गृहस्थमें कैसे रहें?
रुद्रो मुण्डधरो भुजङ्गसहितो गौरी तु सद्भूषणा
स्कन्द: शम्भुसुत: षडाननयुतस्तुण्डी च लम्बोदर:।
सिंहक्रेलिममूषकं च वृषभस्तेषां निजं वाहन-
मित्थं शम्भुगृहे विभिन्नमतिषु चैक्यं सदा वर्तते॥
भगवान् शंकर मुण्डमाला एवं सर्प धारण किये हुए रहते हैं और पार्वती सुन्दर-सुन्दर आभूषण धारण किये हुए रहती हैं। शंकरके पुत्र कार्तिकेय छ: मुखवाले तथा गणेश लम्बी सूँड़ और बड़े पेटवाले हैं। भगवान् शंकर आदिके अपने-अपने वाहन—बैल, सिंह, मोर और मूषक भी आपसमें एक-एकका भक्षण करनेवाले हैं। ऐसा होनेपर भी भगवान् शंकरके विभिन्न (परस्परविरुद्ध) स्वभाववाले परिवारमें सदा एकता रहती है। [इसी प्रकार गृहस्थमें विभिन्न स्वभाववालोंके साथ अपने अभिमान और सुखभोगका त्याग करके दूसरोंके हित और सुखका भाव रखते हुए आपसमें प्रेमपूर्वक एकता रहनी चाहिये।]
गृहस्थ-धर्म
सानन्दं सदनं सुताश्च सुधिय: कान्ता न दुर्भाषिणी
सन्मित्रं सुधनं स्वयोषिति रतिश्चाज्ञापरा: सेवका:।
आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मृष्टान्नपानं गृहे
साधो: सङ्गमुपासते हि सततं धन्यो गृहस्थाश्रम:॥
‘घरमें सब सुखी हैं, पुत्र बुद्धिमान् हैं, पत्नी मधुरभाषिणी है, अच्छे मित्र हैं, अपनी पत्नीका ही संग है, नौकर आज्ञापरायण हैं, प्रतिदिन अतिथि-सत्कार एवं भगवान् शंकरका पूजन होता है, पवित्र एवं सुन्दर खान-पान है और नित्य ही सन्तोंका संग किया जाता है—ऐसा जो गृहस्थाश्रम है, वह धन्य है!’
प्रश्न—विवाह क्यों करें? क्या विवाह करना आवश्यक है?
उत्तर—हमारे यहाँ दो तरहके ब्रह्मचारी होते हैं—नैष्ठिक और उपकुर्वाण। जो आजीवन ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, वे ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ कहलाते हैं और जो विचारके द्वारा भोगेच्छाको नहीं मिटा पाते और केवल भोगेच्छाको मिटानेके लिये ही विवाह करते हैं, वे ‘उपकुर्वाण ब्रह्मचारी’ कहलाते हैं। तात्पर्य है कि जो विचारके द्वारा भोगेच्छाको न मिटा सके, वह विवाह करके देख ले, जिससे यह अनुभव हो जाय कि यह भोगेच्छा भोग भोगनेसे मिटनेवाली नहीं है। इसलिये गृहस्थके बाद वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रममें जानेका विधान किया गया है। सदा गृहस्थमें ही रहकर भोग भोगना मनुष्यता नहीं है।
जिसके मनमें भोगेच्छा है अथवा जो वंश-परम्परा चलाना चाहता है और (वंश-परम्परा चलानेके लिये) उसका कोई भाई नहीं है, उसको केवल भोगेच्छा मिटानेके उद्देश्यसे अथवा वंश-परम्परा चलानेके लिये विवाह कर लेना चाहिये। अगर उपर्युक्त दोनों इच्छाएँ न हों तो विवाह करनेकी जरूरत नहीं है। शास्त्रोंमें निवृत्तिको सर्वश्रेष्ठ बताया गया है—‘निवृत्तिस्तु महाफला।’
प्रश्न—कलियुगमें तो संन्यास लेना मना किया गया है, अत: मनुष्य निवृत्ति कैसे करे?
उत्तर—कलियुगमें संन्यास लेना इसलिये मना किया गया है कि कलियुगमें संन्यास-धर्मका पालन करनेमें बहुत कठिनता पड़ती है, जिससे मनुष्य ठीक तरहसे संन्यास-धर्मको निभा नहीं सकता। अत: जैसे सरकारी कर्मचारी नौकरीसे रिटायर होते हैं, ऐसे ही मनुष्यको घरसे रिटायर हो जाना चाहिये और बेटों-पोतोंको काम-धंधा सौंपकर घरमें रहते हुए ही भजन-स्मरण करना चाहिये। यदि बेटे चाहते हों तो घरसे केवल भोजन, वस्त्र आदि निर्वाहमात्रका सम्बन्ध रखना चाहिये। यदि बेटे न चाहें तो निर्वाहमात्रका सम्बन्ध भी छोड़ देना चाहिये। निर्वाह कैसे होगा, इसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि—
प्रारब्ध पहले रचा, पीछे रचा सरीर।
तुलसी चिन्ता क्यों करे, भज ले श्रीरघुबीर॥
प्रश्न—गृहस्थका खास धर्म क्या है?
उत्तर—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास—इन चारों आश्रमोंकी सेवा करना गृहस्थका खास धर्म है; क्योंकि गृहस्थ ही सबका माँ-बाप है, पालक है, संरक्षक है अर्थात् गृहस्थसे ही ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी उत्पन्न होते हैं और पालित एवं संरक्षित होते हैं। अत: चारों आश्रमोंका पालन-पोषण करना गृहस्थका खास धर्म है।
अतिथि-सत्कार करना; गाय-भैंस, भेड़-बकरी आदिको सुख-सुविधा देना; घरमें रहनेवाले चूहे आदिको भी अपने घरका सदस्य मानना; उन सबका पालन-पोषण करना गृहस्थका खास धर्म है। ऐसे ही देवता, ऋषि-मुनिकी सेवा करना, पितरोंको पिण्ड-पानी देना, भगवान् की विशेषतासे सेवा (भजन-स्मरण) करना गृहस्थका खास धर्म है।
प्रश्न—गृहस्थाश्रममें कैसे रहना चाहिये?
उत्तर—यह मनुष्य-शरीर और इसमें भी गृहस्थ-आश्रम उद्धार करनेकी पाठशाला है। भोग भोगने और आराम करनेके लिये यह मनुष्य-शरीर नहीं है। ‘एहि तन कर फल बिषय न भाई’ (मानस, उत्तर० ४४।१)। शास्त्रविहित यज्ञ आदि कर्म करके ब्रह्मलोक आदि लोकोंकी प्राप्ति करना भी खास बात नहीं है; क्योंकि वहाँ जाकर फिर पीछे लौटकर आना ही पड़ता है—‘आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिन:’ (गीता ८।१६)। अत: प्राणिमात्रके हितकी भावना रखते हुए गृहस्थ-आश्रममें रहना चाहिये और अपनी शक्तिके अनुसार तन, मन, बुद्धि, योग्यता, अधिकार आदिके द्वारा दूसरोंको सुख पहुँचाना चाहिये। दूसरोंकी सुख-सुविधाके लिये अपने सुख-आरामका त्याग करना ही मनुष्यकी मनुष्यता है।
प्रश्न—गृहस्थमें काम-धंधा करते हुए जो हिंसा होती है, उससे छुटकारा कैसे हो?
उत्तर—गृहस्थमें रोज ये पाँच हिंसाएँ होती हैं— (१) जहाँ रसोई बनती है, वहाँ आगमें चींटी आदि छोटे-छोटे जीव मरते हैं, लकड़ियोंमें रहनेवाले जीव मरते हैं, आदि। (२) जहाँ जल रखते हैं, वहाँ घड़ा इधर-उधर करने आदिसे भी जीव मरते हैं। (३) झाड़ू लगाते समय बहुत-से जीव मरते हैं। (४) चक्कीमें अनाज पीसते समय भी बहुत-से जीव पीसे जाते हैं। (५) ऊखलमें चावल आदि कूटते समय भी जीव मरते हैं। इन हिंसाओंसे छूटनेके लिये गृहस्थको प्रतिदिन बलिवैश्वदेव, पञ्चमहायज्ञ करना चाहिये। जो सर्वथा भगवान् के ही शरण हो जाता है, उसको यह हिंसा नहीं लगती। वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है।
प्रश्न—हम चक्की नहीं चलाते, धान नहीं कूटते तो हमें हिंसा नहीं लगेगी?
उत्तर—आप पीसा हुआ आटा, कूटा हुआ धान अपने काममें लेते हैं तो उस आटेको पीसनेमें, धानको कूटनेमें जो हिंसा हुई है, वह आपको लगेगी ही।
प्रश्न—खेतीमें अनेक जीवोंकी हिंसा होती है, तो क्या किसान खेती न करे?
उत्तर—खेती जरूर करे, पर खयाल रखे कि हिंसा न हो। किसानके लिये खेती करनेका विधान होनेसे उसको पाप कम लगता है, अत: उसको पापसे डरकर अपने कर्तव्यका त्याग नहीं करना चाहिये। हाँ, जहाँतक बने, हिंसा न हो, ऐसी सावधानी अवश्य रखनी चाहिये।
प्रश्न—आजकल किसानलोग फसलकी सुरक्षाके लिये जहरीली दवाएँ छिड़कते हैं तो क्या यह ठीक है?
उत्तर—किसानको यह काम कभी नहीं करना चाहिये। पहले लोग ऐसी हिंसा नहीं करते थे तो अनाज सस्ता मिलता था। आजकल हिंसा करते हैं तो अनाज महँगा मिलता है। दीखनेमें तो ऐसा दीखता है कि जीवोंको मार देनेसे अनाज अधिक होता है, पर इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।
प्रश्न—शास्त्रोंमें गृहस्थपर पाँच ऋण बताये गये हैं— पितृऋण, देवऋण, ऋषिऋण, भूतऋण और मनुष्य-ऋण। इनमेंसे पितृऋण क्या है और उससे छूटनेका उपाय क्या है?
उत्तर—माता-पिता, दादा-दादी, परदादा-परदादी, नाना-नानी, परनाना-परनानी आदिके मरनेपर जो कार्य किये जाते हैं, वे सब ‘प्रेतकार्य’ हैं और परम्परासे श्राद्ध-तर्पण करना, पिण्ड-पानी देना आदि जो कार्य पितरोंके उद्देश्यसे किये जाते हैं, वे सब ‘पितृकार्य’ हैं। मरनेके बाद प्राणी देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी, भूत-प्रेत, वृक्ष-लता आदि किसी भी योनिमें चला जाय तो उसकी ‘पितर’ संज्ञा होती है।
माता-पिताके रज-वीर्यसे शरीर बनता है। माताके दूधसे और पिताके कमाये हुए अन्नसे शरीरका पालन-पोषण होता है। पिताके धनसे शिक्षा एवं योग्यता प्राप्त होती है। माता-पिताके उद्योगसे विवाह होता है। इस तरह पुत्रपर माता-पिताका, माता-पितापर दादा-दादीका और दादा-दादीपर परदादा-परदादीका ऋण रहता है। परम्परासे रहनेवाले इस पितृऋणसे मुक्त होनेके लिये, पितरोंकी सद्गतिके लिये उनके नामसे पिण्ड-पानी देना चाहिये। श्राद्ध-तर्पण करना चाहिये।
पुत्र जन्मभर माता-पिता आदिके नामसे पिण्ड-पानी देता है, पर आगे पिण्ड-पानी देनेके लिये सन्तान उत्पन्न नहीं करता तो वह पितृऋणसे मुक्त नहीं होता अर्थात् उसपर पितरोंका ऋण रहता है। परन्तु सन्तान उत्पन्न होनेपर उसपर पितृऋण नहीं रहता, प्रत्युत वह पितृऋण सन्तानपर आ जाता है। पितर पिण्ड-पानी चाहते हैं; अत: पिण्ड-पानी मिलनेसे वे सुखी रहते हैं और न मिलनेसे वे दु:खी हो जाते हैं। पुत्रकी सन्तान न होनेसे भी वे दु:खी हो जाते हैं कि आगे हमें पिण्ड-पानी कौन देगा!
प्रश्न—क्या पितरोंके नामसे दिया हुआ उनको मिल जाता है?
उत्तर—पितरोंके नामसे जो कुछ दिया जाय, वह सब उनको मिल जाता है। वे चाहे किसी भी योनिमें क्यों न हों, उनके नामसे दिया हुआ पिण्ड-पानी उनको उसी योनिके अनुसार खाद्य या पेय पदार्थके रूपमें मिल जाता है। जैसे, पितर पशुयोनिमें हों तो उनके नामसे दिया हुआ अन्न उनको घास बनकर मिल जायगा और देवयोनिमें हों तो अमृत बनकर मिल जायगा। तात्पर्य है कि जैसी वस्तुसे उनका निर्वाह होता हो, वैसी वस्तु उनको मिल जाती है। जैसे हम यहाँसे अमेरिकामें किसीको मनीआर्डरके द्वारा रुपये भेजें तो वे वहाँ डालर बनकर उसको मिल जाते हैं, ऐसे ही हम पितरोंके नामसे पिण्ड-पानी देते हैं, दान-पुण्य करते हैं, तो वह जिस योनिमें पितर हैं, उसी योनिके अनुसार खाद्य या पेय पदार्थके रूपमें पितरोंको मिल जाता है।
आज हमें बड़े आदरसे जो रोटी-कपड़ा आदि मिलता है, वह हमारे पूर्वकृत पुण्योंका फल भी हो सकता है और हमारे पूर्वजन्मके पुत्र-पौत्रादिकोंके द्वारा किये हुए श्राद्ध-तर्पणका फल भी हो सकता है, पर है यह हमारा प्रारब्ध ही।
जैसे किसीने बैंकमें एक लाख रुपये जमा किये। उनमेंसे उसने कुछ अपने नामसे, कुछ पत्नीके नामसे और कुछ पुत्रके नामसे जमा किये, तो वह अपने नामसे जमा किये हुए पैसे ही निकाल सकता है, अपनी पत्नी और पुत्रके नामसे जमा किये हुए पैसे नहीं। वे पैसे तो उसकी पत्नी और पुत्रको ही मिलेंगे। ऐसे ही पितरोंके नामसे जो पिण्ड-पानी दिया जाता है, वह पितरोंको ही मिलता है, हमें नहीं। हाँ, हम जीते-जी गयामें जाकर अपने नामसे पिण्ड-पानी देंगे तो मरनेके बाद वह हमें ही मिल जायगा। गयामें तो पशु-पक्षीके नामसे दिया हुआ पिण्ड-पानी भी उनको मिल जाता है। एक सज्जनका अपनी गायपर बड़ा स्नेह था। वह गाय मर गयी तो वह उसको स्वप्नमें बहुत दु:खी दिखायी दी। उसने गयामें जाकर उस गायके नामसे पिण्ड-पानी दिया। फिर वह गाय स्वप्नमें दिखायी दी तो वह बहुत प्रसन्न थी।
जैसे हमारे पास एक तो अपना कमाया हुआ धन है और एक पिता, दादा, परदादाका कमाया हुआ धन है तो अपने कमाये हुए धनपर ही हमारा अधिकार है; पिता, दादा आदिके कमाये हुए धनपर हमारा उतना अधिकार नहीं है। वंशपरम्पराके अनुसार पिता, दादा आदिके धनपर हमारे पुत्र-पौत्रोंका अधिकार है। ऐसे ही पितरोंको वंश-परम्पराके अनुसार पुत्र-पौत्रोंका दिया हुआ पिण्ड-पानी मिलता है। अत: पुत्र-पौत्रोंपर पिता, दादा आदिके पिण्ड-पानी देनेका दायित्व है।
एक पितृलोक भी है, पर मरनेके बाद सब पितृलोकमें ही जाते हों—यह कोई नियम नहीं है। कारण कि अपने-अपने कर्मोंके अनुसार ही सबकी गति होती है।
प्रश्न—यदि किसीके माता-पिता (पितर) मुक्त हो गये हैं, भगवद्धाममें चले गये हैं तो उनके नामसे दिये हुए पिण्ड-पानीका क्या होगा?
उत्तर—पुत्रको तो यह पता नहीं रहता कि मेरे माता-पिता मुक्त हो गये, भगवद्धाममें चले गये; पर वह उनके नामसे आदरपूर्वक जो पिण्ड-पानी देता है, दान-पुण्य करता है, वह सब उसके नामपर जमा हो जाता है और मरनेके बाद उसीको मिल जाता है। जैसे, हम किसीके नामसे बम्बई पैसे भेजते हैं, पर वह व्यक्ति वहाँ नहीं है तो वे पैसे वापिस हमें ही मिल जाते हैं।
प्रश्न—क्या सन्तान उत्पन्न किये बिना भी मनुष्य पितृऋणसे छूट सकता है?
उत्तर—हाँ, छूट सकता है। जो भगवान् के सर्वथा शरण हो जाता है, उसपर कोई भी ऋण नहीं रहता—
देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां न किङ्करो नायमृणी च राजन्।
सर्वात्मना य: शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्॥
(श्रीमद्भा० ११।५।४१)
‘राजन्! जो सारे कार्योंको छोड़कर सम्पूर्णरूपसे शरणागतवत्सल भगवान् की शरणमें आ जाता है, वह देव, ऋषि, प्राणी, कुटुम्बीजन और पितृगण इनमेंसे किसीका भी ऋणी और सेवक (गुलाम) नहीं रहता।’
प्रश्न—देवऋण क्या है और उससे छूटनेका उपाय क्या है?
उत्तर—वर्षा होती है, घाम तपता है, हवा चलती है, पृथ्वी सबको धारण करती है, रात्रिमें चन्द्रमा और दिनमें सूर्य प्रकाश करता है, जिससे सबका जीवन-निर्वाह चलता है—यह सब हमपर देवऋण है। हवन, यज्ञ करनेसे देवताओंकी पुष्टि होती है और हम देवऋणसे मुक्त हो जाते हैं।
प्रश्न—ऋषिऋण क्या है और उससे छूटनेका उपाय क्या है?
उत्तर—ऋषि-मुनियोंने, सन्त-महात्माओंने जो ग्रन्थ बनाये हैं, स्मृतियाँ बनायी हैं, उनसे हमें प्रकाश मिलता है, शिक्षा मिलती है, कर्तव्य-अकर्तव्यका ज्ञान होता है; अत: उनका हमपर ऋण है। उनके ग्रन्थोंको पढ़नेसे, स्वाध्याय करनेसे, पठन-पाठन करनेसे, सन्ध्या-गायत्री करनेसे हम ऋषिऋणसे मुक्त हो जाते हैं।
प्रश्न—भूतऋण क्या है और उससे छूटनेका उपाय क्या है?
उत्तर—गाय-भैंस, भेड़-बकरी, ऊँट-घोड़ा आदि जितने प्राणी हैं, उनसे हम अपना काम चलाते हैं, अपना जीवन-निर्वाह करते हैं। वृक्ष-लता आदिसे फल, फूल, पत्ती, लकड़ी आदि लेते हैं। यह हमपर दूसरोंका, प्राणियोंका ऋण है। पशु-पक्षियोंको घास, अन्न आदि देनेसे, जल पिलानेसे, वृक्ष-लता आदिको खाद और जल देनेसे हम इस भूतऋणसे मुक्त हो जाते हैं।
प्रश्न—मनुष्यऋण क्या है और उससे छूटनेका उपाय क्या है?
उत्तर—बिना किसीकी सहायता लिये हमारा जीवन-निर्वाह नहीं होता। हम दूसरोंके बनाये हुए रास्तेपर चलते हैं, दूसरोंके बनाये हुए कुएँका पानी काममें लेते हैं, दूसरोंके लगाये हुए पेड़-पौधोंको काममें लेते हैं, दूसरोंके द्वारा उत्पन्न किये हुए अन्न आदि खाद्य पदार्थोंको काममें लेते हैं—यह उनका हमपर ऋण है। दूसरोंकी सुख-सुविधाके लिये कुआँ खुदवानेसे, प्याऊ लगानेसे, बगीचा लगानेसे, रास्ता बनवानेसे, धर्मशाला बनवानेसे, अन्न-क्षेत्र चलानेसे हम मनुष्यऋणसे मुक्त हो सकते हैं।
पितृऋण, देवऋण, ऋषिऋण, भूतऋण और मनुष्य-ऋण—ये पाँचों ऋण गृहस्थपर ही लागू होते हैं। जो भगवान् के सर्वथा शरण हो जाता है, वह पितर, देवता आदि किसीका भी ऋणी नहीं रहता, सभी ऋणोंसे छूट जाता है।
प्रश्न—यदि कोई सन्तान न हो तो अपने सम्बन्धियोंके अथवा अनाथ बालक-बालिकाओंको गोद लेना चाहिये या नहीं?
उत्तर—आजकलके जमानेमें गोद न लेना ही अच्छा है; क्योंकि अपना पैदा किया हुआ बेटा भी सेवा नहीं करता, आज्ञा नहीं मानता तो गोद लिया हुआ बेटा क्या निहाल करेगा! यद्यपि पिण्ड-पानी देनेके लिये गोद लेनेका विधान तो है, पर वह पिण्ड-पानी ही नहीं देगा तो उसको गोद लेना किस कामका? यदि हमारे लिये लड़केकी आवश्यकता होती तो भगवान् दे देते। हमारे लिये लड़केकी आवश्यकता नहीं है, इसलिये भगवान् ने नहीं दिया है। अत: हम गोद लेकर अपने लिये आफत क्यों पैदा करें! प्राय: ऐसा देखा गया है कि गोद लिये हुए लड़के माँ-बापको दु:ख-ही-दु:ख देते हैं, उनकी सेवा नहीं करते। अत: अनाथ बालकोंको पढ़ाना चाहिये, उनकी सेवा करनी चाहिये, उनके शरीर-निर्वाहका प्रबन्ध करना चाहिये।
प्रश्न—अगर कोई बेटा नहीं होगा तो वृद्धावस्थामें हमारी सेवा कौन करेगा?
उत्तर—जिनके बेटे हैं, क्या वे सभी अपने माँ-बापकी सेवा करते हैं? आजकलके बेटे तो माँ-बापकी धन-सम्पत्ति अपने नाम करवाना चाहते हैं और श्राद्ध-तर्पणको फालतू समझते हैं तो ऐसे बेटे क्या सेवा करेंगे? वे तो केवल दु:खदायी होते हैं। वास्तवमें प्रारब्धसे जैसी सेवा बननेवाली है, जितना सुख-आराम मिलनेवाला है, वह तो मिलेगा ही, चाहे पुत्र हो या न हो। हमने यह प्रत्यक्ष देखा है कि विरक्त सन्तोंकी जितनी सेवा होती है, उतनी सेवा गृहस्थोंके बेटे नहीं करते। तात्पर्य है कि बेटा होनेसे ही सेवा होती है, यह बात नहीं है।
प्रश्न—अगर कोई बेटा नहीं होगा तो मरनेके बाद हमें पिण्ड-पानी कौन देगा और पिण्ड-पानी न मिलनेसे हमारी गति कैसे होगी?
उत्तर—पिण्ड-पानी देनेसे पिण्ड-पानी लेनेवालोंका आगे जन्म-मरण चालू होता है। जैसे रास्तेमें चलनेवाला व्यक्ति भूख-प्यासके कारण कहीं रुक जाता है, रास्तेमें अटक जाता है और अन्न-जल मिलनेके बाद फिर अपने रास्तेपर चल पड़ता है, ऐसे ही मृतात्माओंको पिण्ड-पानी न मिलनेसे वे एक जगह अटक जाते हैं, रुक जाते हैं और पिण्ड-पानी मिलनेसे वे वहाँसे चल पड़ते हैं अर्थात् उनकी आगे गति शुरू हो जाती है, उनका जन्म-मरण चालू हो जाता है; परन्तु उनकी मुक्ति, कल्याण नहीं होता।
वास्तवमें मुक्ति होना, कल्याण होना सन्तानके अधीन किंचिन्मात्र भी नहीं है। अगर मुक्ति सन्तानके अधीन हो तो मुक्ति पराधीन ही हुई! फिर मनुष्य-जन्मकी स्वतन्त्रता कहाँ रही? कल्याणमें, मुक्तिमें जब शरीरकी आसक्ति भी बाधक है, तो फिर मरनेके बाद भी पुत्रसे पिण्ड-पानीकी आशा कल्याण कैसे होने देगी? वह तो बन्धनमें ही डालेगी। अत: जो अपना कल्याण चाहता है, उसको पुत्रैषणा (पुत्रकी इच्छा), लोकैषणा (संसारमें आदर-सत्कार, मान-बड़ाईकी इच्छा) और वित्तैषणा (धनकी इच्छा)—इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये, क्योंकि ये तीनों ही परमात्मप्राप्तिमें बाधक हैं।
जिसको सन्तानकी, पिण्ड-पानीकी इच्छा है, वह जन्म-मरणके चक्रमें पड़े रहना चाहता है; क्योंकि कहीं जन्म होगा, तभी तो वह पिण्ड-पानी चाहेगा। अगर जन्म होगा ही नहीं तो पिण्ड-पानी किसको चाहिये!
पुत्र न होनेसे कल्याण नहीं होता—यह बात बिलकुल गलत है। अगर सन्तान होनेसे कल्याण होता तो सूकरीके ग्यारह और सर्पिणीके एक सौ आठ बच्चे होते हैं, फिर उनका तो कल्याण हो ही जाना चाहिये! ऐसे ही ज्यादा बच्चेवालोंका कल्याण जल्दी होना चाहिये, पर वह होता नहीं।
सन्तान हो अथवा न हो, मनुष्यको केवल भगवान् में ही लगना चाहिये; भगवान् के परायण होकर भगवान् का भजन करना चाहिये। अगर पुत्रकी इच्छा न मिटती हो तो नि:सन्तान मनुष्यको चाहिये कि वह श्रीरामललाको, श्रीकृष्णललाको अपना पुत्र मान ले और पुत्र-भावसे उनका लाड़-प्यार करे। वह पुत्र (भगवान्) जैसी सेवा करेगा, वैसी सेवा पैदा किया हुआ पुत्र कर ही नहीं सकता! वह पुत्र तो लोक-परलोकका सब काम कर देगा।
प्रश्न—गृहस्थमें बाल-बच्चोंके भरण-पोषण, विवाह आदिको लेकर अनेक चिन्ताएँ रहती हैं, उन चिन्ताओंसे छुटकारा कैसे पाया जा सकता है?
