जिन खोजा तिन पाइया

परमात्मतत्त्व अद्वितीय है। उपनिषद्‍में आया है—

सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्।

(छान्दोग्य० ६। २। १)

‘हे सोम्य! आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था’।

तात्पर्य है कि वह तत्त्व अद्वैत है। उस तत्त्वमें किसी भी तरहका भेद नहीं है। भेद तीन तरहका होता है—स्वगत भेद, सजातीय भेद और विजातीय भेद। जैसे, एक शरीरमें भी पैर अलग हैं, हाथ अलग हैं, पेट अलग है, सिर अलग है—यह ‘स्वगत भेद’ है। वृक्ष-वृक्षमें कई भेद हैं, गाय-गायमें अनेक भेद हैं—यह ‘सजातीय भेद’ है। वृक्ष अलग हैं और गाय, भैंस, भेड़ आदि पशु अलग हैं—यह स्थावर और जंगमका भेद ‘विजातीय भेद’ है। परमात्मतत्त्व ऐसा है कि उसमें न स्वगत भेद है, न सजातीय भेद है और न विजातीय भेद है। परमात्मतत्त्वमें कोई अवयव नहीं है, इसलिये उसमें ‘स्वगत भेद’ नहीं है। जीव भिन्न-भिन्न होनेपर भी स्वरूपसे एक ही हैं; अत: उसमें ‘सजातीय भेद’ भी नहीं है। उस तत्त्वके सिवाय दूसरी सत्ता है ही नहीं, इसलिये उसमें ‘विजातीय भेद’ भी नहीं है। वह परमात्मतत्त्व सत्तारूपसे एक ही है।

जैसे, समुद्रमें तरंगें उठती हैं, बुद्‍बुद पैदा होते हैं, ज्वार-भाटा आता है, पर यह सब-का-सब जल ही है। इस जलसे भाप निकलती है। वह भाप बादल बन जाती है। बादलोंसे फिर वर्षा होती है। कभी ओले बरसते हैं। वर्षाका जल बह करके सरोवर, नदी-नालेमें चला जाता है। नदी समुद्रमें मिल जाती है। इस प्रकार एक ही जल कभी समुद्ररूपसे, कभी भापरूपसे, कभी बादलरूपसे, कभी बूँदरूपसे, कभी ओलारूपसे, कभी नदीरूपसे और कभी आकाशमें परमाणुरूपसे हो जाता है। समुद्र, भाप, बादल, वर्षा, बर्फ, नदी आदिमें तो फर्क दीखता है, पर जल-तत्त्वमें कोई फर्क नहीं है। केवल जल-तत्त्वको ही देखें तो उसमें न समुद्र है, न भाप है, न बूँदें हैं, न ओले हैं, न नदी है, न तालाब है। ये सब जलकी अलग-अलग उपाधियाँ हैं। तत्त्वसे एक जलके सिवाय कुछ भी नहीं है। इसी तरह सोनेके अनेक गहने होते हैं। उनका अलग-अलग उपयोग, माप-तौल, मूल्य, आकार आदि होते हैं। परन्तु तत्त्वसे देखें तो सब सोना-ही-सोना है। पहले भी सोना था, अन्तमें भी सोना रहेगा और बीचमें अनेक रूपसे दीखनेपर भी सोना ही है। मिट्टीसे घड़ा, हाँडी, ढक्कन, सकोरा आदि कई चीजें बनती हैं। उन चीजोंका अलग-अलग नाम, रूप, उपयोग आदि होता है। परन्तु तत्त्वसे देखें तो उनमें एक मिट्टीके सिवाय कुछ भी नहीं है। पहले भी मिट्टी थी, अन्तमें भी मिट्टी रहेगी और बीचमें अनेक रूपसे दीखनेपर भी मिट्टी ही है। इसी प्रकार पहले भी परमात्मा थे, बादमें भी परमात्मा रहेंगे और बीचमें संसाररूपसे अनेक दीखनेपर भी तत्त्वसे परमात्मा ही हैं— ‘वासुदेव: सर्वम्।’

