गीतामें चरित्र-निर्माण
(भगवान् की सम्मुखता)
मनुष्य-शरीर केवल परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मिला है। इसलिये एक परमात्मप्राप्तिका निश्चय हो जाय तो मनुष्य परमात्माके सम्मुख हो जाता है। परमात्माके सम्मुख होनेसे उसमें सद्गुण-सदाचार स्वत: आने लगते हैं, जिससे उसके चरित्रका ठीक निर्माण होने लगता है। परन्तु जब मनुष्य परमात्मप्राप्तिको भूलकर सांसारिक पदार्थोंका संग्रह करने और भोग भोगनेमें लग जाता है, तब उसका चरित्र गिर जाता है। जिसका चरित्र नीचे गिर जाता है, वह मनुष्य कहलानेके योग्य भी नहीं रहता।
पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद।
ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद॥
(मानस ७। ३९)
भगवद्गीताका पूरा उपदेश चरित्र-निर्माणके लिये ही है। अर्जुनका भाव पहले युद्धका ही था, इसलिये उन्होंने भगवान् को युद्धके लिये आमन्त्रित करके उनको अपने ‘सारथि’ के रूपमें स्वीकार किया और युद्धक्षेत्रमें युद्ध करनेके लिये तैयार भी हो गये। परन्तु भगवान् का विचार अर्जुनका उद्धार करनेका था। अर्जुनने कहा कि दोनों सेनाओंके बीचमें रथको खड़ा कीजिये; मैं देखूँ कि मेरे साथ दो हाथ करनेवाला कौन है? भगवान् ने वैसे ही दोनों सेनाओंके बीच रथको खड़ा करके कहा कि इन कुरुवंशियोंको देख (१।२१—२५)। कुरुवंशियोंको देखनेकी बात सुननेसे अर्जुनको शरीरकी प्रधानतावाला अपना कुटुम्ब याद आ गया। ये सब मर जायँगे—इस विचारसे वे घबरा गये और अपने कर्तव्यसे विमुख होकर बोले कि मैं युद्ध नहीं करूँगा। कर्तव्यसे विमुख होना ही चरित्र-निर्माणमें बाधक होता है। भगवान् ने कहा—अरे! क्या करता है तू? युद्ध करना तो तेरा कर्तव्य है। इसलिये मोह और कायरताको त्यागकर युद्धके लिये खड़ा हो जा। (२।२-३)।
मनुष्यको कर्तव्य-पथपर प्रवृत्त करनेके लिये ही भगवद्गीताका आविर्भाव हुआ है। अधिकार-त्यागपूर्वक अपने कर्तव्यका ठीक-ठीक पालन करनेसे ही चरित्रका निर्माण होता है और कर्तव्यसे च्युत होनेसे ही चरित्रका नाश होता है। भगवान् ‘न त्वेवाहं जातु नासं.....’ (२।१२)—यहाँसे उपदेश आरम्भ करते हैं और पहले देह और देही, विनाशी और अविनाशीका विवेचन करते हैं। तात्पर्य यह है कि विनाशी वस्तुकी ओर ध्यान न देकर अविनाशीकी ओर ध्यान दिया जाय। ऐसा होनेसे ही चरित्र-निर्माण होता है।
एक मार्मिक बात है कि अविनाशीका लक्ष्य होनेसे विनाशी वस्तुएँ स्वत: आयेंगी। उनके लिये दु:ख नहीं पाना पड़ेगा। परन्तु विनाशीका लक्ष्य होनेसे अविनाशी तत्त्वकी प्राप्ति नहीं होगी और विनाशी वस्तुओंके लिये भी चिन्ता करनी पड़ेगी एवं परिश्रम होगा। आगे चलकर भगवान् ने कहा कि यदि स्वधर्मको देखें तो भी क्षत्रियके लिये धर्मयुक्त युद्ध करनेमें ही लाभ है (२। ३१)। तात्पर्य है कि अपने कर्तव्यका पालन करनेसे ही मनुष्यकी उन्नति होती है और अकर्तव्यकी ओर जानेसे ही पतन होता है। कर्तव्य-पालनमें कामना, ममता और आसक्तिका त्याग मुख्य है। इनके त्यागका यह अभिप्राय है कि जडका उद्देश्य नहीं रखना है। शरीर आदि वस्तुएँ पहले हमारी नहीं थीं, पीछे हमारी नहीं रहेंगी और अब भी प्रतिक्षण हमसे वियुक्त हो रही हैं। ऐसी जागृति रहेगी तो जडका उद्देश्य नहीं रहेगा और स्वत: इन्द्रियोंका, अन्त:करणका संयम होगा। संयममें ही चरित्र-निर्माण होता है। असंयमसे प्रवृत्तियाँ उच्छृङ्खल हो जाती हैं एवं उनसे चरित्र गिर जाता है।
तीसरे अध्यायके आरम्भमें अर्जुन पूछते हैं कि मुझको घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं? भगवान् बताते हैं—‘ऊपरसे घोर कर्म दीखनेपर भी स्वार्थ, ममता, अहंता, कामनाका त्याग करके अपने कर्तव्यका पालन किया जाय तो वह घोरपना नहीं रहता, केवल क्रिया रहती है। क्रिया तो वर्ण और आश्रमके अनुसार तरह-तरहकी होती है, पर जो घोरपना, तीक्ष्णपना, मलिनता, पतन करनेकी बात होती है, वह कामनाके कारण होती है। कामना रख करके पारमार्थिक ग्रन्थ पढ़ें, दूसरोंको सुनायें तो (लक्ष्य पैसा आदि रहनेसे) आसुरी-सम्पत्तिसे, पापोंसे बच नहीं सकते; कहने-सुननेपर भी सच्चरित्रता आ नहीं सकती क्योंकि कामनासे ही सब पाप होते हैं (३।