गीताका तात्पर्य

श्रीमद्भगवद्गीता लौकिक होते हुए भी एक अलौकिक ग्रन्थ है। इसमें बहुत ही विलक्षण भाव भरे हुए हैं। आजतक गीतापर जितनी टीकाएँ हुई हैं, उतनी किसी भी ग्रन्थपर नहीं हुई हैं। बाइबिलके अनुवाद (भाषान्तर) तो बहुत हुए हैं, पर टीका एक भी नहीं हुई है। बाइबिलका प्रचार तो राज्य और धनके प्रभावसे हुआ है, पर गीताका प्रचार गीताके अपने प्रभावसे हुआ है। तात्पर्य है कि गीताका आशय खोजनेके लिये जितना प्रयत्न किया गया है, उतना दूसरे किसी भी ग्रन्थके लिये नहीं किया गया है, फिर भी इस ग्रन्थकी गहराईका अन्त नहीं आया है!

थोड़े शब्दोंमें कहें तो गीताका तात्पर्य है—मनुष्य-मात्रका कल्याण करना। शास्त्रोंमें कल्याणके कई मार्ग बताये गये हैं। गीताकी टीकाओंको भी देखें तो उनमें अद्वैतवाद, द्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, द्वैताद्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद, अचिन्त्यभेदाभेदवाद आदि अनेक मतोंको लेकर टीकाएँ की गयी हैं। इस प्रकार अनेक वाद, सिद्धान्त, मत-मतान्तर होते हुए भी गीताका किसीके साथ विरोध नहीं है। गीताने किसी भी मतका खण्डन नहीं किया है; परन्तु अपनी एक ऐसी विलक्षण बात कही है, जिसके सामने सब नतमस्तक हो जाते हैं। कारण कि गीता किसी एक वाद, मत आदिको लेकर नहीं कही गयी है, प्रत्युत जीवमात्रके कल्याणको लेकर कही गयी है।

आचार्यगण अपने-अपने मतको ‘सिद्धान्त’ नामसे कहते हैं। मत सर्वोपरि नहीं होता। हरेक व्यक्ति अपना-अपना मत प्रकट कर सकता है। परन्तु सिद्धान्त सर्वोपरि होता है, जो सबको मानना पड़ता है। इसलिये गुरु-शिष्यमें भी मतभेद तो हो सकता है, पर सिद्धान्तभेद नहीं हो सकता। परन्तु गीतामें भगवान् ने अपने सिद्धान्तको ‘सिद्धान्त’ नामसे न कहकर ‘मत’ नामसे कहा है; जैसे—

मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा।

निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वर:॥

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवा:।

श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभि:॥

(३। ३०-३१)

‘तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको मेरे अर्पण करके कामना, ममता और सन्तापरहित होकर युद्धरूप कर्तव्य-कर्मको कर। जो मनुष्य दोषदृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं।’

भगवान् का मत ही वास्तविक और सर्वोपरि सिद्धान्त है, जिसके अन्तर्गत सभी मत-मतान्तर आ जाते हैं। परन्तु भगवान् अभिमान न करके बड़ी सरलतासे, नम्रतासे अपने सिद्धान्तको ‘मत’ नामसे कहते हैं। तात्पर्य है कि भगवान् ने अपने अथवा दूसरे किसीके भी मतका आग्रह नहीं रखा है, प्रत्युत निष्पक्ष होकर अपनी बात सामने रखी है।

