गीताका अनासक्तियोग
‘योग’ शब्दके कई अर्थ होते हैं। व्याकरणकी दृष्टिसे ‘योग’ शब्द तीन धातुओंसे बनता है—
(१) ‘युजिर् योगे’—सम्बन्ध अर्थात् भगवान् के साथ नित्य-सम्बन्ध।
(२) ‘युज् समाधौ’—समाधिमें स्थिति।
(३) ‘युज् संयमने’—संयमन अर्थात् सामर्थ्य, प्रभाव।
इस प्रकार ‘योग’ शब्दके भीतर सम्बन्ध, समाधि (एकाग्रता) और सामर्थ्य—तीनों बातें हैं। यद्यपि गीतामें ‘योग’ शब्द उपर्युक्त तीनों अर्थोंमें आया है, तथापि मुख्यरूपसे यह भगवान् के साथ नित्य-सम्बन्ध (नित्ययोग) के अर्थमें आया है—
तं विद्याद् दु:खसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।
(६।२३)
‘जिसमें दु:खोंके संयोगका वियोग है, उसको योग नामसे जानना चाहिये।’
संसारके जितने भी सम्बन्ध हैं, वे सब-के-सब बिछुड़नेवाले हैं, संसारके सब संयोगोंका वियोग होनेवाला है। अभी जो संयोग दीखता है, वह पहले नहीं था और आगे नहीं रहेगा, बीचमें ही संयोग दीखता है। इसमें संयोग अनित्य है और वियोग नित्य है। संसारके साथ वियोग नित्य है और परमात्माके साथ योग नित्य है। अत: संसारके साथ वियोग ही परमात्माके साथ योग है और परमात्माके साथ योग ही संसारके साथ वियोग है। हम मानें चाहे न मानें, स्वीकार करें चाहे न करें, दृष्टि डालें चाहे न डालें; परन्तु भगवान् के साथ हमारा सम्बन्ध नित्य है। उस नित्य-सम्बन्धका हमें अनुभव क्यों नहीं हो रहा है? कारण कि जिनका वियोग नित्य है, उनमें हमने आसक्ति कर ली। हम जानते हैं कि शरीर, धन-सम्पत्ति, कुटुम्ब-परिवार, आदर-सत्कार, मान-अपमान आदि रहनेवाले नहीं हैं, प्रत्युत जानेवाले हैं, इनका वियोग निश्चित है, फिर भी हमने भूलसे इन चीजोंमें प्रियता पैदा कर ली अर्थात् इनमें आसक्ति कर ली कि इनके साथ हमारा सम्बन्ध नित्य बना रहे। यदि इन चीजोंमें हमारी अनासक्ति हो जाय तो योगका अर्थात् परमात्माके साथ हमारे नित्य-सम्बन्धका अनुभव हो जायगा। उस परमात्माके साथ कभी किसी जीवका वियोग हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं, होना सम्भव ही नहीं। अत: ‘अनासक्तियोग’ का अर्थ हुआ—जिसके साथ कभी हमारा संयोग हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं, होना सम्भव ही नहीं, उस संसारसे अनासक्ति होकर योग (परमात्माके नित्य-सम्बन्ध)का अनुभव हो जाना।
आसक्ति मिटनेपर संसारके अभाव (नित्यवियोग) का और परमात्माके भाव (नित्ययोग)का अनुभव हो जाता है। गीतामें आया है—
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।
(२। १६)
‘असत् का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है।’
तात्पर्य है कि असत्-वस्तुका अभाव नित्य है और सत्-वस्तुका भाव नित्य है। अभी भले ही संसारका संयोग दीखे, पर अन्तमें वह वियोगमें परिणत होगा। परन्तु परमात्माके साथ वियोग दीखते हुए भी उनके साथ नित्ययोग है। नाशवान् के साथ जो माना हुआ संयोग है, वह बना रहे—यह इच्छा ही नित्ययोगके अनुभवमें बाधक है।
विचार करें, एक समय हम अपनेको बालक कहते थे, पर उस बालकपनके साथ हमारा स्वत: वियोग हो गया, हमने वियोग किया नहीं। यह कोई नहीं कह सकता कि अमुक तारीखको मैंने बालकपन छोड़ दिया। जैसे बालकपनका स्वत: वियोग हो गया, ऐसे ही जवानी और वृद्धावस्थाका भी स्वत: वियोग हो जायगा। इस प्रकार प्रत्येक देश, काल, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति, घटना आदिका प्रतिक्षण स्वत: वियोग हो रहा है। परन्तु आसक्तिके कारण इनके साथ संयोग दीख रहा है।
जिनका वियोग अवश्यम्भावी है, उनको हम अपना मान लेते हैं, उनसे सुख लेना चाहते हैं, उनमें हमारा मन चिपक जाता है, उनको हम नित्य रखना चाहते हैं, उनमें प्रियता पैदा हो जाती है, उनमें मन खिंचता है—यह ‘आसक्ति’ कहलाती है। यही आसक्ति जब भगवान् में हो जाती है, तब इसको ‘प्रेम’ कहते हैं। आसक्ति होनेसे संसार नित्य दीखता है और प्रेम होनेसे परमात्मा नित्य दीखते हैं। आजकल लोगोंने संसारकी आसक्तिका नाम ‘प्रेम’ रख दिया है, यह बहुत बड़ी गलती है। प्रेम सदा अविनाशीमें ही होता है, नाशवान् में नहीं।
जिन शरीर, कुटुम्बी, अवस्था, घटना, परिस्थिति आदिके साथ हम अपना सम्बन्ध मानते हैं, वह सम्बन्ध पहले भी नहीं था, पीछे भी नहीं रहेगा और वर्तमानमें भी उसका निरन्तर वियोग हो रहा है। इस निरन्तर होनेवाले वियोगमें कभी नागा नहीं होता, कभी छुट्टी नहीं होती, कभी अनध्याय नहीं होता, कभी विश्राम नहीं होता। ऐसा होनेपर भी इनके साथ संयोग दीखता है—यही आसक्ति है। यह आसक्ति ही बाँधनेवाली है—
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥
(गीता १३।२१)
‘गुणोंका संग ही इस मनुष्यके ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बनता है।’
तात्पर्य है कि गुणोंका संग, आसक्ति, प्रियता ही हमें बाँधनेवाली है, परमात्मासे वियोगका अनुभव करानेवाली है।
आसक्तिके ही कारण हमें सुख और दु:ख, अनुकूलता और प्रतिकूलता—दोनों अलग-अलग दीखते हैं। आसक्ति मिटनेपर दोनों समान हो जाते हैं; क्योंकि सुख भी ठहरनेवाला नहीं है और दु:ख भी ठहरनेवाला नहीं है। सुख आते हुए अच्छा लगता है, जाते हुए बुरा लगता है और दु:ख आते हुए बुरा लगता है, जाते हुए अच्छा लगता है। अत: दोनोंमें कोई भेद नहीं है। एक श्लोक आता है—
शत्रुर्दहति संयोगे वियोगे मित्रमप्यहो।
उभयोर्दु:खदायित्वे को भेद: शत्रुमित्रयो:॥
‘शत्रु संयोगमें दु:ख देता है और मित्र वियोगमें दु:ख देता है; दोनों ही दु:ख देनेवाले हैं; अत: दोनोंमें क्या भेद हुआ?’
