कल्याणका सुगम साधन—कर्मयोग

मनुष्यमें कर्म करनेकी एक स्वाभाविक रुचि रहती है। कारण कि वह कुछ-न-कुछ पाना चाहता है। अत: कुछ-न-कुछ पानेके उद्देश्यसे वह जन्मसे मृत्युपर्यन्त आसक्तिपूर्वक कर्मोंमें लगा रहता है। कुछ पानेकी आशाके कारण कर्मोंमें उसकी आसक्ति इतनी अधिक रहती है कि जब वृद्धावस्थामें उसकी इन्द्रियाँ कर्म करनेमें असमर्थ हो जाती हैं, तब भी वह कर्मोंसे असङ्ग नहीं हो पाता। इस प्रकार आसक्तिपूर्वक कर्म करते-करते ही वह कालके मुखमें चला जाता है। ऐसी परिस्थितिमें हठपूर्वक कर्मोंका त्याग करनेकी अपेक्षा कोई ऐसा उपाय ही सफल हो सकता है, जिसके अन्तर्गत शास्त्रविहित कर्म करते हुए ही कर्मासक्ति मिट जाय और मनुष्यको कल्याणकी प्राप्ति हो जाय। इस दृष्टिसे मनुष्यके लिये कर्मयोगका अनुष्ठान ही एक सफल एवं सुगम उपाय है। कर्मयोग ऐसे है, जैसे भोजनमें ही औषध मिला दी जाय!! श्रीमद्भागवतमें भगवान् के वचन हैं—

योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयो विधित्सया।

ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित्॥

निर्विण्णानां ज्ञानयोगो न्यासिनामिह कर्मसु।

तेष्वनिर्विण्णचित्तानां कर्मयोगस्तु कामिनाम्॥

यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु य: पुमान्।

न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिद:॥

(११। २०। ६—८)

अर्थात् अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंके लिये मैंने तीन योग (मार्ग) बतलाये हैं—ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग। इन तीनोंके अतिरिक्त अन्य कोई कल्याणका मार्ग नहीं है। जो अत्यन्त वैराग्यवान् हैं, वे ज्ञानयोगके अधिकारी हैं, जो संसारमें आसक्त हैं, वे कर्मयोगके अधिकारी हैं और जो न तो अत्यन्त विरक्त हैं और न अत्यन्त आसक्त हैं, वे भक्तियोगके अधिकारी हैं।

उपर्युक्त भगवद्वचनोंके अनुसार संसारमें कर्मयोगके अधिकारियोंकी संख्या ही अधिकतम सिद्ध होती है। यहाँ शङ्का होती है कि संसारमें आसक्त मनुष्य कर्मयोगके मार्गपर (परमात्माकी तरफ) कैसे चल पायेंगे? इसका समाधान भगवान् ने ‘नृणां श्रेयो विधित्सया’ पदोंमें कर दिया है। तात्पर्य है कि सांसारिक भोग और उनके संग्रहमें रुचि रहते हुए भी जो मनुष्य उन(भोगों)से अपनी रुचिको हटाकर अपना कल्याण करना चाहता है, वह कर्मयोगका पालन करके सुगमतापूर्वक अपना कल्याण कर सकता है। अपना कल्याण करनेका विचार जितना दृढ़ होगा, उतना ही शीघ्र उसका कल्याण होगा।

कर्मयोगका तात्पर्य है—कर्म करते हुए परमात्माको प्राप्त करना। कर्मयोगमें दो शब्द हैं—कर्म और योग। शास्त्रविहित कर्तव्य कर्मोंको ‘कर्म’ कहते हैं। कर्म संसार(फलप्राप्ति)के लिये भी किये जाते हैं और संसारसे ऊँचा उठकर परमात्माको प्राप्त करनेके लिये भी किये जाते हैं। ‘योग’ की व्याख्या भगवान् ने दो प्रकारसे की है— (१) समताको योग कहते हैं—‘समत्वं योग उच्यते’ (गीता २।४८) और (२) दु:ख-संयोगके वियोगको योग कहते हैं—‘तं विद्याद्‍दु:खसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्’ (गीता ६।२३)। परमात्मा ‘सम’ है—‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’ (गीता ५। १९), अत: समतासे परमात्मामें स्थिति होती है, जिसे ‘योग’ कहते हैं। संसारसे सम्बन्ध ही दु:ख-संयोग है। अत: संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ‘योग’-(समता या परमात्मा-)की प्राप्ति हो जाती है*। कर्मयोगमें योगका ही महत्त्व है, ‘कर्म’ का नहीं। इसीलिये भगवान् कहते हैं कि कर्मोंमें योग ही कुशलता है ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ (गीता २। ५०)।