यह संसार दीखता है, इसमें अलग-अलग शरीर हैं। स्थूल, सूक्ष्म और कारण—ये तीन शरीर हैं। कोई स्थिर रहनेवाला (स्थावर) शरीर है, कोई चलने-फिरनेवाला (जंगम) शरीर है। स्थिर रहनेवालोंमें कोई पीपलका वृक्ष है, कोई नीमका वृक्ष है, कोई आमका वृक्ष है, कोई करीलका वृक्ष है। तरह-तरहके पौधे हैं, घास हैं। चलने-फिरनेवालोंमें कई तरहके पशु-पक्षी, मनुष्य आदि हैं। ये सभी पृथ्वीपर हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश—ये पञ्चमहाभूत हैं। इनसे आगे समष्टि अहंकार है। फिर महत्तत्त्व (समष्टि बुद्धि) है। महत्तत्त्वके बाद फिर मूल प्रकृति है। ये सब मिलकर संसार हैं। संसारके आदिमें भी परमात्मा हैं, अन्तमें भी परमात्मा हैं और बीचमें अनेक रूपसे दीखते हुए भी तत्त्वसे परमात्मा ही हैं।

मनसा वचसा दृष्टॺा गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियै:।

अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमञ्जसा॥

(श्रीमद्भा० ११।१३।२४)

‘मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। अत: मेरे सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है—यह सिद्धान्त आप विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें अर्थात् स्वीकार कर लें।’

देखने, सुनने और चिन्तन करनेमें जितना संसार आता है, वह मोहमूल ही है; क्योंकि उसकी वास्तविक और स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं—

देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं।

मोह मूल परमारथु नाहीं॥

(मानस २। ९२। ४)

संसार पहले नहीं था, पीछे नहीं रहेगा, केवल बीचमें बना हुआ दीखता है। बनी हुई (बनावटी) चीज निरन्तर मिट रही है और स्वत:सिद्ध परमात्मतत्त्व ज्यों-का-त्यों विद्यमान है। वह एक परमात्मतत्त्व ही अनेक रूपोंसे दीखता है।

परमात्मतत्त्व एक होते हुए भी अनेक रूपोंसे दीखता है और अनेक रूपोंसे दीखनेपर भी स्वरूपसे एक ही रहता है। कारण कि वह एक ही था, एक ही है और एक ही रहेगा। वह एक रूपसे दीखे तो भी वही है और अनेक रूपसे दीखे तो भी वही है। जलसे बने भाप, बादल, बर्फ आदि सब जल ही है, सोनेसे बने गहने सोना ही है, मिट्टीसे बने बर्तन मिट्टी ही है। इसी तरह जो अनेक रूपोंमें एक परमात्मतत्त्वको ही देखता है, वही तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त, ज्ञानी-महात्मा होता है। कारण कि उसको यथार्थ ज्ञान हो गया, उसने परमात्माको तत्त्वसे जान लिया। तत्त्वसे जानते ही वह परमात्मामें प्रविष्ट हो जाता है—‘ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्’ (गीता १८। ५५)। फिर एक तत्त्व ही शेष रह जाता है।

परमात्मतत्त्व पहले एक था, पीछे एक रहेगा और अभी अनेक रूपोंसे दीखता है—ये तीनों बातें काल-(भूत, भविष्य और वर्तमान-) को लेकर हैं। परन्तु उस तत्त्वमें काल है ही नहीं। इसी तरह वहाँ न देश है, न क्रिया है, न वस्तु है, न व्यक्ति है, न घटना है, न परिस्थिति है, न अवस्था है। केवल एक अद्वैत तत्त्व है।

प्रश्न—परमात्मतत्त्वका स्वरूप क्या है?

उत्तर—परमात्मतत्त्वका स्वरूप है—सत्तामात्र। वह सब देशमें, सब कालमें, सम्पूर्ण वस्तुओंमें, सम्पूर्ण व्यक्तियोंमें, सम्पूर्ण अवस्थाओंमें, सम्पूर्ण घटनाओंमें, सम्पूर्ण परिस्थितिमें, सम्पूर्ण क्रियाओंमें ‘है’-(सत्ता) रूपसे विद्यमान है। उस चिन्मय, ज्ञानस्वरूप सत्तामें मैं, तू, यह, वहका भेद नहीं है। वह इन सबसे अतीत तत्त्व है। ये सब तो उसके भीतर की गयी कल्पनाएँ हैं। जैसे आकाशमें बादल हैं, समुद्रमें लहरें हैं, मनमें मनोराज्य है, स्वप्नद्रष्टामें स्वप्न है, ऐसे ही परमात्मतत्त्वमें देश, काल, वस्तु आदिकी प्रतीति है। वह तत्त्व सम्पूर्ण प्रतीतियोंका आश्रय, आधार और प्रकाशक है। उसके अन्तर्गत अनन्त ब्रह्माण्ड उत्पन्न और लीन होते रहते हैं, पर वह ज्यों-का-त्यों रहता है।

