करणसापेक्ष-करणनिरपेक्ष साधन और करणरहित साध्य

परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति चाहनेवाले साधकोंके लिये साधनकी दो शैलियाँ हैं—करणसापेक्ष अर्थात् क्रियाप्रधान शैली और करणनिरपेक्ष अर्थात् विवेकप्रधान शैली। जिस शैलीमें करण (इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि) तथा क्रियाकी प्रधानता रहती है, उसको ‘करणसापेक्ष साधन’ कहते हैं और जिस शैलीमें सत्-असत् के विवेककी प्रधानता रहती है, उसको ‘करणनिरपेक्ष साधन’ कहते हैं।

करण क्या है?

क्रियाकी सिद्धिमें जो प्रधान हेतु होता है, उसको ‘करण’ कहते हैं। जैसे, सुननेमें कान करण हैं, स्पर्श करनेमें त्वचा करण है, देखनेमें आँख करण हैं, चखनेमें रसना करण है, सूँघनेमें नाक करण है, चिन्तन करनेमें चित्त करण है, किसी बातको समझनेमें बुद्धि करण है, कर्ता-भोक्ता बननेमें अहम् करण है। तात्पर्य है कि सांसारिक कार्य करनेके जितने औजार हैं, वे सब ‘करण’ कहलाते हैं।

शरीरमें कुल तेरह करण हैं। श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना, घ्राण, वाणी, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा—ये दस (ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ) ‘बहि:करण’ हैं तथा मन, बुद्धि और अहंकार—ये तीन ‘अन्त:करण’* हैं।

करणसापेक्ष और करणनिरपेक्ष क्या है?

जिसमें करणकी अत्यन्त आवश्यकता रहती है, वह ‘करणसापेक्ष’ होता है और जिसमें करणकी आवश्यकता नहीं रहती, वह ‘करणनिरपेक्ष’ होता है। जैसे, क्रियाकी सिद्धिमें करणकी अत्यन्त आवश्यकता रहती है; क्योंकि करणके बिना क्रियाकी सिद्धि नहीं होती; अत: क्रियाकी सिद्धि करणसापेक्ष है। परन्तु परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें करणकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि वह तत्त्व क्रियासे अतीत है; अत: परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करणनिरपेक्ष है।

करणनिरपेक्ष और करणरहितमें अन्तर

साधन करणनिरपेक्ष होता है और साध्य करणरहित होता है। परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करणनिरपेक्ष है, पर परमात्मतत्त्व करणरहित है।

दो व्यक्ति बातचीत करते हैं तो उसमें बोलनेके लिये जीभकी और सुननेके लिये कानकी जरूरत है, पर त्वचाकी जरूरत नहीं है। इसलिये उनकी बातचीतको त्वचानिरपेक्ष तो कह सकते हैं, पर त्वचारहित नहीं कह सकते। कारण कि अगर मनुष्य त्वचारहित होगा तो वह बातचीत कैसे कर सकेगा? ऐसे ही साधन करणनिरपेक्ष तो होता है, पर करणरहित नहीं होता।

पढ़ाई चक्षुनिरपेक्ष तो होती है, पर चक्षुरहित नहीं होती। चक्षुनिरपेक्ष कहनेका तात्पर्य है कि जिसके चक्षु हैं, वह भी पढ़ाई कर सकता है और जिसके चक्षु नहीं हैं, वह भी (कानसे सुनकर) पढ़ाई कर सकता है। अगर पढ़ाईको चक्षुरहित कहें तो जिसके चक्षु हैं, वह पढ़ाई कैसे कर सकेगा? इसी तरह साधन करणनिरपेक्ष होता है, करणरहित नहीं होता।

शरीरसे ‘निरपेक्ष’ होनेपर मुक्ति होती है, ‘सापेक्ष’ होनेपर बन्धन होता है और ‘रहित’ होनेपर मृत्यु होती है।

धनके दृष्टान्तसे करणनिरपेक्षताका विवेचन

धन (मुद्रा) वस्तुप्राप्तिका साधन है, साध्य नहीं। वास्तवमें देखा जाय तो धन खुद वस्तुप्राप्तिका साधन नहीं है, प्रत्युत धनका खर्च (त्याग) ही वस्तुप्राप्तिका साधन है। कारण कि वस्तुकी प्राप्ति धनसे नहीं होती, प्रत्युत धनके खर्चसे होती है। अगर वस्तुकी प्राप्ति धनसे होती तो हमारे पास धन रहते हुए ही अर्थात् धनको खर्च किये बिना धनसे ही वस्तु पैदा हो जाती! परन्तु खर्च करनेसे ही धन हमारे अथवा दूसरोंके काम आता है। अत: धनको महत्त्व न देकर उसके खर्चको ही महत्त्व देना है; क्योंकि धन महत्त्वकी चीज नहीं है, प्रत्युत उसका खर्च ही महत्त्वकी चीज है। इसी तरह करण साधन है, साध्य नहीं है। वास्तवमें करणका त्याग (सम्बन्ध-विच्छेद) ही तत्त्वप्राप्तिका साधन है; क्योंकि तत्त्वकी प्राप्ति करणके द्वारा नहीं होती, प्रत्युत करणके त्यागसे होती है। अत: करणको महत्त्व न देकर उसके त्यागको ही महत्त्व देना है।

जबतक हम धनका महत्त्व मानेंगे, तबतक हम धनका खर्च नहीं कर सकेंगे। ऐसे ही जबतक हम करणका महत्त्व मानेंगे, तबतक हम करणसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं कर सकेंगे। अत: साधकको आरम्भमें ही यह बात समझ लेनी चाहिये कि करण महत्त्वकी चीज नहीं है, प्रत्युत उसका त्याग (सम्बन्ध-विच्छेद) ही महत्त्वकी चीज है। अत: करणको काममें लेते हुए भी उसका महत्त्व न रहे, उसकी अपेक्षा न रहे, तब करणनिरपेक्ष साधन होगा।

अगर हम धनको महत्त्व देंगे तो हमारी संग्रहबुद्धि हो जायगी। संग्रहबुद्धि होना अर्थात् धनके संग्रहको महत्त्व देना पतनकी खास चीज है। धनके संग्रहको महत्त्व देनेवाला मनुष्य बड़े-बड़े पाप, अन्याय, अत्याचार कर बैठता है। अत: धनका त्याग (खर्च) तो साधन है, पर वस्तुप्राप्तिको धनके अधीन मानकर धनका संग्रह करना महान् असाधन है। इसी तरह करणका त्याग (सम्बन्ध-विच्छेद) तो साधन है, पर तत्त्वप्राप्तिको करणके अधीन मानकर करणकी सहायता लेना महान् असाधन है। तात्पर्य है कि धनको काममें तो लेना है, पर महत्त्व धनको न देकर उसके खर्चको ही देना है। ऐसे ही करणको काममें तो लेना है, पर महत्त्व करणको न देकर उसके सम्बन्ध-विच्छेदको ही देना है। अगर हम करणको महत्त्व देंगे तो करण बाँधनेवाला हो जायगा और हम करणसे अतीत नहीं हो सकेंगे। करणसे अतीत हुए बिना करणरहित तत्त्वकी प्राप्ति कैसे होगी?

जीवन-निर्वाहके लिये हमें अन्न, जल, वस्त्र आदिकी आवश्यकता है, धनकी आवश्यकता नहीं। धन मिले चाहे न मिले, पर वस्तु मिलनी चाहिये। हमारे पास केवल धन हो और अन्न, जल, वस्त्र आदि न हों तो हम जी नहीं सकेंगे। परन्तु हमारे पास केवल अन्न, जल, वस्त्र आदि हों और धन न हो तो हम अच्छी तरह जी जायँगे। यहाँ शंका हो सकती है कि धन पासमें न हो तो वस्तु कैसे मिलेगी? इसका समाधान है कि धन पासमें न होनेपर भी प्रारब्धके अनुसार अथवा भगवान् के विधानसे वस्तु मिल सकती है१। जैसे, कहीं परिश्रम (नौकरी) करनेसे बदलेमें वस्तु मिल जाती है; कोई भेंट, पुरस्कार आदि देता है तो वस्तु मिल जाती है; खेती करनेसे अनाज मिल जाता है; वस्तुके बदलेमें वस्तु मिल जाती है; जिनके पास धन (मुद्रा) नहीं है, उन साधुओं आदिको भी जीवन-निर्वाहकी वस्तुएँ मिल जाती हैं, आदि। तात्पर्य है कि जीवन-निर्वाहके लिये धनकी अपेक्षा नहीं है। वस्तु धनसे ही मिलती है—यह धनकी अपेक्षा है। वस्तु धनसे भी मिलती है और धनके बिना भी मिलती है—यह धनकी निरपेक्षता है। इसी तरह परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें करणकी अपेक्षा नहीं है अर्थात् वह करणनिरपेक्ष है२।

करणकी आवश्यकता कहाँतक है?

जैसे जूतीकी आवश्यकता तभीतक है, जबतक मार्गपर काँटे-कंकड़ हैं, ऐसे ही साधनमें करणकी आवश्यकता तभीतक है, जबतक विवेककी कमी है अर्थात् विवेक पूर्णतया जाग्रत् नहीं हुआ है। विवेक जाग्रत् न होनेका कारण है—अपने विवेकको महत्त्व न देना। भोग और संग्रहकी आसक्तिके कारण ही मनुष्य अपने विवेकको महत्त्व नहीं देता*।

जैसे झाड़ू वहींतक काम आता है, जहाँतक कूड़ा-करकट है, ऐसे ही विवेकवती बुद्धि वहींतक काम आती है, जहाँतक संसारमें महत्त्वबुद्धि है। जैसे झाड़ू और कूड़ा-करकट—दोनों एक ही जातिके हैं, ऐसे ही करण और संसार—दोनों एक ही जातिके हैं। कूड़ा-करकट दूर होनेपर जैसे झाड़ूको भी दूर कर देते हैं, ऐसे ही संसारमें महत्त्वबुद्धिका त्याग होनेपर करणका भी त्याग हो जाता है।

करणनिरपेक्ष साधनमें करणको काममें लेना है करणका त्याग करनेके लिये, न कि साथमें रखनेके लिये। अगर करणमें महत्त्वबुद्धि होगी तो उसका त्याग नहीं हो सकेगा। करणमें महत्त्वबुद्धि होनेका तात्पर्य है—करणके द्वारा ही तत्त्वकी प्राप्ति मानना।

करण साधन है, साध्य नहीं। साध्य तो करणरहित परमात्मतत्त्व ही है। अत: करणका सदुपयोग तो करना है, पर उसकी अपेक्षा नहीं रखनी है। अपेक्षा रखनेसे करणकी पराधीनता रहेगी। जडकी पराधीनता, दासता रहनेसे चिन्मय तत्त्व नहीं मिलेगा। करणकी अपेक्षा न रखनेसे जडकी दासता नहीं रहेगी और साधक स्वतन्त्रतापूर्वक स्वतन्त्रता (मोक्ष) को प्राप्त कर लेगा।

संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करणनिरपेक्ष होनेसे ही होता है। जबतक करणकी अपेक्षा रहेगी, तबतक संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं होगा; क्योंकि करण भी संसार ही है।

करणको काममें लेना दोष नहीं है, प्रत्युत उसमें महत्त्वबुद्धि रखना, उसका आश्रय लेना, उसके अधीन होना, उसकी अपेक्षा रखना दोष है। अत: बुद्धिको काममें लेना है, उसका सदुपयोग करना है, पर उसका आश्रय नहीं लेना है। साधकको विचार करना चाहिये कि क्या मैं बुद्धि हूँ? अगर मैं बुद्धि नहीं हूँ तो मैं बुद्धिका हूँ अथवा बुद्धि मेरी है? अगर बुद्धि मेरी है तो इससे सिद्ध होता है कि मैं बुद्धिसे अलग हूँ; मेरे लिये बुद्धिकी जरूरत नहीं है, प्रत्युत बुद्धिको मेरी जरूरत है। अत: बुद्धिको छोड़कर अपने स्वरूपमें स्थित होना है। जबतक बुद्धि साथमें रहेगी, तबतक राग-द्वेषका अभाव नहीं होगा और अहम् (परिच्छिन्नता या व्यक्तित्व) बना रहेगा।

जैसे आँख दीखनेमें छोटी-सी होते हुए भी इतनी सूक्ष्म और व्यापक है कि भूमण्डल, तारा, नक्षत्र आदि सब देखनेके बाद भी जगह खाली रहती है। ऐसा नहीं होता कि बस, अब जगह खाली नहीं रही, अब और नहीं देख सकते। जो वस्तु आँखसे नहीं दीखती, वह मन-बुद्धिसे दीखती है अर्थात् जाननेमें आती है। बुद्धि इतनी सूक्ष्म और व्यापक है कि समस्त वेद-पुराणादि शास्त्र, अनेक विद्याएँ, अनेक भाषाएँ और लिपियाँ, चारों युगों और चौदह भुवनोंका ज्ञान तथा ब्रह्माकी आयु भी बुद्धिके जाननेमें आती है। फिर भी ऐसा नहीं होता कि बस, अब जगह खाली नहीं रही, अब और नहीं जान सकते। बुद्धिमें ऐसी विलक्षणता होनेपर भी बुद्धि दृश्य ही है, द्रष्टा नहीं; क्योंकि बुद्धि करण (अन्त:करण) है। करण प्रकृतिका कार्य होता है। करणके द्वारा हम प्रकृतिको तो जान ही नहीं सकते, प्रकृतिके कार्यको भी पूरा नहीं जान सकते, फिर प्रकृतिसे अतीत तत्त्वको जान ही कैसे सकते हैं?

अगर हम ब्रह्मको बुद्धिसे जाननेकी चेष्टा करते हैं तो हमने मानो ब्रह्मको बुद्धिका विषय बना लिया अर्थात् ब्रह्म तो दृश्य (एकदेशीय) हो गया और बुद्धि द्रष्टा (व्यापक) हो गयी। बुद्धिमें वही विषय आता है, जो बुद्धिसे छोटा होता है। अत: जबतक हम ब्रह्मको बुद्धिके ज्ञानसे देखेंगे, बुद्धिसे उसपर विचार करेंगे, तबतक हमारी स्थिति जडमें ही रहेगी। कारण कि सांसारिक विषयोंसे लेकर बुद्धितक सब प्रकृतिका कार्य होनेसे दृश्य (जड) ही है। इसीलिये कहा है—

रूपं दृश्यं लोचनं दृक् तद्दृश्यं दृक् तु मानसम्।

दृश्या धीवृत्तय: साक्षी दृगेव तु न दृश्यते॥

(वाक्यसुधा १)

‘सर्वप्रथम नेत्र द्रष्टा हैं और रूप दृश्य है, फिर मन द्रष्टा है और नेत्रादि इन्द्रियाँ दृश्य हैं, फिर बुद्धि द्रष्टा है और मन दृश्य है। अन्तमें बुद्धिकी वृत्तियोंका भी जो द्रष्टा है, वह साक्षी (स्वयंप्रकाश आत्मा) किसीका भी दृश्य नहीं है।’

तात्पर्य है कि शब्दादि विषयोंमें होनेवाले परिवर्तनको इन्द्रियाँ जानती हैं; अत: विषय दृश्य हैं और इन्द्रियाँ द्रष्टा हैं। इन्द्रियोंमें होनेवाले परिवर्तनको मन जानता है; अत: इन्द्रियाँ दृश्य हैं और मन द्रष्टा है। मनमें होनेवाले संकल्प-विकल्प, चंचलता-स्थिरता आदि विकारोंको बुद्धि जानती है; अत: मन दृश्य है और बुद्धि द्रष्टा है। बुद्धिमें होनेवाले विकारों (समझना, न समझना अथवा कम समझना आदि)-को स्वयं जानता है; अत: बुद्धि दृश्य है और स्वयं (स्वरूप) द्रष्टा है। स्वयं अपरिवर्तनशील तथा निर्विकार है; अत: वह किसीका भी दृश्य नहीं है, प्रत्युत सबका द्रष्टा है*—

१. ‘विज्ञातारमरे केन विजानीयात्’

(बृहदा० २। ४। १४)

‘सबके विज्ञाताको किसके द्वारा जाना जाय?’

