करणनिरपेक्ष साधन—शरणागति

संसारमें किसी क्रियाकी सिद्धिके लिये जो खास कारण हैं, उनको ‘कारक’ कहते हैं। जैसे, कोई व्यक्ति बोलता है तो बोलनेके लिये जो साधन होते हैं, वे ‘कारक’ कहलाते हैं। इसलिये व्याकरणमें कारकका लक्षण बताया है—‘क्रियाजनकत्वं कारकत्वम्’ अर्थात् जो क्रियाका जनक है, उसको कारक कहते हैं। उदाहरणके लिये ‘रामेण बाणेन हतो बाली’ ‘रामके बाणसे बाली मारा गया’—इस वाक्यमें ‘बाण’ करण है; क्योंकि बालीकी मृत्यु बाणसे हुई, धनुष, चाप, हाथ आदि भी करण हैं; क्योंकि इनके बिना बाण चल ही नहीं सकता। परन्तु बालीके मरनेकी क्रिया बाणसे हुई है, धनुषसे, डोरीसे अथवा हाथसे नहीं हुई है। इसलिये ‘करण’ संज्ञा बाणकी हुई, धनुष आदिकी नहीं। जिस व्यापारके बाद तत्काल क्रियाकी सिद्धि हो ही जाती है, उसका नाम ‘करण’ होता है*। संसारके सभी कार्य करणसे ही सिद्ध होते हैं। इसलिये संसारमें कोई भी काम किया जाय तो उसमें करणकी अपेक्षा रहती है, करणकी सहायता लेनी पड़ती है। करणके बिना कर्ता कोई काम कर ही नहीं सकता। इसलिये व्याकरणमें आया है—‘साधकतमं करणम्’ (पाणि० अ० १।४।४२) ‘जो क्रियाकी सिद्धिमें खास, अचूक कारण हो, उसका नाम ‘करण’ है। तात्पर्य है कि करणके बिना किसी क्रियाकी सिद्धि होती ही नहीं।

परमात्मतत्त्व करणरहित है और उसकी प्राप्तिके साधन दो प्रकारके हैं—करणसापेक्ष और करणनिरपेक्ष। जप, ध्यान, कीर्तन, सत्सङ्ग, स्वाध्याय, समाधि आदि सब करणसापेक्ष साधन हैं। जितनी भी क्रियाएँ हैं, सब करणके द्वारा ही होती हैं। परन्तु परमात्मा किसी क्रियाके विषय नहीं हैं। क्रियाका विषय वह वस्तु होती है, जो पैदा होती है। जो वस्तुएँ पहले नहीं हैं और पीछे उत्पन्न होती हैं, लायी जाती हैं, बनायी जाती हैं अथवा उनमें परिवर्तन किया जाता है, उन वस्तुओंकी प्राप्ति करणसे होती है। परन्तु जो उत्पन्न नहीं होता, लाया नहीं जाता, बनाया नहीं जाता, बदला नहीं जाता प्रत्युत सदासे ज्यों-का-त्यों स्वत:सिद्ध है, उसकी प्राप्तिके लिये करणका तो कहना ही क्या, कर्ताकी भी जरूरत नहीं होती। कारक क्रियाकी सिद्धिमें काम आता है और क्रिया तथा पदार्थ प्रकृतिके द्वारा होते हैं। परमात्मतत्त्व प्रकृतिसे अतीत है। अत: उसमें कोई कारक नहीं है अर्थात् न कर्ता है, न कर्म है, न करण है न सम्प्रदान है, न अपादान है और न अधिकरण है।