जब हम प्रतीतिको सत्ता देते हैं, तब यह कहते हैं कि परमात्मतत्त्व प्रतीतिका आश्रय, आधार और प्रकाशक है। जब सर्वत्रको सत्ता देते हैं, तब यह कहते हैं कि परमात्मतत्त्व सर्वत्र परिपूर्ण है। जब हम ‘नहीं’ की सत्ता मानते हैं, तब यह कहते हैं कि परमात्मतत्त्व ‘है’-रूपसे विद्यमान है। असत् की सत्ता माननेपर ही परमात्मतत्त्वको सत् कहते हैं। यदि असत् की सत्ता न मानें तो परमात्मतत्त्वको सत् कहना बनता ही नहीं! जैसे, हमारे यहाँ रात और दिन दो होते हैं; परन्तु सूर्यमें न रात होती है, न दिन होता है। वहाँ तो दिन-ही-दिन है, पर रात न होनेसे उसका नाम दिन नहीं है। दिन नाम रातकी अपेक्षासे होता है। रात नहीं है तो दिन कैसे?

राम सच्चिदानंद दिनेसा।

नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा॥

(मानस १।११६।३)

भगवान् ‘दिनेश’ (दिनके स्वामी) हैं—ऐसा तभी कहना पड़ता है, जब दिनकी सत्ता मानते हैं। वहाँ लवलेश-मात्र भी मोह-निशा नहीं है—ऐसा तभी कहना पड़ता है, जब निशाकी सत्ता मानते हैं। वहाँ दिन और निशा कहना बनता ही नहीं। ऐसा कहना वहीं बनता है, जहाँ द्वैत हो। ‘नोद्यं वा परिहारो वा क्रियतां द्वैतभाषया।’ अर्थात् शंका-समाधान द्वैतभाषासे ही होता है। तात्पर्य है कि दूसरेकी कुछ-न-कुछ सत्ता मानकर ही परमात्माका वर्णन, विवेचन, विचार, चिन्तन, प्रश्नोत्तर आदि होता है।

योगवासिष्ठमें रामजी और वसिष्ठजीका संवाद आता है। रामजीने वसिष्ठजीसे पूछा कि महाराज! आप जिस ब्रह्मकी बात कहते हैं, वह ब्रह्म क्या है, कैसा है? यह सुनकर वसिष्ठजी चुप हो गये। थोड़ी देरके बाद रामजीने फिर कहा कि महाराज! उस ब्रह्मका वर्णन कीजिये। वसिष्ठजीने कहा कि मैंने उसका वर्णन कर दिया! तात्पर्य है कि मौन ही उस ब्रह्मका वर्णन है। वहाँ इन्द्रियाँ नहीं हैं, मन नहीं है, बुद्धि नहीं है, प्रश्न नहीं है, उत्तर नहीं है, शब्द नहीं है, अर्थ नहीं है, कुछ नहीं है, केवल मौन है। मौन ही गुरुका व्याख्यान है, जिससे शिष्योंके सब सन्देह मिट जाते हैं—‘गुरोस्तु मौनमाख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशया:’।

उपनिषद्‍में शिष्य अपने गुरुके प्रति कहता है—

नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च।

यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च॥

(केन० २। २)

अहम्—मैं

सुवेद—तत्त्वको भलीभाँति जान गया हूँ—

इति न मन्ये—ऐसा मैं नहीं मानता (और)

नो इत—न ऐसा ही मानता हूँ कि

न वेद—मैं तत्त्वको नहीं जानता; (क्योंकि)

