जित देखूँ तित तू

‘वासुदेव: सर्वम्’ ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—यह गीताका मुख्य सिद्धान्त है। गीताने इसीको महत्त्व दिया है। जड-चेतन, स्थावर-जंगम, उद्भिज्ज-स्वेदज-जरायुज-अण्डज, चौरासी लाख योनियाँ, चौदह भुवन, अनन्त ब्रह्माण्ड सब कुछ भगवान् ही हैं। इस भावके कई श्लोक गीतामें आये हैं; जैसे—

‘येन सर्वमिदं ततम्’ (२। १७, ८। २२, १८। ४६)

‘मत्त: परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति’ (७। ७)

‘वासुदेव: सर्वम्’ (७। १९)

‘मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना’ (९। ४)

‘सदसच्चाहमर्जुन’ (९। १९)

‘अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च’ (१०। २०)

‘सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन’ (१०। ३२)

‘न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्’ (१०। ३९)

‘बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च’ (१३। १५)

गीतामें जो विभूतियाँ बतायी गयी हैं, उनका तात्पर्य भी यही है कि एक भगवान् के सिवाय कुछ नहीं है*। जितनी भी विभूतियाँ हैं, वे सब भगवान् के ऐश्वर्य हैं। ब्रह्म भी भगवान् की एक ‘विभूति’ है, ऐश्वर्य है। इसलिये भगवान् ने कहा है—‘ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्’ (१४। २७) अर्थात् मैं ब्रह्मका आधार हूँ। असत् की सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है। असत् परिवर्तनशील है और सत् अपरिवर्तनशील है। ये सत् और असत् —दोनों ही भगवान् की विभूतियाँ हैं—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (९। १९)।

गीतामें भगवान् ने ब्रह्मको भी ‘माम्’ (अपना स्वरूप) कहा है—‘ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन्’ (८।१३), देवताओंको भी ‘माम्’ कहा है—‘येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विता:। तेऽपि मामेव.....’ (९। २३), इन्द्रको भी ‘माम्’ कहा है—‘त्रैविद्या मां सोमपा:’ (९।२०), उत्तम गतिको भी ‘माम्’ कहा है—‘मामेवानुत्तमां गतिम्’ (७। १८), क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) को भी ‘माम्’ कहा है—‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि’ (१३। २), सबके शरीरमें रहनेवाले अन्तर्यामीको भी ‘माम्’ कहा है—‘मामात्मपरदेहेषु’ (१६। १८), सम्पूर्ण प्राणियोंके बीजको भी ‘माम्’ कहा है—‘बीजं मां सर्वभूतानाम्’ (७।१०) आदि।

तात्पर्य है कि सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार तथा मनुष्य, देवता, पशु, पक्षी, भूत, प्रेत, पिशाच आदि जो कुछ भी है, वह सब मिलकर भगवान् का ही समग्ररूप है अर्थात् सब भगवान् की ही विभूतियाँ हैं, उनका ही ऐश्वर्य है। ये सब-की-सब विभूतियाँ अव्यय (अविनाशी) हैं। इसलिये गीताने समग्ररूप अर्थात् विराट्‍रूपको भी अव्यय कहा है—‘योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्’ (११।४), ‘त्वमव्यय: शाश्वतधर्मगोप्ता’ (११।१८), निर्गुण-निराकारको भी अव्यय कहा है—‘ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाह-ममृतस्याव्ययस्य च’ (१४।२७), ‘सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते’ (१८। २०), सगुण-साकारको भी अव्यय कहा है—‘तस्य कर्तारमपि मां विद्धॺकर्तारमव्ययम्’ (४।१३),‘परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्’ (७। २४), ‘मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्’ (७। २५), ‘यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वर:’ (१५।१७), परमपदको भी अव्यय कहा है—‘पदमव्ययम्’ (१५। ५,१८। ५६), योगको भी अव्यय कहा है—‘इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्’ (४। १), विज्ञानसहित ज्ञानको भी अव्यय कहा है—‘सुसुखं कर्तुमव्ययम्’ (९।२)।

सब कुछ भगवान् ही हैं—इसका अनुभव करनेवाले भक्तको भगवान् ने अत्यन्त दुर्लभ महात्मा कहा है—

वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:।

(गीता ७।१९)