ईश्वरको माननेवाले जितने भी दार्शनिक सिद्धान्त हैं, उनमें प्राय: तीन चीजोंका वर्णन आता है—परमात्मा, जीवात्मा और जगत्। इन तीनोंके विषयमें कई मतभेद हैं। जैसे—जीवके विषयमें कई कहते हैं कि यह अणु-परिमाण है, कई कहते हैं कि यह मध्यम-परिमाण है और कई कहते हैं कि यह महत्-परिमाण है। जीवको ‘अणु-परिमाण’ माननेवाले कहते हैं कि एक केशको चीरकर उसके दस हजार भाग किये जायँ तो एक भागके बराबर जीवका परिमाण है१। जीवको ‘मध्यम-परिमाण’ माननेवाले कहते हैं कि चींटीमें चीटीं-जितना ही जीव है, मनुष्यमें मनुष्य-जितना ही जीव है, हाथीमें हाथी-जितना ही जीव है। जीवको ‘महत्-परिमाण’ माननेवाले कहते हैं कि जीव एक शरीरमें सीमित नहीं है, प्रत्युत यह बहुत महान् है। इसी तरह ईश्वरके विषयमें कई कहते हैं कि यह सगुण है, कई कहते हैं कि यह निर्गुण है, कई कहते हैं कि यह साकार है, कई कहते हैं कि यह निराकार है। कई कहते हैं कि यह द्विभुज है, कई कहते हैं कि यह चतुर्भुज है, कई कहते हैं कि यह सहस्रभुज है, कई कहते हैं कि यह विराट्‍रूप है। कई कहते हैं कि यह व्यक्त है, कई कहते हैं कि यह अव्यक्त है, कई कहते हैं कि यह अवतार लेता है, कई कहते हैं कि यह अवतार नहीं लेता; आदि-आदि। इसी तरह जगत् के विषयमें कई कहते हैं कि यह अनादि और अनन्त है, कई कहते हैं कि यह अनादि और सान्त है, कई कहते हैं यह अनादि और परिवर्तनशील अर्थात् प्रवाहरूपसे रहनेवाला है आदि-आदि। गीताने इन सब वाद-विवादोंमें न पड़कर सीधी बात बतायी है कि तुम्हारे सामने दीखता है, यह ‘जगत्’ है। हरेक मनुष्यको ‘मैं हूँ’—ऐसा अनुभव होता है, यह ‘जीव’ है। जो जड-चेतन, अपरा-परा सबका स्वामी है, वह ‘ईश्वर’ है२। गीताकी इस बातमें सभी दार्शनिक एकमत हैं। इसमें भी एक विलक्षण बात है कि यदि कोई ईश्वरको न माने तो भी गीताके अनुसार चलनेसे उसका कल्याण हो जायगा३!

गीताने व्यवहारमें परमार्थकी विलक्षण कला बतायी है, जिससे प्रत्येक मनुष्य प्रत्येक परिस्थितिमें रहते हुए, निषिद्धरहित सब तरहका व्यवहार करते हुए भी अपना कल्याण कर सके*। दूसरे ग्रन्थ तो प्राय: यह कहते हैं कि अगर अपना कल्याण चाहते हो तो सब कुछ त्यागकर साधु हो जाओ; क्योंकि व्यवहार और परमार्थ—दोनों एक साथ नहीं होंगे। परन्तु गीता कहती है कि आप जहाँ हैं, जिस मतको मानते हैं, जिस सिद्धान्तको मानते हैं, जिस धर्म, सम्प्रदाय आदिको मानते हैं, उसीको मानते हुए गीताके अनुसार चलो तो कल्याण हो जायगा। तात्पर्य है कि कोई भी मनुष्य चाहे हिन्दू हो, चाहे मुसलमान हो, चाहे ईसाई हो, चाहे यहूदी हो, चाहे पारसी हो, वह किसी भी मतका अनुसरण करनेवाला हो, किसी भी सिद्धान्तको माननेवाला हो, यदि उसका उद्देश्य अपना कल्याण करनेका है तो उसको भी गीतामें अपने कल्याणकी पूरी सामग्री मिल जायगी। व्यवहार करते हुए तत्त्वज्ञान हो जाय, भगवद्भक्ति हो जाय, योगका अनुष्ठान हो जाय, लययोग, राजयोग, मन्त्रयोग आदि योगोंकी प्राप्ति हो जाय—ऐसी विलक्षण विद्या गीताने बतायी है! वह विलक्षण विद्या क्या है—इसको बतानेकी चेष्टा की जाती है। हम जो-जो व्यवहार करते हैं, उसमें अपने स्वार्थ और अभिमानका आग्रह छोड़कर सबके हितकी दृष्टिसे कार्य करें हितकी दृष्टिसे कार्य करनेका तात्पर्य है कि वर्तमानमें भी हित हो और भविष्यमें भी हित हो, हमारा भी हित हो और दूसरे सबका भी हित हो—ऐसी दृष्टि रखकर कार्य करे। ऐसा करनेसे बड़ी सुगमतासे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जायगी। एकान्तमें रहकर वर्षोंतक साधना करनेपर ऋषि-मुनियोंको जिस तत्त्वकी प्राप्ति होती थी, उसी तत्त्वकी प्राप्ति गीताके अनुसार व्यवहार करते हुए हो जायगी। सिद्धि-असिद्धिमें सम रहकर कर्म करना ही गीताके अनुसार व्यवहार करना है। गीता कहती है—

सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।

ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

(२।३८)

‘जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दु:खको समान करके फिर युद्धमें लग जा। इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा।’

योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।

सिद्धॺसिद्धॺो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

(२।४८)

‘हे धनञ्जय! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।’