वेद च—जानता भी हूँ।

वेद—मैं तत्त्वको जानता हूँ (अथवा)

न वेद—नहीं जानता हूँ—

च इति नो—ऐसा सन्देह भी नहीं है।

न:—हमारेमेंसे

य:—जो कोई भी

तत्—उस तत्त्वको

वेद—जानता है,

तत्—वही मेरे उक्त वचनके तात्पर्यको

वेद—जानता है (कि यह अहंरहित सहजावस्था है)।

तात्पर्य है कि उस परमात्मतत्त्वमें मन, बुद्धि, वाणी आदिकी कोई गति नहीं होती—

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।

(तैत्तिरीय० २। ९)

‘मनसहित वाणी आदि सब इन्द्रियाँ उसे न पाकर जहाँसे लौट आती हैं।’

‘मन समेत जेहि जान न बानी’

(मानस १। ३४१। ४)

उस परमात्मतत्त्वका अनुभव उत्पन्न नहीं होता। यदि अनुभव उत्पन्न होगा तो वह मिट जायगा। परमात्मतत्त्व तो अनुभवस्वरूप ही है। केवल उसकी तरफ दृष्टि जाती है। दृष्टि जानेसे हृदय-ग्रन्थिका भेदन हो जाता है, सब संशय मिट जाते हैं और सम्पूर्ण कर्म नष्ट हो जाते हैं—

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया:।

क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे*॥

(मुण्डक० २। २। ८)

‘मैं हूँ’—यह हृदय-ग्रन्थि है। ‘है’ की तरफ दृष्टि हो जानेसे न ‘मैं’ रहता है और न ‘हूँ’ रहता है अर्थात् हृदय-ग्रन्थिका भेदन हो जाता है। परमात्मतत्त्व क्या है, कैसा है, कौन है—ये सन्देह नहीं रहते। संचित, क्रियमाण और प्रारब्ध कर्मोंका क्षय हो जाता है। परमात्मतत्त्व पर (प्रकृति) से भी पर है। सबसे पर (प्रकृति) भी जहाँ अवर (तुच्छ) हो जाती है अर्थात् वहाँतक नहीं पहुँच सकती, उस परावर (पर-से-पर) परमात्मतत्त्वका वर्णन हो ही कैसे सकता है? ऐसे परमात्मतत्त्वकी तरफ लक्ष्य होनेपर वह ज्यों-का-त्यों रह जाता है।

परमात्मतत्त्वके लिये कुछ भी कहें, सुनें, पढ़ें, विचार करें, चिन्तन करें, वह दूसरेकी कुछ-न-कुछ सत्ता माननेसे ही होगा। वास्तवमें उसका वर्णन, विचार, चिन्तन, संकेत आदि कुछ भी नहीं हो सकता। किसी देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, नाम, रूप आदिकी कुछ-न-कुछ कल्पना करके ही उसका वर्णन हो सकता है। ऐसा वह स्वत:सिद्ध चिन्मय तत्त्व है। उसका स्वरूप सत्तामात्र है, जिसकी किसी देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिके साथ कभी किञ्चिन्मात्र भी लिप्तता है नहीं, हुई नहीं, होगी नहीं, हो सकती नहीं।

प्रश्न—उस तत्त्वकी प्राप्तिके लिये क्या करना चाहिये?