२. ‘नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा’

(बृहदा० ३। ७। २३)

‘इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है।’

३. ‘स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता’

(श्वेताश्वतर० ३। १९)

‘वह सम्पूर्ण ज्ञेयको जानता है, पर उसका ज्ञाता कोई नहीं है।’

करणरहित (करणनिरपेक्ष) परमात्मतत्त्व

जिससे क्रियाकी सिद्धि होती है, जो क्रियाको उत्पन्न करनेवाला है, उसको ‘कारक’ कहते हैं—‘क्रियाजनकत्वं कारकत्वम्’। कारक छ: होते हैं—कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण१। ये छहों कारक क्रियाकी सिद्धिमें ही काम आते हैं, परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें नहीं। कारण कि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति क्रियासाध्य नहीं है। सभी कारक प्रकृतिमें हैं और प्रकृतिके कार्य हैं; परन्तु परमात्मतत्त्व प्रकृतिसे अतीत है। अत: कोई भी कारक परमात्मतत्त्वतक नहीं पहुँच सकता। इसलिये परमात्मतत्त्व करणनिरपेक्ष (करणरहित) है अर्थात् वह कर्तानिरपेक्ष, कर्मनिरपेक्ष, करणनिरपेक्ष, सम्प्रदाननिरपेक्ष, अपादाननिरपेक्ष और अधिकरणनिरपेक्ष है२।

शंका—जब परमात्मतत्त्व सभी कारकोंसे निरपेक्ष है तो फिर उसको केवल करणनिरपेक्ष कहनेका क्या तात्पर्य है?

समाधान—क्रियाकी सिद्धि करणके व्यापारके बाद तत्काल ही होती है*। अत: करण क्रियाकी सिद्धिमें अत्यन्त उपकारक होता है—‘साधकतमं करणम्’ (पाणि० अ० १। ४। ४२)। जैसे, ‘रामके बाणसे बालि मारा गया’—इस वाक्यमें ‘बाण’ करण है; क्योंकि बालिके मरनेमें बाण हेतु हुआ। यद्यपि बाणके चलनेमें धनुष, प्रत्यंचा, हाथ आदि कई कारक हेतु हैं, तथापि बालि बाणसे मारा गया, धनुष आदिसे नहीं। अत: परमात्मतत्त्वको करणनिरपेक्ष कहनेका तात्पर्य यह हुआ कि जो क्रियाकी सिद्धिमें अत्यन्त उपकारक है, वह ‘करण’ भी जब उसकी प्राप्तिमें हेतु नहीं है तो फिर दूसरे कारक उसकी प्राप्तिमें हेतु हो ही कैसे सकते हैं? इसलिये करणनिरपेक्ष कहनेसे परमात्मतत्त्व स्वत: कारकनिरपेक्ष सिद्ध हो जाता है; क्योंकि वह कारकोंसे अतीत है।

कारकोंमें ‘कर्ता’ मुख्य होता है; क्योंकि सब क्रियाएँ कर्ताके ही अधीन होती हैं। अन्य कारक तो क्रियाकी सिद्धिमें सहायकमात्र होते हैं। इसलिये कर्ता स्वतन्त्र होता है—‘स्वतन्त्र: कर्त्ता’ (पाणि० अ० १।४।५४)। परमात्मतत्त्व किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं है। गीताने परमात्मतत्त्वमें कर्तापनका निषेध जगह-जगह और तरह-तरहसे किया है; जैसे—

१. शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥

(१३।३१)

‘यह आत्मा शरीरमें रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है।’

२. प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वश:।

य: पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥

(१३।२९)

‘जो सम्पूर्ण क्रियाओंको सब प्रकारसे प्रकृतिके द्वारा ही की जाती हुई देखता है अर्थात् प्रकृतिको कर्ता देखता है और स्वरूपको अकर्ता देखता (अनुभव करता) है, वही यथार्थ देखता है।’

३. तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु य:।

पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मति:॥

(१८। १६)

‘जो कर्मोंके विषयमें शुद्ध आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है।’

४. प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:।

अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥

(३। २७)

‘सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं अर्थात् गुण कर्ता हैं; परन्तु अहंकारसे मोहित अन्त:करणवाला अज्ञानी मनुष्य ‘मैं कर्ता हूँ’—ऐसा मानता है।’

५. तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयो:।

गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥

(३। २८)

‘हे महाबाहो! गुणविभाग और कर्मविभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष ‘सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं’—ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता।’

६. नान्यं गुणेभ्य: कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।

गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥

(१४। १९)

‘जब विवेकी (विचारकुशल) मनुष्य तीनों गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे पर (सर्वथा निर्लिप्त) अनुभव करता है, तब वह मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है।’

७.‘इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते’

(५। ९)

‘सम्पूर्ण इन्द्रियाँ ही इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं अर्थात् इन्द्रियाँ कर्ता हैं।’

८.नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।

(५।८)

‘तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी ‘मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ’—ऐसा माने अर्थात् अनुभव करे।’

—इस प्रकार कहीं प्रकृतिको, कहीं गुणोंको और कहीं इन्द्रियोंको कर्ता कहनेका तात्पर्य यह है कि परमात्मतत्त्वमें कर्तृत्व नहीं है। कर्तृत्व-भोक्तृत्व संसारका स्वरूप है। जब परमात्मतत्त्व कर्ता ही नहीं है तो फिर अन्य कारक वहाँतक पहुँच ही कैसे सकते हैं? अत: उसकी प्राप्ति करणके द्वारा नहीं होती, प्रत्युत करणके सम्बन्ध-विच्छेदसे होती है। उपनिषद्‍में आया है—

१. ‘न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मन:’

(केन० १।३)

‘उस ब्रह्मतक न तो नेत्रेन्द्रिय जाती है, न वाणी जाती है और न मन ही जाता है।’

२. यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्।

तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥

(केन० १। ५)

‘जो मन (अन्त:करण) से मनन नहीं किया जाता, प्रत्युत जिससे मन मनन किया हुआ कहा जाता है, उसीको तू ब्रह्म जान। जिस इसकी लोक उपासना करता है अर्थात् जिसका ज्ञान अन्त:करणसे होता है, वह ब्रह्म नहीं है।’

३. नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा।

(कठ० २। ३। १२)

‘वह परमात्मतत्त्व न तो वाणीसे, न मनसे और न नेत्रोंसे ही प्राप्त किया जा सकता है।’

४. नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम्॥

(कठ० १। २। २३; मुण्डक० ३। २। ३)

‘यह आत्मतत्त्व (परमात्मा) न तो प्रवचनसे, न बुद्धिसे और न बहुत सुननेसे ही प्राप्त हो सकता है। यह जिसको स्वीकार कर लेता है, उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है; क्योंकि यह (परमात्मा) उसके लिये अपने यथार्थ स्वरूपको प्रकट कर देता है।’

परमात्मा उसी साधकको मिलते हैं, जिसको वे स्वयं स्वीकार कर लेते हैं और वे उसीको स्वीकार करते हैं, जो केवल उनको ही प्राप्त करना चाहता है—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।’ (गीता ४। ११)। तात्पर्य है कि परमात्मा साधककी उत्कट अभिलाषासे प्राप्त होते हैं, श्रवणादि साधनोंसे नहीं। शांकरभाष्यमें आया है—

‘यमेव परमात्मानमेवैष विद्वान्वृणुते प्राप्तुमिच्छति तेन वरणेनैष परमात्मा लभ्यो नान्येन साधनान्तरेण, नित्यलब्धस्वभावत्वात्।’

‘जिस परमात्माको यह विद्वान् वरण करता अर्थात् प्राप्त करनेकी इच्छा करता है, उस वरण करनेके द्वारा ही यह परमात्मा प्राप्त होनेयोग्य है। नित्यप्राप्तस्वरूप होनेके कारण यह परमात्मा किसी अन्य साधनसे प्राप्त नहीं हो सकता।’

गीतामें आया है—‘श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्’ (२। २९) ‘इसको सुनकर भी कोई नहीं जानता।’ तात्पर्य है कि जैसे संसारमें सुननेमात्रसे विवाह नहीं होता, प्रत्युत स्त्री और पुरुष एक-दूसरेको पति-पत्नीरूपसे स्वीकार करते हैं, तब विवाह होता है, ऐसे ही सुननेमात्रसे परमात्मतत्त्वको कोई भी नहीं जान सकता, प्रत्युत सुननेके बाद जब स्वयं उसको स्वीकार करेगा अथवा उसमें स्थित होगा, तब स्वयंसे उसको जानेगा। अत: सुननेमात्रसे मनुष्य ज्ञानकी बातें सीख सकता है, सुना सकता है, लिख सकता है, पर अनुभव नहीं कर सकता।

‘मैं हूँ’—इस तरह अपने होनेपन (सत्ता)-का जो अनुभव होता है, यह किसी करणसे नहीं होता। तात्पर्य है कि अपना होनापन किसी करणके अधीन नहीं है, प्रत्युत स्वत:सिद्ध है। अत: जब अपने होनेपनका अनुभव करनेके लिये भी किसी करणकी आवश्यकता नहीं है तो फिर परमात्मतत्त्व क्या हमारेसे भी कमजोर है कि उसके अनुभवके लिये करणकी आवश्यकता हो?

सत्ता (तत्त्व) करणरहित है—इसका सुषुप्तिमें अस्पष्ट अनुभव प्रत्येक मनुष्यको होता है*। सुषुप्तिमें ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सब अविद्यामें लीन हो जाते हैं, पर स्वयं रहता है। इसलिये सुषुप्तिसे जगनेपर (उसकी स्मृतिसे) हम कहते हैं कि मैं ऐसा सुखपूर्वक सोया कि मेरेको कुछ पता नहीं था। इस स्मृतिसे सिद्ध होता है कि सुखका अनुभव करनेवाला और ‘कुछ पता नहीं था’ यह कहनेवाला तो था ही! नहीं तो सुखका अनुभव किसको हुआ और ‘कुछ पता नहीं था’—यह बात किसने कही?

एक स्त्रीकी नथ कुएँमें गिर गयी। उसको निकालनेके लिये एक आदमी कुएँमें उतरा और जलके भीतर जाकर उस नथको ढूँढ़ने लगा। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वह नथ उसके हाथ लग गयी तो उसको बड़ी प्रसन्नता हुई। परन्तु उस समय वह कुछ बोल नहीं सका; क्योंकि वाणी (अग्नि) और जलका आपसमें विरोध है। जलसे बाहर आनेपर ही वह बोल सका कि ‘नथ मिल गयी!’ ऐसे ही सुषुप्तिमें करणोंके लीन होनेपर मनुष्य सुखका अनुभव तो करता है, पर उसको व्यक्त नहीं कर सकता; क्योंकि बोलनेका साधन नहीं रहा। सुषुप्तिसे जगनेपर ही उसको सुषुप्तिके सुखकी स्मृति होती है। स्मृति अनुभवजन्य होती है—‘अनुभवजन्यं ज्ञानं स्मृति:’।

इस प्रकार सुषुप्तिमें करणोंके अभावका अनुभव तो सबको होता है, पर अपने अभावका अनुभव किसीको कभी नहीं होता। करण हमारे बिना नहीं रह सकते, पर हम (स्वयं) करणोंके बिना रह सकते हैं और रहते हैं। सत्तामात्र, चिन्मयतामात्र हमारा स्वरूप है। इस नित्य सत्ताको किसीकी अपेक्षा नहीं है; परन्तु सत्ताकी अपेक्षा सबको है। अत: सत्ताका बोध करणोंके द्वारा नहीं होता, प्रत्युत करणोंके सम्बन्ध-विच्छेदसे होता है।

एक मार्मिक बात है कि सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्ति जिस रीतिसे होती है, उस रीतिसे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति नहीं होती। संसारका कोई भी काम करणके बिना नहीं होता। जो भी काम होता है, करणसे ही होता है। कारण कि अप्राप्त सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्ति तो क्रियासे होती है, पर नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति क्रियासे नहीं होती—‘नास्त्यकृत: कृतेन’ (मुण्डक० १।२।१२); क्योंकि वह क्रियासे अतीत तत्त्व है। अत: उसकी प्राप्तिके लिये करणकी आवश्यकता नहीं है।

जैसे कण्ठी गलेमें है और गला कण्ठीमें है, पर वहम हो गया कि कण्ठी खो गयी तो इस वहम (अज्ञान)को मिटानेके लिये किसी करणकी जरूरत नहीं है, प्रत्युत ज्ञानकी जरूरत है। ज्ञान कण्ठीको पैदा नहीं करता, प्रत्युत वहम मिटाता है। अत: किसी वस्तुको बनानेमें, पैदा करनेमें तो करणकी जरूरत है, पर जो स्वत:सिद्ध (पहलेसे ही विद्यमान) तत्त्व है, उसमें करणकी क्या जरूरत है?

खोया कहे सो बावरा, पाया कहे सो कूर।

पाया खोया कुछ नहीं, ज्यों-का-त्यों भरपूर॥

परमात्मतत्त्वका अनुभव स्वयंको होता है, करणको नहीं। अत: परमात्मतत्त्वका अनुभव करनेके लिये हम करणकी जितनी आवश्यकता मानेंगे, उतनी ही परमात्मतत्त्वके अनुभवमें देरी लगेगी। वास्तवमें हमें नित्यप्राप्त तत्त्वकी ही प्राप्ति करनी है और नित्यनिवृत्तकी ही निवृत्ति करनी है, नया कुछ नहीं करना है। अत: इसमें किसी करण अर्थात् क्रियाकी अपेक्षा नहीं है। इसलिये गीता कहती है—

१. ‘आत्मन्येवात्मना तुष्ट:’

(२। ५५)

‘अपने-आपसे अपने-आपमें ही सन्तुष्ट रहता है।’

२. यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव:।

आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥

(३। १७)

‘जो मनुष्य अपने-आपमें ही रमण करनेवाला तथा अपने-आपमें ही तृप्त एवं अपने-आपमें ही सन्तुष्ट है, उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है।’

३. ‘उद्धरेदात्मनात्मानम्’

(६। ५)

‘अपने द्वारा अपना उद्धार करे।’

४. यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति।

(६। २०)

‘जिस अवस्थामें स्वयं अपने-आपमें अपने-आपको देखता हुआ अपने-आपमें सन्तुष्ट हो जाता है।’

५. ‘पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना’

(१३। २४)

‘अपने-आपसे अपने-आपमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं।’

६. ‘पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्’

(१५। ११)

‘अपने-आपमें स्थित परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं।’ भगवान् के लिये भी अर्जुनने कहा है—

‘स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।’

(१०। १५)

‘हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने-आपसे अपने-आपको जानते हैं।’

उपनिषद्‍में भी आया है—

१. ‘आत्मन्येवात्मानं पश्यति’

(बृहदा० ४। ४। २३)

‘आत्मामें ही आत्माको देखता है।’

२. ‘ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति’

(बृहदा० ४। ४। ६)

‘ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है।’

३. आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम्।

(केन० २। ४)

‘अमृतत्व अपने-आपसे ही प्राप्त होता है। विद्यासे तो अज्ञानान्धकारको निवृत्त करनेका सामर्थ्य मिलता है।’

केनोपनिषद्के उपर्युक्त मन्त्रके शांकरभाष्यमें आया है—

‘आत्मना विन्दते स्वेनैव नित्यात्मस्वभावेनामृतत्वं विन्दते। नालम्बनपूर्वकम्। विन्दत इति आत्मविज्ञानापेक्षम्। यदि हि विद्योत्पाद्यममृतत्वं स्यादनित्यं भवेत्कर्मकार्यवत्। अतो न विद्योत्पाद्यम्। यदि चात्मनैवामृतत्वं विन्दते किं पुनर्विद्यया क्रियत इत्युच्यते। अनात्मविज्ञानं निवर्तयन्ती सा तन्निवृत्त्या स्वाभाविकस्यामृतत्वस्य निमित्तमिति कल्प्यते। यत आह ‘वीर्यं विद्यया विन्दते।’

