कामनाओंके त्यागसे शान्ति

भगवत्प्राप्तिके मार्गमें संसारके भोग और संग्रहकी खास बाधा है। रुपयोंके संग्रहको इतना अधिक आदर दे दिया कि चाहे जीवन बिगड़ जाय, नरकोंमें जाना पड़े, चौरासी लाख योनियोंमें जाना पड़े, अपमान, निन्दा, बेइज्जती हो जाय, पर रुपये इकट्ठे करने ही हैं—यह बहुत बड़ी बीमारी है। दूसरा जो भोग भोगना, सुख भोगना है, यह खास आफत है। इसके कारण मनुष्य अपने अनुभवका आदर नहीं करता; क्योंकि आदरकी जगह रुपयों और सुख-भोगने ले ली। अब भले ही कितनी बातें सीख जाओ, अनुभव नहीं होगा। सीखकर आप पण्डित बन सकते हो। बड़ा भारी व्याख्यान दे सकते हैं, लेखक बन सकते हैं। बड़ी सुन्दर-सुन्दर पुस्तकें लिख सकते हो, परन्तु जो महान् शान्ति है, वह नहीं पा सकते, उसका अनुभव नहीं हो सकता। सीखना और अनुभव करना बिलकुल अलग-अलग चीज है। रात-दिनका फर्क है दोनोंमें। अनुभव तब होगा, जब भोग और संग्रहकी कामना नहीं रहेगी। इतना रुपया और हो जाय, इतना और हो जाय—ऐसी कामना करते हैं, पर साथ एक कौड़ी भी नहीं चलेगी। एकदम खाली जाना पड़ेगा। शरीर भी यहीं पड़ा रहेगा। यह पहले भी अपना नहीं था और बादमें भी अपना नहीं रहेगा—प्रत्यक्ष बात है। परंतु कहने-सुननेसे यह बात समझमें नहीं आती। जब व्याकुलता जाग्रत् होगी, भीतरसे भोग और संग्रहसे उपरति होकर जलन पैदा होगी, तब यह बात समझमें आयेगी। जबतक रुपयों और भोगोंसे सुख लेते हैं, तबतक यह बात अक्लमें नहीं आयेगी।

गीतामें स्थितप्रज्ञ पुरुषके लक्षणोंके आरम्भमें और अन्तमें—दोनों जगह सम्पूर्ण कामनाओंके त्यागकी बात आयी है। उपक्रममें भगवान् ने कहा—

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।

(गीता २।५५)

और उपसंहारमें भी वही बात कही—

विहाय कामान्य: सर्वान्पुमांश्चरति नि:स्पृह:।

(गीता २।७१)

भोग और संग्रहकी कामना ही मुख्य है, और इसके आनेपर तो सैकड़ों-हजारों कामनाएँ आ जाती हैं। ये कामनाएँ मनका स्वरूप नहीं हैं बल्कि मनमें आया करती हैं—‘मनोगतान्।’ इन सब कामनाओंका त्याग कर दें। यदि आज मृत्यु आ जाय तो मैं जी जाऊँ तो अच्छा है, ऐसी कामना भी पैदा न हो। शरीर बहुत-ही प्यारा लगता है, पर यह जानेवाला है। जो जानेवाला है, उसकी मोह-ममता पहलेसे ही छोड़ दें। यदि पहलेसे नहीं छोड़ी, तो बादमें बड़ी दुर्दशा होगी। भोगोंमें, रुपयोंमें, पदार्थोंमें आसक्ति रह गयी, उनमें मन रह गया, तो बड़ी दुर्दशा होगी। साँप, अजगर बनना पड़ेगा; भूत, प्रेत, पिशाच आदि न जाने क्या-क्या बनना पड़ेगा!

एक सन्तकी बात हमने सुनी। विरक्त, त्यागी सन्त थे। पैसा नहीं छूते थे और एकान्तमें भजन करते थे। एक भाई उनकी बहुत सेवा किया करता। रोजाना भोजन आदि पहुँचाया करता। एक बार किसी जरूरी कामसे उसे दूसरे शहर जाना पड़ा। तो उसने संतसे कहा कि महाराज! मैं तो जा रहा हूँ। तो संत बोले कि भैया! हमारी सेवा तुम्हारे अधीन नहीं है, तुम जाओ। उसने कहा कि महाराज! पीछे न जाने कोई सेवा करे न करे? मैं बीस रुपये यहाँ सामने गाड़ देता हूँ, काम पड़े तो आप किसीसे कह देना। बाबाजी ना-ना करते रहे, पर वह तो बीस रुपये गाड़ ही गया। अब वह तो चला गया। पीछे बाबाजी बीमार पड़े और मर गये। मरकर भूत हो गये! अब वहाँ रात्रिमें कोई रहे तो उसे खड़ाऊँकी खट-खट-खट आवाज सुनायी दे। लोग सोचें कि बात क्या है? जब वह भाई आया तो उसे कहा गया कि वहाँ रातको खड़ाऊँकी आवाज आती है, कोई भूत-प्रेत है, पर किसीको दु:ख नहीं देता। वह रात्रिमें वहाँ रहा। उसे बड़ा दु:ख हुआ। उसने प्रार्थना की तो बाबाजी दीखे और बोले कि मरते वक्त तेरे रुपयोंकी तरफ मन चला गया था। अब इन्हें तू कहीं लगा दे तो मैं छुटकारा पा जाऊँ! बाबाजीने रुपयोंको काममें भी नहीं लिया पर ‘मेरे लिये रुपये पड़े हैं’ इस भावसे ही यह दशा हो गयी। अब वे रुपये वहाँसे निकालकर धार्मिक काममें लगाये गये, तब कहीं जाकर बाबाजीकी गति हुई।