उत्तर—परमात्मतत्त्व किसी देश, काल आदिमें बँधा हुआ नहीं है। वह सब देशमें, सब कालमें, सब वस्तुओंमें, सम्पूर्ण व्यक्तियोंमें, सम्पूर्ण घटनाओंमें, सम्पूर्ण परिस्थितियोंमें, सब अवस्थाओंमें विद्यमान है और इन सबसे अतीत भी है। जो सबमें विद्यमान है, वह हमारेमें भी विद्यमान है और जो सब समयमें विद्यमान है, वह अभी भी विद्यमान है। अगर वह हमारेमें नहीं है तो उसको सबमें विद्यमान नहीं कह सकते। अगर वह अभी नहीं है तो उसको सब समयमें विद्यमान नहीं कह सकते। जो हमारेमें है और अभी है, उसकी प्राप्तिके लिये परिश्रमकी जरूरत नहीं है। परिश्रम तो उसकी प्राप्तिमें होता है, जो देश, काल, वस्तु आदिसे कुछ दूर हो। अत: हम परिश्रम करेंगे, उद्योग करेंगे, पुरुषार्थ करेंगे, क्रिया करेंगे, तब उस तत्त्वकी प्राप्ति होगी—ऐसी बात नहीं है। क्रिया करनेसे तो हम उससे दूर होंगे; क्योंकि क्रिया प्रकृतिमें होती है और प्रकृति सत् नहीं है। प्रकृतिसे तो हमारा निरन्तर सम्बन्ध-विच्छेद हो रहा है। कोई भी अवस्था निरन्तर नहीं रहती। परन्तु सत्-तत्त्वसे किसीका भी सम्बन्ध-विच्छेद कभी हुआ नहीं, होगा नहीं, हो सकता नहीं और है नहीं। फिर उसके लिये किसी परिश्रमकी क्या आवश्यकता है? इसलिये शास्त्रमें आया है—‘सन्मात्रं सुगमं नृणाम्’ अर्थात् सत्तामात्रकी प्राप्ति मनुष्योंके लिये बहुत सुगम है। वास्तवमें उसकी प्राप्तिको सुगम कहना भी नहीं बनता। सुगमता-कठिनता तो अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिमें होती है। जो नित्यप्राप्त है, उसके लिये क्या सुगमता और क्या कठिनता? जैसे—‘मैं हूँ’ इस प्रकार अपनी सत्ताका अनुभव सभीको है। वस्तु, परिस्थिति, अवस्था आदिके अभावका अनुभव सबको होता है, पर स्वयंके अभावका अनुभव किसीको कभी नहीं होता, प्रत्युत सबको सदा ही अपने भावका अनुभव होता है। साधकको चाहिये कि वह ‘मैं हूँ’—इसमें ‘मैं’ को आदर न देकर ‘हूँ’ को अर्थात् निर्विकार नित्य सत्ताको आदर दे। ‘हूँ’ को आदर देनेसे ‘मैं’ (अहम्) मिट जायगा और ‘है’ रह जायगा।

अपनी सत्ता (होनापन) सत् है और मैं-पन (अहंकार) असत् है। असत् का त्याग करनेसे सत् का संग अर्थात् सत् में प्रेम होता है, सत् का साक्षात्कार होता है, सत् में निष्ठा होती है, सत् में स्थिति होती है। वास्तवमें असत् निरन्तर हमारा त्याग कर रहा है। जो निरन्तर हमारा त्याग कर रहा है, उसका ही त्याग करना है अर्थात् उसीसे विमुख होना है। शरीर निरन्तर हमारा त्याग कर रहा है, प्राण निरन्तर हमारा त्याग कर रहे हैं, मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ निरन्तर हमारा त्याग कर रही हैं। हम निरन्तर जी रहे हैं—यह तो वहम है, पर हम निरन्तर मर रहे हैं—यह सच्ची बात है। शरीर निरन्तर हमारेसे अलग हो रहा है—यही उसका निरन्तर मरना है। हम स्वयं ज्यों-के-त्यों हैं। स्वयंकी जो सत्ता बचपनमें थी, वही आज भी है। परन्तु शरीर जो बचपनमें था, वही आज है—ऐसा हम नहीं कह सकते। शरीर वह नहीं है, मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ वे नहीं हैं, भाव वे नहीं हैं, सिद्धान्त वे नहीं हैं, सामग्री वह नहीं है, साथी वे नहीं हैं, देश (स्थान) वह नहीं है, काल वह नहीं है, अवस्था वह नहीं है, परिस्थिति वह नहीं है; परन्तु मैं स्वयं वही हूँ जो पहले था। ‘मैं वही हूँ’—इसमें स्थिति होनेका नाम ही तत्त्वकी प्राप्ति है। इसीको जीवन्मुक्ति, तत्त्वज्ञान, कल्याण, उद्धार कहते हैं। यही असली सत्संग है। इसका उपाय यह है कि जब सुषुप्तिसे जाग्रत् में आयें अर्थात् नींदसे जग जायँ, तब अपने बिछौनेपर ही सुखपूर्वक बैठ जायँ और जाग्रत् में सुषुप्तिका अनुभव करें। तात्पर्य है कि जैसे सुषुप्तिमें कुछ भी याद नहीं था, अहम् भी याद नहीं था, ऐसे ही जाग्रत् में भी अहम् की याद न रहे अर्थात् अहम् की उपेक्षा कर दें।