‘कर्म’ का सम्बन्ध संसार (जडता)से एवं ‘योग’ का सम्बन्ध स्वयं (चेतन) से है। अत: ‘कर्म’ संसारके लिये और ‘योग’ अपने लिये होता है। कर्मयोगमें कर्म, कर्मसामग्री और कर्मफलमें ममता, कामना एवं आसक्तिका सर्वथा त्याग होना आवश्यक है। कामना और आसक्तिको त्यागकर केवल संसारके हितके लिये कर्म करनेपर संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होकर परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। अतएव भगवान् कहते हैं कि यज्ञार्थ कर्म (केवल दूसरोंके हितके लिये किये गये कर्म)के अतिरिक्त अन्य (अपने लिये किये गये) सभी कर्म बाँधनेवाले होते हैं—

‘यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:’

(गीता ३। ९)

कर्मका सम्बन्ध ‘पर’ से होता है, ‘स्व’ से नहीं। अपने लिये कर्म करनेसे मनुष्य बँध जाता है अर्थात् उसका सम्बन्ध संसारसे हो जाता है; क्योंकि स्वरूपसे मनुष्यमें कोई क्रिया नहीं होती। सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिमें होती हैं१। प्रकृतिके सम्बन्धसे मनुष्य प्रकृतिमें होनेवाली क्रियाको अपनेमें आरोपित कर लेता है२।

वास्तवमें कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, मूर्च्छा एवं समाधितकमें भी) क्षणमात्रके लिये भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता। कारण कि प्रकृतिजनित गुणोंके वशमें होकर सभी मनुष्योंको कर्म करनेके लिये बाध्य होना पड़ता है*। इसीलिये मनुष्योंमें स्वभावसे ही कर्म करनेका एक वेग विद्यमान रहता है। हठपूर्वक कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करने अथवा अपने लिये कर्म करनेपर वह वेग शान्त नहीं होता। निष्कामभावपूर्वक दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेपर ही वह वेग शान्त हो सकता है। इसलिये कहा है— ‘आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते’ (गीता ६।३) अर्थात् जो योग (समता)में आरूढ़ होना चाहता है, ऐसे मननशील योगीके लिये कर्तव्यकर्म करना कारण है। इस दृष्टिसे परमात्माकी प्राप्तिके लिये कर्मयोगका अनुष्ठान करना सभीके लिये आवश्यक एवं सुगम है।

मनुष्यशरीर कर्मयोनि है। कर्म मनुष्यशरीरमें किये जाते हैं और उनका फल अन्य योनियोंमें भोगा जाता है। इसलिये मनुष्यशरीरमें बुद्धिकी प्रधानता है। अपना कल्याण करना एवं दूसरोंको सुख पहुँचाना, उनकी सेवा करना ही बुद्धिका सदुपयोग है। सुखभोग और संग्रह करना एवं अनुकूलताकी प्राप्तिमें सुखी और प्रतिकूलताकी प्राप्तिमें दु:खी होना बुद्धिका दुरुपयोग है। एकमात्र मनुष्यशरीर ही कर्तव्यका पालन करनेके लिये है। सुखभोग एवं अनुकूलता-प्रतिकूलताकी प्राप्तिमें सुखी-दु:खी होना तो पशु-पक्षी आदि निम्न योनियोंमें भी है, जिनके सामने कर्तव्य-पालनका प्रश्न ही नहीं है। जिनसे केवल संसारका हित होता हो, ऐसे कर्म करना ही कर्मयोग है।

कर्मयोगकी ऐसी विलक्षणता है कि साधक किसी (ज्ञानयोग अथवा भक्तियोगके) मार्गपर क्यों न चले, कर्म-योगकी प्रणाली (अपने लिये कुछ नहीं करना) उसको अपनानी ही पड़ेगी; क्योंकि सभीमें क्रियाशक्ति निरन्तर रहती है। इसीलिये भगवान् ने ज्ञानयोगीके लिये ‘सर्वभूतहिते रता:’ (गीता ५। २५; १२। ४) तथा भक्तियोगीके लिये ‘अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च’ (गीता १२। १३) कहकर दोनोंके लिये दूसरोंके हितार्थ कर्म करना अनिवार्य बतलाया है*।