‘अमरत्व तो आत्मासे—अपने नित्यात्मस्वभावसे ही प्राप्त करते हैं, किसीके आश्रयसे नहीं। ‘विन्दते’—इससे यह समझना चाहिये कि उसकी प्राप्ति आत्मविज्ञानकी अपेक्षा रखनेवाली है। यदि अमृतत्व विद्यासे उत्पन्न किया जानेयोग्य होता तो कर्मफलके समान अनित्य हो जाता। इसलिये वह विद्यासे उत्पाद्य नहीं है। यदि कहो कि जब अमृतत्व स्वत: ही मिल जाता है तो विद्या उसमें क्या करती है? तो इसमें हमें यह कहना है कि वह अनात्मविज्ञानको निवृत्त करती हुई उसकी निवृत्तिके द्वारा स्वाभाविक अमृतत्वकी हेतु बनती है; क्योंकि ‘विद्यासे अज्ञानान्धकारको निवृत्त करनेका सामर्थ्य प्राप्त होता है’—ऐसा कहा भी है।’

धनसहायमन्त्रौषधितपोयोगकृतं वीर्यं मृत्युं न शक्नोत्यभिभवितुमनित्यवस्तुकृतत्वात्; आत्मविद्याकृतं तु वीर्यमात्मनैव विन्दते, नान्येन इत्यतोऽनन्यसाधनत्वादात्मविद्यावीर्यस्य तदेव वीर्यं मृत्युं शक्नोत्यभिभवितुम्।’

‘धन, सहाय, मन्त्र, ओषधि, तप और योगसे प्राप्त होनेवाला वीर्य (सामर्थ्य) अनित्य वस्तुका किया हुआ होनेसे मृत्युका पराभव करनेमें समर्थ नहीं है; किन्तु आत्मविद्यासे होनेवाला वीर्य तो आत्माद्वारा ही प्राप्त किया जाता है, अन्य किसीसे नहीं। इसलिये आत्मविद्याजनित वीर्य किसी अन्य साधनसे प्राप्त होनेवाला नहीं है; अत: वही वीर्य मृत्युका पराभव कर सकता है।’

तात्पर्य यह हुआ कि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति स्वयंको होती है, करणको नहीं। अत: उसकी प्राप्तिके लिये अन्त:करणकी जरूरत नहीं है, प्रत्युत अन्त:करणसे सम्बन्ध-विच्छेदकी जरूरत है। जिससे सम्बन्ध-विच्छेद करना है, वह कैसा है और कैसा नहीं है, इससे क्या मतलब?

किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुन: कियत्।

वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च॥

(श्रीमद्भा० ११। २८। ४)

‘संसारकी सब वस्तुएँ वाणीसे कही जा सकती हैं और मनसे सोची जा सकती हैं; अत: वे सब असत्य हैं। जब द्वैत नामकी कोई वस्तु ही नहीं है तो फिर उसमें क्या अच्छा और क्या बुरा?’

शंका—अन्त:करणको शुद्ध किये बिना उससे सम्बन्ध-विच्छेद कैसे होगा?

समाधान—वास्तवमें परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये अन्त:करणकी आवश्यकता समझना और अन्त:करणसे अपना सम्बन्ध मानना ही अन्त:करणकी अशुद्धि है। बोध अन्त:करणसे नहीं होता, प्रत्युत विवेककी जागृतिसे होता है और स्वयंको होता है। जैसे कलम बढ़िया होनेसे लिखावट तो बढ़िया हो सकती है, पर लेखक बढ़िया नहीं हो जाता, ऐसे ही अन्त:करण शुद्ध होनेसे क्रियाएँ तो शुद्ध हो सकती हैं, पर कर्ता शुद्ध नहीं हो जाता। कर्ता शुद्ध होता है अन्त:करणसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर; क्योंकि अन्त:करणसे अपना सम्बन्ध मानना ही अशुद्धिका मूल कारण है। अपनापन (ममता) ही मल है—‘ममता मल जरि जाइ’ (मानस ७।११७ क)।

गीतामें आया है—

‘सिद्धॺसिद्धॺो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥’

(२। ४८)

—इसकी व्याख्या करते हुए श्रीशंकराचार्यजी महाराज कहते हैं—‘फलतृष्णाशून्येन क्रियमाणे कर्माणि सत्त्वशुद्धिजा ज्ञानप्राप्तिलक्षणा सिद्धिस्तद् विपर्ययजा असिद्धिस्तयो: सिद्धॺसिद्धॺोरपि समस्तुल्यो भूत्वा कुरु कर्माणि। कोऽसौ योगो यत्रस्थ: कुर्वित्युक्तमिदमेव तत् सिद्धॺसिद्धॺो: समत्वं योग उच्यते।’

‘फल तृष्णारहित पुरुषके द्वारा कर्म किये जानेपर अन्त:करणकी शुद्धिसे उत्पन्न होनेवाली ज्ञानप्राप्ति तो सिद्धि है और उससे विपरीत (ज्ञानप्राप्तिका न होना) असिद्धि है। ऐसी सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर अर्थात् दोनोंको तुल्य समझकर कर्म कर। वह कौन-सा योग है, जिसमें स्थित होकर कर्म करनेके लिये कहा है? यही जो सिद्धि और असिद्धिमें सम होना है, इसीको योग कहते हैं।’

तात्पर्य यह हुआ कि साधकको अन्त:करणकी शुद्धि-अशुद्धिकी अपेक्षा न रखकर सम रहना चाहिये। कारण कि अन्त:करणकी शुद्धि और अशुद्धि—दोनोंका जो प्रकाशक (साक्षी) है, वह शुद्धि-अशुद्धिसे रहित (सम) है। अत: अन्त:करणको शुद्ध करनेकी जरूरत नहीं है, प्रत्युत सम होनेकी अर्थात् अन्त:करण तथा उसकी शुद्धि-अशुद्धि दोनोंका त्याग करके अपने स्वरूपमें स्थित होनेकी जरूरत है, जो कि स्वत:सिद्ध है। भागवतोक्त हंसगीतामें भगवान् कहते हैं—

गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रजा:।

जीवस्य देह उभयं गुणाश्चेतो मदात्मन:॥

गुणेषु चाविशच्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया।

गुणाश्च चित्तप्रभवा मद्रूप उभयं त्यजेत्॥

(११। १३। २५-२६)

‘यह चित्त विषयोंका चिन्तन करते-करते विषयाकार हो जाता है और विषय चित्तमें प्रविष्ट हो जाते हैं, यह बात सत्य है, तथापि विषय और चित्त—ये दोनों ही मेरे स्वरूपभूत जीवके देह (उपाधि) हैं अर्थात् आत्माका चित्त और विषयके साथ कोई सम्बन्ध ही नहीं है।’

‘इसलिये बार-बार विषयोंका सेवन करते रहनेसे जो चित्त विषयोंमें आसक्त हो गया है और विषय भी चित्तमें प्रविष्ट हो गये हैं, इन दोनोंको अपने वास्तविक स्वरूपसे अभिन्न मुझ परमात्मामें स्थित होकर त्याग देना चाहिये।’

ऐसी ही बात श्रीरामचरितमानसमें भी आयी है—

सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक।

गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक॥

(७। ४१)

प्रश्न—क्या परमात्माका सगुण-साकार रूप भी करणनिरपेक्ष है?

उत्तर—हाँ, परमात्माका सगुण रूप भी वास्तवमें निर्गुण होनेसे करणनिरपेक्ष (करणरहित) ही है१। परमात्माको चाहे निर्गुण कहें, चाहे सगुण कहें, वे सत्त्व-रज-तम तीनों गुणोंसे सर्वथा अतीत हैं। वे सृष्टिकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके लिये गुणोंको स्वीकार करते हैं, पर ऐसा करनेपर भी वे गुणोंसे सर्वथा अतीत ही रहते हैं, गुणोंसे बँधते नहीं२। अत: परमात्माके ब्रह्मा, विष्णु और महेशरूप भी तत्त्वसे निर्गुण ही हैं।

वास्तवमें परमात्मा सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार आदि सब कुछ हैं। सगुण-निर्गुण आदि तो उनके विशेषण (नाम) हैं। जो परमात्मा गुणोंसे कभी नहीं बँधते, जिनका गुणोंपर पूरा आधिपत्य होता है, वे ही परमात्मा निर्गुण होते हैं। अगर परमात्मा गुणोंसे बँधे हुए और गुणोंके अधीन होंगे तो वे कभी निर्गुण नहीं हो सकते। निर्गुण तो वे ही हो सकते हैं, जो गुणोंसे सर्वथा अतीत हैं और जो गुणोंसे सर्वथा अतीत हैं, ऐसे परमात्मामें ही सम्पूर्ण गुण रह सकते हैं। जो अपनेको गुणोंसे बँधा हुआ मानता है, वह जीव भी परमात्मप्राप्ति होनेपर जब गुणातीत कहा जाता है—‘गुणातीत: स उच्यते’ (गीता १४।२५), तो फिर परमात्मा गुणोंसे आबद्ध कैसे हो सकते हैं? वे तो नित्य ही गुणातीत हैं।

जब परमात्मा सगुण-साकार रूपसे प्रकट होते हैं, तब उनके करण भी प्राकृत (मायिक) नहीं होते, प्रत्युत चिन्मय होते हैं—

‘जन्म कर्म च मे दिव्यम्’

(गीता ४। ९)

चिदानंदमय देह तुम्हारी।

बिगत बिकार जान अधिकारी॥

(मानस २।१२७।३)

भगवान् का साकार रूप जीवोंके शरीरोंकी तरह हाड़-मांसका (जड) नहीं होता। जीवोंके शरीर तो पाप-पुण्यमय, नाशवान्, रोगी, विकारी, पाञ्चभौतिक और रज-वीर्यसे पैदा होनेवाले होते हैं, पर भगवान् का शरीर पाप-पुण्यसे रहित, अविनाशी, रोगरहित, विकार-रहित, चिन्मय तथा स्वत: प्रकट होनेवाला होता है। जीवोंके शरीरोंकी अपेक्षा देवताओंके शरीर भी दिव्य होते हैं, पर भगवान् का शरीर देवताओंके शरीरोंसे भी अत्यन्त विलक्षण, परम दिव्य होता है, जिसको देखनेके लिये देवता भी लालायित रहते हैं—

देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिण:।

(गीता ११।५२)

भगवान् के शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—सब-के-सब चिन्मय हैं। भगवान् का एक नाम ‘आत्मारामगणाकर्षी’ भी है। भगवान् के चरणकमलोंकी गन्धसे नित्य-निरन्तर परमात्मतत्त्वमें स्थित रहनेवाले सनकादिकोंके चित्तमें भी हलचल पैदा हो गयी थी—

तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्दकिञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायु:।

अन्तर्गत: स्वविवरेण चकार तेषां संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वो:॥

(श्रीमद्भा० ३। १५। ४३)

‘प्रणाम करनेपर उन कमलनेत्र भगवान् के चरणकमलके परागसे मिली हुई तुलसी-मञ्जरीकी वायुने उनके नासिका-छिद्रोंमें प्रवेश करके उन अक्षर परमात्मामें नित्य स्थित रहनेवाले ज्ञानी महात्माओंके भी चित्त और शरीरको क्षुब्ध कर दिया।’

तात्पर्य है कि सगुण होते हुए भी परमात्मा वास्तवमें निर्गुण ही हैं*। इसलिये सगुणकी उपासना करनेवाला साधक भी तीनों गुणोंका अतिक्रमण कर जाता है—

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।

स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥

(गीता १४। २६)

‘जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।’

सगुणकी उपासना करनेवाला निर्गुण ब्रह्मकी प्राप्तिका पात्र कैसे होता है? इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं—

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।

शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥

(गीता १४।२७)

‘ब्रह्म, अविनाशी अमृत, शाश्वतधर्म और ऐकान्तिक सुखकी प्रतिष्ठा (आश्रय) मैं ही हूँ।’

उपर्युक्त श्लोकमें ‘ब्रह्म तथा अविनाशी अमृतकी प्रतिष्ठा मैं हूँ’—यह निर्गुण-निराकारकी बात है [भगवान् ने ‘ब्रह्मण्याधाय कर्माणि’ (गीता ५।१०) और ‘मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना’ (गीता ९।४) पदोंमें भी अपनेको (सगुण-साकारको) ब्रह्म तथा अव्यक्तमूर्ति कहा है।] ‘शाश्वतधर्मकी प्रतिष्ठा मैं हूँ’—यह सगुण-साकारकी बात है [अर्जुनने भी भगवान् को ‘शाश्वतधर्मगोप्ता’ (गीता ११।१८) कहा है। ] ‘ऐकान्तिक सुखकी प्रतिष्ठा मैं हूँ’—यह सगुण-निराकारकी बात है [ध्यानयोगके प्रकरणमें इसी ऐकान्तिक सुखको ‘आत्यन्तिक सुख’ कहा गया है (६।२१)।]

इसी प्रकार ग्यारहवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें भी ‘त्वमक्षरं परमं वेदितव्यम्’ पदोंसे निर्गुण-निराकारकी बात आयी है; ‘त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्’ पदोंसे सगुण-निराकारकी बात आयी है; और ‘त्वं शाश्वतधर्मगोप्ता’ पदोंसे सगुण-साकारकी बात आयी है। ग्यारहवें अध्यायके ही चौवनवें श्लोकमें भगवान् कहते हैं—

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।

ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥

‘हे शत्रुतापन अर्जुन! इस प्रकार मैं अनन्यभक्तिसे ही तत्त्वसे जाननेमें, देखनेमें और प्रवेश (प्राप्त) करनेमें शक्य हूँ।’

—यहाँ भी भगवान् ने सगुणकी उपासनासे निर्गुणकी प्राप्ति बतायी है। जैसे, ‘ज्ञातुम्’ पद निर्गुण-निराकारके लिये, ‘द्रष्टुम्’ पद सगुण-साकारके लिये और ‘प्रवेष्टुम्’ पद सगुण-निराकार तथा निर्गुण-निराकार दोनोंके लिये आया है। तात्पर्य है कि सगुणकी उपासना करणसापेक्ष दीखते हुए भी परिणाममें करणनिरपेक्ष ही है।

करणसापेक्ष साधन

चित्तवृत्तिकी पाँच अवस्थाएँ हैं—मूढ़, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध। इनमें मूढ़ और क्षिप्त वृत्तिवाला मनुष्य ध्यानयोगका अधिकारी नहीं होता। जिसका चित्त कभी परमात्मामें लगता है, कभी नहीं लगता—ऐसा विक्षिप्त वृत्तिवाला मनुष्य ही ध्यानयोगका अधिकारी होता है।

विक्षिप्त वृत्तिवाला साधक अपने चित्तको संसारसे हटाकर परमात्मामें लगानेका अभ्यास करता है१। जब उसका चित्त परमात्मामें लग जाता है, तब ध्यान-अवस्था होती है। ध्यानावस्थामें ध्याता, ध्यान और ध्येय—यह त्रिपुटी रहती है। ध्यान करते-करते जब ध्याता और ध्यान नहीं रहते, प्रत्युत एक ध्येय रह जाता है, तब चित्तवृत्ति एकाग्र हो जाती है२। चित्तवृत्ति एकाग्र होनेपर संप्रज्ञात (सविकल्प) समाधि होती है३। ध्येयमें तीन बातें रहती हैं—ध्येय, ध्येयका नाम और नाम-नामीका सम्बन्ध। संप्रज्ञात-समाधिका दीर्घकालतक अभ्यास करनेपर जब नामकी स्मृति न रहकर केवल नामी (ध्येय) रह जाता है, तब चित्तवृत्ति निरुद्ध हो जाती है। चित्तवृत्ति निरुद्ध होनेपर असंप्रज्ञात (निर्विकल्प) समाधि होती है।

