गीताकी शरणागति

गीतामें भगवान् ने अपनी प्राप्तिके अनेक साधन बताये हैं। जिससे मनुष्यका कल्याण हो जाय, ऐसी कोई भी युक्ति, उपाय भगवान् ने बाकी नहीं रखा है। अनन्त मुखोंसे कही जानेवाली बातको भगवान् ने एक मुखसे गीतामें कह दिया है! इसलिये गीताके टीकाकार श्रीधरस्वामी लिखते हैं—

शेषाशेषमुखव्याख्याचातुर्यं त्वेकवक्त्रत:।

दधानमद्भुतं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥

‘शेषनागके द्वारा अपने अशेष मुखोंसे की जानेवाली व्याख्याके चातुर्यको जो एक मुखसे ही धारण करते हैं, उन अद्भुत परमानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ।’

गीता ज्ञानका एक अथाह समुद्र है। इसका अध्ययन करनेपर नये-नये भाव मिलते हैं और मिलते ही चले जाते हैं। हाँ, अगर कोई विद्वत्ताके जोरपर गीताका अर्थ समझना चाहे तो नहीं समझ सकेगा। अगर गीता और गीतावक्ताकी शरण लेकर उसका अध्ययन किया जाय तो गीताका तात्त्विक अर्थ स्वत: समझमें आने लगता है।

गीता एक प्रासादिक ग्रन्थ है। यह ग्रन्थ अपनी शरण लेनेवालेपर खुद कृपा करता है और कृपा करके उसके सामने प्रकट होता है। मैंने ऐसे मनुष्योंको देखा है, जिनको संस्कृतका बोध नहीं है, पर वे गीताका अर्थ करते हैं! भाषाका बोध न होनेपर भी गीताका सिद्धान्त, भाव उनके मनमें आ जाता है। आजसे साठ-पैंसठ वर्ष पहलेकी बात है। कलकत्तेमें एक मुनीम थे। उनको शुद्ध हिन्दी लिखनी नहीं आती थी। एक दिन उन्होंने कहा कि मैं गीता कण्ठस्थ करना चाहता हूँ; परन्तु इसके लिये किसी पण्डितको रखूँ तो मेरी इतनी सामर्थ्य नहीं है कि उसको तनखाह दे सकूँ। मैंने कहा कि तुम भगवान् को नमस्कार करके, उनकी शरण होकर गीता पढ़नी शुरू कर दो। उन्होंने घर जाकर भगवान् का चित्र सामने रख दिया, धूप-बत्ती कर दी, पुष्प चढ़ा दिये और ‘कृष्णं वन्दे जगद्‍गुरुम्’ कहकर गीता पढ़ने लग गये। कुछ समयमें उनको गीता याद हो गयी। मैंने उनसे गीताके अठारह अध्याय ठीक संख्यासहित सुने। अशुद्धियाँ बहुत कम थीं।

विद्वत्ताके अभिमानसे गीता याद नहीं होती—ये उदाहरण भी मेरे सामने आये हैं। एक अच्छे पण्डित थे, जो रामायणके मर्मज्ञ थे। गीता-जयन्तीके अवसरपर मैंने गीताकी कुछ बातें कहीं तो उनका गीतामें आकर्षण हुआ। उन्होंने कहा कि मैं किसीसे कोई श्लोक सुन लेता हूँ तो वह मुझे कण्ठस्थ हो जाता है; अत: मैं गीताका अर्थ जानना चाहता हूँ। मैंने कहा कि आप गीताका एक बारहवाँ अध्याय याद करके मेरे पास आयें तो मैं उसका अर्थ आपको अच्छी तरहसे सुना दूँगा। कुछ दिनोंके बाद वे मेरेसे मिले और कहा कि मैं गीताको याद करनेके लिये बहुत परिश्रम करता हूँ, पर मेरेको गीता याद नहीं होती! इसका कारण मैंने यही समझा कि उनके मनमें अभिमान था कि मैं इतना जानकार हूँ, मेरेको बहुत जल्दी श्लोक याद हो जाते हैं! यह अभिमान पारमार्थिक मार्गमें बड़ा भारी बाधक है। जो निरभिमान होकर सरलतापूर्वक गीताकी शरणमें जाता है, उसको गीताके भाव समझमें आ जाते हैं। मैंने देखा है कि जिन्होंने भगवान् की शरण ले ली है, उनके अनुभवमें ऐसी-ऐसी विचित्र बातें आ जाती हैं, जो शास्त्रोंमें भी कहीं-कहीं मिलती हैं। इसलिये गीतामें शरणागतिकी बात मुख्यरूपसे आयी है। गीता शरणागतिसे ही शुरू होती है और शरणागतिमें ही समाप्त होती है। भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन साथ-साथ रहा करते थे। श्रीमद्भागवतमें अर्जुन कहते हैं—

शय्यासनाटनविकत्थनभोजनादि-

ष्वैक्याद् वयस्य ऋतवानिति विप्रलब्ध:।

सख्यु: सखेव पितृवत्तनयस्य सर्वं

सेहे महान् महितया कुमतेरघं मे॥

(१। १५। १९)

‘भगवान् श्रीकृष्णके साथ सोने, बैठने, घूमने, बातचीत करने और भोजनादि करनेमें मेरा-उनका ऐसा सहज भाव हो गया था कि मैं कभी-कभी ‘हे सखे! तुम तो बड़े सत्यवादी हो!’ ऐसा कहकर आक्षेप भी करता था। परन्तु वे महात्मा प्रभु अपने बड़प्पनके अनुसार मुझ कुबुद्धिके उन समस्त तिरस्कारोंको वैसे ही सहा करते थे, जैसे सखा अपने सखाके या पिता अपने पुत्रके सब तिरस्कार सहा करता है।’

अर्जुनके साथ इतनी घनिष्ठ मित्रता होते हुए भी भगवान् श्रीकृष्णने उनको पहले कभी गीताका उपदेश नहीं दिया। परन्तु युद्धके अवसरपर, जब दोनों तरफसे शस्त्र चलनेकी तैयारी हो रही थी—‘प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डव:’ (गीता १। २०), तब भगवान् ने अर्जुनको गीता सुनायी! क्या गीतोपदेश देनेके लिये यही एकान्तका बढ़िया समय था? इसका उत्तर यह है कि पहले कभी अर्जुन इस प्रकार व्याकुल होकर भगवान् की शरण नहीं हुए थे। जब उन्होंने दोनों पक्षकी सेनाओंमें अपने सगे-सम्बन्धियोंको देखा, तब वे सन्देहमें पड़ गये कि मैं युद्ध करूँ अथवा न करूँ? युद्धमें हमारी विजय होगी अथवा कौरवोंकी? मेरा कल्याण युद्ध करनेमें है अथवा न करनेमें? अत: उन्होंने भगवान् की शरण लेते हुए प्रार्थना की—

कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव:

पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता:।

यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे

शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥

(गीता २।७)

‘कायरताके दोषसे उपहत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्त:करणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित श्रेय हो, वह मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ। आपके शरण हुए मेरेको शिक्षा दीजिये।’

इस प्रकार गीताके आरम्भमें अर्जुन भगवान् की शरण लेकर अपने कल्याणका उपाय पूछते हैं और अन्तमें भगवान् अपनी शरणमें आनेकी आज्ञा देते हैं—‘मामेकं शरणं व्रज’ (गीता १८। ६६)।

अर्जुनने भगवान् से पहले तो यह कहा कि ‘मैं आपकी शरण हूँ, मेरेको शिक्षा दीजिये’, पर इसके तुरन्त बाद वे ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’—ऐसा कहकर चुप हो गये—‘न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह’ (गीता २।९)। यह बात भगवान् को ठीक नहीं लगी, पर वे कुछ बोले नहीं। अत्यधिक कृपालु होनेके कारण भगवान् ने उपदेश देना शुरू कर दिया। आगे चलकर अठारहवें अध्यायमें भगवान् बोले—

यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।

मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥

(गीता १८।५९)

‘अहङ्कारका आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या (झूठा) है; क्योंकि तेरी क्षात्र-प्रकृति तेरेको युद्धमें लगा देगी।’

भगवान् के कथनका तात्पर्य है कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’—यह वास्तवमें अहङ्कारकी शरण होना है, मेरी शरण होना नहीं। अगर मेरी शरणागति होती तो ‘मैं ऐसा करूँगा, ऐसा नहीं करूँगा’—यह हो ही नहीं सकता। अहङ्कार शरणागतिमें महान् बाधक है वर्ण, आश्रम, जाति, विद्या, कुल, योग्यता, पद आदिको लेकर ‘मैं भी कुछ हूँ’—ऐसा अभिमान शरण नहीं होने देता। अत: भगवान् ने अर्जुनसे कहा कि जैसी तेरी मरजी आये, वैसा कर—‘यथेच्छसि तथा कुरु’ (गीता १८।६३)। यह सुनकर अर्जुन घबरा गये कि भगवान् तो मेरा त्याग कर रहे हैं! यह देखकर भगवान् बोले कि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है, इसलिये मैं तेरे हितके लिये सर्वगुह्यतम (सबसे अत्यन्त गोपनीय) बात कहता हूँ*। गीतामें ‘सर्वगुह्यतमम्’ शब्द एक ही बार यहाँ (१८।६४ में) आया है।

इसके बाद भगवान् ने दो श्लोक कहे—

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥

(गीता १८।६५-६६)

‘तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर। ऐसा करनेसे तू मेरेको ही प्राप्त हो जायगा—यह मैं तेरे सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है।’

‘सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर।’

इन दो श्लोकोंके बाद भगवान् ने कहा कि यह सर्वगुह्यतम वचन उस व्यक्तिसे मत कहना, जो अतपस्वी है, अभक्त है, इस रहस्यको सुनना नहीं चाहता और मेरेमें दोषदृष्टि करता है*। इससे ऐसा मालूम देता है कि भगवान् ने दोनों तरफसे (चौंसठवें एवं सड़सठवें श्लोकमें) निषेध करके मानो डिबियाके बीचमें दो सर्वगुह्यतम श्लोक-रत्न रखे हैं। इन दोनोंमें भी शरणागतिका मुख्य श्लोक अन्तिम (१८। ६६) है।

रामायणमें भी जब सुग्रीवने भगवान् से कहा—

सब प्रकार करिहउँ सेवकाई।

जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई॥

(मानस, किष्किन्धा० ५।४)

तब भगवान् ने कहा—

सखा सोच त्यागहु बल मोरें।

सब बिधि घटब काज मैं तोरें॥

(मानस, किष्किन्धा० ७।५)

अर्जुनने भगवान् से कहा कि धर्मका निर्णय करनेमें मेरी बुद्धि काम नहीं कर रही है—‘धर्मसम्मूढचेता:’; अत: मैं आपकी शरण हूँ, तो भगवान् ने कहा कि तुझे धर्मका निर्णय करनेकी जरूरत ही नहीं है—‘सर्वधर्मान् परित्यज्य।’ जिनके भीतर कामना है, वे धर्मका आश्रय लेनेवाले तो बार-बार जन्मते और मरते रहते हैं—‘एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्नागतागतं कामकामा लभन्ते’ (गीता ९।२१)। अत: धर्मका आश्रय न लेकर अनन्यभावसे एक मेरी शरण ले—‘मामेकं शरणं व्रज।’

अर्जुन कहता है कि मैं युद्ध करूँगा तो पाप लगेगा१ और भगवान् कहते हैं कि तू युद्ध नहीं करेगा तो पाप लगेगा२। परन्तु अन्तमें भगवान् अत्यन्त कृपा करके कहते हैं कि तू पापसे मत डर, तू मेरी शरणमें आ जा तो मैं तेरेको सब पापोंसे मुक्त कर दूँगा। इसके साथ ही भगवान् आश्वासन भी देते हैं कि तू चिन्ता मत कर।

सम्पूर्ण पाप और दु:ख भगवान् से विमुख होनेसे ही होते हैं। भगवान् से विमुख होना सबसे बड़ा पाप है और सम्मुख होना सबसे बड़ा पुण्य है। इसलिये भगवान् ने कहा है—

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।

जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

(मानस, सुन्दर० ४४।१)

भगवान् के सम्मुख होनेसे पापों और दु:खोंका मूल नष्ट हो जाता है। सन्तोंने कहा है कि भगवान् के सम्मुख होना पूरा पुण्य है और सद्‍गुण-सदाचारोंमें लगना आधा पुण्य है। इसी तरह भगवान् से विमुख होना पूरा पाप है और दुर्गुण-दुराचारोंमें लगना आधा पाप है। जीव भगवान् का अंश है और अंशीसे विमुख होनेसे ही वह दु:ख पाता है। जब वह भगवान् की शरण हो जाता है, तब सब पाप-ताप मिट जाते हैं।

साधकको चाहिये कि वह सरल हृदयसे ऐसा कह दे कि ‘हे नाथ! मैं आपका हूँ’ अब मान ले कि मैं भगवान् की शरण हो गया और भगवान् ने मेरेको स्वीकार कर लिया। वास्तवमें भगवान् किसीका भी त्याग करते नहीं, किया नहीं और करेंगे नहीं। सर्वसमर्थ भगवान् में किसीका त्याग करनेकी सामर्थ्य ही नहीं है। उन्होंने सबको अपनी शरणमें ले रखा है। हम ही उनसे विमुख होकर संसारके सम्मुख हो गये, संसारकी शरण हो गये। अत: भगवान् कहते हैं कि सब धर्मोंका आश्रय छोड़कर एक मेरी शरण हो जाओ तो मैं तुम्हें सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत करो। तात्पर्य है कि धर्मका अनुष्ठान तो करो, पर धर्मका अनुष्ठान करके मैं अपना कल्याण कर लूँगा—यह आश्रय मत रखो। नाम, जप, कीर्तन, प्रार्थना, गीता-रामायणका पाठ, शास्त्रोंका अध्ययन आदि सब करो, पर इनसे मैं अपना कल्याण कर लूँगा—ऐसा अभिमान मत रखो। अपने उद्योगसे कोई अनन्त पापोंका नाश नहीं कर सकता; क्योंकि यह ताकत जीवमें नहीं है, प्रत्युत भगवान् में ही है। इसलिये भगवान् कहते हैं—‘अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:’ अर्थात् सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त मैं करूँगा, तुम चिन्ता क्यों करते हो!