संसारका स्वरूप है—क्रिया और पदार्थ। परमात्म-तत्त्वकी प्राप्तिके लिये क्रिया और पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद करना आवश्यक है। इसके लिये गीताने कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों ही योगोंकी दृष्टिसे क्रिया और पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी युक्ति बतायी है; जैसे—कर्मयोगी क्रिया और पदार्थमें आसक्तिका त्याग करके उनको दूसरोंके हितमें लगाता है१; ज्ञानयोगी क्रिया और पदार्थसे असंग होता है२; और भक्तियोगी क्रिया तथा पदार्थको भगवान् के अर्पण करता है३। सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थोंको भगवान् के अर्पण करनेसे मनुष्य सुगमतापूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त होकर भगवान् को प्राप्त हो जाता है। भगवान् के अर्पण करनेसे क्रियाएँ और वस्तुएँ नहीं रहेंगी—यह बात नहीं है, प्रत्युत वे महान् पवित्र हो जायँगी। जैसे भक्तलोग भगवान् को भोग लगाते हैं तो भोग लगायी हुई वस्तु वैसी-की-वैसी ही मिलती है, कम नहीं होती, पर वह वस्तु महान् पवित्र हो जाती है। इसी तरह संसारमें भी हम जिस वस्तुको अपनी न मानकर दूसरोंकी सेवाके लिये मानते हैं, वह वस्तु महान् पवित्र हो जाती है और जिस वस्तुको हम केवल अपने लिये ही मानते हैं, वह वस्तु महान् अपवित्र हो जाती है।

मान लें कि कोई सज्जन अपने लिये रसोई बनाता है। अचानक एक भिक्षु आता है और आवाज देता है तो वह सज्जन बड़े प्रेमसे उसको भिक्षा देता है। वह अन्न बड़ा शुद्ध होता है। परन्तु जब वह सज्जन रसोई अपनी थालीमें परोस लेता है, तब वह अन्न उतना शुद्ध नहीं रहता, क्योंकि ‘मैं भोजन करूँगा’—यह भाव आ गया। अब यदि भिक्षुक आता है तो उसको वह अन्न देनेमें संकोच होता है और भिक्षुकको लेनेमें संकोच होता है। फिर भी भिक्षुक उसमेंसे थोड़ा अन्न ले सकता है। परन्तु वह सज्जन भोजन करने बैठ गया और उसने ग्रास बना लिया तो अब वह अन्न पहले-जैसा शुद्ध नहीं रहा। अगर वह उस ग्रासको मुँहमें ले लेता है तो वह अशुद्ध, जूठन हो जाता है। जब वह उस ग्रासको निगल लेता है, तब (अपने लिये भोजन करनेसे) वह महान् अशुद्ध हो जाता है। यदि किसी कारणसे उलटी हो जाय तो वह उलटी किया हुआ अन्न बड़ा अशुद्ध होता है। उलटी न हो तो वह महान् अशुद्ध होकर मैला बन जाता है। परन्तु दूसरे दिन वह जंगलमें उस मैलेका त्याग कर देता है तो हवा, धूप, वर्षा आदिके कारण वह मैला समय लगनेपर स्वत: मिट्टीमें मिलकर मिट्टी ही बन जाता है और इतना शुद्ध हो जाता है कि पता ही नहीं लगता कि मैलापन कहाँ था! वह मिट्टी दूसरी वस्तुओं (बर्तन आदि) को भी शुद्ध कर देती है। यह त्यागका ही माहात्म्य है! इस प्रकार अपने लिये बनाने-खानेसे शुद्ध वस्तु भी महान् अशुद्ध हो जाती है और त्याग करनेसे महान् अशुद्ध वस्तु (मल-मूत्र) भी शुद्ध हो जाती है। अत: जिस-जिस वस्तुको हम स्वार्थवश अपनी और अपने लिये मानते हैं, उस-उस वस्तुको हम अशुद्ध कर देते हैं। कारण कि संसारकी वस्तुएँ सबके लिये हैं, उनमें सबका हिस्सा है। गीता कहती है—

भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥

(३। १३)

‘जो केवल अपने लिये ही पकाते हैं, वे पापीलोग तो केवल पापका ही भक्षण करते हैं।’

हमारे पास जो चीज है, वह सबके लिये है, केवल हमारे लिये नहीं है—इस उदारभावसे बड़ी शान्ति मिलती है। रसोई बननेपर कोई भूखा आ जाय, अतिथि आ जाय, भिक्षुक आ जाय, कुत्ता आदि आ जाय तो शक्तिके अनुसार उनको भी दे दें। वे सब-का-सब माँगें तो उनसे कह सकते हैं कि ‘भाई, सब कैसे दे दें, हमें भी तो लेना है, आप अपना हिस्सा ले लो!’ हम दूसरेको भोजन तो करा सकते हैं, पर उसकी इच्छापूर्ति कभी नहीं कर सकते। इतना ही नहीं, संसारके सब लोग मिलकर भी एक आदमीकी इच्छापूर्ति नहीं कर सकते—

यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशव: स्त्रिय:।

न दुह्यन्ति मन:प्रीतिं पुंस: कामहतस्य ते॥

(श्रीमद्भा० ९।१९।१३)

