गायकी महत्ता और आवश्यकता

गाय विश्वकी माता है—‘गावो विश्वस्य मातर:।’ सूर्य, वरुण, वायु आदि देवताओंको यज्ञ, होममें दी हुई आहुतिसे जो खुराक, पुष्टि मिलती है, वह गायके घीसे ही मिलती है। होममें गायके घीकी ही आहुति दी जाती है, जिससे सूर्यकी किरणें पुष्ट होती हैं। किरणें पुष्ट होनेसे वर्षा होती है और वर्षासे सभी प्रकारके अन्न, पौधे, घास आदि पैदा होते हैं, जिनसे सम्पूर्ण स्थावर-जंगम, चर-अचर प्राणियोंका भरण-पोषण होता है*।

हिन्दुओंके गर्भाधान, जन्म, नामकरण आदि जितने संस्कार होते हैं, उन सबमें गायके दूध, घी, गोबर आदिकी मुख्यता होती है। द्विजातियोंको जो यज्ञोपवीत दिया जाता है, उसमें गायका पञ्चगव्य (दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र) का सेवन कराया जाता है। यज्ञोपवीत-संस्कार होनेपर वे वेद पढ़नेके अधिकारी होते हैं। अच्छे ब्राह्मणका लड़का भी यज्ञोपवीत-संस्कारके बिना वेद पढ़नेका अधिकारी नहीं होता। जहाँ विवाह-संस्कार होता है, वहाँ भी गायके गोबरका लेप करके शुद्धि करते हैं। विवाहके समय गोदानका भी बहुत माहात्म्य है। पुराने जमानेमें वाग्दान (सगाई)के समय बैल दिया जाता था। जननाशौच और मरणाशौच मिटानेके लिये गायका गोबर और गोमूत्र ही काममें लिया जाता है; क्योंकि गायके गोबरमें लक्ष्मीका और गोमूत्रमें गङ्गाजीका निवास है।

जब मनुष्य बीमार हो जाता है, तब उसको गायका दूध पीनेके लिये देते हैं; क्योंकि गायका दूध तुरंत बल, शक्ति देता है। अगर बीमार मनुष्यको अन्न भी न पचे तो उसके पास गायके घी और खाद्य पदार्थोंकी अग्निमें आहुति देनेपर उसके धुएँसे उसको खुराक मिलती है। जब मनुष्य मरने लगता है, तब उसके मुखमें तुलसीमिश्रित गङ्गाजल या गायका दही देते हैं। कारण कि कोई मनुष्य यात्राके लिये रवाना होता है तो उस समय गायका दही लेना माङ्गलिक होता है। जो सदाके लिये यहाँसे रवाना हो रहा है, उसको गायका दही अवश्य देना चाहिये, जिससे परलोकमें उसका मङ्गल हो। अन्तकालमें मनुष्यको जैसे गङ्गाजल देनेका माहात्म्य है, वैसा ही माहात्म्य गायका दही देनेका है।

वैतरणीसे बचनेके लिये गोदान किया जाता है। श्राद्ध-कर्ममें गायके दूधकी खीर बनायी जाती है; क्योंकि पवित्र होनेसे इस खीरसे पितरोंकी बहुत ज्यादा तृप्ति होती है। मनुष्य, देवता, पितर आदि सभीको गायके दूध, घी आदिसे पुष्टि मिलती है। अत: गाय विश्वकी माता है।

गायके अङ्गोंमें सम्पूर्ण देवताओंका निवास बताया गया है। गायकी छाया भी बड़ी शुभ मानी गयी है। यात्राके समय गाय या साँड़ दाहिने आ जाय तो शुभ माना जाता है और उसके दर्शनसे यात्रा सफल हो जाती है। दूध पिलाती गायका दर्शन बहुत शुभ माना जाता है—‘सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा’(मानस, बाल० ३०३।३) गाय महान् पवित्र होती है। उसके शरीरका स्पर्श करनेवाली हवा भी पवित्र होती है। उसके गोबर-गोमूत्र भी पवित्र होते हैं। जहाँ गाय बैठती है, वहाँकी भूमि पवित्र होती है। गायके चरणोंकी रज (धूल) भी पवित्र होती है।