अगर किसीसे पूछा जाय कि तू है क्या? तो हरेक कहेगा कि ‘हाँ’ मैं ‘हूँ’। ‘मैं हूँ’—इसमें कोई विवाद नहीं है, यह निर्विवाद बात है। अब विचार करें कि ‘मैं हूँ’—इस प्रकार अपनी सत्ता किस करणके द्वारा सिद्ध होती है? ‘मैं हूँ’—इस अपने होनेपनमें न कर्ता है, न कर्म है, न करण है, न सम्प्रदान है, न अपादान है और न अधिकरण है। अपने होनेपनको प्रमाणित करनेके लिये किसी पुस्तककी, शास्त्रकी भी जरूरत नहीं है। तात्पर्य है कि करणसे हम क्रिया कर सकते हैं, श्रवण कर सकते हैं, मनन कर सकते हैं, निदिध्यासन कर सकते हैं, ध्यान कर सकते हैं, समाधि लगा सकते हैं, पर जो इन सबसे अतीत तथा भूत, भविष्यत् और वर्तमान—तीनों कालोंसे रहित है, उस परमात्मतत्त्वतक कोई क्रिया पहुँचती ही नहीं, फिर उसमें करण क्या करेगा? अत: ‘मैं-हूँ’—इस प्रकार अपनी स्वत:सिद्ध सत्ताका अनुभव करना ‘करणनिरपेक्ष साधन’ है। इस साधनमें करण रहे या न रहे, पर इसमें करणकी मुख्यता नहीं है, अपेक्षा नहीं है, इसलिये इसको ‘करणनिरपेक्ष’ कहते हैं।

कर्तृत्व-भोक्तृत्व ही संसार है। परमात्मतत्त्व कर्तृत्व-भोक्तृत्वसे अतीत है। सम्पूर्ण व्यवहार संसारमें होता है। जिसमें व्यवहार होता है, वह नाशवान् होता है और जिसमें कोई व्यवहार नहीं होता, वह अविनाशी होता है। संसार निरन्तर परिवर्तनशील है। एक नदीके किनारे कई सज्जन खड़े थे। वे कहने लगे कि देखो, नदी कैसे वेगसे बह रही है! तो एक सन्तने कहा कि नदी भी बह रही है, उसका जल भी बह रहा है और उसपर जो पुल बना है, उसपर आदमी भी बह रहे हैं! इतना ही नहीं, यह पुल भी बह रहा है! इसपर प्रश्न उठता है कि पुल कैसे बह रहा है? वह तो अपनी जगहपर ही है। इसका उत्तर है कि जब पुल बना था, उस समय यह जैसा नया था, वैसा नया आज नहीं रहा, प्रत्युत पुराना हो गया। इसका नयापना बह गया और पुरानापना आ गया। यह पुरानापना भी निरन्तर बह रहा है और बहते-बहते एक दिन यह पुल मिट जायगा। ऐसे ही यह नदी भी निरन्तर बह रही है और बहते-बहते एक दिन मिट जायगी। तात्पर्य है कि संसारकी प्रत्येक वस्तु बह रही है और बहते हुए नाशकी तरफ अर्थात् अभावकी तरफ जा रही है। एक दिन संसारका बहनापना भी नहीं रहेगा, उसका सर्वथा अभाव हो जायगा। मनुष्य समझते हैं कि हम जी रहे हैं, पर यह बिलकुल झूठी बात है। सच्ची बात तो यह है कि हम निरन्तर मर रहे हैं, एक-एक श्वासमें मर रहे हैं, एक-एक क्षणमें मर रहे हैं। किसी भी क्षण मरना बन्द नहीं होता। तात्पर्य है कि यह मृत्युरूपी क्रिया नाशवान् शरीरमें हो रही है, स्वरूपमें नहीं। अविनाशी तत्त्वमें कोई क्रिया होती ही नहीं। अत: उसको क्रियाके द्वारा नहीं पकड़ सकते।

विवाह होनेपर कन्या पतिकी हो जाती है। वह मान लेती है कि ये मेरे पति हैं और पति मान लेता है कि यह मेरी पत्नी है—इसमें क्या क्रिया है? यह तो स्वीकृति है। स्वीकृतिमें क्रिया नहीं होती। परन्तु ‘मैं पतिकी हूँ’—इस स्वीकृतिमें और ‘मैं भगवान् का हूँ’—इस स्वीकृतिमें फर्क है। ‘मैं पतिकी हूँ’—यह स्वीकृति तो शरीरको लेकर है, पर ‘मैं भगवान् का हूँ’—यह स्वीकृति शरीरको लेकर नहीं है, प्रत्युत स्वरूप (तत्त्व)को लेकर है। स्त्री तो पतिकी बनती है, पहलेसे नहीं है, पर ‘मैं भगवान् का हूँ’—यह पहलेसे ही स्वत:सिद्ध है—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५। ७), ‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी’ (मानस, उत्तर० ११७। १)। जब पतिकी स्वीकृतिमें भी क्रिया नहीं है, फिर भगवान् की स्वीकृतिमें क्रिया कैसे होगी जो कि स्वत:सिद्ध है? अत: ‘मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे हैं’—यह स्वीकृति ‘करणनिरपेक्ष साधन’ है।

मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे हैं—यह स्वीकृति पहले करणके द्वारा अर्थात् मन, वाणी, बुद्धिसे होती है, पर इसमें जो ‘हूँ’ है—यह स्वीकृति करणके द्वारा नहीं होती, प्रत्युत स्वयंसे होती है। जैसे, जिस आदमीका विवाह हो चुका हो, उसको नींदसे उठाकर पूछो कि क्या तुम्हारा विवाह हो गया? तो वह तुरन्त कहेगा कि हाँ, हो गया। वह यह विचार नहीं करेगा कि विवाह हुआ या नहीं हुआ। कारण कि ‘मैं विवाहित हूँ’—यह स्वीकृति स्वयंकी है। उसने ‘मैं विवाहित हूँ’—इसकी एक माला भी नहीं फेरी, एक बार भी अभ्यास नहीं किया, फिर भी वह इस बातको कभी भूलता नहीं। कारण कि यह स्वयंकी स्वीकृति है और मनुष्य स्वयंको कभी भूलता नहीं। इसी तरह ‘मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे हैं’—यह स्वीकृति एक बार होती है और सदाके लिये होती है। इसमें किसी अभ्यासकी आवश्यकता नहीं है। सभी अभ्यास ‘करणसापेक्ष साधन’ में होते हैं। श्रवण, मनन, निदिध्यासन, ध्यान, समाधि आदि सब करणसापेक्ष साधन हैं। परन्तु स्वयंकी स्वीकृति ‘करणनिरपेक्ष साधन’ है। करणसापेक्ष साधनमें तो भूल हो जाती है, पर करणनिरपेक्ष साधनमें भूल होती ही नहीं। करणसापेक्ष साधनमें साधक योगभ्रष्ट भी हो सकता है, पर करणनिरपेक्ष साधनमें योगभ्रष्ट होता ही नहीं।

जैसे स्त्री पतिको स्वीकार करती है, ऐसे ही भक्त भगवान् को स्वीकार करता है कि ‘मैं भगवान् का हूँ’। वास्तवमें ‘मैं शरीर-संसारका हूँ’—इस गलत मान्यताको हटानेके लिये ‘मैं भगवान् का हूँ’—इस स्वीकृतिकी जरूरत है, अन्यथा इस स्वीकृतिकी भी जरूरत नहीं है। तात्पर्य है कि ‘मैं भगवान् का हूँ’ यह स्वीकृति अस्वीकृतिको मिटानेमें काम करती है, नया सम्बन्ध जोड़नेमें नहीं। जैसे ‘मैं पतिकी हूँ’—ऐसा माननेके लिये तो स्त्रीको कुछ करना नहीं पड़ता, पर पतिके घरका काम जन्मभर करना पड़ता है, ऐसे ही ‘मैं भगवान् का हूँ’—ऐसा माननेके लिये भक्तको कुछ करना नहीं है, पर भगवान् का काम जन्मभर करना है। उसको सांसारिक अथवा पारमार्थिक सब कार्य भगवान् के लिये ही करने हैं। जैसे पतिव्रता स्त्री सब काम पतिके सम्बन्धसे ही करती है। शरीरका काम भी पतिके सम्बन्धसे करती है। कपड़े भी पतिके सम्बन्धसे ही पहनती है। सुहागनके कपड़े और तरहके होते हैं, विधवाके कपड़े और तरहके। पतिके सम्बन्धसे ही वह सुहागन होती है और पतिके सम्बन्धसे ही वह विधवा होती है। वह शृंगार भी पतिके सम्बन्धसे करती है। पति पासमें हो तो और तरहका शृंगार होता है, पति दूर देशमें गया हो तो और तरहका शृंगार होता है। वह बिन्दी भी लगाती है तो पतिके सम्बन्धसे लगाती है। ऐसे ही भक्तका प्रत्येक काम भगवान् के लिये ही होता है—