कर्मयोगमें कर्ता निष्काम होता है, कर्म नहीं; क्योंकि जड होनेके कारण कर्म स्वयं निष्काम या सकाम नहीं हो सकते। निष्काम कर्ताके द्वारा ही निष्काम कर्म होते हैं, जिसे कर्मयोग कहते हैं। अत: चाहे कर्मयोग कहो या निष्कामकर्म—दोनोंका अर्थ एक ही होता है। सकाम कर्मयोग होता ही नहीं। इसलिये कर्ताका भाव नित्य-निरंतर निष्काम रहना चाहिये*।

कर्मयोगीको किसीका भी अहित सहन नहीं होता; क्योंकि जैसे शरीरके प्रत्येक अङ्गका सम्पूर्ण शरीरके साथ अविभाज्य सम्बन्ध है, वैसे ही संसारके प्रत्येक शरीरका सम्पूर्ण शरीरोंसे अविभाज्य सम्बन्ध है। जैसे मनुष्य अपने शरीरके प्रत्येक अङ्गके सुख-दु:खमें सुखी और दु:खी होता है, वैसे ही कर्मयोगी प्राणिमात्रके सुख और दु:खमें अपना सुख और दु:ख देखता है। दाँतोंसे जीभ कट जानेपर अपने दाँतोंको तोड़ देनेका भाव किसीमें भी नहीं आता, इसी प्रकार अपना कहलानेवाले शरीरका अनिष्ट करनेवालेका भी अहित करनेका भाव कर्मयोगीमें कभी नहीं आता।

मनुष्यके पास (शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सामर्थ्य, समय, योग्यता, विद्या, धन, जमीन आदि) जितनी भी सामग्री है, वह सब-की-सब उसे समष्टि-संसारसे ही मिली है, उसकी अपनी व्यक्तिगत नहीं है। प्रत्यक्ष है कि इन मिले हुए पदार्थोंपर हमारा कोई अधिकार नहीं चलता। इन पदार्थोंको हम अपने इच्छानुसार न तो रख सकते हैं, न उनमें कोई मनमाना परिवर्तन ही कर सकते हैं। इन्हें न तो हम अपने साथ लाये हैं, न साथ ले जा सकते हैं। वास्तवमें ये पदार्थ हमें सदुपयोग करने (दूसरोंकी सेवामें लगाने) के लिये ही मिले हैं, अपना अधिकार जमानेके लिये कभी नहीं। मिली हुई वस्तुको दूसरोंकी सेवामें लगाये बिना जो उस वस्तुका केवल अपने लिये भोग करता है, उसे भगवान् चोर कहते हैं—‘तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्‍क्ते स्तेन एव स:’ (गीता ३।१२)। इतना ही नहीं, भगवान् ऐसे पुरुषको पापायु कहते हुए उसके जीनेको ही व्यर्थ बताते हैं—‘अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति’ (गीता ३।१६)।

संसारसे प्राप्त शरीरसे हमने अभीतक अपने लिये ही कर्म किये हैं, अपने सुख-भोग और संग्रहके लिये ही उस शरीरका उपयोग किया है। इसलिये संसारका हमपर ऋण है। इस ऋणको उतारनेके लिये हमें केवल संसारके हितके लिये कर्म करने हैं। फलकी कामना रखकर कर्म करनेसे पुराना ऋण तो उतरता नहीं, नया ऋण और उत्पन्न हो जाता है। ऋणसे मुक्त होनेके लिये नया जन्म लेना पड़ता है*। दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे पुराना ऋण समाप्त हो जाता है और निष्कामभावसे कर्म करनेसे नया ऋण उत्पन्न नहीं होता। इस दृष्टिसे (जन्म-मरणसे छूटनेके लिये) कर्मयोगका पालन करना सभीके लिये आवश्यक है।

कर्मयोगके विषयमें भगवान् कहते हैं—

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

(गीता २। ४७)

तात्पर्य यह है कि मनुष्यको केवल कर्म करनेका अधिकार है। पुराने कर्मोंके फलस्वरूप मिली हुई सामग्रीपर तथा नये (अभी किये जानेवाले) कर्मोंके फलस्वरूप आगे मिलनेवाली सामग्रीपर भी उसका कोई अधिकार नहीं है। इसलिये मनुष्यको कर्मोंके फलका हेतु भी नहीं बनना चाहिये; और कर्म न करनेमें उसकी आसक्ति भी नहीं होनी चाहिये। सभी कर्म अनित्य अर्थात् आरम्भ होने और समाप्त होनेवाले होते हैं। फिर उन कर्मोंसे मिलनेवाला फल नित्य कैसे हो सकता है? इस दृष्टिसे कर्मयोगी कर्म और कर्मफल दोनोंसे ही अपना सम्बन्ध नहीं जोड़ता।