‘पृथिवीपर जितने भी धान्य, स्वर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब-के-सब मिलकर भी उस पुरुषके मनको सन्तुष्ट नहीं कर सकते, जो कामनाओंके प्रहारसे जर्जर हो रहा है।’

हमारी भारतीय संस्कृति बड़ी विलक्षण है, जो प्राणीमात्रका उद्धार चाहती है। राजस्थानमें मैंने देखा कि जब किसानलोग खेती करते हैं, तब पहले वे भगवान् से प्रार्थना करते हैं कि ‘पशुओंके भाग्यका, पक्षियोंके भाग्यका, चिड़ी-कमेड़ीके भाग्यका, अटाऊ-बटाऊके भाग्यका हमें देना महाराज!’ तात्पर्य है खेती केवल हमारे लिये नहीं है, प्रत्युत सबके लिये है, जब खेती पकती है, तब जो फल सबसे पहले आता है, उसको पहले अपने काममें नहीं लेते। पहले उसको मन्दिरमें या ब्राह्मणों अथवा साधुओंके पास भेजते हैं, फिर उसको काममें लेते हैं। ऐसे ही रसोई बनती है तो पहले अतिथि आदिको देकर फिर भोजन करते हैं। रसोई बननेके बाद ‘बलिवैश्वदेव’ करनेका विधान आता है। उसमें विश्वमात्रके लिये अन्न अर्पण किया जाता है। कोई मर जाता है तो उसके लिये श्राद्ध और तर्पण करते हैं। इतना ही नहीं, सम्पूर्ण जीवोंको, देवताओंको और ईश्वरको भी पिण्ड और पानी देते हैं। भगवान् में किसी कमीकी सम्भावना ही नहीं है। परन्तु जैसे बालक पिताकी ही चीज पिताको अर्पण करता है तो पिता प्रसन्न हो जाता है, ऐसे ही भगवान् की चीज भगवान् को ही अर्पण करनेसे भगवान् प्रसन्न हो जाते हैं। समुद्रको भी जल देते हैं और सूर्यको भी दीपक दिखाते हैं, आरती करते हैं। क्या समुद्रमें जलकी कमी है? सूर्यमें प्रकाशकी कमी है? उनमें कमी नहीं है, पर हमारा उदारभाव, सबकी सेवा करनेका भाव, सबको सुख पहुँचानेका भाव कल्याण करनेवाला है—

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत्॥

—इसी बातको गीताने ‘सर्वभूतहिते रता:’ (५। २५, १२।४) पदोंसे कहा है। सबको देनेके बाद जो शेष बचता है, वह ‘यज्ञशेष’ कहलाता है। गीता कहती है—

यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।

(३।१३)

यज्ञशेष ग्रहण करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं।’

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्॥

(४।३१)

‘यज्ञशेष अमृतको ग्रहण करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं।’

कर्मयोगी सब वस्तुओंको संसारके अर्पण करता है, ज्ञानयोगी प्रकृतिके अर्पण करता है और भक्तियोगी भगवान् के अर्पण करता है। किसीके भी अर्पण करो, पर अपने लिये मत मानो—यह खास बात है। वास्तवमें वस्तु कल्याण करनेवाली नहीं है, प्रत्युत हमारा उदारभाव कल्याण करनेवाला है। यदि वस्तु कल्याण करनेवाली हो तो लखपति, करोड़पति या अरबपति तो अपना कल्याण कर लेंगे, पर साधारण आदमी अपना कल्याण नहीं कर सकेगा। परन्तु वास्तवमें कल्याण त्यागीका होता है, संग्रहीका नहीं। अत: इतना धन खर्च करनेसे कल्याण होगा, इतनी वस्तुओंको देनेसे कल्याण होगा—यह बात है ही नहीं। कल्याण हमारे इस भावसे होगा कि सबका हित हो जाय, सब सुखी हो जायँ। भगवान् क्रियाग्राही या वस्तुग्राही नहीं हैं, प्रत्युत भावग्राही हैं—‘भावग्राही जनार्दन:।’ इसलिये हरेक काममें परहितका भाव रखें। इसमें खर्चा तो बहुत थोड़ा है, पर लाभ बड़ा भारी है। थोड़ा खर्चा यह है कि कोई अभावग्रस्त सामने आ जाय तो उसको थोड़ा-सा अन्न दे दो, थोड़ा-सा जल दे दो, थोड़ा-सा वस्त्र दे दो, थोड़ा-सा आश्रय दे दो, उसकी थोड़ी-सी सहायता कर दो। कभी खुद भूखे रहकर दूसरेको भोजन देनेका मौका भी आ जाय तो कोई बात नहीं। हम एकादशीव्रत करते हैं तो उस दिन भूखे रहते ही हैं। जब देशका विभाजन हुआ था, उस समय पाकिस्तानसे आये कई व्यक्तियोंको दस-दस रुपये देनेपर भी एक गिलास पानी नहीं मिला था। अत: सब समय अन्न-जलका मिलना कोई हाथकी बात नहीं है। कभी भूखा-प्यासा रहना ही पड़ता है। यदि दूसरेके हितके लिये भूखे-प्यासे रह जायँ तो कल्याण हो जाय!