वृन्दावनकी एक घटना हमने सुनी थी। एक गलीमें एक भिखारी पैसे माँगा करता था। उसके पास एक रुपयेसे कुछ कम पैसे इकट्ठे हो गये थे। वह मर गया। जहाँ उसके चिथड़े पड़े थे, वहाँ लोगोंने एक छोटा-सा साँप बैठा हुआ देखा। उसे कई बार दूर फेंका गया, पर वह फिर उन्हीं चिथड़ोंमें आकर बैठ जाता। जब नहीं हटा तो सोचा बात क्या है? साँपको दूर फेंककर चिथड़ोंमें देखा, तो उसमेंसे कुछ पैसे मिले। वे पैसे किसी काममें लगा दिये। तो फिर वह साँप देखनेमें नहीं आया।

यह जो भीतर वासना रहती है, यह बड़ी भयंकर होती है। वासना तब रहती है, जब वस्तुओंमें प्रियता होती है। जहाँ वस्तुओंकी प्रियता या आकर्षण रहता है, वहीं भगवान् की प्रियता जाग्रत् होनी चाहिये। आप बाहरसे भले ही कितने बढ़िया-बढ़िया काम करें, पर भीतर संसारकी जो प्रियता या आकर्षण है, वह खतरनाक है। इसलिये भगवान् ने सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करनेकी बात कही—‘विहाय कामान्य: सर्वान्पुमांश्चरति नि:स्पृह:।’ नि:स्पृहका अर्थ है—निर्वाह कैसे होगा? मेरा जीवन कैसे चलेगा? इस प्रकार भी परवाह मनमें नहीं रखे। जीवन तो चलेगा ही। जिन कर्मोंसे शरीर मिला है, उन कर्मोंसे उसका निर्वाह भी होगा। प्रारब्धमें न हो तो धनी व्यक्ति भी ज्यादा भोग नहीं भोग सकेगा, और प्रारब्धमें हो तो साधारण व्यक्तिको भी भोग मिल जायँगे। नहीं मिलनेवाला नहीं मिलेगा और मिलनेवाला मिलेगा ही। मनमें जो प्रियता है, वह बाधक है। वह नहीं होगी, तो भी रुपये, वस्तु, आदर, महिमा आदि मिलेगी। निर्वाहकी चीज तो अपने-आप मिलेगी, आप जो आशा करते हैं यहीं गलती होती है।

भीतर भोग और संग्रहकी जो प्रियता है, जिससे वे अच्छे लगते हैं और छोड़ना नहीं चाहते, उसीका त्याग होना चाहिये। त्याग नाम इसीका है। बाहरका त्याग भी अच्छा है, सहायक है। पर वास्तवमें त्याग प्रियताका है। वह प्रियता ही जन्म-मरण देनेवाली और महान् नरकोंमें डालनेवाली चीज है।

भगवान् ने चार चीजोंका त्याग बतलाया—जो प्राप्त नहीं है, उसकी कामना, जो प्राप्त है उसकी ममता, निर्वाहकी स्पृहा और मैं ऐसा हूँ—यह अहंता, जिसके कारण अपनेमें दूसरोंकी अपेक्षा विशेषता दीखती है।

विहाय कामान्य: सर्वान्पुमांश्चरति नि:स्पृह:।

निर्ममो निरहङ्कार: स शान्तिमधिगच्छति॥

(गीता २।७१)

जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंको त्यागकर ममतारहित, अहङ्काररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शान्तिको प्राप्त होता है।

कामना, स्पृहा, ममता और अहङ्कार—इन चारोंका सर्वथा त्याग हो जाय तो अभी शान्ति मिल जाय। ये चारों महान् अशान्ति पैदा करनेवाली चीजें हैं। इनको तो त्यागना नहीं चाहते और शान्ति पाना चाहते हैं, ऐसा कभी होगा नहीं।

कामनाके त्यागसे ही कर्मयोग सिद्ध होगा। कर्मयोगके द्वारा सिद्ध हुए पुरुषका नाम स्थितप्रज्ञ है। उसके लक्षण बतलाते समय आरम्भ और अन्तमें कामनाओंके त्यागकी बात कही। कामना, स्पृहा, ममता और अहङ्कार—इनका त्याग होनेपर फिर एक ब्रह्मकी प्राप्ति हो जायगी—‘ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति’ (गीता २।७२)।

अन्तमें न जाने कहाँ वासना रह जाय? और जगह न रहे, पर शरीरमें तो रह सकती है। इसलिये मनुष्य जितना सावधान रहे, उतना अच्छा है। शरीर तो मूल चीज है इसलिये इसमें अहंता-ममता नहीं रहनी चाहिये। इसमें अहंता-ममता होनेसे ही इसके निर्वाहकी इच्छा होती है। पर इच्छासे तो शरीर रहेगा नहीं। जीनेकी इच्छा करते-करते ही लोग मरते हैं। इच्छा करनेमें फायदा तो कोई-सा नहीं है और नुकसान कोई-सा भी बाकी नहीं है। मैंने खूब सोचा है, विचार किया है।

प्रश्न—कामना छोड़नेके लिये क्या करें?

उत्तर—अगर आपके मनमें करनेकी है, तो यों करो—नाम-जप करो और भीतरसे प्रार्थना करो कि हे नाथ! हे प्रभु! मेरेसे कामना, आसक्ति छूटती नहीं! इस प्रकार हरदम भीतरसे पुकारते ही रहो लगनसे। वे प्रभु परमदयालु हैं, वे कृपा करेंगे। यह उपाय आप काममें लाकर देखें, उपाय तो कई हैं, पर जोरदार लगन होनी चाहिये।