जो जाको शरणो गहै, ताकहँ ताकी लाज।

उलटे जल मछली चलै, बह्यो जात गजराज॥

नदीके तेज प्रवाहमें यदि बलवान् हाथी भी आ जाय तो वह टिक नहीं सकता, लुढ़क जाता है। परन्तु छोटी-सी मछली उस तेज प्रवाहमें भी बड़े आरामसे घूमती है। इतना ही नहीं, मैंने देखा है कि अगर ऊपरसे जलकी धारा तीव्रगतिसे नीचे गिर रही हो तो उस धारामें भी छोटी-छोटी मछलियाँ ऊँचे चढ़ जाती हैं। इसका कारण यह है कि हाथीने तो जंगलकी शरण ले रखी है, पर मछलीने जलकी शरण ले रखी है। जलके सिवाय और जगह वह व्याकुल हो जाती है, जलके वियोगमें मर जाती है। अगर जल मछलीको बहा दे तो बेचारी मछली कहाँ जायगी? किसकी शरण लेगी? इसी तरह अगर हम भगवान् की शरण ले लें तो फिर कोई भी शक्ति हमें रोक नहीं सकती। इसलिये भगवान् कहते हैं कि तू चिन्ता मत कर—‘मा शुच:।’ हमने भगवान् की शरण ले ली, फिर अपने उद्धारकी चिन्ता हम करें—यह बड़े आश्चर्यकी और मूर्खताकी, बेसमझीकी बात है!

जबतक साधकमें अपने बल, बुद्धि, योग्यता आदिका आश्रय रहता है, ‘मैं कर सकता हूँ’—यह अभिमान रहता है, तबतक शरणागति नहीं होती। जब अपने बलका आश्रय नहीं रहता, तब बड़ी सुगमतासे शरणागति होती है। इसलिये कहा है—

जब लगि गज बल अपनो बरत्यो, नेक सरॺो नहिं काम।

निरबल ह्वै बल राम पुकारॺो, आये आधे नाम॥

सुने री मैंने निरबल के बल राम।

इसलिये साधकको अपना बल, बुद्धि, योग्यता आदि सब लगाने चाहिये। सब बल लगानेपर भी जब कार्य सिद्ध नहीं होता, तब अपने बलका अभिमान दूर हो जाता है। जबतक वह अपना पूरा बल लगाकर भजन नहीं करता, तबतक उसके भीतर अपने बलका अभिमान रहता है। जबतक अपने बलका अभिमान रहता है, तबतक शरणागति सिद्ध नहीं होती।

भगवान् अर्जुनसे कहते हैं—‘निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्’ (गीता ११।३३) ‘हे सव्यसाची! तुम निमित्तमात्र बन जाओ।’ अर्जुनको ‘सव्यसाची’ इसलिये कहा कि वे दोनों हाथोंसे बाण चलाते थे। वे दायें हाथसे जैसा निशाना मारते थे, वैसा-का-वैसा निशाना बायें हाथसे भी मारते थे। वे आगे-पीछे, दायें-बायें चारों तरफ बराबर भाग सकते थे और भागते हुए बाण चला सकते थे। भगवान् ‘सव्यसाची’ सम्बोधन देकर मानो यह कहते हैं कि तुम अपने उद्योगमें कमी मत रखो, पूरा उद्योग करो, पर भरोसा उद्योगका मत रखो।

जब भगवान् ने इन्द्रकी पूजा बन्द करवाकर गिरिराज गोवर्धनकी पूजा करवा दी, तब इन्द्रने कोप करके व्रजपर भयंकर वर्षा कर दी। भगवान् ने गिरिराजको बायें हाथकी छोटी अंगुलीके नखपर उठा लिया और ग्वालबालोंसे कहा कि सब-के-सब पर्वतपर अपनी-अपनी लाठियाँ लगाओ। सबने पूरी शक्तिसे अपनी लाठियाँ लगा दीं। ग्वालबालोंके मनमें आया कि हम सबने लाठियाँ लगायी हैं, तभी पर्वत उठा है। लालाकी एक अंगुलीसे पर्वत थोड़े ही उठा है! उनके मनमें ऐसा आते ही भगवान् ने उनका अभिमान दूर करनेके लिये अपनी अंगुली थोड़ी-सी नीचे की तो ग्वालबाल चिल्लाने लगे—अरे दादा! मरे, मरे, मरे! भगवान् ने कहा कि उठाओ, लगाओ जोर! पर लाठीके जोरसे पर्वत थोड़े ही उठ सकता है! तात्पर्य है कि साधक अपना बल तो पूरा लगाये, पर उद्योगसे मेरा उद्धार हो जायगा—इस तरह उद्योगका आश्रय न लेकर भगवान् का ही आश्रय रखे कि उद्धार तो भगवान् की कृपासे ही होगा। भगवान् की कृपाका भरोसा रखना शरणागति है। इसलिये भगवान् कहते हैं कि तू मेरी शरणमें आ जा, मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, उसकी चिन्ता तू मत कर।

परीक्षित् की माता उत्तराने भी भगवान् की शरण ली थी। द्रोणाचार्यके पुत्र अश्वत्थामाने विचार कर लिया था कि मैं पाण्डवोंका वंश नष्ट कर दूँगा। उसने सोते हुए द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंको मार डाला। अब केवल उत्तराके गर्भमें एक बालक रह गया। उसको भी नष्ट करनेके लिये अश्वत्थामाने ब्रह्मास्त्र चलाया। जब उत्तराने उसको अपनी ओर आते देखा, तब उसने भगवान् को पुकारा—

पाहि पाहि महायोगिन् देवदेव जगत्पते।

नान्यं त्वदभयं पश्ये यत्र मृत्यु: परस्परम्॥

अभिद्रवति मामीश शरस्तप्तायसो विभो।

कामं दहतु मां नाथ मा मे गर्भो निपात्यताम्॥

(श्रीमद्भा० १।८।९-१०)