आसक्ति ही इन दोनोंमें भेद पैदा करती है और यही संसारमें बाँधती है। अनासक्त होते ही भगवान् के साथ नित्य-सम्बन्धका अनुभव स्वत: हो जाता है और भगवान् के साथ सम्बन्ध जोड़नेसे आसक्ति मिट जाती है। कर्मयोग और ज्ञानयोग आसक्तिका नाश करते हैं और आसक्तिका नाश होनेपर भगवान् के साथ सम्बन्ध हो जाता है। भक्तियोग भगवान् के साथ सम्बन्ध जोड़ता है और सम्बन्ध जुड़नेपर संसारकी आसक्तिका नाश हो जाता है। इसलिये गीताने ‘योग’ की दो परिभाषाएँ दी हैं—‘दु:खसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्’ (६।२३) और ‘समत्वं योग उच्यते’ (२।४८)*। तात्पर्य है कि संसारके वियोगका नाम भी योग है और परमात्माके नित्ययोगका नाम भी योग है। संसारका वियोग नित्य-निरन्तर रहता है और परमात्माका योग नित्य-निरन्तर रहता है। जो नित्य-निरन्तर रहता है, उसीको ‘समता’ कहते हैं। वह समता परमात्माका स्वरूप है—‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’ (गीता ५।१९)। संसारका वियोग होनेपर परमात्माके योगका अनुभव हो जाता है और परमात्माके योगका अनुभव होनेपर संसारके साथ वियोग हो जाता है।
हमारे सामने दो चीजें हैं—नित्य और अनित्य। विचार करें, हम जो बालकपनमें थे, वही हम आज भी हैं; परन्तु वह शरीर नहीं रहा, वह स्थान नहीं रहा, वह समय नहीं रहा, वे साथी नहीं रहे, वह अवस्था नहीं रही, वह परिस्थिति नहीं रही, वे भाव नहीं रहे, सबके साथ वियोग हो गया। जैसे गङ्गाजीका प्रवाह नित्य-निरन्तर बहता रहता है, ऐसे ही संसार-निरन्तर बह रहा है, एक क्षण भी स्थिर नहीं होता। नित्य-निरन्तर बहते हुए अभाव (नाश)में जा रहा है। हम जितने वर्षोंके हो गये, उतने वर्ष बीत गये हैं। शरीरको लेकर कहते हैं कि हम जी रहे हैं’—यह बिलकुल झूठी बात है! सच्ची बात तो यह है कि हम मर रहे हैं। हम कहते हैं कि पचास वर्षके हो गये तो वास्तवमें हमारी उम्रमेंसे पचास वर्ष खत्म हो गये। अब बाकी कितनी उम्र है—इसका तो पता नहीं, पर पचास वर्ष तो मर ही गये—इसमें सन्देह नहीं है। जब जन्मदिन आता है, तब हम बड़ा आनन्द मनाते हैं कि आज हम इतने वर्षके हो गये! वास्तवमें इतने वर्षके हो नहीं गये, प्रत्युत इतने वर्ष मर गये। तात्पर्य है कि शरीर और संसारके साथ हमारा नित्य-निरन्तर वियोग हो रहा है। इस वियोगका हम अनुभव कर लें तो परमात्माके नित्ययोगका अनुभव हो जायगा।
एक दृष्टान्त दिया जाता है आपके घर लड़का भी जन्मता है और लड़की भी। आपके मनमें यह भाव रहता है कि लड़का तो रहनेवाला है और लड़की जानेवाली है। इसलिये लड़केमें आपकी जितनी आसक्ति होती है, उतनी लड़कीमें नहीं होती। लड़की घरपर रहनेवाली नहीं है—ऐसा निश्चय होनेपर उसका उतना मोह नहीं रहता। इसी तरह शरीर, पदार्थ, धन-सम्पत्ति, आदर-सत्कार, मान-बड़ाई आदि सब-की-सब कन्या है, जो आपके साथ रहनेवाली नहीं है। संसारमात्र आपसे निरन्तर अलग हो रहा है। यह अलग होना कभी बन्द नहीं होता। अन्तमें संसारका वियोग हो जायगा—यह बिलकुल अकाटॺ बात है। ब्रह्माकी आयुसे भी अधिक आयु मिल जाय तो भी संसारका संयोग किसीका भी कभी रह नहीं सकता। ऐसा होनेपर भी आसक्तिके कारण संसारका सम्बन्ध स्थिर प्रतीत होता है। इस आसक्तिको मिटाना ही मनुष्यका खास उद्देश्य है और इसीमें मनुष्यजन्मकी सफलता है; क्योंकि अन्य जन्मोंमें ऐसा विवेक सम्भव नहीं है।
मनसे वस्तुओंको अपना मानना ही ममता (आसक्ति) है। बाहरसे अर्थात् व्यवहारमात्रमें वस्तुओंको अपना मानना ममता नहीं है। व्यवहारमें अपनेपनका सम्बन्ध केवल सेवाके लिये ही रखना है। केवल एक-दूसरेकी सेवाके लिये माना हुआ सम्बन्ध बन्धनकारक नहीं होता। अपने स्वार्थके लिये माना हुआ सम्बन्ध ही बाँधनेवाला होता है।
संसारके साथ हमारा सम्बन्ध टिक नहीं सकता और परमात्माके साथ हमारा सम्बन्ध मिट नहीं सकता। परन्तु नाशवान् में आसक्तिके कारण हमें परमात्माके साथ अपने सम्बन्धका भान नहीं होता। नाशवान् में आसक्ति होनेपर फिर निरन्तर नाशवान्-ही-नाशवान् का सम्बन्ध दीखता है।
प्रश्न—नाशवान् की आसक्तिका नाश कैसे हो?