हमारे पास कोई भी सामग्री न अपनी है, न अपने लिये है। यह सामग्री संसारकी और संसारके लिये ही है। मनुष्य भूलसे ही उस सामग्रीको अपनी और अपने लिये मानकर बँधता है और फलकी कामना करके भविष्यमें भी बँधनेकी तैयारी कर लेता है*। कर्मयोगीकी प्रवृत्ति आरम्भसे ही दूसरोंकी सेवा करनेकी रहती है। अत: भोग और संग्रहमें उसकी आसक्ति स्वत: मिट जाती है। कर्मयोगमें व्यक्तिगत सुखका सर्वथा त्याग होता है। इसलिये भगवान् ने कर्मयोगको त्यागके नामसे कहा है (गीता १८। ५-६)।

मनुष्यको जो सामग्री, योग्यता, सामर्थ्य, परिस्थिति आदि प्राप्त है, उसीके सदुपयोगसे उसे कर्मयोगका अनुष्ठान करना है। कर्मयोगमें अप्राप्त सामग्रीकी अपेक्षा नहीं है; क्योंकि जो सामग्री हमारे पास नहीं है, उसकी आशा संसार रखता ही नहीं। कर्मयोगकी यह विलक्षणता है कि जो सामग्री, परिस्थिति आदि हमें मिली हुई है, केवल उसीके सदुपयोगके द्वारा हम कर्मयोगका पूरा-पूरा पालन कर सकते हैं। भगवान् गीतामें कहते हैं कि अपने-अपने (प्राप्त) कर्तव्यका ठीक रीतिसे आचरण करनेमात्रसे मनुष्यको परमसिद्धि प्राप्त हो जाती है—‘स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:’ (१८। ४५)। अतएव मनुष्य किसी भी देश, काल, परिस्थिति आदिमें क्यों न हो, वह स्वार्थ, अभिमान, कामना, ममता आदिको त्यागकर सबके हितके लिये ही सब कर्म करे।

कर्मयोगके मार्गपर स्थूलशरीरसे होनेवाली सेवा, सूक्ष्मशरीरसे होनेवाले चिन्तन, ध्यान आदि और कारण-शरीरसे होनेवाली समाधितकके सम्पूर्ण कर्म केवल संसारके कल्याणके लिये ही किये जाते हैं, अपने लिये नहीं। कारण कि दूसरेके कल्याणके लिये कर्म करनेसे अपने स्वार्थका त्याग होता है।

यद्यपि अपना कल्याण चाहना भी श्रेष्ठ है तथापि संसारका कल्याण चाहना उससे कहीं अधिक श्रेष्ठ है। संसारके कल्याणसे अपना कल्याण अलग मानना ही भूल है। वास्तवमें संसारका कल्याण चाहनेमें ही अपना कल्याण स्वाभाविक रूपसे निहित है। स्थूल-शरीरका स्थूल-संसारके साथ, सूक्ष्म शरीरका सूक्ष्म-संसारके साथ तथा कारण-शरीरका कारण-संसारके साथ अविभाज्य सम्बन्ध है। मनुष्य अपने कल्याणके लिये जो कुछ भी करता है, वह सब संसारद्वारा प्रदत्त शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिकी सहायतासे ही करता है। अत: कर्म संसारकी सामग्रीसे करना और कल्याण अकेले चाहना न्याययुक्त नहीं है।

कर्म और क्रियामें बहुत अन्तर है। कर्ममें कर्तृत्वाभिमान रहता है, अत: उसका फल होता है। क्रियामें कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता, अत: उसका फल भी नहीं होता। जैसे, बालकसे जवान होना, खाये हुए अन्नका पचना आदि ‘क्रिया’ है, जिसका फल (बन्धन) नहीं होता। कर्मयोगी कर्म करते हुए भी (कामना, ममता, आसक्ति आदि न होनेके कारण) कर्मोंसे स्वाभाविक रूपसे निर्लिप्त रहता है। इसलिये उससे क्रिया होती है, कर्म नहीं होता। अतएव उसके अन्त:करणमें अनुकूलता-प्रतिकूलतासे होनेवाले हर्ष-शोकादि विकार नहीं होते। यदि अनुकूलता-प्रतिकूलता आदिका उसपर प्रभाव पड़ता है तो वह कर्मयोगी नहीं, अपितु कर्मी है। संसारसे किसी भी प्रकारकी आशा रखनेवाला मनुष्य कर्मयोगका भलीभाँति अनुष्ठान कर ही नहीं सकता।