अहम् नहीं है—इसमें ‘नहीं’ भी अहम् है और ‘है’ भी अहम् है। कारण कि ‘नहीं’ की अपेक्षा ‘है’ और ‘है’ की अपेक्षा ‘नहीं’ है। तत्त्वमें ‘नहीं’ और ‘है’ दोनों ही नहीं हैं अर्थात् तत्त्व निरपेक्ष है। इस प्रकार ‘अहम् नहीं है’—इसका भी निषेध कर दें और चुप हो जायँ। कुछ भी चिन्तन न करें, न संसारका, न परमात्माका, न स्वयंका। अगर चिन्तन आता है तो उसकी उपेक्षा कर दें। जो अपने-आप आता है, उसके पाप-पुण्यके भागी हम नहीं बनते। जैसे, संसारमें बहुत-सी हत्याएँ होती हैं और बहुत-सा उपकार होता है, पर हम न तो हत्याके पापके भागी होते हैं, न उपकारके पुण्यके भागी होते हैं। कारण कि वह होता है, हम नहीं करते। जो होता है, उसके साथ हमारा सम्बन्ध नहीं है। जो होता है, वह मिटता है। जो मिटता है, वह असत् है। जो असत् है, उसका हमारेसे स्वत: सम्बन्ध-विच्छेद है।

संकल्प पहले नहीं था, पीछे पैदा हो गया और फिर मिट जायगा। संकल्पका होना भी मिटनेमें है और मिटना भी मिटनेमें है। मिटनेके प्रवाहको ही होना कहते हैं। मरनेके प्रवाहको ही जीना कहते हैं। अत: जो संकल्प अपने-आप होता है, उसकी उपेक्षा कर दें। उसको न अच्छा समझें, न बुरा समझें; न अपना समझें, न दूसरेका समझें। वह बना रहे—यह भावना भी न करें और वह मिट जाय—यह भावना भी न करें। यही जीवन्मुक्त-अवस्था है। गीतामें आया है—

प्रकाशं च प्रवृतिं च मोहमेव च पाण्डव।

न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥

(१४।२२)

‘हे पाण्डव! प्रकाश, प्रवृत्ति तथा मोह—ये सभी अच्छी तरहसे प्रवृत्त हो जायँ तो भी गुणातीत मनुष्य ‘ये क्यों आ गये’—ऐसे इनसे द्वेष नहीं करता और ये सभी निवृत्त हो जायँ तो इनके आनेकी इच्छा नहीं करता।’

मनमें कोई भाव आ गया तो वह जायगा—यह नियम है। जो उत्पन्न हुआ है, वह मरेगा—यह नियम है। जाते हुएको हम भूलसे आया हुआ मान लेते हैं। वास्तवमें वह आया नहीं है, प्रत्युत जा रहा है। उत्पन्न नहीं हुआ है, प्रत्युत मर रहा है। जो जा रहा है, मर रहा है, उसके लिये क्या हर्ष और क्या शोक? क्या राजी और क्या नाराजी? जो जा रहा है, उसकी तरफ दृष्टि न डालें। सात्त्विक वृत्ति आयी या राजसी वृत्ति आयी अथवा तामसी वृत्ति आयी; संयोग हुआ या वियोग हुआ; आया या गया, कुछ न देखें—

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।

गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥

(गीता १४।२३)

‘जो उदासीनकी तरह स्थित है* और जो गुणोंके द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता तथा गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं—इस भावसे जो अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है और स्वयं कोई भी चेष्टा नहीं करता।’

वास्तवमें न कुछ आया है, न गया है; न उत्पन्न हुआ है, न नष्ट हुआ है, प्रत्युत गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं। अपना उससे कुछ प्रयोजन नहीं, कुछ लेन-देन नहीं। इस प्रकार तटस्थ रहकर चुप, शान्त हो जायँ तो हमारी स्थिति स्वत: तत्त्वमें ही रहेगी। तत्त्वमें स्वत:-स्वाभाविक स्थितिका नाम ही जीवन्मुक्ति है, कल्याण है, उद्धार है।