असंप्रज्ञात-समाधि दो तरहकी होती है—सबीज और निर्बीज। जब संसारकी सूक्ष्म वासना रहती है, तब सबीज समाधि होती है। सबीज समाधिमें अहम् (मैं-पन)के साथ सम्बन्ध रहता है। अहम् के सम्बन्धसे दो अवस्थाएँ होती हैं—समाधि और व्युत्थान। सूक्ष्म वासनाके कारण इस सबीज समाधिमें अनेक प्रकारकी सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं। ये सिद्धियाँ सांसारिक दृष्टिसे तो ऐश्वर्य हैं, पर परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें विघ्न हैं१। जब योगी इन सिद्धियोंमें न फँसकर इनसे उपराम (वासनारहित) हो जाता है, तब निर्बीज समाधि होती है। निर्बीज समाधिमें अहम् से, कारणशरीरसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और योगी अपने सहज स्वरूपमें स्थित हो जाता है२, जिससे फिर कभी व्युत्थान नहीं होता। इसको सहज समाधि, सहजावस्था अथवा गुणातीत-अवस्था भी कहते हैं।

यद्यपि करणसापेक्ष साधनमें करण (क्रिया)की प्रधानता रहती है, तथापि साधकका लक्ष्य परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होनेसे परिणाममें उसका करणसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और उसको परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है।

करणनिरपेक्ष साधन—

करणनिरपेक्ष साधन गीताकी एक विलक्षण देन है, जिसमें मनुष्यमात्रका अधिकार है। इस साधनमें सत्-असत् के विवेककी प्रधानता है। विवेक अनादि और स्वत:सिद्ध है*। यह बुद्धिमें प्रकाशित होता है, पर बुद्धिका गुण नहीं है। यद्यपि सत्-असत् का विवेक सभी साधनोंमें रहता है, तथापि करण-निरपेक्ष साधनमें साधक आरम्भसे ही इस विवेकको महत्त्व देता है, जिससे यह विवेक स्वयं उसका मार्गदर्शक हो जाता है। विवेकको महत्त्व देनेसे उसमें जडकी दासता अर्थात् क्रिया और पदार्थका आश्रय नहीं रहता, प्रत्युत उसकी निरपेक्षता रहती है। जडके आश्रयसे तत्त्वकी प्राप्ति अथवा बोध नहीं होता, प्रत्युत संसारका कार्य होता है। जडका आश्रय सर्वथा मिटनेपर जडकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती और जडकी स्वतन्त्र सत्ता न रहनेपर विवेक ही तत्त्वबोधमें परिणत हो जाता है। इस प्रकार करणनिरपेक्ष-साधनमें विवेक मुख्य है।

१. सत्-असत् का विवेक

गीताके उपदेशका आरम्भ विवेकसे ही हुआ है; जैसे—

एक शरीर है और एक शरीरी (शरीरवाला) है। शरीर प्रकृतिका अंश और शरीरी परमात्माका अंश है। शरीर और शरीरी दोनों ही अशोच्य हैं। तात्पर्य है कि शरीरीका कभी नाश नहीं होता; अत: उसके लिये शोक करना नहीं बनता और शरीरका नाश निरन्तर होता है; अत: उसके लिये भी शोक करना नहीं बनता। शरीर-शरीरीकी इस भिन्नताको जाननेवाले विवेकी पुरुष किसी भी मृत अथवा जीवित प्राणीके लिये कभी शोक-चिन्ता नहीं करते। उनकी दृष्टि नाशवान् शरीरकी तरफ न रहकर अविनाशी शरीरीकी तरफ ही रहती है। वे देखते हैं कि शरीर पहले भी नहीं थे और बादमें भी नहीं रहेंगे, पर उनमें रहनेवाला शरीरी पहले भी था और बादमें भी रहेगा। अत: शरीरोंके आने-जानेका उसपर कोई असर नहीं पड़ता। कारण कि जैसे शरीर बालकसे जवान और जवानसे बूढ़ा हो जाता है, पर स्वयं ज्यों-का-त्यों रहता है (इसीलिये हम कहते हैं कि जो मैं बचपनमें था, वही मैं आज हूँ), ऐसे ही एक शरीरसे दूसरे शरीरकी प्राप्ति होनेपर भी स्वयं ज्यों-का-त्यों रहता है। तात्पर्य है कि अवस्थाएँ बदलती हैं, स्वयं नहीं बदलता (२।११—१३)।

जैसे शरीर नाशवान् और परिवर्तनशील है, ऐसे ही सम्पूर्ण सांसारिक पदार्थ नाशवान् और परिवर्तनशील हैं। उन पदार्थोंमें हमारी अनुकूलताकी भावना हो जाती है तो वे सुख देनेवाले हो जाते हैं और प्रतिकूलताकी भावना हो जाती है तो वे दु:ख देनेवाले हो जाते हैं। शरीरादि सम्पूर्ण प्राकृत पदार्थ आने-जानेवाले, उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं। वे एक क्षण भी स्थिर नहीं रहते। जिस मनुष्यपर इन प्राकृत पदार्थोंके आने-जानेका किंचिन्मात्र भी असर नहीं पड़ता, वह परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है (२। १४-१५)।

नाशवान् शरीरादि पदार्थ ‘असत्’ हैं और अविनाशी शरीरी ‘सत्’ है। असत् की तो सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है। असत् की जो सत्ता प्रतीत होती है, वह भी वास्तवमें सत् की सत्तासे ही है। अत: सत् और असत्— दोनोंके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुष एक सत्-तत्त्वका ही अनुभव करते हैं अर्थात् उनकी दृष्टिमें एक सत्-तत्त्वके सिवाय और किसीकी भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती। यह सत्-तत्त्व सम्पूर्ण संसारमें व्याप्त है। संसारका नाश होनेपर भी इस सत्-तत्त्वका कभी नाश नहीं होता। परन्तु देखने और जाननेमें आनेवाले जितने शरीर हैं, वे सब-के-सब असत् हैं। उनका प्रतिक्षण ही नाश हो रहा है। उनको ‘नाशवान्’ कहते हैं; क्योंकि नाशके सिवाय उनमें और कुछ है ही नहीं। जैसे शरीरोंका विनाशीपना नित्य है, ऐसे ही उनमें रहनेवाले शरीरीका अविनाशीपना नित्य है (२।१६—१८)।

यह शरीरी न किसीको मारता है और न किसीसे मारा जाता है अर्थात् यह मरने-मारनेकी क्रियाओंसे सर्वथा रहित है। जो इसको मरने-मारनेवाला मानते हैं, वे मनुष्य वास्तवमें इसको जानते नहीं। कारण कि यह शरीरी जन्म-मरणसे रहित, नित्य-निरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और अनादि है। शरीरमें तो छ: विकार होते हैं—उत्पन्न होना, सत्तावाला दीखना, बदलना, बढ़ना, क्षीण होना और नष्ट होना; परन्तु शरीरी इन छहों विकारोंसे रहित है। अत: शरीरके मारे जानेपर भी यह मारा नहीं जाता। जो मनुष्य शरीरीको इस प्रकार छहों विकारोंसे रहित जान लेता है, वह कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये? तात्पर्य है कि शरीरी किसी भी क्रियाका न तो कर्ता (करनेवाला) है और न कारयिता (करवानेवाला) है (२। १९—२१)।

मरना और जीना शरीरोंका होता है, शरीरीका नहीं। जैसे पुराने कपड़े उतारनेसे मनुष्य मर नहीं जाता और दूसरे नये कपड़े पहननेसे मनुष्यका जन्म नहीं हो जाता, ऐसे ही पुराने शरीरोंको छोड़नेपर शरीरी मर नहीं जाता और नये शरीरोंमें जानेपर शरीरीका जन्म नहीं हो जाता। शरीरोंके बदलनेपर भी शरीरी ज्यों-का-त्यों ही रहता है। इस शरीरीको शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकती। कारण कि यह शरीरी अच्छेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य और अशोष्य है। तात्पर्य है कि काटना, जलाना आदि क्रियाएँ संसारमें ही चलती हैं। शरीरीपर इन क्रियाओंका किंचिन्मात्र भी असर नहीं पड़ता। यह शरीरी सब कालमें है और सब वस्तुओंमें है। इसमें आने-जानेकी और हिलनेकी क्रिया नहीं है। देश, काल, क्रिया, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना आदि तो नहीं रहते, पर शरीरी रहता है। यह शरीरी स्थूल, सूक्ष्म और कारण—तीनों शरीरोंसे अतीत है। ये शरीर तो नहीं रहते, पर शरीरी रहता है (२।२२—२५)।

शरीर पहले भी नहीं था, पीछे भी नहीं रहेगा तथा बीचमें भी इसका प्रतिक्षण उत्पत्ति और विनाश हो रहा है। यह नित्यजात और नित्यमृत है। कारण कि यह प्रतिक्षण पहली अवस्थाको छोड़कर दूसरी अवस्थाको धारण करता रहता है। पहली अवस्थाको छोड़ना मरना हुआ और दूसरी अवस्थाको धारण करना जन्मना हुआ। इस प्रकार नित्यजात और नित्यमृत होनेके कारण वास्तवमें इस शरीरकी स्थिति है ही नहीं। उत्पत्ति-विनाशकी परम्पराको ही स्थिति कह देते हैं। इसलिये जो पैदा हुआ है, उसकी मृत्यु अवश्य होगी, इसका कोई परिहार (निवारण) नहीं कर सकता (२।२६-२७)।

शरीर पहले भी अव्यक्त था और बादमें भी अव्यक्त हो जायगा, केवल बीचमें ही व्यक्त दीखता है। परन्तु शरीरी व्यक्त-अव्यक्त भावसे रहित है। वास्तवमें शब्दोंके द्वारा इस शरीरीका वर्णन नहीं हो सकता। जैसे सांसारिक वस्तुएँ देखने, कहने, सुनने और जाननेमें आती हैं, ऐसे यह शरीरी देखने, कहने, सुनने और जाननेमें नहीं आता। कारण कि यह इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिका विषय नहीं है। जानने, बोलने, सुनने आदिकी शक्तियाँ संसारमें ही काम करती हैं। शरीरीको तो स्वयंसे ही जाना जा सकता है; क्योंकि यह करणनिरपेक्ष तत्त्व है (२।२८-२९)।

इस प्रकार शरीरीके अविनाशीपनको जो जान लेता है, उसमें शोक, चिन्ता, भय, उद्वेग आदि विकार नहीं होते। अगर उसमें ये विकार होते हैं तो वास्तवमें उसने शरीरीको जाना नहीं है। तात्पर्य है कि असत् की सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है—इस बातको केवल सीखना नहीं है, प्रत्युत इसका अनुभव करना है। शोक केवल सीखनेसे नहीं मिटता, प्रत्युत अनुभव करनेसे मिटता है। अनुभव होनेसे शोक टिक सकता ही नहीं (२।३०)*।

इस प्रकार शरीर और शरीरीके भेदको समझना और समझकर स्वीकार करना अपने विवेकका आदर है। विवेकमें सत् और असत् दोनों रहते हैं। विवेकका आदर करनेसे सत् का आदर और असत् का निरादर स्वत: हो जाता है। असत् का निरादर होनेसे साधक असत् से ऊँचा उठ जाता है और स्वत:प्राप्त सत्-तत्त्वको प्राप्त कर लेता है।

सत् अपना स्वरूप है और असत् प्रकृतिका स्वरूप है। जब साधक अपने विवेकका आदर करता है अर्थात् विवेकको महत्त्व देता है, तब उसके साधनमें सत् (स्वयं)की प्रधानता होती है और जब वह अपने विवेकका आदर नहीं करता, तब उसके साधनमें असत् (इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि)की प्रधानता होती है।

२. विवेककी आवश्यकता

मनुष्योंके अन्त:करणमें यह बात बड़ी गहराईसे बैठी हुई है कि जो कुछ होगा, करनेसे ही होगा। परमात्माकी प्राप्ति भी तभी होगी, जब उसके लिये उद्योग करेंगे। जब संसारका काम भी बिना कुछ किये नहीं होता तो फिर सबसे ऊँचे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति बिना कुछ किये कैसे हो जायगी? आदि-आदि। इतना ही नहीं, वेदोंमें, शास्त्रोंमें, सन्तवाणीमें, सब जगह परमात्मप्राप्तिके लिये प्राय: करनेकी बातपर ही जोर दिया गया है।

वास्तवमें ‘जो कुछ होगा, करनेसे ही होगा’—यह बात उसीमें लागू होती है, जो उत्पन्न होनेवाला और अप्राप्त है। जो अनुत्पन्न और नित्यप्राप्त है, उसमें यह बात लागू नहीं होती। कारण कि अनुत्पन्न और नित्यप्राप्त तत्त्वका निर्माण नहीं करना है, उसको कहींसे लाना नहीं है, प्रत्युत उसका अन्वेषण करना है, अनुभव करना है, उसकी तरफ लक्ष्य करना है। तात्पर्य है कि कुछ करनेकी बात संसारके लिये है, परमात्माके लिये नहीं। संसारकी प्राप्तिका जो तरीका है, वह तरीका परमात्माकी प्राप्तिका नहीं है। कारण कि संसार सब समय सबको समानरूपसे प्राप्त नहीं है, जब कि परमात्मा सब समय सबको समानरूपसे प्राप्त हैं। वे परमात्मा सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति, घटना आदिमें समानरूपसे परिपूर्ण हैं। संसारको प्राप्त मान लिया, ‘नहीं’ को ‘है’ मान लिया, इसी कारण परमात्मतत्त्व (‘है’) का अनुभव नहीं हो रहा है।

उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंकी प्राप्ति तो कर्म करनेसे होती है, पर अनुत्पन्न तत्त्वकी प्राप्ति अपने विवेकको महत्त्व देनेसे होती है। अत: परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति क्रियासाध्य नहीं है, प्रत्युत विवेकसाध्य है। अपने विवेकको महत्त्व देना ही ‘करणनिरपेक्ष साधन’ है।

जैसे विवेक करणनिरपेक्ष है, ऐसे करणसापेक्ष साधन विवेकनिरपेक्ष नहीं है। वास्तवमें कोई भी साधन विवेकनिरपेक्ष हो ही नहीं सकता। कारण कि विवेकको तो क्रियाकी आवश्यकता नहीं है, पर क्रियाको विवेककी बड़ी भारी आवश्यकता है। विवेकके बिना क्रिया जड है और क्रियाके बिना विवेक चिन्मय तत्त्वज्ञान है। इसलिये कर्मोंसे मनुष्य बँधता है और विवेकसे मुक्त हो जाता है—

‘कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया तु प्रमुच्यते।’

(महा० शान्ति० २४१। ७)

तपस्या, यज्ञ, दान, तीर्थ, व्रत आदि जितने भी श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ कर्म हैं, उनके बलपर परमात्माकी प्राप्ति नहीं हो सकती। भगवान् कहते हैं—

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रै:।

एवंरूप: शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥

(गीता ११। ४८)

‘हे कुरुप्रवीर! मनुष्यलोकमें इस प्रकारके विश्वरूपवाला मैं न वेदोंके पढ़नेसे, न यज्ञोंके अनुष्ठानसे, न दानसे, न उग्र तपोंसे और न मात्र क्रियाओंसे तेरे (कृपापात्रके) सिवाय और किसीके द्वारा देखा जाना शक्य हूँ।’

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।

शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥

(गीता ११। ५३)

‘जिस प्रकार तुमने मुझे देखा है, इस प्रकारका मैं न तो वेदोंसे, न तपसे, न दानसे और न यज्ञसे ही देखा जा सकता हूँ।’

जब साधक इन तपस्या, यज्ञ, दान आदिसे ऊँचा उठ जाता है, तब उसको परमात्माकी प्राप्ति होती है—

वेदेषु यज्ञेषु तप:सु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।

अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्।

(गीता ८। २८)

‘योगी इसको जानकर वेदोंमें, यज्ञोंमें, तपोंमें तथा दानमें जो-जो पुण्यफल कहे गये हैं, उन सभी पुण्यफलोंका अतिक्रमण कर जाता है और आदिस्थान परमात्माको प्राप्त हो जाता है।’