यद्यपि कर्मयोगीको संसारकी कोई आवश्यकता नहीं रहती, तथापि संसारको कर्मयोगीकी बहुत आवश्यकता रहती है; क्योंकि कर्मयोगका पालन करके मनुष्य संसारमात्रके लिये बहुत उपयोगी हो जाता है। इसके विपरीत अपने स्वार्थके लिये कर्म करनेवाला मनुष्य वास्तवमें न तो संसारके लिये और न अपने लिये ही उपयोगी हो सकता है।

आजकल लोगोंमें प्राय: यह बात प्रचलित है कि मनुष्यके लिये ही यह सब संसार—सुख-भोग बने हैं, अत: इन्हें भोगना चाहिये। यह बिलकुल गलत बात है। वास्तवमें मनुष्य संसारके लिये है, न कि संसार मनुष्यके लिये। चौरासी लाख योनियोंमें जितने जीव हैं, वे सब कर्मफल भोगनेके लिये मानो जेलखानेमें पड़े कैदी हैं। कैदियोंके प्रबन्ध और हितके लिये जैसे अफसर रहता है, वैसे ही मनुष्य संसारके प्रबन्ध और हितके लिये है। प्याऊपर बैठा व्यक्ति यदि यह सोचे कि जल मेरे लिये ही है अथवा अन्नका वितरण करनेवाला यह सोचे कि अन्न मेरे लिये ही है, तो यह कितनी मूर्खताकी बात होगी। ऐसे ही संसार—सुख-भोगोंको अपना और अपने लिये मानना बहुत बड़ी भूल है, जिसका मनुष्यजीवनमें कोई स्थान नहीं है।

लोग ऐसी शङ्का भी किया करते हैं कि भजन-ध्यान करने, दूसरोंकी सेवा करने, परमात्माको प्राप्त करने आदिकी कामना भी तो ‘कामना’ ही है, फिर सर्वथा निष्काम कैसे हुआ जा सकता है? इसका समाधान यह है कि स्वरूपको जाननेकी कामना, सेवा करनेकी कामना, भगवान् को प्राप्त करनेकी कामना ‘कामना’ नहीं है। वस्तुत: नाशवान्-(असत्-) की कामना ही ‘कामना’ है; क्योंकि वह अपना नहीं है। अविनाशी-(सत्-)की कामना ‘कामना’ नहीं है; क्योंकि वह अपना है। संसारसे प्राप्त वस्तुको संसारकी ही सेवामें लगा देनेकी कामना ‘कामना’ नहीं है, अपितु ‘त्याग’ है; क्योंकि विनाशी (असत्) होनेके कारण संसार भी अपना नहीं है और उससे प्राप्त वस्तु भी अपनी नहीं है।

लोग प्राय: कहा करते हैं कि यदि हम किसी प्रकारकी कामना न करें तो धनादि कोई भी वस्तु प्राप्त नहीं हो सकती। अत: कामना किये बिना हमारा जीवननिर्वाह कैसे होगा? यह बात भी बिलकुल निराधार है। वास्तवमें किसी अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति ‘कामना’ के कारण नहीं, अपितु प्राप्त वस्तुके सदुपयोग अर्थात् कर्तव्य-कर्मके कारण होती है। पहलेके सदुपयोगके कारण वर्तमानमें एवं वर्तमानके सदुपयोगके कारण भविष्यमें अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति अवलम्बित है। सदुपयोगका तात्पर्य है—वर्तमानमें प्राप्त सामग्रीके द्वारा कर्तव्य-कर्मोंका आचरण। यदि वह सदुपयोग निष्कामभावसे किया जाय तो परमात्माकी प्राप्ति एवं सकामभावसे किया जाय तो सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्ति हो सकती है।