गायसे अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—इन चारोंकी सिद्धि होती है। गोपालनसे, गायके दूध, घी, गोबर आदिसे धनकी वृद्धि होती है। कोई भी धार्मिक कृत्य गायके बिना नहीं होता। सम्पूर्ण धार्मिक कार्योंमें गायका दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र काममें आते हैं। कामनापूर्तिके लिये किये जानेवाले यज्ञोंमें भी गायका घी आदि काममें आता है। बाजीकरण आदि प्रयोगोंमें भी गायके दूध और घीकी मुख्यता रहती है। निष्कामभावसे गायकी सेवा करनेसे मोक्ष होता है। गायकी सेवा करनेमात्रसे अन्त:करण निर्मल होता है। भगवान् श्रीकृष्णने भी बिना जूतीके गायोंको चराया था, जिससे उनका नाम ‘गोपाल’ पड़ा। प्राचीन कालमें ऋषिलोग वनमें रहते हुए अपने पास गायें रखा करते थे। गायके दूध-घीका सेवन करनेसे उनकी बुद्धि बड़ी विलक्षण होती थी,जिससे वे बड़े-बड़े ग्रन्थोंकी रचना किया करते थे। आजकल तो उन ग्रन्थोंको ठीक-ठीक समझनेवाले भी कम हैं। गायके दूध-घीसे वे दीर्घायु होते थे। गायके घीका एक नाम ‘आयु’ भी है। बड़े-बड़े राजालोग भी उन ऋषियोंके पास आते थे और उनकी सलाहसे राज्य चलाते थे।

गाय इतनी पवित्र है कि देवताओंने भी उसको अपना निवास-स्थान बनाया है। जिसका गोबर और गोमूत्र भी इतना पवित्र है, फिर वह स्वयं कितनी पवित्र होगी! एक गायका पूजन करनेसे सब देवताओंका पूजन हो जाता है, जिससे सब देवताओंको पुष्टि मिलती है। पुष्ट हुए देवताओंके द्वारा सम्पूर्ण सृष्टिका संचालन, पालन, रक्षण होता है।

प्रश्नोत्तर

प्रश्न—गायके घीसे आहुति देनेपर वर्षा होती है—ऐसा शास्त्रोंमें आता है। आजकल प्राय: लोग गायके घीसे यज्ञ, होम आदि नहीं करते तो भी वर्षा होती ही है—इसका कारण क्या है?

उत्तर—प्राचीन कालसे जो यज्ञ, होम होते आये हैं, उनका संग्रह अभी बाकी है। उसी संग्रहसे अभी वर्षा हो रही है। परंतु अभी यज्ञ आदि न होनेसे वैसी व्यवस्था नहीं रही है, इसलिये कहीं अतिवृष्टि और कहीं अनावृष्टि हो रही है। वर्षा भी बहुत कम हो रही है।

प्रश्न—वर्षा अग्निमें आहुति देनेसे ही होती है या कर्तव्यका पालन करनेसे होती है?

उत्तर—कर्तव्य-पालनके अन्तर्गत यज्ञ, होम, दान, तप आदि सब कर्म आ जाते हैं। गीताने भी यज्ञ आदिको कर्तव्य-कर्मके अन्तर्गत ही माना है। अगर मनुष्य अपने कर्तव्यका पालन करेंगे तो सूर्य, वरुण, वायु आदि देवता भी अपने कर्तव्यका पालन करेंगे और समयपर वर्षा करेंगे।

प्रश्न—विदेशोंमें यज्ञ आदि नहीं होते, फिर वहाँ देवतालोग वर्षा क्यों करते हैं?

उत्तर—जिन देशोंमें गायें नहीं हैं अथवा जिन देशोंके लोग यज्ञ आदि नहीं करते, वहाँ भी अपने कर्तव्य-कर्मका पालन तो होता ही है। वहाँके लोग अपने कर्तव्यका पालन करते हैं तो देवता भी अपने कर्तव्यका पालन करते हैं अर्थात् वहाँ वर्षा आदि करते हैं।

प्रश्न—ट्रैक्टर आदि यन्त्रोंसे खेती हो जाती है, फिर गाय-बैलकी क्या जरूरत है?