तपस्या आदि करके जब मनुष्य हार जाता है, उसमें अपने बलका अभिमान नहीं रहता, तब परमात्माकी प्राप्ति होती है। तात्पर्य है कि जिस बलका अभिमान परमात्मप्राप्तिमें बाधक है, वह बल जब तपस्यासे खर्च हो जाता है, जल जाता है, तब परमात्माकी कृपासे उनकी प्राप्ति होती है। अत: परमात्मप्राप्तिमें अपने बल, बुद्धि, योग्यता, विद्वत्ता आदिका अभिमान ही बाधक है—

संसृत मूल सूलप्रद नाना।

सकल सोक दायक अभिमाना॥

(मानस ७। ७४। ६)

‘ईश्वरस्याप्यभिमानद्वेषित्वाद् दैन्यप्रियत्वाच्च’

(नारदभक्तिसूत्र २७)

‘ईश्वरका भी अभिमानसे द्वेषभाव और दैन्यसे प्रियभाव है।’

अर्जुन भगवान् से कहते हैं—

न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवा:॥

(गीता १०। १४)

‘हे भगवन्! आपके प्रकट होनेको न तो देवता जानते हैं और न दानव जानते हैं।’

तात्पर्य है कि देवताओंमें जो दिव्यता है, वह भगवान् को जाननेमें कुछ भी काम नहीं आती। जब देवता भी भगवान् को नहीं जान सकते तो फिर दानव उनको जान ही कैसे सकते हैं? परन्तु अर्जुन दानवोंके द्वारा भी भगवान् को न जाननेकी बात कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि दानवोंके पास मायाकी बहुत विलक्षण शक्ति है; परन्तु वह मायाशक्ति भी भगवान् को जाननेमें कुछ काम नहीं आती। अत: मनुष्य, देवता, दानव आदि कोई भी अपने बलसे, अपनी योग्यतासे, अपनी बुद्धिसे भगवान् को नहीं प्राप्त कर सकते।

सब-के-सब साधन मिलकर भी परमात्माकी प्राप्ति नहीं करा सकते। वास्तवमें सभी साधन अपने बलका अभिमान खर्च करनेके लिये ही हैं। अत: साधनसे परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती, प्रत्युत अपने बलका अभिमान (जो परमात्मप्राप्तिमें बाधक है) दूर होता है। साधन करते-करते जब साधकको यह पता लग जाता है कि अपनी सामर्थ्यसे कुछ नहीं होगा, तब उसका अभिमान मिट जाता है और परमात्मप्राप्ति हो जाती है—

दौड़ सके तो दौड़ ले, जब लगि तेरी दौड़।

दौड़ थक्या धोखा मिटॺा, वस्तु ठौड़-की-ठौड़॥

जिसकी स्फुरणामात्रसे अनन्त ब्रह्माण्ड पैदा हो जाते हैं, उसको सम्पूर्ण संसार देकर भी कोई कैसे प्राप्त कर सकता है? हमारा अधिकार उसीपर हो सकता है, जिसमें हमारेसे कम बल, बुद्धि, योग्यता, विद्वत्ता आदि हो। परमात्मामें बलकी कमी नहीं है। उनमें अनन्त बल है। परन्तु उनमें निर्बलता नहीं है। वह निर्बलता हमारे पास है! इसलिये निर्बल होकर पुकारनेसे वे प्राप्त हो जाते हैं—

जब लगि गज बल अपनो बरत्यो, नेक सरॺो नहिं काम।

निरबल ह्वै बलराम पुकारॺो, आये आधे नाम॥

सुने री मैंने निरबल के बल राम।

‘अशक्तानां हरिर्बलम्’ (ब्रह्मवैवर्त० गण० ३५। ९६)

प्रश्न—कर्मका उपयोग कहाँ है?

उत्तर—कर्मका उपयोग संसारसे ऊँचा उठनेके लिये है। संसारसे ऊँचा उठनेका तात्पर्य है—क्रियाकी आसक्ति (करनेका वेग) और पदार्थकी आसक्ति (राग)का मिट जाना। अगर मनुष्य अपने विवेकके द्वारा इन दोनोंको न मिटा सके तो कर्मयोगसे इनको मिटाये। कर्मयोगसे अर्थात् निष्कामभावसे दूसरोंके हितके लिये कर्तव्य-कर्म करनेसे कर्मोंके वेगकी तथा वर्तमान रागकी निवृत्ति हो जाती है और फलेच्छाका त्याग करनेसे नया राग पैदा नहीं होता। कर्मोंका वेग तथा रागकी निवृत्ति होनेसे मनुष्य योगारूढ़ हो जाता है—

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।

योगारूढस्य तस्यैव शम: कारणमुच्यते॥

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।

सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥

(गीता ६।३-४)

‘जो योगमें आरूढ़ होना चाहता है, ऐसे मननशील योगीके लिये कर्तव्य-कर्म करना कारण है और उसी योगारूढ़ मनुष्यका शम (शान्ति) परमात्मप्राप्तिमें कारण है।’ (तात्पर्य है कि परमात्मप्राप्तिमें कर्म कारण नहीं है, प्रत्युत कर्मोंके सम्बन्ध-विच्छेदसे होनेवाली शान्ति कारण है।)

‘जिस समय न इन्द्रियोंके भोगोंमें तथा न कर्मोंमें ही आसक्त होता है, उस समय वह सम्पूर्ण संकल्पोंका त्यागी मनुष्य योगारूढ़ कहा जाता है।’

तात्पर्य है कि कर्मोंका उपयोग वहींतक है, जहाँतक प्रकृतिका राज्य है। प्रकृतिसे अतीत तत्त्वमें कर्मोंका सर्वथा अभाव हो जाता है; क्योंकि क्रिया और पदार्थ सब प्रकृतिजन्य हैं।

प्रश्न—कर्मयोग करणसापेक्ष है या करणनिरपेक्ष?

उत्तर—कर्मयोग करणनिरपेक्ष अर्थात् विवेकप्रधान साधन है। अगर विवेककी प्रधानता न हो तो ‘कर्म’ होगा, ‘कर्मयोग’ होगा ही नहीं। ‘कर्म’ करणसापेक्ष है, पर ‘योग’ करणनिरपेक्ष है। तात्पर्य है कि योग (समता)की प्राप्ति क्रियासे नहीं होती, प्रत्युत विवेकसे होती है। अत: कर्मयोग कर्म नहीं है।

योगकी अपेक्षा कर्म दूरसे ही निकृष्ट है—‘दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।’ (गीता २। ४९)। जैसे पर्वतसे अणु बहुत दूर है अर्थात् अणुको पर्वतके पास रखकर दोनोंकी तुलना नहीं की जा सकती, ऐसे ही योगसे कर्म बहुत दूर है अर्थात् योग और कर्मकी तुलना नहीं की जा सकती। योगके बिना कर्म निरर्थक है*।

कर्मयोगमें ‘कर्म हमारे लिये है ही नहीं’—यह विवेक मुख्य रहता है। अपने लिये किया गया प्रत्येक कर्म, यहाँतक कि समाधि भी बन्धनकारक है। कारण कि जबतक प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है, तबतक करना और न करना—दोनों ही कर्म हैं अर्थात् चलने, बोलने, देखने आदिकी तरह बैठना, मौन होना, सोना, समाधि लगाना आदि भी कर्म ही है। कर्मका सम्बन्ध संसारके साथ है, स्वरूपके साथ नहीं। स्थूलशरीरकी स्थूल संसारके साथ एकता है, सूक्ष्मशरीरकी सूक्ष्म संसारके साथ एकता है तथा कारणशरीरकी कारण संसारके साथ एकता है। अत: स्थूलशरीरसे होनेवाली क्रियाएँ, सूक्ष्मशरीरसे होनेवाला चिन्तन और ध्यान तथा कारणशरीरसे होनेवाली समाधि संसारके लिये ही है, अपने लिये (व्यक्तिगत) नहीं। सत्स्वरूपमें कभी किञ्चिन्मात्र भी कोई कमी नहीं आती; अत: उसके लिये किसी क्रियाकी आवश्यकता सम्भव ही नहीं है। स्वरूपपर कुछ करनेका दायित्व भी नहीं है अर्थात् उसको अपने लिये कुछ करना ही नहीं है। कुछ करनेका दायित्व उसीपर होता है, जो कर सकता हो। करणोंके बिना कोई कर्म किया ही नहीं जा सकता। करण प्रकृतिमें हैं तथा प्रकृतिके ही कार्य हैं। स्वरूपमें कोई भी करण नहीं है; क्योंकि वह प्रकृति तथा उसके कार्यसे सर्वथा अतीत तत्त्व है। अत: स्वरूपके लिये कुछ करना बनता ही नहीं। इसलिये कर्मयोगी नि:स्वार्थभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये ही सम्पूर्ण कर्म करता है, जिससे वह प्रकृतिके सम्बन्ध (कर्म-बन्धन)से छूट जाता है—

‘यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते।’

(गीता ४।२३)

प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर उसका ‘करना’ तथा ‘न करना’—दोनोंसे ही कोई सम्बन्ध नहीं रहता—

‘नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।’

(गीता ३।१८)

३. मान्यताके परिवर्तनसे मुक्ति

गीतामें आया है—

नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोऽयं सनातन:।

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते॥

(२। २४-२५)

‘यह आत्मा नित्य रहनेवाला, सबमें परिपूर्ण, अचल, स्थिर स्वभाववाला और अनादि है। यह प्रत्यक्ष नहीं दीखता, यह चिन्तनका विषय नहीं है और इसमें कोई विकार नहीं है।’

—ऐसे स्वभाववाले स्वयं (आत्मा) ने नित्य-निरन्तर बदलनेवाले नाशवान् के साथ केवल मान्यता-मात्रसे संग कर लिया तो वह चौरासी लाख योनियोंमें चला गया—‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३। २१)। केवल परिवर्तनशीलके साथ सम्बन्ध माननेसे कितना अनर्थ हो गया कि वह अनन्त जन्मोंसे मुफ्तमें ही दु:ख पा रहा है! यह कितने आश्चर्यकी बात है! अब यदि वह इस असत्य मान्यताको छोड़ दे और सत्य तत्त्वको स्वीकार कर ले तो इसमें परिश्रम क्या है? इसमें करण, क्रिया और कर्ताका क्या काम है? इसमें परिश्रमकी गन्ध भी नहीं है। इसमें कुछ करना सम्भव ही नहीं है। इसके लिये कुछ करना मानो इस तत्त्वसे विमुख होना है!

जो किसी भी देश, काल, क्रिया, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति, घटना आदिमें हमारेसे अलग नहीं हो सकता तथा हम उससे अलग नहीं हो सकते, उसकी प्राप्तिके लिये परिश्रम कैसे? वह हमें स्वत:-स्वाभाविक, नित्य-निरन्तर प्राप्त है। उसके लिये कुछ करना नहीं है, कुछ लाना नहीं है, कहीं जाना नहीं है! केवल उसकी तरफ लक्ष्य करना है—‘संकर सहज सरूपु सम्हारा।’ इससे सुगम और क्या हो सकता है?

जैसे ब्राह्मण हर समय अपने ब्राह्मणपनेमें स्थित रहता है (अपने ब्राह्मणपनेको न याद करता है, न भूलता है) तो इसके लिये उसको कोई परिश्रम या अभ्यास नहीं करना पड़ता। ऐसे ही साधकको हर समय अपने होनेपन (स्वरूप)में स्थित रहना है। इसके लिये उसको कोई अभ्यास नहीं करना है। ब्राह्मणपना तो बनावटी (माना हुआ) है, पर अपना होनापन पहलेसे ही स्वत:सिद्ध है। ब्राह्मणपनेमें तो ‘मैं ब्राह्मण हूँ’— ऐसा अहंकार है, पर अपने होनेपनमें कोई अहंकार नहीं है।

शरीर (संसार) प्रतिक्षण बदल रहा है, नष्ट हो रहा है—यह प्रत्यक्ष हमारे देखनेमें आता है तो इससे हमारा अविनाशीपना ही सिद्ध होता है। कारण कि नाशवान् को अविनाशी ही देख सकता है। बदलनेवालेको न बदलनेवाला ही देख सकता है। अब अपने अविनाशी, न बदलनेवाले स्वरूपमें स्थित होनेके लिये कोई श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि करना चाहे तो भले ही करे, पर वास्तवमें कुछ करनेकी जरूरत नहीं है, प्रत्युत केवल सत्य तत्त्वको स्वीकार करनेकी जरूरत है। जब झूठी मान्यताके लिये भी अभ्यास नहीं किया था तो फिर सच्ची मान्यताके लिये क्या अभ्यास करना पड़ेगा? अभ्याससे एक नयी अवस्था बन जायगी, अवस्थातीत बोध नहीं होगा। तत्त्व अवस्था नहीं है, प्रत्युत अवस्थातीत है।

जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई।

जदपि मृषा छूटत कठिनई॥

(मानस ७। ११७। २)

जब झूठी बात भी इतनी दृढ़ हो सकती है कि छोड़नेमें कठिनाई हो तो फिर सच्ची बात दृढ़ क्यों नहीं हो सकती? सच्ची बात दृढ़ न होनेमें मुख्य बाधा है—संयोगजन्य सुखकी लोलुपता अर्थात् संसारका आकर्षण। परन्तु यह बाधा भी वास्तवमें साधककी बनायी हुई है और वह इसको मिटा सकता है। कारण कि उसमें इस बाधाको मिटानेका बल भी है, योग्यता भी है, अधिकार भी है, विवेक भी है और इसके लिये संसारकी, सन्त-महात्माओंकी तथा भगवान् की सहायता भी प्राप्त है।

प्रश्न—संसारका आकर्षण कैसे मिटायें?

उत्तर—विवेक-विचारपूर्वक देखा जाय तो संसारका आकर्षण जड़ (मन-बुद्धि-अहम्) में ही है, स्वयंमें नहीं है। परन्तु जड़से तादात्म्यके कारण स्वयंने इसको अपनेमें मान लिया है। संसार तो बहता है, पर स्वयं रहता है। कभी पूर्वसंस्कारवश ऐसा दीखता है कि स्वयं भी भोगोंमें बह गया, पर वास्तवमें स्वयं बहा नहीं है, प्रत्युत अहम् के कारण तादात्म्य होनेसे उसने अपना बहना मान लिया है। स्वयंका बहना त्रिकालमें भी सम्भव नहीं है। वह शरीरमें स्थित होते हुए भी भोगोंसे लिप्त नहीं होता—

‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।’

(गीता १३। ३१)

जैसे संसार निरन्तर मिट रहा है, ऐसे ही उसका आकर्षण भी निरन्तर मिट रहा है। उत्पन्न होनेवाली यावन्मात्र वस्तु मिटती है—यह नियम है। अत: उसको रखनेका प्रयत्न करना भी भूल है और उसको मिटानेका प्रयत्न करना भी भूल है! इसलिये साधकको चाहिये कि वह उस आकर्षणको महत्त्व न दे, प्रत्युत उसकी उपेक्षा (बेपरवाह) कर दे। उपेक्षा करनेसे वह अपने-आप मिट जायगा। जैसे, पानीमें मिट्टी मिली हुई हो तो हम ज्यों-ज्यों हाथसे मिट्टीको थपकाकर नीचे बैठानेका प्रयत्न करेंगे, त्यों-ही-त्यों मिट्टी ऊपर आयेगी। अगर हम पानी और मिट्टीको बिलकुल न छेड़ें तो मिट्टी अपने-आप नीचे बैठ जायगी। ऐसे ही परिश्रम आदि कुछ करनेसे संसारका आकर्षण नहीं मिटेगा। उसकी उपेक्षा करके चुप हो जायँ तो वह अपने-आप मिट जायगा और शुद्ध स्वरूप रह जायगा; क्योंकि मिटना संसारका स्वभाव है और शुद्ध रहना स्वयंका स्वभाव है—

ईस्वर अंस जीव अबिनासी।

चेतन अमल सहज सुख रासी॥

(मानस ७। ११७। १)

मेरेमें आकर्षण है और वह मिटता नहीं है—इस भावसे ही भोगोंका आकर्षण टिका हुआ है। कारण कि हम सब सत्यसङ्कल्प परमात्माके साक्षात् अंश हैं और परमात्मारूपी कल्पवृक्षके नीचे हैं; अत: हम जैसा भाव रखेंगे, वैसा ही हो जायगा। इसलिये ‘आकर्षण मेरेमें नहीं है’—यह भाव आकर्षणको मिटानेका रामबाण उपाय है; क्योंकि यह वास्तविकता है और वास्तविकताको दृढ़तासे स्वीकार करना साधकका कर्तव्य है।