उत्तर—इसका बड़ा सीधा-सरल उपाय यह है कि जिन-जिनके साथ हमारी आसक्ति है, उन-उनकी सेवा करें और बदलेमें उनसे मान, आदर, सेवा, सत्कार, एहसान आदि कुछ भी न चाहें। जिन व्यक्तियोंमें अपनापन है, उन व्यक्तियोंकी सेवा करें। जिन पदार्थोंमें अपनापन है, उन पदार्थोंको सेवामें लगा दें। शरीरमें अपनापन है तो शरीरसे परिश्रम करके सेवा करें। जितना-जितना दूसरोंको सुख पहुँचानेका भाव पैदा हो जायगा, उतना-उतना हमारा वस्तुओंके साथ सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा।
जब अधिकमास आता है, तब बहनें-माताएँ दान करनेके लिये थाली, गिलास, कटोरी, लोटा, छाता, आसन, कपड़ा आदि वस्तुएँ इकट्ठा करती हैं। उनमेंसे एक कटोरी भी कोई बालक ले आता है तो वे कहती हैं कि अरे! यह देनेकी चीज है, अपनी चीज नहीं है। अपने ही पैसोंसे खरीदी हुई और अपने ही घरमें रखी हुई होनेपर भी हम उसको अपनी नहीं मानते और अपने काममें नहीं लेते। इसी तरह ये सब-की-सब वस्तुएँ सेवाके लिये हैं, अपने सुखभोगके लिये नहीं हैं—ऐसा निश्चय कर लें तो इस विषयमें आसक्ति मिट जायगी।
इस मनुष्य-शरीरका फल सुख भोगना है ही नहीं—‘एहि तन कर फल बिषय न भाई।’ (मानस ७।४४। १)। यह तो केवल दूसरोंको सुख पहुँचानेके लिये, दूसरोंकी सेवा करनेके लिये ही है। अगर हम सेवामें लग जायँ, मात्र प्राणियोंके हितमें हमारी प्रीति हो जाय तो आसक्ति मिट जायगी—‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता:’ (गीता १२।४)।
एक सिद्धान्त है कि जो आदि और अन्तमें है, वह वर्तमानमें भी है१ तथा जो आदि और अन्तमें नहीं है, वह वर्तमानमें भी नहीं है२। अगर वर्तमानमें हम अस्सी-नब्बे वर्षके हैं तो नब्बे वर्षसे पहले यह शरीर, घर, कुटुम्ब, धन हमारा नहीं था और नब्बे-सौ वर्षोंके बाद हमारा नहीं रहेगा; अत: वर्तमानमें भी यह हमारा नहीं है। इसका निरन्तर वियोग हो रहा है। परन्तु परमात्माके साथ हमारा सम्बन्ध पहले भी था, आगे भी रहेगा और वर्तमानमें भी है। तात्पर्य है कि परमात्माका अंश होनेसे उनके साथ हमारा निरन्तर योग है। सुख लेनेके लिये हम नाशवान् से सम्बन्ध जोड़ लेते हैं—इसका नाम आसक्ति है। हमें सुख लेना नहीं है, प्रत्युत सुख देना है। अगर हम केवल दूसरोंको सुख पहुँचानेमें, दूसरोंका हित करनेमें, दूसरोंकी सेवा करनेमें लग जायँ तो हमारी आसक्ति मिट जायगी। परन्तु गलती यह होती है कि हम सुख लेनेके लिये दूसरोंको सुख पहुँचाते हैं। जैसे व्यापारी मुनाफेके लिये वस्तुएँ खरीदता है और मुनाफेके लिये बिक्री करता है, ऐसे ही हम अपने सुखके लिये दूसरोंसे सम्बन्ध जोड़ते हैं और अपने सुखके लिये सम्बन्ध तोड़ते हैं। इस प्रकार हमने अपने सुखको ही पकड़ रखा है—यह आसक्ति है।
हमें नाशवान् सुख नहीं लेना है, प्रत्युत अविनाशी सुख लेना है। वह अविनाशी सुख (आनन्द) नित्यप्राप्त है। जैसे पृथ्वीपर रात और दिन दोनों होते हैं, पर सूर्यमें न रात है और न रातके साथ रहनेवाला दिन है। वहाँ तो नित्य दिन (प्रकाश) है। ऐसे ही संसारमें सुख और दु:ख दो होते हैं, पर परमात्मामें न सुख है, न दु:ख है, प्रत्युत नित्य सुख (आनन्द) है—
राम सच्चिदानंद दिनेसा।
नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा॥
(मानस १।११६।३)
वस्तुका त्याग नहीं करना है, प्रत्युत उससे सुख लेनेकी आशा, कामना और भोगका त्याग करना है। शरीरका त्याग करेंगे तो मर जायँगे; अत: शरीरसे सुख लेनेकी इच्छाका, उसके जीते रहनेकी इच्छाका त्याग करना है। इसी तरह वस्तुओंसे, व्यक्तियोंसे सुख लेनेकी इच्छाका त्याग करना है। जैसे, सर्दीके दिनोंमें रजाई आदि लें तो सुख लेनेके लिये नहीं, प्रत्युत सर्दीसे बचनेके लिये। अमुक तरहकी रजाई होनी चाहिये, अमुक तरहका कम्बल होना चाहिये—यह आसक्ति है। परन्तु रजाई बढ़िया हो या घटिया हो, कम्बल हो या टाट हो, हमें तो केवल शीतका निवारण करना है—यह आसक्ति नहीं है, प्रत्युत आवश्यकता है। आसक्ति और आवश्यकता—दोनों अलग-अलग हैं। संसारकी आसक्ति अथवा कामना होती है और परमात्माकी प्रियता अथवा आवश्यकता होती है। आवश्यकता पूरी होनेवाली होती है और कामना मिटनेवाली होती है। जो मिटनेवाली है, उसका त्याग करनेमें क्या बाधा है?