उत्तर—वैज्ञानिकोंने कहा है कि अभी जिस रीतिसे तेल खर्च हो रहा है, ऐसे खर्च होता रहा तो लगभग बीस वर्षोंमें ये तेल आदि सब समाप्त हो जायँगे, जमीनमें तेल नहीं रहेगा। जब तेल ही नहीं रहेगा, तब यन्त्र कैसे चलेंगे? उस समय गाय-बैल ही काम आयेंगे।

प्रश्न—तेल नहीं रहेगा तो उसकी जगह कोई नया आविष्कार हो जायगा, फिर गायोंकी क्या आवश्यकता?

उत्तर—नया आविष्कार हो अथवा न हो, पर जो चीज अभी अपने हाथमें है, उसको क्यों नष्ट करें? जो चीज अभी हाथमें नहीं है, भविष्यपर निर्भर है, उसको लेकर अभीकी चीजको नष्ट करना बुद्धिमानी नहीं है। जैसे, गर्भके बालककी आशासे गोदके बालकको समाप्त करना बुद्धिमानी नहीं है, प्रत्युत बड़ी भारी भूल है, महान् मूर्खता है, घोर पाप, अन्याय है। गायोंकी परम्परा तो युगोंतक चलती रहेगी, पर आविष्कारोंकी परम्परा भी चलती रहेगी—इसका क्या भरोसा? अगर विश्वयुद्ध छिड़ जाय तो क्या आविष्कार सुरक्षित रह सकेंगे? पीछेको कदम तो उठा लिया और आगे जगह मिली नहीं तो क्या दशा होगी? इसलिये आगे आविष्कार होगा—इस विचारको लेकर गायोंका नाश नहीं करना चाहिये, प्रत्युत प्रयत्नपूर्वक उनकी रक्षा करनी चाहिये। उत्पादनके जितने उपाय हों, उतना ही बढ़िया है। उनको नष्ट करनेसे क्या लाभ? अगर आगे आविष्कार हो भी जाय तो भी गायें निरर्थक नहीं हैं। गायोंके गोबर-गोमूत्रसे अनेक रोग दूर होते हैं। उनसे बनी खादके समान कोई खाद नहीं है। गायके दूधके समान कोई दूध नहीं है। गायसे होनेवाले लाभोंकी गणना नहीं की जा सकती।

प्रश्न—भैंसे और ऊँटके द्वारा भी खेती हो सकती है, फिर गाय-बैलकी क्या जरूरत?

उत्तर—खेतीमें जितनी प्रधानता बैलोंकी है, उतनी प्रधानता अन्य किसीकी भी नहीं है। भैंसेके द्वारा भी खेती की जाती है, पर खेतीमें जितना काम बैल कर सकता है, उतना भैंसा नहीं कर सकता। भैंसा बलवान् तो होता है, पर वह धूप सहन नहीं कर सकता। धूपमें चलनेसे वह जीभ निकाल देता है, जबकि बैल धूपमें भी चलता रहता है। कारण कि भैंसेमें सात्त्विक बल नहीं होता, जबकि बैलमें सात्त्विक बल होता है। बैलोंकी अपेक्षा भैंसे कम भी होते हैं। ऊँटसे भी खेती की जाती है, पर ऊँट भैंसोंसे भी कम होते हैं और बहुत महँगे होते हैं। खेती करनेवाला हरेक आदमी ऊँट नहीं खरीद सकता। आजकल बड़ी संख्यामें अच्छे-अच्छे जवान बैल मारे जानेके कारण बैल भी महँगे हो गये हैं, तो भी वे ऊँट-जितने महँगे नहीं हैं। यदि घरोंमें गायें रखी जायँ तो बैल घरोंमें ही पैदा हो जाते हैं, खरीदने नहीं पड़ते। विदेशी गायोंके जो बैल होते हैं, वे खेतीमें काम नहीं आ सकते; क्योंकि उनके कंधे न होनेसे उनपर जुआ नहीं रखा जा सकता। वे गरमी भी सहन नहीं कर सकते। वास्तवमें जिस देशका पशु है, वह उसी देशमें काम आ सकता है। अत: अपने देशकी गायोंका पालन करना चाहिये, उनकी विशेषरूपसे रक्षा करनी चाहिये।

बैलोंसे जितनी बढ़िया खेती होती है, उतनी ट्रैक्टरोंसे नहीं होती। देखनेमें तो ट्रैक्टरोंसे और रासायनिक खादसे खेती जल्दी हो जाती है, पर जल्दी होनेपर भी वह बढ़िया नहीं होती। बैलोंसे की गयी खेतीका अनाज बड़ा पवित्र होता है। गोबर-गोमूत्रकी खादसे जो अन्न पैदा होता है, वह बड़ा पवित्र, शुद्ध, निर्मल होता है।