इस प्रकार जो कुछ किया जाय, सबके हितके लिये किया जाय। कोई किसी भी धर्म, सम्प्रदाय, मत-मतान्तर, वर्ण, आश्रम आदिका हो, जो पक्षपात न रखकर सबके हितका भाव रखता है, उसका कल्याण हो जाता है।

अयं निज: परो वेत्ति गणना लघुचेतसाम्।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

(पञ्च० अपरीक्षित० ३७)

‘यह अपना है और यह पराया है—इस प्रकारका भाव संकुचित हृदयवाले मनुष्य करते हैं। उदार हृदयवाले मनुष्योंके लिये तो सम्पूर्ण विश्व ही अपना कुटुम्ब है।’

तात्पर्य है कि उदार भाववाले मनुष्य सम्पूर्ण कार्य विश्वमात्रके हितके लिये ही करते हैं। रामायणमें आया है—

उमा संत कइ इहइ बड़ाई।

मंद करत जो करइ भलाई॥

(मानस, सुन्दर० ४१। ४)

जो अपना बुरा करता है, उसका भी सन्तलोग भला ही करते हैं। भगवान् राम अंगदको रावणके पास भेजते समय कहते हैं कि शत्रुसे इस तरह बात करना, जिससे हमारा काम (सीताजीकी प्राप्ति) भी हो जाय और उसका हित भी हो—

काजु हमार तासु हित होइ।

रिपु सन करेहु बतकही सोई॥

(मानस, लंका० १७। ४)

मनुष्यमें ऐसा उदारभाव त्यागसे आता है। इसलिये गीतामें त्यागकी बड़ी महिमा है। त्यागसे तत्काल शान्ति मिलती है—‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२।१२)। मनुष्य मल-मूत्र जैसी वस्तुका भी त्याग करता है तो उसको एक शान्ति मिलती है, चित्तमें प्रसन्नता होती है, शरीर हलका हो जाता है, नीरोगता आ जाती है। जब मैली-से-मैली वस्तुके त्यागका भी इतना माहात्म्य है, फिर अन्न-वस्त्र आदिका दूसरोंके हितके लिये त्याग किया तो उसका कितना माहात्म्य होगा! त्यागके विषयमें एक मार्मिक बात है कि जो वस्तु अपनी नहीं होती, उसीका त्याग होता है! तात्पर्य यह है कि वस्तु अपनी नहीं है, पर भूलसे अपनी मान ली है, इस भूलका ही त्याग होता है। जैसे, जब हम मनुष्यशरीरमें आये थे, तब अपने साथ कुछ नहीं लाये थे, शरीर भी माँसे मिला था और जब हम जायँगे, तब अपने साथ कुछ नहीं ले जायँगे। परन्तु यहाँकी वस्तुओंको अपनी मानकर हम उसके मालिक बन जाते हैं। अत: उन वस्तुओंका मनसे त्याग करना है कि ये हमारी नहीं हैं, प्रत्युत सबकी हैं, जो कि वास्तविकता है। केवल इतनी-सी बातसे हमारा कल्याण हो जायगा। गीता कहती है—

निर्ममो निरहङ्कार: स शान्तिमधिगच्छति॥

(२।७१)

अर्थात् शरीरमें ‘मैं’-पन और वस्तुओंमें ‘मेरा’-पनका त्याग करनेसे शान्ति मिल जाती है, कल्याण हो जाता है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि कुछ भी मेरा नहीं है। इनको संसारका मान लें तो कर्मयोग हो जायगा, प्रकृतिमात्रका समझ लें तो ज्ञानयोग हो जायगा और भगवान् का मान लें तो भक्तियोग हो जायगा। यदि इनको अपना मानेंगे तो जन्म-मरणयोग हो जायगा अर्थात् जन्म-मरण होगा, मिलेगा कुछ नहीं। जो अपना नहीं है, वह मिलेगा कैसे? अपने पास रहेगा कैसे? इसलिये गीता कहती है कि इन शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिसे जो भी काम करो, सबके हितके लिये करो—

यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते॥

(४। २३)

‘यज्ञके लिये अर्थात् नि:स्वार्थभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं।

रामायणमें आया है—

परहित बस जिन्ह के मन माहीं।

तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥

(मानस, अरण्य० ३१। ५)