यहाँ ‘वासुदेव:’ शब्द पुँल्लिङ्गमें आया है; अत: यहाँ ‘वासुदेव: सर्व:’ कहा जाना चाहिये था। परन्तु यहाँ ‘सर्व:’ न कहकर ‘सर्वम्’ कहा गया है, जो नपुंसकलिङ्गमें है। अगर तीनों लिङ्गों (सर्व:, सर्वा, सर्वम्), का एकशेष किया जाय तो नपुंसकलिङ्ग (सर्वम्) ही एकशेष रहता है। नपुंसकलिङ्गके अन्तर्गत तीनों लिङ्ग आ जाते हैं। अत: ‘सर्वम्’ शब्दमें स्त्री, पुरुष और नपुंसक—सबका समाहार हो जाता है। गीतामें जगत्, जीव और परमात्मा—इन तीनोंके लिये पुँल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग—इन तीनों ही लिङ्गोंका प्रयोग हुआ है*। इससे तात्पर्य निकलता है कि जगत्, जीव और परमात्मा—ये तीनों ही ‘सर्वम्’ शब्दके अन्तर्गत हैं। अत: तीनों लिङ्गोंसे कही जानेवाली सब-की-सब वस्तुएँ, व्यक्ति, परिस्थिति आदि परमात्मा ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्।’ इसमें ‘सर्वम्’ तो असत् है और ‘वासुदेव:’ सत् है। असत् का भाव विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है—

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।

(गीता २।१६)

तात्पर्य है कि सत्-ही-सत् है, असत् है ही नहीं। वासुदेव-ही-वासुदेव है, ‘सर्वम्’ है ही नहीं। सत् का होनापना स्वत:सिद्ध है और असत् का न होनापना स्वत:सिद्ध है। सत्, चित्, आनन्द तथा अद्वैतका भाव-ही-भाव है और असत्, जड, दु:ख तथा द्वैतका अभाव-ही-अभाव है। जब असत् की सत्ता ही नहीं है, तो फिर सत्-ही-सत् रहा—यही ‘वासुदेव: सर्वम्’ है।

विवेक वहीं काम करता है, जहाँ सत् और असत्— दोनोंका विचार होता है। जब असत् है ही नहीं तो फिर विवेक क्या करे? असत् को मानें तो विवेक है और असत् को न मानें तो विश्वास है। विवेकमें सत्-असत् का विभाग है, विश्वासमें विभाग है ही नहीं। विश्वासमें केवल सत्-ही-सत् अर्थात् परमात्मा-ही-परमात्मा हैं।

असत् की सत्ता माननेसे ही संयोग और वियोग हैं। असत् को सत्ता न दें तो न संयोग है, न वियोग है, प्रत्युत ‘योग’ (नित्ययोग) है।

प्रश्न—असत् की सत्ता न मानते हुए भी असत् का आकर्षण क्यों रहता है? काम, क्रोध, लोभ, अभिमान आदि दोष क्यों रहते हैं?

उत्तर—इसलिये रहते हैं कि असत् की सत्ता न होते हुए भी उसकी सत्ता स्वीकार कर ली और उससे भी अधिक उसकी महत्ता, श्रेष्ठता स्वीकार कर ली। मनुष्य भूतकालके दोषको स्वीकार करके ही अपनेको दोषी मानता है, जबकि भूतकाल अभी है ही नहीं। दोष आगन्तुक है, पर निर्दोषता स्वत:सिद्ध है। दोष आनेसे पहले भी निर्दोषता थी और दोष जानेके बाद भी निर्दोषता रहेगी। अत: दोषके समय भी निर्दोषता निरन्तर ज्यों-की-त्यों है, पर उधर मनुष्यकी दृष्टि नहीं जाती। दोष तो आता-जाता है, फिर रहनेवाली तो निर्दोषता ही हुई। अत: निर्दोषता सच्ची है, दोष सच्चा नहीं है। जो आगन्तुक है, वह सच्चा कैसे हो सकता है?

जब त्याज्य वस्तु (असत्) है ही नहीं तो फिर किसका त्याग करें? किसका निषेध करें? एक कहावत है—‘नंगा क्या धोवे और क्या निचोड़े?’ जिसकी सत्ता ही नहीं है, उसके त्यागका अभिमान कैसे? न त्याग है, न त्यागका अभिमान है और न त्यागी है, होना सम्भव ही नहीं! मनुष्य दिनमें एक-दो घण्टे व्याख्यान देता है, पर ‘मैं वक्ता हूँ’—यह फूँक हरदम भरी रहती है। वास्तवमें सभी मनुष्य वक्ता और श्रोता हैं; क्योंकि सभी बोलते हैं और सभी सुनते हैं। परन्तु मनुष्यमें वक्तापनका अभिमान तब आता है, जब उसमें यह भाव आ जाता है कि ‘मैं समझता हूँ, दूसरे नहीं समझते; मेरेमें समझ है, दूसरेमें समझ नहीं है; और मैंने समझ लिया है, दूसरेने नहीं समझा है। अत: मैं दूसरोंको समझाता हूँ अथवा समझा सकता हूँ।’ वास्तवमें समझदार वही है, जो अपनेको बेसमझ मानता है। अर्थात् जिसमें समझदारीका अभिमान नहीं है*।