बालक जन्मता है तो वह बड़ा होगा कि नहीं, पढ़ेगा कि नहीं, उसका विवाह होगा कि नहीं, उसके बाल-बच्चे होंगे कि नहीं, उसके पास धन होगा कि नहीं आदि सब बातोंमें सन्देह है, पर वह मरेगा कि नहीं—इसमें कोई सन्देह नहीं है। वह जरूर मरेगा। अगर हम नि:सन्देह बातको धारण नहीं करेंगे तो फिर क्या धारण करेंगे? नि:सन्देह बातको धारण करनेसे हमें दु:खी नहीं होना पड़ेगा। अत: जिसका वियोग अवश्यम्भावी है, उसके वियोगको वर्तमानमें ही स्वीकार कर लें। जिसका वियोग हो जायगा, उससे सुखकी इच्छा क्यों रखें? उससे सुखकी इच्छा रखेंगे तो उसका हमारेसे वियोग होनेपर भी रोना पड़ेगा और हमारा उससे वियोग होनेपर भी रोना पड़ेगा। अगर पहलेसे ही सुखकी इच्छाका त्याग कर दें तो फिर रोना नहीं पड़ेगा।
जब कन्या विवाहके बाद ससुराल जाती है तो वह रोती है। माता-पितासे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर उसको दु:ख होता है। पर वह ससुरालमें जाकर रहने लग जाती है तो रहते-रहते इतनी घुल-मिल जाती है कि अपने पीहरको भूल जाती है। जब वह दादी परदादी बन जाती है और पोते-परपोतेकी स्त्री उद्दण्डता करती है, तब वह कहती है कि इस परायी जाई (पराये घरमें जन्मी) छोकरीने मेरा घर बिगाड़ दिया! उसको यह याद ही नहीं रहता कि मैं भी परायी जाई हूँ! इसको आसक्ति कहते हैं। उसने घरको अपना मान लिया कि मैं तो यहाँकी हूँ, मैं माँ हूँ और यह मेरा बेटा है, मैं दादी हूँ और यह मेरा पोता है, मैं परदादी हूँ और यह मेरा परपोता है आदि-आदि ये मेरे हैं—इसमें एक रस (सुख) मिलता है। यह रस ही भयंकर दु:ख देनेवाला है। यह रस तो सदा रहेगा नहीं, पर दु:ख दे जायगा। पक्षी उड़ जायगा, पर अण्डा दे जायगा! आसक्तिपूर्वक अपने सुखके लिये जोड़ा गया सम्बन्ध सदा नहीं रहेगा, मिट जायगा। अगर सुख देनेके लिये सम्बन्ध जोड़ें तो सदाके लिये सुखी हो जायँगे। सेवा-समितिवाले किसी मेले-महोत्सवमें सेवा करनेके लिये जाते हैं तो लोगोंके बिछुड़नेपर उनको रोना नहीं पड़ता; क्योंकि वे दूसरोंको सुख देनेके लिये वहाँ गये हैं, सुख लेनेके लिये नहीं। परन्तु जिस कुटुम्बमें हम रहते हैं, उसमें दूसरोंसे सुख लेनेकी आशा रहती है तो उनके बिछुड़नेपर रोना पड़ता है।
किसीका बेटा मर जाय तो बड़ा दु:ख होता है, पर वास्तवमें बेटेके मरनेसे दु:ख नहीं होता, प्रत्युत उसको अपना माननेसे दु:ख होता है। प्रतिदिन संसारमें जो भी मरता है, बेटा ही मरता है; क्योंकि मरनेवाला किसी-न-किसीका बेटा है ही। पर ‘मेरा बेटा’ मान लिया तो अब उसके मरनेका दु:ख होगा। अत: संसारमें अपनेपनका सम्बन्ध ही दु:ख देनेवाला है। अगर केवल सेवाके लिये सम्बन्ध जोड़ा जाय तो दु:ख नहीं होगा। इसलिये कुटुम्बमें सबकी सेवा करने, सबको सुख पहुँचाने, सबको आराम देनेका ही सम्बन्ध रखना चाहिये। ऐसा करनेसे आसक्ति मिट जायगी।
अगर पचीस वर्षका लड़का मर जाय तो बड़ा दु:ख होता है। पर वही लड़का अगर उन्नीस-बीस वर्षकी अवस्थामें बीमार हो जाय तथा वैद्यलोग कह दें कि इसके जीनेकी सम्भावना नहीं है और बीमारी भोगते हुए वह पचीस वर्षकी अवस्थामें मर जाय तो उतना दु:ख नहीं होगा। तात्पर्य यह हुआ कि सुखकी आशा, कामना और भोगमें ही दु:ख है। अगर सुखकी आशा, कामना और भोग न करें तो दु:ख हो ही नहीं सकता। सब-के-सब दु:ख सुखकी आशा, कामना और भोगपर ही अवलम्बित हैं।