खेतका और गायका घनिष्ठ सम्बन्ध है। खेतमें पैदा होनेवाले घास आदिसे गायकी पुष्टि होती है और गायके गोबर-मूत्रसे खेतकी पुष्टि होती है। विदेशी खाद डालनेसे कुछ ही वर्षोंमें जमीन खराब हो जाती है अर्थात् उसकी उपजाऊ शक्ति नष्ट हो जाती है। परंतु गोबर-गोमूत्रसे जमीनकी उपजाऊ शक्ति ज्यों-की-त्यों बनी रहती है। इसलिये पुराने जमानेमें खेतोंमें खाद डालनेकी प्रथा ही नहीं थी और सौ-सौ वर्षोंतक खेतोंमें अन्न पैदा होता रहता था। विदेशोंमें रासायनिक खादसे बहुत-से खेत खराब हो गये हैं, जिनको उपजाऊ बनानेके लिये वे गोबर काममें ले रहे हैं।

प्रश्न—गायके दूधकी क्या महिमा है?

उत्तर—गायका दूध जितना सात्त्विक होता है, उतना सात्त्विक दूध किसीका भी नहीं होता। हमारे देशकी गायें सौम्य और सात्त्विक होती हैं, इसलिये उनका दूध भी सात्त्विक होता है। जिसको पीनेसे बुद्धि तीक्ष्ण होती है और स्वभाव सौम्य, शान्त होता है। विदेशी गायोंका दूध तो ज्यादा होता है, पर उनके दूधमें उतनी सात्त्विकता नहीं होती तथा उनमें गुस्सा भी ज्यादा होता है। अत: उनका दूध पीनेसे मनुष्यका स्वभाव भी क्रूर होता है। विदेशी गायोंके दूधमें घी कम होता है और वे खाती भी ज्यादा हैं।

भैंसके दूधमें घी ज्यादा होनेसे वह शरीरको मोटा तो करता है, पर वह दूध सात्त्विक नहीं होता। गाड़ी चलानेवाले जानते ही हैं कि गाड़ीका हार्न सुनते ही गायें सड़कके किनारे हो जाती हैं, जबकि भैंस सड़कमें ही खड़ी रहती है। इसलिये भैंसके दूधसे बुद्धि स्थूल होती है। सैनिकोंके घोड़ोंको गायका दूध पिलाया जाता है, जिससे वे घोड़े बहुत तेज होते हैं। एक बार सैनिकोंने परीक्षाके लिये कुछ घोड़ोंको भैंसका दूध पिलाया, जिससे घोड़े खूब मोटे हो गये। परंतु जब नदी पार करनेका काम पड़ा, तब वे घोड़े पानीमें बैठ गये! भैंस पानीमें बैठा करती है, इसलिये वही स्वभाव घोड़ोंमें भी आ गया।

ऊँटनीका दूध भी निकलता है, पर उस दूधका दही, मक्खन होता ही नहीं। उसका दूध तामसी होनेसे दुर्गतिमें ले जानेवाला होता है। स्मृतियोंमें ऊँट, कुत्ते, गधे आदिको अस्पृश्य बताया गया है। बकरीका दूध नीरोग करनेवाला एवं पचनेमें हलका होता है, पर वह गायके दूधकी तरह बुद्धिवर्धक और सात्त्विक बात समझनेके लिये बल देनेवाला नहीं होता।

गायके दूधसे निकला घी ‘अमृत’ कहलाता है। स्वर्गकी अप्सरा उर्वशी राजा पुरूरवाके पास गयी तो उसने अमृतकी जगह गायका घी पीना ही स्वीकार किया—‘घृतं मे वीर भक्ष्यं स्यात्’ (श्रीमद्भा० ९।१४।२२)।

प्रश्न—गायके गोबर और गोमूत्रकी क्या महिमा है?