पर हित सरिस धर्म नहिं भाई।

पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥

(मानस, उत्तर० ४१। १)

दूसरोंका हित करनेसे कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों सिद्ध हो जाते हैं। सगुण और निर्गुण—दोनोंकी प्राप्ति दूसरोंका हित करनेसे हो जाती है। गीताने सगुणकी प्राप्तिके लिये कहा है—

ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता:॥

(१२।४)

‘वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे (सगुणको) ही प्राप्त होते हैं।’

और निर्गुणकी प्राप्तिके लिये कहा है—

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषय: क्षीणकल्मषा:।

छिन्नद्वैधा यतात्मान: सर्वभूतहिते रता:॥

(५।२५)

‘जिनका शरीर मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसहित वशमें है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं, जिनके सम्पूर्ण संशय मिट गये हैं, जिनके सम्पूर्ण कल्मष (दोष) नष्ट हो गये हैं, वे विवेकी साधक निर्वाण ब्रह्मको (निर्गुणको) प्राप्त होते हैं।’

हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी आदि कोई भी क्यों न हो, यदि वह अपने सिद्धान्तोंका, नियमोंका पालन करते हुए त्याग करे अर्थात् मिली हुई वस्तुको अपनी न माने तो उसका कल्याण हो जायगा। त्यागमें सब एक हो जाते हैं, कोई मतभेद नहीं रहता। जैसे कोई देवताओंका पूजन करता है, कोई ऋषियोंका पूजन करता है, कोई माँ-बापका पूजन करता है आदि-आदि। परन्तु नियम-पालनमें भिन्नता होनेपर भी दूसरोंके हितके लिये स्वार्थ और अभिमानका त्याग करनेमें सब एक हो जाते हैं। जिनमें अपने स्वार्थ और अभिमानके त्यागकी मुख्यता है, वे मत, सिद्धान्त, सम्प्रदाय, ग्रन्थ, व्यक्ति आदि महान् श्रेष्ठ होते हैं। परन्तु जिनमें अपने स्वार्थ और अभिमानकी मुख्यता है, वे मत, सिद्धान्त, ग्रन्थ, व्यक्ति आदि महान् निकृष्ट होते हैं।

सबका हित करनेसे अपना हित मुफ्तमें, स्वाभाविक ही हो जाता है। इसलिये हमें कोई नया काम नहीं करना है, प्रत्युत अपना भाव बदलना है कि हमारी सम्पत्ति सबके लिये है। हम तो सम्पत्तिकी रक्षा करनेवाले हैं। जैसे आवश्यकता पड़नेपर हम अन्न, जल, वस्त्र आदि अपने काममें लेते हैं, ऐसे ही आवश्यकता पड़नेपर दूसरोंको भी अन्न, जल, वस्त्र, औषध दे दें। जैसे खुद आवश्यकताके अनुसार वस्तु लेते हैं, ऐसे ही दूसरोंको भी आवश्यकताके अनुसार वस्तु दें।

सबके हितका भाव हरेक भाई-बहन रख सकते हैं। यह भाव गृहस्थ भी रख सकते हैं, साधु-संन्यासी भी रख सकते हैं; दरिद्र-से-दरिद्र मनुष्य भी रख सकते हैं, धनी-से-धनी मनुष्य भी रख सकते हैं। हमारे पास जो वस्तुएँ हैं, वे किसकी हैं—इसका पता नहीं है, पर कोई अभावग्रस्त आदमी सामने आ जाय तो वस्तुको उसीकी समझकर उसको दे दें—‘त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।’ जैसे हमारे पास कोई सज्जन आता है और कहता है कि ‘भाई, आज मेरेको मेलेमें जाना है। मेरे पास एक हजार रुपये हैं, कोई जेब न कतर ले, इसलिये इन रुपयोंको आपके पास रखता हूँ।’ वह रुपये रखकर चला जाता है। शामको वह वापस आकर रुपये माँगता है और हम उसके रुपये उसको दे देते हैं तो क्या हमने दान कर दिया? दान नहीं किया, प्रत्युत उसीकी वस्तु उसको दे दी।