वास्तविक दृष्टिसे देखें तो सब कुछ वासुदेव ही है। समझदार भी वही है, बेसमझ भी वही है और समझ भी वही है। वक्ता भी वही है, श्रोता भी वही है और व्याख्यान भी वही है। वे ही अनेक रूपोंसे तरह-तरहकी लीलाएँ करते हैं। इस वास्तविकताको जाननेपर फिर कौन अभिमान करे और किसका अभिमान करे? तात्पर्य है कि जो नहीं है, उसको सत्ता और महत्ता देनेसे ही अभिमान आदि सब दोष आते हैं।

भगवान् कहते हैं—

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।

मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥

(गीता ७।१२)

‘जितने भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं, वे सब मेरेसे ही होते हैं—ऐसा समझो। परन्तु मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं।’

अपना कुछ स्वार्थ रखें, लेनेकी इच्छा रखें, तभी सात्त्विक, राजस और तामस—तीन भेद होते हैं। यदि अपना कोई स्वार्थ न रखें तो ये भगवान् के ही स्वरूप हैं। इनको अपने लिये मानना, इनसे सुख लेना ही पतनका कारण है।

सात्त्विक-राजस-तामस भावोंमें भगवान् नहीं हैं और भगवान् में सात्त्विक-राजस-तामस भाव नहीं है—इसका तात्पर्य है कि सात्त्विक-राजस-तामस भाव (पदार्थ और क्रियाएँ) हैं ही नहीं, प्रत्युत सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान् से उत्पन्न होनेके कारण सब भाव भगवान् के ही स्वरूप हुए (गीता १०। ४-५)।

प्रश्न—जब सात्त्विक, राजस और तामस—सभी भाव परमात्मासे ही प्रकट होते हैं तो फिर ‘मैं उनमें नहीं हूँ, वे मेरेमें नहीं हैं’—यह कैसे?

उत्तर—जैसे जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, समाधि और मूर्च्छा—ये पाँचों अवस्थाएँ हमारेमें होनेपर भी हम इन पाँचोंसे अतीत हैं। कारण कि अवस्थाएँ बदलती हैं, पर हम वही रहते हैं। इन अवस्थाओंके भाव, अभाव और परिवर्तनका अनुभव तो सबको होता है, पर अपने अभाव और परिवर्तनका अनुभव कभी किसीको नहीं होता। अगर हम अवस्थाओंमें होते और अवस्थाएँ हमारेमें होतीं तो हम सदा एक अवस्थामें ही रहते और अवस्थाका परिवर्तन होता ही नहीं। अवस्थाओंके परिवर्तनका अनुभव उसीको हो सकता है, जो अवस्थाओंसे अतीत और अपरिवर्तनशील है। ऐसे ही सात्त्विक, राजस और तामस भावोंमें परिवर्तन होता रहता है, पर परमात्मा ज्यों-के-त्यों रहते हैं। अत: परमात्मासे सब कुछ होते हुए भी वे सबसे अतीत हैं।

परमात्मतत्त्व अक्रिय है। परन्तु अक्रिय होनेपर भी वह सम्पूर्ण क्रियाओं और शक्तियोंका केन्द्र है। सभी सक्रियता उस अक्रिय तत्त्वसे ही आती है। जैसे, सुषुप्ति अवस्थामें हम अक्रिय होते हैं तो उससे शरीरमें एक शक्ति, ताजगी, स्फूर्ति आती है। सम्पूर्ण सात्त्विक, राजस और तामस भाव (पदार्थ और क्रिया) उसीसे प्रकट होते हैं। उसमें सब कुछ है और कुछ नहीं है। एक सिद्धान्त है कि जिसमें कुछ नहीं होता, उसमें सब कुछ होता है और जिसमें सब कुछ होता है, उसमें कुछ नहीं होता। अत: सबसे अतीत होता हुआ भी सब कुछ वही है। मालिक भी वही है, दास भी वही है। प्रिया भी वही है, प्रियतम भी वही है। भगवान् भी वही है, भक्त भी वही है। साध्य भी वही है, साधक भी वही है। सब कुछ वही होते हुए भी वह सबसे अतीत भी है*। उसीको गीताने ‘समग्र’ नामसे कहा है। वह समग्र ही ‘वासुदेव: सर्वम्’ है।