मन-बुद्धि और संसार (विषय)—दोनों एक ही जातिके हैं। इसलिये मन-बुद्धिका अपनी ही जातिके संसारकी तरफ आकर्षण हो रहा है तो इससे अपनी सत्तामें क्या फर्क पड़ा? अत: साधकको चाहिये कि वह मन-बुद्धि तथा उसमें रहनेवाला आकर्षण— दोनोंको छोड़कर स्वयंमें स्थित रहे—‘मद्रूप उभयं त्यजेत्’ (श्रीमद्भा० ११।१३।२६)*

४. निषेधात्मक साधन

साधन दो तरहका होता है—निषेधात्मक और विध्यात्मक। विवेक निषेध करता है और करण (क्रिया) विधि करता है। अत: निषेधात्मक साधन विवेकप्रधान अर्थात् ‘करणनिरपेक्ष’ होता है और विध्यात्मक साधन क्रियाप्रधान अर्थात् ‘करण-सापेक्ष’ होता है। परमात्मतत्त्व वास्तवमें करणनिरपेक्ष है*; अत: उसकी प्राप्ति निषेधात्मक साधनसे तत्काल होती है, जब कि विध्यात्मक साधनसे उसकी प्राप्तिमें देरी लगती है। निषेधात्मक साधन करनेवाला योगभ्रष्ट भी नहीं होता; क्योंकि निषेधात्मक साधनमें असत्, नाशवान् का तत्काल निषेध हो जाता है। परन्तु विध्यात्मक साधन करनेवाला योगभ्रष्ट हो सकता है; क्योंकि विध्यात्मक साधनमें असत् का सहारा लेना पड़ता है। अत: उसमें असत् (मन-बुद्धि-अहम्)की सत्ता बहुत दूरतक साथ रहती है।

परमात्मतत्त्वको विधिरूपसे कभी प्राप्त नहीं कर सकते, प्रत्युत निषेधरूपसे ही प्राप्त कर सकते हैं। कारण कि परमात्मतत्त्व नित्यप्राप्त है। नित्यप्राप्तके अनुभवमें अप्राप्त संसारसे माना हुआ सम्बन्ध ही बाधक है। नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अन्वेषण होता है और अप्राप्त संसारका निर्माण होता है। अन्वेषणमें निषेधात्मक साधन चलता है और निर्माणमें विध्यात्मक साधन चलता है। अत: परमात्मतत्त्वका अनुभव संसारके सम्बन्धका निषेध (त्याग) करनेसे होता है। सबका निषेध करनेपर जो शेष रहता है, वही परमात्मतत्त्व है। तात्पर्य है कि असत् का निषेध (त्याग) करनेपर सत् तत्त्वकी विधि (स्थापना) करनेकी आवश्यकता नहीं रहती। इसलिये सन्तलोग संसारका त्याग करते हुए परमात्मतत्त्वकी खोज करते हैं—

‘ह्यतत्त्यजन्तो मृगयन्ति सन्त:’

(श्रीमद्भा० १०। १४। २८)

न कर्मसे, न सन्तानसे, न धनसे, प्रत्युत केवल त्यागसे ही सन्तोंने अमरत्व प्राप्त किया है—

‘न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशु:’

(कैवल्य० १। २)

त्यागसे तत्काल परमशान्ति प्राप्त होती है—

‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’

(गीता १२। १२)

पारमार्थिक उन्नतिमें त्याग ही मुख्य है। हिरण्यकशिपु, रावण आदि असुरों-राक्षसोंमें भी तपस्या आदि नियम (विधि) तो मिलते हैं, पर त्याग (निषेध) नहीं मिलता। त्याग केवल परमात्मप्राप्ति चाहनेवालोंमें ही मिलता है। इसलिये नियमोंके पालनकी अपेक्षा अहिंसादि यमोंके पालनको श्रेष्ठ बताया गया है—

यमानभीक्ष्णं सेवेत नियमान् मत्पर: क्वचित्।

(श्रीमद्भा० ११। १०। ५)

करणनिरपेक्ष साधनमें करणोंका त्याग (सम्बन्ध-विच्छेद) है। करणसापेक्ष साधनमें भी अन्तमें करणोंका त्याग होनेसे ही तत्त्वप्राप्ति होती है। त्याग करण (जड)का ही होता है, तत्त्वका नहीं। कारण कि त्याग उसीका होता है, जो स्वत: हमारा त्याग कर रहा है अर्थात् जिससे हमारी एकात्मता नहीं है। तात्पर्य है कि नित्यप्राप्तकी ही प्राप्ति होती है और अप्राप्तका ही निषेध होता है। ‘है’ की ही प्राप्ति होती है और ‘नहीं’ की ही निवृत्ति होती है। ‘है’ सदा स्वत: प्राप्त है ही और ‘नहीं’ सदा स्वत: निवृत्त है ही!

‘परमात्मतत्त्व है’—ऐसा मानना भी वास्तवमें ‘संसार नहीं है’—इस प्रकार संसारका निषेध करनेके लिये ही है। इसी तरह ‘मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे हैं’—इसका तात्पर्य भी वास्तवमें ‘मैं संसारका नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है’—इस प्रकार संसारका निषेध करनेमें ही है। यह भक्तिकी विशेषता है कि अनन्यभावपूर्वक ‘मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे हैं’—इस प्रकार विधिमुखसे माने हुए साधनको भी भगवान् कृपा करके सिद्ध कर देते हैं१ अर्थात् भक्तका अनन्यभाव पूर्ण कर देते हैं, अभावरूप संसारका सदाके लिये अभाव कर देते हैं। तात्पर्य है कि भक्त अहम् को बदलता है और भगवान् उसके अहम् को मिटा देते हैं२।

जबतक निषेध नहीं होता, तबतक विधिकी सिद्धि नहीं होती। मीराबाईने कहा है—‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’ तो इसमें ‘दूसरो न कोई’—यह निषेध है। इस निषेधसे ऐसी सिद्धि हुई कि उनका शरीर भी चिन्मय होकर भगवान् के विग्रहमें लीन हो गया! कारण कि जडताकी निवृत्ति होनेपर चिन्मयता ही शेष रहती है। ‘मेरे तो गिरधर गोपाल’—ऐसा तो बहुत-से मनुष्य मानते हैं, पर इससे भगवान् की प्राप्ति नहीं हो जाती। अगर इसके साथ ‘दूसरो न कोई’—ऐसा भाव नहीं होगा तो संसारके अन्य सम्बन्धोंकी तरह भगवान् का भी एक और नया सम्बन्ध हो जायगा! अगर ‘मेरा कोई नहीं है’—इस तरह सर्वथा निषेध हो जाय तो बोध हो जायगा। बोध होते ही नित्यप्राप्तकी प्राप्ति हो जायगी। कारण कि जबतक दूसरी सत्ताकी मान्यता है, तभीतक विवेक है। दूसरी सत्ताकी मान्यता न रहे तो वह तत्त्वबोध ही है।

‘योग’ निषेधमें ही होता है—

‘तं विद्याद् दु:खसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।’

(गीता ६। २३)

‘जिसमें दु:खोंके संयोगका वियोग (संसारका निषेध) है, उसीको योग नामसे जानना चाहिये।’

परन्तु ‘समत्वं योग उच्यते’ (गीता २। ४८) ‘समताको योग कहा जाता है’—यह विधि है। जो संसारकी सत्ता मानते हैं, उनको संसारमें विषमता दीखती है। इसलिये उनकी दृष्टिको विषम संसारसे हटाकर समरूप परमात्माकी तरफ करनेके लिये ‘समत्वं योग उच्यते’ कहा गया है। विधिमें करण साथमें रहता है, इसीलिये समतामें अन्त:-करणकी स्थिति बतायी गयी है—‘येषां साम्ये स्थितं मन:’ (गीता ५।१९)।

विधिमें ‘मैं-पन’ साथमें रहनेसे साधन सिद्ध होनेमें देरी लगती है। जैसे, ‘मैं ब्रह्म हूँ’—यह विधि है। यह अहंग्रह उपासना है, बोध नहीं। कारण कि मैंपनमें ब्रह्म नहीं है और ब्रह्ममें मैंपन नहीं है। अत: मैंपन केवल कल्पना है। ब्रह्मका तो अनुभव है और संसारकी प्रतीति है; परन्तु मैंपनका न अनुभव है, न प्रतीति है, प्रत्युत यह केवल अज्ञानीकी मान्यता है—‘अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३। २७)।

प्रकृति और प्रकृतिका कार्यमात्र प्रकाश्य है और परमात्मा प्रकाशक हैं। प्रकाश्य और प्रकाशक—इन दोनोंमें ही मैंपन नहीं है, फिर मैंपन कहाँ रहा? तात्पर्य है कि मैंपन केवल कल्पित है। अगर मैंपनका निषेध कर दिया जाय तो तत्काल सिद्धि हो जाती है—‘निर्ममो निरहङ्कार: स शान्तिमधिगच्छति’ (गीता २। ७१)।

विधिकी अपेक्षा निषेध श्रेष्ठ और बलवान् है। परन्तु जिनके भीतर उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका महत्त्व है, उनको निषेध मुख्य नहीं दीखता, प्रत्युत विधि मुख्य दीखती है कि अमुक आदमीने इतना दान किया, इतने तीर्थ किये, इतने व्रत-उपवास किये आदि। इसलिये वे विधिको तो ग्रहण करते हैं, पर निषेधको टाल देते हैं। उनकी यह मान्यता रहती है कि विधि करनेसे ही उन्नति होगी। वास्तवमें निषेधकी जितनी आवश्यकता है, उतनी विधिकी आवश्यकता नहीं है। विधि करनेमें कमी रह सकती है, पर निषेध करनेमें विधि स्वत:सिद्ध हो जाती है तथा उसमें कोई कमी भी नहीं रहती। जैसे, सत्य बोलना विधि है और झूठ न बोलना निषेध है। सत्य बोलनेवाला कभी झूठ भी बोल सकता है, पर झूठ न बोलनेवाला या तो सत्य बोलेगा अथवा चुप रहेगा। सत्य बोलनेका तो महत्त्व दीखता है, पर झूठ न बोलनेका उतना महत्त्व नहीं दीखता। इसलिये सत्य बोलनेसे ‘मैं सत्यवादी हूँ’ ऐसा अहंकार आ सकता है, पर झूठ न बोलनेसे अहंकार आ ही नहीं सकता। इतना ही नहीं, मौनकी अपेक्षा भी झूठ न बोलना श्रेष्ठ है; क्योंकि मौन रहनेवाला जब कभी बोलेगा, तब झूठ भी बोल सकता है, पर झूठ न बोलनेवाला जब कभी बोलेगा, सत्य ही बोलेगा। तात्पर्य है कि विधिमें अर्थात् अपने उद्योगसे किये गये साधनमें अहंकार ज्यों-का-त्यों बना रहता है; क्योंकि उद्योग अहंकारपूर्वक ही होता है। कर्ता (करनेवाला) रहेगा, तभी तो उद्योग होगा! यद्यपि निषेधमें भी अहंकार (निषेध करनेवाला) रहता है, तथापि साधकमें अहंकारके त्यागका ही उद्देश्य रहनेसे वह बाँधनेवाला नहीं होता। जिसका साधन विवेकप्रधान होता है, उसमें निषेधका अहंकार टिक ही नहीं सकता।

भलाई करना विध्यात्मक साधन है और बुराईका त्याग करना निषेधात्मक साधन है। भलाई करनेसे कहीं-न-कहीं बुराई रह सकती है, पर बुराई न करनेसे भलाई सर्वथा आ जाती है। कारण कि भलाई असीम है। कितनी ही भलाई करें, पर वह बाकी रहेगी ही। भलाई करनेसे भलाईका अन्त नहीं आता, पर बुराई न करनेसे बुराईका अन्त आ जाता है। तात्पर्य है कि भलाई करनेसे भलाई बाकी रहती है, पर बुराई न करनेसे भलाई बाकी नहीं रहती।

‘करना’ सीमित और ‘न करना’ असीम होता है। अत: भलाई करनेसे सीमित भलाई होती है और बुराई न करनेसे असीम भलाई होती है। तात्पर्य है कि भलाई स्वत:सिद्ध है और बुराई आगन्तुक है। परन्तु जब हम बुराईको स्वीकार करके भलाई करते हैं अर्थात् भलाईको कृतिसाध्य मानते हैं, तब हमारे द्वारा पूरी भलाई नहीं होती। बुराईको स्वीकार न करनेसे भलाई अपने-आप होती है, करनी नहीं पड़ती, अपने-आप होनेवाला साधन असली होता है और जो साधन किया जाता है, वह नकली होता है तथा उसके साथ अभिमान रहता है। अगर हम बुराईका त्याग कर दें तो भलाई न करनेपर भी हम अपने-आप भले आदमी हो जायँगे।

अगर हम बुराईका त्याग कर दें अर्थात् किसीका बुरा न करें, किसीका बुरा न सोचें, किसीकी बुराई न देखें, किसीकी बुराई न सुनें, किसीकी बुराईकी चर्चा न करें तथा किसीको स्वरूपसे कभी किंचिन्मात्र भी बुरा न समझें तो ऐसा करनेपर दो बातें होंगी—हम कुछ नहीं करेंगे अथवा कुछ करेंगे तो भलाई ही करेंगे। दोष तो करनेसे ही आता है। हम कुछ नहीं करेंगे तो दोष कैसे आयेगा? क्योंकि कुछ न करनेसे प्रकृतिका सम्बन्ध नहीं रहता तथा स्वत:सिद्ध निर्दोष स्वरूपमें स्वत:स्थिति हो जाती है। इसलिये भलाई करनेकी अपेक्षा बुराई न करना श्रेष्ठ है।

तन कर मन कर वचन कर, देत न काहू दु:ख।

तुलसी पातक झरत है, देखत उनका मुख॥

मूलमें हमें असत् का ही त्याग करना है, सत् को प्राप्त नहीं करना है; क्योंकि सत् स्वत:सिद्ध प्राप्त है। असत् का त्याग होनेपर सत् ही शेष रहता है, असत् शेष नहीं रहता। अत: हम असत् का त्याग करेंगे तो सत्कर्म, सच्चर्चा, सच्चिन्तन और सत्संग स्वत: होंगे, करने नहीं पड़ेंगे।

सत् से अलग कोई हो ही नहीं सकता और असत् के साथ कोई रह ही नहीं सकता। परन्तु जब हम सत् को प्राप्त करनेका उद्योग करते हैं, तब असत् (इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि)का सहारा लेना ही पड़ता है। कारण कि असत् की सहायताके बिना उद्योग हो ही नहीं सकता। असत् का सहारा रहनेपर सीमित साधन होता है। जैसे हाथसे दीवारको नहीं पकड़ सकते, ऐसे ही सीमित साधनसे असीम तत्त्वको नहीं पकड़ सकते। असत् का त्याग (अस्वीकृति) करनेपर सत् की प्राप्ति स्वत: हो जाती है; क्योंकि वह स्वत:प्राप्त है। त्याग उसीका होता है, जो सदासे ही त्यक्त है और प्राप्ति उसीकी होती है, जो सदासे ही प्राप्त है—‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:’ (गीता २। १६)। साधकका काम केवल इतना है कि वह विवेकपूर्वक असत् का संग न करे, असत् को स्वीकार न करे।

५. अहंता-ममताका निषेध

करणनिरपेक्ष साधनमें सत्-असत् के विवेककी मुख्यता होनेसे अहम् का नाश जल्दी और सुगमतासे हो जाता है; क्योंकि अहम् भी असत् (जड) ही है। गीताने पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहम्—इन आठोंको अपरा (जड) प्रकृति कहा है*। ऐसा कहनेका तात्पर्य यह है कि जैसे पृथ्वी जड और जाननेमें आनेवाली है, ऐसे ही अहम् भी जड और जाननेमें आनेवाला है। अत: गीताने अहम् को इदंतासे कहा है; जैसे—‘एतद्यो वेत्ति’ (१३। १)। ‘इदम्’ (यह) कभी ‘अहम्’ (मैं) नहीं होता; अत: अहम् को इदंतासे कहनेका तात्पर्य है कि यह अपना स्वरूप नहीं है। परन्तु जब चेतन (जीव) इस अहम् के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब वह बँध जाता है।