उत्तर—प्रत्येक प्राणी अपने प्रारब्धके अनुसार ही जन्मता है। प्रारब्धमें तीन चीजें होती हैं—जन्म, आयु और भोग*। इन तीनोंमें प्राणीका ‘जन्म’ तो हो चुका है; उसकी जितनी ‘आयु’ है, उतना तो वह जीयेगा ही; और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंका आना ‘भोग’ है। वास्तवमें परिस्थिति किसीको भी सुखी-दु:खी नहीं करती, प्रत्युत मनुष्य ही अज्ञानवश परिस्थितिसे सुखी-दु:खी हो जाता है।
कन्या बड़ी हो जाय तो ऐसी परिस्थितिमें उसके विवाहको लेकर चिन्ता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि कन्या अपने प्रारब्ध (भाग्य)को लेकर ही आयी है। अत: उसको अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति उसके प्रारब्धके अनुसार ही मिलेगी। माता-पिताको तो उसके विवाहके विषयमें यह विचार करना है कि जहाँ हमारी कन्या सुखी रहे, वहीं उसको देना है। ऐसा विचार करना माता-पिताका कर्तव्य है। परन्तु हम उसको सुखी कर ही देंगे, उसको अच्छा परिवार मिल ही जायगा, यह उनके हाथकी बात नहीं है। अत: कर्तव्यका पालन तो होना चाहिये, पर चिन्ता नहीं होनी चाहिये।
एक चिन्ता होती है और एक विचार होता है। चिन्ता अज्ञान (मूर्खता) से पैदा होती है और उससे अन्त:करण मैला होता है, नया विकास नहीं होता। परन्तु विचारसे बुद्धिका विकास होता है। अत: हरेक काम कैसे करना है, किस रीतिसे करना है आदि विचार तो करना चाहिये, पर चिन्ता कभी नहीं करनी चाहिये। यदि चिन्तासे रहित होकर विचार किया जाय तो कोई-न-कोई उपाय जरूर मिल जाता है।
प्रश्न—यदि बेटे वृद्धावस्थामें सेवा न करें तो क्या करना चाहिये?
उत्तर—बेटोंसे अपनी ममता उठा लेनी चाहिये। यही मानना चाहिये कि ये हमारे बेटे नहीं हैं। कोई भी सेवा न करे तो ऐसी अवस्थामें कुटुम्बियोंसे जो सुख-सुविधा पानेकी आशा होती है, उसीसे दु:ख होता है—‘आशा हि परमं दु:खं नैराश्यं परमं सुखम्’। अत: उस आशाका ही त्याग कर देना चाहिये और असुविधामें तपकी भावना करनी चाहिये कि ‘भगवान् की बड़ी कृपासे हमें स्वत: तप करनेका अवसर मिला है। अगर परिवारवाले हमारी सेवा करने लग जाते तो हम उनकी मोह-ममतामें फँस जाते, पर भगवान् ने कृपा करके हमें फँसने नहीं दिया!’
मनुष्य मोह-ममतामें फँस जाता है—यही उसकी आध्यात्मिक उन्नतिमें बाधा है। उस बाधाको जो हटाते हैं, उनका तो उपकार ही मानना चाहिये कि ये हमें बाधारहित कर रहे हैं, हमारा कल्याण कर रहे हैं, उनकी हमपर बड़ी भारी कृपा है!
जीवनभर सेवा लेते रहनेसे वृद्धावस्थामें असमर्थताके कारण परिवारवालोंसे सेवा लेनेकी इच्छा ज्यादा हो जाती है। अत: मनुष्यको पहलेसे ही सावधान रहना चाहिये कि मैं सेवा लेनेके लिये यहाँ नहीं आया हूँ, मैं तो सबकी सेवा करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ; क्योंकि मनुष्य, देवता, ऋषि-मुनि, पितर, पशु-पक्षी, भगवान् आदि सबकी सेवा करनेके लिये ही यह मनुष्य-शरीर है। अत: किसीसे भी सुख-सुविधा नहीं चाहनी चाहिये। अगर हम पहलेसे ही किसीसे सुख-सुविधा, सेवा नहीं चाहेंगे तो वृद्धावस्थामें सेवा न होनेपर भी दु:ख नहीं होगा। हाँ, हमारे मनमें सेवा लेनेकी इच्छा न रहनेसे दूसरोंके मनमें हमारी सेवा करनेकी इच्छा जाग्रत् हो जायगी!
हरेक क्षेत्रमें त्यागकी आवश्यकता है। त्यागसे तत्काल शान्ति मिलती है। प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी प्रसन्न रहना बड़ा भारी तप है। अन्त:करणकी शुद्धि तपसे होती है, सुख-सुविधासे नहीं। सुख-सुविधा चाहनेसे अन्त:करण अशुद्ध होता है। अत: मनुष्य सुख कभी चाहे ही नहीं, प्रत्युत अपने मन-वाणी-शरीरसे दूसरोंको सुख पहुँचाये।
प्रश्न—यदि परिवारमें कोई मर जाय तो मृतात्माकी शान्तिके लिये तथा अपना शोक दूर करनेके लिये क्या करना चाहिये?
उत्तर—(१) मृतात्माके लिये विधिवत् नारायणबलि, श्राद्ध-तर्पण आदि करना चाहिये। (२) जब-जब उसकी याद आये, तब-तब उसको भगवान् के चरणोंमें देखना चाहिये। (३) उसके निमित्त गीता-पाठ, भागवत-सप्ताह, श्रीरामचरितमानसका नवाह्नपारायण, नाम-जप, कीर्तन आदि करने चाहिये। (४) उसके निमित्त गरीब बालकोंको मिठाई बाँटनी चाहिये। मिठाई मिलनेसे बालक प्रसन्न हो जाते हैं। उनकी प्रसन्नतासे मृतात्माको भी शान्ति मिलती है और खुदको भी।
सत्सङ्ग, कथा-कीर्तन, मन्दिर, तीर्थ आदिमें जानेके विषयमें शोक नहीं रखना चाहिये, प्रत्युत वहाँ जरूर जाना चाहिये। इनमें भी सत्सङ्गकी विशेष महिमा है, क्योंकि सत्सङ्गसे सब प्रकारका शोक दूर होता है।
व्यवहार
प्रश्न—परिवारके बड़े-बूढ़ोंके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये?
उत्तर—बड़ोंको सुख-आराम देना, उनकी सेवा करना, उनको बड़प्पन देना, उनका आदर करना, उनकी आज्ञाका पालन करना, उनके शासनमें रहना—यह छोटोंका कर्तव्य है। परन्तु यह खुद बड़ोंका कर्तव्य नहीं है अर्थात् हम बड़े हैं, पूजनीय हैं, आदरणीय हैं—ऐसा मानना बड़ोंका काम नहीं है। कारण कि ऐसा भाव रहनेसे दूसरोंके हृदयमें उनके प्रति आदरभाव कम होता है और आगे चलकर उनका निरादर होने लगता है। अत: बड़ोंका भाव तो सबका पालन-पोषण करनेका, कष्ट सहनेका, छोटोंको सुख-सुविधा देनेका ही होना चाहिये। छोटों और बड़ोंका इस प्रकार भाव होनेसे सम्पूर्ण परिवार एवं समाज सुखी होता है।
प्रश्न—विधवा स्त्रीके साथ सास-ससुर, माता-पिता आदिका कैसा व्यवहार होना चाहिये?
उत्तर—बहू अथवा बेटी विधवा हो जाय तो सास-ससुर, माता-पिता आदिको उसका हृदयसे आदर करना चाहिये और बाहरसे रक्षा एवं शासन करना चाहिये, जिससे वह बिगड़ न जाय। तात्पर्य है कि उसका हित चाहते हुए उसके साथ ऐसा बर्ताव करना चाहिये, जिससे वह दु:खी भी न हो और उसके आचरण भी न बिगड़ें।
बहू अथवा बेटीके विधवा होनेपर सास और माँको चाहिये कि वे अपना जीवन सादगीसे बितायें; गहने-कपड़े, भोजन आदिको भोगबुद्धिसे सेवन न करें, प्रत्युत निर्वाहमात्र करें। ऐसा करनेसे बहू और बेटीका सुधार होगा। कारण कि सास और माँ भोग भोगेंगी तो उसका असर बहू और बेटीपर अच्छा नहीं पड़ेगा। यदि सास और माँ संयम रखेंगी तो उसका असर बहू और बेटीपर भी अच्छा पड़ेगा, जिससे उनका जीवन सुधरेगा। सास और माँको यही विचार करना चाहिये कि अभी इस अवस्थामें हम संयम नहीं करेंगी तो फिर कब संयम करेंगी? संसारमें संयमी और त्यागीकी ही महिमा है, भोगी और संग्रहीकी नहीं।
प्रश्न—विधवा स्त्रीके साथ भाई और भौजाइयोंका कैसा व्यवहार होना चाहिये?
उत्तर—भाई और भौजाइयोंको विधवाका हृदयसे आदर करना चाहिये, उसका तिरस्कार नहीं करना चाहिये। उसके चरित्र और भावोंकी रक्षा करते हुए उसके साथ आदरका बर्ताव करना चाहिये। उसके हितकी दृष्टिसे उसपर शासन और प्यार—दोनों ही करना चाहिये।
प्रश्न—माता-पिताको कन्याके घरका अन्न खाना चाहिये या नहीं?
उत्तर—माता-पिताने कन्याका दान कर दिया तो वह उस घरकी मालकिन बन गयी, अब माता-पिताको उसके घरका अन्न लेनेका अधिकार नहीं है। दान की हुई वस्तुपर दाताका अधिकार नहीं रहता। हमने एक कथा सुनी है। बरसानेका एक चमार सुबह किसी कामके लिये नन्दगाँव गया। वहीं दोपहर हो गयी। कुछ खाया-पीया नहीं था। प्यास लगी थी, पर बेटीके गाँवका जल कैसे पीया जाय?* क्योंकि हमारे वृषभानुजीने यहाँ कन्या दी है—ऐसा सोचकर उसने वहाँका जल नहीं पीया और बरसानेके लिये चल दिया। चलते-चलते वह प्यासके कारण रास्तेमें गिर पड़ा। उस समय राधाजी उस चमारकी कन्याका रूप धारण करके उसके पास आयीं और बोलीं कि पिताजी! मैं आपके लिये जल लायी हूँ, पी लो। चमारने कहा कि बेटी! मैं अभी नन्दगाँवकी सीमामें हूँ; अत: मैं यहाँका पानी नहीं पी सकता। राधाजीने कहा कि पिताजी! मैं तो बरसानेका जल लायी हूँ। उसने वह जल पी लिया और कहा कि बेटी! अब तुम जाओ, मैं आता हूँ। राधाजी चली गयीं। चमार अपने घर पहुँचा तो उसने अपनी बेटीको गोदमें लेकर कहा कि बेटी! तुमने जल पिलाकर मेरे प्राण बचा लिये! अगर तुम जल लेकर नहीं आती तो मेरे प्राण चले जाते। कन्याने कहा कि पिताजी! मैं तो जल लेकर आयी ही नहीं थी! तब चमार समझ गया कि राधाजी ही मेरी कन्याका रूप धारण करके जल पिलाने आयी थीं। तात्पर्य है कि पहले लोग अपनी बेटीके गाँवका भी अन्न-जल नहीं लेते थे।
जबतक कन्याकी सन्तान न हो जाय, तबतक उसके घरका अन्न-जल नहीं लेना चाहिये। परंतु कन्याकी सन्तान होनेपर माता-पिता कन्याके यहाँका अन्न-जल ले सकते हैं। कारण कि दामादने केवल पितृऋणसे मुक्त होनेके लिये ही दूसरेकी कन्या स्वीकार की है। उससे सन्तान होनेपर दामाद पितृऋणसे मुक्त हो जाता है; अत: कन्यापर माँ-बापका अधिकार हो जाता है, तभी तो दौहित्र अपने नाना-नानीका श्राद्ध-तर्पण करता है, उनको पिण्ड-पानी देता है और परलोकमें नाना-नानी अपने दौहित्रके द्वारा किया हुआ श्राद्ध-तर्पण, पिण्ड-पानी स्वीकार भी करते हैं। यदि कन्याकी सन्तान पुत्री हो, पुत्र न हो, तो भी उसके घरका अन्न-जल ले सकते हैं; क्योंकि सन्तान होनेसे कन्यादान सफल हो जाता है।
प्रश्न—माता-पिता और पुत्र-पुत्रीका आपसमें कैसा व्यवहार होना चाहिये?
उत्तर—माता-पिताका यही भाव होना चाहिये कि पुत्र-पुत्रीने हमारे घर जन्म लिया है; अत: हमें इनके लोक-परलोकका सुधार करना है। हमें केवल अपना सुख-आराम नहीं देखना है, प्रत्युत ‘इनका सुधार कैसे हो’ इस भावसे पुत्र-पुत्रीपर शासन करना है, उनको अच्छी शिक्षा देनी है और समयपर ताड़ना भी करनी पड़े तो वह भी उनके हितके लिये ही करनी है।
पुत्र-पुत्रीका यही भाव होना चाहिये कि जिस शरीरसे हम परमात्माकी प्राप्ति कर सकते हैं, महान् आनन्दकी प्राप्ति कर सकते हैं, वह शरीर हमें माँ-बापसे मिला है; अत: हमारे द्वारा इनको कभी दु:ख न हो। हमारे कारण इनका अपयश न हो। हमारे ऐसे आचरण हों, जिनसे लोगोंमें इनका आदर-सम्मान बढ़े। हम तीर्थ, व्रत आदि जो कुछ शुभ कर्म करें, उनका फल (पुण्य) माता-पिताको ही मिले। ऐसे भावसे आपसमें प्रेम बढ़ेगा, वर्तमानमें परिवार सुखी होगा और भविष्यमें सबका कल्याण होगा।
प्रश्न—पति और पत्नीका आपसमें कैसा व्यवहार होना चाहिये?
उत्तर—पतिका यही भाव रहना चाहिये कि यह अपने माता-पिता, भाई आदि सबको छोड़कर मेरे पास आयी है तो इसने कितना बड़ा त्याग किया है! अत: इसको किसी तरहका कष्ट न हो, शरीर-निर्वाहके लिये इसको रोटी, कपड़े, स्थान आदिकी कमी न हो, मेरी अपेक्षा इसको ज्यादा सुख मिले। ऐसा भाव रखनेके साथ-साथ उसके पातिव्रत-धर्मका भी खयाल रखना चाहिये, जिससे वह उच्छृङ्खल न बने और उसका कल्याण हो जाय।
पत्नीका यही भाव रहना चाहिये कि मैं अपने गोत्र और सब कुटुम्बियों आदिका त्याग करके इनके पास आयी हूँ तो समुद्र लाँघकर अब किनारे आकर मैं डूब न जाऊँ अर्थात् मैं इतना त्याग करके आयी हूँ तो अब मेरे कारण इनको दु:ख न हो, इनका अपमान, निन्दा, तिरस्कार न हो। अगर मेरे कारण इनकी निन्दा आदि होगी तो बड़ी अनुचित बात हो जायगी। मैं चाहे कितना ही कष्ट पा लूँ, पर इनको किञ्चिन्मात्र भी कष्ट न हो। इस तरह वह अपने सुख-आरामका त्याग करके पतिके सुख-आरामका खयाल रखे; उनका लोक-परलोक कैसे सुधरे—इसका खयाल रखे।
प्रश्न—सास और बहूका आपसमें कैसा व्यवहार होना चाहिये?
उत्तर—सासका तो यही भाव होना चाहिये कि यह अपनी माँको छोड़कर हमारे घरपर आयी है और मेरे ही बेटेका अंग है, अत: मेरा कोई व्यवहार ऐसा नहीं होना चाहिये, जिसके कारण इसको अपनी माँ याद आये।
बहूका यही भाव होना चाहिये कि मेरा जो सुहाग है, उसकी यह खास जननी है। जो मेरा सर्वस्व है, वह इसी वृक्षका फल है। अत: इनका आदर होना चाहिये, प्रतिष्ठा होनी चाहिये। कष्ट मैं भोगूँ और सुख इनको मिले। ये मेरे साथ चाहे जैसा कड़वा बर्ताव करें, वह मेरे हितके लिये ही है। यह प्रत्यक्ष देखनेमें आता है कि मेरे बीमार होनेपर मेरी सास जितनी सेवा करती है, उतनी सेवा दूसरा कोई नहीं कर सकता। वास्तवमें मेरे साथ हितैषितापूर्वक जैसा सासका व्यवहार है, वैसा व्यवहार और किसीका दीखता नहीं और सम्भव भी नहीं! इन्होंने मेरेको बहूरानी कहा है और अपना उत्तराधिकार मेरेको ही दिया है। ऐसा अधिकार दूसरा कौन दे सकता है! इनका बदला मैं कई जन्मोंमें भी नहीं उतार सकती। अत: मेरे द्वारा इनको किंचिन्मात्र भी किसी प्रकारका कष्ट न हो। इसी तरह अपने भाई-बहनोंसे भी जेठ-जेठानी, देवर-देवरानीका आदर ज्यादा करना है। जेठ-जेठानी माता-पिताकी तरह और देवर-देवरानी पुत्र-पुत्रीकी तरह हैं। अत: यही भाव रखना चाहिये कि इनको सुख कैसे हो! मैं केवल सेवा करनेके लिये ही इनके घरमें आयी हूँ; अत: मेरी छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी क्रिया केवल इनके हितके लिये, सुख-आरामके लिये ही होनी चाहिये। मेरे साथ इनका कैसा व्यवहार है—इस तरफ मुझे खयाल करना ही नहीं है; क्योंकि इनके कड़वे व्यवहारमें भी मेरा हित ही है।
प्रश्न—भौजाई और देवरका आपसमें कैसा व्यवहार होना चाहिये?
उत्तर—भौजाई सीताजीकी तरह और देवर भरतकी तरह व्यवहार करे। सीताजी भरतको पुत्रकी तरह समझती थीं। कैकयीने बिना कारण रामजीको वनमें भेज दिया, पर सीताजीने कभी भी भरतपर दोषारोपण नहीं किया, भरतका निरादर नहीं किया, प्रत्युत चित्रकूटमें जब भरतजीने सीताजीकी चरण-रजको अपने सिरपर चढ़ाया, तब सीताजीने उन्हें आशीर्वाद दिया! ऐसे ही भौजाईको चाहिये कि देवर कितना ही निरादर, अपमान करे, पर वह अपना मातृभाव, हितैषीभाव कभी न छोड़े और देवरको चाहिये कि भौजाईका माँकी तरह आदर करे। यद्यपि सीताजी अवस्थामें उतनी बड़ी नहीं थीं, फिर भी भरत, लक्ष्मण आदिका सीताजीमें मातृभाव था।
प्रश्न—बहनोई और सालेका आपसमें कैसा व्यवहार होना चाहिये?
उत्तर—बहनोईका यह भाव होना चाहिये कि जैसे मेरेको मेरी स्त्री प्यारी लगती है, ऐसे ही मेरी स्त्रीका प्यारा भाई होनेसे साला प्यारका पात्र है। इनके घरसे समय-समयपर कुछ-न-कुछ मिलता ही रहता है; अत: लौकिक दृष्टिसे देखा जाय तो भी फायदा-ही-फायदा है। पारमार्थिक भावमें तो त्यागकी मुख्यता है ही।
सालेका यह भाव होना चाहिये कि ये मेरी बहनके ही आदरणीय अङ्ग हैं; अत: ये मेरे भी आदरके पात्र हैं। जैसे बहन और बेटीको देनेका माहात्म्य है, ऐसे ही बहनका अङ्ग होनेसे बहनोईको भी देनेका माहात्म्य है। ये प्यारके, दानके पात्र हैं; अत: हृदयसे आदर करते हुए इनको देते रहना चाहिये।
प्रश्न—भाई और बहनका आपसमें कैसा व्यवहार होना चाहिये?
उत्तर—प्राय: भाईकी तरफसे ही गलती होती है। बहनकी तरफसे कम गलती होती है। अत: भाईका यह भाव रहना चाहिये कि यह सुआसिनी है, दयाकी मूर्ति है, इसका ज्यादा आदर, प्यार करना है। ब्राह्मणको भोजन करानेका जैसा पुण्य होता है, वैसा ही पुण्य बहन-बेटीको देनेका होता है।
सरकारने पिताकी सम्पत्तिमें बहनके हिस्सेका जो कानून बनाया है, उससे भाई-बहनमें लड़ाई हो सकती है, मनमुटाव होना तो बहुत मामूली बात है। वह जब अपना हिस्सा माँगेगी, तब बहन-भाईमें प्रेम नहीं रहेगा। हिस्सा पानेके लिये जब भाई-भाईमें भी खटपट हो जाती है, तो फिर भाई-बहनमें खटपट हो जाय, इसमें कहना ही क्या है! अत: इसमें बहनोंको हमारी पुरानी रिवाज (पिताकी सम्पत्तिका हिस्सा न लेना) ही पकड़नी चाहिये, जो कि धार्मिक और शुद्ध है। धन आदि पदार्थ कोई महत्त्वकी वस्तुएँ नहीं हैं। ये तो केवल व्यवहारके लिये ही हैं। व्यवहार भी प्रेमको महत्त्व देनेसे ही अच्छा होगा, धनको महत्त्व देनेसे नहीं। धन आदि पदार्थोंका महत्त्व वर्तमानमें कलह करानेवाला और परिणाममें नरकोंमें ले जानेवाला है। इसमें मनुष्यता नहीं है। जैसे, कुत्ते आपसमें बड़े प्रेमसे खेलते हैं, पर उनका खेल तभीतक है, जबतक उनके सामने रोटी नहीं आती। रोटी सामने आते ही उनके बीच लड़ाई शुरू हो जाती है! अगर मनुष्य भी ऐसा ही करे तो फिर उसमें मनुष्यता क्या रही?
धर्मको, अपने कर्तव्यको, भगवान् और ऋषियोंकी आज्ञाको और त्यागको महत्त्व देनेसे लोक-परलोक स्वत:सिद्ध हो जाते हैं। परन्तु मान, बड़ाई, स्वार्थ आदिको महत्त्व देनेसे लोक-परलोक दोनों बिगड़ जाते हैं।
प्रश्न—गृहस्थको अतिथिके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये?
उत्तर—अतिथिका अर्थ है—जिसके आनेकी कोई तिथि, निश्चित समय न हो। अतिथि-सेवाकी मुख्यता गृहस्थ-आश्रममें ही है। दो नम्बरमें इसकी मुख्यता वानप्रस्थ-आश्रममें है। ब्रह्मचारी और संन्यासीके लिये इसकी मुख्यता नहीं है।
जब ब्रह्मचारी स्नातक बनता है अर्थात् ब्रह्मचर्य-आश्रमके नियमोंका पालन करके दूसरे आश्रममें जानेकी तैयारी करता है, तब उसको यह दीक्षान्त उपदेश दिया जाता है—‘मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव।’ (तैत्तिरीयोपनिषद्, शिक्षा० ११।२) अर्थात् माता, पिता, आचार्य और अतिथिको ईश्वर समझकर उनकी सेवा करो। गृहस्थ-आश्रममें जानेवालोंके लिये ये खास नियम हैं। अत: गृहस्थको अतिथिका यथायोग्य आदर-सत्कार करना चाहिये।
अतिथि-सेवामें आसन देना, भोजन कराना, जल पिलाना आदि बहुत-सी बातें हैं, पर मुख्य बात अन्न देना ही है। जब रसोई बन जाय, तब पहले विधिसहित बलिवैश्वदेव करे। बलिवैश्वदेव करनेका अर्थ है—विश्वमात्रको भोजन अर्पित करना। फिर भगवान् को भोग लगाये। फिर कोई अतिथि, भिक्षुक आ जाय तो उसको भोजन कराये। भिक्षुक छ: प्रकारके कहे गये हैं—
ब्रह्मचारी यतिश्चैव विद्यार्थी गुरुपोषक:।
अध्वग: क्षीणवृत्तिश्च षडेते भिक्षुका: स्मृता:॥
‘ब्रह्मचारी, साधु-संन्यासी, विद्याध्ययन करनेवाला, गुरुकी सेवा करनेवाला, मार्गमें चलनेवाला और क्षीणवृत्ति-वाला (जिसके घरमें आग लगी हो; चोर-डाकू सब कुछ ले गये हों, कोई जीविका न रही हो आदि)—ये छ: भिक्षुक कहे जाते हैं’; अत: इन छहोंको अन्न देना चाहिये।
यदि बलिवैश्वदेव करनेसे पहले ही अतिथि, भिक्षुक आ जाय तो? समय हो तो बलिवैश्वदेव कर ले, नहीं तो पहले ही भिक्षुकको अन्न दे देना चाहिये। ब्रह्मचारी और संन्यासी तो बनी हुई रसोईके मालिक हैं। इनको अन्न न देकर पहले भोजन कर ले तो पाप लगता है, जिसकी शुद्धि चान्द्रायणव्रत* करनेसे होती है। अतिथि घरपर आकर खाली हाथ लौट जाय तो वह घरके मालिकका पुण्य ले जाता है और अपने पाप दे जाता है। अत: अतिथिको अन्न जरूर देना चाहिये।
गृहस्थको भीतरसे तो अतिथिको परमात्माका स्वरूप मानना चाहिये और उसका आदर करना चाहिये, उसको अन्न-जल देना चाहिये, पर बाहरसे सावधान रहना चाहिये अर्थात् उसको घरका भेद नहीं देना चाहिये, घरको दिखाना नहीं चाहिये आदि। तात्पर्य है कि भीतरसे आदर करते हुए भी उसपर विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि आजकल अतिथिके वेशमें न जाने कौन आ जाय!
प्रश्न—गृहस्थका धर्म तो पहले संन्यासी आदिको भोजन देनेका है और संन्यासीका धर्म गृहस्थके भोजन करनेके बाद भिक्षाके लिये जानेका है, तो दोनों बातें कैसे?
