गृहस्थोंके लिये
(यदि यह लेख आपके मनके अनुकूल न भी पड़े तो भी कम-से-कम एक बार तो अवश्य ही मनोयोगपूर्वक पढ़नेकी कृपा करें—यह प्रार्थना है।)
जनसंख्या-वृद्धिको रोकनेके लिये सरकारने परिवार-नियोजन-कार्यक्रम चला रखा है, जिसके अन्तर्गत वह गर्भाधानको रोकनेके लिये अथवा गर्भपात-जैसे महापापको करनेके लिये लोगोंको प्रोत्साहित कर रही है। इसके लिये वह नये-नये उपायोंकी खोज करके उनका व्यापक स्तरपर प्रचार एवं प्रसार कर रही है। सरकारका यह कार्यक्रम कहाँतक उचित है—इसपर कुछ विचार किया जा रहा है—
परिवार-नियोजन-कार्यक्रमके प्रचार एवं प्रसारके कारण
परिवार-नियोजन-कार्यक्रमका आरम्भ सर्वप्रथम उन पश्चिमी देशोंमें हुआ था, जो ईश्वर, धर्म और परलोकसे प्राय: अनभिज्ञ हैं। वहाँके लोगोंने यह विचार किया कि हमारी जनसंख्या जिस गतिसे बढ़ रही है, उसको देखते हुए भविष्यमें हमें भरपेट खानेको नहीं मिलेगा, रहनेके लिये पर्याप्त जगह नहीं मिलेगी, हमारा जीवन-निर्वाह कठिन हो जायगा, हमारा जीवन-स्तर गिर जायगा आदि। उन्होंने जनसंख्याकी वृद्धिकी ओर तो देखा, पर इस ओर नहीं देखा कि जनसंख्या-वृद्धिके साथ-साथ जीवन-निर्वाहके साधनोंकी भी वृद्धि होती है; क्योंकि आवश्यकता ही आविष्कारकी जननी है। फलस्वरूप परिवार-नियोजन-कार्यक्रमसे जीवन-निर्वाहके साधनोंमें तो वृद्धि नहीं हुई, पर ऐसी अनेक बुराइयोंकी वृद्धि अवश्य हुई, जिनसे समाजका घोर पतन हुआ!
वास्तवमें जीवन-निर्वाहके साधनोंमें कमी होनेका कारण जनसंख्याकी वृद्धि नहीं है, प्रत्युत अपने सुखभोगकी इच्छाओंकी वृद्धि है। भोगेच्छाकी वृद्धि होनेसे मनुष्य आरामतलब और अकर्मण्य हो जाता है, जिससे वह जीवन-निर्वाहके साधनोंका उपभोग तो अधिक करता है, पर उत्पादन कम करता है। इससे जीवन-निर्वाहके साधनोंमें कमी आने लगती है। इतना ही नहीं, अपनी इच्छाओंकी पूर्तिके लिये मनुष्य तरह-तरहके पाप करने लगता है, जिनमें गर्भपात आदि संतति-निरोधके उपाय भी शामिल हैं। गीताने काम अर्थात् भोगेच्छाको सम्पूर्ण पापोंका मूल बताया है—
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:।
महाशनो महापाप्मा विद्धॺेनमिह वैरिणम्॥
(३।३७)
‘रजोगुणसे उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खानेवाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान।’ भोग-विलासकी चीजोंको मनुष्यने अपनी आवश्यक चीजें बना लिया है। वह उन चीजोंके इतने अधीन हो गया है कि उनके बिना उसको अपना जीवन भी भारी लगने लगा है, जिसका कारण आलस्य, प्रमाद और आरामतलबी है। जब उसके लिये अपनी जरूरतोंको पूरा करना भी कठिन हो गया है, तो फिर वह अपनी संतानकी जरूरतोंको कहाँतक पूरा करे! अत: उसने संतति-निरोधके उपायोंको काममें लाना शुरू कर दिया है। उसमें काम-वासना भी इतनी बढ़ गयी है कि उसने स्त्रीको मात्र भोग-सामग्री बनाना तो ठीक समझा है, पर भोगके प्राकृतिक परिणाम—संतानका होना ठीक नहीं समझा है। वह यह विचार तो करता है कि संतान न होनेसे स्त्री अधिक समयतक युवा बनी रहेगी, हमारे भोगके योग्य बनी रहेगी, पर यह विचार नहीं करता कि लाख कोशिश करनेपर भी जवानीके बाद बुढ़ापा आयेगा ही और बुढ़ापेके बाद मौत आयेगी ही, जो कि अनिवार्य है। उसके हृदयमें न तो ईश्वरका विश्वास रहा है, न अपने भाग्यका विश्वास रहा है और न अपने पुरुषार्थ-(कर्तव्य-)पर ही विश्वास रहा है। तात्पर्य है कि ईश्वर सबका पालन करनेवाला है, हरेक व्यक्ति अपने भाग्यके अनुसार पाता है और अपने पुरुषार्थ-(उद्योग-)से मैं कमा सकता हूँ और अपने परिवारका पालन-पोषण कर सकता हूँ—इन बातोंपरसे मनुष्यका विश्वास हट गया है। इन सब कारणोंसे परिवार-नियोजन-कार्यक्रमका तेजीसे प्रचार एवं प्रसार हुआ और हो रहा है।
क्या परिवार-नियोजन आवश्यक है?