‘मैं उनमें नहीं हूँ, वे मेरेमें नहीं हैं’—ऐसा कहकर भगवान् ने यह भाव प्रकट किया है कि यदि कोई मनुष्य मेरेको सत्ता और महत्ता न देकर सात्त्विक, राजस और तामस गुण, पदार्थ तथा क्रियाको सत्ता और महत्ता देगा, वह जन्म-मरणमें चला जायगा—‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३। २१)। ‘सब गुण मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं’— ऐसा कहकर भगवान् ने यह भाव प्रकट किया है कि साधककी दृष्टि इन गुणोंकी तरफ न जाकर मेरी (गुणातीतकी) तरफ ही जानी चाहिये अर्थात् मेरी सत्ता मानकर मेरेको ही महत्ता देनी चाहिये, जिससे कि मेरी प्राप्ति हो जाय।

परमात्मा शरीरमें ‘हूँ’ रूपसे और संसारमें ‘है’ रूपसे विद्यमान हैं*। ‘हूँ’ और ‘है’ एक हैं तथा शरीर और संसार एक हैं। एक तरफ ‘हूँ’ और एक तरफ ‘है’ है तथा इन दोनोंके बीचमें शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि और उनका विषय अर्थात् संसार (मैं-पन)की मान्यता है। ‘हूँ’ और ‘है’ सत् हैं तथा शरीर और संसार असत् हैं। सत्-सत् एक रहा, बीचमें असत् आ गया। असत् को सत्ता और महत्ता देनेसे ही ‘हूँ’ और ‘है’ के बीचमें आड़ (मैं-पन) आ गयी। यह आड़ न रहे तो ‘हूँ’ का आकर्षण स्वत: ‘है’ में हो जायगा—यही प्रेम है। कारण कि अंशीकी तरफ अंशका आकर्षण स्वत: होता है; जैसे—पृथ्वीका अंश होनेसे ऊपर फेंके गये पत्थरका आकर्षण स्वत: पृथ्वीकी तरफ होता है और सूर्यका अंश होनेसे अग्निकी लपटें स्वत: ऊपर उठती हैं।

रामायणमें आया है—

जासु सत्यता तें जड़ माया।

भास सत्य इव मोह सहाया॥

(मानस, बाल० ११७।४)

—यहाँ ‘असत् माया’ न कहकर ‘जड माया’ कहनेसे दो अर्थ निकलते हैं—(१) जिसकी सत्यतासे असत् माया भी मूढ़तासे सत् दीखती है और (२) जिसकी चेतनतासे जड माया भी मूढ़तासे चेतन दीखती है, वह सत् और चेतन तत्त्व परमात्मा हैं—

ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी।

सत चेतन घन आनँद रासी॥

(मानस, बाल० २३।३)

परमात्मामें जगत् को देखना नास्तिकता है; क्योंकि वास्तवमें जगत् है नहीं। जगत् में परमात्माको देखना आस्तिकता है; क्योंकि वास्तवमें परमात्मा ही हैं। नास्तिक संसारी होता है और आस्तिक साधक होता है। कल्याण आस्तिकका होता है, नास्तिकका नहीं; क्योंकि नास्तिककी दिशा विपरीत है।

परमात्मामें जगत् को देखनेसे जगत् ही दीखता है, परमात्मा नहीं दीखते और जगत् में परमात्माको देखनेसे परमात्मा ही दीखते हैं, जगत् नहीं दीखता। जगत् में परमात्माको देखनेका साधन है—जगत् की वस्तुओंको केवल सेवा-सामग्री मानना और व्यक्तियोंको परमात्माका स्वरूप मानकर उस सेवा-सामग्रीसे उनकी सेवा करना, उनको सुख पहुँचाना। सेवा-सामग्रीको अपनी न मानकर सेव्य (परमात्मा) की ही माने। जैसे, गङ्गाजलसे गङ्गाका पूजन किया जाय, दीपकसे सूर्यका पूजन किया जाय, ऐसे ही भगवान् की ही वस्तु भगवान् के अर्पित करनी है—‘त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये’। अगर वस्तुओंको अपनी मानकर उनसे सुख लेंगे तो वस्तुएँ बड़ी हो जायँगी और हम छोटे (दास) हो जायँगे। इतना ही नहीं, देहाभिमान मुख्य होनेसे हम जडतामें चले जायँगे, हमारी चेतनता आच्छादित हो जायगी।

भगवान् कहते हैं—

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।

मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥

(मानस, किष्किन्धा० ३)

यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥

(गीता १८।४६)

‘जिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।’