जो लेनेके उद्देश्यसे देता है, वह वास्तवमें लेता ही है, देता नहीं। जो ‘एक गुना दान, सहस्रगुना पुण्य’ के भावसे एक रुपयेका दान करता है, उसका सम्बन्ध हजार रुपयोंके साथ जुड़ जाता है! अत: जो सुख लेनेके उद्देश्यसे स्त्रीको सुख देता है, बच्चोंका पालन-पोषण करता है, बच्चोंका विवाह करता है, उसको परिणाममें दु:ख पाना पड़ता है। जो सुख लेनेके लिये किसीके साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ता, वह संसारमें बड़े मौजसे रहता है। वह जीता है तो आनन्दसे जीता है और मरता है तो आनन्दसे मरता है। परन्तु लेनेकी इच्छासे सम्बन्ध जोड़नेवाला जीते हुए भी दु:ख पाता है और मरते हुए भी दु:ख पाता है। दूसरा चाहे छोटा हो, चाहे बड़ा हो, चाहे समान अवस्थावाला हो, सबको सुख पहुँचाना है। ऐसा करनेसे हमारा व्यवहार शुद्ध हो जायगा, शान्ति मिलेगी, बिना चाहे आदर-सत्कार बढ़ जायगा। अत: आसक्तिके त्यागका उपाय है—सेवा करना, सबको सुख पहुँचाना। किसीके साथ सम्बन्ध जोड़ना है तो उसको सुख पहुँचानेके लिये, उसका हित करनेके लिये, उसका कल्याण करनेके लिये, उसका आदर-सत्कार करनेके लिये, उसको आराम देनेके लिये ही सम्बन्ध जोड़ना है। लेनेके लिये सम्बन्ध जोड़ना है ही नहीं। इससे आसक्ति मिट जायगी।
एक राजा था। वह एक दिन शामके वक्त अपने महलकी छतपर घूम रहा था। साथमें पाँच-सात आदमी भी थे। महलके पीछे कुछ मकानोंके खण्डहर थे। उन खण्डहरोंमें कभी-कभी एक सन्त आकर ठहरा करते थे। राजाने उन खण्डहरोंकी तरफ संकेत करते हुए अपने आदमियोंसे पूछा कि ‘यहाँ एक सन्त आकर ठहरा करते थे न?’ उन्होंने कहा कि ‘हाँ महाराज! आया करते थे, पर कुछ वर्षोंसे उनको यहाँ आते देखा नहीं।’ राजाने कहा कि ‘वे बड़े विरक्त, त्यागी सन्त थे। उनके दर्शनसे बड़ी शान्ति मिलती थी। वे मिलें तो उनसे कोई बात पूछें। उनका पता लगाओ।’ राजाके आदमियोंने उनका पता लगाया तो पता लगा कि वे शरीर छोड़ गये। मनुष्यकी यह बड़ी भूल होती है कि जब कोई मौजूद होता है, तब उससे लाभ लेते नहीं और जब वह मर जाता है, तब रोते हैं। राजाने कहा कि ‘अहो! हमसे बड़ी गलती हो गयी कि हम उनसे लाभ नहीं ले सके! अब उनका कोई शिष्य हो तो उसको ले आओ, हम उससे मिलेंगे।’ राजपुरुषोंने खोज की तो एक साधु मिले। उनसे पूछा कि ‘महाराज! क्या आप उन सन्तको जानते हैं?’ वे बोले कि ‘हाँ, जानता हूँ। वे बड़े ऊँचे महात्मा थे।’ राजपुरुषोंने फिर पूछा कि ‘क्या आप उन सन्तके शिष्य हैं?’ साधुने कहा कि ‘नहीं वे किसीको शिष्य नहीं बनाते थे। हाँ, मैं उनके साथमें जरूर रहा हूँ।’ राजाके पास यह समाचार पहुँचा तो राजाने उनको ही लानेकी आज्ञा दी। राजाके आदमी उस साधुके पास गये और बोले कि ‘महाराज! राजाने आपको बुलाया है, हमारे साथ चलिये।’ वे बोले कि ‘भाई! मैंने क्या अपराध किया है?’ कारण कि राजा प्राय: उसीको लानेकी आज्ञा देते हैं, जिसने कोई गलती की हो। राजपुरुषोंने कहा कि ‘नहीं महाराज! आपको तो वे सत्संगके लिये, पारमार्थिक बातें पूछनेके लिये बुलाते हैं। आप हमारे साथ पधारें।’ वे साधु ‘अच्छा’ कहकर उनके साथ चल दिये। रास्तेमें वे एक गलीमें जाकर बैठ गये। राजपुरुषोंने समझा कि वे लघुशंका करते होंगे। गलीमें एक कुतियाने बच्चे दे रखे थे। साधुने उनमेंसे एक पिल्लेको उठा लिया और अपनी चद्दरके भीतर छिपाकर राजपुरुषोंके साथ चल पड़े।
राजाओंके यहाँ आसन (कुरसी) का बड़ा महत्त्व होता है। किसको कौन-सा आसन दिया जाय, किसको कितना आदर दिया जाय, किसको ऊँचा और किसको नीचा आसन दिया जाय—इसका विशेष ध्यान रखा जाता है। राजाने साधुके बैठनेके लिये गलीचा बिछा दिया और खुद भी उसपर बैठ गये, जिससे ऊँचे-नीचे आसनका कोई विचार न रहे। बाबाजीने बैठते ही अपने दोनों पैर राजाके सामने फैला दिये। राजाने सोचा कि यह मूर्ख है, सभ्यताको जानता नहीं! कभी राजसभामें गया नहीं, इसलिये राजाओंके सामने कैसे बैठना चाहिये—यह इसको आता नहीं। राजाने पूछ लिया—पैर फैलाये कबसे? बाबाजी बोले—हाथ सिकोड़े तबसे। तात्पर्य है कि कुछ लेनेकी इच्छा होती तो हम हाथ फैलाते और पैर सिकोड़ते, पर हमें लेना कुछ है ही नहीं, इसलिये हाथ सिकोड़ लिये और पैर फैला लिये। ऐसा कहकर बाबाजीने हाथ-पैर ठीक कर लिये। राजाने उत्तर सुनकर विचार किया कि ये मूर्ख नहीं हैं, प्रत्युत बड़े समझदार, त्यागी और चेतानेवाले हैं। राजाने उन सन्तकी चर्चा की तो साधुने कहा कि वे बड़े अच्छे सन्त थे, वैसे सन्त बहुत कम हुआ करते हैं।