जनसंख्या-वृद्धिसे होनेवाली जिन हानियोंका प्रचार किया जा रहा है, वह केवल कपोल-कल्पना है, उसमें वास्तविकताकी बात ही नहीं है। परिवार-नियोजनके समर्थक कहते हैं कि जनसंख्या बढ़नेपर अन्नकी कमी हो जायगी, जिससे सबको भरपेट अन्न नहीं मिल सकेगा। यह बात तो तभी लागू पड़ती है, जब अन्न एक निश्चित मात्रामें जमा रखा गया हो और आगे अन्न पैदा होनेकी गुंजाइश न हो। जनसंख्याकी वृद्धिको लेकर अन्नकी चिन्ता करनेवाले लोग यह भूल जाते हैं कि जनसंख्या बढ़नेसे केवल खानेवाले ही नहीं बढ़ते, प्रत्युत पैदा करनेवाले (कमानेवाले) भी बढ़ते हैं। प्रत्येक व्यक्तिके पास केवल पेट ही नहीं होता, प्रत्युत दो हाथ, दो पैर और एक मस्तिष्क भी होता है, जिनसे वह केवल अपना ही नहीं, प्रत्युत कई प्राणियोंका भरण-पोषण कर सकता है। वास्तवमें अन्नादि वस्तुओंकी कमी तभी आ सकती है, जब मनुष्य काम न करें और भोगी, ऐयाश, आरामतलब हो जायँ। आवश्यकता ही आविष्कारकी जननी है। अत: जब जनसंख्या बढे़गी, तब उसके पालन-पोषणके साधन भी बढ़ेंगे, अन्नकी पैदावार भी बढ़ेगी, वस्तुओंका उत्पादन भी बढ़ेगा, उद्योग भी बढ़ेंगे। जहाँतक हमें ज्ञात हुआ है, पृथ्वीमें कुल सत्तर प्रतिशत खेतीकी जमीन है, जिसमें केवल दस प्रतिशत भागमें ही खेती हो रही है, जिसका कारण खेती करनेवालोंकी कमी है! अत: जनसंख्याकी वृद्धि होनेपर अन्नकी कमीका प्रश्न ही पैदा नहीं होता। यदि भूतकालको देखें तो पता लगता है कि जनसंख्यामें जितनी वृद्धि हुई है, उससे कहीं अधिक अन्नके उत्पादनमें वृद्धि हुई है। इसलिये जे० डी० बर्नेल आदि विशेषज्ञोंका कहना है कि जनसंख्यामें वृद्धि होनेपर भी आगामी सौ वर्षोंतक अन्नकी कमीकी कोई सम्भावना मौजूद नहीं है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कोलिन क्लार्कने तो यहाँतक कहा है कि ‘अगर खेतीकी जमीनका ठीक-ठीक उपयोग किया जाय तो वर्तमान जनसंख्यासे दस गुनी ज्यादा जनसंख्या बढ़नेपर भी अन्नकी कोई समस्या पैदा नहीं होगी’ (पापुलेशन ग्रोथ एण्ड लिविंग स्टैण्डर्ड)।
सन् १८८० में जर्मनीमें जीवन-निर्वाहके साधनोंकी बहुत कमी थी, पर उसके बाद चौंतीस वर्षोंके भीतर जब जर्मनीकी जनसंख्या बहुत बढ़ गयी, तब जीवन-निर्वाहके साधन और कम होनेकी अपेक्षा इतने अधिक बढ़ गये कि उसको काम करनेके लिये बाहरसे आदमी बुलाने पड़े! इंग्लैंडकी जनसंख्यामें तीव्रगतिसे वृद्धि होनेपर भी वहाँ जीवन-निर्वाहके साधनोंमें कोई कमी नहीं आयी। यह प्रत्यक्ष बात है कि संसारमें कुल जनसंख्या जितनी बढ़ी है, उससे कहीं अधिक जीवन-निर्वाहके साधन बढ़े हैं।
परिवार-नियोजनके समर्थनमें एक बात यह भी कही जाती है कि जनसंख्या बढ़नेपर लोगोंको रहनेके लिये जगह मिलनी कठिन हो जायगी। विचार करें, यह सृष्टि करोड़ों-अरबों वर्षोंसे चली आ रही है, पर कभी किसीने यह नहीं देखा, पढ़ा या सुना होगा कि किसी समय जनसंख्या बढ़नेसे लोगोंको पृथ्वीपर रहनेकी जगह नहीं मिली! जनसंख्याको नियन्त्रित रखना और उसके जीवन-निर्वाहका प्रबन्ध करना मनुष्यके हाथमें नहीं है, प्रत्युत सृष्टिकी रचना करनेवाले भगवान् के हाथमें है। भगवान् कहते हैं—
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।
(गीता १५।१३)
‘मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे समस्त प्राणियोंको धारण करता हूँ।’
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वर:॥
(गीता १५।१७)
‘वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है।’
ब्रिटिश एसोसिएशनके अध्यक्ष सर विलियम क्रोक्सने भी सन् १८९८ में आजकी तरह यह चेतावनी दी थी कि ‘जनसंख्या-वृद्धिके कारण पृथ्वीमें जीवन-निर्वाहके साधन आगामी तीस वर्षोंसे अधिक हमारी आवश्यकताओंकी पूर्ति नहीं कर सकेंगे। अत: इंग्लैंड आदि देशोंको शीघ्र ही अकालका सामना करना पड़ सकता है!’ परंतु आगामी तीस वर्षोंमें अकाल पड़ना तो दूर रहा, अन्नकी इतनी अधिक पैदावार हुई कि उसके भावोंमें अत्यधिक मन्दी आ गयी, जिसके कारण अमेरिका आदि कुछ देशोंको अपना अधिक गेहूँ जलाकर अथवा समुद्रमें डालकर नष्ट कर देना पड़ा!