उत्तर—गायके गोबरमें लक्ष्मीजीका और गोमूत्रमें गङ्गाजीका निवास माना गया है। इसलिये गायके गोबर-गोमूत्र भी बड़े पवित्र हैं। गोबरसे लिपे हुए घरोंमें प्लेग, हैजा आदि भयंकर बीमारियाँ नहीं होतीं। इसके सिवाय युद्धके समय गोबरसे लिपे हुए मकानोंपर बमका उतना असर नहीं होता, जितना सीमेंट आदिसे बने हुए मकानोंपर होता है।

गोबरमें जहर खींचनेकी विशेष शक्ति होती है। काशीमें कोई आदमी साँप काटनेसे मर गया। लोग उसकी दाह-क्रिया करनेके लिये उसको गङ्गाके किनारे ले गये। वहाँ एक साधु रहता था। उसने पूछा कि इस आदमीको क्या हुआ? लोगोंने कहा कि यह साँप काटनेसे मरा है। साधुने कहा कि यह मरा नहीं है, तुमलोग गायका गोबर ले आओ। गोबर लाया गया। साधुने जमीनपर गोबर डालकर उसपर उस आदमीको लिटा दिया और उसकी नासिकाको छोड़कर पूरे शरीरपर गोबर थोप दिया। आँखें मीचकर, उनपर कपड़ा रखकर उसके ऊपर भी गोबर रख दिया। आधे घंटेके बाद दूसरी बार उसपर गोबर थोप दिया। कुछ घंटोंमें उस आदमीके श्वास चलने लगे और वह जी उठा! अगर किसी अङ्गमें बिच्छू काट जाय तो जहाँतक विष चढ़ा हुआ है, वहाँतक गोबर लगा दिया जाय तो विष उतर जाता है। हमने सुना है कि शरीरमें कोई भी रोग हो, जमीनमें गहरा गड्ढा खोदकर उसमें रोगीको खड़ा कर दे और उसके गलेतक वह गड्ढा गोबरसे भर दे। लगभग आधे घंटेतक अथवा जितनी देरतक रोगी सुगमतापूर्वक सहन कर सके, उतनी देरतक वह गड्ढेमें खड़ा रहे। जबतक रोग शान्त न हो जाय, तबतक प्रतिदिन यह प्रयोग करता रहे।

आजकल गोबरसे गैस पैदा की जाती है। उस गैससे बिजली भी पैदा की जाती है, जिसको कई जगह काममें लिया जाता है। गैस निकलनेके बाद गोबरकी तेजी कम हो जाती है और वह खेतोंमें देनेके लिये बढ़िया खाद हो जाती है।

संखिया, भिलावा आदि बड़े-बड़े जहरोंकी शुद्धि भी गोमूत्रसे ही होती है। सोना, चाँदी आदि धातुएँ भी गोमूत्रसे शुद्ध की जाती हैं। भस्म बनाते समय उन धातुओंको तपाकर तेलमें, गायकी छाछमें और गोमूत्रमें बुझाकर शुद्ध किया जाता है।

छोटी बछड़ीका गोमूत्र प्रतिदिन तोला-दो-तोला पीनेसे पेटके रोग दूर होते हैं। यकृत्-पीड़ामें भी गोमूत्रका सेवन बड़ा लाभदायक होता है। एक संतको दमारोग था। उन्होंने छोटी बछड़ीका गोमूत्र प्रात: खाली पेट एक तोला प्रतिदिन लेना शुरू किया तो उनका रोग बहुत कम हो गया। छातीमें, कलेजेमें दर्द होता हो तो एक बर्तनमें गोमूत्र लेकर उसको गरम करे। उस बर्तनपर एक लोहेकी छलनी रखकर उसपर कपड़ा या पुरानी रुई रख दे। वह कपड़ा या रुई गरम हो जाय तो उससे छातीपर सेक करता रहे। इससे दर्द दूर हो जाता है। गोमूत्रसे स्नान करनेसे शरीरकी खुजली मिटती है।

—इस प्रकार गोबर और गोमूत्रसे अनेक रोग दूर होते हैं।

प्रश्न—गोरक्षासे क्या लाभ हैं?