उत्तर—गृहस्थको चाहिये कि रसोई बन जानेपर पहले बलिवैश्वदेव कर ले, फिर अतिथि आ जाय तो उसको यथाशक्ति भोजन दे और अतिथि न आये तो एक गाय दुहनेमें जितना समय लगता है, उतने समयतक दरवाजेके बाहर खड़े होकर अतिथिकी प्रतीक्षा करे। अतिथि न आये तो उसका हिस्सा अलग रखकर भोजन कर ले।
संन्यासी कुछ भी संग्रह नहीं करता। अत: जब उसको भूख लगे, तब वह भिक्षाके लिये गृहस्थके घरपर जाय। जब गृहस्थ भोजन कर ले और बर्तन माँजकर अलग रख ले, उस समय वह भिक्षाके लिये जाय। तात्पर्य है कि गृहस्थपर भार न पड़े, उसकी रसोई कम न पड़े। घरमें एक-दो आदमियोंकी रसोई बनी हो और भिक्षुक आ जाय तो रसोई कम पड़ेगी! हाँ, घरमें पाँच-सात आदमियोंकी रसोई बनी हो तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा; परन्तु उस घरपर भिक्षुक ज्यादा आ जायँ तो उनपर भी भार पड़ेगा। अत: गृहस्थके भोजन करनेके बाद ही संन्यासीको भिक्षाके लिये जाना चाहिये और जो बचा हो, वह लेना चाहिये। संन्यासीको चाहिये कि वह भिक्षाके लिये गृहस्थके घरपर ज्यादा न ठहरे। अगर गृहस्थ मना न करे तो एक गाय दुहनेमें जितना समय लगता है, उतने समयतक गृहस्थके घरपर ठहरे। अगर गृहस्थके मनमें देनेकी भावना न हो तो वहाँसे चल देना चाहिये, पर क्रोध नहीं करना चाहिये। ऐसे ही गृहस्थको भी क्रोध नहीं करना चाहिये।
प्रश्न—गृहस्थको अपने पड़ोसीके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये?
उत्तर—पड़ोसीको अपने परिवारका ही सदस्य मानना चाहिये। यह अपना है और यह पराया है—ऐसा भाव तुच्छ हृदयवालोंका होता है। उदार हृदयवालोंके लिये तो सम्पूर्ण पृथ्वी ही अपना कुटुम्ब है२। भगवान् के नाते सब हमारे भाई हैं। अत: खास घरके आदमियोंकी तरह ही पड़ोसीसे बर्ताव करना चाहिये। घरमें कभी मिठाई या फल आ जायँ और सामने अपने तथा पड़ोसीके बालक हों तो मिठाई आदिका वितरण करते हुए पहले पड़ोसीके बालकोंको थोड़ा ज्यादा और बढ़िया मिठाई आदि दे। उसके बाद बहन-बेटीके बालकोंको अधिक मात्रामें और बढ़िया मिठाई आदि दे। फिर कुटुम्बके तथा ताऊ आदिके बालक हों तो उनको दे। अन्तमें बची हुई मिठाई आदि अपने बालकोंको दे। इसमें कोई शंका करे कि हमारे बालकोंको कम और साधारण चीज मिले तो हम घाटेमें ही रहे? इसमें घाटा नहीं है। हम पड़ोसी या बहन-बेटीके बालकोंके साथ ऐसा बर्ताव करेंगे तो वे भी हमारे बालकोंके साथ ऐसा ही बर्ताव करेंगे, जिससे माप-तौल बराबर ही आयेगा। खास बात यह है कि ऐसा बर्ताव करनेसे आपसमें प्रेम बहुत बढ़ जायगा। प्रेमकी जो कीमत है, वह वस्तु-पदार्थोंकी नहीं है।
पड़ोसीकी कोई गाय-भैंस घरपर आ जाय तो पड़ोसीसे झगड़ा न करे और उन पशुओंको पीटे भी नहीं, प्रत्युत प्रेमपूर्वक पड़ोसीसे कह दे कि ‘भैया! तुम्हारी गाय-भैंस हमारे घरपर आ गयी है। वह फिर न आ जाय, इसका खयाल रखना।’ हम ऐसा सौम्य बर्ताव करेंगे तो हमारी गाय-भैंस पड़ोसीके यहाँ जानेपर वह भी ऐसा ही बर्ताव करेगा। यदि पड़ोसी क्रूर बर्ताव करे तो भी हमारेको उसपर क्रोध नहीं करना चाहिये, प्रत्युत इस बातकी विशेष सावधानी रखनी चाहिये कि हमारी गाय-भैंस आदिसे पड़ोसीका कोई नुकसान न हो।
हमारे घर कोई उत्सव हो, विवाह आदि हो और उसमें बढ़िया-बढ़िया मिष्ठान्न आदि बने तो उसको पड़ोसीके बालकोंको भी देना चाहिये; क्योंकि पड़ोसी होनेसे वे हमारे कुटुम्बी ही हैं। इससे भी अधिक प्रेमका बर्ताव करना हो तो जैसे अपनी बहन-बेटीके विवाहमें देते हैं, ऐसे ही पड़ोसीकी बहन-बेटीके विवाहमें भी देना चाहिये; जैसे अपने दामादके साथ बर्ताव करते हैं, ऐसे ही पड़ोसीके दामादके साथ भी बर्ताव करना चाहिये।
प्रश्न—नौकरके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये?
उत्तर—नौकरके साथ अपने बालककी तरह बर्ताव करना चाहिये। नौकर दो तरहसे रखा जाता है— (१) नौकरको तनखाह भी देते हैं और भोजन भी। (२) नौकरको केवल तनखाह देते हैं, भोजन वह अपने घरपर करता है। जो नौकर तनखाह भी लेता है और भोजन भी करता है, उसके साथ भोजनमें विषमता नहीं करनी चाहिये। प्राय: घरोंमें नौकरके लिये तीन नम्बरका, घरके सदस्योंके लिये दो नम्बरका और अपने पति-पुत्रके लिये एक नम्बरका भोजन बनाया जाता है तो यह तीन तरहका भोजन न बनाकर एक तरहका ही भोजन बनाना चाहिये। भोजन मध्यम दर्जेका बनाना चाहिये और सबको देना चाहिये। समयपर कोई भिक्षुक आ जाय तो उसको भी देना चाहिये।
जो नौकर केवल तनखाह लेता है, भोजन नहीं करता, वह जैसा उचित समझे, बनाये और खाये। परन्तु हमारे घरपर कभी विशेषतासे मिठाई आदि बने तो नौकरके बाल-बच्चोंको देनी चाहिये। विवाह आदिमें उसको कपड़े आदि देने चाहिये। उसको तनखाह तो यथोचित ही देनी चाहिये, पर समय-समयपर उसको इनाम, कपड़ा, मिठाई आदि भी देते रहना चाहिये। अधिक तनखाहका उतना असर नहीं पड़ता, जितना इनाम आदिका असर पड़ता है। नौकरको इनाम आदि देनेसे देनेवालेके हृदयमें उदारता आती है और आपसमें प्रेम बढ़ता है, जिससे वह समयपर चोर-डाकू आदिसे हमारी रक्षा भी करेगा; विवाह आदिके अवसरपर वह उत्साहसे काम करेगा।
प्रश्न—घरमें चूहे, छिपकली, मच्छर, खटमल आदि जीवोंके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये?
उत्तर—घरमें रहनेवाले चूहे आदिको भी अपने घरका सदस्य मानना चाहिये; क्योंकि वे भी अपना घर बनाकर हमारे घरमें रहते हैं। अत: उनका भी हमारे घरमें रहनेका अधिकार है। तात्पर्य है कि अपनी रक्षा करते हुए जहाँतक बने, उनका भी पालन करना चाहिये। परन्तु आजकल लोग उनको मार देते हैं, यह ठीक नहीं है। मनुष्यको अपनी रक्षा करनेका ही अधिकार है, किसीको मारनेका अधिकार नहीं है। जैसे मनुष्य पृथ्वीपर अपना घर बनाकर रहता है, ऐसे ही चूहे आदि भी अपना घर बनाकर रहते हैं; अत: उनको मारना नहीं चाहिये। घरमें साँप, बिच्छू आदि जहरीले जीव हों तो उनको युक्तिसे पकड़कर घरसे दूर सुरक्षित स्थानपर छोड़ देना चाहिये।
अपनी सफाई न रखनेसे, अशुद्धि रखनेसे ही मच्छर, खटमल आदि पैदा होते हैं। अत: घरमें पहलेसे ही स्वच्छता, निर्मलता रखनी चाहिये, जिससे वे पैदा हों ही नहीं। स्वच्छता रखते हुए भी वे पैदा हो जायँ, तो भी उनको मारनेका हमें अधिकार नहीं है।
प्रश्न—घरमें कुत्ता पालना चाहिये या नहीं?
उत्तर—घरमें कुत्ता नहीं रखना चाहिये। कुत्तेका पालन करनेवाला नरकोंमें जाता है। महाभारतमें आया है कि जब पाँचों पाण्डव और द्रौपदी वीरसंन्यास लेकर उत्तरकी ओर चले तो चलते-चलते भीमसेन आदि सभी गिर गये। अन्तमें जब युधिष्ठिर भी लड़खड़ा गये, तब इन्द्रकी आज्ञासे मातलि रथ लेकर वहाँ आया और युधिष्ठिरसे कहा कि आप इसी शरीरसे स्वर्ग पधारो। युधिष्ठिरने देखा कि एक कुत्ता उनके पास खड़ा है। उन्होंने कहा कि यह कुत्ता मेरी शरणमें आया है; अत: यह भी मेरे साथ स्वर्गमें चलेगा। इन्द्रने युधिष्ठिरसे कहा—
स्वर्गे लोके श्ववतां नास्ति धिष्ण्य-
मिष्टापूर्तं क्रोधवशा हरन्ति।
ततो विचार्य क्रियतां धर्मराज
त्यज श्वानं नात्र नृशंसमस्ति॥
(महाभारत, महाप्र० ३।१०)
‘धर्मराज! कुत्ता रखनेवालोंके लिये स्वर्गलोकमें स्थान नहीं है। उनके यज्ञ करने और कुआँ, बावड़ी आदि बनवानेका जो पुण्य होता है, उसे क्रोधवश नामक राक्षस हर लेते हैं। इसलिये सोच-विचारकर काम करो और इस कुत्तेको छोड़ दो। ऐसा करनेमें कोई निर्दयता नहीं है।’
युधिष्ठिरने कहा कि मैंने इसका पालन नहीं किया है, यह तो मेरी शरणमें आया है। मैं इसको अपना आधा पुण्य देता हूँ, इसीसे यह मेरे साथ चलेगा। युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर उस कुत्तेमेंसे धर्मराज प्रकट हो गये और बोले कि मैंने तेरी परीक्षा ली थी। तुमने मेरेपर विजय कर ली, अब चलो स्वर्ग!
तात्पर्य है कि गृहस्थको घरमें कुत्ता नहीं रखना चाहिये। महाभारतमें आया है—
भिन्नभाण्डं च खट्वां च कुक्कुटं शुनकं तथा।
अप्रशस्तानि सर्वाणि यश्च वृक्षो गृहेरुह:॥
भिन्नभाण्डे कलिं प्राहु: खट्वायां तु धनक्षय:।
कुक्कुटे शुनके चैव हविर्नाश्नन्ति देवता:।
वृक्षमूले ध्रुवं सत्त्वं तस्माद् वृक्षं न रोपयेत्॥
(महाभारत, अनु० १२७।१५-१६)
‘घरमें फूटे बर्तन, टूटी खाट, मुर्गा, कुत्ता और अश्वत्थादि वृक्षका होना अच्छा नहीं माना गया है। फूटे बर्तनमें कलियुगका वास कहा गया है। टूटी खाट रहनेसे धनकी हानि होती है। मुर्गे और कुत्तेके रहनेपर देवता उस घरमें हविष्य ग्रहण नहीं करते तथा मकानके अन्दर कोई बड़ा वृक्ष होनेपर उसकी जड़के भीतर साँप, बिच्छू आदि जन्तुओंका रहना अनिवार्य हो जाता है, इसलिये घरके भीतर पेड़ न लगाये।’
कुत्ता महान् अशुद्ध, अपवित्र होता है। उसके खान-पानसे, स्पर्शसे, उसके जगह-जगह बैठनेसे गृहस्थके खान-पानमें, रहन-सहनमें अशुद्धि, अपवित्रता आती है और अपवित्रताका फल भी अपवित्र (नरक आदि) ही होता है।
प्रश्न—खेत आदिकी रक्षाके लिये कुत्ता रखा जाय तो क्या हानि है?
उत्तर—कुत्तेको केवल खेत आदिकी रक्षाके लिये ही रखे। समय-समयपर उसको रोटी दे, पर अपनेसे उसको दूर ही रखे। उसको अपने साथ रखना, अपने साथ घुमाना, मर्यादारहित छुआछूत करना ही निषिद्ध है। तात्पर्य है कि कुत्तेका पालन करना, उसकी रक्षा करना दोष नहीं है, प्रत्युत प्राणिमात्रका पालन करना तो गृहस्थका खास कर्तव्य है। परन्तु कुत्तेके साथ घुल-मिलकर रहना, उसको साथमें रखना, उसमें आसक्ति रखना पतनका कारण है, क्योंकि अन्त समयमें यदि कुत्तेका स्मरण हो जायगा तो अगले जन्ममें कुत्ता ही बनना पड़ेगा।*
प्रश्न—घरकी छतपर या दीवारपर पीपल लग जाय तो उसको हटाना चाहिये या नहीं?
उत्तर—उसको उखाड़कर चौराहेमें या मन्दिरके सामने अथवा गलीमें अच्छी जगह लगा देना चाहिये और उसको जल देते रहना चाहिये। छत या दीवार तोड़नी पड़े तो कोई बात नहीं, उसकी फिर मरम्मत करा लेनी चाहिये, पर जहाँतक बन सके, पीपलको काटना नहीं चाहिये। पीपल, वट, पाकर, गूलर, आँवला, तुलसी आदि पवित्र वृक्षोंका विशेष आदर करना चाहिये, जो मनुष्योंको पवित्र करनेवाले हैं।
प्रश्न—गृहस्थको जीवन-निर्वाहके लिये धन कैसे कमाना चाहिये?
उत्तर—गृहस्थको शरीरसे परिश्रम करके और ‘दूसरेका हक न आ जाय’ ऐसी सावधानी रखकर धन कमाना चाहिये। जितना धन पैदा हो जाय, उसमेंसे दसवाँ, पन्द्रहवाँ अथवा बीसवाँ हिस्सा दान-पुण्यके लिये निकालना चाहिये। धन कमानेमें कुछ-न-कुछ दोष आ जाते हैं; अत: उन दोषोंके प्रायश्चित्तके लिये धन निकालना चाहिये।
प्रश्न—आजकल सरकारी कानून ऐसे हैं कि हम सच्चाईसे धन कमा नहीं सकते; अत: क्या करना चाहिये?
उत्तर—सरकारी कानूनसे बचनेका उपाय है—अपना खर्चा कम करना; स्वाद-शौकीनी, सजावट आदिमें खर्चा न करना; साधारण रीतिसे निर्वाह करना; बड़ी सादगीसे सात्त्विक जीवन बिताना। कारण कि धन कमाना हाथकी बात नहीं है। धन तो जितना मिलनेवाला है, उतना ही मिलेगा; पर खर्चा कम करना हाथकी बात है, इसमें हम स्वतन्त्र हैं।
प्रश्न—यह बात तो प्रत्यक्ष है कि हम पूरा टैक्स देते हैं तो धन चला जाता है और टैक्स पूरा नहीं देते, छिपा लेते हैं तो धन बच जाता है; अत: छिपा लेना अच्छा हुआ?
उत्तर—एक बार ऐसा दीखता है कि टैक्स न देनेसे धन बच गया, पर अन्तमें वह धन रहेगा नहीं*। बचा हुआ धन काममें भी आयेगा नहीं। परन्तु धनके लिये जो झूठ, कपट, धोखेबाजी, अन्याय आदि किये हैं, उनका दण्ड तो भोगना ही पड़ेगा और अन्यायपूर्वक कमाया हुआ धन छोड़कर मरना ही पड़ेगा। तात्पर्य है कि अन्यायपूर्वक कमाया हुआ धन चाहे डॉक्टरों, वकीलों आदिके पास चला जायगा, चाहे चोर-डाकू ले जायँगे, चाहे बैंकोंमें पड़ा रहेगा, पर आपके काममें नहीं आयेगा। अत: जो धन आपके काममें नहीं आयेगा, उसके लिये पाप, अन्याय क्यों किया जाय?
सच्चाईसे कमानेपर धन कम आयेगा, यह बात नहीं है। जो धन आनेवाला है, वह तो आयेगा ही। हाँ, किस तरह आयेगा, इसका तो पता नहीं, पर आनेवाला धन आयेगा जरूर। ऐसे कई उदाहरण देखनेमें आते हैं कि जो धनका त्याग कर देते हैं, धन लेते नहीं, उनके सामने भी धन आता है। तात्पर्य है कि जैसे घाटा, बीमारी, दु:ख आदि बिना चाहे, बिना उद्योग किये आते हैं, ऐसे ही जो धन, सुख आनेवाला है, वह भी बिना चाहे, बिना उद्योग किये ही आयेगा—
सुखमैन्द्रियकं राजन् स्वर्गे नरक एव च।
देहिनां यद् यथा दु:खं तस्मान्नेच्छेत तद् बुध:॥
(श्रीमद्भा० ११।८।१)
‘राजन्! प्राणियोंको जैसे इच्छाके बिना प्रारब्धानुसार दु:ख प्राप्त होते हैं, ऐसे ही इन्द्रियजन्य सुख स्वर्गमें और नरकमें भी प्राप्त होते हैं। अत: बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि वह उन सुखोंकी इच्छा न करे।’
बालक-सम्बन्धी बातें
प्रश्न—आदर्श सन्तान कैसे उत्पन्न हो?
उत्तर—आदर्श सन्तान तभी उत्पन्न हो सकती है, जब माता-पिताके आचरण, भाव आदर्श हों और सन्तानकी उत्पत्ति केवल पितृऋणसे मुक्त होनेके लिये ही हो, अपने सुखके लिये न हो; क्योंकि अपनी सुखासक्तिसे उत्पन्न की हुई सन्तान प्राय: कम श्रेष्ठ होती है। कुन्तीके आचरण, भाव आदर्श थे तो धर्मराज स्वयं उनकी गोदमें आये थे।
माताओंको चाहिये कि जब वे गर्भवती हो जायँ, तब वे अपनी सन्तानको श्रेष्ठ, अच्छा बनानेकी इच्छासे भगवान् की कथाएँ एवं भगवद्भक्तोंके चरित्र सुनें, उनका ही चिन्तन करें और वैसे ही चित्र देखें। इस तरह माँपर अच्छे संगका असर होनेसे श्रेष्ठ सन्तान पैदा होती है। जैसे, जब प्रह्लादजीकी माँ गर्भवती थी, तब नारदजीने गर्भस्थ बालकको लक्ष्य करके उसको भगवान् की कथा सुनायी, उपदेश दिया, जिससे राक्षसकुलमें होते हुए भी प्रह्लादजी श्रेष्ठ हुए।
सत्कर्म (सदाचार), सच्चिन्तन, सच्चर्चा और सत्सङ्ग— ये चार हैं। अच्छे कर्म करना ‘सत्कर्म’ है। दूसरेके हितका और भगवान् का चिन्तन करना ‘सच्चिन्तन’ है। आपसमें भगवान् और भक्तोंके चरित्रोंका वर्णन करना और सुनना ‘सच्चर्चा’ है। मैं भगवान् का हूँ और भगवान् ही मेरे हैं—इस तरह भगवान् के साथ अटलरूपसे स्थित रहना ‘सत्सङ्ग’ है। इन चारोंसे सन्तान आदर्श, श्रेष्ठ बन सकती है।
मनुष्य-शरीरमें ही यह स्वतन्त्रता है कि मनुष्य नया निर्माण कर सकता है, अपनी उन्नति कर सकता है, अपनेको श्रेष्ठ बना सकता है। अत: मनुष्यको चाहिये कि वह सन्त-महात्माओंका संग करे। सन्त-महात्मा न मिलें तो साधनमें तत्परतासे लगे हुए साधकोंका संग करे। ऐसे साधक भी न मिलें तो गीता, रामायण आदि सत्-शास्त्रोंका पठन-पाठन एवं मनन करे और अपने कल्याणका विचार रखे। इससे वह श्रेष्ठ पुरुष बन सकता है।
प्रश्न—माता-पिताके आचरण, भाव आदि तो बड़े अच्छे हैं, पर उनकी सन्तान अच्छी नहीं निकलती—इसका क्या कारण है?
उत्तर—इसमें खास कारण संग-दोष अर्थात् बालकको अच्छा संग न मिलना ही है। ऋणानुबन्धसे पूर्वजन्मका बदला लेनेके लिये भी ऐसी सन्तान पैदा होती है। जो पुत्र कुसङ्गसे बिगड़ता है, वह सत्सङ्गसे सुधर सकता है। परन्तु जो पूर्वजन्मका बदला लेनेके लिये आता है, वह तो दु:ख ही देनेवाला होता है। अत: अपने आचरण, भाव अच्छे होते हुए भी यदि ऐसी सन्तान पैदा हो जाय तो पूर्वका ऋणानुबन्ध समझकर प्रसन्न रहना चाहिये कि हमारा ऋण कट रहा है।
विश्रवा ब्राह्मण-कुलके थे; परन्तु उनकी पत्नी कैकसी राक्षस-कुलकी थी, जिसके कारण रावण पैदा हुआ। उग्रसेन धर्मात्मा पुरुष थे; परन्तु एक दिन एक राक्षसने उग्रसेनका रूप धारण करके उनकी पत्नीसे सहवास किया, जिससे कंस पैदा हुआ।
प्रश्न—माता-पिताके आचरण तो अच्छे नहीं हैं, पर उनकी सन्तान अच्छी निकलती है—इसका क्या कारण है?
उत्तर—प्राय: माँ-बापका स्वभाव ही सन्तानमें आता है, पर ऋणानुबन्धसे अथवा गर्भाधानके समय कोई अच्छा संस्कार पड़नेसे अथवा गर्भावस्थामें किसी सन्त-महात्माका संग मिलनेसे श्रेष्ठ सन्तान पैदा हो जाती है। जैसे, हिरण्यकशिपुके यहाँ प्रह्लादजी पैदा हुए। प्रह्लादजीके विषयमें आता है कि तपस्यामें बाधा पड़नेसे हिरण्यकशिपु स्त्रीसे मिलनेके लिये घर आया तो गर्भाधानके समय बातचीतमें उसके मुखसे कई बार ‘विष्णु’ नामका उच्चारण हुआ। जब उसकी स्त्री कयाधू गर्भवती थी, तब गर्भस्थ बच्चेको लक्ष्य करके नारदजीने उसको भक्तिकी बातें सुनायीं। इन कारणोंसे प्रह्लादजीके भीतर भक्तिके संस्कार पड़ गये। जैसे जलका रस मधुर ही होता है, पर जमीनके संगसे जलका रस बदल जाता है, अलग-अलग हो जाता है (प्रत्येक कुएँका जल अलग-अलग होता है), ऐसे ही संगके कारण मनुष्यके भाव बदल जाते हैं।
प्रश्न—पिताकी आत्मा ही पुत्रके रूपमें आती है—इसका क्या तात्पर्य है?
उत्तर—जैसे कोई किसी ब्राह्मणको अपना कुलगुरु मानता है, कोई यज्ञोपवीत देनेवालेको गुरु मानता है; परन्तु उनका शरीर न रहे तो उनके पुत्रको गुरु माना जाता है और उनका जैसा आदर-सत्कार किया जाता था, वैसा ही उनके पुत्रका आदर-सत्कार किया जाता है*। जैसे पिता धनका मालिक होता है और पिता मर जाय तो पुत्र धनका मालिक बन जाता है। ऐसे ही पुत्र उत्पन्न होता है तो वह पिताका प्रतिनिधि होता है, पिताकी जगह काम करनेवाला होता है।
यहाँ ‘आत्मा’ का अर्थ गौणात्मा है अर्थात् ‘आत्मा’ शब्द शरीरका वाचक है। शरीरसे शरीर (पुत्र) पैदा होता है; अत: व्यवहारमें पुत्र पिताका प्रतिनिधि होता है; परन्तु परमार्थ (कल्याण)-में पुत्र कोई कारण नहीं है।
प्रश्न—बालकोंको शिक्षा कैसे दी जाय, जिससे वे श्रेष्ठ बन जायँ?