‘देवाधिदेव! जगदीश्वर! महायोगिन्! आप मेरी रक्षा कीजिये! रक्षा कीजिये! आपके सिवाय इस लोकमें मुझे अभय देनेवाला दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि यहाँ सभी आपसमें एक-दूसरेकी मृत्युका कारण बन रहे हैं। प्रभो! सर्वशक्तिमान्! यह दहकता हुआ लोहेका बाण मेरी तरफ दौड़ा आ रहा है। स्वामिन्! यह मुझे भले ही जला डाले, पर मेरे गर्भको नष्ट न करे।’

उत्तराकी पुकार सुनते ही भगवान् ने चक्र धारण कर लिया और छोटा-सा रूप धारण करके गर्भस्थ शिशुके चारों ओर घूमने लगे। इससे ब्रह्मास्त्र गर्भस्थ शिशुका कुछ भी बिगाड़ नहीं कर सका और शान्त हो गया। परीक्षित् कहते हैं—

द्रौण्यस्त्रविप्लुष्टमिदं मदङ्गं

सन्तानबीजं कुरुपाण्डवानाम्।

जुगोप कुक्षिं गत आत्तचक्रो

मातुश्च मे य: शरणं गताया:॥

(श्रीमद्भा० १०।१।६)

‘महाराज! मेरा यह शरीर, जो आपके सामने है तथा जो कौरव और पाण्डव दोनों ही वंशोंका एकमात्र सहारा था, अश्वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे जल चुका था। उस समय मेरी माता जब भगवान् की शरणमें गयी, तब उन्होंने हाथमें चक्र लेकर मेरी माताके गर्भमें प्रवेश किया और मेरी रक्षा की।’

तात्पर्य है कि भगवान् की शरणमें जाना जीवका काम है और उसकी सब प्रकारसे रक्षा करना भगवान् का काम है। अगर मनुष्यमें थोड़ा भी शरणागतिका भाव आ जाय तो भगवान् पिघल जाते हैं, उनसे रहा नहीं जाता और वे उसको स्वीकार कर ही लेते हैं। अगर कोई सच्चे हृदयसे एक बार भी कह दे कि ‘हे नाथ! मैं आपका हूँ’ तो भगवान् उसका उद्धार कर देते हैं। भगवान् शरणागतका त्याग नहीं कर सकते। भगवान् कहते हैं—

ये दारागारपुत्राप्तान् प्राणान् वित्तमिमं परम्।

हित्वा मां शरणं याता: कथं तांस्त्यक्तुमुत्सहे॥

(श्रीमद्भा० ९।४।६५)

‘जो भक्त स्त्री, पुत्र, गृह, गुरुजन, प्राण, धन, इहलोक और परलोक—सबको छोड़कर केवल मेरी शरणमें आ गये हैं, उन्हें छोड़नेका संकल्प भी मैं कैसे कर सकता हूँ?’

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू।

आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥

(मानस, सुन्दर० ४४।१)

जो सच्चे हृदयसे भगवान् की शरण लेता है, उसका जीवन बदल जाता है—ऐसा मैंने देखा है। कलकत्तेमें एक सज्जन मिले थे। वे कहते थे कि ‘मैं सत्संग करनेवालोंको फालतू समझा करता था कि ये व्यर्थ ही अपना समय बर्बाद करते हैं। एक बार मैं नवद्वीप गया। मैं वहाँके प्रसिद्ध ‘भजनाश्रम’ में ठहरा हुआ था। एक दिन वहाँ कुछ माताएँ कीर्तन कर रही थीं। मैं वहाँ बैठ गया। उस कीर्तनमें एक स्त्रीने उठकर भगवान् की शरणागतिकी बात कही और वाल्मीकिरामायणका यह श्लोक कहा—

सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।

अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥

(६।१८।३३)

‘जो एक बार भी शरणमें आकर ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसा कहकर मेरेसे रक्षाकी याचना करता है, उसको मैं सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय कर देता हूँ—यह मेरा व्रत है।’

मैंने यह सुना तो विचार आया कि यह तो बड़ा सुगम साधन है! मैं अपने कमरेमें आ गया और सब कपाट बन्द करके एकान्तमें सच्चे हृदयसे भगवान् से कहा कि कोई एक बार भी आपकी शरण हो जाय तो आप उसका उद्धार कर देते हो, सब पापोंसे मुक्त कर देते हो—यह बात अगर सच्ची है तो हे नाथ! मैं आपकी शरण हूँ! ऐसा कहकर मैंने लम्बा पड़कर प्रणाम किया। फिर मैं वहाँसे कलकत्ते आ गया और अपने काममें लग गया। नवद्वीपवाली बात मेरेको याद ही नहीं रही। एक दिन मैंने सुना कि अमुक जगह सत्संग हो रहा है तो यों ही कौतूहलवशात् वहाँ चला गया। जानेपर मन लग गया तो सत्संग करने लग गया। धीरे-धीरे मेरा जीवन बदल गया। फिर एक दिन आश्चर्य आया कि मैं तो बड़ा तर्क-वितर्क करनेवाला था, फिर अपने-आप यह परिवर्तन कैसे हो गया! तब याद आया कि ओहो! मैंने नवद्वीपमें कहा था कि ‘हे नाथ! मैं आपकी शरण हूँ’ उसीका यह परिणाम है!

तात्पर्य है कि जब मनुष्य सच्चे हृदयसे भगवान् की शरण हो जाता है, तब भगवान् पर उसके उद्धारकी जिम्मेवारी आ जाती है। सच्चे हृदयसे ‘हे नाथ! मैं आपका हूँ’ ऐसा स्वीकार करनेमात्रसे कल्याण हो जाता है; क्योंकि वास्तवमें सभी भगवान् के ही हैं। महाभारतमें आया है—

एकोऽपि कृष्णस्य कृत: प्रणामो दशाश्वमेधावभृथेन तुल्य:।

दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय॥

(महाभारत, शान्ति० ४७।९२)

‘भगवान् श्रीकृष्णको एक बार भी प्रणाम किया जाय तो वह दस अश्वमेध यज्ञोंके अन्तमें किये गये स्नानके समान फल देनेवाला होता है। इसके सिवाय प्रणाममें एक विशेषता है कि दस अश्वमेध करनेवालेका तो पुन: संसारमें जन्म होता है, पर श्रीकृष्णको प्रणाम करनेवाला अर्थात् उनकी शरणमें जानेवाला फिर संसार-बन्धनमें नहीं आता।’

गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज कहते हैं—

कूर कुटिल खल कुमति कलंकी।

नीच निसील निरीस निसंकी॥

तेउ सुनि सरन सामुहें आए।

सकृत प्रनामु किहें अपनाए॥

(मानस, अयोध्या० २९९।१-२)

सब स्वारथी असुर सुर नर मुनि, कोउ न देत बिनु पाये।

कोसलपालु कृपालु कलपतरु, द्रवत सकृत सिर नाये॥

(विनयपत्रिका १६३।२)

भगवान् की स्तुति करते हुए ब्रह्माजी कहते हैं—

हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते

जीवेत यो मुक्ति पदे स दायभाक्॥

(श्रीमद्भा० १०। १४। ८)

‘जो हृदय, वाणी तथा शरीरसे आपको नमस्कार करता रहता है, वह आपके परमपदका ठीक वैसे ही अधिकारी हो जाता है, जैसे पिताकी सम्पत्तिका पुत्र!’