उत्तर—गायकी रक्षासे मनुष्य, देवता, भूत-प्रेत, यक्ष-राक्षस,पशु-पक्षी, वृक्ष-घास आदि सबकी रक्षा होती है। पृथ्वीपर कोई भी ऐसा स्थावर-जंगम प्राणी नहीं है, जो गायसे पुष्टि न पाता हो। गाय अर्थ, धर्म, काम और मोक्षको सिद्ध करनेवाली, लोक-परलोकमें सहायता करनेवाली और नरकोंसे उद्धार करनेवाली है।

गोरक्षाके लिये बलिदान करनेवालोंकी कथाओंसे इतिहास, पुराण भरे पड़े हैं। बड़े भारी दु:खकी बात है कि आज हमारे देशमें पैसोंके लोभसे प्रतिदिन हजारोंकी संख्यामें गायोंकी हत्या की जा रही है! अगर इसी तरह गोहत्या होती रही तो एक समय गोवंश समाप्त हो जायगा। जब गायें नहीं रहेंगी, तब देशकी क्या दशा होगी, कितनी आफतें आयेंगी—इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। जब गायें खत्म हो जायँगी और जमीनसे तेल निकलना बंद हो जायगा,तब खेती कैसे होगी? खेती न होनेसे अन्न तथा वस्त्र (कपास) कैसे मिलेगा? लोगोंको शरीर-निर्वाहके लिये अन्न, जल और वस्त्र मिलना भी मुश्किल हो जायगा। राजस्थानके गाँवोंमें मैंने देखा है कि पहले वहाँ बैलोंके द्वारा जमीनसे पानी निकाला जाता था। फिर वहाँ बिजली आनेसे बिजलीसे पानी निकलने लगा और बैलोंको लोगोने बिक्री कर दिया। अब अगर बिजली बंद हो जाय तो पानी भी बंद हो जाता है और लोग दु:ख पाते हैं! यह प्रत्यक्ष देखी हुई बात है।

गोरक्षासे सब तरहका लाभ है—इस बातको धर्मप्राण भारतवर्ष ही समझ सकता है, दूसरे देश नहीं समझ सकते; क्योंकि उनके पास गहरी धार्मिक और पारमार्थिक बातोंको समझनेके लिये वैसी बुद्धि नहीं है और वैसे शास्त्र भी नहीं हैं। जो लोग विदेशी संस्कृति, सभ्यतासे प्रभावित हैं तथा केवल भौतिक चकाचौंधमें फँसे हुए हैं, वे भी गायका महत्त्व नहीं समझ सकते। वे ऋषि-मुनियोंकी बातोंको तो मानते नहीं और स्वयं जानते नहीं! ऋषि-मुनियोंने, राजा-महाराजाओंने, धर्मात्माओंने गोरक्षाके लिये बड़े-बड़े कष्ट सहे तो क्या वे सब बेसमझ थे? क्या समझ अब ही आयी है?

प्रश्न—लोगोंमें गोरक्षाकी भावना कम क्यों हो रही है?

उत्तर—गायके कलेजे, मांस, खून आदिसे बहुत-सी अँग्रेजी दवाइयाँ बनती हैं। उन दवाइयोंका सेवन करनेसे गायके मांस, खून आदिका अंश लोगोंके पेटमें चला गया है, जिससे उनकी बुद्धि मलिन हो गयी है और उनकी गायके प्रति श्रद्धा, भावना नहीं रही है।

लोग पापसे पैसा कमाते हैं और उन्हीं पैसोंका अन्न खाते हैं, फिर उनकी बुद्धि शुद्ध कैसे होगी और बुद्धि शुद्ध हुए बिना सच्ची, हितकर बात अच्छी कैसे लगेगी?

स्वार्थबुद्धि अधिक होनेसे मनुष्यकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, बुद्धि तामसी हो जाती है, फिर उसको अच्छी बातें भी विपरीत दीखने लगती हैं*। आजकल मनुष्योंमें स्वार्थ-भावना बहुत ज्यादा बढ़ गयी है, जिससे उनमें गोरक्षाकी भावना कम हो रही है।

गायके मांस, चमड़े आदिके व्यापारमें बहुत पैसा आता हुआ दीखता है। मनुष्य लोभके कारण पैसोंकी तरफ तो देखता है,पर गोवंश नष्ट हो रहा है, परिणाममें हमारी क्या दशा होगी, कितने भयंकर नरकोंमें जाना पड़ेगा, कितनी यातना भोगनी पड़ेगी—इस तरफ वह देखता ही नहीं! तात्पर्य है कि तात्कालिक लाभको देखनेसे मनुष्य भविष्यपर विचार नहीं कर सकता; क्योंकि लोभके कारण उसकी विचार करनेकी शक्ति कुण्ठित हो जाती है, दब जाती है। लोभके कारण वह अपना वास्तविक हित सोच ही नहीं सकता।

प्रश्न—गायमें सब देवताओंका निवास है, फिर वे गायकी हत्या क्यों होने देते हैं?