यदि व्यक्तियोंको परमात्माका स्वरूप मानकर वस्तुओंसे उनकी सेवा की जाय तो संसार लुप्त हो जायगा और परमात्मा प्रकट हो जायँगे अर्थात् ‘सब कुछ परमात्मा ही है’—इसका अनुभव हो जायगा। जैसे रस्सीमें साँपका भ्रम मिटनेपर साँप तो लुप्त हो जाता है, पर रस्सी तो रहती ही है, ऐसे ही परमात्मामें जगत् का भ्रम मिटनेपर जगत् तो लुप्त हो जाता है, पर परमात्मा तो रहते ही हैं। संसारकी तो मान्यता है, पर ‘परमात्मा हैं’ यह वास्तविकता है।

भगवान् कहते हैं—

नरेष्वभीक्ष्णं मद्भावं पुंसो भावयतोऽचिरात्।

स्पर्धासूयातिरस्कारा: साहङ्कारा वियन्ति हि॥

(श्रीमद्भा० ११।२९।१५)

जब साधक समस्त स्त्री-पुरुषोंमें निरन्तर मेरा ही भाव करता है अर्थात् मेरेको ही देखता है*, तब शीघ्र ही उसके चित्तसे स्पर्द्धा, ईर्ष्या, तिरस्कार आदि दोष अहङ्कारके सहित दूर हो जाते हैं।’

यही बात सन्तोंने भी कही है—

तू तू करता तू भया, मुझमें रही न हूँ।

वारी फेरी बलि गई, जित देखूँ तित तू॥

गीतामें संसारको परमात्माका स्वरूप भी कहा गया है—‘वासुदेव: सर्वम्’ (७। १९) और दु:खालय (दु:खोंका घर) भी कहा गया है—‘दु:खालयमशाश्वतम्’ (८। १५)। इसका तात्पर्य है कि जो संसारकी वस्तु, व्यक्ति और क्रियासे सुख लेता है, उसके लिये तो संसार भयंकर दु:ख देनेवाला है, पर जो वस्तु और क्रियासे व्यक्तियोंकी सेवा करता है, उसके लिये संसार परमात्माका स्वरूप है। सुखकी आशा, कामना और भोग महान् दु:खोंके कारण हैं। इसलिये वस्तु, व्यक्ति और क्रियासे सुख लेना ही नहीं है। जिस क्षण सुखबुद्धिका त्याग है, उसी क्षण परमात्माकी प्राप्ति है—‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२।१२)।

वस्तुओंको व्यक्तियोंकी सेवामें लगाना साधन है और वस्तुओं तथा व्यक्तियोंसे सुख लेना घोर असाधन है। जिसके जीवनमें कभी साधन और कभी असाधन रहता है, उसके जीवनमें असाधनकी ही मुख्यता रहती है। सुखभोग और संग्रह ही जिसका उद्देश्य है, वह असाधक है। ऐसा मनुष्य साधन करना तो दूर रहा, साधन करनेका निश्चय भी नहीं कर सकता१। परन्तु जिसका उद्देश्य भोग और संग्रहका है ही नहीं, प्रत्युत केवल परमात्मप्राप्तिका है, वह साधक है। ऐसा मनुष्य यदि किसी कारणसे दुराचारी भी हो तो भी शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और परमशान्तिको प्राप्त हो जाता है२।

प्रश्न—जब सब कुछ भगवान् ही हैं तो फिर यह संसार कहाँसे आया? जीव संसार-बन्धनमें कैसे पड़ा?

उत्तर—संसार न तो भगवान् की दृष्टिमें है और न जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ, भगवत्प्रेमी महात्माकी दृष्टिमें है, प्रत्युत जीवकी दृष्टि (मान्यता) में है। अत: संसारको सत्ता और महत्ता जीवने दी है—‘जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७। ५)। जीव वास्तवमें संसारमें नहीं फँसा है, प्रत्युत अपनी भावनामें फँसा है—

सब जग ईश्वर-रूप है, भलो बुरो नहिं कोय।

जैसी जाकी भावना, तैसो ही फल होय॥

जीवने संसारकी सत्ता मान ली और सत्ता मानकर उसको महत्ता दे दी। महत्ता देनेसे कामना अर्थात् सुखभोगकी इच्छा पैदा हुई, जिससे जीव जन्म-मरणमें पड़ गया। तात्पर्य यह हुआ कि एक भगवान् के सिवाय दूसरी सत्ता माननेसे ही जीव संसार-बन्धनमें पड़ा है। अत: दूसरी सत्ता न माननेकी जिम्मेवारी जीवकी ही है। अगर वह संसारकी सत्ता न माने तो संसार है ही कहाँ?