पतिव्ररता रहै पतिके पासा, यों साहिबके ढिग रहै दासा।

कारण कि भक्त अपनी अहंताको बदल देता है कि मैं संसारी नहीं हूँ, मैं तो भगवान् का हूँ। यह अहंता-परिवर्तन एक ही बार होता है, दो बार नहीं। जब एक बार अपनेको दे दिया, तो फिर दुबारा देनेके लिये क्या रह गया? देना एक ही बार होता है और सदाके लिये होता है। हमने अपनेको दे दिया तो अब कुछ भी करना बाकी नहीं रहा। अब तो नामजप करना है, कीर्तन करना है, भगवान् और उनके भक्तोंकी लीलाएँ सुननी हैं, भगवान् के जनोंकी सेवा करनी है; क्योंकि इससे बढ़कर और कोई काम है नहीं। यह सब करके मैं भगवान् का हो जाऊँगा—यह भाव उसमें रहता ही नहीं। क्या स्त्रीमें यह भाव रहता है कि मैं इतना काम करूँगी तो पतिकी होऊँगी, काम नहीं करूँगी तो नहीं होऊँगी? वह बीमार हो जाय, कुछ भी न करे तो भी पतिकी ही है और सब काम करे तो भी पतिकी ही है। पतिके साथ कुछ करने या न करनेका सम्बन्ध नहीं है, प्रत्युत स्वीकृतिका सम्बन्ध है। इसी तरह भगवान् के साथ सम्बन्ध हो जाय तो भजन अपने-आप होगा, करना नहीं पड़ेगा। स्त्री तो विधवा भी हो सकती है, पर भक्तका सुहाग स्वत:सिद्ध है, अमर है, सदासे ही है।

ज्यों तिरिया पीहर रहै, सुरति रहै पिय माहिं।

ऐसे जन जगमें रहै, हरि को भूलै नाहिं॥

लड़की पीहरमें कुछ दिन रह जाती है, तो माँसे कहती है कि ‘माँ, भाईसे कह कि मेरेको घर पहुँचा दे, उनको (पतिको) रोटीकी तकलीफ हो रही होगी!’ वह रहती तो यहाँ है, पर चिन्ता उस घरकी है; क्योंकि वह समझती है कि मैं यहाँकी नहीं हूँ। इसी तरह भक्त जगत् में रहते हुए भी भगवान् को नहीं भूलता, प्रत्युत ऐसा समझता है कि जगत् मेरा नहीं है, मेरे तो भगवान् हैं। यह ‘करणनिरपेक्ष साधन’ है।

करणनिरपेक्ष साधनमें अहंता बदल जाती है। जो पहले मानता था कि मैं संसारका हूँ, वह अहंता बदलनेपर मानता है कि मैं भगवान् का हूँ। जो पहले मानता था कि मैं ब्राह्मण हूँ, मैं क्षत्रिय हूँ, मैं वैश्य हूँ आदि, वह अहंता बदलनेपर मानता है कि मैं न ब्राह्मण हूँ, न क्षत्रिय हूँ, न वैश्य आदि हूँ, मैं तो भगवान् का हूँ।

नाहं विप्रो न च नरपतिर्नापि वैश्यो न शूद्रो

नो वा वर्णी न च गृहपतिर्नो वनस्थो यतिर्वा।

किन्तु प्रोद्यन्निखिलपरमानन्दपूर्णामृताब्धे-

र्गोपीभर्तु: पदकमलयोर्दासदासानुदास:॥

‘मैं न तो ब्राह्मण हूँ, न क्षत्रिय हूँ, न वैश्य हूँ, न शूद्र हूँ, न ब्रह्मचारी हूँ, न गृहस्थ हूँ, न वानप्रस्थ हूँ और न संन्यासी ही हूँ; किन्तु सम्पूर्ण परमानन्दमय अमृतके उमड़ते हुए महासागररूप गोपीकान्त श्यामसुन्दरके चरणकमलोंके दासोंका दासानुदास हूँ।’

पहले गुरुके द्वारा शिष्यको जो दीक्षा दी जाती थी, उसका तात्पर्य भी अहंता बदलनेसे ही था। जैसे विवाहके समय ब्राह्मण कह देता है कि बेटी, ये तेरे पति हो गये’ और वह स्वीकार कर लेती है, ऐसे ही गुरु शिष्यसे कह देता है कि ‘बेटा, अब तुम भगवान् के हो गये’ और वह स्वीकार कर लेता है अर्थात् ‘मैं भगवान् का हूँ’—इस तरह अपनी अहंता बदल देता है। गुरुमें यह भाव नहीं होता था कि यह मेरा चेला बन जाय, मेरी सेवा करे, भेंट-पूजा करे, मेरी टोली बनाये, मेरा पक्ष ले आदि। शिष्यके साथ गुरुका सम्बन्ध सांसारिक न होकर पारमार्थिक (कल्याणके लिये) होता था।