वर्तमानमें करोड़ों एकड़ जमीन खाली पड़ी है। अत: जनसंख्या-वृद्धिको लेकर यह हल्ला करना व्यर्थ है कि भविष्यमें लोगोंको खानेके लिये अन्न और रहनेके लिये जगह नहीं मिलेगी। भारतकी तो प्राकृतिक सम्पत्ति इतनी है कि वर्तमान जनसंख्यासे दुगुनी अधिक जनसंख्या हो जाय तो भी सबका जीवन-निर्वाह हो सकता है। भारतकी प्राकृतिक सम्पत्ति संसारमें सबसे अधिक है। जितनी चीजें यहाँ पैदा होती हैं, उतनी अन्य किसी भी देशमें पैदा नहीं होतीं। अगर जनसंख्या कम हो जायगी तो उनका उत्पादन कौन करेगा? कारण कि जनसंख्यामें कमी होनेसे अन्न आदिका उत्पादन करनेवाले कुशल व्यक्तियोंका, उत्पादन करनेकी शक्तियोंका और उत्पादन करनेके साधनोंका भी अभाव हो जाता है।
यदि सरकार जनसंख्या-वृद्धिको एक समस्या मानती है तो इसका उचित और वास्तविक समाधान यही है कि जीवन-निर्वाहके साधनोंमें वृद्धि की जाय, नये-नये साधनोंकी खोज की जाय। जिन देशोंने इस समाधानको अपनाया है, उनके जीवन-निर्वाहके साधनोंमें जनसंख्या-वृद्धिकी अपेक्षा भी बहुत अधिक वृद्धि हुई है। कारण कि वास्तवमें जीवन-निर्वाहके साधनोंमें कमी होनेका सम्बन्ध जनसंख्या-वृद्धिके साथ है ही नहीं। जीवन-निर्वाहके साधनोंमें कमी तब आती है, जब मनुष्य आलसी, प्रमादी, भोगी और अकर्मण्य बननेके कारण अपनी जिम्मेवारीका काम नहीं करते। वे खर्चा तो अधिक करते हैं, पर काम कम करते हैं, जो कि देशको दरिद्र बनानेवाली चीज है।
देशकी समस्याओंके समाधानके लिये परिवार-नियोजन-कार्यक्रमको अपनाना वास्तवमें अपनी पराजय स्वीकार करना है। इससे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य इतना आलसी और अकर्मण्य हो गया है कि वह अपनी आवश्यकताओंके अनुसार जीवन-निर्वाहके साधनोंमें वृद्धि न करके खुदको ही समाप्त कर देना ठीक समझता है! जैसे, शरीरपर कोई कपड़ा ठीक न आये तो कपड़ेका आकार ठीक करनेकी अपेक्षा शरीरको ही काटकर छोटा करनेका प्रयत्न किया जाय! कपड़ा मनुष्यके लिये है, मनुष्य कपड़ेके लिये नहीं। अगर मनुष्य कपड़ेके लिये हो जायगा तो फिर मनुष्यमें मनुष्यता रहेगी ही नहीं। कोलिन क्लार्कने लिखा है कि ‘आर्थिक सलाहकारोंका काम यह बताना है कि अर्थ-व्यवस्थाको जनसंख्याके अनुसार कैसे ठीक किया जाय, न कि यह बताना कि जनसंख्याको अर्थ-व्यवस्थाके अनुसार कैसे ठीक किया जाय। किसी भी अर्थशास्त्रीको, चाहे वह कितना ही बड़ा विद्वान् हो और किसी भी सरकारको, चाहे वह कितनी ही शक्तिशाली हो, यह अधिकार नहीं है कि वह माँ-बापसे संतान कम पैदा करनेके लिये अथवा पैदा न करनेके लिये कहे। परंतु हर माँ-बापको यह अधिकार अवश्य है कि वे अर्थशास्त्रियोंसे और सरकारसे यह माँग करें कि वे अर्थ-व्यवस्थाको इतना सुदृढ़ बनायें कि उनके परिवारकी जीवन-निर्वाह-सम्बन्धी आवश्यकताएँ पूरी हो सकें।’
एक आदमीके शरीरसे एक बार स्त्रीसंगके समय जितना वीर्य निकलता है, उससे करोड़ों बच्चे पैदा हो सकते हैं! कारण कि उसमें लगभग पचीससे पचास करोड़तक शुक्राणु विद्यमान रहते हैं, जिनमेंसे प्रत्येक शुक्राणुमें एक मनुष्य बननेकी पूरी क्षमता होती है। परंतु उनमेंसे कोई एक ही शुक्राणु स्त्रीके रजसे मिलकर मनुष्य बन पाता है। मनुष्यकी इस संतानोत्पादक शक्तिको किसी देशकी सरकारने अथवा खुद मनुष्यने सीमित नहीं किया है, प्रत्युत उसने सीमित किया है, जो इस सम्पूर्ण संसारका रचयिता, पालनकर्ता और संहारकर्ता है*। जनसंख्याके नियोजनका, उसको बढ़ाने-घटानेका कार्य उसके विभागमें है, सरकारके विभागमें नहीं। तात्पर्य है कि सरकारका अधिकार जनसंख्याको सीमित करना नहीं है, प्रत्युत जितनी जनसंख्या है, उसके जीवन-निर्वाहका, उसकी सुरक्षाका भलीभाँति प्रबन्ध करना है। यदि जनसंख्या और जीवन-निर्वाहके साधनोंके बीच संतुलनको ठीक रखनेका प्रयत्न किया जायगा तो संतुलन ठीक होनेकी अपेक्षा और बिगड़ जायगा। कारण कि जीवन-निर्वाहके साधन मनुष्योंके लिये हैं, न कि मनुष्य उनके लिये। मनुष्योंको कम करके अन्नको अधिक पैदा करनेकी चेष्टा वैसी ही है, जैसी चेष्टा संतानको गर्भमें न आने देकर माँका दूध अधिक प्राप्त करनेकी है! जहाँ वृक्ष अधिक होते हैं, वहाँ वर्षा अधिक होती है, फिर मनुष्य अधिक होंगे तो क्या अन्न अधिक नहीं होगा? यह प्रत्यक्ष बात है कि जब देशमें परिवार-नियोजन-कार्यक्रमका आरम्भ नहीं हुआ था, तब अन्न जितना सस्ता था, उतना आज नहीं है।