शास्त्रमें आया है कि रसोई बननेके बाद यदि ब्रह्मचारी और संन्यासी आ जायँ तो उनको अन्न न देनेसे पाप लगता है, जिसकी शुद्धि चान्द्रायणव्रत करनेसे होती है। यदि उनको थोड़ा-सा अन्न भी दे दें तो इतनेमें हमारे धर्मका पालन हो जायगा और पाप नहीं लगेगा। इसमें कोई शंका कर सकता है कि हमने पैसे कमाये, उससे सब सामग्री लाये और रसोई बनायी, पर कोई संन्यासी आदि आ जाय तो उसको न देनेसे पाप लग जायगा—यह कैसा न्याय है? इसका समाधान यह है कि जिसने संन्यास ले लिया, त्याग कर दिया और जो अपने पासमें कुछ नहीं रखता, उसके हकका धन कहाँ गया? यदि वह चाहता तो दूकान, खेत आदिमें काम करके, पढ़ाने-लिखानेका काम करके अपने जीवन-निर्वाहके योग्य धन कमा सकता था, रुपयोंका संग्रह कर सकता था, पर वह उसने नहीं किया तो वे रुपये हमारे पास ही तो रहे! इसलिये समयपर भोजनके लिये आ जाय तो उसको रोटी दे दें— यह हमारा कर्तव्य है। नहीं देंगे तो उसका हमपर ऋण रहेगा, हमें पाप लगेगा।

साधुओंकी भिक्षावृत्तिको शास्त्रोंमें बहुत पवित्र बताया गया है; क्योंकि कई घरोंसे थोड़ा-थोड़ा लेनेसे देनेवालेपर कोई भार भी नहीं पड़ता और लेनेवालेकी उदरपूर्ति भी हो जाती है। इसलिये इसको ‘माधुकरी वृत्ति’ भी कहते हैं। ‘मधुकर’ नाम भौंरे अथवा मधुमक्खीका है। मधुमक्खी हरेक पुष्पसे थोड़ा-थोड़ा रस लेती है और किसी पुष्पका नुकसान भी नहीं करती। एक साधु थे। उनसे किसीने पूछा कि ‘आप भोजन कहाँ पाते हो? पासमें एक पैसा तो है नहीं!’ साधुने कहा कि ‘भिक्षा पा लेते हैं।’ उसने फिर पूछा कि ‘कभी भिक्षा न मिले तो?’ साधु बोला—‘तो भूखको ही पा लेते हैं!’ भूखको पानेका तात्पर्य है कि आज हम भोजन नहीं करेंगे, कल करेंगे।

संसारमें एक-दूसरेको दिये बिना, एक-दूसरेकी सेवा किये बिना किसीका भी निर्वाह नहीं हो सकता। राजा-महाराजा कोई क्यों न हो, अपने निर्वाहके लिये कुछ-न-कुछ सहायता लेनी ही पड़ती है। इसलिये गीतामें आया है—

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व:।

परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ॥

(३। ११)

‘अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे।’

कितनी विलक्षण बात है कि एक-दूसरेका पूजन (सेवा) करते-करते परम कल्याणकी प्राप्ति हो जाती है!

कई वर्ष पहलेकी बात है। बाँकुड़ा जिलेमें अकाल पड़ गया तो गीताप्रेसके संस्थापक, संचालक तथा संरक्षक सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दकाने वहाँ कई जगह कीर्तन आरम्भ करवा दिया और लोगोंसे कहा कि वहाँ बैठकर दो घण्टे कीर्तन करो और आधा सेर चावल ले जाओ। पैसा देनेसे वे मांस, मछली आदि खरीदेंगे, पर चावल देनेसे वे चावल खायेंगे ही, इसलिये चावल देना शुरू किया। इस तरह उन्होंने कीर्तनके सौ-सवा सौ कैम्प खोल दिये। एक दिन सेठजी वहाँ देखनेके लिये गये। रात्रिमें वे जहाँ ठहरे थे, वहाँ बहुत-से बंगाली लोग इकट्ठे हुए। उन्होंने सेठजीकी बड़ी प्रशंसा की और कहा कि आपने हमारे जिलेको जिला दिया! सेठजी बोले कि देखो, तुमलोग झूठी प्रशंसा करते हो, हमने क्या खर्च किया है? हम मारवाड़से यहाँ आये थे। यहाँ आकर हमने बंगालसे जितना कमाया, वह सब-का-सब दे दें तो आपकी ही वस्तु आपको दी, हमने अपना क्या दिया? वह भी अभी सब नहीं दिया है। वह सब दे दें और फिर हम मारवाड़से लाकर दें, तब यह माना जायगा कि हमने दिया। इसी तरह हमें हरेकको उसीकी वस्तु समझकर उसको देनी है। देकर हम उऋण हो जायँगे, नहीं तो ऋण रह जायगा। अपनेमें सेवकपनेका अभिमान भी नहीं होना चाहिये। घरमें रसोई बनती है तो बच्चे भी खाते हैं, स्त्रियाँ भी खाती हैं, पुरुष भी खाते हैं; क्योंकि उसमें सबका हिस्सा है। इसी तरह कोई भूखा आ जाय, कुत्ता आ जाय, कौआ आ जाय तो उनका भी उसमें हिस्सा है। उनके हिस्सेकी चीज उनको दे दें। इस प्रकार नि:स्वार्थभावसे आचरण करनेपर हमारा कल्याण हो जायगा। गीतामें आया है—