उत्तर—बालक प्राय: देखकर ही सीखते हैं। इसलिये माता-पिताको चाहिये कि वे उनके सामने अपने आचरण अच्छे रखें, अपना जीवन संयमित और पवित्र रखें। ऐसा करनेसे बालक अच्छी बातें सीखेंगे और श्रेष्ठ बनेंगे।
बालकोंकी उन्नतिके लिये एक नम्बरमें तो माता-पिता अपने आचरण अच्छे रखें और दो नम्बरमें उनको अच्छी बातें सुनायें, ऊँचे दर्जेकी शिक्षा दें, भक्तोंके और भगवान् के चरित्र सुनायें। अच्छी शिक्षा वह होती है, जिससे बालक व्यवहारमें परमार्थकी कला सीख जायँ। इस विषयमें थोड़ी बातें बतायी जाती हैं।
माता-पिता कहीं बाहर जाना चाहते हैं तो वे बच्चोंसे कहते हैं कि ‘तुम यहीं रहो’। ऐसा कहनेसे बच्चे मानते नहीं, जिद करते हैं, जिससे माता-पिताको भी विक्षेप हो जाता है और बच्चे भी दु:खी हो जाते हैं तथा घरमें अशान्ति हो जाती है। अत: बच्चोंको पहलेसे ही यह कह देना चाहिये कि ‘हम कहीं जायँ तो जिद मत किया करो; जैसा हम कहें, वैसा किया करो।’ रोज दिनमें दो-तीन बार ऐसा कह देनेसे बच्चे इस बातको स्वीकार कर लेंगे। फिर कहीं जाते समय बच्चोंको कह दें कि ‘जिद नहीं करना; हम जैसा कहें, वैसा करना।’ तो वे आपकी बात मान लेंगे।
घरमें मिठाई आती है, फल आता है, अच्छा खाद्य पदार्थ आता है तो बच्चा उसको लेनेके लिये जिद करता है। अत: जिस समय खाद्य पदार्थ सामने न हो, उस समय दिनमें दो-तीन बार बच्चेसे कह देना चाहिये कि ‘कोई खानेकी चीज हो तो पहले दूसरेको देनी चाहिये, बची हुई खुद खानी चाहिये।’ फिर बढ़िया चीज सामने आनेपर वह जिद करे तो उस समय उससे कहें कि ‘देखो बेटा! जिद नहीं करना और दूसरोंको खिलाकर खाना—बाँटकर खाना, वैकुण्ठमें जाना।’ फिर वह जिद नहीं करेगा। इस तरह आप बच्चोंको जो-जो बातें सिखाना चाहते हैं, उन बातोंको दिनमें दो-तीन बार बच्चोंसे कह दिया करें और उनसे प्यारपूर्वक स्वीकार करा लिया करें।
बच्चोंको अच्छी-अच्छी बातें सिखानी चाहिये; जैसे— ‘देखो बेटा! कभी किसी चीजकी चोरी नहीं करना। माँसे माँगकर लेना, न दे तो रोकर लेना, पर चोरी नहीं करना। छोटे भाई-बहनोंसे प्यार करो। उनको खिलाओ, खेलाओ। जैसे भगवान् राम भरत आदिसे प्यार करते थे, प्यारसे समझाते थे, ऐसे ही तुम भी अपने भाई-बहनोंके साथ प्यारसे रहो, उनसे लड़ाई मत करो। आपसमें वाद-विवाद हो जाय तो उनकी बात मानो। अपनी बात मनानेकी जिद मत करो। माँ-बाप जैसा कहें, उसके अनुसार घरका काम-धंधा करो। समय फालतू मत खोओ, अच्छे काममें लगे रहो। दूसरोंका हक मत मारो। दूसरोंकी चीजको अपनी मत मानो। चीजोंको अच्छे-से-अच्छे काममें लगाओ, आदि-आदि।’ इस तरह बच्चोंको जो-जो शिक्षा देनी हो, उसको रोज दो-तीन बार बच्चोंसे कह देना चाहिये। इससे उनके भीतर इन बातोंका असर हो जायगा।
तात्पर्य है कि बालकोंको एक तो अच्छा आचरण करके दिखाना चाहिये और दूसरा, उनको अच्छी शिक्षा देनी चाहिये। इस विषयमें माता-पिताको भगवान् के इन वचनोंका मनन करना चाहिये—
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रित:।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:॥
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमा: प्रजा:॥
(गीता ३।२२—२४)
‘हे पार्थ! मुझे तीनों लोकोंमें न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई प्राप्त करनेयोग्य वस्तु अप्राप्त है, फिर भी मैं कर्तव्यकर्ममें ही लगा रहता हूँ। अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्य-कर्म न करूँ तो बड़ी हानि हो जाय; क्योंकि मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं संकरताको करनेवाला तथा इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ।’
प्रश्न—आजकल स्कूलोंका वातावरण अच्छा नहीं है; अत: बच्चोंकी शिक्षाके लिये क्या करना चाहिये?
उत्तर—बच्चेको प्रतिदिन घरमें शिक्षा देनी चाहिये। उसको ऐसी कहानियाँ सुनानी चाहिये, जिनमें यह बात आये कि जिसने माता-पिताका कहना किया, उसकी उन्नति हुई और जिसने माता-पिताका कहना नहीं किया, उसका जीवन खराब हुआ। जब बच्चा पढ़ने लग जाय, तब उसको भक्तोंके चरित्र पढ़नेके लिये देने चाहिये। बच्चेसे कहना चाहिये कि ‘बेटा! हरेक बच्चेके साथ स्वतन्त्र सम्बन्ध मत रखो, ज्यादा घुल-मिलकर बात मत करो। पढ़कर सीधे घरपर आ जाओ। बड़ोंके पास रहो। कोई चीज खानी हो तो माँसे बनवाकर खाओ, बाजारकी चीज मत खाओ; क्योंकि दूकानदारका उद्देश्य पैसा कमानेका होता है कि पैसा अधिक मिले, चीज चाहे कैसी हो। अत: वह चीजें अच्छी नहीं बनाता। बचपनमें अग्नि तेज होनेसे अभी तो बाजारकी चीजें पच जायँगी, पर उनका विकार (असर) आगे चलकर मालूम होगा।’
गृहस्थको चाहिये कि वह धन कमानेकी अपेक्षा बच्चोंके चरित्रका ज्यादा खयाल रखें; क्योंकि कमाये हुए धनको बच्चे ही काममें लेंगे। अगर बच्चे बिगड़ जायँगे तो धन उनको और ज्यादा बिगाड़ेगा! इस विषयमें अच्छे पुरुषोंका कहना है—‘पूत सपूत तो क्यों धन संचै? पूत कपूत तो क्यों धन संचै?’ अर्थात् पुत्र सपूत होगा तो उसको धनकी कमी रहेगी नहीं और कपूत होगा तो संचय किया हुआ सब धन नष्ट कर देगा, फिर धनका संचय क्यों करें?
प्रश्न—बच्चोंको ईसाई-स्कूलोंमें शिक्षा दिलानी चाहिये या नहीं?
उत्तर—ईसाई-स्कूलोंमें बच्चोंको पढ़ाओगे तो वे घरमें रहते हुए भी ईसाई बन जायँगे अर्थात् आपके बच्चे ऊपरसे हिन्दू और भीतरसे ईसाई बन जायँगे। यह बड़ी शर्मकी बात है कि हजारों मील दूर रहनेवाले यहाँ आकर आपके बच्चोंको ईसाई बना लेते हैं और आप अपने घरके बच्चोंको भी हिन्दू बनाये नहीं रख सकते! बच्चे आपके देशकी खास सम्पत्ति हैं, उनकी रक्षा करो।
बड़े आदमियोंको चाहिये कि वे निजी स्कूल, कालेज बनायें, जिनमें अच्छा अनुशासन हो और बच्चोंको अच्छी शिक्षा देनेकी व्यवस्था हो। पढ़ानेवाले शिक्षकोंके आचरण भी अच्छे हों। यद्यपि अच्छे आचरणवाले शिक्षक मिलने कठिन हैं, तथापि उद्योग किया जाय तो मिल सकते हैं। ऐसे स्कूल-कॉलेजोंमें अपने धर्मकी और गीता, रामायण आदि ग्रन्थोंकी शिक्षा भी बच्चोंको दी जानी चाहिये। धार्मिक शिक्षाके लिये एक घण्टा तो अनिवार्य रखना ही चाहिये।
आप स्वयं भी सादगी रखें और बच्चोंको भी सादगी सिखायें। आप स्वाद-शौकीनी, ऐश-आरामका त्याग करें और अच्छे-से-अच्छे काममें लगे रहें तो इसका बच्चोंपर भी अच्छा असर पड़ेगा। घरमें भगवान् का मन्दिर हो, भगवान् का पूजन हो। भगवान् का चरणामृत छोटे-बड़े सभी लें। घरमें भगवत्-सम्बन्धी चर्चा हो, भगवन्नाम-कीर्तन हो, अच्छे-अच्छे पदोंका गान हो। आप जितने अच्छे बनोगे, बच्चे भी उतने ही अच्छे बनेंगे। वचनोंकी अपेक्षा आचरणोंका असर ज्यादा पड़ता है।
प्रश्न—पुत्र-पुत्रीके विवाहके लिये माता-पिताको क्या करना चाहिये?
उत्तर—मुख्य बात तो यह है कि पुत्र और पुत्रीका जैसा भाग्य होगा, वैसा ही होगा। परन्तु माता-पिताका कर्तव्य है कि यदि पुत्रका विवाह करना हो तो लड़कीका स्वभाव देखना चाहिये; क्योंकि उम्रभर उससे काम पड़ेगा। उसके शरीरमें कोई भयंकर रोग न हो, उसकी माँका स्वभाव ठीक हो आदि जितनी जाँच कर सकें, करनी चाहिये। यदि कन्याका विवाह करना हो तो घर भी अच्छा हो, वर भी अच्छा हो, उसमें योग्यता भी हो आदि बातोंका विचार करके ही अपनी कन्या देनी चाहिये। शास्त्रमें वरके विषयमें सात बातें देखनेके लिये कहा गया है—
कुलं च शीलं च वपुर्यशश्च
विद्यां च वित्तं च सनाथतां च।
एतान्गुणान्सप्त परीक्ष्य देया
कन्या बुधै: शेषमचिन्तनीयम्॥
‘वरके कुल, शील, शरीर, यश, विद्या, धन और सनाथता (बड़े लोगोंका सहारा)—इन सात गुणोंकी परीक्षा करके अपनी कन्या देनी चाहिये।’
वास्तवमें वर अच्छा हो और वरकी माँ अच्छी हो तो वहाँ कन्या सुखसे रहती है। कन्याको एकदम नजदीक भी नहीं देना चाहिये और बहुत दूर भी नहीं देना चाहिये; क्योंकि नजदीक देनेसे खटपट ज्यादा हो सकती है* और दूर देनेसे कन्याका माँ-बापसे मिलना कठिन होता है।
तात्पर्य है कि अपनी सन्तान सुख पाये, वह सुख-सुविधासे रहे, उसको किसी तरहका कष्ट न हो और वंशकी वृद्धि हो—ऐसे भावसे सन्तानका विवाह करे।
प्रश्न—क्या दहेज लेना पाप है?
उत्तर—हाँ, पाप है।
प्रश्न—अगर पाप है तो फिर शास्त्रोंमें इसका विधान क्यों है?
उत्तर—शास्त्रोंमें केवल दहेज देनेका विधान है, लेनेका विधान नहीं है। दहेज लेना नहीं चाहिये और न लेनेकी ही महिमा है। कारण कि दहेज देना तो हाथकी बात है, पर दहेज लेना हाथकी बात नहीं है।
चाहना दो तरहकी होती है—(१) हमारी चीज हमारेको मिल जाय—यह चाहना न्याययुक्त है, परन्तु परमात्मप्राप्तिमें यह चाहना भी बाधक है। (२) दूसरोंकी चीज हमारेको मिल जाय—यह चाहना नरकोंमें ले जानेवाली है। ऐसे ही दहेज लेनेकी जो इच्छा है, वह नरकोंमें ले जानेवाली है। दहेज कम मिले, ज्यादा मिले और न भी मिले—यह तो प्रारब्धपर निर्भर है, पर अन्यायपूर्वक दूसरोंका धन लेनेकी जो इच्छा है, वह घोर नरकोंमें ले जानेवाली है। मनुष्य-शरीर प्राप्त करके घोर नरकोंमें जाना कितना बड़ा नुकसान है, पतन है! अत: मनुष्यको कम-से-कम घोर नरकोंमें ले जानेवाली इच्छाका, पराये धनकी इच्छाका तो त्याग करना ही चाहिये।
वास्तवमें धन प्रारब्धके अनुसार ही मिलता है, इच्छा-मात्रसे नहीं। अगर धन इच्छामात्रसे मिलता तो कोई भी निर्धन नहीं रहता। धनकी इच्छा कभी किसीकी पूरी हुई नहीं, होगी नहीं और हो सकती भी नहीं। उसका तो त्याग ही करना पड़ेगा। धन मिलनेवाला हो तो इच्छा न रखनेसे सुगमतापूर्वक मिलता है और इच्छा रखनेसे कठिनतापूर्वक, पाप-अन्यायपूर्वक मिलता है। गीतामें अर्जुनने पूछा कि मनुष्य न चाहता हुआ भी पाप क्यों कर बैठता है? तो भगवान् ने उत्तर दिया कि कामना ही सम्पूर्ण पापोंका मूल है (३।३६-३७)।
पुराने जमानेमें दहेजमें बेटेके ससुरालसे आया हुआ धन बाहर ही वितरित कर दिया करते थे, अपने घरमें नहीं रखते थे और ‘दूसरोंकी कन्या दानमें ली है’—इसके लिये प्रायश्चित्तरूपसे यज्ञ, दान, ब्राह्मण-भोजन आदि किया करते थे। कारण कि दूसरोंकी कन्या दानमें लेना बड़ा भारी कर्जा (ऋण) है। परन्तु गृहस्थाश्रममें कन्या दानमें लेनी पड़ती है; अत: उनका यह भाव रहता था कि हमारे घर कन्या होगी तो हम भी कन्यादान करेंगे।
जो ब्राह्मण विधि-विधानसे गाय आदिको दानमें लेते हैं, वे भी उसके लिये प्रायश्चित्तरूपसे यज्ञ, गायत्री-जप करते हैं—ऐसा हमने देखा है। जब दूसरोंका धन लेना भी दोष है, तो फिर दहेजमें धन लेना दोष है ही। अगर कहीं दहेज लेना भी पड़े तो केवल देनेवालेकी इच्छापूर्ति, प्रसन्नताके लिये ही लेना चाहिये। अपनी किञ्चिन्मात्र भी लेनेकी इच्छा नहीं हो और केवल देनेवालेकी प्रसन्नताके लिये ही थोड़ा लिया जाय, तो वह लेना भी देनेके समान ही है।
सन्तानका कर्तव्य
माता च कमला देवी पिता देवो जनार्दन:।
बान्धवा विष्णुभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम्॥
वास्तवमें भगवान् लक्ष्मी-नारायण ही सबके माता-पिता हैं। इस दृष्टिसे संसारमें हमारे जो माता-पिता हैं, वे साक्षात् लक्ष्मी-नारायणके ही स्वरूप हैं। अत: पुत्रका कर्तव्य है कि वह माता-पिताकी ही सेवामें लगा रहे। असली पुत्र वे होते हैं, जो शरीर आदिको अपना नहीं मानते, प्रत्युत माता-पिताका ही मानते हैं; क्योंकि शरीर माता-पितासे ही पैदा हुआ है। शरीर चाहे स्थूल, सूक्ष्म अथवा कारण ही क्यों न हो, उन सबपर वे माता-पिताका ही अधिकार मानते हैं, अपना नहीं। मनुजीने भी कहा है कि पुत्र तीर्थ, व्रत, भजन, स्मरण आदि जो कुछ शुभ कार्य करे, वह सब माता-पिताके ही अर्पण करे*। माता-पिता जीवित हों तो तत्परतासे उनकी आज्ञाका पालन करे, उनके चित्तकी प्रसन्नता ले और मरनेके बाद उनको पिण्ड-पानी दे, श्राद्ध-तर्पण करे, उनके नामसे तीर्थ, व्रत आदि करे। ऐसा करनेसे उनका आशीर्वाद मिलता है, जिससे लोक-परलोक दोनों सुधरते हैं।
श्रीभीष्मजीने पिताकी सुख-सुविधा, प्रसन्नताके लिये अपनी सुख-सुविधाका त्याग कर दिया और आबाल ब्रह्मचारी रहनेकी प्रतिज्ञा ले ली। उन्होंने कनक-कामिनी दोनोंका त्याग कर दिया। इससे प्रसन्न होकर पिताने उनको इच्छामृत्युका वरदान दिया। वे इच्छामृत्यु हो गये कि जब चाहें, तभी मरें। उनको ऐसी सामर्थ्य पिताकी सेवासे प्राप्त हो गयी। श्रीरामने पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये राज्य, वैभव, सुख-आराम आदि सबका परित्याग कर दिया। वाल्मीकिरामायणमें श्रीरामने स्वयं कहा है कि पिताजीके कहनेपर मैं आगमें भी प्रवेश कर सकता हूँ, विषका भी भक्षण कर सकता हूँ और समुद्रमें भी कूद सकता हूँ, पर मैं पिताकी आज्ञा नहीं टाल सकता*। श्रीराम विचारक नहीं थे, आज्ञापालक थे अर्थात् पिताजीने क्या कहा है, कहाँ कहा है, कब कहा है, किस अवस्थामें और किस परिस्थितिमें कहा है आदिका विचार न करके उन्होंने पिताकी आज्ञाका पालन किया और वनवासमें चले गये। अत: माता-पिताके आज्ञापालनमें श्रीराम सबके आदर्श हुए।
गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है—
अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन॥
तात्पर्य है कि पुत्रको श्रीरामकी तरह अपना आचरण बनाना चाहिये और यह सोचना चाहिये कि इस परिस्थितिमें, इस अवस्थामें, इस समय मेरी जगह श्रीराम होते तो क्या करते। इस तरह उनका ध्यान करके काम करना चाहिये।
पुत्र माता-पिताकी कितनी ही सेवा करे तो भी वह माता-पिताके ऋणको चुका नहीं सकता। कारण कि जिस मनुष्य-शरीरसे अपना कल्याण हो सकता है, जीवन्मुक्ति मिल सकती है, भगवत्प्रेम प्राप्त हो सकता है, भगवान् का मुकुटमणि बन जाय—इतना ऊँचा पद प्राप्त हो सकता है, वह मनुष्य-शरीर हमें माता-पिताने दिया है। उसका बदला पुत्र कैसे चुका सकता है? नहीं चुका सकता।
प्रश्न—माता-पिताकी सेवाका तात्पर्य क्या है?
उत्तर—माता-पिताकी सेवाका तात्पर्य कृतज्ञतामें है। माता-पिताने बच्चेके लिये जो कष्ट सहे हैं उसका पुत्रपर ऋण है। उस ऋणको पुत्र कभी उतार नहीं सकता। माँने पुत्रकी जितनी सेवा की है, उतनी सेवा पुत्र कर ही नहीं सकता। अगर कोई पुत्र यह कहता है कि मैं अपनी चमड़ीसे माँके लिये जूती बना दूँ तो उससे हम पूछते हैं कि यह चमड़ी तुम कहाँसे लाये? यह भी तो माँने ही दी है! उसी चमड़ीकी जूती बनाकर माँको दे दी तो कौन-सा बड़ा काम किया? केवल देनेका अभिमान ही किया है! ऐसे ही शरीर खास पिताका अंश है। पिताके उद्योगसे ही पुत्र पढ़-लिखकर योग्य बनता है, उसको रोटी-कपड़ा मिलता है। इसका बदला कैसे चुकाया जा सकता है! अत: केवल माता-पिताकी सेवा करनेसे, उनकी प्रसन्नता लेनेसे वह ऋण अदा तो नहीं होता, पर माफ हो जाता है।
प्रश्न—मेरा ऐसा पुत्र हो जाय, उसका कल्याण हो जाय—इस उद्देश्यसे माँ-बापने थोड़े ही संग किया! उन्होंने तो अपने सुखके लिये संग किया। हम पैदा हो गये तो हमारेपर उनका ऋण कैसे?
उत्तर—केवल सुखासक्तिसे संग करनेवाले स्त्री-पुरुषके प्राय: श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न नहीं होते। जो स्त्री-पुरुष शास्त्रके आज्ञानुसार केवल पितृ-ऋणसे मुक्त होनेके लिये ही सन्तान उत्पन्न करते हैं, अपने सुखका उद्देश्य नहीं रखते, वे ही असली माता-पिता हैं। परन्तु पुत्रके लिये तो कैसे हों, किसी भी तरहके माता-पिता हों, वे पूज्य ही हैं; क्योंकि उन्होंने मानव-शरीर देकर पुत्रको परमात्मप्राप्तिका अधिकारी बना दिया! उपनिषदोंमें आता है कि विद्यार्थी जब विद्या पढ़कर, स्नातक होकर गृहस्थमें प्रवेश करनेके लिये गुरुजीसे आज्ञा लेता, तब गुरुजी उसको आज्ञा देते कि ‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव’ अर्थात् तुम माता-पिताको साक्षात् ईश्वररूप मानकर उनकी आज्ञाका पालन करो; उनकी सेवा करो। यह ऋषियोंकी दीक्षान्त शिक्षा है और इसके पालनमें ही हमारा कल्याण है। अत: पुत्रको जिनसे शरीर मिला है, उनका कृतज्ञ होना ही चाहिये।
प्रश्न—माता-पिताने हमें जन्म देकर संसार-बन्धनमें डाल दिया, आफतमें डाल दिया; फिर हमारेपर उनका ऋण कैसे?
उत्तर—यह बात बिलकुल गलत है। माता-पिताने तो मनुष्यशरीर देकर संसार-बन्धनसे, जन्म-मरणसे छूटनेके लिये बड़ा भारी अवसर दिया है। माता-पिताने पुत्रको न तो बन्धनमें डाला है और न उनका पुत्रको बन्धनमें, आफतमें डालनेका उद्देश्य ही है। वे प्रत्येक अवस्थामें, जाने-अनजाने सदा पुत्रका भला ही चाहते हैं और भला ही करते हैं। परन्तु हम पदार्थोंमें, भोगोंमें, परिस्थितियोंमें, व्यक्तियोंमें ममता करके उनसे सुख भोगनेकी इच्छासे ही बन्धनमें, आफतमें पड़ते हैं। तात्पर्य है कि अपने सुखकी इच्छा, सुखका भोग, सुखकी आशाका त्याग करके यदि पुत्र माता-पिताकी सेवाको परमात्मप्राप्तिका साधन मानकर तत्परतासे उनकी सेवा करे तो उसको संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होकर परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी।
पुत्रको माता-पिताके कर्तव्यकी तरफ दृष्टि डालनी ही नहीं चाहिये। उसे तो केवल अपना ही कर्तव्य देखना चाहिये। जो अपने कर्तव्यको न देखकर माता-पिताके कर्तव्यको देखता है, वह अपने कर्तव्यसे च्युत हो जाता है अर्थात् कर्तव्य-पालनसे पतित हो जाता है। किसी भी शास्त्रमें किसीको भी माता-पिताके, गुरुजनोंके कर्तव्यको देखनेका अधिकार नहीं दिया गया है। पहले मनुष्य किसीके कर्तव्यको नहीं देखते थे, प्रत्युत अपना कर्तव्य देखते थे, अपने कर्तव्यका पालन करते थे, इसीसे वे जीवन्मुक्त, भगवद्भक्त होते थे। अगर वे दूसरोंका कर्तव्य देखते, अपना ही स्वार्थ देखते तो आजकी तरह ही मनुष्य-समुदाय होता। जिन्होंने केवल अपना कर्तव्य देखा है, उसका पालन किया है, उन सन्त-महात्माओं, धर्मात्माओंको भारतकी जनता कितनी आदरदृष्टिसे देखती है! अत: मनुष्यको अपने कर्तव्यका कभी परित्याग नहीं करना चाहिये।
कर्तव्यके विषयमें एक मार्मिक बात है कि केवल कर्तव्य समझकर उसका पालन करनेसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है; जैसे—जो माता-पिताकी सेवा केवल अपना कर्तव्य समझकर करते हैं, उनका माता-पितासे सम्बन्ध-विच्छेद होता है, उनका माता-पिताके चरणोंमें प्रेम नहीं होता। परन्तु जो अपने शरीरको माता-पिताका ही मानकर तत्परतासे आदर और प्रेमपूर्वक उनकी सेवा करते हैं, उनका माता-पितामें प्रेम हो जाता है। जैसे मनुष्य भोजन करनेको, जल पीनेको अपना कर्तव्य नहीं मानते, प्रत्युत प्राणोंका आधार मानते हैं, ऐसे ही माता-पिताकी सेवाको प्राणोंका आधार मानना चाहिये। उनकी सेवाको ही अपना जीवन मानना चाहिये, अपना खास काम मानना चाहिये—
सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि।
जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि॥
(मानस, अयोध्या० १४२।२)
इस प्रकार माता-पिताकी सेवाको अपने प्राणोंका, जीवनका आधार मानकर करनेसे ‘मैं’ और ‘मेरा’-पन मिट जाता है; क्योंकि शरीरको माता-पिताका ही मानकर उनकी सेवामें अर्पण करनेसे, शरीरपर अपना कोई अधिकार न माननेसे अहंता-ममता नहीं रहती।
प्रश्न—मनुष्य माता-पिताकी सेवाको भगवत्प्राप्तिका साधन मानता है, साध्य नहीं मानता। अगर वह माता-पिताकी सेवाको ही साध्य मानेगा, अपने प्राणोंका आधार मानेगा तो उसका माता-पिताके चरणोंमें ही प्रेम होगा, फिर उसको भगवत्प्रेम, भगवत्प्राप्ति कैसे होगी?
उत्तर—इसमें तीन बातें हैं—(१) जो माता-पिताकी सेवाको ही साधन और साध्य मानकर उनकी सेवा करता है, उनकी सेवाको अपने प्राणोंका आधार मानता है, उसकी माता-पिताके चरणोंमें प्रेम एवं भक्ति हो जाती है और अन्तमें उसको पितृलोककी प्राप्ति होती है। (२) जो परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखते हुए माता-पिताकी सेवाको अपना कर्तव्य समझकर करता है, उसको माता-पितासे सम्बन्ध-विच्छेद होकर परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। (३) जो माता-पिताको साक्षात् भगवत्स्वरूप मानकर उनकी सेवा करता है, उसको भगवत्प्राप्ति हो जाती है। इन तीनोंमेंसे जिसमें जिसका भाव बैठे, वही करना चाहिये।
जैसे पतिव्रता स्त्री भगवान् की, शास्त्रोंकी, महापुरुषोंकी आज्ञाके अनुसार तन-मनसे पतिकी सेवा करती है, उसको पतिलोककी प्राप्ति होती है अर्थात् जो लोक पतिका है, वही लोक पतिव्रताका होता है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि अगर दुराचारी होनेके कारण पतिका लोक नरक है तो पतिव्रताका लोक भी नरक होगा! जिस स्त्रीने पतिसेवाको अपना धर्म (कर्तव्य) समझकर पातिव्रत धारण किया है, वह नरकोंमें कैसे जा सकती है? नहीं जा सकती। उसने पातिव्रत धारण किया है; अत: उसका जो लोक होगा, वही लोक पतिका भी होगा। तात्पर्य है कि पातिव्रतके तपोबलसे उसका और पतिका दोनोंका कल्याण हो जायगा। ऐसे ही जो माता-पिताकी सेवाको ही साधन और साध्य मानकर उनकी सेवा करता है, उसको और उसके माता-पिताको भगवान् की प्राप्ति हो जाती है; क्योंकि जो लोक पुत्रका होगा, वही लोक माता-पिताका (पितृलोक) होगा।
प्रश्न—कहा गया है कि यह शरीर हमारे कर्मोंसे, भाग्यसे मिला है—‘बड़े भाग मानुष तनु पावा’; और भगवान् ने विशेष कृपा करके मनुष्य-शरीर दिया है—‘कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥’ तो फिर यह शरीर माता-पितासे मिला है—यह कहना कहाँतक उचित है?