अगर सरकार जनसंख्यापर नियन्त्रण रखना ही चाहती है तो उसको ‘जन्म’ पर नियन्त्रण रखनेके साथ-साथ ‘मृत्यु’ पर भी नियन्त्रण रखना चाहिये। अगर वह मृत्युपर नियन्त्रण नहीं रख सकती तो उसको जन्मपर भी नियन्त्रण रखनेका अधिकार नहीं है! मनुष्य पैदा होने तो कम हो जायँ, पर मृत्यु पहलेकी तरह अपना काम करती रहे तो क्या परिणाम होगा? युद्ध, अकाल, बाढ़, भूकम्प, महामारी आदि कारणोंसे जितने मनुष्योंकी मृत्यु होती है, उसकी कोई सीमा नहीं है। अत: परिवार-नियोजनके द्वारा सरकार जनसंख्याकी सीमा निश्चित नहीं कर सकती कि अमुक सीमातक जनसंख्या कम कर दी जाय और फिर उस सीमासे उसको कम न होने दिया जाय; अगर कम हो जाय तो तत्काल उसकी पूर्ति कर दी जाय! तात्पर्य है कि जनसंख्याकी व्यवस्था भगवान् के हाथमें है। उसकी ओरसे अरबों वर्षोंसे ठीक व्यवस्था चलती आयी है। मनुष्योंको इस विषयमें हस्तक्षेप करनेका अधिकार नहीं है। इस विषयमें हस्तक्षेप करनेवाले देश इसका दुष्परिणाम भुगत चुके हैं।
संतति-निरोध नास्तिकवाद-रूपी विषवृक्षकी उपज है। जो मनुष्य नास्तिक, आलसी-प्रमादी और भोगी हैं, उन लोगोंने ही संतति-निरोध-कार्यक्रमका आरम्भ किया है, वे ही लोग संतति-निरोधके समर्थनमें दी गयी दलीलोंसे प्रभावित होते हैं और वे ही लोग इसका दुष्परिणाम भी भोगेंगे।
परिवार-नियोजन-कार्यक्रमके दुष्परिणाम
इंग्लैण्ड, अमेरिका, जर्मनी, फ्राँस आदिमें पिछले सौ वर्षोंके भीतर जो तीव्रगतिसे परिवार-नियोजन-कार्यक्रम अपनाया गया, उसके परिणामोंका विश्लेषण करते हुए अमेरिकाके जनसंख्या-विशेषज्ञ प्रो० वारेन थम्पसनने लिखा है कि ‘जिस समाजने सन्तति-निरोधको अपनाया है, उस समाजमें शारीरिक योग्यतावाले लोगोंकी संख्या तो बढ़ रही है, पर बौद्धिक कुशलतावाले विचारशील लोगोंकी संख्या घट रही है।’ अन्य विदेशी विद्वान् अल्डुस हक्सले, बर्टेण्ड रसेल आदिने भी यही बात कही है कि ‘परिवार-नियोजन-कार्यक्रमके परिणामस्वरूप लोगोंका स्वास्थ्य और बौद्धिक स्तर गिर रहा है और अल्पबुद्धिवाले एवं अकुशल लोगोंकी संख्या बढ़ रही है।’ कारण यह है कि विवाहके बाद आरम्भमें स्त्रीका पुरुषके प्रति और पुरुषका स्त्रीके प्रति विशेष आकर्षण रहता है, जिससे उनमें प्रबल भोगेच्छा रहती है। इसलिये आरम्भमें जो सन्तान होती है, वह केवल भोगेच्छासे ही पैदा होती है। भोगेच्छासे पैदा हुई सन्तान प्राय: अच्छी नहीं होती और बादमें होनेवाली सन्तानकी अपेक्षा अल्पबुद्धिवाली, विवेकहीन, भोगी होती है। इसलिये गीतामें आया है कि भोगेच्छारहित योगियोंके कुलमें ही श्रेष्ठ बुद्धिवाले योगभ्रष्ट साधकोंका जन्म होता है—‘योगिनामेव कुले भवति धीमताम्’ (६।४२)
परिवार-नियोजन-कार्यक्रम अपनानेसे समाजमें बच्चों तथा जवानोंकी संख्या कम हो जाती है और बूढ़ोंकी संख्या अधिक हो जाती है, जिसके कारण देशकी आर्थिक उन्नति रुक जाती है और वह विभिन्न दृष्टियोंसे काफी पिछड़ जाता है। बच्चों और बूढ़ोंका अनुपात बिगड़नेसे देशकी सारी व्यवस्था डाँवाडोल हो जाती है। लार्ड कीन्स और प्रो० हेन्सनके मतानुसार ‘जनसंख्याकी वृद्धिसे आर्थिक तेजी आती है। बेरोजगारीकी वृद्धिका कारण जनसंख्याकी कमी है।’ कोलन क्लार्कने लिखा है कि अगर जनसंख्यामें वृद्धि हो और बाजारका आकार बढ़ जाय तो प्रति व्यक्ति उत्पादन बढ़ जायगा, कम नहीं होगा। अगर अमेरिका और पश्चिमी यूरोपमें अधिक जनसंख्या न होती तो कई वर्तमान उद्योग संकटमें पड़ जाते और उनका उत्पादन-व्यय भी बहुत बढ़ जाता।’