राजाने पूछा—आप उनके साथ रहे हैं न?
साधुने कहा—हाँ, मैं उनके साथ रहा तो हूँ।
राजाने पूछा—आपने उनसे कुछ लिया होगा?
साधुने कहा—हमने लिया नहीं राजन्!
राजा बोला—तो क्या आप रीते ही रह गये?
साधुने कहा—नहीं, ऐसे सन्तके साथ रहनेवाला कभी रीता रह सकता ही नहीं। हमने लिया तो नहीं, पर रह गया।
राजाने पूछा—क्या रह गया?
साधुने कहा—जैसे डिबियामेंसे कस्तूरी निकालनेपर भी उसमें सुगन्ध रह जाती है, घीके बर्तनमेंसे घी निकालनेपर भी उसमें चिकनाहट रह जाती है, ऐसे ही सन्तके साथ रहनेसे उनकी सुगन्ध, चिकनाहट रह गयी।
राजा बोले—महाराज! वह सुगन्ध, चिकनाहट क्या है—यह मेरेको बताइये।
साधुने कहा—राजन्! यह हम साधुओंकी, फकीरोंकी बात है, राजाओंकी बात नहीं। आप जानकर क्या करोगे?
राजाने कहा—नहीं महाराज! आप जरूर बताइये।
साधुने चद्दरके पीछे छिपाया पिल्ला बाहर निकाला और राजाके सामने कर दिया।
राजाने कहा—हम समझे नहीं महाराज!
साधुने कहा—आप बुरा तो नहीं मानोगे?
राजाने कहा—अरे, मैं तो पूछता ही हूँ, बुरा कैसे मानूँगा? आप सच्ची बात कह दें।
साधुने कहा—‘राजन्! मेरेको आपमें और इस पिल्लेमें फर्क नहीं दीखता; यह समता ही उन सन्तके संगकी सुगन्ध, चिकनाहट है! यह पिल्ला बहुत साधारण चीज है और आप बहुत विशेष हैं—यह बात तो सच्ची है, पर मेरेको ऐसा नहीं दीखता। आपमें भी प्राण हैं और इसमें भी प्राण हैं। आपके भी श्वास चलते हैं और इसके भी श्वास चलते हैं। आपका शरीर भी पाँच भूतोंसे बना है और इसका शरीर भी पाँच भूतोंसे बना है। आप भी देखते हैं, यह भी देखता है। आप भी खाते-पीते हैं, यह भी खाता-पीता है। आपमें और इसमें फर्क क्या है? संसारके सभी प्राणियोंमें कोई-न-कोई विशेषता है ही। किसीमें कोई विशेषता है तो किसीमें कोई विशेषता है, टोटलमें सब बराबर हुए! आप ऊँचे पदपर हैं और यह नीचा है—यह फर्क तो तब होता है, जब मेरा स्वार्थका सम्बन्ध हो। मेरा किसीसे स्वार्थका सम्बन्ध है ही नहीं, न आपसे कुछ लेना है, न कुत्तेसे कुछ लेना है, फिर मेरे लिये आपमें और इसमें फर्क क्या है? आप बुरा न मानें। आपने बतानेका आग्रह किया, इसलिये साफ बात कह दी। मैं आपका तिरस्कार नहीं करता हूँ, प्रत्युत सत्कार करता हूँ, क्योंकि आप प्रजाके मालिक हैं।
तात्पर्य है कि जब हमें संसारसे कुछ लेना होता है, तब हमें कोई धनी और कोई दरिद्र दीखता है। धनी मिले या दरिद्र मिले, हमें उनसे कुछ लेना है ही नहीं, तो फिर दोनोंमें क्या फर्क हुआ? एक साधु थे। घरोंसे भिक्षा लेना और पाकर चले आना—यह उनका प्रतिदिनका नियम था। शहरसे भिक्षा लाते समय बीचमें बहुत भीड़ रहती है; अत: स्पर्शदोषसे बचनेके लिये वे वहीं बैठकर पा लेते थे। एक दिन भिक्षा पानेके बाद वे अपना पात्र माँजने लगे तो एक सेठने कहा कि आपका पात्र मैं माँज देता हूँ। साधुने कहा कि आपसे नहीं मँजवाना है तो वह सेठ बोला कि मेरा नौकर माँज देगा। साधुने कहा कि ‘मेरे लिये आपमें और नौकरमें फर्क क्या है? आप माँजें या नौकर माँजे, फर्क क्या पड़ा? फर्क तो तब पड़े, जब मैं आपको बड़ा आदमी समझूँ और नौकरको मामूली आदमी समझूँ। मेरे लिये जैसे आप आदरणीय हैं, ऐसे ही नौकर आदरणीय है और जैसे नौकर आदरणीय है, ऐसे ही आप आदरणीय हैं। नौकर है तो आपका है, मेरा नौकर है क्या? उसको मैं तनख्वाह देता हूँ क्या? मेरा सम्बन्ध तो आपके साथ और नौकरके साथ समान ही है। अन्तर तो तब हो, जब मेरेको कुछ लेना हो, कोई रागद्वेषपूर्वक सम्बन्ध जोड़ना हो!’