३७)। परन्तु परमात्माका लक्ष्य हो तो लौकिक कर्तव्य-कर्म करते हुए भी स्वत: सच्चरित्रता आ जाती है। इसलिये तीसरे अध्यायमें भगवान् ने कामनाका त्याग कर कर्तव्य-कर्म करनेपर बहुत जोर दिया है। ऐसे ही चौथे अध्यायमें बताया कि जब अपनी कामना नहीं रहती, कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता, तब सब कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् कर्मोंको करते हुए भी मनुष्य बँधता नहीं; क्योंकि उसका उद्देश्य परमात्माकी ओर चलनेका है। पाँचवें अध्यायमें भी अपने कर्तव्यका पालन करनेकी बात बतायी—
युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्त: कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥
(५।१२)
‘जो युक्त (योगी) होता है, वह कर्मफलका त्याग करके नैष्ठिकी, सदा रहनेवाली शान्तिको प्राप्त होता है और जो अयुक्त होता है अर्थात् जिसके मन-इन्द्रियाँ वशमें नहीं होते, वह कामनाके कारण फलमें आसक्त होकर बँध जाता है।’ फल (पदार्थ) तो उत्पन्न और नष्ट होनेवाला है, पर उसमें जो कामना है, वही बन्धनका कारण है। कामनासे चरित्र गिरता है। चरित्र गिरनेसे अशान्ति पैदा हो जाती है और चरित्र-निर्माणसे शान्ति मिलती है। मनमें दुर्भाव उत्पन्न होते ही अशान्ति हो जाती है और सद्भाव होते ही शान्ति होने लगती है।
यदि ध्यान दे तो यह प्रत्येक मनुष्यका अनुभव है कि वह जितना-जितना नाशवान् की कामनाका त्याग करता है, उतनी-उतनी शान्ति, आनन्द, समता, सद्गुण उसमें आते रहते हैं और जितनी-जितनी नाशवान् वस्तुओंकी कामना करता है, उतनी-उतनी अशान्ति, विषमता, दु:ख, सन्ताप, जलन, दुर्गुण आते हैं।
छठे अध्यायमें भी परमात्मामें तत्परतासे लगनेकी बात कही है। वे परमात्मा सब जगह परिपूर्ण हैं। उन परमात्माको जो सब प्राणियोंमें देखता है और सब प्राणियोंको परमात्माके अन्तर्गत देखता है, उससे परमात्मा अदृश्य नहीं होते और वह परमात्मासे अदृश्य नहीं होता—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
(६।३०)
जो मनुष्य दूसरोंके दु:ख-सुखको अपने शरीरके दु:ख-सुखके समान समझता है, वह परमयोगी होता है—
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दु:खं स योगी परमो मत:॥
(६।३२)
किसीको भी दु:ख न पहुँचे—ऐसा जिसका भाव है, वह परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है। सबका दु:ख दूर कैसे हो? सभी सुखी कैसे हो जायँ? ऐसे भाववालेका चरित्र सबसे ऊँचा होता है। आगे मनको वशमें करनेकी बात आयी तो अभ्यास और वैराग्यको बताया (६।३५) अर्थात् वहाँ भी भगवान् की ओर लगने और संसारसे हटनेकी बात कही। परलोकमें गतिके विषयमें भी यही बात है। जो परमात्माकी ओर चलता है, उसका साधन बीचमें ही छूट जाय और वह मर जाय तो उसका भी उद्धार ही होता है, दुर्गति नहीं होती (६।४०)। कल्याणकारी काम करनेवालेका काम अधूरा रहनेपर भी उसको लाभ ही होता है। जो भगवान् में ही मन और बुद्धिको लगा देता है, वह योगियोंमें श्रेष्ठ योगी माना गया है (६।४७)। भगवान् की ओर लगना ही श्रेष्ठता है।
जो भक्ति नहीं करते, उनको भगवान् दुष्कृती बताते हैं (७।१५) और जो भक्ति करते हैं, उनको सुकृती बताते हैं (७।१६)। तात्पर्य है कि परमात्माकी तरफ चलनेवाले सुकृती और संसारकी ओर चलनेवाले दुष्कृती हैं। आगे बताया कि जिनके कर्म पवित्र हैं, जिनका चरित्र बढ़िया है, वे दृढ़व्रत होकर भगवान् का भजन करते हैं (७।२८)।
भगवान् की ओर चलनेमें स्मृतिकी बात मुख्य है। आठवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनके प्रश्न करनेपर भगवान् ने कहा कि जो अन्त समयमें मेरा स्मरण करते हुए जाता है, वह मुझको प्राप्त होता है—इसमें संदेह नहीं (८।५)। कारण कि मनुष्य जिस-जिस भावको स्मरण करते हुए शरीरका त्याग करता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है (८।६)। इसलिये भगवान् कहते हैं कि तू सब समयमें मेरा स्मरण कर—‘सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर’ (८।७)। फिर भगवान् ने विशेष बात बतायी कि जो निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उसके लिये मैं सुलभ हूँ—
अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥
(८।१४)
भगवान् का स्मरण करना दैवीसम्पत्तिका, सच्चरित्रताका वास्तविक मूल है। स्मरण करनेका तात्पर्य है—भगवान् के साथ अपना जो वास्तविक सम्बन्ध है, उसको स्मरण करना कि मेरा तो भगवान् के साथ ही सम्बन्ध है, संसारके साथ सम्बन्ध नहीं है। संसारके साथ सम्बन्ध केवल माना हुआ है, इसलिये यह सम्बन्ध टिकता नहीं। प्रत्यक्ष देखते हैं कि इस जन्ममें जो सम्बन्धी हैं, वे पहले जन्ममें नहीं थे और आगेके जन्ममें भी नहीं रहेंगे। अभी बाल्यावस्थामें भी जो दशा थी, वह अभी नहीं रही और जो अभी है, वह आगे नहीं रहेगी। इस प्रकार संसार तो निरन्तर बदल रहा है, पर परमात्मा वे ही हैं और ‘मैं’ (स्वयं) भी वही हूँ। इसलिये परमात्माके साथ मेरा सम्बन्ध नित्य है। इस बातकी याद रहना ही स्मृति है। चिन्तन तो संसारका भी हो सकता है, पर स्मृति भगवान् की ही होती है। ऐसी स्मृति रहनेसे सच्चरित्रता स्वत: आती रहती है।
जो केवल भगवान् की ओर चलता है, वह सबसे श्रेष्ठ हो जाता है। वेद, यज्ञ, तप, दान, तीर्थ, व्रत आदिसे जो लाभ होता है, उससे अधिक लाभ भगवान् का उद्देश्य रखकर भगवान् की ओर चलनेवालेको होता है (८।२८)। इसलिये भगवान् की तरफ चलनेको सब विद्याओंका राजा, सब गोपनीयोंका राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फलवाला, धर्मयुक्त, करनेमें बड़ा सुगम और अविनाशी बताया गया है (९।२)। भगवान् अपने-आपको इतना सुगम बताते हैं कि ‘जो भक्तिपूर्वक पत्र, पुष्प, फल, जल आदि मेरे अर्पण कर देता है, उसका मैं भोजन कर लेता हूँ’ (९।२६)। ‘इसलिये चलना-फिरना, खाना-पीना, सोना-जगना आदि सब कुछ मेरे अर्पण कर दे तो सब पुण्यों और पापोंसे मुक्त होकर मुझको प्राप्त हो जायगा’ (९।२७-२८)।
मनुष्य दुराचारी है या सदाचारी है—इसकी कोई चिन्ता नहीं। खास बात है कि वह भगवान् में लग जाय। भगवान् में लगनेपर उसका दुराचार टिक ही नहीं सकता। वह बहुत शीघ्र धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शाश्वती शान्तिको प्राप्त हो जाता है (९।३०-३१)। ‘दुराचारी, पापयोनि (पशु आदि), स्त्री, वैश्य, शूद्र, क्षत्रिय, ब्राह्मण आदि किसी जाति, वर्ण, आश्रम, देश आदिका कोई क्यों न हो, भगवान् में लग जाय तो उसको भगवान् की प्राप्ति हो जाती है’ (९।३२-३३)। जितनी जातियाँ, वर्ण आदि हैं, उनमें बाहरसे तो प्रकृतिकी भिन्नता है, पर भीतरसे सब परमात्माके अंश हैं। इसलिये संसारके व्यवहारमें तो अपने वर्ण आदिके अनुसार चलनेकी मुख्यता है, पर पारमार्थिक मार्गमें वर्ण आदिकी मुख्यता नहीं है; क्योंकि परमार्थरूपसे (परमात्माका अंश होनेसे) सबका स्वरूप शुद्ध है और सबका परमात्मापर समानरूपसे अधिकार है। भगवान् कहते हैं कि ‘मेरा ही भक्त बन, मुझमें ही मनवाला हो, मेरा ही पूजन कर, मेरेको ही नमस्कार कर’ (९। ३४)। तात्पर्य है कि केवल मेरी तरफ लग जा।
दसवें अध्यायमें अर्जुनके द्वारा प्रार्थना करनेपर भगवान् ने अपनी विभूतियों और योगशक्तिका वर्णन किया। उसमें सार बात यह कही कि ‘मैं सब संसारमें व्यापक हूँ। जहाँ-जहाँ तुम्हें विशेषता दीखे, वहाँ-वहाँ मेरे तेजके अंशकी ही अभिव्यक्ति जान’ (१०।४१)। विशेषता तो मेरे कारणसे ही है। तात्पर्य है कि जहाँ जो कुछ विशेषता, अधिकता, विलक्षणता दीखे, वहाँ भी भगवान् की ही तरफ वृत्ति जानी चाहिये। फिर कहते हैं कि ‘तुझे बहुत जाननेसे क्या, मैं सम्पूर्ण संसारको एक अंशसे व्याप्त करके स्थित हूँ’ (१०।४२)। ऐसी बात सुनकर अर्जुनने, जिसके एक अंशमें सब संसार है, वह विश्वरूप देखना चाहा। उसे देखनेके लिये भगवान् ने अर्जुनको दिव्य चक्षु दिये।* विश्वरूप देखकर अर्जुन चकरा गये, भयभीत हो गये, मोहित हो गये। तब भगवान् ने कहा कि यह तेरी मूर्खता है। मैं तो वही हूँ। फिर तू भयभीत क्यों होता है?