सन्तति-निरोधके उपायोंके व्यापक प्रचार एवं प्रसारसे भोगेच्छा बहुत बढ़ जाती है। भोगेच्छा बढ़नेसे उनका प्रयोग विवाहित स्त्री-पुरुषोंतक ही सीमित नहीं रहता, प्रत्युत अविवाहित लड़के-लड़कियाँ भी उनका प्रयोग आरम्भ कर देते हैं, जिससे समाजमें व्यभिचार बढ़ जाता है और समाजकी मर्यादा भंग हो जाती है। मर्यादा भंग होनेसे मनुष्य पशुओंकी तरह हो जाता है। फिर कन्याएँ भी गर्भवती होने लगती हैं और विधवाएँ भी गर्भवती होने लगती हैं; क्योंकि उनको गर्भ रोकने अथवा गिरानेका उपाय मिल जाता है। व्यभिचार बढ़नेसे सुजाक, उपदंश, एड्स आदि भयंकर रोगोंकी भी वृद्धि हो जाती है। लोगोंका चरित्र गिरनेसे देशका घोर नैतिक पतन हो जाता है। परिवार-नियोजन-कार्यक्रमका यह दुष्परिणाम पश्चिमी देशोंमें प्रत्यक्ष रूपसे देखनेमें आ रहा है। वहाँ यौन-अपराधोंमें अत्यधिक वृद्धि हुई है और बीस वर्षसे भी कम उम्रवाले लड़के-लड़कियोंमें सुजाक, उपदंश आदि गुप्तरोग तेजीसे फैल रहे हैं।
विदेशोंमें पति-पत्नीके सम्बन्धोंमें शिथिलता और तलाककी अधिकता पाये जानेके कारणोंमें सन्तति-निरोध भी एक कारण है। अधिकतर वे ही पति-पत्नी तलाक लेते हैं, जिनकी कोई सन्तान नहीं है अथवा जिनकी बहुत कम सन्तान है। कारण कि सन्तान पैदा होनेसे पति-पत्नीका सम्बन्ध दृढ़ होता है और वे माँ-बापके रूपमें एक श्रेष्ठ पदको प्राप्त करते हैं। परन्तु सन्तति-निरोधसे पति-पत्नीका सम्बन्ध शिथिल होकर केवल काम-वासनाकी पूर्तिके लिये सीमित हो जाता है। स्त्रीको माँका ऊँचा दर्जा प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत वह पुरुषके लिये भोग्या बनकर रह जाती है, जो कि उसके पतनका चिह्न है। जब पति-पत्नीके सम्बन्ध शिथिल हो जाते हैं, तब समाजमें तलाक, व्यभिचार आदि दोषोंकी अधिकता हो जाती है, जिसका परिणाम भयंकर दु:ख होता है।
स्त्रीका आदर माँ बननेसे ही होगा, भोग्या बननेसे नहीं। भोग्या बननेपर जब वह भोगके योग्य नहीं रहेगी, तब उसका निर्वाह कौन करेगा? उलटे उसका तिरस्कार होगा। पति तलाक दे दे और बेटे हों नहीं, तो फिर उसका पालन कौन करेगा? सन्तान नहीं होगी तो बूढ़ी और बीमार स्त्रीकी सेवा कौन करेगा? कारण कि माँको कष्ट न हो, उसकी सेवा बन जाय—यह भाव जितना बेटे-पोतोंमें होता है, उतना दूसरोंमें नहीं होता।
जब मनुष्योंकी बुद्धिमें यह स्वार्थभाव पैदा हो जायगा कि बच्चे कम पैदा होनेसे हम सुखी रहेंगे, हमारा जीवन-स्तर अच्छा रहेगा, तब यह भाव बच्चे कम पैदा करने अथवा न पैदा करनेतक ही सीमित नहीं रहेगा। उनको अपनी स्वार्थसिद्धिमें केवल अपनी सन्तान ही बाधक नहीं दीखेगी, प्रत्युत बूढ़े माँ-बाप भी बाधक दीखने लगेंगे, अपने भाई-बहन भी बाधक दीखने लगेंगे, परिवारके रोगी, अपाहिज, असमर्थ और निर्धन व्यक्ति भी बाधक दीखने लगेंगे! पश्चिम देशोंमें यही दशा देखनेमें आ रही है। जो अपनी सन्तानका ही पालन-पोषण करनेके लिये तैयार न हो, वह दूसरोंका पालन-पोषण कैसे करेगा? अत: सन्तति-निरोधके प्रचार-प्रसारसे मनुष्योंमें सेवा, त्याग, प्रेम, परहित आदिकी भावनाएँ नष्ट हो जायँगी और वे पहलेसे अधिक स्वार्थी बन जायँगे।
प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने परिवारको, अपनी परिस्थितिको, अपने स्वार्थको देखकर सन्तति-निरोध करता है, न कि देशको देखकर। देशको अपनी शक्ति बनाये रखनेके लिये कम-से-कम कितनी जनसंख्याकी जरूरत है, यह बात व्यक्तिकी दृष्टिमें नहीं रहती। जो स्त्री-पुरुष केवल एक या दो सन्तान पैदा करेंगे, वे अपनी सन्तानसे प्राय: यही आशा रखेंगे कि वह हमारे पास रहकर हमारी सेवा करे, हमारे स्वार्थोंको पूरा करे, हमारी आवश्यकताओंकी पूर्ति करे*। हमारी सन्तान देशकी सेवा करे, सेनामें भरती होकर देशकी शत्रुओंसे रक्षा करे—यह भाव प्राय: उन्हीं माता-पिताके मनमें आयेगा, जिनकी अधिक सन्तान हैं। अगर एक-दो सन्तान होगी तो