अहम् के सम्बन्धसे परिच्छिन्नता पैदा होती है और परिच्छिन्नतासे सम्पूर्ण भेद पैदा होते हैं। भेदोंमें मैं-मेरेका भेद मुख्य है, जिसको अहंता और ममता नामसे कहा गया है। मैं-मेरेका भेद आठ प्रकारका है—मैं और मेरा, तू और तेरा, यह और इसका, वह और उसका। मैं, तू, यह, वह—ये चारों अहंताके रूप हैं और मेरा, तेरा, इसका, उसका—ये चारों ममताके रूप हैं।

मैं, तू, यह और वह—ये चारों ही एक-दूसरेकी दृष्टिमें चारों बन सकते हैं। जैसे—राम, श्याम, गोविन्द और गोपाल—ये चार व्यक्ति हैं। राम और श्याम एक-दूसरेके सामने हैं, गोविन्द उनके पास है और गोपाल उनसे दूर है। राम अपनेको ‘मैं’ कहता है, अपने सामनेवाले श्यामको ‘तू’ कहता है, पासवाले गोविन्दको ‘यह’ कहता है और दूरवाले गोपालको ‘वह’ कहता है। अगर श्याम अपनेको ‘मैं’ कहे तो वह रामको ‘तू’ कहेगा, गोविन्दको ‘यह’ कहेगा और गोपालको ‘वह’ कहेगा। अगर गोविन्द अपनेको ‘मैं’ कहे तो वह श्यामको ‘यह’ कहेगा और रामको ‘तू’ कहेगा अथवा श्यामको ‘तू’ और रामको ‘यह’ कहेगा तथा गोपालको ‘वह’ कहेगा। अगर गोपाल अपनेको ‘मैं’ कहे तो वह राम, श्याम और गोविन्द—तीनोंको ‘वह’ कहेगा। इस प्रकार राम, श्याम, गोविन्द और गोपाल—ये चारों ही एक-दूसरेकी दृष्टिमें मैं, तू, यह और वह बन सकते हैं। इन चारोंमें ‘मैं’ सबसे कमजोर है। कारण कि एक व्यक्तिको हजारों-लाखों आदमी तू, यह और वह कह सकते हैं, पर ‘मैं’ अकेला वही एक व्यक्ति कह सकता है!

मैं-मेरा ही माया है, जिसके त्यागपर सबने विशेष जोर दिया है*। परन्तु स्वरूप मायारहित है। स्वरूपमें ‘मैं’ और ‘मेरा’—दोनों ही नहीं हैं। वह ‘मैं’ और ‘मेरा’—दोनोंका प्रकाशक है, आश्रय है, आधार है, अधिष्ठान है। अत: स्वत:सिद्ध विवेकके द्वारा मैं और मेराको छोड़कर उसके प्रकाशक, आश्रय, आधार, अधिष्ठानमें स्थित होना (जो कि पहलेसे ही है) करणनिरपेक्ष साधन है।

६. कर्तापन-भोक्तापनका निषेध

मात्र क्रियाएँ प्रकृतिमें ही होती हैं। प्रकृति निरन्तर क्रियाशील है। वह किसी भी अवस्था (सर्ग-प्रलय, महासर्ग-महाप्रलय)में क्षणमात्र भी अक्रिय नहीं रहती। प्रकृतिमें होनेवाली क्रियाको भगवान् ने गीतामें अनेक प्रकारसे बताया है; जैसे—सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं (१३। २९); सम्पूर्ण क्रियाएँ गुणोंके द्वारा होती हैं; अत: गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं (३। २७-२८; १४। २३); गुणोंके सिवाय अन्य कोई कर्ता है ही नहीं (१४। १९); इन्द्रियाँ ही इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं (५। ९); स्वभाव ही बरत रहा है (५। १४); सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु हैं— अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव (१८।१३-१४)। इस प्रकार क्रियाओंको चाहे प्रकृतिसे होनेवाली कहें, चाहे प्रकृतिके कार्य गुणोंसे होनेवाली कहें, चाहे इन्द्रियोंसे होनेवाली कहें, वास्तवमें एक ही बात है। एक ही बातको अलग-अलग प्रकारसे कहनेका तात्पर्य यह है कि स्वयं (चेतन) किसी भी क्रियाका किंचिन्मात्र भी कर्ता नहीं है। जैसे प्रकृति कभी अक्रिय रहती ही नहीं, ऐसे ही स्वयंमें कभी क्रिया होती ही नहीं। परन्तु जब स्वयं प्रकृतिके अंश अहम् के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है अर्थात् अहम् को अपना स्वरूप मान लेता है, तब वह स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरमें होनेवाली क्रियाओंका कर्ता अपनेको मानने लगता है—‘अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३। २७)। जैसे कोई मनुष्य चलती हुई रेलगाड़ीमें बैठा है, चल नहीं रहा है तो भी रेलगाड़ीके सम्बन्धसे वह अपनेको चलनेवाला मान लेता है और कहता है कि ‘मैं जा रहा हूँ।’ ऐसे ही स्वयं जब क्रियाशील प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मानने लगता है, तब वह कर्ता न होते हुए भी अपनेको कर्ता मान लेता है। अपनेको कर्ता माननेसे वह प्रकृतिकी जिस क्रियासे सम्बन्ध जोड़ता है, वह क्रिया उसके लिये फलजनक ‘कर्म’ बन जाती है। कर्मसे बन्धन होता है—‘कर्मणा बध्यते जन्तु:’ (संन्यासोपनिषद् २।९८; महा० शान्ति० २४१।७)।

कर्म करना और कर्म न करना—ये दोनों ही प्रकृतिके राज्यमें हैं। अत: प्रकृतिका सम्बन्ध होनेपर चलने, बोलने, देखने, सुनने आदिकी तरह बैठना, खड़ा होना, मौन होना, सोना, मूर्च्छित होना, श्रवण-मनन-निदिध्यासन करना, ध्यान करना, समाधि लगाना आदि क्रियाएँ भी ‘कर्म’ ही हैं। इसलिये भगवान् ने शरीर, वाणी और मनसे होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाओंको ‘कर्म’ माना है—‘शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नर:।’ (गीता १८। १५) तथा शरीर, वाणी और मनकी शुद्धिके लिये शारीरिक, वाचिक और मानसिक तपका वर्णन किया है (१७। १४—१६)। इसी तरह गीतामें चौथे अध्यायके चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक जिन यज्ञोंका वर्णन आया है तथा वेदोंमें जिन यज्ञोंका वर्णन हुआ है, उन सबको कर्मजन्य माना गया है—‘कर्मजान्विद्धि तान्सर्वान्’ (४।३२)।

भगवान् ने ज्ञानेन्द्रियोंको भी कर्मेन्द्रियाँ ही माना है। इसलिये गीतामें ज्ञानेन्द्रियोंका वर्णन तो आया है, पर ‘ज्ञानेन्द्रिय’ शब्द कहीं नहीं आया है। देखना, सुनना, स्पर्श करना आदि ज्ञानेन्द्रियोंकी क्रियाओंको भी गीतामें कर्मेन्द्रियोंकी क्रियाओंके साथ ही सम्मिलित किया गया है१। तीसरे अध्यायके छठे-सातवें श्लोकोंमें भी ज्ञानेन्द्रियोंको कर्मेन्द्रियोंके अन्तर्गत ही माना गया है; क्योंकि ज्ञानेन्द्रियोंके बिना मिथ्याचार भी सिद्ध नहीं होगा और कर्मयोगका अनुष्ठान भी नहीं होगा२। जहाँ कर्मोंके तीन (सात्त्विक, राजस, तामस) भेद बताये गये हैं, वहाँ भी ‘ज्ञानेन्द्रिय’ शब्द नहीं आया है (गीता १८। २३—२५)। ज्ञानेन्द्रियोंके विषयोंके लिये भी ‘पञ्च चेन्द्रियगोचरा:’ (गीता १३। ५) पद दिया गया है।

कर्म तीन प्रकारके होते हैं—क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध। मनुष्य वर्तमानमें जो कर्म करता है, वे ‘क्रियमाण’ कर्म हैं। भूतकालमें (इस जन्ममें अथवा पहलेके अनेक मनुष्य-जन्मोंमें) किये हुए जो कर्म अन्त:करणमें संगृहीत हैं, वे ‘संचित’ कर्म हैं। संचितमेंसे जो कर्म फल देनेके लिये उन्मुख हो गये हैं अर्थात् जन्म, आयु और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें परिणत होनेके लिये सामने आ गये हैं, वे ‘प्रारब्ध’ कर्म हैं। क्रियमाण कर्म अनेक प्रकारके कहे गये हैं। जैसे, व्याकरणकी दृष्टिसे कर्म चार प्रकारके हैं—उत्पाद्य, विकार्य, संस्कार्य (मलापकर्ष तथा गुणाधान) और आप्य [कहीं-कहीं निर्वर्त्य, विकार्य और प्राप्य—ये तीन प्रकार कहे गये हैं]। न्यायकी दृष्टिसे कर्म पाँच प्रकारके हैं—उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुञ्चन, प्रसारण और गमन। धर्मकी दृष्टिसे भी कर्म पाँच प्रकारके हैं—नित्य, नैमित्तिक, काम्य, प्रायश्चित्त और आवश्यक कर्तव्य-कर्म। ये सभी प्रकारके कर्म प्रकृतिके सम्बन्धसे होनेवाले हैं। प्रकृतिके सम्बन्धसे रहित स्वयं (स्वरूप) कभी किंचिन्मात्र भी किसी कर्मका कर्ता नहीं है। भगवान् ने स्वरूपको कर्ता माननेवालेकी निन्दा की है कि उसकी बुद्धि शुद्ध अर्थात् विवेकवती नहीं है, वह दुर्मति है*। परन्तु जो अहम् को अपना स्वरूप नहीं मानता, ऐसा तत्त्वज्ञमहापुरुष स्वयंको कर्ता अनुभव नहीं करता—‘नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्’ (गीता ५। ८)। तात्पर्य है कि अहम् को अपना स्वरूप माननेसे जो ‘अहङ्कार-विमूढात्मा’ हो गया था, वही अपनेको अहम् से अलग अनुभव करनेपर ‘तत्त्ववित्’ हो जाता है।

अहङ्कारसे मोहित होकर स्वयंने भूलसे अपनेको कर्ता मान लिया तो वह कर्म तथा उनके फलोंसे बँध गया और चौरासी लाख योनियोंमें चला गया। अब यदि वह अपनेको अहम् से अलग माने और अपनेको कर्ता न माने अर्थात् स्वयं वास्तवमें जैसा है, वैसा ही अनुभव कर ले तो उसके तत्त्ववित् (मुक्त) होनेमें आश्चर्य ही क्या है? तात्पर्य है कि जो असत्य है, वह भी जब सत्य मान लेनेसे सत्य दीखने लग गया तो फिर जो वास्तवमें सत्य है, उसको मान लेनेपर वह वैसा ही दीखने लग जाय तो इसमें क्या आश्चर्य है?

वास्तवमें स्वयं जिस समय अपनेको कर्ता-भोक्ता मानता है, उस समय भी वह कर्ता-भोक्ता नहीं है—‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ (गीता १३। ३१)। कारण कि अपना स्वरूप सत्तामात्र है। सत्तामें अहम् नहीं है और अहम् की सत्ता नहीं है। अत: ‘मैं कर्ता हूँ’—यह मान्यता कितनी ही दृढ़ हो, है तो भूल ही! भूलको भूल मानते ही भूल मिट जाती है—यह नियम है। किसी गुफामें सैकड़ों वर्षोंसे अन्धकार हो तो प्रकाश करते ही वह तत्काल मिट जाता है, उसके मिटनेमें अनेक वर्ष-महीने नहीं लगते। इसलिये साधक दृढ़तासे यह मान ले कि ‘मैं कर्ता नहीं हूँ’*। फिर यह मान्यता मान्यतारूपसे नहीं रहेगी, प्रत्युत अनुभवमें परिणत हो जायगी।

जब चेतनमें कर्तापन है ही नहीं तो फिर उसको सुख-दु:खके भोक्तापनमें हेतु क्यों कहा गया है—‘पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते।’ (गीता १३। २०)? इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं कि अहम् के साथ तादात्म्य करनेसे ही चेतन सुख-दु:खका भोक्ता बनता है—

पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङ्‍क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।

(गीता १३।२१)

चेतनको भोक्तापनमें हेतु बतानेका कारण यह है कि सुखी-दु:खी चेतन ही हो सकता है, जड नहीं। इसमें भी एक मार्मिक बात है कि अहम् के साथ तादात्म्य होते हुए भी वास्तवमें चेतन सुख-दु:खका भोक्ता नहीं है—‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥’ (गीता १३। ३१)। तात्पर्य है कि कर्ता-भोक्ता अहम् है, स्वयं (चेतन) नहीं।

तादात्म्य क्या है? एक चार कोनोंवाला लोहा हो और उसको अग्निसे तपा दिया जाय तो यह लोहे और अग्निका तादात्म्य है। तादात्म्य होनेसे लोहेमें जलानेकी ताकत न होनेपर भी वह जलानेवाला हो जाता है और अग्नि चार कोनोंवाली न होनेपर भी चार कोनोंवाली हो जाती है। ऐसे ही जड (अहम्) और चेतनका तादात्म्य होनेपर जडकी सत्ता न होनेपर भी सत्ता दीखने लग जाती है और कर्ता-भोक्ता न होनेपर भी चेतन कर्ता-भोक्ता बन जाता है।

जैसे चुम्बककी तरफ लोहा ही खिंचता है, अग्नि नहीं खिंचती; परन्तु लोहेसे तादात्म्य होनेके कारण अग्नि भी चुम्बककी तरफ खिंचती हुई प्रतीत होती है। ऐसे ही भोगोंकी तरफ अहम् ही खिंचता है, चेतन नहीं खिंचता। अहम् के बिना केवल चेतनका भोगोंमें आकर्षण हो ही नहीं सकता। अहम् के साथ एक होनेसे ही स्वयं भोक्ता बनता है अर्थात् अपनेको सुखी-दु:खी मानता है। अत: वास्तवमें अहम् ही कर्ता-भोक्ता बनता है, चेतन नहीं।

‘मैं हूँ’—यह जड-चेतनका तादात्म्य है। इस ‘मैं हूँ’ में ही भोक्तापन रहता है। अगर ‘मैं’ न रहे तो ‘हूँ’ नहीं रहेगा, प्रत्युत ‘है’ रहेगा। जैसे लोहे और अग्निमें तादात्म्य न रहनेसे लोहा पृथ्वीपर ही रह जाता है और अग्नि निराकार अग्नि-तत्त्वमें लीन हो जाती है, ऐसे ही अहम् तो प्रकृतिमें ही रह जाता है और ‘हूँ’ (‘है’ का स्वरूप होनेसे) ‘है’ में ही विलीन हो जाता है। ‘है’ में भोक्तापन नहीं है। तात्पर्य है कि भोगोंमें ‘हूँ’ खिंचता है, ‘है’ नहीं खिंचता। ‘हूँ’ ही कर्ता-भोक्ता बनता है, ‘है’ कर्ता-भोक्ता नहीं बनता। अत: ‘हूँ’ को न मानकर ‘है’ को ही माने अर्थात् अनुभव करे।

सुख-दु:खके आने-जानेका और स्वयंके रहनेका अनुभव सबको है। पापी-से-पापी मनुष्यको भी इसका अनुभव है। ऐसा अनुभव होनेपर भी मनुष्य आगन्तुक सुख-दु:खके साथ मिलकर सुखी-दु:खी हो जाता है। इसका कारण यह है कि ‘मैं अलग हूँ और सुख-दु:ख अलग हैं’—इस विवेकका वह आदर नहीं करता, इसको महत्त्व नहीं देता, इसपर कायम नहीं रहता। वास्तवमें स्वयं सुखी-दु:खी नहीं होता, प्रत्युत अहम् के साथ मिलकर अपनेको सुखी-दु:खी मान लेता है। तात्पर्य है कि सुख-दु:ख केवल मान्यतापर टिके हुए हैं।

सुख-दु:खका आना, रहना और जाना—ये तीन अवस्थाएँ सबके अनुभवमें आती हैं। वास्तवमें ये तीन न होकर एक ही हैं। कारण कि सुख-दु:खके आते ही उसी क्षण उनका जाना शुरू हो जाता है। उनका रहना सिद्ध होता ही नहीं। तात्पर्य है कि सुख-दु:ख तो निरन्तर बह रहे हैं, अभावमें जा रहे हैं, पर अज्ञानके कारण हमने ही उनको पकड़ा है अर्थात् उनको आते हुए और रहते हुए माना है। वास्तवमें ‘वे बह रहे हैं’—ऐसा कहना भी सुख-दु:खकी सत्ताको लेकर है। अगर उनको सत्ता न दें तो वे हैं ही नहीं! जब हैं ही नहीं तो फिर बहें क्या?