बारहवें अध्यायमें अर्जुनने पूछा कि ‘जो ज्ञानमार्गसे चलते हैं और जो भक्तिमार्गसे चलते हैं, उन दोनोंमें कौन श्रेष्ठ हैं?’ भगवान् ने भक्तिमार्गसे चलनेवालोंको श्रेष्ठ बताया (१२।२) ज्ञानमार्गमें तो स्वयं (अपने बलपर) चलते हैं, पर भक्तिमार्गमें भगवान् के आश्रित हो जाते हैं। ज्ञानमार्गमें तो दैवीसम्पत्तिके गुणोंका, विवेक-वैराग्य आदिका उपार्जन करना पड़ता है, पर भक्तिमार्गमें प्रभुके चरणोंकी शरण होनेपर दैवीसम्पत्तिके सद्गुण-सदाचार स्वत: स्वाभाविक आते हैं। ऐसे शरणागत भक्तोंका भगवान् बहुत जल्दी उद्धार करते हैं (१२। ७)। इसलिये भगवान् कहते हैं कि ‘तू अपने मन-बुद्धि मुझको ही दे दे, मेरे ही परायण हो जा।’ ऐसे भगवत्परायण पुरुषके लिये भगवान् कहते हैं कि वह मुझे बहुत प्यारा है। ऐसे तो संसारके सम्पूर्ण जीव भगवान् को प्यारे हैं, पर जो भगवान् के शरण हो जाते हैं, वे भगवान् को बहुत प्यारे होते हैं। केवल भगवत्परायण होनेसे सद्गुण-सदाचार बिना कोई प्रयत्न किये अपने-आप आ जाते हैं।
तेरहवें अध्यायमें भगवान् ज्ञानका वर्णन करते हैं तो उसमें अमानित्व आदि सद्गुणोंका वर्णन करते हुए अव्यभिचारिणी भक्तिकी बात कहते हैं—‘मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।’ (१३।१०)। चौदहवें अध्यायमें भी भक्तिकी बात कहते हैं कि ‘जो भक्तियोगके द्वारा मुझको भजता है, वह तीनों गुणोंको अतिक्रमण कर जाता है’ (१४।२६)। गुणोंके सङ्गसे ही आसुरी सम्पत्ति आती है, जिससे ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म होता है।* भगवान् की ओर चलनेसे उन गुणोंका अतिक्रमण हो जाता है।
पंद्रहवें अध्यायमें भगवान् ने अपना विशेष प्रभाव बताया और कहा कि ‘क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी जीव)—इन दोनोंसे उत्तम पुरुष मैं हूँ’ (१५।१६—१८)। जो मुझको पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वविद् है अर्थात् सब कुछ जाननेवाला है और सर्वभावसे मेरा ही भजन करता है। जो भगवान् का भजन करते हैं, उनमें दैवीसम्पत्ति स्वाभाविक प्रकट होती है। इसलिये सोलहवें अध्यायमें भगवान् ने दैवीसम्पत्तिका वर्णन किया। परन्तु जो भगवान् से विमुख होकर अपने ही शरीरको पुष्ट करना, भोगोंको भोगना और संग्रह करना चाहते हैं, उनमें आसुरी सम्पत्ति आती है। उस आसुरी सम्पत्तिका भगवान् ने सोलहवें अध्यायमें बहुत विस्तारसे वर्णन किया। दैवी सम्पत्तिसे मुक्ति होती है (१६। ५)। आसुरी सम्पत्तिसे बन्धन होता है (१६।५), चौरासी लाख योनियोंकी प्राप्ति होती है (१६।१९) और नरकोंकी प्राप्ति होती है (१६।२०)।
सत्रहवें अध्यायमें सात्त्विक, राजस और तामस—तीन प्रकारके भावोंका वर्णन किया। इसमें भी देखें तो संसारसे विमुख और परमात्माके सम्मुख होनेवालोंमें ही सात्त्विक भाव होते हैं। वे राजस और तामस भावोंसे ऊँचा उठ जाते हैं। परमात्माके लिये किये हुए यज्ञ, तप, दान आदि कर्म सात्त्विक और मुक्ति देनेवाले हो जाते हैं (१७।२५)। परन्तु संसारके लिये अर्थात् मान, बड़ाई, सुख, आराम आदिके लिये तथा प्रमाद और मूढ़तापूर्वक किये हुए यज्ञ, तप, दान आदि कर्म राजसी-तामसी हो जाते हैं।
अठारहवें अध्यायमें भगवान् ने संन्यास (सांख्ययोग) और त्याग-(कर्मयोग-) का विस्तारसे वर्णन किया। अन्तमें भगवान् ने यह निर्णय दिया कि सब धर्मोंका आश्रय छोड़कर केवल एक मेरी शरणमें आ जा—
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥
(१८।६६)
संसारके जितने काम हैं, जितनी सिद्धियाँ हैं, जितनी उन्नति है, वे सब-की-सब इस एक ही बात-(शरणागति) में आ जायँगी। भगवान् कहते हैं कि जितने पाप हैं, दुर्गुण-दुराचार हैं, उनसे मैं मुक्त कर दूँगा। तू चिन्ता मत कर। मेरी कृपासे दैवी सम्पत्ति अपने-आप आ जायगी।
जैसे बालक माँकी गोदीमें रहता है तो उसका स्वाभाविक ही पालन-पोषण एवं वर्धन हो जाता है, ऐसे ही एक प्रभुका आश्रय ले लिया जाय तो सब-के-सब सद्गुण-सदाचार बिना जाने ही आ जायँगे। अपने-आप ही चरित्र-निर्माण हो जायगा।
इस तरह गीताभरमें देखा जाय तो एक ही बात है—परमात्माकी तरफ चलना अर्थात् परमात्माके सम्मुख होना। परमात्माकी ओर चलनेका उद्देश्य ही चरित्र-निर्माणमें हेतु है और संसारकी ओर चलनेका उद्देश्य ही चरित्र गिरनेमें हेतु है। सांसारिक भोग और संग्रहकी इच्छासे ही सब दुर्गुण-दुराचार आते हैं। सबसे अधिक पतन करनेवाली वस्तु है—रुपयोंका महत्त्व और आश्रय। इससे मनुष्यका चरित्र गिर जाता है। चरित्र गिरनेसे उसकी मनुष्योंमें निन्दा होती है, अपमान होता है। चरित्रहीन मनुष्य पशुओं तथा नारकीय जीवोंसे भी नीचा है; क्योंकि पशु और नारकीय जीव तो पहले किये हुए पाप-कर्मोंका फल भोगकर मनुष्यताकी तरफ आ रहे हैं, पर चरित्रहीन मनुष्य पापोंमें लगकर पशुता तथा नरकोंकी तरफ जा रहा है! ऐसे मनुष्यका संग भी पतन करनेवाला है। इसीलिये कहा है—