घरका काम ही पूरा नहीं होगा, फिर कौन फौजमें भरती होगा? कौन साधु बनेगा? कौन शास्त्रोंका विद्वान् बनेगा? कौन व्याख्यानदाता बनेगा? ज्यादा सन्तान होगी तो कोई फौजमें चला जायगा, कोई खेती करेगा, कोई व्यापार करेगा, कोई फैक्ट्री लगायेगा। परिवार-नियोजनके समर्थक कहते हैं कि जनसंख्या बढ़नेपर लोग भूखों मरेंगे, पर हम कहते हैं कि जनसंख्या कम होनेपर लोग भूखों मरेंगे, कारण कि खेती करनेके लिये आज भी आदमी कम मिलते हैं, फिर भविष्यमें जनसंख्या और कम होनेपर आदमी कैसे मिलेंगे? जो आदमी मिलते भी हैं, वे भी पैसा तो पूरा लेते हैं, पर लगन और परिश्रमके साथ काम नहीं करते। यह प्रत्यक्ष बात है कि घरके आदमी (बेटे) जितनी लगन और परिश्रमके साथ काम करते हैं, उतना मजदूर या नौकर नहीं करते। विदेशी विशेषज्ञोंका अनुमान है कि यदि एक हजार ऐसे व्यक्ति हैं, जिनकी केवल दो-दो सन्तानें हैं तो तीस वर्ष बाद उनकी संख्या घटकर ३३१ रह जायगी, साठ वर्ष बाद उनकी संख्या घटकर १८६ रह जायेगी और डेढ़ सौ वर्ष बाद उनकी संख्या घटकर केवल ९२ रह जायगी। जनसंख्या अधिक कम होनेपर लोग अकाल, बाढ़, भूकम्प आदि प्राकृतिक प्रकोपोंसे तथा शत्रुओंसे अपनी रक्षा नहीं कर पाते और परिणामस्वरूप अपने अस्तित्वको ही नष्ट कर देते हैं। अत: जो जाति परिवार-नियोजनको अपनाती है, वह वास्तवमें आत्महत्या करती है।
अमेरिकाने जापानपर जो एटम बम फेंका था, वह बीस हजार टी०एन०टी० की शक्तिका था और उससे ७८,१५० व्यक्ति मर गये, ३७,४२५ व्यक्ति घायल हो गये तथा १३,०८३ व्यक्ति लापता हो गये। परन्तु आज दस करोड़ टी०एन०टी० या इससे भी अधिक शक्तिशाली एटम बम बनाये जा रहे हैं। अगर भविष्यमें इस तरहके विनाशकारी अस्त्रोंसे युद्ध लड़ा गया तो युद्धकी लपेटमें आनेवाले देशोंकी जनसंख्या सहसा कितनी कम हो जायगी—इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। जिस देशकी जनसंख्या पहलेसे ही कम की जा रही है, उसका तो ऐसे युद्धमें सर्वथा विनाश ही निश्चित है!
लगभग दो हजार वर्ष पूर्व यूनानमें भी गर्भपात आदिका प्रचलन हो गया था और उसकी जनसंख्या कम हो रही थी। उसी समय वहाँ गृहयुद्ध छिड़ गया। इस दुगुने नुकसानको यूनान सह नहीं सका और परिणाममें उसको दूसरोंका गुलाम बनकर रहना पड़ा। किसी समय फ्राँसकी गणना संसारकी मुख्य शक्तियोंमें होती थी। परन्तु जब वह विश्वयुद्धमें पराजित हो गया, तब मार्शल पीताने स्पष्ट शब्दोंमें स्वीकार किया कि ‘इस पराजयका मूल कारण हमारी जनसंख्याका कम होना है।’
राजनीतिक दृष्टिसे देखा जाय तो जनसंख्या-वृद्धिका बहुत महत्त्व है। जनसंख्याकी कमी परिणाममें राजनीतिक शक्तिके ह्रासका कारण बनती है। प्रो०ओरगांस्की अलब्रेनोने कहा था कि ‘यूरोपको विश्वकी सबसे बड़ी शक्ति बनानेमें जनसंख्या-वृद्धिका हाथ है’ (पापुलेशन एण्ड पॉलिटिक्स)। पश्चिमी देशोंमें जनसंख्याकी कमीके साथ-साथ राजनीतिक शक्तिका भी ह्रास हुआ, जिसका पता विश्वयुद्धके बाद लगा। अत: उन देशोंने जनसंख्याको बढ़ानेपर जोर देना आरम्भ कर दिया। इतना ही नहीं, अपनी पूर्व शक्तिको वापिस लानेके लिये पश्चिमी देश पूर्वी देशोंपर यह दबाव डाल रहे हैं कि वे परिवार-नियोजनके द्वारा अपनी जनसंख्याको कम करें। आर्थरमेक कारमेकने स्पष्ट शब्दोंमें कहा है कि ‘विकसित देश यह चाहते हैं कि विकासशील देशोंकी जनसंख्या कम हो जाय, क्योंकि उनकी जनसंख्या-वृद्धिको वे देश अपने उच्च जीवन-स्तर और राजनीतिक सुरक्षाके लिये खतरा समझते हैं। उनका उद्देश्य पिछड़े देशोंको और अधिक पिछड़ा बना देना है, मुख्यरूपसे काले लोगोंको, जिससे कि गोरे लोगोंका आधिपत्य बना रहे’ (अनलिसिस ऑफ लाइफ इन सोसाइटी)। यही कारण है कि विश्वबैंक तथा पश्चिमी देश भारतको इस शर्तपर कर्जा देते हैं कि वह अपनी जनसंख्याको अधिक-से-अधिक कम करे। कारण कि भारतकी जनसंख्या कम हो जायगी और वह कर्जदार हो जायगा तो उसपर उन देशोंका अधिकार हो जायगा!