धनादि समस्त सांसारिक वस्तुएँ कर्म करनेसे प्राप्त होती हैं। जो वस्तु कर्मके अधीन है, वह कामना करनेसे कैसे प्राप्त हो सकती है? अत: उसके लिये कामना करना व्यर्थ ही है। इसके अतिरिक्त कामना पूरी हो जानेपर हम उसी अवस्थामें आ जाते हैं, जिसमें कामना उत्पन्न होनेसे पूर्व थे। कामना सदा पूरी नहीं होती और कामनाके अनुरूप प्राप्त वस्तु भी सदा रहनेवाली नहीं होती। अतएव कामना करनेसे पराधीनताके सिवा कुछ नहीं मिलता।

वास्तवमें सांसारिक पदार्थोंकी कामनाके बाद जब वे पदार्थ हमें मिलते हैं तो उनकी प्राप्तिमें हमें सुख प्रतीत होता है। वह सुख उन पदार्थोंकी प्राप्तिसे नहीं हुआ है। यदि पदार्थोंकी प्राप्तिसे सुख होता तो उनके रहते हुए कभी कोई दु:ख नहीं होना चाहिये था। कम-से-कम जो पदार्थ कामनाके बाद मिला है, उस पदार्थको लेकर तो दु:ख होना ही नहीं चाहिये, किंतु फिर भी दु:ख होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि पदार्थ-प्राप्तिके बाद होनेवाला सुख पदार्थ-प्राप्तिका सुख नहीं है, अपितु कामना-निवृत्तिका सुख है।

जैसे, हम धनकी कामना करते हैं तो धनका हमारे मनके साथ घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है अर्थात् धन हमारे मनके द्वारा पकड़ा जाता है। जब बाहरसे धन मिलता है, तब मनसे पकड़ा हुआ धन निकल जाता है और सुखकी प्रतीति होती है। वास्तवमें वह सुख बाहरसे उस धनके मिलनेसे नहीं हुआ है, प्रत्युत मनसे पकड़े हुए धनके निकलनेसे अर्थात् धनकी कामनाका त्याग होनेसे हुआ है। परन्तु मनुष्य भूलसे इस सुखको पदार्थोंकी प्राप्तिसे मिलनेवाला मानकर पुन: नयी-नयी कामनाएँ करने लगता है। इसी कारण वह कामना निवृत्ति अर्थात् निष्कामताको सुरक्षित नहीं रख पाता। अतएव कहा है—

न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति।

हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥

(श्रीमद्भा० ९। १९। १४; मनु० २। ९४)

‘विषयोंके उपभोगसे कामना कभी शान्त नहीं होती, अपितु घीसे अग्निके समान बार-बार अधिक ही बढ़ती जाती है।’

यदि मनुष्य यह विचार करे कि वास्तवमें सुख तो कामना-निवृत्तिका ही होता है तो फिर उसके जीवनमें कामनाओंका कोई स्थान रह ही नहीं सकता। कामना-निवृत्ति-(निष्कामता-)में तो मनुष्यमात्र स्वतन्त्र है, क्योंकि इसमें किसी अन्यकी सहायताकी अपेक्षा नहीं है।

सम्पूर्ण सांसारिक कामनाओंकी पूर्ति करनेकी सामर्थ्य किसीमें भी नहीं है, पर कामनाओंका सर्वथा त्याग करनेकी सामर्थ्य सभीमें है। अत: मनुष्य कामनाओंका सर्वथा त्याग कर सकता है*। कामनाओंका सर्वथा त्याग होते ही संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद और परमात्माकी प्राप्ति स्वत: हो जाती है, जो कि नित्य प्राप्त है।

कामनायुक्त प्रत्येक प्रवृत्ति या कर्म बाँधनेवाला होता है। कामनाका नाश हुए बिना शान्तिकी प्राप्ति सर्वथा असम्भव है*। कामना करनेसे लाभ तो कुछ नहीं होता, पर हानि किसी प्रकारकी शेष नहीं रहती। मिली हुई वस्तु-(शरीरादि-)को अपना माननेसे (ममतासे) कामना उत्पन्न होती है। वास्तवमें कामनाका मनुष्यजीवनमें कोई स्थान नहीं है। कामना-रहित होकर दूसरोंके लिये कर्म करनेमें ही मनुष्य-जीवनकी सफलता है। अतएव गीतामें भगवान् मनुष्यमात्रको निष्कामभाव-पूर्वक परहितार्थ कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं—

योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।

सिद्धॺसिद्धॺो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

(२। ४८)

‘हे धनञ्जय! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि और असिद्धिमें समान-बुद्धि होकर योगमें स्थित हुआ कर्तव्य कर्मोंको कर। समत्व ही योग कहलाता है।’