बरु भल बास नरक कर ताता।
दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
(मानस ५।४६।४)
अत: अपना चरित्र सुधारनेके लिये भगवान् के सम्मुख हो जायँ कि मैं भगवान् का हूँ, भगवान् मेरे हैं। मैं संसारका नहीं हूँ, संसार मेरा नहीं है।
मनुष्यसे भूल यह होती है कि जो अपने नहीं हैं, उन सांसारिक वस्तुओंको तो अपना मान लेता है और जो वास्तवमें अपने हैं, उन भगवान् को अपना नहीं मानता। वास्तवमें देखा जाय तो सदुपयोग करनेके लिये ही सांसारिक वस्तुएँ अपनी हैं और अपने-आपको देनेके लिये ही भगवान् अपने हैं। कारण कि वस्तुएँ संसारकी हैं, इसलिये उन्हें संसारकी सेवामें अर्पित करना है और मनुष्य स्वयं भगवान् का है, इसलिये स्वयंको भगवान् के अर्पित करना है। न तो संसारसे कुछ लेना है और न भगवान् से ही कुछ लेना है। अगर लेना ही है तो केवल भगवान् को ही लेना है।
सांसारिक वस्तुओंकी कामनासे संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। कामना ममतासे उत्पन्न होती है अर्थात् शरीर, स्त्री, पुत्र, धन आदिको अपना माननेसे कामना उत्पन्न होती है। अब विचार करें कि जिन शरीर, स्त्री, पुत्र, धन आदिको हम अपना मानते हैं, उनपर हमारा स्वतन्त्र अधिकार है क्या? उनको जितने दिन चाहें, उतने दिन रख सकते हैं क्या? खुद उनके साथ सदा रह सकते हैं क्या? अगर कहा जाय कि नहीं तो फिर उनमें अपनापन छोड़नेमें क्या कठिनता है? उनमें भूलसे माना हुआ अपनापन छोड़नेसे कामना उत्पन्न नहीं होगी। कामना उत्पन्न न होनेसे भगवान् में स्वत: अपनापन होगा; क्योंकि वे सदासे अपने हैं और नित्यप्राप्त हैं। भगवान् में अपनापन होनेसे सब आचरण और भाव स्वत: शुद्ध हो जायँगे।
शरीर, स्त्री, पुत्र, धन, मकान आदि पदार्थ सत् हैं या असत् हैं—यह विकल्प तो हो सकता है, पर उनके साथ हमारा सम्बन्ध असत् है—इसमें संदेहकी सम्भावना ही नहीं है। असत् को असत् जान लेनेपर असत्-सम्बन्धका त्याग सुगमतापूर्वक हो जाता है और भगवान् की सम्मुखता होनेपर भगवान् का नित्य सम्बन्ध स्वत: जाग्रत् हो जाता है। फिर मनुष्यमें सच्चरित्रता स्वत: आ जाती है और वह चरित्र-निर्माणका आचार्य बन जाता है अर्थात् उसका चरित्र दूसरोंके लिये आदर्श हो जाता है—
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
(गीता ३।२१)
‘श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, दूसरे लोग भी (उसके आचरणोंको आदर्श मानते हुए) वैसा-वैसा ही आचरण करने लगते हैं; और वह जो प्रमाण देता है, समस्त मनुष्यसमुदाय उसीके अनुसार बर्ताव करने लग जाता है।’
इस चरित्र-निर्माणमें किंचिन्मात्र भी परतन्त्रता नहीं है। इसमें सब-के-सब स्वतन्त्र हैं, समर्थ हैं, योग्य हैं, अधिकारी हैं।
गीतोक्त सदाचार
भगवान् ने अर्जुनको निमित्त बनाकर मनुष्यमात्रको सदाचारयुक्त जीवन बनाने तथा दुर्गुण-दुराचारोंका त्याग करनेकी अनेक युक्तियाँ श्रीमद्भगवद्गीतामें बतलायी हैं। वर्ण, आश्रम, स्वभाव और परिस्थितिके अनुरूप विहित कर्तव्य कर्म करनेके लिये प्रेरणा करते हुए भगवान् कहते हैं—
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
(गीता ३।२१)
‘श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करते हैं, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं।’
वस्तुत: मनुष्यके आचरणसे ही उसकी वास्तविक स्थिति जानी जा सकती है। आचरण दो प्रकारके होते हैं—(१) अच्छे आचरण, जिन्हें सदाचार कहते हैं और (२) बुरे आचरण, जिन्हें दुराचार कहते हैं।
सदाचार और सद्गुणोंका परस्पर अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। सद्गुणसे सदाचार प्रकट होता है और सदाचारसे सद्गुण दृढ़ होते हैं। इसी प्रकार दुर्गुण-दुराचारका भी परस्पर अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। सद्गुण-सदाचार (सत् होनेसे) प्रकट होते हैं, पैदा नहीं होते। ‘प्रकट’ वही तत्त्व होता है, जो पहलेसे (अदर्शनरूपसे) रहता है। दुर्गुण-दुराचार मूलमें हैं नहीं, वे केवल सांसारिक कामना और अभिमानसे उत्पन्न होते हैं। दुर्गुण-दुराचार स्वयं मनुष्यने ही उत्पन्न किये हैं। अत: इनको दूर करनेका उत्तरदायित्व भी मनुष्यपर ही है। सद्गुण-सदाचार कुसङ्गके प्रभावसे दब सकते हैं, परंतु नष्ट नहीं हो सकते, जब कि दुर्गुण-दुराचार सत्सङ्गादि सदाचारके पालनसे सर्वथा नष्ट हो सकते हैं। सर्वथा दुर्गुण-दुराचाररहित सभी हो सकते हैं, किंतु कोई भी व्यक्ति सर्वथा सद्गुण-सदाचारसे रहित नहीं हो सकता।