अभ्यास और विवेचन

परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके साधन दो प्रकारके हैं— क्रियाप्रधान और विवेकप्रधान। क्रियाप्रधान साधनमें अभ्यासकी मुख्यता होती है और विवेकप्रधान साधनमें विवेचनकी मुख्यता होती है। इन दोनोंमेंसे किसी भी साधनको करें, अन्तमें विवेककी मुख्यतासे ही परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होगी। कारण कि क्रियाका तो आदि और अन्त होता है, पर विवेकका आदि और अन्त नहीं होता। अत: परिणाममें क्रियाका तो अन्त हो जाता है और विवेक तत्त्वबोधमें परिणत हो जाता है।

विवेचनका स्वरूप है—गहरा विचार करना कि तत्त्व क्या है? विचार करनेसे जो अतत्त्व है, उसकी निवृत्ति हो जाती है। अतत्त्वकी निवृत्ति होनेपर तत्त्व ज्यों-का-त्यों शेष रह जाता है, अनुभवमें आ जाता है। अत: विवेचन परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका मुख्य साधन है। श्रीशंकराचार्यजी महाराज कहते हैं—

को दीर्घरोगो भव एव साधो किमौषधं तस्य विचार एव॥

(प्रश्नोत्तरी ७)

‘दीर्घरोग क्या है? हे साधो! संसारमें आना (जन्म-मरण) ही दीर्घरोग है। उसकी दवा क्या है? विचार ही उसकी दवा है।’ कारण कि अविचारसे ही बन्धन हुआ है।

विचार दो तरहका होता है। एक विचार करना होता है और एक विचार उदय होता है। जो विचार किया जाता है, उसमें तो क्रिया है; परन्तु जो विचार उदय होता है, उसमें क्रिया नहीं है। विचार करनेमें तो बुद्धिकी प्रधानता रहती है, पर विचार उदय होनेपर बुद्धिसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। अत: तत्त्वबोध विचार करनेसे नहीं होता, प्रत्युत विचार उदय होनेसे होता है। तात्पर्य है कि तत्त्वप्राप्तिके उद्देश्यसे विचार करते-करते ‘संसारके साथ मेरा सम्बन्ध है ही नहीं, हुआ ही नहीं, होगा ही नहीं, होना सम्भव ही नहीं’—इस विचारका उदय होता है। विचारका उदय होते ही विवेक बोधमें परिणत हो जाता है अर्थात् असत् से सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और सम्बन्ध-विच्छेद होते ही तत्त्वबोध हो जाता है। विचारका उदय होनेको ही गीताने ‘स्मृतिर्लब्धा’ (१८। ७३) कहा है।

विवेचनसे विचारका उदय होता है और अभ्याससे नयी अवस्था पैदा होती है। उदय होना और पैदा होना—दोनोंमें बड़ा अन्तर है। जो चीज उदय होती है, वह पहलेसे ही विद्यमान होती है और जो चीज पैदा होती है, वह पहलेसे विद्यमान नहीं होती। जैसे, सूर्य उदय होता है, पैदा नहीं होता। हमारी आँखोंके आगेसे आड़ हट जाती है तो उसको सूर्यका उदय होना कह देते हैं और आगे आड़ आ जाती है तो उसको सूर्यका अस्त होना कह देते हैं। जिस जगहसे सूर्यका उदय होना दीखता है, उसको ‘उदयाचल’ कहते हैं और जिस जगहसे सूर्यका अस्त होना दीखता है, उसको ‘अस्ताचल’ कहते हैं। वास्तवमें प्रत्येक जगह ही उदयाचल और अस्ताचल है। ऐसे ही अविचार (अज्ञान) की आड़ हट जाती है तो उसको विचारका उदय होना कहते हैं। वास्तवमें अज्ञान है नहीं, तभी वह मिटता है। अज्ञानका अर्थ ज्ञानका अभाव नहीं है, प्रत्युत विवेकका अनादर करना, जाने हुएको महत्त्व न देना ही अज्ञान है।