वर्तमान वोट-प्रणालीका तो जनसंख्याके साथ सीधा सम्बन्ध है। इस प्रणालीके अनुसार सौ मूर्ख निन्यानबे बुद्धिमानोंको हरा सकते हैं, जबकि वास्तवमें सौ मूर्ख मिलकर भी एक बुद्धिमान् की समानता नहीं कर सकते। विचार करें कि समाजमें विद्वानोंकी संख्या अधिक है या मूर्खोंकी? सज्जनोंकी संख्या अधिक है या दुष्टोंकी? ईमानदारोंकी संख्या अधिक है या बेईमानोंकी? जिनकी संख्या अधिक होगी, वे ही वोटोंसे जीतेंगे और देशपर शासन करेंगे। जिस जातिकी जनसंख्या अधिक होगी, वही जाति देशपर राज्य करेगी।
पारिवारिक दृष्टिसे देखा जाय तो जिस परिवारमें बच्चोंकी संख्या अधिक होती है, वे परिवार अधिक उन्नत होते हैं। प्रो० कोलन क्लार्कने लिखा है कि ‘अधिक बच्चोंवाले और कम बच्चोंवाले—दोनों प्रकारके परिवारोंका व्यापक सर्वेक्षण करनेपर यह निष्कर्ष निकला है कि छोटे परिवारवाले बच्चोंकी अपेक्षा बड़े परिवारवाले बच्चे जीवनमें अधिक सफल रहे हैं’ (दैनिक टाइम्स १५.३.५९)
मनोवैज्ञानिकोंका कहना है कि जिस बच्चेको अपनेसे छोटे अथवा बड़े भाई-बहनके साथ खेलने-कूदने, रहने, परस्पर विनोद करने आदिका मौका नहीं मिलता, उसका भलीभाँति मानसिक विकास नहीं होता और वह कई नैतिक गुणोंसे वञ्चित रह जाता है। अगर अपनी और भाई-बहनकी उम्रके बीच बहुत फर्क हो तो (अपनी उम्रके नजदीक उम्रवाला भाई-बहन न मिलनेसे) उसमें मानसिक अवरोध (न्यूरोसिस) तक पैदा हो सकता है।
जिस समय स्त्री और पुरुष सन्तानोत्पत्तिके योग्य होते हैं, वही समय उनके यौवनका होता है और जिस समय वे सन्तानोत्पत्तिके अयोग्य होते हैं, वही समय उनके बुढ़ापेका होता है। तात्पर्य है कि सन्तान पैदा करनेकी शक्ति न रहनेसे मनुष्यकी शारीरिक और मानसिक शक्तियाँ शिथिल हो जाती हैं। स्त्रीका शरीर तो मुख्यरूपसे सन्तानोत्पत्तिके लिये ही निर्मित हुआ है। युवावस्था आते ही उसका मासिक धर्म आरम्भ हो जाता है, जो हर महीने उसको गर्भवती होनेके योग्य बनाता रहता है। गर्भवती होनेके बाद उसके शरीरकी अधिकतम शक्ति बच्चेके पालन-पोषणमें लग जाती है। इसलिये बच्चेका पालन-पोषण जितना स्त्री कर सकती है, उतना पुरुष नहीं कर सकता। अगर स्त्री मर जाय तो पुरुष बच्चोंको सास, नानी या बहन आदिके पास भेज देता है। परन्तु पति मर जाय तो स्त्री स्वयं कष्ट उठाकर भी बच्चोंका पालन कर लेती है, उनको पढ़ा-लिखाकर तैयार कर देती है। कारण कि स्त्री मातृशक्ति है, उसमें पालन करनेकी विलक्षण योग्यता, स्नेह, कार्यक्षमता है। इसलिये कहा है—‘मात्रा समं नास्ति शरीरपोषणम्’ अर्थात् माताके समान शरीरका पालन-पोषण करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। माताके रूपमें स्त्रीको पुरुषकी अपेक्षा भी विशेष अधिकार दिया गया है—‘सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते’ (मनु० २।१४५) अर्थात् माताका दर्जा पितासे हजार गुना अधिक माना गया है। वर्तमानमें गर्भ-परीक्षण किया जाता है और गर्भमें कन्या हो तो गर्भ गिरा दिया जाता है। क्या यह मातृशक्तिका घोर अपमान नहीं है? क्या यह स्त्रीको समान अधिकार देना है? सन्तति-निरोधके द्वारा स्त्रीको केवल भोग्या बना दिया गया है। भोग्या स्त्री तो वेश्या होती है। क्या यह स्त्री-जातिका घोर अपमान नहीं है?
नोबेल पुरस्कार प्राप्त डॉ० एलेक्सिज कारेलने लिखा है कि ‘सन्तानोत्पत्ति स्त्रीका कर्तव्य है और इस कर्तव्यका पालन करना स्त्रीकी पूर्णताके लिये अनिवार्य है’ (मैन, दि अननौन)। इसी तरह यौन-मनोविज्ञानके विशेषज्ञ डॉ० ऑस्वाल्ड श्वार्जने लिखा है कि ‘काम-वासनाका सम्बन्ध सन्तानोत्पत्तिसे है। स्त्रीके शरीरकी रचना मुख्यरूपसे गर्भधारण तथा सन्तान पैदा करनेके लिये ही हुई है। इसलिये अगर उसको सन्तानोत्पत्ति करनेसे रोका जायगा तो इसका उसके शरीर और मनपर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जिससे उसका व्यक्तित्व पराजय, अभाव तथा नीरसतासे युक्त हो जायगा’ (दि साइकोलॉजी आफ सेक्स)। जो पुरुष स्त्रीसंग तो करता है, पर गर्भाधान नहीं करता, वह उस मूर्ख किसानकी तरह है, जो हल तो चलाता है, पर बीज नहीं डालता अथवा उस मूर्ख आदमीकी तरह है, जो केवल जीभके स्वादके लिये भोजन चबाता है, पर उसको गलेसे उतारनेके बदले बाहर थूक देता है!