यद्यपि लोकमें ऐसी प्रसिद्धि है कि मनुष्य सदाचारी होनेपर सद्गुणी और दुराचारी होनेपर दुर्गुणी बनता है, किंतु वास्तविकता यह है कि सद्गुणी होनेपर ही व्यक्ति सदाचारी और दुर्गुणी होनेपर ही दुराचारी बनता है। जैसे—दयारूप सद्गुणके पश्चात् दानरूप सदाचार प्रकट होता है। इसी प्रकार पहले चोरपने (दुर्गुण) का भाव अहंता (मैं) में उत्पन्न होनेपर व्यक्ति चोरीरूप दुराचार करता है। अत: मनुष्यको सद्गुणोंका संग्रह और दुर्गुणोंका त्याग दृढ़तासे करना चाहिये। दृढ़ निश्चय होनेपर दुराचारी-से-दुराचारीको भी भगवत्प्राप्तिरूप सदाचारके चरम लक्ष्यकी प्राप्ति हो सकती है। भगवान् घोषणा करते हैं—
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:॥
(गीता ९।३०)
‘अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्य-भावसे मेरा भजन करता है तो उसको साधु ही मानना चाहिये। कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है।’
तात्पर्य है कि बाहरसे साधु न दीखनेपर भी उसको साधु ही मानना चाहिये; क्योंकि उसने यह पक्का निश्चय कर लिया है कि अब मेरेको केवल भजन ही करना है। स्वयंका निश्चय होनेके कारण वह किसी प्रकारके प्रलोभनसे अथवा विपत्ति आनेपर भी अपने ध्येयसे विचलित नहीं किया जा सकता।
साधक तभी अपने ध्येय-लक्ष्यसे विचलित होता है, जब वह असत्—संसार और शरीरको ‘है’ अर्थात् सदा रहनेवाला मान लेता है। असत् की स्वतन्त्र सत्ता न होनेपर भी भूलसे मनुष्यने उसे सत् मान लिया और भोग-संग्रहकी ओर आकृष्ट हो गया। अत: असत्—संसार, शरीर, परिवार, रुपये-पैसे, जमीन, मान, बड़ाईसे विमुख होकर (इन्हें अपना मानकर इनसे सुख न लेकर और सुख लेनेकी इच्छा न रखकर) इनका यथायोग्य सदुपयोग करना है तथा सत्-तत्त्व (परमात्मा) को ही अपना मानना है। श्रीमद्भगवद्गीताके अनुसार असत् (संसार) की सत्ता नहीं है और सत्-तत्त्व (परमात्मा) का अभाव नहीं है—
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।
(२।१६)
जिस वास्तविक तत्त्वका कभी अभाव अथवा नाश नहीं होता, उसका अनुभव हम सबको हो सकता है। हमारा ध्यान उस तत्त्वकी ओर न होनेसे ही वह अप्राप्त-सा हो रहा है। उस सत्-तत्त्वका विवेचन गीतामें भगवान् ने पाँच प्रकारसे किया है।
(१) सद्भावे
(१७।२६)
(२) साधुभावे च सदित्येतत् प्रयुज्यते।
(१७।२६)
(३) प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्द: पार्थ युज्यते॥
(१७।२६)
(४) यज्ञे तपसि दाने च स्थिति: सदिति चोच्यते।
(१७।२७)
(५) कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥
(१७।२७)
यह सत्-तत्त्व ही सद्गुणों और सदाचारका मूल आधार है। अत: उपर्युक्त सत् शब्दका थोड़ा विस्तारसे विचार करें।
(१) ‘सद्भावे’—सद्भाव कहते हैं—परमात्माके अस्तित्व या होनेपनको। प्राय: सभी आस्तिक यह बात तो मानते ही हैं कि सर्वोपरि सर्वनियन्ता कोई विलक्षण शक्ति सदासे है और वह अपरिवर्तनशील है। जो संसार प्रत्यक्ष प्रतिक्षण बदल रहा है, उसे ‘है’ अर्थात् स्थिर कैसे कहा जाय? यह तो नदीके जलके प्रवाहकी तरह निरन्तर बह रहा है। जो बदलता है, वह ‘है’ कैसे कहा जा सकता है? क्योंकि इन्द्रियों, बुद्धि आदिसे जिसको जानते, देखते हैं, वह संसार पहले नहीं था, आगे भी नहीं रहेगा और वर्तमानमें भी जा रहा है—यह सभीका अनुभव है। फिर भी आश्चर्य यह है कि ‘नहीं’ होते हुए भी वह ‘है’ के रूपमें स्थिर दिखायी दे रहा है। ये दोनों बातें परस्पर सर्वथा विरुद्ध हैं। वह होता, तब तो बदलता नहीं और बदलता है तो ‘है’ अर्थात् स्थिर नहीं। इससे सिद्ध होता है कि यह ‘होनापन’ संसार-शरीरादिका नहीं है, प्रत्युत सत्-तत्त्व (परमात्मा) का है, जिससे नहीं होते हुए भी संसार ‘है’ दीखता है। परमात्माके होनेपनका भाव दृढ़ होनेपर सदाचारका पालन स्वत: होने लगता है।
भगवान् हैं—ऐसा दृढ़तासे माननेपर न पाप, अन्याय, दुराचार होंगे और न चिन्ता, भय आदि ही। जो सच्चे हृदयसे सर्वत्र परमात्माकी सत्ता मानते हैं, उनसे पाप हो ही कैसे सकते हैं?* परम दयालु, परम सुहृद् परमात्मा सर्वत्र हैं, ऐसा माननेपर न भय होगा और न चिन्ता होगी। भय लगने अथवा चिन्ता होनेपर ‘मैंने भगवान् को नहीं माना’—इस प्रकार विपरीत धारणा नहीं करनी चाहिये, किंतु भगवान् के रहते चिन्ता, भय कैसे आ सकते हैं—ऐसा माने। दैवी सम्पत्ति (सदाचार) के छब्बीस लक्षणोंमें प्रथम ‘अभय’ है (गीता १६।१)।