नमस्कार से रामदास, करम सभी कट जाय।

जाय मिले परब्रह्ममें, आवागमन मिटाय॥

भगवान् को प्रणाम करना उनकी शरणागति है। प्रणाम करनेका तात्पर्य है—‘मैं आपका हूँ; अत: आप जो भी विधान करें, मुझे स्वीकार है।’ गीतामें भी कई जगह नमस्कार करनेकी बात आयी है; जैसे—‘मां नमस्कुरु’ (९।३४,१८।६५),‘नमस्यन्तश्च मां भक्त्या’ (९। १४), ‘सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घा:’ (११। ३६) आदि। हमारी संस्कृति ही शरणागति-प्रधान है। शिष्य गुरुको प्रणाम करता है, पुत्र माता-पिताको प्रणाम करता है, स्त्री पतिको प्रणाम करती है, नौकर मालिकको प्रणाम करता है, प्रजा राजाको प्रणाम करती है आदि। मनुस्मृतिमें आया है—

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:।

चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥

(२।१२१)

‘जिसका प्रणाम करनेका स्वभाव है और जो नित्य वृद्धोंकी सेवा करता है, उसकी आयु, विद्या, यश और बल—ये चारों बढ़ते हैं।’

महाभारत-युद्धके आरम्भमें युधिष्ठिर अपने विपक्षमें खड़े पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य आदिके पास जाकर उनको प्रणाम करते हैं और उनसे युद्धके लिये आज्ञा माँगते हैं। इससे प्रसन्न होकर वे युधिष्ठिरको युद्धमें विजय होनेका वरदान देते हैं। प्रणामकी इतनी महिमा है कि ऊँचे-से-ऊँचे महात्मा जिस ‘वासुदेव: सर्वम्’ (सब कुछ भगवान् ही हैं)का अनुभव करते हैं, वह भी सबको प्रणाम करनेसे सुगमतापूर्वक अनुभवमें आ जाता है (श्रीमद्भागवत० ११।२९।१६—१९)।

शरणागति एक ही बार होती है और सदाके लिये होती है। एक बार ‘हे नाथ! मैं आपका हूँ’ ऐसा कहनेके बाद फिर और क्या कहना शेष रह गया? एक बार अपने-आपको दे दिया तो फिर दुबारा क्या देना शेष रह गया?

सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते।

सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सतां सकृत्॥

(महाभारत वन० २९४। २६; मनुस्मृति ९।४७)

‘कुटुम्बमें धन आदिका बँटवारा एक ही बार होता है, कन्या एक ही बार दी जाती है और किसी वस्तुको देनेकी प्रतिज्ञा भी एक ही बार की जाती है। सत्पुरुषोंके ये तीनों कार्य एक ही बार हुआ करते हैं।’

सिंह गमन सज्जन वचन, कदलि फलै इक बार।

तिरिया तेल हम्मीर हठ, चढ़ै न दूजी बार॥

जैसे विवाह होनेपर स्त्री मान लेती है कि अब मैं ससुरालकी हो गयी, पीहरकी नहीं रही, ऐसे ही ‘हे नाथ! मैं आपका हूँ’ ऐसा कहकर मान ले कि अब मैं भगवान् का हो गया, संसारका नहीं रहा। मैं जहाँ रहता हूँ, वह भगवान् का घर है; जो काम करता हूँ, वह भगवान् का काम है; जो पाता हूँ, वह भगवान् का प्रसाद है और जिन माता-पिता, स्त्री-पुत्र आदिका पालन करता हूँ, वे भगवान् के ही जन हैं। जैसे विवाह होनेपर स्त्रीका गोत्र बदल जाता है, पतिका गोत्र ही उसका गोत्र हो जाता है, ऐसे ही शरणागत भक्तका ‘अच्युतगोत्र’ हो जाता है। गोस्वामीजी महाराज कहते हैं—‘साह ही को गोतु गोतु होत है गुलाम को’ (कवितावली, उत्तर० १०७)।

जैसे पहलवान मनुष्यके किसी अंगमें कोई कमजोरी हो तो उसको पकड़ लेनेसे वह हार जाता है, ऐसे ही भगवान् की भी एक कमजोरी है, जिसको पकड़ लेनेसे वे इधर-उधर नहीं हो सकते, हार जाते हैं! वह कमजोरी है—एक भगवान् के सिवाय अन्य किसीका सहारा न लेना अर्थात् अनन्यभावसे भगवान् की शरण लेना—

एक बानि करुनानिधान की।

सो प्रिय जाकें गति न आन की॥

(मानस, अरण्य० १०।४)

मीराबाईने कहा है—‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’। ‘मेरे तो गिरधर गोपाल’—यह तो सब कह देते हैं, पर ‘दूसरो न कोई’—यह नहीं कहते, प्रत्युत माता-पिता, भाई-बन्धु, कुटुम्बी, धन-सम्पत्ति, विद्या, योग्यता आदि किसी-न-किसीका आश्रय भी साथमें रखते हैं। जैसे किसी राजाका बेटा दूसरोंसे भीख माँगने लगे तो वह राजाको नहीं सुहाता, ऐसे ही सत्-चित्-आनन्दरूप भगवान् का अंश जीव जब असत्-जड-दु:खरूप संसारका आश्रय लेता है तो वह भगवान् को नहीं सुहाता; क्योंकि इसमें जीवका महान् अहित है। भगवान् को वही प्यारा लगता है, जो अन्यका आश्रय नहीं लेता—‘सो प्रिय जाकें गति न आन की।’ भगवान् कहते हैं—‘मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्त: स मे प्रिय:’ (गीता १२। १४) ‘मेरेमें अर्पित मन-बुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है।’

सर्वथा भगवान् की शरण हो जायँ तो फिर वे छोड़ नहीं सकते। परन्तु जो भगवान् के सिवाय अन्यका सहारा रखता है, धन, बल, बुद्धि, योग्यता, वर्ण-आश्रम, विद्या आदिका सहारा रखता है तो फिर भगवान् उसकी पूरी रक्षा नहीं करते। जब वह पूरी शरण हुआ ही नहीं तो फिर उसकी पूरी रक्षा कैसे करें? इसलिये भगवान् कहते हैं—‘मामेकं शरणं व्रज’ ‘केवल मेरी शरणमें आ’। परन्तु शरणागतके भीतर ऐसी दृढ़ता रहनी चाहिये कि भगवान् भले ही मेरी रक्षा न करें, मेरी कितनी ही हानि हो जाय, चाहे शरीर नष्ट हो जाय तो भी आश्रय भगवान् का ही रखूँगा। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं—

आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मा-

मदर्शनान्मर्महतां करोतु वा।

यथा तथा वा विदधातु लम्पटो

मत्प्राणनाथस्तु स एव नापर:॥

(शिक्षाष्टक ८)

‘वे चाहे मुझे हृदयसे लगाकर हर्षित करें या चरणोंमें लिपटे हुए मुझे पैरोंतले रौंद डालें अथवा दर्शन न देकर मर्माहत ही करें। वे परम स्वतन्त्र श्रीकृष्ण जैसे चाहें वैसे करें, मेरे तो वे ही प्राणनाथ हैं, दूसरा कोई नहीं।’

शरणागति अत्यन्त सुगम साधन है। जैसे मनुष्य नींद लेता है तो उसको नींद लेनेके लिये न तो कोई पुरुषार्थ करना पड़ता है, न कोई परिश्रम करना पड़ता है, न कुछ याद करना पड़ता है, न कोई कार्य करना पड़ता है, प्रत्युत सब कुछ छोड़ना पड़ता है। सब कुछ छोड़ दें तो नींद स्वत: आ जाती है। इसी तरह अपने बल, बुद्धि, विद्या, योग्यता आदिका कोई अभिमान न रखें, कोई आश्रय न रखें तो शरणागति स्वत: हो जाती है, उसके लिये कुछ करना नहीं पड़ता। कारण कि वास्तवमें जीवमात्र भगवान् के ही शरणागत है। भगवान् सबको अपना मानते हैं—‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’ (मानस, उत्तर० ८६।२)। परन्तु जीव अभिमान करके भगवान् से दूर हो जाता है अर्थात् अपनेको भगवान् से दूर मान लेता है। अत: अपने बल, योग्यता, वर्ण, आश्रम आदिका अभिमान अथवा सहारा शरणागतिमें महान् बाधक है। यदि अभिमान न छूटे तो इसके लिये आर्तभावपूर्वक भगवान् से ही प्रार्थना करनी चाहिये कि ‘हे नाथ! मैं अभिमान छोड़ना चाहता हूँ, पर मेरेसे छूटता नहीं, क्या करूँ!’ तो वे छुड़ा देंगे। जो काम हमारे लिये कठिन-से-कठिन है, वह भगवान् के लिये सुगम-से-सुगम है। अत: अपनेमें कोई दोष दीखे तो भगवान् को ही पुकारना चाहिये, अपने दोषको महत्त्व न देकर शरणागतिको ही महत्त्व देना चाहिये। शरणागतिको महत्त्व देनेसे दोष स्वत: दूर हो जाते हैं।

शरणागत भक्तके लिये साधन भी भगवान् हैं, साध्य भी भगवान् हैं और सिद्धि भी भगवान् हैं। इसलिये गीतामें भगवान् ने कर्मयोग और ज्ञानयोगकी निष्ठा तो बतायी है, पर भक्तियोगकी निष्ठा नहीं बतायी है*। कारण कि कर्मयोगी और ज्ञानयोगीकी तो खुदकी निष्ठा होती है, पर भक्तकी खुदकी निष्ठा नहीं होती, प्रत्युत भगवान् की ही निष्ठा होती है। भक्त साधननिष्ठ न होकर भगवन्निष्ठ होता है। जैसे, बँदरीका बच्चा खुद माँको पकड़ता है, पर बिल्लीका बच्चा माँको नहीं पकड़ता, प्रत्युत माँ ही उसको पकड़कर जहाँ चाहे, वहाँ ले जाती है। शरणागत भक्त भी बिल्लीके बच्चेकी तरह अपने बलका सहारा नहीं लेता, अपने बलका अभिमान नहीं करता। हनुमान् जी भक्तिके आचार्य होते हुए भी अभिमान न होनेके कारण कहते हैं—जानउँ नहिं कछु भजन उपाई’ (मानस, किष्किन्धा० ३।२)। ‘अतुलित-बलधाम’ होते हुए भी उनको अपना बल याद नहीं है।

जाम्बवान् ने उनसे कहा—

पवन तनय बल पवन समाना।

बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥

कवन सो काज कठिन जग माहीं।

जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥

(मानस, किष्किन्धा० ३०।२-३)

जाम्बवान् से इतनी प्रशंसा सुनकर भी हनुमान् जी चुप रहे। परन्तु जब जाम्बवान् ने कहा कि आपका अवतार ही रामजीका काम करनेके लिये हुआ है, तब हनुमान् जी को तत्काल अपना सब बल याद आ गया—

राम काज लगि तव अवतारा।

सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥

(मानस, किष्किन्धा० ३०।३)

हनुमान् जी समुद्रको लाँघनेके लिये तैयार हो गये कि रामजीका काम तो रामजीकी कृपासे होगा, उसमें अपनी योग्यता-अयोग्यताको क्यों देखें? जहाँ अपने बलका अभिमान नहीं होता, वहाँ भगवान् का बल काम करता है। अभिमान होनेसे ही बाधा लगती है।

जब कभी अपनेमें अभिमान आ जाय, हमारी वृत्तियाँ खराब हो जायँ, मनमें कोई कामना उत्पन्न हो जाय तो उसको दूर करनेका सबसे सुगम और बढ़िया उपाय है—भगवान् से कह देना। मन-ही-मन भगवान् से कहे कि ‘हे नाथ! देखिये, देखिये, मेरे मनमें कामना आ गयी! मेरे मनकी दशा देखिये भगवन्! मेरे मनमें ऐसी वृत्ति आ गयी, ऐसा संकल्प आ गया! हे नाथ, मैं आपका भजन-ध्यान करता हूँ, लोग मेरेको आपका भक्त मानते हैं, अच्छा मानते हैं, पर मेरी दशा यह है!’ जैसे अग्निके साथ सम्बन्ध होनेपर काला कोयला भी चमक उठता है; क्योंकि वास्तवमें कोयलेका सम्बन्ध तो अग्निसे ही है, पर अग्निसे दूर होनेपर वह काला हो जाता है। ऐसे ही भगवान् के साथ सम्बन्ध होनेपर मनुष्यके सब दोष मिट जाते हैं और वह चमक उठता है, उसमें विलक्षणता आ जाती है; क्योंकि वास्तवमें मनुष्यका सम्बन्ध तो भगवान् के साथ ही है। भगवान् की कृपा असम्भवको भी सम्भव बना देती है। ऐसे ‘कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ:’ भगवान् के चरणोंका आश्रय लिया जाय तो फिर किस बातकी चिन्ता? भगवान् अपने शरणागत भक्तका सब काम कर देते हैं—‘सब बिधि घटब काज मैं तोरें’, ‘अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि।’