जीव सत्यसंकल्प परमात्माका अंश है। अत: जब यह अपनेमें अज्ञानको स्वीकार कर लेता है, तब अज्ञानकी सत्ता न होनेपर भी सत्ता दीखने लग जाती है—

जासु सत्यता तें जड़ माया।

भास सत्य इव मोह सहाया॥

(मानस १। ११७। ४)

इसलिये अज्ञानका नाश एक ही बार होता है और सदाके लिये होता है—‘यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।’ (गीता ४। ३५) कारण कि जब अज्ञानकी सत्ता ही नहीं है, तो फिर पुन: अज्ञान कैसे होगा? अत: नित्यनिवृत्त अज्ञानकी ही निवृत्ति होती है और नित्यप्राप्त तत्त्वकी ही प्राप्ति होती है।

अभ्याससे अप्राप्तकी प्राप्ति होती है और विवेचनसे नित्यप्राप्तकी प्राप्ति होती है। अत: अभ्यास सांसारिक वस्तुकी प्राप्तिमें काम आता है और विवेचन परमात्मतत्त्वकी खोजमें काम आता है। यद्यपि विवेचनके बिना अभ्यास नहीं होता, तथापि केवल विवेचनसे सांसारिक वस्तुकी प्राप्ति नहीं होती। जैसे, तबला बजाना सीखते हैं तो पहले उसका विवेचन करते हैं, बोल सीखते हैं, फिर उसका अभ्यास करते हैं। केवल विवेचन करनेसे मनुष्य बोल तो सीख जाता है, पर तबला नहीं बजा सकता। परन्तु केवल विवेचन करनेसे मनुष्य परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर सकता है।

अभ्याससे नींद आती है और विवेचनसे नींद उड़ जाती है। कारण कि जितना अधिक अभ्यास करते हैं, उतनी ही थकावट आती है और विवेचनमें जितना गहरा उतरते हैं, उतनी ही थकावट दूर होती है तथा बुद्धिमें स्वच्छता आती है। अभ्याससे एक नयी अवस्थाका निर्माण होता है और विवेचनसे अवस्थातीत तत्त्वका अनुभव होता है।

परमात्मतत्त्व नित्यप्राप्त है; अत: उसकी खोज (नित्यप्राप्तकी प्राप्ति) होती है, निर्माण (अप्राप्तकी प्राप्ति) नहीं। परमात्मतत्त्वकी खोजके लिये जब साधक विवेचन करता है, तब उसका विवेक विकसित होकर तत्त्वबोधमें परिणत हो जाता है। परन्तु जब वह केवल सीखनेके लिये विवेचन करता है, तब वह अत्यधिक मोहमें आबद्ध हो जाता है—‘द्वैताद्वैतमहामोह:’। कारण कि सीखना बुद्धिका संग्रह (परिग्रह) है। यह सिद्धान्त है कि संग्रह संग्रहीको दबाता (पराधीन बनाता) है, उसकी फजीती करता है और त्याग त्यागीको स्वतन्त्र बनाता है, उसकी इज्जत बढ़ाता है। जैसे, धनका संग्रह करनेवाला धनके कारण अपनेको बड़ा मानता है तो वास्तवमें धन ही बड़ा हुआ, वह खुद तो छोटा ही हुआ! वह अपनेको धनका मालिक मानता है, पर वास्तवमें उसका गुलाम हो जाता है तो यह उसकी फजीती ही हुई! तात्पर्य है कि संग्रहमें जडकी मुख्यता होती है और त्यागमें चेतनकी मुख्यता होती है। अत: संग्रह करनेसे स्वयं दब जाता है तथा जड़ता आ जाती है और अनुभवसे संग्रह दब जाता है तथा चेतनता आ जाती है। संग्रह कितना ही क्यों न हो, सीमित ही होता है, पर त्याग सदा असीम होता है। सीमित वस्तुसे सीमित संसारकी प्राप्ति होती है और असीम वस्तुसे असीम परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होती है। अत: साधकको परमात्मतत्त्वकी खोज (अनुभव) के लिये विवेचन करना चाहिये, बुद्धिके संग्रहके लिये अर्थात् सीखनेके लिये नहीं। इसलिये सन्तोंने कहा है—

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।

मैं बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ॥