उत्तर—इस शरीरके मिलनेमें प्रारब्ध (कर्म) और भगवत्कृपा तो निमित्त कारण है और माता-पिता उपादान कारण हैं। जैसे, घड़ा मिट्टीसे बनता है तो मिट्टी घड़ेका उपादान कारण है और कुम्हार घड़ा बनानेमें निमित्त बनता है तो कुम्हार निमित्त कारण है। उपादान कारण (खास कारण) वह कहलाता है, जो कार्यरूपमें परिणत होनेमें कारण बनता है। निमित्त कारण कई होते हैं; जैसे—घड़ेके बननेमें कुम्हार, चक्का, डण्डा आदि कई निमित्त कारण हैं, पर कुम्हार मुख्य निमित्त कारण है। ऐसे ही शरीरके पैदा होनेमें माता-पिता ही खास उपादान कारण हैं; क्योंकि उनके रज-वीर्यसे ही शरीर बनता है।
जन्म और आयुके होनेमें तथा अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिके बननेमें कर्म निमित्त कारण हैं और ‘किस कर्मका कब, कहाँ क्या फल होगा; कैसी परिस्थिति बनेगी’—इस तरह कर्मफलकी व्यवस्था करनेमें, कर्मफल देनेमें भगवत्कृपा निमित्त कारण है अर्थात् यह सब भगवदिच्छासे, भगवान् के विधानसे ही होता है; क्योंकि कर्म जड होनेसे स्वयं कर्मफल नहीं दे सकते। अगर कर्मफलका विधान जीवोंके हाथमें होता तो वे शुभ कर्मका ही फल लेते, अशुभ कर्मका फल लेते ही क्यों? जैसे संसारमें यह देखा जाता है कि मनुष्य शुभ कर्मका फल स्वयं स्वीकार करता है और अशुभ कर्म (चोरी, डकैती आदि) का फल (दण्ड) स्वयं स्वीकार नहीं करता तो उसको राजकीय व्यवस्थासे दण्ड दिया जाता है।
माँ बच्चेके लिये कितना कष्ट उठाती है, उसको गर्भमें धारण करती है, जन्म देते समय असह्य पीड़ा सहती है, अपना दूध पिलाती है, बड़े लाड़-प्यारसे पालन-पोषण करती है, खाना-पीना, उठना-बैठना, चलना-फिरना आदि सिखाती है, ऐसी माँका ऋण पुत्र नहीं चुका सकता। अत: पुत्रको माँके प्रति कृतज्ञ होना ही चाहिये। ऐसे ही पिता बिना कहे ही पुत्रके भरण-पोषणका पूरा प्रबन्ध करता है, विद्या पढ़ाकर योग्य बनाता है, जीविका चलानेकी विद्या सिखाता है, विवाह कराता है, ऐसे पिताका ऋण थोड़े ही चुकाया जा सकता है! अत: माता-पिताका कृतज्ञ होकर जीते-जी उनकी आज्ञाका पालन करना, उनकी सेवा करना, उनको प्रसन्न रखना और मरनेके बाद उनको पिण्ड-पानी देना, श्राद्ध-तर्पण करना आदि पुत्रका खास कर्तव्य है।
प्रश्न—माता-पिताने बचपनमें ही बच्चोंको अच्छी शिक्षा नहीं दी; अत: पुत्र माता-पिताकी सेवा नहीं करते तो इसमें पुत्रोंका क्या दोष?
उत्तर—माता-पिताके द्वारा अच्छी शिक्षा नहीं दी गयी तो उसके दोषी माता-पिता हुए; क्योंकि उन्होंने अपने कर्तव्यका पालन नहीं किया। परन्तु माता-पिताके दोष देखना पुत्रका कर्तव्य नहीं है। उसको तो अपना कर्तव्य देखना चाहिये। दूसरोंका कर्तव्य देखनेसे मनुष्य अपने कर्तव्यसे पतित हो जाता है। दूसरोंका कर्तव्य देखना ही भयंकर दोष है। गीताने भी अपने-आपसे अपना उद्धार करनेकी, अपना सुधार करनेकी बात कही है*; क्योंकि अच्छी शिक्षा मिलनेपर भी धारण तो खुद ही करेगा। अच्छी शिक्षा मिलनेपर भी बालक उसको धारण न करे, बिगड़ जाय तो यह दोष स्वयं बालकका ही है। अत: अपना उद्धार और पतन मुख्यतासे अपनेपर ही लागू होता है।
प्रश्न—अगर माता-पिता पुत्रके साथ कठोरताका बर्ताव करें; पक्षपात करें तो उस पुत्रको क्या करना चाहिये?
उत्तर—उस पुत्रको माँ-बापका कर्तव्य नहीं देखना चाहिये। उसको तो अपना ही कर्तव्य देखना चाहिये और माँ-बापकी उत्साहपूर्वक विशेषतासे सेवा करनी चाहिये। रामचरितमानसमें तो हरेकके लिये कहा गया है—‘मंद करत जो करइ भलाई॥’ (५।४१।७)।
अगर माता-पिता पुत्रका आदर करते हैं तो आदरमें पुत्रकी सेवा खर्च हो जाती है, बिक जाती है। परन्तु वे आदर न करके पुत्रका निरादर करते हैं तो पुत्रकी सेवा पूरी रह जाती है, खर्च नहीं होती। वे कष्ट देते हैं तो उससे पुत्रकी शुद्धि होती है, सहनशीलता बढ़ती है, तप बढ़ता है, महत्त्व बढ़ता है। अत: माता-पिताके दिये हुए कष्टको परम तप समझकर प्रसन्नतासे सहना चाहिये और यह समझना चाहिये कि ‘मेरेपर माँ-बापकी बड़ी कृपा है, जिससे मेरी सेवाका किञ्चिन्मात्र भी व्यय न होकर मेरेको शुद्ध सेवा, शुद्ध तपश्चर्याका लाभ मिल रहा है! ऐसा अवसर तो किसी भाग्यशालीको ही मिलता है और मेरा यह अहोभाग्य है कि माता-पिता मेरी सेवा स्वीकार कर रहे हैं!’ अगर वे सेवा स्वीकार न भी करें तो भी पुत्रका काम तो उनकी सेवा करना ही है। सेवामें कोई कमी, त्रुटि मालूम दे तो उसको तत्काल सुधार देना चाहिये और सेवामें ही तत्पर रहना चाहिये।
जो पुत्र धन, जमीन, मकान आदि पानेकी आशासे माँ-बापकी सेवा करता है, वह वास्तवमें धन आदिकी ही सेवा करता है, माँ-बापकी नहीं। पुत्रको तो केवल सेवाका ही सम्बन्ध रखना चाहिये। उसको माता-पितासे यही कहना चाहिये कि आपके पास जो धन-सम्पत्ति हो वह चाहे मेरे भाईको दे दो, चाहे बहनको दे दो, जिसको आप चाहो, उसको दे दो, पर सेवा मेरेसे लो। माता-पिता हमारेसे सेवा ले लें—इसीमें उनकी कृपा माने।
प्रश्न—माता-पिता अनुचित, निषिद्ध कर्म करनेकी आज्ञा दें तो पुत्रको क्या करना चाहिये?
उत्तर—अनुचित आज्ञा दो तरहकी होती है— (१) ‘अमुकको मार दो’ आदि दूसरोंका अनिष्ट करनेकी आज्ञा देना और (२) ‘तुम घर छोड़कर वनमें जाओ’ आदि आज्ञा देना। इनमेंसे दूसरी आज्ञाका तो पालन करना चाहिये, पर पहली आज्ञाका पालन नहीं करना चाहिये। उसमें पिताकी सामर्थ्य देखनी चाहिये। अगर पिता समर्थ हो तो उस आज्ञाका पालन करनेमें कोई हर्ज नहीं है। जैसे, जमदग्निने अपने पुत्र परशुरामजीसे कहा कि तुम्हारी माँ व्यभिचारिणी है और तुम्हारे भाई मेरी आज्ञाका पालन नहीं करते; अत: इनको मार डालो, तो परशुरामजीने उनका गला काट डाला। जमदग्निने प्रसन्न होकर कहा कि तुम वरदान माँगो। परशुरामजीने कहा कि माँ और भाइयोंको जीवित कर दो और उनको मेरे द्वारा मारे जानेकी बात याद न रहे। जमदग्निने ‘तथास्तु’ कहा और सब जीवित हो गये।
अगर पिता समर्थ नहीं है और वह अनुचित आज्ञा देता है तो पुत्रको उस आज्ञाका पालन नहीं करना चाहिये। कारण कि अगर पुत्र उस अनुचित आज्ञाका पालन करेगा तो पिताको नरक होगा। जिस आज्ञाके पालनसे पिताको नरक हो, दु:ख पाना पड़े, ऐसी आज्ञाका पालन नहीं करना चाहिये। मैं भले ही नरकमें चला जाऊँ, पर पिता नरकमें न जाय—ऐसा भाव होनेसे न पुत्रको नरक होगा और न पिताको। तात्पर्य है कि पिताको नरकसे बचानेके लिये उनकी आज्ञा भंग कर दे, पर अनुचित काम कभी न करे।
अगर पिता समर्थ नहीं है और वह अनुचित आज्ञा देता है, पर पुत्रने उम्रभर माता-पिताकी किसी भी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं किया है तो पुत्र उस अनुचित आज्ञाके पालनमें जल्दबाजी न करे, उसपर विचार करे और भगवान् को याद करे। जैसे, गौतमने अपने पुत्र चिरकारीसे कहा कि तुम्हारी माँ व्यभिचारिणी है, इसको मार डालो; और ऐसा कहकर वे वनमें चले गये। चिरकारीने तलवार निकाली और पिताकी आज्ञापर विचार करने लगा। वहाँ गौतमके मनमें विचार आया कि उसको क्यों मारें, उसका त्याग भी तो कर सकते हैं। ऐसा विचार करके वे लौटकर आये तो उन्होंने देखा कि चिरकारी हाथमें तलवार लिये खड़ा है; अत: उन्होंने चिरकारीको मना कर दिया कि माँको मत मारो।
प्रश्न—गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है—
जाके प्रिय न राम-बैदेही।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही॥
तज्यो पिता प्रह्लाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी।
बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी॥
—प्रह्लादने पिताका, विभीषणने भाईका, भरतने माँका, बलिने गुरुका और गोपियोंने पतिका त्याग कर दिया, तो क्या उनको दोष नहीं लगा?
उत्तर—यहाँ यह बात ध्यान देनेकी है कि उन्होंने पिता आदिका त्याग किस विषयमें, किस अंशमें किया? हिरण्यकशिपु प्रह्लादजीको बहुत कष्ट देता था, पर प्रह्लादजी उसको प्रसन्नतापूर्वक सहते थे। वे इस बातको मानते थे कि यह शरीर पिताका है; अत: वे इस शरीरको चाहे जैसा रखें, इसपर उनका पूरा अधिकार है। इसीलिये उन्होंने पिताजीसे कभी यह नहीं कहा कि आप मेरेको कष्ट क्यों दे रहे हैं? परन्तु मैं (स्वयं) साक्षात् परमात्माका अंश हूँ; अत: मैं भगवान् की सेवामें, भजनमें लगा हूँ। पिताजी इसमें बाधा देते हैं, मुझे रोकते हैं—यह उचित नहीं है। इसलिये प्रह्लादजीने पिताजीकी उस आज्ञाका त्याग किया, जिससे उनको नरक न हो जाय। अगर वे पिताजीकी आज्ञा मानकर भगवद्भक्तिका त्याग कर देते तो इसका दण्ड पिताजीको भोगना पड़ता। पुत्रके द्वारा ऐसा कोई भी काम नहीं होना चाहिये, जिससे पिताको दण्ड भोगना पड़े। इसी दृष्टिसे उन्होंने पिताकी आज्ञा न मानकर पिताका हित ही किया, पिताका त्याग नहीं किया।
रावणने विभीषणको लात मारी और कहा कि तुम यहाँसे चले जाओ तो विभीषणजी रामजीके पास चले गये। अत: विभीषणने भाईका त्याग नहीं किया। प्रत्युत उसके अन्यायका त्याग किया; अन्यायका समर्थन, अनुमोदन नहीं किया। विभीषणने रावणको उसके हितकी बात ही कही और उसका हित ही किया।
माँने रामजीको वनमें भेज दिया, दु:ख दिया—इस विषयमें ही भरतने माँका त्याग किया है। भरतका कहना था कि जैसे कौसल्या अम्बा मेरेपर रामजीसे भी अधिक स्नेह करती हैं, ऐसे ही तेरेको भी रामजीपर मेरेसे भी अधिक स्नेह करना चाहिये था; परन्तु रामजीको तूने वनमें भेज दिया! जब तू रामजीकी भी माँ नहीं रही, तो फिर मेरी माँ कैसे रहेगी? इस विषयमें तेरेको दण्ड देना मेरे लिये उचित नहीं है। मैं तो यह कर सकता हूँ कि तेरेको ‘माँ’ नहीं कहूँ, और मैं क्या करूँ!
बलिने गुरुका इस अंशमें त्याग किया कि साक्षात् भगवान् ब्राह्मणवेशमें आकर मेरेसे याचना कर रहे हैं, पर गुरुजी मेरेको दान देनेसे रोक रहे हैं; अत: मैं गुरुकी बात नहीं मानूँगा। गुरुकी बातका त्याग भी बलिने गुरुके हितके लिये ही किया। बलि दान देनेके लिये तैयार ही थे। अगर उस समय वे गुरुकी बात मानते तो उसका दोष गुरुको ही लगता। अत: उन्होंने गुरुका शाप स्वीकार कर लिया और उस दोषसे, अहितसे गुरुको बचा लिया। स्वयं दण्ड भोग लिया, पर गुरुको दण्डसे बचा लिया तो यह गुरु-सेवा ही हुई!
पति भगवान् के सम्मुख होनेके लिये रोक रहे थे—इसी विषयमें गोपियोंने पतियोंका त्याग किया। अगर वे पतिकी बात मानतीं तो पति पापके भागी होते; अत: पतिकी बात न मानकर उन्होंने पतियोंको पापसे ही बचाया।
तात्पर्य है कि मनुष्य-शरीरकी सार्थकता परमात्माको प्राप्त करनेमें ही है। अत: उसमें सहायक होनेवाला हमारा हित करता है और उसमें बाधा देनेवाला हमारा अहित करता है। प्रह्लाद आदि सभीने परमात्मप्राप्तिमें बाधा देनेवालेका ही त्याग किया है, पिता आदिका नहीं। इसीलिये उनका मङ्गल-ही-मङ्गल हुआ।
प्रश्न—माताका दर्जा ऊँचा है या पिताका? और ऊँचा होनेमें क्या कारण है?
उत्तर—ऊँचा दर्जा माँका ही है। माँका दर्जा पितासे सौ गुणा अधिक बताया गया है—‘सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते’ (मनु० २।१४५)। रामजी जब वनवासके लिये जाने लगे, तब वे माँके पास गये और माँके चरणोंमें पड़कर कहा कि ‘माँ! मुझे वनवासकी आज्ञा हुई है।’ माँने कहा कि अगर केवल पिताकी ऐसी आज्ञा है तो फिर माँको बड़ी समझकर तुम वनमें मत जाओ—
जौं केवल पितु आयसु ताता।
तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता॥
(मानस, अयोध्या० ५६।१)
हाँ, अगर तुम्हारी छोटी माँ और पिताने वनमें जानेके लिये कह दिया है तो* वन तुम्हारे लिये सौ अयोध्याके समान है—
जौ पितु मातु कहेउ बन जाना।
तौ कानन सत अवध समाना॥
(मानस, अयोध्या० ५६।२)
पिता तो धन-सम्पत्ति आदिसे पुत्रका पालन-पोषण करता है, पर माँ अपना शरीर देकर पुत्रका पालन-पोषण करती है। धन-सम्पत्ति आदि तो ममताकी वस्तुएँ हैं और शरीर अहंताकी। ममतासे अहंता नजदीक होती है। ममताकी वस्तुएँ आती-जाती रहती हैं और शरीर अपेक्षाकृत रहता है। अत: माँका दर्जा ऊँचा होना ही चाहिये।
माँने अपनी युवावस्थाका नाश किया है। अपना शरीर देकर, अपना दूध पिलाकर पालन-पोषण किया है। माँने दाईका, नाईका, धोबीका, दर्जीका, गुरुका काम भी किया है! और तो क्या, टट्टी-पेशाब उठाकर मेहतरका काम भी किया है! वह काम भी भाररूपसे नहीं, प्रत्युत बड़े स्नेहपूर्वक, ममतापूर्वक, उत्साहपूर्वक किया है और बदलेमें लेनेकी भावना नहीं रखी है। जब बच्चा बीमार हो जाता है, तब माँके शरीरका बल घट जाता है। अत: संसारमें माँके समान बच्चेका पालन-पोषण करनेवाला और कौन है! ‘मात्रा समं नास्ति शरीरपोषणम्।’ इसीलिये माँका दर्जा ऊँचा है। शास्त्रोंमें आया है कि पुत्र साधु-संन्यासी बन जाय, फिर भी यदि माँ सामने आ जाय तो वह माँको साक्षात् दण्डवत् प्रणाम करे। इतना ऊँचा दर्जा और किसका हो सकता है!
प्रश्न—माता-पिताकी सेवासे क्या लाभ है?
उत्तर—माता-पिताकी सेवासे लोक-परलोक दोनों सुधरते हैं, भगवान् प्रसन्न होते हैं। जो माता-पिताकी सेवा नहीं करते, उनपर भगवान् विश्वास नहीं करते कि यह अपने माँ-बापकी भी सेवा, भक्ति नहीं करता तो फिर मेरी भक्ति कहाँतक करेगा!
पुण्डरीकने तन-मनसे तत्परतापूर्वक माता-पिताकी सेवा की। उसकी सेवासे प्रसन्न होकर भगवान् बिना बुलाये ही पुण्डरीकके घर आ गये और बोले—‘पुण्डरीक! तेरी माता-पिताकी भक्तिसे प्रसन्न होकर मैं स्वयं तेरे पास तेरेको दर्शन देने आया हूँ।’ पुण्डरीक उस समय माता-पिताकी सेवामें लगे हुए थे; अत: वे भगवान् से बोले—‘माता-पिताकी जिस सेवाके कारण आप यहाँ मुझे दर्शन देने आये हैं, उस सेवाको मैं क्यों छोड़ूँ? अभी मैं माता-पिताकी सेवामें लगा हुआ हूँ; सेवा पूरी होनेपर ही मैं आपके दर्शन कर सकता हूँ; तबतक आप रुकना चाहें तो इन ईंटोंपर खड़े हो जायँ।’ ऐसा कहकर पुण्डरीकने दो ईंटें पीठके पीछे फेंक दीं। भगवान् उनपर खड़े हो गये! ईंटोंपर खड़े होनेके कारण भगवान् का नाम ‘विट्ठल’ पड़ गया। भगवान् के इस रूपका कोई दर्शन करना चाहे तो पण्ढरपुर (महाराष्ट्र) में कर सकता है। इसी प्रकार महाभारतमें मूक चाण्डालकी बात आती है। मूक चाण्डालकी माता-पितामें भक्ति देखकर स्वयं भगवान् उसके घरपर रहते थे! तात्पर्य है कि माता-पिताकी सेवासे लौकिक-पारलौकिक सब तरहके लाभ होते हैं।
प्रश्न—जब माता-पिताकी सेवाका इतना माहात्म्य है तो फिर उनकी सेवाको छोड़कर मनुष्य साधु-संन्यासी क्यों हो जाते हैं?
उत्तर—जैसे कोई मर जाता है तो वह माता-पिताकी सेवाको छोड़कर ही मरता है, पर वह दोषका भागी नहीं होता, ऐसे ही जिसको संसारसे असली वैराग्य हो जाता है, वह दोषका भागी नहीं होता। इसी तरह जो सर्वथा भगवान् के शरण हो जाता है, उसको भी कोई दोष नहीं लगता; क्योंकि उसपर किसीका भी ऋण नहीं रहता—
देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां
न किंकरो नायमृणी च राजन्।
सर्वात्मना य: शरणं शरण्यं
गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्॥
(श्रीमद्भा० ११।५।४१)
‘राजन्! जो सब कामोंको छोड़कर सम्पूर्णरूपसे शरणागतवत्सल भगवान् की शरणमें आ जाता है, वह देव, ऋषि, प्राणी, कुटुम्बीजन और पितृगण—इनमेंसे किसीका भी ऋणी और सेवक नहीं रहता।’
तात्पर्य है कि जो मनुष्यजन्मके वास्तविक ध्येय भगवान् में लगा है, उसके द्वारा यदि माता-पिताकी सेवाका, परिवारका त्याग हो जाय तो उसको दोष नहीं लगता।
प्रश्न—दो-चार लड़के हों और उनमेंसे कोई साधु-संन्यासी बन जाय तो कोई बात नहीं, पर किसीका एक ही लड़का हो, वह अगर साधु-संन्यासी बन जाय तो उसके माता-पिता किसके सहारे जियें?
उत्तर—उस लड़केको चाहिये कि जबतक माता-पिता हैं, तबतक उनकी सेवा करता रहे, उनको छोड़े नहीं; क्योंकि भगवत्प्राप्तिमें साधु होना कोई कारण नहीं है, प्रत्युत संसारसे वैराग्य और भगवान् में प्रेम होना ही कारण है। अत: वह माता-पिताकी सेवा करते हुए ही भजन-स्मरण करे तो उसके लिये भगवत्प्राप्ति होनेमें कोई बाधा नहीं है, प्रत्युत माता-पिताकी प्रसन्नतासे भगवत्प्राप्तिमें सहायता ही मिलेगी। तात्पर्य है कि माता-पिताके ऋणको अदा किये बिना उनका त्याग नहीं करना चाहिये। परन्तु तीव्र वैराग्य हो जाय, भगवान् के चरणोंमें अनन्य प्रेम हो जाय, ऐसी अवस्थामें माता-पिताकी सेवा छूट जाय तो उसको दोष नहीं लगेगा।
जो घरमें बैठा है, पर माँ-बापकी सेवा नहीं करता केवल अपने स्त्री-पुत्रोंके पालनमें ही लगा है, उसको दोष (पाप) लगेगा ही। ऐसे ही जो माँ-बापको, घर-परिवारको छोड़कर साधु बना है और मकान, आश्रम बनाता है, रुपये इकट्ठा करता है, चेला-चेली बनाता है, ऐश-आराम करता है, उसको माँ-बापकी सेवा न करनेका पाप लगेगा ही।
प्रश्न—अगर कोई साधु-संन्यासी बनकर रुपये इकट्ठा करता है और माता-पिता, स्त्री-पुत्रोंको रुपये भेजता है, उनका पालन-पोषण करता है तो क्या उसको दोष लगेगा?
उत्तर—जो साधु-संन्यासी बनकर माँ-बाप आदिको रुपये भेजते हैं, वे तो पापके भागी हैं ही, पर जो उनके दिये हुए रुपयोंसे अपना निर्वाह करते हैं, वे भी पापके भागी हैं; क्योंकि वे दोनों ही शास्त्र-आज्ञाके विरुद्ध काम करते हैं। माता-पिताकी सेवा तो वे गृहस्थाश्रममें ही रहकर करते, पर वे अवैध काम करके संन्यास-आश्रमको दूषित करते हैं तो उनको पाप लगेगा ही। वे पापसे बच नहीं सकते!
प्रश्न—अगर घरमें माँका पालन करनेवाला, सँभालनेवाला कोई न रहा हो तो उस अवस्थामें साधु-संन्यासी बना हुआ लड़का माँका पालन कर सकता है या नहीं?
उत्तर—माँका कोई आधार न रहे तो साधु बननेपर भी वह माँका पालन कर सकता है और पालन करना ही चाहिये। असमर्थ अवस्थामें तो दूसरे प्राणियोंकी भी सेवा करनी चाहिये, फिर माँ तो शरीरकी जननी है! वह अगर असमर्थ अवस्थामें है तो उसकी सेवा करनेमें कोई दोष नहीं है।
प्रश्न—पुत्री (कन्या) तो पतिके घर चली जाती है, तो फिर वह माँ-बापकी सेवा कैसे कर सकती है और सेवा किये बिना माँ-बापका ऋण माफ कैसे हो सकता है?
उत्तर—जैसे, किसीपर इतना अधिक ऋण हो जाय कि उसको चुकानेकी मनमें होनेपर भी वह चुका न सके तो वह ऋणदाताके पास जाकर कह दे कि मैं और मेरे स्त्री-पुत्र, घर, जमीन आदि सब आपके समर्पित हैं; अब आप इनका जैसा उपयोग करना चाहें, वैसा कर सकते हैं। ऐसा करनेसे उसपर ऋण नहीं रहता, ऋण माफ हो जाता है। इसी तरह कन्या बचपनसे ही माता-पिताके समर्पित रहती है। वह अपने मनकी कुछ भी नहीं रखती। माता-पिता जहाँ उसका सम्बन्ध (विवाह) करा देते हैं, वह प्रसन्नतापूर्वक वहीं चली जाती है। वह अपने गोत्रको भी पतिके गोत्रमें मिला देती है। जिसने ऐसा त्याग किया है, उसपर माता-पिताका ऋण कैसे रह सकता है? नहीं रह सकता।
प्रश्न—माँ-बापका कोई सहारा न रहे तो ऐसी अवस्थामें विवाहित पुत्री माँ-बापका पालन कर सकती है या नहीं?