बल, बुद्धि, योग्यता आदि किसी भी चीजका किंचिन्मात्र भी आश्रय लेना मनुष्यकी कमजोरी है; क्योंकि अन्यका आश्रय लेना कमजोरका ही काम है। परन्तु भगवान् का आश्रय लेना कमजोरी नहीं है, प्रत्युत वास्तविकता है। कारण कि भगवान् का अंश होनेसे जीव स्वत:-स्वाभाविक भगवान् के आश्रित है। जब वह अपने अंशी भगवान् से विमुख होकर प्रकृतिके अंश (शरीर-संसार)का आश्रय ले लेता है, तब वह कमजोर, पराधीन, असहाय, अनाथ हो जाता है। इसलिये अपने बलका आश्रय लेनेवाला मनुष्य अभिमान तो करता है कि मैं यों कर दूँगा! ऐसे कर दूँगा! पर जब पेशाब रुक जाता है, तब डाक्टरके पास भागता है! अपनी शक्तिका अभिमान तो करता है, पर दशा यह है कि पेशाब करनेकी भी शक्ति नहीं है! वास्तवमें संसारका आश्रय लेनेवाला कुछ नहीं कर सकता। परन्तु जो भगवान् का आश्रय लेता है, वह सब कुछ कर सकता है। वह असम्भवको भी सम्भव कर सकता है; क्योंकि भगवान् की सब शक्ति शरणागतमें आ जाती है। भगवान् की शरण लेनेसे नारदजीने कामदेवको जीत लिया—

काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी।

निज भयँ डरेउ मनोभव पापी॥

सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू।

बड़ रखवार रमापति जासू॥

(मानस, बाल० १२६।४)

शक्ति तो भगवान् की थी, पर नारदजीमें अभिमान आ गया कि मैंने अपनी शक्तिसे कामको जीत लिया—‘जिता काम अहमिति मन माहीं’ (मानस, बाल० १२७।३)। अभिमान आते ही वह बात नहीं रही और वे विश्वमोहिनी कन्यापर मोहित हो गये—‘करौं जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी॥’ (मानस, बाल० १३१।४)। अपने बलका अभिमान आते ही ‘हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला’—यह दशा हो गयी।

मनुष्यमें जो भी विशेषता, विलक्षणता आती है, वह सब भगवान् से ही आती है। भगवान् कहते हैं—

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।

तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥

(गीता १०।४१)

यदि भगवान् में विशेषता, विलक्षणता न होती तो वह मनुष्यमें कैसे आती? जो चीज अंशीमें नहीं है, वह अंशमें कैसे आ सकती है? मनुष्यसे यही भूल होती है कि वह उस विशेषताको अपनी विशेषता मानकर अभिमान कर लेता है और जहाँसे वह विशेषता आयी है, उस तरफ देखता ही नहीं! मिली हुई चीजको अपनी मान लेता है, पर उसे देनेवालेको अपना मानता ही नहीं! वास्तवमें वस्तु अपनी नहीं है, प्रत्युत उसको देनेवाले भगवान् अपने हैं। उन भगवान् के ही चरणोंकी शरण लेनी है।

वास्तवमें हम सब-के-सब सदासे ही भगवान् के हैं, उनके ही शरणागत हैं। इसीलिये कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं कह सकता कि मैंने अपनी मरजीसे इन माता-पिताके यहाँ जन्म लिया है और मैं अपनी मनचाही वस्तु, परिस्थिति आदि प्राप्त कर सकता हूँ। कारण कि यह सब भगवान् के हाथमें है। इसमें हमारी मरजी काम नहीं करती, प्रत्युत भगवान् की ही मरजी काम करती है।

करी गोपाल की सब होइ।

जो अपनौं पुरुषारथ मानत, अति झूठो है सोइ॥

साधन, मंत्र, जंत्र, उद्यम, बल, ये सब डारौ धोइ।

जो कुछ लिखि राखी नँदनंदन, मेटि सकै नहिं कोइ॥

दुख-सुख, लाभ-अलाभ समुझि तुम, कतहिं मरत हौं रोइ।

सूरदास स्वामी करुनामय, स्याम-चरन मन पोइ॥

(सूरविनय० २७६)

सब कुछ भगवान् ही करते हैं; क्योंकि उन्होंने सदासे ही हमें अपनी शरणमें ले रखा है। अब हमें केवल उनकी शरणागति स्वीकार करनी है, उनकी हाँ-में-हाँ मिलानी है, उनकी मरजीमें अपनी मरजी मिलानी है।

भगवान् की तरफसे तो हम सब उनके ही हैं— ‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५। ७) ‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’ (मानस, उत्तर० ८६।२)। परन्तु हम अपनी तरफसे संसारके बन जाते हैं। अत: वास्तवमें हमें भगवान् के शरणागत नहीं होना है, प्रत्युत संसारकी शरणागतिका त्याग करना है, अपनी भूलको मिटाना है। गीता सुननेसे अर्जुनकी भी भूल मिट गयी और उनको ‘मैं तो सदासे भगवान् का ही हूँ’—ऐसी स्मृति प्राप्त हो गयी। अर्जुन कहते हैं—

नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।

स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव॥

(गीता १८।७३)

‘हे अच्युत! आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया है और स्मृति प्राप्त हो गयी है। मैं सन्देहरहित होकर स्थित हूँ। अब मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा।’

भगवान् ने कहा—‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’ तो अर्जुनने कहा—‘करिष्ये वचनं तव’। तात्पर्य है कि शरण लेनेके बाद मनुष्यका काम है—भगवान् की आज्ञाका पालन करना।

कर्मयोगमें निष्कामभावकी स्मृति होती है, ज्ञानयोगमें स्वरूपकी स्मृति होती है और भक्तियोगमें भगवान् के साथ आत्मीयताकी स्मृति होती है, जो कि सदासे ही है।

भगवान् के साथ कर्मयोगीका ‘नित्य’-सम्बन्ध होता है, ज्ञानयोगीका ‘तात्त्विक’-सम्बन्ध होता है और शरणागत भक्तका ‘आत्मीय’-सम्बन्ध होता है। नित्य-सम्बन्धमें संसारके अनित्य-सम्बन्धका त्याग है, तात्त्विक-सम्बन्धमें तत्त्वके साथ एकता (तत्त्वबोध) है और आत्मीय-सम्बन्धमें भगवान् के साथ अभिन्नता (प्रेम) है। नित्य-सम्बन्धमें शान्तरस है, तात्त्विक-सम्बन्धमें अखण्डरस है और आत्मीयसम्बन्धमें अनन्तरस है। अनन्तरसकी प्राप्ति हुए बिना जीवकी भूख सर्वथा नहीं मिटती। अनन्तरसकी प्राप्ति शरणागतिसे होती है। इसलिये शरणागति सर्वश्रेष्ठ साधन है।

गीतामें कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, ध्यानयोगी आदि कई तरहके योगियोंका वर्णन आया है, पर भगवान् ने केवल भक्तियोगीको अर्थात् शरणागत भक्तको ही दुर्लभ महात्मा बताया है—