ज्ञानमार्गमें तो अज्ञान बाधक है, पर भक्तिमार्गमें एक भगवान् के सिवाय अन्यकी सत्ता और महत्ता बाधक है। कारण कि वास्तवमें अज्ञानकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं, अधूरे तथा विपरीत ज्ञानको ही अज्ञान कह देते हैं। इसी तरह भगवान् के सिवाय अन्यकी सत्ता है ही नहीं, भगवान् के ऐश्वर्यको ही संसार कह देते हैं। अज्ञान मिटता है विवेकका आदर करनेसे और अन्यकी सत्ता मिटती है भोगबुद्धिका त्याग करनेसे*।

प्रश्न—पहलेसे ही सुखभोगकी जो आदत पड़ी हुई है, वह कैसे मिटे?

उत्तर—सुखभोगकी आदत मिटानेके लिये उद्देश्य और अहंता—दोनोंको बदलना आवश्यक है। मनुष्यशरीर भोग भोगनेके लिये है ही नहीं—‘एहि तन कर फल बिषय न भाई’ (मानस, उत्तर० ४४। १)। अत: मेरा उद्देश्य भोग और संग्रह करनेका नहीं है, प्रत्युत परमात्माको प्राप्त करनेका ही है—यह उद्देश्यको बदलना है। मैं भोगी नहीं हूँ, प्रत्युत मैं तो साधक ही हूँ—यह अहंताको बदलना है। मनुष्य उद्देश्यको दृढ़ करता नहीं और अहंताको बदलता नहीं, इसी कारण उसकी आदत नहीं सुधरती। आदतका सुधार किये बिना मनुष्य भले ही व्याख्यान दे दे, सब शास्त्र पढ़ ले, पुस्तकें लिख ले, लोगोंकी दृष्टिमें महात्मा बन जाय तो भी उसका कल्याण नहीं हो सकता।

एक बार मथुराके कुछ सज्जन रातको भोजन करके, भाँग पीकर विश्रामघाटपर आये और एक नौकापर बैठ गये। उन्होंने विचार किया कि यमुना स्वत: प्रयागराज जाती है और हमें भी प्रयागराज जाना है; अत: नौकामें बैठकर हम सुगमतासे प्रयागराज पहुँच जायँगे। ऐसा विचार करके उन्होंने ‘जय यमुना मैयाकी’ कहा और नौका खेने लगे। वे रातभर नौका खेते रहे। सुबह होते ही उन्होंने एक शहर देखा तो किसी व्यक्तिसे पूछा कि यह कौन-सा शहर है? उसने बताया—यह मथुरा है। फिर पूछा कि यह घाट कौन-सा है? उसने कहा—विश्रामघाट। वे बोले—अरे! हम तो विश्रामघाटसे ही चले थे और वहीं पहुँच गये, क्या बात है? देखा तो पता चला कि नौकाकी रस्सी तो खोली ही नहीं और रातभर यों ही नौका खेनेकी मेहनत करते रहे! उद्देश्यको दृढ़ किया नहीं और अहंताको बदला नहीं—यही रस्सीको न खोलना है।

प्रश्न—‘मैं साधक हूँ’—इस तरह अहंताको बदलनेपर तो अभिमान आ जायगा, जिससे साधकका पतन होगा?

उत्तर—अहंता बदलनेसे साधकमें यह भाव आयेगा कि मैं साधक हूँ तो साधनसे विरुद्ध कोई कार्य कर ही नहीं सकता। मैं साधक हूँ तो असाधन कैसे कर सकता हूँ? मैं सत्यवादी हूँ तो असत्य कैसे बोल सकता हूँ? मैं ईमानदार हूँ तो बेईमानी कैसे कर सकता हूँ? मैं साहूकार हूँ तो चोरी कैसे कर सकता हूँ? जैसी अहंता होगी, वैसी ही क्रिया होगी। अभिमान तभी आता है, जब साधक दूसरोंको सामने रखता है, उसके साथ अपनी तुलना करता है। दूसरोंको देखनेसे उसको उनकी अपेक्षा अपनेमें विशेषता दीखती है, जिससे अभिमान आ जाता है। दूसरोंके कर्तव्यको देखना अपना कर्तव्य नहीं है, प्रत्युत अकर्तव्य है। इसलिये साधकको केवल अपने कर्तव्यका पालन करना है। दूसरे अपने कर्तव्यका पालन करते हैं या नहीं, उधर दृष्टि ही नहीं डालनी है। फिर साधकमें अभिमान नहीं आयेगा। भक्त तो दूसरोंको भगवान् का स्वरूप मानता है—‘मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत’ (मानस, किष्किन्धा० ३)। इसलिये उसमें अभिमान आता ही नहीं। तात्पर्य है कि दूसरोंको असाधक माननेसे ही साधकमें अभिमान आता है। दूसरोंको असाधक मानना असाधन है, जो पतन करनेवाला है। इसलिये साधकका यह भाव रहना चाहिये कि मैं साधक हूँ तो साधन करनेके लिये, न कि दूसरोंको असाधक माननेके लिये।