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥

(१८। ४६)

‘अपने कर्तव्य कर्मके द्वारा उस परमात्माका पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।’

तात्पर्य है कि ब्राह्मण ब्राह्मणोचित कर्मोंके द्वारा पूजन करे, क्षत्रियोचित कर्मोंके द्वारा पूजन करे, वैश्य वैश्योचित कर्मोंके द्वारा पूजन करे और शूद्र शूद्रोचित कर्मोंके द्वारा पूजन करे। इस प्रकार सबका पूजन, सबका हित करनेसे अपना कल्याण हो जाता है—यह बात गीतामें बहुत विलक्षण रीतिसे बतायी गयी है।

यदि हम सुख चाहते हैं तो दूसरोंको भी सुख पहुँचाना हमारा कर्तव्य है। यदि हम अपने पास कुछ भी नहीं रखते हैं तो दूसरोंको देनेका विधान हमारेपर लागू भी नहीं होता। इन्कमपर टैक्स लगता है। हमने कमाया है तो उसपर टैक्स लगेगा। यदि हमने कमाया ही नहीं तो उसपर टैक्स कैसे लगेगा? अत: यदि हम अपने पास वस्तुएँ रखते हैं तो उनसे दूसरोंकी सेवा करनी है, दूसरोंका हित करना है। गीताका तात्पर्य सबके कल्याणमें है और सबके कल्याणमें ही हमारा कल्याण निहित है। जो लोगोंको अन्न बाँटता है, क्या वह भूखा रहेगा? क्या उसको अन्न नहीं मिलेगा? ऐसे ही जो सबके हितमें लगा हुआ है, क्या उसका हित नहीं होगा? उसका हित अपने-आप हो जायगा।

चाहे धनी हो, चाहे गरीब हो; चाहे बहुत परिवारवाला हो, चाहे अकेला हो; चाहे बलवान् हो, चाहे निर्बल हो; चाहे विद्वान् हो, चाहे मूर्ख हो, कल्याणमें सबका समान हिस्सा है। जैसे, एक माँके दस बेटे होते हैं तो क्या माँके दस हिस्से होते हैं? माँ तो सभी बेटोंके लिये पूरी-की-पूरी होती है। दसों बेटे पूरी माँको अपनी मानते हैं। ऐसे ही भगवान् पूरे-के-पूरे हमारे हैं। भगवान् के हिस्से नहीं होते। हम सब उनकी गोदमें बैठनेके समान अधिकारी हैं। इसलिये हम सब आपसमें प्रेमसे रहें और एक-दूसरेका हित करें—यह गीताका सिद्धान्त है—परस्परं भावयन्त:’, ‘सर्वभूतहिते रता:।’

प्रश्न—दान देनेमें, सेवा करनेमें पात्र-अपात्रका विचार करना चाहिये कि नहीं?

उत्तर—अन्न, जल, वस्त्र और औषध—इनको देनेमें पात्र-अपात्र आदिका विचार नहीं करना चाहिये। जिसको अन्न, जल आदिकी आवश्यकता है, वही पात्र है। परन्तु कन्यादान, भूमिदान, गोदान आदि विशेष दान करना हो तो उसमें देश, काल, पात्र आदिका विशेष विचार करना चाहिये।

अन्न, जल, वस्त्र और औषध—इनको देनेमें यदि हम पात्र-कुपात्रका अधिक विचार करेंगे तो खुद कुपात्र बन जायँगे और दान करना कठिन हो जायगा! अत: हमारी दृष्टिमें अगर कोई भूखा, प्यासा आदि दीखता हो तो उसको अन्न, जल आदि दे देना चाहिये। यदि वह अपात्र भी हुआ तो हमें पाप नहीं लगेगा।

प्रश्न—दूसरोंको देनेसे लेनेवालेकी आदत बिगड़ जायगी, लेनेका लोभ पैदा हो जायगा; अत: देनेसे क्या लाभ?

उत्तर—दूसरेको निर्वाहके लिये दें, संचयके लिये नहीं अर्थात् उतना ही दें, जिससे उसका निर्वाह हो जाय। यदि लेनेवालेकी आदत बिगड़ती है तो यह दोष वास्तवमें देनेवालेका है अर्थात् देनेवाला कामना, ममता, स्वार्थ आदिको लेकर देता है। यदि देनेवाला नि:स्वार्थ-भावसे, बदलेकी आशा न रखकर दे तो जिसको देगा, उसका स्वभाव भी देनेका बन जायगा, वह भी सेवक बन जायगा! रामायणमें आया है—

सर्बस दान दीन्ह सब काहू।

जेहिं पावा राखा नहिं ताहू॥

(मानस, बाल० १९४। ४)