अच्छे आचरण करनेवालेको कोई यह नहीं कहता कि तुम अच्छे आचरण क्यों करते हो, पर बुरे आचरण करने-वालेको सब कहते हैं कि तुम बुरे आचरण क्यों करते हो? प्रसन्न रहनेवालेको कोई यह नहीं कहता कि तुम प्रसन्न क्यों रहते हो, पर दु:खी रहनेवालेको सब कहते हैं कि तुम दु:खी क्यों रहते हो? तात्पर्य है कि भगवान् का ही अंश होनेसे जीवमें दैवी सम्पत्ति स्वाभाविक है—‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी॥’ (मानस ७।११७।१)। आसुरी सम्पत्ति स्वाभाविक नहीं है, प्रत्युत आगन्तुक है और नाशवान् के संगसे आती है। जब जीव भगवान् से विमुख होकर नाशवान् (असत्) का संग कर लेता है अर्थात् शरीरमें अहंता-ममता कर लेता है, तब उसमें आसुरी सम्पत्ति आ जाती है और दैवी सम्पत्ति दब जाती है। नाशवान् का संग छूटते ही सद्गुण-सदाचार स्वत: प्रकट हो जाते हैं।
(२) ‘साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते’—अन्त:करणके श्रेष्ठ भावोंको ‘साधुभाव’ कहते हैं। परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले होनेसे श्रेष्ठ भावोंके लिये ‘सत्’ शब्दका प्रयोग किया जाता है। श्रेष्ठ भाव अर्थात् सद्गुण-सदाचार दैवी सम्पत्ति है। ‘देव’ नाम भगवान् का है और उनकी सम्पत्ति ‘दैवी सम्पत्ति’ कहलाती है। भगवान् की सम्पत्तिको अपनी माननेसे अथवा अपने बलसे उपार्जित माननेसे अभिमान आ जाता है, जो आसुरी सम्पत्तिका मूल है। अभिमानकी छायामें सभी दुर्गुण-दुराचार रहते हैं।
सद्गुण-सदाचार किसीकी व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं है। अगर ये व्यक्तिगत होते तो एक व्यक्तिमें जो सद्गुण-सदाचार हैं, वे दूसरे व्यक्तियोंमें नहीं आते। वास्तवमें ये सामान्य धर्म हैं, जिनको मनुष्यमात्र धारण कर सकता है। जैसे पिताकी सम्पत्तिपर सन्तानमात्रका अधिकार होता है, ऐसे ही भगवान् की सम्पत्ति (सद्गुण-सदाचार) पर प्राणिमात्रका समान अधिकार है।
अपनेमें सद्गुण-सदाचार होनेका जो अभिमान आता है, वह वास्तवमें सद्गुण-सदाचारकी कमीसे अर्थात् उसके साथ आंशिकरूपसे रहनेवाले दुर्गुण-दुराचारसे ही पैदा होता है। जैसे, सत्य बोलनेका अभिमान तभी आता है; जब सत्यके साथ आंशिक असत्य रहता है। सत्यकी पूर्णतामें अभिमान आ ही नहीं सकता। असत्य साथमें रहनेसे ही सत्यकी महिमा दीखती है और उसका अभिमान आता है। जैसे, किसी गाँवमें सब निर्धन हों और एक लखपति हो तो उस लखपतिकी महिमा दीखती है और उसका अभिमान आता है। परन्तु जिस गाँवमें सब-के-सब करोड़पति हों, वहाँ लखपतिकी महिमा नहीं दीखती और उसका अभिमान नहीं आता। तात्पर्य है कि अपनेमें विशेषता दीखनेसे ही अभिमान आता है। अपनेमें विशेषता दीखना परिच्छिन्नताको पुष्ट करता है।
सद्गुण-सदाचारकी स्वतन्त्र सत्ता है, पर दुर्गुण-दुराचारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। कारण कि असत् को तो सत् की जरूरत है, पर सत् को असत् की जरूरत नहीं है। झूठ बोलनेवाला व्यक्ति थोड़े-से पैसोंके लोभमें सत्य बोल सकता है, पर सत्य बोलनेवाला व्यक्ति कभी झूठ नहीं बोल सकता।
(३) ‘प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्द: पार्थ युज्यते’— ‘तथा हे पार्थ! उत्तम कर्ममें भी ‘सत्’ शब्दका प्रयोग किया जाता है।’ दान, पूजा, पाठादि जितने भी शास्त्र-विहित शुभकर्म हैं, वे स्वयं ही प्रशंसनीय होनेसे सत्कर्म हैं, किंतु इन प्रशस्त कर्मोंका भगवान् के साथ सम्बन्ध नहीं रखनेसे वे ‘सत्’ न कहलाकर केवल शास्त्र-विहित कर्ममात्र रह जाते हैं। यद्यपि दैत्य-दानव भी प्रशंसनीय कर्म तपस्यादि करते हैं, परन्तु असद् भाव—दुरुपयोग करनेसे इनका परिणाम विपरीत हो जाता है—
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तप:।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥
(गीता १७।१९)
‘जो तप मूढ़तापूर्वक हठसे, मन, वाणी और शरीरकी पीड़ाके सहित अथवा दूसरेका अनिष्ट करनेके लिये किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है।’ वस्तुत: प्रशंसनीय कर्म वे होते हैं, जो स्वार्थ और अभिमानके त्यागपूर्वक ‘सर्वभूतहिते रता:’ भावसे किये जाते हैं। शास्त्र-विहित सत्कर्म भी यदि अपने लिये किये जायँ तो वे असत्कर्म हो जाते हैं, बाँधनेवाले हो जाते हैं। उनसे यदि ब्रह्मलोककी प्राप्ति भी हो जाय तो वहाँसे लौटकर आना पड़ता है—‘आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन।’ (गीता ८।१६)
भगवान् के लिये कर्म करनेवाले सदाचारी पुरुषका कभी नाश नहीं होता—
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥
(गीता ६।४०)
‘हे पार्थ! उस पुरुषका न तो इस लोकमें नाश होता है और न परलोकमें ही। क्योंकि हे प्यारे! कल्याणकारी (भगवत्प्राप्तिके लिये) कर्म करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता।’