डॉ० मेरी शारलीबने अपने चालीस वर्षोंके अनुभवके आधारपर लिखा है कि ‘सन्तति-निरोधके उपायोंको काममें लेते रहनेका अनिवार्य परिणाम यह होता है कि स्त्रीमें प्रसन्नताकी कमी, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, उद्विग्नता, हृदय एवं मस्तिष्ककी कमजोरी, रक्त प्रवाहकी कमी, हाथ-पैरोंमें सुन्नता, मासिक धर्मकी अनियमितता आदि दोष उत्पन्न हो जाते हैं।’ अन्य डॉक्टरोंने भी यह मत प्रकट किया है कि सन्तति-निरोधके उपायोंसे स्त्रीमें स्मरणशक्ति क्षीण होना, पागलपन, स्वभावमें उत्तेजना, मासिक धर्मका कष्टपूर्वक एवं अनियमितरूपसे आना, कमरमें दर्द होना, मुखकी शोभा तथा सौन्दर्य नष्ट होना आदि दोष उत्पन्न होते हैं। यदि वह स्त्री कभी गर्भवती होती है तो उसको गर्भावस्थामें तथा प्रसवकालमें अधिक कष्ट उठाना पड़ता है। डॉ० आर्नल्ड लोरेण्डने अपनी पुस्तक ‘लाइफ शॉर्टनिंग हेबिट्स एण्ड रिजूविनेशन’ में सन्तति-निरोधके उपायोंसे होनेवाली हानियोंका विस्तारसे वर्णन किया है। सन्तति-निरोधके उपायोंके विषयमें डॉक्टरोंका मत है कि ‘इनमेंसे कोई भी उपाय विश्वसनीय और हानिरहित नहीं है।’ इंग्लैण्डके डॉक्टर रेनियल डॺूक्स आदिका मत है कि ‘सन्तति-निरोधक गोलियोंके प्रयोगसे कैंसर-जैसा भयंकर रोग भी पैदा हो सकता है!’
तात्पर्य यह हुआ कि अपने सुखभोगके लिये किया हुआ सन्तति-निरोध आरम्भमें तो मूर्खतावश अमृतकी तरह प्रतीत होता है, पर परिणाममें वह विषकी तरह विनाशकारी होता है। गीतामें भगवान् कहते हैं—
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥
(१८।३८)
‘जो सुख इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है, वह सुख राजस कहा गया है।’
परिवार-नियोजनके दुष्परिणाम भुगत चुके देशोंकी प्रतिक्रिया
परिवार-नियोजनके दुष्परिणाम भुगतनेके बाद अनेक देशोंने सन्तति-निरोधपर प्रतिबन्ध लगा दिया और जनसंख्या-वृद्धिके उपाय लागू कर दिये। जर्मनीकी सरकारने सन्तति-निरोधके उपायोंके प्रचार एवं प्रसारपर रोक लगा दी और विवाहको प्रोत्साहन देनेके लिये विवाह-ऋण देने शुरू कर दिये। सन् १९३५ में एक कानून बनाया गया, जिसके अनुसार एक बच्चा पैदा होनेपर इन्कम टैक्समें १५ प्रतिशत छूट, दो बच्चे होनेपर ३५ प्रतिशत छूट, तीन बच्चे होनेपर ५५ प्रतिशत छूट, चार बच्चे होनेपर ७५ प्रतिशत छूट, पाँच बच्चे होनेपर ९५ प्रतिशत छूट और छ: बच्चे होनेपर इन्कम टैक्स माफ कर देनेकी बात कही गयी। इससे वहाँकी जनसंख्यामें पर्याप्त वृद्धि हुई।
फ्रांसकी सरकारने भी सन्तति-निरोधके उपायोंके प्रचार एवं प्रसारपर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिया तथा जनसंख्याकी वृद्धिके लिये अनेक उपाय लागू कर दिये, अधिक सन्तान पैदा करनेवालोंके टैक्स कम कर दिये गये, उनका वेतन तथा पेंशन बढ़ा दी गयी, उनको अनेक प्रकारकी आर्थिक सहायता दी जाने लगी और पुरस्कार भी दिये जाने लगे।
इंग्लैण्डके प्रथम विश्वयुद्धके समय जनसंख्याकी कमीको देखते हुए स्वास्थ्य-मन्त्रालयके मुख्य चिकित्साधिकारी सर जार्ज न्यूमनने चेतावनी दी कि यदि जनसंख्याकी इस कमीको न रोका गया तो ब्रिटेनकी शक्ति चौथे दर्जेकी हो जायगी। इस कमीको दूर करनेके लिये ‘लीग ऑफ नेशनल लाइफ’ नामक समिति बनायी गयी वहाँके अधिकारियोंने विचार किया कि यदि इंग्लैण्डको अपना अस्तित्व बनाये रखना है तो इसको जनसंख्याकी कमीपर तुरन्त रोक लगानी होगी। इसके लिये सन् १९४४ में एक ‘रायल कमीशन’ की स्थापना की गयी, जिसका उद्देश्य जनसंख्याकी कमीको दूर करनेके विभिन्न उपायोंकी खोज करना था। सन् १९४९ में उसने अपनी रिपोर्टमें जनसंख्या-वृद्धिके अनेक उपाय लागू करनेकी सलाह दी; जैसे—अधिक सन्तानवाले लोगोंको आर्थिक सहायता दी जाय, उनपर टैक्स कम लगाये जायँ, ऐसे मकानोंका निर्माण किया जाय अथवा उनके निर्माणमें सहायता दी जाय, जिनमें सोनेके लिये तीनसे अधिक कमरे हों आदि-आदि। इसके अनुसार इंग्लैण्डमें कई कानून बनाये गये। लोग अधिक सन्तान पैदा करनेमें रुचि लेने लगें—इसके लिये वहाँ विभिन्न प्रकारकी आर्थिक सहायता तथा पढ़ाई, आवास आदिकी सुविधाएँ दी जाने लगीं। परिणामस्वरूप वहाँ तीव्रगतिसे जनसंख्याकी वृद्धि हुई।
उपर्युक्त देशोंके सिवाय स्वीडन, इटली आदि देशोंने भी सन्तति-निरोधपर प्रतिबन्ध लगाया। इटलीमें तो यहाँतक कानून बना दिया गया कि सन्ततिनिरोधका प्रचार एवं प्रसार करनेवालेको एक वर्षकी कैद तथा जुर्माना किया जा सकता है। आश्चर्यकी बात है कि परिवारनियोजनके जिन दुष्परिणामोंको पश्चिमी देश भुगत चुके हैं, उनको देखनेके बाद भी भारत-सरकार इस कार्यक्रमको बढ़ावा दे रही है! ‘विनाशकाले विपरीतबुद्धि:’!*