उत्तर—गायमें देवताओंका निवास पवित्रताकी दृष्टिसे कहा गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि देवता गायमें साक्षात् रूपसे निवास करते हैं। जैसे दियासलाईमें अग्नि रहती है, पर उसको रुईके भीतर रख दिया जाय तो उससे रुई नहीं जलती; क्योंकि अग्नि दियासलाईमें अप्रकटरूपसे, निराकार-रूपसे रहती है। परमात्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें रहते हैं, फिर भी प्राणी मरते हैं; क्योंकि परमात्मा निर्लिप्तरूपसे, अप्रकटरूपसे रहते हैं। ऐसे ही गायके शरीरमें सम्पूर्ण देवता अप्रकटरूपसे, निर्लिप्तरूपसे रहते हैं। जैसे परमात्माको सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें विद्यमान कहनेका तात्पर्य है कि हृदय पवित्र और परमात्माका उपलब्धि-स्थान है, ऐसे ही देवताओंको गायके शरीरमें विद्यमान कहनेका तात्पर्य है कि गाय महान् पवित्र है और उसकी सेवा-पूजासे सम्पूर्ण देवताओंकी सेवा-पूजा हो जाती है।

प्रश्न—गोसेवासे क्या लाभ है?

उत्तर—जैसे भगवान् की सेवा करनेसे त्रिलोकीकी सेवा होती है, ऐसे ही निष्कामभावसे गायकी सेवा करनेसे विश्वमात्रकी सेवा होती है; क्योंकि गाय विश्वकी माता है। गायकी सेवासे लौकिक और पारलौकिक—दोनों तरहके लाभ होते हैं। गायकी सेवासे अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—ये चारों पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं। रघुवंश भी गायकी सेवासे ही चला था।

प्रश्न—गोरक्षाके लिये क्या करना चाहिये?

उत्तर—गायोंकी रक्षाके लिये उनको अपने घरोंमें रखना चाहिये और उनका पालन करना चाहिये। गायके ही दूध-घीका सेवन करना चाहिये, भैंस आदिका नहीं। गायोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही गोशालाएँ बनानी चाहिये, दूधके उद्देश्यसे नहीं। जितनी गोचर-भूमियाँ हैं, उनकी रक्षा करनी चाहिये तथा सरकारसे और गोचर-भूमियाँ छुड़ाई जानी चाहिये। सरकारकी गोहत्या-नीतिका कड़ा विरोध करना चाहिये और वोट उनको ही देना चाहिये, जो पूरे देशमें पूर्णरूपसे गोहत्या बंद करनेका वचन दें।

खेती करनेवाले सज्जनोंको चाहिये कि वे गाय, बछड़ा, बैल आदिको बेचें नहीं। गाय और माय बेचनेकी नहीं होती। जबतक गाय दूध और बछड़ा देती है, बैल काम करता है, तबतक उनको रखते हैं। जब वे बूढ़े हो जाते हैं, तब उनको बेच देते हैं—यह कितनी कृतघ्नताकी, पापकी बात है! गाँधीजीने ‘नवजीवन’ अखबारमें लिखा था कि ‘बूढ़ा बैल जितना घास (चारा) खाता है उतना गोबर और गोमूत्र पैदा कर देता है अर्थात् अपना खर्चा आप ही चुका देता है।’

बंबईके देवनार-कसाईखानेमें मैंने देखा है कि वहाँ अच्छे-अच्छे, जवान-जवान बैल ट्रकोंमें भरकर लाये जाते हैं और खड़े कर दिये जाते हैं। दूरतक सींग-ही-सींग दीखते थे। ऐसे बैलोंको मशीनोंके द्वारा बड़ी बुरी तरहसे मारते हैं। जीते-जी उनका चमड़ा उतारा जाता है; क्योंकि जीते हुएका चमड़ा उतारा जाय तो वह बहुत नरम होता है। जो गायों और बैलोंको बेचते हैं, उनको यह हत्या लगती है! अत: अपनी पूरी शक्ति लगाकर हर हालतमें गायोंकी रक्षा करना, उनको कत्लखानोंमें जानेसे रोकना तथा उनका पालन करना, उनकी वृद्धि करना हमारा परम कर्तव्य है।