उत्तर—वह असहाय माँ-बापकी सेवा कर सकती है। यदि विवाहित पुत्रीकी सन्तान है तो माँ-बाप उसके घरका अन्न-जल ले सकते हैं, उसके घरपर रह सकते हैं। परन्तु यदि उसकी कोई सन्तान नहीं है तो माँ-बापको उसके घरका अन्न-जल लेनेका अधिकार नहीं है।
माता-पिताने कन्याका दान (विवाह) कर दिया तो अब वे उसके घरका अन्न नहीं ले सकते; क्योंकि दान दी हुई वस्तुपर दाताका अधिकार नहीं रहता। परन्तु कन्यासे सन्तान (पुत्र या पुत्री) होनेपर माता-पिता कन्याके यहाँका अन्न ले सकते हैं। कारण यह है कि कन्याके पति (दामाद)-ने केवल पितृऋणसे मुक्त होनेके लिये ही दूसरेकी कन्या स्वीकार की है और उससे सन्तान होनेपर वह पितृऋणसे मुक्त हो जाता है। अत: सन्तान होनेपर माता-पिताका कन्यापर अधिकार हो जाता है, तभी तो गोत्र न होनेपर भी दौहित्र अपने नाना-नानीका श्राद्ध-तर्पण कर सकता है।
यदि माता-पिता असहाय अवस्थामें हों तथा उनकी सेवा करनेवाला कोई न हो तो उनकी सेवा करनेकी जिम्मेवारी पुत्रीपर ही है। अत: अपनी सन्तान न होनेपर भी विवाहित पुत्रीको उनकी सेवा करनी चाहिये। दूसरी बात, वर्तमान कानूनमें पिताकी सम्पत्तिमें पुत्र और पुत्रीका समान अधिकार माना गया है। अत: वर्तमान कानूनकी दृष्टिसे भी देखा जाय तो जब पुत्रीको सम्पत्ति देनेका अधिकार है तो फिर उससे सेवा लेनेका भी माता-पिताको अधिकार है!
स्त्री-सम्बन्धी बातें
प्रश्न—क्या कन्या स्वयंवर कर सकती है?
उत्तर—शास्त्रोंमें स्वयंवरकी बात आती है, परन्तु जिन्होंने स्वयंवर किया है, उन्होंने कष्ट ही उठाया है। सीता, द्रौपदी, दमयन्ती आदिने स्वयंवर किया तो उन्होंने प्राय: दु:ख ही पाया। आजकल जो कन्याएँ स्वयंवर करती हैं, खुद ही पतिको चुनती हैं, अपने मनसे विवाह करती हैं, वे कौन-सा सुख पाती हैं? वे दु:ख-ही-दु:ख पाती हैं, भटकती ही रहती हैं।
जो कन्या स्वयंवर करती है, उसकी जिम्मेवारी खुद उसीपर रहती है। पिता कन्याका हितैषी होता है और हितैषी होकर ही वह कन्याके लिये वर ढूँढ़ता है, उसका सम्बन्ध करता है; अत: उस सम्बन्धकी जिम्मेवारी पितापर ही रहती है, कन्यापर नहीं। पिताके द्वारा सम्बन्ध करानेपर कन्यासे कहीं थोड़ी गलती भी हो जाय तो वह माफ हो जायगी; परन्तु स्वयंवर करनेवाली कन्याकी गलती माफ नहीं होगी। जैसे, पुत्र माता-पिताकी सेवा कम भी करे तो उतना दोष नहीं है; क्योंकि वह माता-पितासे उत्पन्न हुआ है, उसने जानकर सम्बन्ध नहीं जोड़ा है। परन्तु गोद जानेवाला पुत्र माता-पिताकी सेवा नहीं करता तो उसको विशेष दण्ड भोगना पड़ता है; क्योंकि उसने जानकर सम्बन्ध जोड़ा है। कोई किसीके यहाँ नौकरी करता है और नौकरीमें गलती करता है तो उसको माफी नहीं होती; क्योंकि उसने नौकरी स्वयं स्वीकार की है। हाँ, दयालु मालिक उसको माफ कर सकता है, पर वह माफीका अधिकारी नहीं होता। कोई किसीको अपना गुरु बनाता है तो गुरुकी आज्ञाका पालन करना उसकी विशेष जिम्मेवारी होती है। यदि वह गुरु-आज्ञाका पालन नहीं करता, गुरुका तिरस्कार करता है, निन्दा करता है तो उसको भयङ्कर दण्ड भोगना पड़ता है। उसको भगवान् भी माफ नहीं कर सकते। भगवान् कुपित हो जायँ तो गुरु माफ करा सकता है, पर गुरु कुपित हो जायँ तो भगवान् भी माफ नहीं करा सकते। अत: स्वयंवर करनेवाली कन्यापर विशेष जिम्मेवारी रहती है।
प्रश्न—कन्या विवाह न करके साधन-भजनमें ही जीवन बिताना चाहे तो क्या यह ठीक है?
उत्तर—कन्याके लिये विवाह न करना उचित नहीं है; क्योंकि वह स्वतन्त्र रहकर अपना जीवन-निर्वाह कर ले—ऐसा बहुत कठिन है अर्थात् विवाह न करनेसे उसके जीवन-निर्वाहमें बहुत कठिनता आयेगी। जबतक माँ-बाप हैं, तबतक तो ठीक है, पर जब माँ-बाप नहीं रहते, तो फिर प्राय: भाईलोग (अपनी स्त्रियोंके वशीभूत होनेसे) बहनका आदर नहीं करते, प्रत्युत बहनका तिरस्कार करते हैं, उसको हीन दृष्टिसे देखते हैं। भौजाइयाँ भी उसको तिरस्कारकी दृष्टिसे देखती हैं। इससे कन्याके मनमें पराधीनताका अनुभव होता है। अत: विवाह कर लेना अच्छा है।
हमने ऐसे स्त्री-पुरुषोंको भी देखा है, जिन्होंने विवाहसे पहले ही यह प्रतिज्ञा कर ली कि हम स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध न रखकर केवल साधन-भजन ही करेंगे; और वे अपनी प्रतिज्ञा निभाते आये हैं। यद्यपि आजके जमानेमें ऐसे लड़के मिलने कठिन हैं, जो केवल साधन-भजनके लिये ही विवाह करें, तथापि उनका मिलना असम्भव नहीं है।
मीराबाईकी तरह जो बचपनसे ही भजन-स्मरणमें लग जाय, उसकी तो बात ही अलग है; परन्तु यह विधान नहीं है, भाव है। इस भावमें भी कठिनता आती है। मीराबाईके जीवनमें बहुत कठिनता आयी थी, पर भगवान् के दृढ़ विश्वासके बलपर वह सब कठिनताओंको पार कर गयी। ऐसा दृढ़ विश्वास बहुत कम होता है। जिसमें ऐसा दृढ़ विश्वास हो, उसके लिये यह विधान नहीं है कि वह विवाह न करे अथवा वह विवाह करे। तात्पर्य है कि भगवान् पर दृढ़ श्रद्धा-विश्वास हो तो मनुष्य कहीं भी रहे, वह श्रेष्ठ हो ही जायगा।
प्रश्न—क्या स्त्रीको साधु-संन्यासी बनना उचित है?
उत्तर—पुरुषको तो यह अधिकार है कि उसको संसारसे वैराग्य हो जाय तो वह घर आदिका त्याग करके, विरक्त होकर भजन-स्मरण करे, पर स्त्रियोंके लिये ऐसी आज्ञा हमने कहीं देखी नहीं है। अत: स्त्रीको साधु-संन्यासी बनना उचित नहीं है। उसको तो घरमें ही रहकर अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये। वह घरमें ही त्यागपूर्वक, संयमपूर्वक रहे—इसीमें उसकी महिमा है।
वास्तवमें त्याग-वैराग्यमें जो तत्त्व है, वह साधु-संन्यासी बननेमें नहीं है। जिसके भीतर पदार्थोंकी गुलामी नहीं है, वह घरमें रहते हुए ही साध्वी है, संन्यासिनी है।
प्रश्न—पतिव्रता, साध्वी और सती किसे कहते हैं?
उत्तर—यद्यपि शब्दकोशके अनुसार पतिव्रता, साध्वी और सती—तीनों नाम एक ही अर्थमें हैं, तथापि तीनोंमें भेद किया जाय तो पतिके रहते हुए जो अपने नियममें दृढ़ रहती है, वह ‘पतिव्रता’ है; पतिके न रहनेपर जो अपने नियममें, त्यागमें दृढ़ रहती है, वह ‘साध्वी’ है; और जो सत्यका पालन करती है, जिसका पतिके साथ दृढ़ सम्बन्ध रहता है, जो पतिके मरनेपर उसके साथ सती हो जाती है, वह ‘सती’ है।
प्रश्न—सतीप्रथा उचित है या अनुचित?
उत्तर—सती होना ‘प्रथा’ है ही नहीं। पतिके साथ जल जाना सती होना नहीं है। जिसके मनमें सत् आ जाता है, उत्साह आ जाता है, वह आगके बिना भी जल जाती है और उसको जलनेका कोई कष्ट भी नहीं होता। यह कोई प्रथा नहीं है कि वह ऐसा ही करे, प्रत्युत यह तो उसका सत्य है, धर्म है, शास्त्र-मर्यादापर विश्वास है।
हरदोई जिलेमें इकनोरा नामका गाँव है। वहाँ एक लड़की अपनी ननिहालमें थी। पति बीमार था, वह मर गया। उसको पतिके मरनेका समाचार मिला। उसने मामासे पूछा कि सती सुलोचनाको पतिका सिर नहीं मिलता तो वह क्या करती? मामाने कहा कि मुझे क्या पता? उसने कहा कि मामाजी! मैं सती होऊँगी। मामाने कहा कि ऐसा नहीं करना बेटी! उसने कहा कि मैं करती नहीं हूँ, होता है। उसने दीपक जलाया और उसपर अपनी अँगुली रखी तो उसकी अँगुली मोमबत्तीकी तरह जलने लगी। उसने मामासे कहा कि आप मुझे सती होनेकी आज्ञा देते हैं या नहीं। नहीं तो आपका यह सारा घर भस्म हो जायगा। मामाने कहा कि अच्छा तेरी जैसी मरजी हो, वैसा कर। उसने जलती हुई अँगुलीको एक दीवारपर बुझाया और घरसे बाहर जाकर पीपलवृक्षके नीचे खड़ी हो गयी तथा मामासे कहा कि मुझे लकड़ी दो। मामाने कहा कि हम न लकड़ी देंगे, न आग। गाँवके लोग वहाँ इकट्ठे हो गये थे। उसने हाथ जोड़कर सूर्यभगवान् से प्रार्थना की कि हे नाथ! आप आग दो। ऐसा कहते ही वह वहाँ खड़ी-खड़ी अपने-आप जल गयी! उस आगसे पीपलके पत्ते जल गये। यह सब गाँवके लोगोंने अपनी आँखोंसे देखा। वहाँके मुसलमानोंसे पूछा गया तो उन्होंने भी कहा कि यह सब घटना हमारे सामने घटी है। करपात्रीजी महाराज भी वहाँ गये थे और उन्होंने दीवारपर काली लकीर देखी, जहाँ उसने अपनी जलती हुई अँगुली बुझायी थी और पीपलके जले हुए पत्ते भी देखे।
तात्पर्य है कि यह सतीप्रथा नहीं है। यह तो उसका खुदका धार्मिक उत्साह है। इस विषयमें प्रभुदत्त ब्रह्मचारीजीने ‘सतीधर्म हिन्दूधर्मकी रीढ़ है’ नामक पुस्तक लिखी है*, उसको पढ़ना चाहिये।
प्रश्न—पतिव्रताके भाव और आचरण कैसे होते हैं?
उत्तर—उसमें धार्मिक भावोंकी प्रबलता होती है, जिससे वह तन-मनसे पतिकी सेवा करती है। पतिके मनमें ही अपना मन मिला देती है, अपना कुछ नहीं रखती। उसका मन पतिमें ही खिंचा रहता है। उसका यह पातिव्रत ही उसकी रक्षा करता है।
प्राय: पतिव्रताका सम्बन्ध पूर्वजन्मके पतिके साथ ही होता है। कहीं-कहीं ऐसा भी होता है कि बचपनमें कन्याको अच्छी शिक्षा, अच्छा संग मिलनेसे उसके भाव अच्छे बन जाते हैं तो वह विवाह होनेपर पतिव्रता बन जाती है।
प्रश्न—पतिव्रताकी पहचान क्या है?
उत्तर—पतिव्रताके घरमें शान्ति रहती है और सभी अपने-अपने धर्मका पालन करनेवाले होते हैं। उसकी सन्तान भी श्रेष्ठ, माता-पिताकी भक्त होती है। पड़ोसियोंपर, मोहल्लेवालोंपर भी उसके भावोंका असर पड़ता है।
पतिव्रताको देखनेवालेका दुर्भाव मिट जाता है। परन्तु सब जगह यह नियम लागू नहीं होता; क्योंकि पतिव्रताको देखकर अपने भीतरके अच्छे भाव ही जाग्रत् होते हैं। जिसके भीतर अच्छे भाव, संस्कार नहीं हैं, उसपर पतिव्रताका उतना असर नहीं पड़ता। जैसे, एक व्याधने दमयन्तीको अजगरके मुखसे छुड़ाया, पर उसके रूपको देखकर वह मोहित हो गया और उसके भीतर दुर्भाव पैदा हो गया। दमयन्तीके शापसे वह वहीं भस्म हो गया। युधिष्ठिर बड़े धर्मात्मा, सात्त्विक पुरुष थे, परन्तु दुर्योधनपर उनका असर नहीं पड़ा।
प्रश्न—क्या वर्तमान समयमें पातिव्रतधर्मका पालन हो सकता है?
उत्तर—पातिव्रतधर्मका पालन करनेमें वर्तमान समय कोई बाधक नहीं है। अपने धर्मका पालन करनेमें सबको सदासे स्वतन्त्रता है। धर्मसे विरुद्ध काम करनेमें ही शास्त्र, धर्म, मर्यादा आदि बाधक हैं।
प्रश्न—क्या पति पत्नीका त्याग कर सकता है?
उत्तर—पत्नी अच्छी है, सुशील है, पर रंगकी काली है, माँके साथ उसकी नहीं बनती, कभी माँका कहना नहीं मानती और माँ कहती है कि इसको छोड़ दो—ऐसी स्थितिमें जो पत्नीको छोड़ देता है, वह महापाप करता है, घोर अन्याय करता है; अत: वह घोर नरकोंमें जायगा। आजकलके लड़के पत्नीको दोषी समझकर उसका त्याग कर देते हैं तो क्या वे खुद सर्वथा दूधके धोये हुए हैं! अत: पत्नीका कभी त्याग नहीं करना चाहिये।
प्रश्न—अगर पत्नी दुश्चरित्रा, व्यभिचारिणी हो तो उसका त्याग करना चाहिये या नहीं?
उत्तर—आजकलके जमानेमें जहाँतक बने, उस पत्नीका त्याग नहीं करना चाहिये। अपनी सामर्थ्यके अनुसार उसपर शासन करना चाहिये, उसको सुधारनेकी चेष्टा करनी चाहिये। यदि उसको दण्ड ही देना हो तो उससे बातचीत न करे और उसके हाथसे बना भोजन भी न करे।
प्रश्न—पतिका आधा पुण्य पत्नीको और पत्नीका आधा पाप पतिको मिलता है—ऐसा क्यों?
उत्तर—पत्नीने अपने माता-पिता, भाई-भौजाई आदि सबका, घरभरका त्याग किया है और पुण्य त्यागसे होता है। उसने अपने गोत्रतकका त्याग करके पतिके मनमें अपना मन मिला दिया है! अत: वह पुण्यकी भागी होती है। पति सन्ध्या-गायत्री आदि करता है तो उसका भी आधा फल (पुण्य) पत्नीको मिलता है। इसीलिये पतिके दो जनेऊ होते हैं—एक अपना और एक पत्नीका।
स्त्रीको बचपनमें शिक्षा देना माता-पिता, भाई आदिके अधीन होता है और विवाह होनेपर शिक्षा देना पतिके अधीन होता है। अगर पतिसे अच्छी शिक्षा न मिलनेके कारण पत्नी पाप करती है तो उसका आधा पाप पतिको लगता है।
अगर पति अच्छी शिक्षा देता है, पर पत्नी पतिका कहना नहीं मानती, पाप करती है तो उसका आधा पाप पतिको नहीं लगता; क्योंकि उसने अपनी जिम्मेवारी खुदपर ही ली है। ऐसे ही जो स्त्री पतिके कहनेमें चलती है, पतिके अधीन रहती है, वही पतिके आधे पुण्यकी भागीदार होती है। जो पतिके कहनेमें नहीं चलती, वह पतिके आधे पुण्यकी भागीदार नहीं होती।
प्रश्न—विधर्मी लोग किसी स्त्रीका अपहरण करके ले जायँ तो उस स्त्रीको क्या करना चाहिये?
उत्तर—उसको जहाँतक बने, वहाँसे छूटनेका प्रयास करना चाहिये और मौका लगनेपर वहाँसे भाग जाना चाहिये। कोई भी उपाय न चले तो भगवान् को पुकारना चाहिये। भगवान् किसी-न-किसी प्रकारसे छुड़ा देंगे।
एक स्त्रीको मुखमें कपड़ा ठूँसकर, दोनों हाथ पीठके पीछे बाँधकर और ऊपरसे बुरका पहनाकर विधर्मीलोग रेलमें ले जा रहे थे। लखनऊ स्टेशनपर जब टीटी टिकट देखनेके लिये उस स्त्रीके पास आकर खड़ा हुआ, तब उस स्त्रीने अपने पैरसे टीटीका पैर दबाया। टीटीने विचार किया कि इसने मेरा पैर क्यों दबाया! इसमें कुछ-न-कुछ रहस्य है! उसने रेलवे पुलिसको बुलाया। पुलिसने जाँच करके उस स्त्रीको छुड़ा लिया और उसका अपहरण करनेवालोंको पकड़ लिया। ऐसे ही नोआखालीमें विधर्मीने एक स्त्रीको पकड़ लिया। उस स्त्रीने भगवान् को पुकारा। इतनेमें दूसरा विधर्मी आया और कहने लगा कि इसको मैं अपनी स्त्री बनाऊँगा। इसी बातको लेकर दोनों आदमियोंमें लड़ाई हो गयी। वे दोनों आपसमें लड़कर मर गये और उस स्त्रीकी रक्षा हो गयी।
प्रश्न—जिसकी स्त्रीको विधर्मी ले गये, उस पुरुषका क्या कर्तव्य है?
उत्तर—पुरुषमें उसको छुड़ाकर लानेकी सामर्थ्य हो और वह प्रसन्नतासे आना चाहे तो उसको अपने घरमें ले आना चाहिये। कारण कि उसके साथ जबर्दस्ती हुई है, अत: उसका एक पतिव्रत नहीं रहा, पर उसका धर्म नहीं बिगड़ा। धर्म तो स्वयं (अपनी इच्छासे) छोड़नेपर ही बिगड़ता है। जबर्दस्ती करके कोई भी किसीका धर्म नहीं छुड़ा सकता, उसको धर्मभ्रष्ट नहीं कर सकता। कोई जबर्दस्ती किसीके मुखमें गोमांस भी दे दे, तो भी वह उसका धर्म नहीं छुड़ा सकता। अत: यदि उस स्त्रीका मन नहीं बिगड़ा है, उसने संगका सुख नहीं लिया है तो उसका पातिव्रतधर्म नष्ट नहीं हुआ है। इसलिये यदि वह वापिस आ जाय तो उसको गीता, रामायण, भागवत आदिके पाठद्वारा तथा गङ्गाजलसे स्नान कराकर शुद्ध कर लेना चाहिये। यह सब करनेके बाद जब वह रजस्वला हो जायगी, तब वह सर्वथा शुद्ध हो जायगी—‘रजसा शुद्धॺते नारी।’
जमदग्नि ऋषिकी पत्नी रेणुका प्रतिदिन अपने पातिव्रत-धर्मके प्रभावसे कपड़ेमें जल भरकर लाया करती थी। एक दिन उसको नदीके किनारेपर सोनेकी तरह चमकीले एवं सुन्दर बाल दीखे। उसके मनमें आया कि ये बाल इतने सुन्दर हैं तो वह पुरुष कितना सुन्दर होगा! इस तरह मनमें विकार आते ही उसका धर्म नष्ट हो गया और वह पहलेकी तरह कपड़ेमें जल भरकर नहीं ला सकी।
इन्द्रने गौतम ऋषिका रूप धारण करके अहल्याको भ्रष्ट किया तो उसका धर्म भ्रष्ट नहीं हुआ, प्रत्युत एक पतिव्रत नष्ट हुआ। यद्यपि पतिने क्रोधमें आकर उसको पत्थरका बना दिया, तथापि भगवान् रामने उसका उद्धार कर दिया; क्योंकि वह अपने धर्ममें दृढ़ थी।
गीताप्रेसके संस्थापक श्रीजयदयालजी गोयन्दका शुद्धि एवं पवित्रताका बहुत खयाल रखा करते थे। उन्होंने भी कहा था कि विधर्मियोंने जबर्दस्ती करके जिन स्त्रियोंको भ्रष्ट किया है, उनका धर्म भ्रष्ट नहीं हुआ है। अत: यदि वे हिन्दूधर्ममें आना चाहें तो उनको ले लेना चाहिये और गङ्गास्नान, गीता-रामायणपाठ आदिसे शुद्ध करा लेना चाहिये। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि दूसरे धर्मको माननेवाला व्यक्ति हिन्दूधर्ममें आना चाहे तो उसको ले लेना चाहिये अर्थात् वह भी हिन्दू हो सकता है और हिन्दूधर्मकी पद्धतिके अनुसार जप-ध्यान, पूजा-पाठ आदि कर सकता है।
प्रश्न—पत्नी अपनी इच्छासे कहीं चली जाय और फिर लौट आये तो क्या करना चाहिये?
उत्तर—उसको अपनी पत्नी नहीं मानना चाहिये, उसके साथ पत्नी-जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिये। जैसे, सन्त कूबाजी महाराजकी पत्नी उनको छोड़कर दूसरेके पास चली गयी। वहाँ उसकी सन्तान भी हो गयी। परन्तु उसका वह पति मर गया। अब उसके लिये जीवन-निर्वाह करना भी बड़ा मुश्किल हो गया। अत: वह पुन: कूबाजीके पास आ गयी। कूबाजीने उसके निर्वाहके लिये अन्न, जल, वस्त्र आदिका प्रबन्ध कर दिया, पर उसको अपनी पत्नी नहीं माना।
प्रश्न—पति दुश्चरित्र हो तो पत्नीको क्या करना चाहिये?
उत्तर—पत्नीको दुश्चरित्र पतिका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत अपने पातिव्रतधर्मका पालन करते हुए उसको समझाना चाहिये। जैसे, मन्दोदरीने रावणको समझाया, पर उसका त्याग नहीं किया।
विवाहके समय स्त्री-पुरुष दोनों ही परस्पर वचनबद्ध होते हैं। उसके अनुसार पतिको सलाह देनेका, पतिसे अपने मनकी बात कहनेका पत्नीको अधिकार है। गान्धारी कितने ऊँचे दर्जेकी पतिव्रता थी कि जब उसने सुना कि जिससे मेरा विवाह होनेवाला है, उसके नेत्र नहीं हैं, तो उसने भी अपने नेत्रोंपर पट्टी बाँध ली; क्योंकि नेत्रोंका जो सुख पतिको नहीं है, वह सुख मुझे भी नहीं लेना है! परन्तु समय आनेपर उसने भी पति (धृतराष्ट्र)-को समझाया कि आपको दुर्योधनकी बात नहीं माननी चाहिये, नहीं तो कुलका नाश हो जायगा। ऐसी सलाह उसने कई बार दी, पर धृतराष्ट्रने उसकी सलाह नहीं मानी, जिससे कुलका नाश हो गया। तात्पर्य है कि पतिको अच्छी सलाह देनेका पत्नीको पूरा अधिकार है।
शास्त्रोंमें आया है कि जो पतिव्रता स्त्री तन-मनसे पतिकी सेवा करती है, अपने धर्मका पालन करती है, वह मृत्युके बाद पतिलोकमें (पतिके पास) जाती है। अगर पति दुश्चरित्र है तो पतिका लोक नरक होगा; अत: पतिव्रता स्त्रीका लोक भी नरक ही होना चाहिये! परन्तु पतिव्रता स्त्री नरकोंमें नहीं जा सकती; क्योंकि उसने शास्त्रकी, भगवान् की, सन्त-महात्माओंकी आज्ञाका पालन किया है, पातिव्रतधर्मका पालन किया है। अत: वह अपने पातिव्रत-धर्मके प्रभावसे पतिका उद्धार कर देगी अर्थात् जो लोक पत्नीका होगा, वही लोक पतिका हो जायगा। तात्पर्य है कि अपने कर्तव्यका पालन करनेवाला मनुष्य दूसरोंका उद्धार करनेवाला बन जाता है।
प्रश्न—अगर पति पत्नीको व्यभिचारके लिये प्रेरित करे तो पत्नीको क्या करना चाहिये?
उत्तर—पतिको यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी स्त्री दूसरोंको दे; क्योंकि पत्नीके पिताने पतिको ही दान दिया है। अन्न, वस्त्र आदिका दान लेनेवाला तो अन्न आदि दूसरोंको दे सकता है, पर कन्यादान लेनेवाला पति दूसरोंको अपनी पत्नी नहीं दे सकता। अगर वह ऐसा करता है तो वह महापापका भागी होता है। ऐसी स्थितिमें पत्नीको पतिकी बात बिलकुल नहीं माननी चाहिये। उसको अपने पतिसे साफ कह देना चाहिये कि मेरे पिताने आपको ही कन्यादान किया है; अत: दूसरोंको देनेका आपका अधिकार नहीं है। इस विषयमें वह पतिकी आज्ञा भंग करती है तो उसको कोई दोष नहीं लगता; क्योंकि पतिकी यह आज्ञा अन्याय है और अन्यायको स्वीकार करना अन्यायको प्रोत्साहित करना है, जो कि सबके लिये अनुचित है। दूसरी बात, अगर पत्नी पतिकी धर्मविरुद्ध आज्ञाका पालन करेगी तो इस पापके कारण पतिको नरकोंकी प्राप्ति होगी। अत: पत्नीको ऐसी आज्ञाका पालन नहीं करना चाहिये, जिससे पतिको नरकोंमें जाना पड़े।
अगर पति स्वयं भी शास्त्रनियमके विरुद्ध स्त्रीसंग करता है तो वह अन्याय, पाप करता है। धर्मयुक्त काम भगवान् का स्वरूप है—‘धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥’ (गीता ७।११); अत: इसमें दोष, पाप नहीं है। परन्तु धर्मसे विरुद्ध स्त्रीको मनमाना काममें लेना अन्याय है। मनुष्यको सदा शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार ही प्रत्येक कार्य करना चाहिये (गीता १६—२४)।
प्रश्न—अगर पति मांस-मदिरा आदिका सेवन करता हो तो पत्नीको क्या करना चाहिये?