तात्पर्य है कि संसारसे लेनेकी इच्छाका त्याग करनेसे आसक्ति मिट जाती है। अत: केवल देनेके लिये, सुख पहुँचानेके लिये ही संसारके साथ सम्बन्ध रखे—यह आसक्ति मिटानेका बड़ा सीधा सरल उपाय है। स्त्री, पुत्र, माता, पिता, भाई, भौजाई आदि सबको सुख पहुँचाना है, सबका हित करना है और उनसे लेना कुछ नहीं है। उनमें हमारा अपनापन पहले भी नहीं था और पीछे भी नहीं रहेगा, बीचमें ही हमने अपना माना है। पर वह भी निरन्तर मिट रहा है। इसको छोड़नेकी जिम्मेवारी हमपर है; क्योंकि आसक्ति हमने ही पकड़ी है, यह भगवान् की अथवा किसी दूसरेकी दी हुई नहीं है। यह कर्मोंका फल भी नहीं है, प्रत्युत अपनी ही मूर्खताका फल है। अपनी मूर्खताका त्याग करना अपना कर्तव्य है।
सांसारिक भोग और संग्रहकी आसक्तिके कारण परमात्मप्राप्तिके अनन्त आनन्दका अनुभव नहीं हो रहा है। इसलिये आसक्तिका त्याग करना है और परमात्माका प्रेम प्राप्त करना है। कारण कि हम स्वरूपसे परमात्माके अंश हैं; अत: हमारा खिंचाव परमात्माकी तरफ ही होना चाहिये, शरीर या संसारकी तरफ नहीं। हम एक शरीरके साथ अपना सम्बन्ध मानेंगे तो संसारमात्रके साथ हमारा सम्बन्ध जुड़ जायगा। जैसे पुरुष एक स्त्रीके साथ पति-पत्नीका सम्बन्ध जोड़ता है तो सास-ससुर, साला-साली आदि कइयोंके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है और पत्नी मर जाय तो न कोई सास है, न कोई ससुर है, न कोई साला है, न कोई साली है! ऐसे ही एक शरीरके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे संसारमात्रके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है और एक शरीरके साथ सम्बन्ध-विच्छेद करनेसे संसारमात्रसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। तात्पर्य है कि लेनेकी इच्छासे संसारमात्रके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है और लेनेकी इच्छा छोड़नेसे संसारमात्रके साथ सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होते ही परमात्माके साथ नित्य-सम्बन्ध (नित्ययोग)का अनुभव हो जाता है। यह अनासक्ति-योग है।
प्रश्न—हम जिसकी सेवा करेंगे, उसमें क्या आसक्ति नहीं हो जायगी?
उत्तर—नहीं होगी। एक आदमी प्याऊपर बैठकर पानी पिलाता है तो उसका अनेक व्यक्तियोंके साथ सम्बन्ध होता है। कई लोग आते हैं और पानी पीकर चले जाते हैं। परन्तु प्याऊपर बैठे आदमीकी उनमें आसक्ति नहीं होती; क्योंकि पानी पिलानेके सिवाय उसका और कोई सम्बन्ध है ही नहीं। आसक्ति तो लेनेका सम्बन्ध होनेपर ही होती है।
एक आदमी जाड़ेके समय पचास कम्बल वितरित कर देता है तो उसकी महिमा होती है, पर एक व्यापारी एक हजार कम्बल बिक्री कर देता है तो उसकी महिमा नहीं होती। व्यापारीके द्वारा बिक्री किये गये कम्बलोंसे लोगोंका जाड़ा भी दूर होता है, फिर भी उसको पुण्य नहीं होता; क्योंकि उसने पैसे कमानेके लिये ही कम्बल दिये हैं। लेनेके लिये देना वास्तवमें देना नहीं है, प्रत्युत लेना ही है। अत: आसक्ति वहीं होती है, जहाँ लेनेके लिये देना होता है अथवा लेनेके लिये लेना होता है अर्थात् लेना मुख्य होता है। अत: देनेके लिये ही लेना होना चाहिये और देनेके लिये ही देना होना चाहिये। जैसे, कोई ब्राह्मण श्राद्ध आदिमें केवल यजमानके हितके लिये ही लेता है तो वह देनेके लिये ही लेता है।
पहले उद्देश्य बनता है, फिर क्रिया होती है। हमारा उद्देश्य आसक्ति-त्यागका होना चाहिये। हमें आसक्ति-त्यागके लिये ही लेना है और आसक्ति-त्यागके लिये ही देना है। किसीसे भी कोई आशा नहीं रखनी है। स्त्री रोटी बनाकर दें तो खा लें, पर वह रोजाना रोटी बनाकर दे—यह आशा भी न रखें। आशा ही महान् दु:ख देनेवाली है—आशा हि परमं दु:खं नैराश्यं परमं सुखम्’ (श्रीमद्भा० ११।८।४४)।
दूसरोंकी सेवा अपनी शक्तिके अनुसार करनी है। हमारे पास जितना समय है, जितनी समझ है, जितनी सामर्थ्य है, जितनी सामग्री है, उतनेसे ही दूसरोंकी सेवा करनी है। इससे अधिककी हमारेपर जिम्मेवारी ही नहीं है, और दूसरे हमारेसे आशा भी नहीं रखते। मालपर जगात और इन्कमपर टैक्स लगता है। माल नहीं हो तो जगात किस बातकी? इन्कम नहीं तो टैक्स किस बातका?