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।

वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:॥

(गीता ७।१९)

‘बहुत जन्मोंके अन्तमें ‘सब कुछ वासुदेव ही हैं’—ऐसा जो ज्ञानवान् मेरी शरण होता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।’

भगवान् महात्माको तो दुर्लभ बताते हैं, पर अपनेको सुलभ बताते हैं—

अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।

तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥

(गीता ८।१४)

‘हे पार्थ! अनन्यचित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्य-निरन्तर स्मरण करता है,उस नित्ययुक्त योगीके लिये मैं सुलभ हूँ।’

हरि दुरलभ नहिं जगतमें, हरिजन दुरलभ होय।

हरि हेरॺा सब जग मिलै, हरिजन कहिं एक होय॥

हरि से तू जनि हेत कर, कर हरिजन से हेत।

हरि रीझै जग देत हैं, हरिजन हरि ही देत॥

संसारमें भगवान् दुर्लभ नहीं हैं, प्रत्युत उनके शरणागत भक्त दुर्लभ हैं। कारण कि भगवान् को ढूँढ़ें तो वे सब जगह मिल जायँगे, पर भगवान् का प्यारा भक्त कहीं-कहीं ही मिलेगा। भगवान् प्रसन्न होकर मनुष्यशरीर देते हैं तो उस शरीरसे जीव नरकोंमें भी जा सकता है*; परन्तु भक्त तो भगवान् की ही प्राप्ति कराता है। भक्तका संग करनेवाला नरकोंमें नहीं जा सकता।

गीताके अठारहवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने भगवान् से ज्ञानयोग और कर्मयोगका तत्त्व ही पूछा था। परन्तु भगवान् ने उन दोनोंका तत्त्व पचपनवें श्लोकतक बताकर फिर कृपापूर्वक अपनी तरफसे भक्तिका वर्णन शुरू कर दिया और कहा—

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्‍व्यपाश्रय:।

मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥

(गीता १८। ५६)

‘मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है।’

ज्ञानयोगीके लिये तो भगवान् ने बताया कि वह सब विषयोंका त्याग करके संयमपूर्वक निरन्तर ध्यानके परायण रहे, तब वह अहंता, ममता, काम, क्रोध आदिका त्याग करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र होता है*। परन्तु भक्तके लिये उपर्युक्त श्लोकमें बताया कि वह अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार सब विहित कर्मोंको सदा करते हुए भी मेरी कृपासे परमपदको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि उसने मेरा आश्रय लिया है—‘मद्‍व्यपाश्रय:।’ तात्पर्य है कि भगवान् के चरणोंका आश्रय लेनेसे सुगमतासे कल्याण हो जाता है। भक्तको अपना कल्याण खुद नहीं करना पड़ता, प्रत्युत प्रभु-कृपा उसका कल्याण कर देती है—‘मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्।’

भगवान् की शरणमें जानेका काम तो भक्तका है, पर शरणागतिकी सिद्धि भगवान् की कृपासे होती है। अहंताको बदलनेकी उत्कण्ठा तो भक्तकी होती है, पर बदलनेका काम भगवान् करते हैं। जैसे बच्चेकी इच्छा माँ पूरी कर देती है, ऐसे ही भक्तकी इच्छा (उत्कण्ठा) को भगवान् पूरी कर देते हैं। गीतामें आया है—

यो यो यां यां तनुं भक्त: श्रद्धयार्चितुमिच्छति।

तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥

(७।२१)

‘जो-जो भक्त जिस-जिस देवताका श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहता है, उस-उस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धाको दृढ़ कर देता हूँ।’

जब भगवान् दूसरे देवताओंमें मनुष्यकी श्रद्धाको दृढ़ कर देते हैं तो फिर अपनेपर श्रद्धा करनेवाले भक्तोंकी श्रद्धाको वे दृढ़ क्यों नहीं करेंगे? अवश्य करेंगे। इसलिये आया है—

राम सदा सेवक रुचि राखी।

बेद पुरान साधु सुर साखी॥

(मानस, अयोध्या० २१९। ४)

जीवमात्र किसी-न-किसीका आश्रय चाहता है कि कोई मुझे अपनानेवाला मिल जाय, मेरी सहायता करनेवाला मिल जाय, मेरी रक्षा करनेवाला मिल जाय, मेरा पालन करनेवाला मिल जाय, मेरा दु:ख दूर करनेवाला मिल जाय, मेरे भयको हरनेवाला मिल जाय, मेरे सन्तापको हरनेवाला मिल जाय, मेरेको तत्त्वज्ञान देनेवाला मिल जाय, मेरा उद्धार करनेवाला मिल जाय, आदि-आदि। कोई कुटुम्बका आश्रय लेता है, कोई धनका आश्रय लेता है, कोई अपने विद्या-बुद्धिका आश्रय लेता है, कोई अपनी योग्यता आदिका आश्रय लेता है और कोई अपने पुरुषार्थका आश्रय लेता है कि मैं सब कुछ कर लूँगा। ऐसे अनेक तरहके आश्रय हैं, पर ये सब-के-सब नष्ट होनेवाले हैं। परन्तु भगवान् का आश्रय अविनाशी है और अविनाशी पदकी प्राप्ति करानेवाला है।

जो मनुष्योंमें भी नीचे हैं, जन्मसे भी नीचे हैं, कर्मसे भी नीचे हैं, योग्यतासे भी नीचे हैं और जो पशु-पक्षी आदि जंगम तथा वृक्ष-लता आदि स्थावर जीव हैं, वे भी यदि भगवान् के चरणोंका आश्रय ले लें तो भगवत्कृपासे उनका भी उद्धार हो जाता है! भगवान् कहते हैं—

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनय:।

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥

किं पुनर्ब्राह्मणा: पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।

(गीता ९। ३२-३३)

‘हे पार्थ! जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरी शरण होकर नि:सन्देह परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। फिर जो पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और ऋषिस्वरूप क्षत्रिय मेरे भक्त हों, वे परमगतिको प्राप्त हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है!’

इस प्रकार गीतामें शरणागतिका भाव बहुत विलक्षण रीतिसे आया है। भगवान् ने संसारकी सम्पूर्ण अच्छी-अच्छी बातोंका सार गीतामें संग्रह कर दिया है, मानो गागरमें सागर भर दिया है! उनमें भी शरणागति सम्पूर्ण गीताका सार है। उस शरणागतिको यदि कोई स्वीकार कर ले तो वह निहाल हो जायगा। उसमें बड़ी विलक्षणता आ जायगी। उसके भीतर बिना पढ़े वेदोंका तात्पर्य स्वत: स्फुरित हो जायगा। उसके लिये कुछ भी करना, जानना और पाना शेष नहीं रहेगा। अत: शरणागतिकी अनन्त अपार महिमा है!