अहम् में बैठी हुई बात निरन्तर रहती है। अत: मैं साधक हूँ—ऐसी अहंता होनेपर साधकके द्वारा निरन्तर साधन होगा। साधन करते समय और सांसारिक कार्य करते समय—दोनों ही समय वह साधक रहेगा और उससे साधन-विरुद्ध क्रिया नहीं होगी। निरन्तर साधन होनेसे उसकी अहंता सुगमतासे मिट जायगी। साधककी साधनसे और साधनकी साध्यसे अभिन्नता होती है। इसलिये अहंता मिटनेपर साधकपना न रहकर साधनमात्र रह जाता है। साधनमात्र रहते ही साधन साध्यमें लीन हो जाता है। फिर एक भगवान् के सिवाय कुछ नहीं रहता।

प्रश्न—सब कुछ भगवान् ही हैं—यह बात वास्तविक होते हुए भी समझमें क्यों नहीं आती?

उत्तर—अपनेमें सकामभाव होना और भगवान् के सिवाय दूसरी सत्ताको मानकर उसको महत्त्व देना—इन दो कारणोंसे ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’ यह बात समझमें नहीं आती। अगर हम अपनेमें कामना न रखें और सबमें भगवद्‍बुद्धि रखें तो ‘वासुदेव: सर्वम्’ का अनुभव हो जायगा। अगर इन दोनोंमेंसे एक भी बात सांगोपांग, ठीक तरहसे जीवनमें आ जाय तो कल्याण हो जायगा। परन्तु इसमें भी फर्क यह रहेगा कि कामनाओंके नाशसे मुक्ति तो हो जायगी, पर प्रेम (अनन्तरस) की प्राप्ति नहीं होगी, जबकि सबमें भगवद्‍बुद्धि होनेसे मुक्तिके साथ-साथ प्रेमकी भी प्राप्ति हो जायगी!

एक मार्मिक बात है कि भगवान् को न मानना कामनासे भी अधिक दोषी है। जो भगवान् को छोड़कर अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, उनमें यदि कामना रह जाय तो वे जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं—‘गतागतं कामकामा लभन्ते’ (गीता ९। २१)। परन्तु जो केवल भगवान् का ही भजन करते हैं, उनमें यदि कामना रह भी जाय तो भगवान् की कृपा और भजनके प्रभावसे वे भगवान् को ही प्राप्त होते हैं। कामनाके कारण ऐसे भक्तोंके तीन भेद होते हैं—अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु*। इन तीनोंको ही भगवान् ने ‘उदार’ कहा है—‘उदारा: सर्व एवैते’ (७।१८) परन्तु जो भगवान् के सिवाय अन्यका भजन करनेवाले हैं, उनको भगवान् ने उदार नहीं कहा है, प्रत्युत उनके भजनको अविधिपूर्वक किया गया बताया है—

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विता:।

तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥

(गीता ९।२३)

देवताओंको भगवान् से अलग समझनेके कारण अर्थात् देवताओंमें भगवद्‍बुद्धि न होनेके कारण तथा कामना भी होनेके कारण उनकी उपासना अविधिपूर्वक है। तात्पर्य है कि सबमें भगवद्‍बुद्धि न होना सकामभावसे भी अधिक घातक है।

श्रीशुकदेवजी महाराज कहते हैं—

अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी:।

तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥

(श्रीमद्भा० २।३।१०)

‘जो बुद्धिमान् मनुष्य है, वह चाहे सम्पूर्ण कामनाओंसे रहित हो, चाहे सम्पूर्ण कामनाओंसे युक्त हो, चाहे मोक्षकी कामनावाला हो, उसको तो तीव्र भक्तियोगके द्वारा परमपुरुष भगवान् का ही भजन करना चाहिये।’

प्रश्न—भक्तिमें मुख्य बाधक क्या है?