प्रश्न—क्या सत्संग आदिमें आसक्ति होना भी दोष है?
उत्तर—नहीं; क्योंकि यह आसक्ति नहीं है, प्रत्युत प्रेम है। कामना नहीं है, प्रत्युत आवश्यकता है। परन्तु गाना-बजाना बढ़िया हो, राग-रागिनी बढ़िया हो, खूब लच्छेदार व्याख्यान हो, जो श्रोताओंको रुला दे अथवा हँसा दे—यह श्रोताकी आसक्ति है। लोग हमें वक्ता समझें, हमारा मान-आदर करें—यह वक्ताकी आसक्ति है। मुक्तिके लिये, तत्त्वबोधके लिये, भगवत्प्रेमके लिये सत्संग आदिमें रुचि तो वास्तवमें हमारी आवश्यकता (भूख) है, जो दोषी नहीं है।
सत्सङ्ग करना आसक्ति मिटानेके लिये है। जैसे काँटेसे काँटा निकलता है, ऐसे ही सत्संगकी आसक्ति (रुचि)से संसारकी आसक्ति मिटती है।
सङ्ग: सर्वात्मना त्याज्य: स चेत्त्यक्तुं न शक्यते।
स सद्भि: सह कर्तव्य: सतां सङ्गो हि भेषजम्॥
(मार्कण्डेय० ३७।२३)
‘संग (आसक्ति)का सर्वथा त्याग करना चाहिये। परन्तु यदि उसका त्याग न किया जा सके तो सत्पुरुषोंका संग करना चाहिये; क्योंकि सत्पुरुषोंका संग ही उस संग (आसक्ति)को मिटानेकी औषध है।’
प्रश्न—आवश्यकता और कामनामें क्या फर्क है?
उत्तर—आवश्यकता अविनाशीकी होती है और कामना नाशवान् की होती है। जैसे सड़कमें कोई गड्ढा पड़ जाय तो उसपर मोटर लचकती है; अत: उस गड्ढेको मिट्टी, पत्थर आदि किसी चीजसे भरकर सम कर दें तो मोटर नहीं लचकेगी, ऐसे ही शरीरको भूख लगनेपर उसकी पूर्ति कर देना आवश्यकता है। भूख मिटानेके लिये चाहे साग-पत्ती खा लें, चाहे हलवा-पूरी खा लें, जिससे पेट भर जाय। परन्तु अमुक चीज चाहिये, मिठाई चाहिये, खटाई चाहिये, चटनी चाहिये—यह कामना है। आवश्यकताकी पूर्ति होती है और कामनाकी निवृत्ति होती है*। कामनाकी पूर्ति किसीकी भी कभी हुई नहीं, होगी नहीं, हो सकती नहीं।
प्रश्न—कभी-कभी दूसरेको सिखानेके लिये सेवा लेनी पड़ती है, क्या यह ठीक है?
उत्तर—बालक आदिको सिखानेके लिये सेवा लेना वास्तवमें सेवा करना ही है। लेनेकी क्रिया तो दीखती है, पर वास्तवमें लिया नहीं है, प्रत्युत शिक्षा दी है।
प्रश्न—सभीके शरीर अनित्य हैं, फिर उनकी सेवा क्यों की जाय?
उत्तर—अनित्यकी सेवा करनेसे नित्यकी प्राप्ति होती है। कारण कि अनित्यकी सेवा करनेसे अनित्यकी आसक्तिका त्याग हो जाता है और आसक्तिका त्याग होनेपर नित्यकी प्राप्ति हो जाती है। वास्तवमें सेवा केवल अनित्य शरीरकी नहीं होती, प्रत्युत शरीरी (शरीरवाले) की होती है। व्यवहारमें जड चीज जडता (शरीर) तक ही पहुँचती है, चेतनतक नहीं; परन्तु सेवा लेनेवाला अपनेको शरीर मानता है, इसलिये वह सेवा चेतनकी होती है—‘जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि’ (मानस, अयोध्या० १४२।१)। तात्पर्य है कि हम शरीरको अपना मानते हैं, इसलिये शरीरतक पहुँचनेवाली चीज अपनेतक पहुँचती है।
भक्त तो सबको भगवान् का ही स्वरूप मानकर उनकी सेवा करता है—‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य’ (गीता १८।४६), ‘मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत’ (मानस, किष्किन्धा० ३)। भगवान् में आत्मीयता होनेसे उसकी संसारमें समता हो जाती है—
तुलसी ममता राम सों समता सब संसार।
राग न रोष न दोष दुख दास भए भव पार॥
(दोहावली ९४)
संसारमें समता होनेसे आसक्ति मिट जाती है। यही अनासक्तियोग है।