अहंता बदलती है—संसारका सम्बन्ध मिटानेके लिये, भगवान् से नया सम्बन्ध जोड़नेके लिये नहीं। कारण कि संसारका सम्बन्ध माना हुआ है और भगवान् का सम्बन्ध स्वत:सिद्ध है। ‘मैं भगवान् का हूँ’—इस तरह अहंता बदल जानेके बाद अहम् मिट जाता है अर्थात् व्यक्तित्व नहीं रहता। फिर भक्तकी प्रत्येक क्रिया भगवान् के लिये ही होती है। अपने लिये कुछ करना बाकी रहता ही नहीं। जब अपने-आपको भगवान् के अर्पित कर दिया तो फिर अपने लिये क्या करना बाकी रहा? वह भगवान् की मरजीमें अपनी मरजी मिला देता है और प्रसन्न रहता है। बीमार हो जाय तो भगवान् की मरजी, स्वस्थ हो जाय तो भगवान् की मरजी, घाटा लग जाय तो भगवान् की मरजी, नफा हो जाय तो भगवान् की मरजी, निरादर हो जाय तो भगवान् की मरजी, आदर हो जाय तो भगवान् की मरजी, सब निन्दा करें तो भगवान् की मरजी, सब प्रशंसा करें तो भगवान् की मरजी। उसका बीमार-स्वस्थता, घाटा-नफा, निरादर-आदर आदिसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता, केवल भगवान् से ही सम्बन्ध रहता है। विवाहमें तो कन्या वरको स्वीकार करती है और वर कन्याको स्वीकार करता है, तब दोनोंका सम्बन्ध होता है। परन्तु भगवान् ने तो सब जीवोंको पहलेसे ही स्वीकार कर रखा है—

ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।

(गीता १५।७)

‘इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है।’

‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’

(मानस, उत्तर० ८६।२)

मुख्य स्वीकृति बड़ेकी, मालिककी होती है। जैसे हम किसीकी गोद जायँ तो इसमें गोद लेनेवालेकी स्वीकृति मुख्य होती है। अगर वह हमें स्वीकार ही न करे तो हम उसकी गोद कैसे जायँगे? ऐसे ही भगवान् की स्वीकृति मुख्य है और उन्होंने पहलेसे ही हमें स्वीकार कर रखा है। हम भगवान् को स्वीकार कर लें, उनकी स्वीकृतिमें अपनी स्वीकृति मिला लें—इसका नाम शरणागति है। यह ‘करणनिरपेक्ष साधन’ है।

वास्तवमें हम अनादिकालसे भगवान् के ही हैं, पर संसारसे सम्बन्ध मानकर हम भगवान् के सम्बन्धको भूल गये थे, अब वह भूल मिट गयी, भगवान् के सम्बन्धकी याद आ गयी—यह शरणागति है। जैसे, अर्जुनने भगवान् से कहा—

नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।

(गीता १८।७३)

‘हे अच्युत! आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया है और स्मृति प्राप्त हो गयी है।’

संसारके साथ माने हुए सम्बन्धका त्याग करनेपर भगवान् के साथ स्वत:सिद्ध सम्बन्धका अनुभव होता है, पैदा नहीं होता। इसलिये शरणागति निषेधमुख साधन है, जिसमें संसारकी स्वीकृति मिटती है।

भगवान् के शरणागत होकर भक्त स्वत: निर्भय, नि:शोक, निश्चिन्त और नि:शंक हो जाता है।

चिन्ता दीनदयाल को, मो मन सदा आनन्द।

जायो सो प्रतिपालसी, रामदास गोबिन्द॥

जब कन्या विवाहके बाद ससुराल जाने लगती है, तब वह माँसे यह नहीं कहती कि माँ! थोड़ा आटा तो साथमें दे दे, मैं रोटी कहाँ खाऊँगी?’ कारण कि जो ले जा रहा है, वही रोटी देगा, वही कपड़ा देगा, वही मकान देगा, हमें क्या चिन्ता है? चिन्ता क्या, इस बातकी स्फुरणा ही नहीं होती। इससे भी विलक्षण भगवान् का हो जानेके बाद भक्त किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं करता। उसके मनमें शंका ही नहीं होती कि क्या होगा, क्या नहीं होगा?

मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे हैं—यह बहुत ऊँचा ‘करणनिरपेक्ष साधन’ है, जिसकी सिद्धि तत्काल होती है। जप, तप आदि करनेसे, बुद्धिसे तत्त्वका निश्चय करनेसे तत्काल सिद्धि नहीं होती; क्योंकि शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि ‘करण’ हैं। करणरहित स्वत:सिद्ध तत्त्वमें बुद्धिका निश्चय होता ही नहीं, प्रत्युत बुद्धिसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है। बुद्धिके निश्चयसे तो अभिमान पैदा होता है कि मैं ज्ञानी हूँ, दूसरे अज्ञानी हैं; मैं समझदार हूँ, दूसरे बेसमझ हैं! बेसमझकी बेसमझी तो मिट जाती है, पर अपनेको समझदार माननेवालेकी बेसमझी नहीं मिटती। पागलका पागलपना तो मिट जाता है, पर जो कहता है कि ‘तू पागल, तेरा बाप पागल, मैं क्यों पागल’, उसका पागलपना नहीं मिट सकता। कारण कि वह अपनेको पागल मानता ही नहीं, फिर उसका पागलपना कैसे मिटेगा? इसलिये जो बद्धज्ञानी (सीखे हुए ज्ञानी) होते हैं, उनका उद्धार होना बहुत कठिन है। कारण कि उनसे कोई बात कहें तो वे कहते हैं कि ‘मैं जानता हूँ’, जबकि जानता कुछ है नहीं, पर जाननेका अभिमान भीतर दृढ़ हो गया! अभिमान दृढ़ होनेपर फिर उसका मिटना कठिन हो जाता है।

प्रश्न—‘मैं पतिकी हूँ—यह तो प्रत्यक्ष दिखायी देता है, पर ‘मैं भगवान् का हूँ’—यह प्रत्यक्ष दिखायी नहीं देता, फिर इसको कैसे मानें?

उत्तर—पहले जमानेमें विवाहसे पहले लड़का-लड़की एक-दूसरेको नहीं देखते थे। माता-पिता ही दोनोंको भलीभाँति देखकर उनकी सगाई कर देते थे। एक बार सगाई होनेपर फिर उस सम्बन्धमें कोई सन्देह नहीं रहता था। जब बिना देखे सगाई हो सकती है, तो फिर बिना देखे भगवान् को अपना क्यों नहीं मान सकते? अवश्य मान सकते हैं। जो कहते हैं कि बिना देखे भगवान् को अपना कैसे मानें, उनकी अभी सगाई ही नहीं हुई है, विवाह होना तो दूर रहा!

दूसरी बात, किसीको अपना माननेके लिये उसे देखनेकी जरूरत नहीं है, प्रत्युत अपना स्वीकार करनेकी जरूरत है। हम प्रतिदिन अनेक मनुष्योंको देखते हैं तो क्या उन सबसे अपनेपनका सम्बन्ध हो जाता है? उन सबसे मित्रता हो जाती है? प्रेम हो जाता है? जिसको अपना स्वीकार करते हैं, उसीसे प्रेम होता है।

तीसरी बात, हमारे पास देखनेके लिये जो नेत्र हैं, वे जड संसारका अंग होनेसे संसारको ही देखते हैं, संसारसे अतीत चिन्मय भगवान् को नहीं देख सकते। हाँ, अगर भगवान् चाहें तो वे हमारे नेत्रोंका विषय हो सकते हैं अर्थात् हमें दर्शन दे सकते हैं; क्योंकि वे सर्वसमर्थ हैं। इसलिये हमें प्रभुको देखे बिना ही भगवान् के, शास्त्रोंके, भक्तोंके वचनोंपर विश्वास करके ‘मैं प्रभुका हूँ और प्रभु मेरे हैं’—ऐसा स्वीकार कर लेना चाहिये। यही सर्वश्रेष्ठ ‘करणनिरपेक्ष साधन’ है।