उत्तर—मुख्य बाधक है—कपट, छल, कुटिलता, चालाकी, विश्वासघात, छिपाव, दम्भ, पाखण्ड। काम, क्रोध आदि दोष उतने बाधक नहीं हैं, जितने कपट आदि बाधक हैं। कारण कि काम, क्रोध आदिमें तो साधक उनके परवश हो जाता है, पर कपट आदि स्वतन्त्रतासे करता है। साधक सच्चे हृदयसे काम, क्रोधादि दोषोंको दूर करना चाहता है, पर न चाहते हुए भी वे आ जाते हैं; परन्तु छल, कपट आदिको तो वह जान-बूझकर करता है। इसलिये भगवान् ने कहा है—

निर्मल मन जन सो मोहि पावा।

मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥*

(मानस, सुन्दर० ४४।३)

पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ।

सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ॥

(मानस, उत्तर० ८७ क)

भगवान् को कपट, छल आदि नहीं सुहाते, जबकि अन्य दोषोंकी तरफ वे देखते ही नहीं—

रहति न प्रभु चित चूक किए की।

करत सुरति सय बार हिए की॥

(मानस, बाल० २९। ३)

जन अवगुन प्रभु मान न काऊ।

दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ॥

(मानस, उत्तर० १। ३)

इसलिये सन्तोंके स्वभावमें आया है—‘सरल सुभाव न मन कुटिलाई’ (मानस, उत्तर० ४६। १)। सन्तवाणीमें भी कपट त्यागकी बात विशेषरूपसे आयी है; जैसे—

कपट गाँठ मन में नहीं, सबसों सरल सुभाव।

नारायण वा भक्त की, लगी किनारे नाव॥

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तुलसी सीतानाथ ते मत कर कपट सनेह।

क्या परदा भर्तार सों जिन्ह देखी सब देह॥

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जग चतुराई छोड़कर, होय मूढ़ भज राम॥

हम काम-क्रोधादि दोषोंको दूर करना चाहते हैं, फिर भी वे अपनेसे दूर नहीं होते तो यह निर्बलता (कमजोरी) है। परन्तु कपट आदि करना निर्बलता नहीं है, प्रत्युत अपनेको सबल मानकर किया गया अपराध है। जो निर्बल है, उसपर प्राय: हरेकको दया आती है, पर जो कपटी है, उसपर क्रोध आता है। इसलिये भगवान् निर्बलोंके हैं, कपटियोंके नहीं—

‘सुने री मैंने निरबल के बल राम’

‘अशक्तानां हरिर्बलम्’ (ब्रह्मवैवर्त० गण० ३५।९६)

जिस तरह भक्तिमें कपट, छल आदि बाधक होते हैं, उसी तरह भागवत-अपराध भी बाधक होता है। भगवान् अपने प्रति किया गया अपराध तो सह सकते हैं, पर अपने भक्तके प्रति किया गया अपराध नहीं सह सकते। देवताओंने मन्थरामें मतिभ्रम पैदा करके भगवान् रामको सिंहासनपर नहीं बैठने दिया तो इसको भगवान् ने अपराध नहीं माना। परन्तु जब देवताओंने भरतजीको भगवान् रामसे न मिलने देनेका विचार किया, तब देवगुरु बृहस्पतिने उनको सावधान करते हुए कहा—

सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ।

निज अपराध रिसाहिं न काऊ॥

जो अपराध भगत कर करई।

राम रोष पावक सो जरई॥

लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा।

यह महिमा जानहिं दुरबासा॥

(मानस, अयोध्या० २१८।२-३)

शंकरजी भगवान् रामके ‘स्वामी’ भी हैं, ‘दास’ भी हैं और ‘सखा’ भी हैं—‘सेवक स्वामि सखा सिय पी के’ (मानस, बाल० १५।२)। इसलिये शंकरजीसे द्रोह करनेवालोंके लिये भगवान् राम कहते हैं—

सिव द्रोही मम भगत कहावा।

सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥

संकर बिमुख भगति चह मोरी।

सो नारकी मूढ़ मति थोरी॥

संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।

ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास॥

(मानस, लंका० २)

अत: साधकको इस भागवत-अपराधसे बचना चाहिये।

प्रश्न—भागवत-अपराधसे बचनेका उपाय क्या है?

उत्तर—भागवत-अपराधसे बचनेका उपाय है—किसीका भी अपराध न करे अर्थात् किसीका भी तिरस्कार, विरोध, निन्दा, द्वेष, खण्डन न करे। कारण कि कौन भक्त है और कौन भक्त नहीं है—इसकी पहचान नहीं हो सकती।

हमारे द्वारा किसीका भी तिरस्कार, विरोध न हो—इसके लिये सबमें भगवद्भाव करना ही एकमात्र निरापद साधन है। कारण कि किसीका भी तिरस्कार, विरोध करनेसे सबमें भगवद्भाव नहीं हो सकता—

उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।

निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥

(मानस, उत्तर० ११२ ख)