(४) ‘यज्ञे तपसि दाने च स्थिति: सदिति चोच्यते’— (गीता १७।२७)। ‘यज्ञ, तप और दानमें जो स्थिति है, वह भी ‘सत्’—कही जाती है।’ सदाचारमें यज्ञ, दान और तप—ये तीनों प्रधान हैं; किंतु इनका सम्बन्ध भगवान् से होना चाहिये। यदि इन (यज्ञादि) में मनुष्यकी दृढ़ स्थिति (निष्ठा) हो जाय तो स्वप्नमें भी उसके द्वारा दुराचार नहीं हो सकता। ऐसे दृढ़निश्चयी सदाचारी पुरुषके विषयमें ही कहा गया है—
निष्पीडितोऽपि मधु ह्युद्गमतीक्षुदण्ड:।
‘ईखको पेरनेपर भी उसमेंसे मीठा रस ही प्राप्त होता है।’
(५) ‘कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते’— (गीता १७।२७) ‘उस परमात्माके लिये किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत् —ऐसे कहा जाता है।’ अपना कल्याण चाहनेवाला निषिद्ध आचरण कर ही नहीं सकता। जबतक अपने जाननेमें आनेवाले दुर्गुण-दुराचारका त्याग नहीं करता, तबतक वह चाहे कितनी ज्ञान-ध्यानकी ऊँची-ऊँची बातें बनाता रहे, उसे सत्-तत्त्वका अनुभव नहीं हो सकता। निषिद्ध और विहित कर्मोंके त्याग-ग्रहणके विषयमें भगवान् कहते हैं—
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
(गीता १६।२४)
‘इससे तेरे लिये इस कर्तव्य और अकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर शास्त्रविधिसे नियत कर्म ही करनेयोग्य है।’ विहित कर्म करनेकी अपेक्षा निषिद्धका त्याग श्रेष्ठ है। निषिद्ध आचरणके त्यागके बाद जो भी क्रियाएँ होंगी, वे सब भगवदर्थ होनेपर सत्-आचार (सदाचार) ही कहलायेंगी। भगवदर्थ कर्म करनेवालोंसे एक बड़ी भूल यह होती है कि वे कर्मोंके दो विभाग कर लेते हैं। (१)संसार और शरीरके लिये किये जानेवाले कर्म अपने लिये और (२) पूजा-पाठ, जप-ध्यान, सत्सङ्गादि सात्त्विक कर्म भगवान् के लिये मानते हैं; वास्तवमें जैसे पतिव्रता स्त्री घरका काम, शरीरकी क्रिया, पूजा-पाठादि सब कुछ पतिके लिये ही करती है, वैसे ही साधकको भी सब कुछ केवल भगवदर्थ करना चाहिये। भगवदर्थ कर्म सुगमतापूर्वक करनेके लिये पाँच बातें (पञ्चामृत) सदैव याद रखनी चाहिये—(१) मैं भगवान् का हूँ, (२) भगवान् के घर (दरबार) में रहता हूँ, (३) भगवान् के घरका काम करता हूँ, (४) भगवान् का दिया हुआ प्रसाद पाता हूँ और (५) भगवान् के जनों (परिवार) की सेवा करता हूँ। इस प्रकार शास्त्र-विहित कर्म करनेपर सदाचार स्वत: पुष्ट होगा। श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान् आज्ञा देते हैं—
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥
(९।२७)
‘हे अर्जुन! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो यज्ञ करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर।’ यहाँ यज्ञ, दान और तपके अतिरिक्त ‘यत्करोषि’ और ‘यदश्नासि’—ये दो क्रियाएँ और आयी हैं। तात्पर्य यह है कि यज्ञ, दान और तपके अतिरिक्त हम जो कुछ भी शास्त्र-विहित कर्म करते हैं और शरीर-निर्वाहके लिये खाना, पीना, सोना आदि जो भी क्रियाएँ करते हैं, वे सब भगवान् के अर्पण करनेसे ‘सत्’ हो जाती हैं। साधारण-से-साधारण स्वाभाविक-व्यावहारिक कर्म भी यदि भगवान् के लिये किया जाय तो वह भी ‘सत्’ हो जाता है। भगवान् कहते हैं—
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥
(गीता १८।४६)
‘अपने स्वाभाविक कर्मोंके द्वारा उस परमात्माकी पूजा करके मनुष्य परम सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।’ जैसे, एक व्यक्ति प्राणियोंकी साधारण सेवा केवल भगवान् के लिये ही करता है और दूसरा व्यक्ति केवल भगवान् के लिये ही जप करता है। यद्यपि स्वरूपसे दो प्रकारकी छोटी-बड़ी क्रियाएँ दीखती हैं, परंतु दोनों (साधकों) का उद्देश्य परमात्मा होनेसे वस्तुत: उनमें किंचिन्मात्र भी अन्तर नहीं है; क्योंकि परमात्मा सर्वत्र समानरूपसे परिपूर्ण हैं। वे जैसे जप-क्रियामें हैं, वैसे ही साधारण सेवा-क्रियामें भी हैं।
भगवान् ‘सत्’ स्वरूप हैं। अत: उनसे जिस किसीका भी सम्बन्ध होगा, वह सब ‘सत्’ हो जायगा। जिस प्रकार अग्निसे सम्बन्ध होनेपर लोहा, लकड़ी, ईंट, पत्थर, कोयला—ये सभी एक-से चमकने लगते हैं, वैसे ही भगवान् के लिये (भगवत्प्राप्तिके उद्देश्यसे) किये गये छोटे-बड़े सब-के-सब कर्म ‘सत्’ हो जाते हैं, अर्थात् सदाचार बन जाते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीतामें सदाचार-सूत्र* यही बतलाया गया है कि यदि मनुष्यका लक्ष्य (उद्देश्य) केवल सत् (परमात्मा) हो जाय तो उसके समस्त कर्म भी ‘सत्’ अर्थात् सदाचार-स्वरूप ही हो जायँगे। अतएव सत् स्वरूप एवं सर्वत्र परिपूर्ण सच्चिदानन्दघन परमात्माकी ओर ही अपनी वृत्ति रखनी चाहिये, फिर सद्गुण, सदाचार स्वत: प्रकट होने लगेंगे।