उत्तर—पतिको समझाना चाहिये, निषिद्ध आचरणसे छुड़ाना चाहिये। अगर पति न माने तो लाचारी है, पर पतिको समझाना स्त्रीका धर्म है, अधिकार है। पत्नीको तो अपना खान-पान शुद्ध ही रखना चाहिये।
प्रश्न—पति मार-पीट करे, दु:ख दे तो पत्नीको क्या करना चाहिये?
उत्तर—पत्नीको तो यही समझना चाहिये कि मेरे पूर्वजन्मका कोई बदला है, ऋण है, जो इस रूपमें चुकाया जा रहा है; अत: मेरे पाप ही कट रहे हैं और मैं शुद्ध हो रही हूँ। पीहरवालोंको पता लगनेपर वे उसको अपने घर ले जा सकते हैं; क्योंकि उन्होंने मार-पीटके लिये अपनी कन्या थोड़े ही दी थी!
प्रश्न—अगर पीहरवाले भी उसको अपने घर न ले जायँ तो वह क्या करे?
उत्तर—फिर तो उसको अपने पुराने कर्मोंका फल भोग लेना चाहिये, इसके सिवाय बेचारी क्या कर सकती है! उसको पतिकी मार-पीट धैर्यपूर्वक सह लेनी चाहिये। सहनेसे पाप कट जायँगे और आगे सम्भव है कि पति स्नेह भी करने लग जाय। यदि वह पतिकी मार-पीट न सह सके तो पतिसे कहकर उसको अलग हो जाना चाहिये और अलग रहकर अपनी जीविका-सम्बन्धी काम करते हुए एवं भगवान् का भजन-स्मरण करते हुए निधड़क रहना चाहिये।
पुरुषको कभी भी स्त्रीपर हाथ नहीं चलाना चाहिये। शिखण्डी भीष्मजीको मारनेके लिये ही पैदा हुआ था; परन्तु वह जब युद्धमें भीष्मजीके सामने आता है, तब भीष्मजी बाण चलाना बन्द कर देते हैं। कारण कि शिखण्डी पूर्वजन्ममें स्त्री था और इस जन्ममें भी स्त्रीरूपसे ही जन्मा था, पीछे उसको पुरुषत्व प्राप्त हुआ था। अत: भीष्मजी उसको स्त्री ही मानते हैं और उसपर बाण नहीं चलाते।
विपत्तिके दिन किसी पापके कारण ही आते हैं। उसमें उत्साहपूर्वक भगवान् का भजन-स्मरण करनेसे दुगुना लाभ होता है। एक तो पापोंका नाश होता है और दूसरा भगवान् को पुकारनेसे भगवद्विश्वास बढ़ता है। अत: विपत्ति आनेपर स्त्रियोंको हिम्मत नहीं हारनी चाहिये।
विपत्ति आनेपर आत्महत्या करनेका विचार भी मनमें नहीं लाना चाहिये; क्योंकि आत्महत्या करनेका बड़ा भारी पाप लगता है। किसी मनुष्यकी हत्याका जो पाप लगता है, वही पाप आत्महत्याका लगता है। मनुष्य सोचता है कि आत्महत्या करनेसे मेरा दु:ख मिट जायगा, मैं सुखी हो जाऊँगा। यह बिलकुल मूर्खताकी बात है; क्योंकि पहलेके पाप तो कटे नहीं, नया पाप और कर लिया! जिन्होंने आत्महत्याका प्रयास किया और बच गये, उनसे यह बात सुनी है कि आत्महत्या करनेमें बड़ा भारी कष्ट होता है और पश्चात्ताप होता है कि मैं ऐसा नहीं करता तो अच्छा रहता, अब क्या करूँ? आत्महत्या करनेवाले प्राय: भूत-प्रेत बनते हैं और वहाँ भूखे-प्यासे रहते हैं, दु:ख पाते हैं। तात्पर्य है कि आत्महत्या करनेवालोंकी बड़ी भारी दुर्गति होती है।
प्रश्न—अगर पति त्याग कर दे तो स्त्रीको क्या करना चाहिये?
उत्तर—वह अपने पिताके घरपर रहे। पिताके घरपर रहना न हो सके तो ससुराल अथवा पीहरवालोंके नजदीक किरायेका कमरा लेकर उसमें रहे और मर्यादा, संयम, ब्रह्मचर्यपूर्वक अपने धर्मका पालन करे, भगवान् का भजन-स्मरण करे। पितासे या ससुरालसे जो कुछ मिला है, उससे अपना जीवन-निर्वाह करे। अगर धन पासमें न हो तो घरमें ही रहकर अपने हाथोंसे कातना-गूँथना, सीना-पिरोना आदि काम करके अपना जीवन-निर्वाह करे। यद्यपि इसमें कठिनता होती है, पर तपमें कठिनता ही होती है, आराम नहीं होता। इस तपसे उसमें आध्यात्मिक तेज बढ़ेगा, उसका अन्त:करण शुद्ध होगा।
माता-पिता, भाई-भौजाई आदिको विशेष ध्यान देना चाहिये कि बहन-बेटी धर्मकी मूर्ति होती है; अत: उसका पालन-पोषण करनेका बहुत पुण्य होता है। उनको यह उक्ति अक्षरश: चरितार्थ कर लेनी चाहिये—‘बिपति काल कर सतगुन नेहा’ (मानस, किष्किन्धा० ७।३) अर्थात् विपत्तिके समय बहन-बेटी आदिसे सौगुना स्नेह करे। यदि वे ऐसा न कर सकें तो लड़कीको विचार करना चाहिये कि जंगलमें रहनेवाले प्राणियोंका भी भगवान् पालन-पोषण करते हैं, तो क्या वे मेरा पालन-पोषण नहीं करेंगे! सबके मालिक भगवान् के रहते हुए मैं अनाथ कैसे हो सकती हूँ! इस बातको दृढ़तासे धारण करके भगवान् के भरोसे निधड़क रहना चाहिये, निर्भय, नि:शोक, निश्चिन्त और नि:शंक रहना चाहिये। एक विधवा बहन थी। उसके पास कुछ नहीं था। ससुरालवालोंने उसके गहने भी दबा लिये। वह कहती थी कि मुझे चिन्ता है ही नहीं! दो हाथोंके पीछे एक पेट है, फिर चिन्ता किस बातकी!
लड़कियोंको बचपनसे ही कातना-गूँथना, सीना-पिरोना, पढ़ना-पढ़ाना आदि सीख लेना चाहिये। विवाह होनेपर पतिकी सेवामें कमी नहीं रखनी चाहिये, पर भीतरमें भरोसा भगवान् का ही रखना चाहिये। असली सहारा भगवान् का ही है। ऐसा सहारा न पतिका है, न पुत्रका है और न शरीरका ही है—यह बिलकुल सच्ची बात है। अत: यदि पति त्याग कर दे तो घबराना नहीं चाहिये। इस विषयमें अपनी कोई त्रुटि हो तो तत्काल सुधार कर लेना चाहिये और अपनी कोई त्रुटि न हो तो बिलकुल निधड़क रहना चाहिये। हृदयमें कमजोरी तो अपने भाव और आचरण ठीक न रहनेसे ही आती है। अपने भाव और आचरण ठीक रहनेसे हृदयमें कमजोरी कभी आती ही नहीं। अत: अपने भावों और आचरणोंको सदा शुद्ध, पवित्र रखते हुए भगवान् का भजन-स्मरण करते रहना चाहिये। भगवान् के भरोसे किसी बातकी परवाह नहीं करनी चाहिये।
आजके युवकोंको चाहिये कि वे स्त्रियोंको छोड़ें नहीं। स्त्रीका त्याग करना महापाप है, बड़ा भारी अन्याय है। ऐसा करनेवाले भयंकर नरकोंमें जाते हैं।
प्रश्न—पुरुष दूसरा विवाह कर सकता है या नहीं?
उत्तर—अगर पहली स्त्रीसे सन्तान न हुई हो तो पितृऋणसे मुक्त होनेके लिये, केवल सन्तान-उत्पत्तिके लिये पुरुष शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार दूसरा विवाह कर सकता है। अपने सुखभोगके लिये वह दूसरा विवाह नहीं कर सकता; क्योंकि यह मनुष्य-शरीर अपने सुख-भोगके लिये है ही नहीं।
पुनर्विवाह अपनी पूर्वपत्नीकी आज्ञासे, सम्मतिसे ही करना चाहिये और पत्नीको भी चाहिये कि वह पितृऋणसे मुक्त होनेके लिये पुनर्विवाहकी आज्ञा दे दे। पुनर्विवाह करनेपर भी पतिको अपनी पूर्वपत्नीका अधिकार सुरक्षित रखना चाहिये; उसका तिरस्कार, निरादर कभी नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उसको बड़ी मानकर दोनोंको उसका सम्मान करना चाहिये।
जिसकी सन्तान तो हो गयी, पर स्त्री मर गयी, उसको पुनर्विवाह करनेकी जरूरत ही नहीं है; क्योंकि वह पितृऋणसे मुक्त हो गया। परन्तु जिसकी भोगासक्ति नहीं मिटी है, वह पुनर्विवाह कर सकता है; क्योंकि अगर वह पुनर्विवाह नहीं करेगा तो वह व्यभिचारमें प्रवृत्त हो जायगा, वेश्यागामी हो जायगा, जिससे उसको भयंकर पाप लगेगा। अत: इस पापसे बचनेके लिये और मर्यादामें रहनेके लिये उसको शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार पुनर्विवाह कर लेना चाहिये।
प्रश्न—पहले राजालोग अनेक विवाह करते थे तो क्या ऐसा करना उचित था?
उत्तर—जो राजालोग अपने सुखभोगके लिये अधिक विवाह करते थे, वे आदर्श नहीं माने गये हैं। केवल राजा होनेमात्रसे कोई आदर्श नहीं हो जाता। जो शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार चलते थे, धर्मका पालन करते थे, वे ही राजालोग आदर्श माने गये हैं।
वास्तवमें विवाह करना कोई ऊँचे दर्जेकी चीज नहीं है और आवश्यक भी नहीं है। आवश्यक तो परमात्मप्राप्ति करना है। इसीके लिये मनुष्य-शरीर मिला है, विवाह करनेके लिये नहीं। स्त्री-पुरुषका संग तो देवतासे लेकर भूत-प्रेत आदितक स्थावर-जंगम हरेक योनिमें होता है; अत: यह कोई महत्ताकी बात नहीं है। परन्तु परमात्मप्राप्तिका अवसर, अधिकार, योग्यता आदि तो मनुष्यजन्ममें ही है। मनुष्य परमात्मप्राप्तिका जन्मजात अधिकारी है। जो विचारके द्वारा अपनी विषयासक्तिको, भोगासक्तिको नहीं छोड़ पाते, ऐसे कमजोर मनुष्योंके लिये ही विवाहका विधान किया गया है। भोगोंको भोगकर उनसे विरक्त होनेके लिये, उनमें अरुचि करनेके लिये ही गृहस्थाश्रममें प्रवेश करना चाहिये। जो विषयासक्तिको नहीं छोड़ पाते, उनपर ही पितृऋण रहता है अर्थात् उपकुर्वाण ब्रह्मचारीपर ही वंश-परम्परा चलानेका दायित्व रहता है, नैष्ठिक ब्रह्मचारी और भगवान् के भक्तपर नहीं। तात्पर्य है कि पितृऋण उसी पुरुषपर रहता है, जो भोगासक्ति नहीं मिटा सका। जिसमें भोगासक्ति नहीं है, उसपर कोई ऋण रहता ही नहीं, चाहे वह कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, भक्तियोगी आदि कोई भी क्यों न हो! कारण कि इन्कमपर ही टैक्स लगता है, मालपर ही जगात लगती है। जिसके पास इन्कम है ही नहीं, उसपर टैक्स किस बातका? माल है ही नहीं तो जगात किस बातकी?
प्रश्न—स्त्री पुनर्विवाह क्यों नहीं कर सकती?
उत्तर—माता-पिताने कन्यादान कर दिया तो अब उसकी कन्या संज्ञा ही नहीं रही; अत: उसका पुन: दान कैसे हो सकता है? अब उसका पुनर्विवाह करना तो पशुधर्म ही है।
सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते।
सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सतां सकृत्॥
(मनुस्मृति ९।४७; महाभारत वन० २९४।२६)
‘कुटुम्बमें धन आदिका बँटवारा एक ही बार होता है, कन्या एक ही बार दी जाती है और ‘मैं दूँगा’—यह वचन भी एक ही बार दिया जाता है। सत्पुरुषोंके ये तीनों कार्य एक ही बार होते हैं।’
शास्त्रीय, धार्मिक, शारीरिक और व्यावहारिक—चारों ही दृष्टियोंसे स्त्रीके लिये पुनर्विवाह करना अनुचित है। शास्त्रीय दृष्टिसे देखा जाय तो शास्त्रमें स्त्रीको पुनर्विवाहकी आज्ञा नहीं दी गयी है। धार्मिक दृष्टिसे देखा जाय तो पितृऋण पुरुषपर ही रहता है। स्त्रीपर पितृऋण आदि कोई ऋण नहीं है। शारीरिक दृष्टिसे देखा जाय तो स्त्रीमें कामशक्तिको रोकनेकी ताकत है, एक मनोबल है। व्यावहारिक दृष्टिसे देखा जाय तो पुनर्विवाह करनेपर उस स्त्रीकी पूर्वसन्तान कहाँ जायगी? उसका पालन-पोषण कौन करेगा? क्योंकि वह स्त्री जिससे विवाह करेगी, वह उस सन्तानको स्वीकार नहीं करेगा। अत: स्त्रीजातिको चाहिये कि वह पुनर्विवाह न करके ब्रह्मचर्यका पालन करे, संयमपूर्वक रहे।
शास्त्रमें तो यहाँतक कहा गया है कि जिस स्त्रीकी पाँच-सात सन्तानें हैं, वह भी यदि पतिकी मृत्युके बाद ब्रह्मचर्यका पालन करती है तो वह नैष्ठिक ब्रह्मचारीकी गतिमें जाती है। फिर जिसकी सन्तान नहीं है, वह यदि पतिके मरनेपर ब्रह्मचर्यका पालन करती है तो उसकी नैष्ठिक ब्रह्मचारीकी गति होनेमें कहना ही क्या है?
प्रश्न—यदि युवा स्त्री विधवा हो जाय तो उसको क्या करना चाहिये?
उत्तर—जीवित अवस्थामें पति जिन बातोंको अच्छा मानते थे और जो बातें उनके अनुकूल थीं, उनकी मृत्युके बाद भी विधवा स्त्रीको उन्हींके अनुसार आचरण करते रहना चाहिये। उसको ऐसा विचार करना चाहिये कि भगवान् ने जो प्रतिकूलता भेजी है, यह मेरी तपस्याके लिये है। जान-बूझकर की गयी तपस्यासे यह तपस्या बहुत ऊँची है। भगवान् के विधानके अनुसार किये गये तप, संयमकी बहुत अधिक महिमा है। ऐसा विचार करके उसको मनमें हर समय उत्साह रखना चाहिये कि मैं कैसी भाग्यशालिनी हूँ कि भगवान् ने मेरेको ऐसा तप करनेका सुन्दर अवसर दिया है! भागवतमें आया है—
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते
जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्॥
(श्रीमद्भा० १०।१४।८)
‘जो मनुष्य क्षण-क्षणपर बड़ी उत्सुकतासे आपकी कृपाका ही भलीभाँति अनुभव करता रहता है और प्रारब्धानुसार जो कुछ सुख या दु:ख प्राप्त होता है, उसे निर्विकार मनसे भोग लेता है एवं जो प्रेमपूर्ण हृदय, गद्गद वाणी और पुलकित शरीरसे अपनेको आपके चरणोंमें समर्पित करता रहता है—इस प्रकार जीवन व्यतीत करनेवाला मनुष्य ठीक वैसे ही आपके परमपदका अधिकारी हो जाता है, जैसे अपने पिताकी सम्पत्तिका पुत्र!’
विधवा स्त्रीको अपने चरित्रकी विशेष रक्षा करनी चाहिये। अगर वह व्यभिचार करती है तो वह अपने दोनों कुलोंको कलङ्कित करती है, मर्यादाका नाश करती है और मरनेके बाद घोर नरकोंमें जाती है। अत: उसको मर्यादामें रहना चाहिये, धर्म-विरुद्ध काम नहीं करना चाहिये। माता कुन्तीकी तरह उसको अपने वैधव्य-धर्मका पालन करना चाहिये। माता कुन्तीको याद करनेसे अपने धर्मके पालनका बल मिलता है।
प्रश्न—आजकल स्त्रीको पुरुषके समान अधिकार देनेकी बात कही जाती है, क्या यह ठीक है?
उत्तर—यह ठीक नहीं है। वास्तवमें स्त्रीका समान अधिकार नहीं है, प्रत्युत विशेष अधिकार है! कारण कि वह अपने पिता आदिका त्याग करके पतिके घरपर आयी है; अत: घरमें उसका विशेष अधिकार होता है। वह घरकी मालकिन, बहूरानी कहलाती है। बाहर पतिका विशेष अधिकार होता है। जैसे रथ दो पहियोंसे चलता है, पर दोनों पहिये अलग-अलग होते हैं। अगर दोनों पहियोंको एक साथ लगा दिया जाय तो रथ कैसे चलेगा? जैसे दोनों पहिये अलग-अलग होनेसे ही रथ चलता है, ऐसे ही पति और पत्नीका अपना अलग-अलग अधिकार होनेसे ही गृहस्थ चलता है। अगर समान अधिकार दिया जाय तो स्त्रीकी तरह पुरुष गर्भ-धारण कैसे करेगा? अत: अपना-अपना अधिकार ही समान अधिकार है। इसीमें दोनोंकी स्वतन्त्रता है।
अपना-अपना अधिकार ही श्रेष्ठ है, उत्तम है। हमारेको थोड़ा अधिकार दिया गया है और पुरुषको ज्यादा अधिकार दिया गया है—इस बातको लेकर ही भीतरमें यह वासना होती है कि हमारेको समान अधिकार मिले, पूरा अधिकार मिले। इस वासनामें हेतु है—बेसमझी, मूर्खता। समझदारी हो तो थोड़ा ही अधिकार बढ़िया है। कर्तव्य अधिक होना चाहिये। कर्तव्यका दास अधिकार है, पर अधिकारका दास कर्तव्य नहीं है। यदि अपने कर्तव्यका तत्परतासे पालन किया जाय तो संसार, सन्त-महात्मा, शास्त्र और भगवान्—ये सब अधिकार दे देते हैं।
अधिकार प्राप्त करनेकी इच्छा जन्म-मरणका हेतु है और नरकोंमें ले जानेवाली है। हमने देखा है कि एक मोहल्लेका कुत्ता दूसरे मोहल्लेमें जाता है तो उस मोहल्लेका कुत्ता उसको काटनेके लिये दौड़ता है। दोनों कुत्ते आपसमें लड़ते हैं। आगन्तुक कुत्ता नीचे गिर जाय, पैर ऊपर कर दे, नम्रता स्वीकार कर ले तो उस मोहल्लेका कुत्ता उसके ऊपर खड़ा होकर राजी हो जाता है। कारण कि वह उस मोहल्लेपर अपना अधिकार मानता है, पर आगन्तुक कुत्ता उस मोहल्लेपर अपना अधिकार नहीं मानता, उसके सामने नम्रता स्वीकार कर लेता है तो लड़ाई मिट जाती है। इससे सिद्ध होता है कि अधिक अधिकार पानेकी लालसा तो कुत्तोंके भीतर भी रहती है। ऐसी ही लालसा यदि मनुष्योंके भीतर भी रहे तो मनुष्यता कैसी? अधिक अधिकार पानेकी लालसा नीच मनुष्योंमें होती है। जो श्रेष्ठ मनुष्य होते हैं, वे अपने कर्तव्यका ही उत्साहपूर्वक तत्परतासे पालन करते हैं। कर्तव्यका पालन करनेसे उनका अधिकार स्वत: ऊँचा हो जाता है।
वास्तवमें देखा जाय तो स्त्रियोंका अधिकार कम नहीं है। वे घरकी मालकिन, गृहलक्ष्मी कहलाती हैं। घरके जितने भी लोग बाहर काम-धंधा करते हैं, वे आकर स्त्रियोंका ही आश्रय लेते हैं। स्त्रियाँ घरभरके प्राणियोंको आश्रय देनेवाली होती हैं। वे सबकी सेवा करती हैं, सबका पालन करती हैं। अत: उनका अधिकार ज्यादा है। परन्तु जब वे अपने कर्तव्यसे च्युत हो जाती हैं, तभी उनके मनमें अधिक अधिकार पानेकी लालसा पैदा होती है।
प्रश्न—आजकल मँहगाईके जमानेमें स्त्री भी नौकरी करे तो क्या हर्ज है?
उत्तर—स्त्रीका हृदय कोमल होता है, अत: वह नौकरीका कष्ट, ताड़ना, तिरस्कार आदि नहीं सह सकती। थोड़ी भी विपरीत बात आते ही उसके आँसू आ जाते हैं। नौकरीको चाहे गुलामी कहो, चाहे दासता कहो, चाहे तुच्छता कहो, एक ही बात है। गुलामीको पुरुष तो सह सकता है, पर स्त्री नहीं सह सकती। अत: नौकरी, खेती, व्यापार आदिका काम पुरुषोंके जिम्मे है और घरका काम स्त्रियोंके जिम्मे है। अत: स्त्रियोंकी प्रतिष्ठा, आदर घरका काम करनेमें ही है। बाहरका काम करनेमें स्त्रियोंका तिरस्कार है। यदि स्त्री प्रतिष्ठासहित उपार्जन करे तो कोई हर्ज नहीं है अर्थात् वह अपने घरमें ही रहकर जीविका-उपार्जन कर सकती है; जैसे—स्वेटर आदि बनाना, कपड़े सीना, पिरोना, बेलपत्ती आदि निकालना, भगवान् के चित्र सजाना आदि। ऐसा काम करनेसे वह किसीकी गुलाम, पराधीन नहीं रहेगी।
लड़ाई-झगड़ेका समाधान
प्रश्न—परिवारमें झगड़ा, कलह, अशान्ति आदि होनेका क्या कारण है?
उत्तर—हरेक प्राणी अपने मनकी कराना चाहता है, अपनी अनुकूलता चाहता है, अपना सुख-आराम चाहता है, अपनी महिमा चाहता है, अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है—ऐसे व्यक्तिगत स्वार्थके कारण ही परिवारमें झगड़ा, कलह, अशान्ति आदि होते हैं। जैसे, कुत्ते आपसमें बड़े प्रेमसे खेलते हैं, पर रोटीका टुकड़ा सामने आते ही लड़ाई शुरू हो जाती है; अत: लड़ाईका कारण रोटीका टुकड़ा नहीं है, प्रत्युत व्यक्तिगत स्वार्थ है।
कुटुम्बमें जो केवल अपना सुख-आराम चाहता है, वह कुटुम्बी नहीं होता, प्रत्युत एक व्यक्ति होता है। कुटुम्बी वही होता है, जो कुटुम्बमें बड़े, छोटे और समान अवस्थावाले—सबका हित चाहता है और हित करता है। अत: जो कुटुम्बमें शान्ति चाहता है, कलह नहीं चाहता, उसको अपना कर्तव्य और दूसरोंका अधिकार देखना चाहिये अर्थात् अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये और दूसरोंका हित करना चाहिये, आदर-सत्कार, सुख-आराम देना चाहिये।
प्रश्न—भाई-भाई आपसमें लड़ें तो माता-पिताको क्या करना चाहिये?
उत्तर—माता-पिताको न्यायकी बात कहनी चाहिये। वे छोटे पुत्रसे कहें कि तुम भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्नको देखो कि वे रामजीके साथ कैसा बर्ताव करते थे; भीम, अर्जुन आदि अपने बड़े भाई युधिष्ठिरके साथ कैसा बर्ताव करते थे। बड़े पुत्रसे कहें कि तुम रामजीको देखो कि उन्होंने अपने छोटे भाइयोंके साथ कैसा बर्ताव किया था*; और युधिष्ठिर अपने छोटे भाइयोंके साथ कैसा बर्ताव करते थे। अत: तुम सबलोग उनके चरित्रोंको आदर्श मानकर अपने आचरणमें लाओ।
प्रश्न—बहन-भाई आपसमें लड़ें तो माता-पिताको क्या करना चाहिये?
उत्तर—माता-पिताको लड़कीका पक्ष लेना चाहिये; क्योंकि वह सुवासिनी है, दानकी पात्र है*, थोड़े दिन रहनेवाली है; अत: वह आदरणीय है। लड़का तो घरका मालिक है, घरमें ही रहनेवाला है। लड़केको एकान्तमें समझाना चाहिये कि ‘बेटा! बहनका निरादर मत करो। यह यहाँ रहनेवाली नहीं है। यह तो अपने घर चली जायगी। तुम तो यहाँके मालिक हो।’
बहनको चाहिये कि वह भाईसे कुछ भी आशा न रखे। भाई जितना दे, उसमेंसे थोड़ा ही ले। उसको यह सोचना चाहिये कि भाईके घरसे लेनेसे हमारा काम थोड़े ही चलेगा! हमारा काम तो हमारे घरसे ही चलेगा।
प्रश्न—बेटा और बहू आपसमें लड़ें तो माता-पिताका क्या कर्तव्य होता है?
उत्तर—माता-पिता उन दोनोंको समझायें कि हम कबतक बैठे रहेंगे? इस घरके मालिक तो आप ही हो। यदि आप ही परस्पर लड़ोगे तो इस कुटुम्बका पालन कौन करेगा? क्योंकि भार तो सब आपपर ही है।
बेटेको अलगसे समझाना चाहिये कि बेटा! तुम्हारे लिये ही तुम्हारी पत्नीने अपने माता-पिता आदि सबका त्याग किया है। तुम तो अपने बापकी गद्दीपर बैठे हुए हो, तुमने क्या त्याग किया? अत: ऐसी त्यागमूर्ति स्त्रीको तन, मन, धन आदिसे प्रसन्न रखना, उसका पालन करना तुम्हारा खास कर्तव्य है। पर हाँ, यह याद रखना कि तुम पति हो; अत: स्त्रीकी दासतामें मत फँसना, उसका गुलाम मत बनना। जिसमें उसका हित हो, आसक्तिरहित होकर वही कार्य करो। मनुष्यमात्रका यह कर्तव्य है कि वह जीवमात्रका हित करे। तुम एक पत्नीका भी हित नहीं करोगे तो क्या करोगे?
पुत्रवधूको समझाना चाहिये कि बेटी! तुमने केवल पतिके लिये अपने माता-पिता, भाई-भौजाई, भतीजे आदि सबका त्याग कर दिया, अब उसको भी राजी नहीं रख सकती, उसकी भी सेवा नहीं कर सकती तो और क्या कर सकती हो। कोई समुद्र तर जाय, पर किनारेपर आकर डूब जाय तो यह कितनी शर्मकी बात है! तुमको तो एक ही व्रत निभाना है—
एकइ धर्म एक ब्रत नेमा।
कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥
(मानस, अरण्य० ५।४)
प्रश्न—ननद (लड़की) और भौजाई (बहू) आपसमें लड़ें तो माता-पिताको क्या करना चाहिये?
उत्तर—माँ लड़कीको समझाये कि ‘देखो बेटी! यह (भौजाई) तो आजकलकी छोरी है। यह कुछ भी कह दे, तुम बड़ी समझकर इसका आदर करो। यह घरकी मालकिन है; अत: तुम मेरेसे भी बढ़कर विशेषतासे इसका आदर करो। मेरा आदर कम करोगी तो मैं जल्दी नाराज नहीं होऊँगी; क्योंकि मेरी कन्या होनेके नाते मेरे साथ तुम्हारी ममता है।’
भौजाईको चाहिये कि वह ननदका ज्यादा आदर करे; क्योंकि वह अतिथिकी तरह आयी है। वह ननदके बच्चोंको अपने बच्चोंसे भी ज्यादा प्यार करे*। बच्चे राजी होनेसे उनकी माँ भी राजी हो जाती है—यह सिद्धान्त है। इस तरह ननदको राजी रखना चाहिये। दूसरोंको राजी रखना अपने कल्याणमें कारण है।
बेटीमें मोह होनेके कारण माँ बेटीको कुछ देना चाहे तो बेटीको नहीं लेना चाहिये। बेटीको माँसे कहना चाहिये कि ‘मेरी भौजाई देगी, तभी मैं लूँगी। अगर तू देगी तो भौजाईको बुरा लगेगा और वह आपसे लड़ेगी तो मैं कलह कराने यहाँ थोड़े ही आयी हूँ! माँ! तेरेसे लूँगी तो थोड़े ही दिन मिलेगा, पर भौजाईके हाथसे लूँगी तो बहुत दिनतक मिलता रहेगा। अत: त्यागदृष्टिसे, व्यवहारदृष्टिसे और स्वार्थदृष्टिसे भौजाईके हाथसे लेना ही अच्छा है।’
प्रश्न—बड़ा भाई माता-पितासे लड़े तो छोटे भाइयोंका क्या कर्तव्य है?
उत्तर—छोटे भाई बड़े भाईके चरणोंमें प्रणाम करके प्रार्थना करें कि ‘भाई साहब! आप ऐसा बर्ताव करोगे तो हमलोग किसको आदर्श मानेंगे? अत: आप हमलोगोंपर कृपा करके माँ-बापके साथ अच्छा-से-अच्छा बर्ताव करो। ऐसा करनेसे आपको दो प्रकारसे लाभ होगा, एक तो आपके अच्छे बर्तावका कुटुम्बपर, मोहल्लेपर अच्छा असर पड़ेगा और दूसरा, आपके आचरणोंको देखकर हमलोग भी वैसा ही आचरण करेंगे, जिसका आपको पुण्य होगा। अत: आपका आचरण आदर्श होना चाहिये। हम तो आपसे केवल प्रार्थना ही कर सकते हैं; क्योंकि आप हमारे पिताके समान हैं।’
प्रश्न—छोटे भाई माता-पितासे लड़ें तो बड़े भाईका क्या कर्तव्य है?
उत्तर—बड़ा भाई छोटे भाइयोंको समझाये कि ‘देखो भाई! मैं और आप सब बालक हैं। माता-पिता हमारे लिये सर्वथा आदरणीय हैं, पूज्य हैं। जिस शरीरसे हम भगवत्प्राप्ति कर सकते हैं, वह हमें माता-पिताकी कृपासे ही मिला है। हम उनके ऋणसे कभी मुक्त नहीं हो सकते। हाँ, हम उनके अनुकूल होंगे तो उनके राजी होनेसे वह ऋण माफ हो सकता है। हम अपने चमड़ेकी जूती बनाकर माता-पिताको पहना दें तो भी उनका ऋण नहीं चुका सकते; क्योंकि वह चमड़ा आया कहाँसे? उनकी वस्तु ही उनको दी है, हमने अपना क्या दिया? उनकी वस्तुको हम अपना मानते हैं, यही गलती है। वे हमारेको चाहे जैसा रखें, उनका हमपर पूरा अधिकार है।’
प्रश्न—बहन माता-पितासे लड़े तो भाईका क्या कर्तव्य है?
उत्तर—भाई न्याय देखे और न्यायमें भी वह बहनका पक्ष ले और माता-पितासे कहे कि यह तो अतिथिकी तरह आयी है। इसका लाड़-प्यार करना चाहिये। परन्तु बहनका अन्याय हो तो बहनको एकान्तमें समझाये कि बहन! आपसमें प्रेमकी ही महिमा है, कलहकी नहीं। माँ-बाप आदरणीय हैं। अत: तुम और हम सब माँ-बापका आदर करें। तुच्छ चीजोंके लिये उनका निरादर क्यों करें?
प्रश्न—छोटा भाई भौजाईसे लड़े तो बड़े भाईका क्या कर्तव्य है?
उत्तर—बड़ा भाई छोटे भाईको धमकाये कि ‘तुम क्या कर रहे हो? शास्त्रकी दृष्टिसे बड़े भाईकी स्त्री माँके समान होती है। लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नने सीताजीके साथ कैसा बर्ताव किया था; उनके चरित्रोंको बार-बार पढ़ो और मनन करो, जिससे तुम्हारे भीतर निर्मल भाव पैदा होंगे, तुम्हारी बुद्धि स्वाभाविक ही शुद्ध हो जायगी।’
प्रश्न—जेठानी और देवरानी आपसमें लड़ें तो भाइयोंको क्या करना चाहिये?
उत्तर—वे अपनी-अपनी स्त्रीको समझायें। छोटा भाई अपनी स्त्रीको समझाये कि ‘देखो! तुम्हें मेरे बड़े भाईको पिताके समान और भौजाईको माँके समान समझकर उनका आदर करना चाहिये।’ बड़ा भाई अपनी स्त्रीको समझाये कि ‘तुम्हारे लिये मेरा छोटा भाई पुत्रके समान और उसकी स्त्री पुत्रीके समान है; अत: तुम्हें उनको प्यार करना चाहिये। उसकी स्त्री कुछ भी कह दे, तुम्हें उसको क्षमा कर देना चाहिये; क्योंकि तुम बड़ी हो। अगर तुम उसकी बात नहीं सहोगी तो तुम्हारा दर्जा बड़ा कैसे हुआ? उसकी बातोंको सहनेसे, उसको प्यार करनेसे ही तो दर्जा ऊँचा होगा! क्रोध करनेवाला अन्तमें हार जाता है और दूसरेके क्रोधको धैर्यपूर्वक सहनेवाला जीत जाता है।
दोनों भाइयोंको यह सावधानी रखनी चाहिये कि वे स्त्रियोंकी कलहको अपनेमें न लायें। स्त्रियोंमें सहनेकी शक्ति (स्वभाव) कम होती है; अत: भाइयोंको बड़ी सावधानीसे बर्ताव करना चाहिये, जिससे आपसमें खटपट न हो। अगर स्त्रियोंकी आपसमें बने ही नहीं तो अलग-अलग हो जाना चाहिये*, पर अलग-अलग भी प्रेमके लिये ही होना चाहिये। यदि अलग-अलग होकर भी आपसमें खटपट रहती है तो फिर अलग-अलग होनेसे क्या हुआ? अत: प्रेमके लिये ही साथ रहना है और प्रेमके लिये ही अलग होना है। अलग होनेपर अपने हिस्सेके लिये कलह भी नहीं होनी चाहिये। छोटे भाईको चाहिये कि बड़ा भाई जितना दे दे, उतना ही ले ले, पर बड़े भाईको चाहिये कि वह अपनी दृष्टिसे छोटे भाईको अधिक दे; क्योंकि वह छोटा है, प्यारका पात्र है। अपनी दृष्टिसे अधिक देनेपर भी यदि छोटा भाई (अपनी दृष्टिसे) ठीक न माने तो बड़े भाईको छोटे भाईकी दृष्टिका ही आदर करना चाहिये, अपनी दृष्टिका नहीं।
त्याग ही बड़ी चीज है। तुच्छ चीजोंके लिये राग-द्वेष करना बड़ी भारी भूल है; क्योंकि चीजें तो यहीं रह जायँगी, पर राग-द्वेष साथमें जायँगे। इसलिये मनुष्यको हरदम सावधान रहना चाहिये और अपने अन्त:करणको कभी मैला नहीं करना चाहिये।
प्रश्न—पुत्र आपसमें लड़ें तो भाइयोंको क्या करना चाहिये?
उत्तर—जहाँतक बने, अपने पुत्रका पक्ष न लें, भाईके पुत्रका पक्ष लें। यदि भाईके पुत्रका अन्याय हो तो उसको शान्तिसे समझाना चाहिये। तात्पर्य है कि अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करें तो सबके साथ अच्छा बर्ताव होगा।
प्रश्न—माँ और पत्नी (सास और बहू) आपसमें लड़ें तो पुत्रका क्या कर्तव्य होता है?
उत्तर—ऐसी स्थितिमें पुत्रके लिये बड़ी आफत होती है! वह अगर माँका पक्ष ले तो स्त्री रोने लग जाती है और स्त्रीका पक्ष ले तो माँ दु:खी हो जाती है कि यह तो स्त्रीका हो गया, मेरा नहीं रहा! ऐसे समयमें पुत्र तो विशेषतासे माँका ही आदर करे, माँकी ही बात रखे और स्त्रीको एकान्तमें समझाये कि ‘मेरी माँके समान मेरे लिये और तेरे लिये भी पूजनीय, आदरणीय और कोई नहीं है। उसके समान हम दोनोंका हित करनेवाला और हित चाहनेवाला भी और कोई नहीं है। माँ तेरेको खरी-खोटी सुना भी दे, तो भी भीतरसे वह कभी तेरा अहित नहीं चाहती, प्रत्युत सदा हित ही चाहती है। अगर तू मेरेको राजी रखना चाहती है तो माँको राजी रख। पुत्रको चाहिये कि वह स्त्रीके वशमें होकर, उसके कहनेमें आकर किसीसे कलह, लड़ाई, द्वेष न करे। स्त्रीके कहनेमें आकर माँ, बहन आदिका तिरस्कार, अपमान कर देना बहुत बड़ा अपराध है।
माँको भी एकान्तमें समझाये कि ‘माँ! यह बेचारी अपने माँ-बाप, भाई-भौजाई आदि सबको छोड़कर आयी है; अत: आप ही इसका लाड़-प्यार कर सकती हैं। इसका दु:ख सुननेवाला दूसरा कौन है? यह अपने सुख-दु:खकी बात किससे कहे? आप ही इसकी माँ हैं। इसके द्वारा आपके मनके प्रतिकूल बर्ताव भी हो जाय तो भी सहन करके इसको निभाना चाहिये। हम दोनों ही इसका खयाल नहीं करेंगे तो यह कहाँ जायगी? अत: माँ! इसको क्षमा कर दें। मैंने बचपनमें कई बार आपकी गोदीमें टट्टी-पेशाब कर दिया, पर आपने मेरेको अपना ही अंग मानकर मेरेपर कभी गुस्सा नहीं किया, प्रत्युत क्षमा कर दिया और उसको मेरा अपराध माना ही नहीं। ऐसे ही इसको अपना अंग समझकर क्षमा कर दें। जैसे दाँतोंसे जीभ कट जाय तो दाँतोंके साथ वैर नहीं होता, उनपर गुस्सा नहीं आता, ऐसे ही इसके द्वारा कोई अपकार भी हो जाय तो आपको गुस्सा नहीं आना चाहिये; क्योंकि यह आपका ही अंग है। जैसे मैं आपका अंग हूँ, ऐसे ही मेरा अंग होनेसे यह भी आपका ही अंग हुआ।’
प्रश्न—पत्नी और पुत्रवधू आपसमें लड़ें तो पति (ससुर)-को क्या करना चाहिये?
उत्तर—पतिको चाहिये कि वह अपनी पत्नीको धमकाये और पुत्रवधूको आश्वासन दे कि मैं तुम्हारी सासको समझाऊँगा। अपनी पत्नीको एकान्तमें समझाये कि ‘देखो! तुम ही इसकी माँ हो। यह अपने माता-पिता, भाई-भौजाई आदि सबको छोड़कर हमारे घर आयी है। अत: तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम इसका अपनी पुत्रीकी तरह पालन करो, प्यार करो। यह अपने दु:खकी बात तुम्हारे सिवाय किसको कहेगी? अपना आधार, आश्रय किसको बनायेगी?’
पुत्रवधूको समझाना चाहिये कि ‘देख बेटी! सास जो करती है बहूके हितके लिये ही करती है। पुत्र जन्मता है, तभीसे वह आशा रखती है कि मेरी बहू आयेगी, मेरा कहना करेगी, मेरी सेवा करेगी! ऐसी आशा रखनेवाली सास बहूका अहित कैसे कर सकती है? बचपना होनेके कारण, अपने मनके अनुकूल न होनेसे तेरेको सासकी बात बुरी लगती है। बेटी! तू अपने माँ-बाप आदि सबको छोड़कर यहाँ आयी है तो क्या एक सासको भी राजी नहीं रख सकती! सास कितने दिनकी है? यहाँकी मालकिन तो तुम ही हो। तुम दोनोंकी लड़ाई भले आदमी सुनेंगे तो इसमें दोष (गलती) तुम्हारा ही मानेंगे; जैसे—बड़े-बूढ़े और बालक आपसमें लड़ें तो दोष बच्चोंका ही माना जाता है, बड़े-बूढ़ोंका नहीं। अत: इन सब बातोंको खयालमें रखते हुए तुम्हें अपने व्यवहारका सुधार करना चाहिये, जिससे तुम्हारा व्यवहार सासको बुरा न लगे। कभी तुमसे कटु बर्ताव हो भी जाय तो सासके पैरोंमें पड़कर, रोकर क्षमा माँग लेनी चाहिये। इसका सासपर बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ेगा, जिससे तुम दोनोंकी तथा घरकी शोभा होगी, घर सुखी होगा। एक तुम्हारे बिगड़नेसे पूरा घर अशान्त हो जायगा। घरकी अशान्तिका कारण तुम क्यों बनती हो? तुम बड़ोंकी आज्ञाका पालन करो; सुबह-शाम बड़ोंके चरणोंमें पड़ो। सास कुछ भी कह दे, उसके सामने बोलो मत। जब वह शान्त हो जाय, तब अपने मनकी बात बड़ी शान्तिसे उसको बता दो। वह माने तो ठीक, न माने तो ठीक, तुम्हारा कोई दोष नहीं रहेगा।’
प्रश्न—पिता और माता आपसमें लड़ें तो पुत्रका क्या कर्तव्य है?
उत्तर—जहाँतक बने, पुत्रको माँका पक्ष लेना चाहिये; परन्तु पिताको इस बातका पता नहीं लगना चाहिये कि यह अपनी माँका पक्ष लेता है। पितासे कहना चाहिये कि ‘पिताजी! आप हम सबके मालिक हैं। मेरी माँ कुछ भी कहेगी तो आपसे ही कहेगी। आपके सिवाय उसकी सुननेवाला कौन है? विवाहके समय आपने अग्नि और ब्राह्मणके सामने जो वचन दिये थे, उसका पालन करना चाहिये। माँ अपने दिये हुए वचन निभाती है या नहीं, इसका खयाल न करके आपको अपना ही कर्तव्य निभाना चाहिये। आप मर्यादा रखेंगे तो मेरे और मेरी माँके लोक-परलोक दोनों सुधर जायँगे, नहीं तो हम दोनों कहाँ जायँगे? आपके बिना हमारी क्या दशा होगी? मैं आपको शिक्षा नहीं दे रहा हूँ, केवल याद दिला रहा हूँ। मैं कुछ अनुचित भी कह दूँ तो आपको क्षमा कर देना चाहिये; क्योंकि आप बड़े हैं—‘क्षमा बड़नको चाहिये, छोटनको उत्पात। कहा विष्णुको घट गयो, जो भृगु मारी लात॥’ भृगुने लात मारी तो विष्णुभगवान् का घटा कुछ नहीं, प्रत्युत महिमा ही बढ़ी! अत: आप खुद सोचें। आपको मैं क्या समझाऊँ, आप खुद जानकार हैं।’
परिवारमें कलह न हो—इसके लिये प्रत्येक व्यक्तिका कर्तव्य है कि वह अपने अधिकारका त्याग करके दूसरोंके अधिकारकी रक्षा करे। प्रत्येक व्यक्ति अपना आदर और सम्मान चाहता है; अत: दूसरोंको आदर और सम्मान देना चाहिये।
प्रश्न—सास पुत्रका पक्ष लेकर तंग करे तो बहूको क्या करना चाहिये?
उत्तर—बहूको यही समझना चाहिये कि ये तो घरके मालिक हैं। मैं तो दूसरे घरसे आयी हूँ। अत: ये कुछ भी कहें, कुछ भी करें मुझे तो वही करना है, जिससे ये राजी रहें। बहूको सासके साथ अच्छा बर्ताव करना चाहिये, उससे द्वेष नहीं करना चाहिये। उसको अपने भावोंकी रक्षा करनी चाहिये, अपने भावोंको अशुद्ध नहीं होने देना चाहिये। उसको भगवान् से प्रार्थना करनी चाहिये कि ‘हे नाथ! इनको सद्बुद्धि दो और मेरेको सहिष्णुता दो।’
प्रश्न—पति और ससुर आपसमें लड़ें तो स्त्रीको क्या करना चाहिये?
उत्तर—स्त्रीका कर्तव्य है कि वह अपने पतिको समझाये; जैसे—‘यहाँ जो कुछ है, वह सब पिताजीका ही है। आपकी माँको भी पिताजी ही लाये हैं। धन-सम्पत्ति, जमीन-जायदाद, घर, वैभव आदि सब पिताजीका ही कमाया हुआ है। अत: उनका सब तरहसे आदर करना चाहिये। उनकी बात मानना न्याय है, धर्म है और आपका कर्तव्य है। कुछ भी लिखा-पढ़ी किये बिना आप उनकी सम्पत्तिके स्वत:सिद्ध उत्तराधिकारी हैं। अत: वे कुछ भी कहें, वह सब आपको मान्य होना चाहिये। आपको शरीर, मन, वाणी आदिसे सर्वथा उनका आदर करना चाहिये। वे कभी गुस्सेमें आकर कुछ कह भी दें तो आपको यही सोचना चाहिये कि उनके समान मेरा हित करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। अत: उनका चित्त कभी नहीं दुखाना चाहिये। मैं भी कुछ अनुचित कह दूँ तो आपको मेरी परवाह न करके पिताजीकी बातका ही आदर करना चाहिये।’
प्रश्न—पति और पुत्र आपसमें लड़ें तो स्त्रीको क्या करना चाहिये?
उत्तर—स्त्रीको तो पतिका ही पक्ष लेना चाहिये और पुत्रको समझाना चाहिये कि ‘बेटा! तुम्हारे पिताजी जो कुछ कहें, जो कुछ करें, पर वास्तवमें उनके हृदयमें स्वत: तुम्हारे प्रति हितका भाव है। वे कभी तुम्हारा अहित नहीं कर सकते और दूसरा कोई तुम्हारा अहित करे तो वे सह नहीं सकते। अत: इन भावोंका खयाल रखकर तुम्हें पिताजीकी सेवामें ही तत्पर रहना चाहिये। तुम मेरा आदर भले ही कम करो, पर पिताजीका आदर ज्यादा करो। वास्तवमें हमारे मालिक तो ये ही हैं। मेरा आदर तुम कम भी करोगे तो मैं नाराज नहीं होऊँगी, पर तुम्हारे पिताजी नाराज नहीं होने चाहिये। मैं भी उनको प्रसन्न रखना चाहती हूँ और तुम्हारा भी कर्तव्य है कि उनको प्रसन्न रखो।’
प्रश्न—पत्नी और पुत्र आपसमें लड़ें तो पुरुषका क्या कर्तव्य है?
उत्तर—उसे पुत्रको समझाना चाहिये कि ‘बेटा! माँको प्रसन्न रखना तुम्हारा विशेष कर्तव्य है। संसारमें जितने भी सम्बन्ध हैं, उन सबमें माँका सम्बन्ध ऊँचा है। अत: अपनी स्त्रीके वशीभूत होकर तुम्हें माँका चित्त नहीं दुखाना चाहिये।’
पत्नीसे कहना चाहिये कि ‘तुमने इसको पेटमें रखा है, जन्म दिया है, अपना दूध पिलाया है। अपनी गोदमें टट्टी-पेशाब करनेपर भी तुमने इसपर कभी गुस्सा नहीं किया, प्रत्युत प्रसन्नतासे उत्साहपूर्वक कपड़े धोये। अब यह तुम्हें कुछ कड़ुआ भी बोल दे तो भी अपना प्यारा पुत्र मानकर इसको क्षमा कर दो; क्योंकि तुम माँ हो। पुत्र कुपुत्र हो सकता है, पर माता कुमाता नहीं हो सकती—‘कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति’।
प्रश्न—परिवारमें प्रेम और सुख-शान्ति कैसे रहे?
उत्तर—जब मनुष्य अपने उद्देश्यको भूल जाता है, तभी सब बाधाएँ, आफतें आती हैं। अगर वह अपने उद्देश्यको जाग्रत् रखे कि चाहे जो हो जाय, मुझे अपनी आध्यात्मिक उन्नति करनी ही है, तो फिर वह सुख-दु:खको नहीं गिनता—‘मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दु:खं न च सुखम्॥’ और अपने स्वार्थ एवं अभिमानका त्याग करनेमें उसको कोई कठिनाई भी नहीं होती। स्वार्थ और अभिमानका त्याग होनेसे व्यवहारमें कोई बाधा, अड़चन नहीं आती। व्यवहारमें, परस्पर प्रेम होनेमें बाधा तभी आती है, जब मनुष्य अपनी मूँछ रखना चाहता है, अपनी बात रखना चाहता है, अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है।
दूसरेका भला कैसे हो, उसका कल्याण कैसे हो, उसका आदर-सम्मान कैसे हो, उसको सुख-आराम कैसे मिले—यह बात जब आचरणमें आ जाती है, तब सब कुटुम्बी प्रसन्न हो जाते हैं। किसी समय कोई कुटुम्बी अप्रसन्न भी हो जाय तो उसकी अप्रसन्नता टिकेगी नहीं, स्थायी नहीं रहेगी; क्योंकि जब कभी वह अपने लिये ठीक विचार करेगा, तब उसकी समझमें आ जायगा कि मेरा हित इसी बातमें है। जैसे बालकको पढ़ाया जाय तो खेलकूदमें वृत्ति रहनेके कारण उसको पढ़ाई बुरी लगती है, पर परिणाममें उसका हित होता है। ऐसे ही कोई बात ठीक होते हुए भी किसीको बुरी लगती है तो उस समय भले ही उसकी समझमें न आये, पर भविष्यमें जरूर समझमें आयेगी। कदाचित् उसकी समझमें न भी आये तो भी हमें अपनी नीयत और आचरणपर सन्तोष होगा कि हम उसका भला चाहते हैं और हमारे भीतर एक बल रहेगा कि हमारी बात सच्ची और ठोस है।
आपसमें प्रेम रहनेसे ही परिवारमें सुख-शान्ति रहती है। प्रेम होता है अपने स्वार्थ और अभिमानके त्यागसे। जब स्वार्थ और अभिमान नहीं रहेगा, तब प्रेम नहीं होगा तो क्या होगा! दूसरा व्यक्ति अपने स्वार्थके वशीभूत होकर हमारे साथ कड़ुआ बर्ताव करता है तो कभी-कभी यह भाव पैदा होता है कि मैं तो इसके साथ अच्छा बर्ताव करता हूँ, फिर भी यह प्रसन्न नहीं हो रहा है, मैं क्या करूँ! ऐसा भाव होनेमें हमारी सूक्ष्म सुख-लोलुपता ही कारण है; क्योंकि दूसरे व्यक्तिके तत्काल सुखी, प्रसन्न होनेसे एक सुख मिलता है। अत: इस सुख-लोलुपताका पता लगते ही इसका त्याग कर देना चाहिये; क्योंकि हमें केवल अपना कर्तव्य निभाना है, दूसरेका आदर करना है, उसके प्रति प्रेम करना है। हमारे भाव और आचरणका उसपर असर पड़ेगा ही। हाँ, अन्त:करणमें कठोरता होनेके कारण उसपर असर न भी पड़े तो भी हमने अपनी तरफसे अच्छा किया—इस बातको लेकर हमें सन्तोष होगा। सन्तोष होनेसे हमारा प्रेम घटेगा नहीं और परिवारमें भी सुख-शान्ति रहेगी।