७. स्वत:प्राप्त और सहज निवृत्ति

स्वत:प्राप्त कभी अप्राप्त नहीं होता और सहज निवृत्तिका कभी नाश नहीं होता। स्वत:प्राप्त तत्त्व है और सहज निवृत्ति प्रकृति है। सहज निवृत्तिके दो भेद हैं—प्रवृत्ति और निवृत्ति। प्रवृत्तिमें भी सहज निवृत्ति है और निवृत्तिमें भी सहज निवृत्ति है। परन्तु स्थूल दृष्टिसे देखा जाय तो सहज निवृत्तिका भान प्रवृत्तिके समय नहीं होता, प्रत्युत प्रवृत्तिके आदि और अन्तमें होता है। तात्पर्य है कि प्रकृति निरन्तर क्रियाशील होनेसे कभी अक्रिय नहीं रहती। अत: प्रकृतिकी क्रियाशीलता ही स्थूल दृष्टिसे सर्ग और प्रलय, महासर्ग और महाप्रलय—इन दो अवस्थाओंके रूपमें प्रतीत होती है*। परन्तु स्वत:प्राप्त तत्त्वमें क्रिया नहीं है; अत: उसमें क्रियाकी सहज निवृत्ति है।

जिसमें क्रिया नहीं है, वह नित्यप्राप्त है और जिसमें क्रिया है, वह कभी किसीको प्राप्त हुआ नहीं, प्राप्त है नहीं, प्राप्त होगा नहीं तथा प्राप्त हो सकता नहीं। तात्पर्य है कि क्रियाशील प्रकृतिकी प्रतीति तो होती है, पर प्राप्ति नहीं होती। सहज निवृत्तिकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? अविवेकके कारण स्त्री, पुत्र, धन, मान, बड़ाई आदिकी प्राप्ति दीखती तो है, पर वास्तवमें इनकी अप्राप्ति ही है। कारण कि ये पहले भी अप्राप्त थे, पीछे भी अप्राप्त हो जायँगे तथा वर्तमानमें भी ये हमारेसे निरन्तर वियुक्त हो रहे हैं। अत: इनकी निरन्तर निवृत्ति (सम्बन्ध-विच्छेद) है, प्राप्ति नहीं है।

तत्त्वकी प्राप्ति भी स्वत:सिद्ध है और प्रकृतिकी निवृत्ति भी स्वत:सिद्ध है। तत्त्वकी प्राप्तिका नाम भी ‘योग’ है—‘समत्वं योग उच्यते’ (गीता २।४८) और प्रकृतिकी निवृत्तिका नाम भी ‘योग’ है—‘दु:खसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्’ (गीता ६।२३)।

—इस प्रकार विवेकको प्रधानता देकर, अपनी विवेक-शक्तिका उपयोग करके सहज निवृत्तिकी निवृत्ति और स्वत:प्राप्तकी प्राप्ति स्वीकार करना करणनिरपेक्ष साधन है।

८. संसारका अभाव और परमात्मतत्त्वका भाव

देखने, सुनने तथा चिन्तन करनेमें जितना भी संसार आ रहा है, इसका पहले भी अभाव था, पीछे भी अभाव हो जायगा तथा वर्तमानमें भी यह निरन्तर अभावमें जा रहा है—

देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं।

मोह मूल परमारथु नाहीं॥

(मानस २। ९२। ४)

इसका इतनी तेजीसे परिवर्तन हो रहा है कि इसको दो बार नहीं देख सकते अर्थात् एक बार देखनेमें यह जैसा था, दूसरी बार देखनेमें यह वैसा नहीं रहता। इसमें केवल परिवर्तन-ही-परिवर्तन है। परिवर्तनके पुंजका नाम ही संसार है।

वस्तुके उत्पन्न होते ही उसके नाशका क्रम (परिवर्तन) आरम्भ हो जाता है। जैसे, जमीनमें बीज डालते हैं तो पहले मिट्टी-पानीके संयोगसे बीज कुछ फूलता है। फिर वह फूटता है तो उसमेंसे अंकुर निकलता है। अंकुरसे फिर दो पत्तियाँ निकलती हैं। फिर वह बढ़कर पौधा बनता है। पौधा बढ़ते-बढ़ते वृक्ष बनता है। फिर वह वृक्ष भी धीरे-धीरे पुराना होकर अन्तमें गिर जाता है। तात्पर्य है कि बीजके बढ़नेसे लेकर वृक्ष बननेतक उसमें निरन्तर परिवर्तन हुआ है। ऐसे ही स्त्री गर्भधारण करती है तो गर्भमें पहले एक पिण्ड बनता है। फिर उसके बढ़नेपर उसमेंसे वृक्षकी शाखाओंकी तरह एक सिर, दो हाथ और दो पैर निकलते हैं। फिर आँख, कान, नाक आदि नौ छिद्र बनते हैं। फिर हृदय आदिका निर्माण होते-होते नवें मासमें वह सम्पूर्ण अंगोंसे युक्त होकर गर्भाशयसे बाहर आता (जन्म लेता) है। जन्मके बाद वह प्रतिक्षण बढ़ता रहता है। जन्मसे लेकर दो वर्षतक उसकी ‘शिशु’-अवस्था होती है। दोसे पाँच वर्षतक उसकी ‘कुमार’-अवस्था होती है। पाँचसे दस वर्षतक उसकी ‘पौगण्ड’-अवस्था होती है। दससे पन्द्रह वर्षतक उसकी ‘किशोर’-अवस्था होती है। पन्द्रहसे तीस वर्षतक उसकी ‘युवा’-अवस्था होती है। तीससे पचास वर्षतक उसकी ‘प्रौढ़’-अवस्था होती है। पचास वर्षसे आगे उसकी ‘वृद्ध’-अवस्था होती है*। फिर उसकी मृत्यु हो जाती है। मृत्युके बाद सूक्ष्म-शरीर तथा कारण-शरीर—दोनोंको लेकर जीव परलोकगमन करता है और स्थूलशरीर यहीं पड़ा रह जाता है। उस स्थूलशरीरमें अनेक विकार (फूलना, सड़ना आदि) होने लगते हैं। उसको जलानेसे वह राख बन जाता है, पशु-पक्षियोंके खानेसे वह विष्ठा बन जाता है और जमीनमें गाड़नेसे वह कृमि बन जाता है।

तात्पर्य यह हुआ कि गर्भसे लेकर अन्ततक शरीरमें निरन्तर परिवर्तन होता है। उत्पन्न होते ही उसमें विनाशकी क्रिया आरम्भ हो जाती है। इसलिये जन्म लेनेके बाद बालक बड़ा होगा कि नहीं होगा, पढ़ेगा कि नहीं पढ़ेगा, व्यापार आदि कार्य करेगा कि नहीं करेगा, डॉक्टर, इंजीनियर आदि बनेगा कि नहीं बनेगा, विवाह करेगा कि नहीं करेगा, उसकी सन्तान होगी कि नहीं होगी आदि सब बातोंमें सन्देह रहता है, पर वह मरेगा कि नहीं मरेगा—इस बातमें कोई सन्देह नहीं रहता; क्योंकि यह निरन्तर मर रहा है।

इस प्रकार संसारमात्रमें कोरा परिवर्तन-ही-परिवर्तन है। ऐसा कोई वर्ष नहीं, जिसमें परिवर्तन न होता हो। ऐसा कोई महीना नहीं, जिसमें परिवर्तन न होता हो। ऐसा कोई दिन नहीं, जिसमें परिवर्तन न होता हो। ऐसा कोई घंटा नहीं, जिसमें परिवर्तन न होता हो। ऐसा कोई मिनट नहीं, जिसमें परिवर्तन न होता हो। ऐसा कोई सेकेंड नहीं, जिसमें परिवर्तन न होता हो। जैसे नदी निरन्तर बहती ही रहती है, एक क्षणके लिये भी रुकती नहीं, ऐसे ही संसारके नाशका प्रवाह निरन्तर चलता रहता है, एक क्षणके लिये भी रुकता नहीं।

वास्तवमें संसारका प्रवाह नदीके प्रवाहसे अथवा विद्युत् की गतिसे भी तेज है, जिसमें नदीका प्रवाह भी प्रवाहित हो रहा है तथा विद्युत् की गति भी गतिशील हो रही है! नदीके किनारे खड़े एक सन्तने कहा कि जैसे नदी बह रही है, ऐसे ही पुलपर आदमी बह रहे हैं। दूसरे सन्त बोले कि आदमी ही नहीं, खुद पुल भी बह रहा है! कैसे? जिस दिन यह पुल बना, उस दिन यह जैसा नया था, वैसा आज नया नहीं है और जैसा आज है, वैसा आगे नहीं रहेगा, प्रत्युत पुराना होकर एक दिन गिर जायगा। तात्पर्य यह हुआ कि इसमें प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है, यह निरन्तर अभावमें जा रहा है।

प्रत्येक देश (स्थान)का पहले भी अभाव था, पीछे भी अभाव हो जायगा और अब भी निरन्तर अभाव हो रहा है। प्रत्येक वर्ष, महीना, पक्ष, वार, तिथि, नक्षत्र, घंटा, मिनट, सेकेंड आदिका तथा भूत, भविष्य और वर्तमान कालका प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है। प्रत्येक वस्तु परिवर्तनका पुंज है। प्रत्येक व्यक्ति जन्मसे पहले भी नहीं था, मृत्युके बाद भी नहीं रहेगा तथा बीचमें भी प्रतिक्षण मृत्युकी ओर जा रहा है। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, मूर्च्छा और समाधि-अवस्था तथा बालक, जवान और वृद्धावस्था आदि सम्पूर्ण अवस्थाओंका प्रतिक्षण अभाव हो रहा है। एक क्षण पहले जैसी अवस्था थी, दूसरे क्षणमें वैसी अवस्था नहीं रहती। अनुकूल, प्रतिकूल तथा मिश्रित—कोई भी परिस्थिति निरन्तर नहीं रहती। परिस्थितिमात्रका निरन्तर अभाव हो रहा है। प्रत्येक सुखदायी तथा दु:खदायी घटनाका निरन्तर अभाव हो रहा है। जन्म-मरण, संयोग-वियोग आदि कोई भी घटना टिकती नहीं। कोई भी क्रिया निरन्तर नहीं रहती। प्रत्येक क्रियाका आदि और अन्त होता है। तात्पर्य है कि प्रत्येक देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति, घटना और क्रियामें निरन्तर परिवर्तन हो रहा है। परन्तु इस परिवर्तनको जो जाननेवाला है, वह अपरिवर्तनशील तत्त्व है। कारण कि जो बदलता है, वह बदलनेवालेको नहीं जान सकता। जो नहीं बदलता, वही बदलनेवालेको जान सकता है। गीतामें आया है—

भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।

(८। १९)

‘वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न हो-होकर लीन होता है।’

—जो उत्पन्न हो-होकर लीन होता है, वह बदलनेवाला नाशवान् संसार है और जो वही रहता है, वह न बदलनेवाली अखण्ड सत्ता है। संसारमें केवल परिवर्तन है और सत्तामें केवल अपरिवर्तन है। बदलनेवालेका नाम ही संसार है और न बदलनेवालेका नाम ही परमात्मतत्त्व है। परमात्मतत्त्वकी सत्तासे ही यह संसार सत्तावाला (‘है’-रूपसे) दीख रहा है—

जासु सत्यता तें जड़ माया।

भास सत्य इव मोह सहाया॥

(मानस १। ११७। ८)

जैसे, हम कहते हैं कि ‘यह मनुष्य है, यह पशु है, यह वृक्ष है, यह मकान है’ आदि तो इसमें ‘मनुष्य, पशु, वृक्ष, मकान’ आदि तो पहले भी नहीं थे, पीछे भी नहीं रहेंगे तथा वर्तमानमें भी प्रतिक्षण अभावमें जा रहे हैं; परन्तु ‘है’ रूपसे जो सत्ता है, वह सदा ज्यों-की-त्यों है। तात्पर्य है कि ‘मनुष्य, पशु, वृक्ष, मकान’ आदि तो संसार है और ‘है’ परमात्मतत्त्व है। संसारकी तो सत्ता नहीं है और परमात्मतत्त्वका अभाव नहीं है—‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:’ (गीता २। १६)।

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहम्—ये आठों अपरा प्रकृति हैं (गीता ७। ४)। इन आठोंमें क्रिया, परिवर्तन अथवा विकृति होती है, पर ये जिसकी सत्तासे सत्तावान् प्रतीत होते हैं, उस ‘है’ में कभी किंचिन्मात्र भी कोई क्रिया, परिवर्तन अथवा विकृति नहीं होती। वह नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहता है। जैसे, हम कहते हैं कि ‘पृथ्वी है’ तो इसमें दो शब्द हैं—‘पृथ्वी’ और ‘है’। जब भूकम्प आता है, तब वह पृथ्वीमें आता है, ‘है’ में नहीं आता। पेड़-पौधे पृथ्वीपर उगते हैं, ‘है’ पर नहीं उगते। जल कभी बर्फ बनकर जम जाता है, कभी भाप बनकर उड़ जाता है, पर ‘है’ न जमता है, न उड़ता है। जल ठण्डा या गर्म होता है, ‘है’ ठण्डा या गर्म नहीं होता। अग्नि कभी जलती है, कभी शान्त होती है, पर ‘है’ न जलता है, न शान्त होता है। वायु कभी स्थिर रहती है, कभी बहती है, पर ‘है’ न स्थिर रहता है, न बहता है। बादल आकाशको आच्छादित करते हैं, पर ‘है’ को आच्छादित नहीं करते। शब्द आकाशका, स्पर्श वायुका, रूप अग्निका, रस जलका और गन्ध पृथ्वीका गुण है, पर ‘है’ में ये गुण नहीं हैं। स्थिर या चंचल मन होता है, ‘है’ नहीं होता। संकल्प-विकल्प मनमें होते हैं, ‘है’ में नहीं होते। कभी ठीक समझना, कभी कम समझना और कभी बिलकुल न समझना बुद्धिमें है, ‘है’ में नहीं है। सम्पूर्ण क्रियाएँ अहम् (धातुरूप समष्टि अहंकार) में होती हैं, ‘है’ में कभी किंचिन्मात्र भी कोई क्रिया नहीं होती। इसी अहम् के साथ सम्बन्ध जोड़कर जीव मान लेता है कि ‘मैं सुखी हूँ, मैं दु:खी हूँ, मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ, मैं मूर्ख हूँ, मैं विद्वान् हूँ, मैं ऊँचा हूँ, मैं नीचा हूँ’ आदि। परन्तु ‘है’ कभी सुखी-दु:खी, कर्ता-भोक्ता, मूर्ख-विद्वान्, ऊँचा-नीचा आदि नहीं होता।

हम कहते हैं कि ‘संसार है’ तो परिवर्तन संसारमें होता है, ‘है’ में नहीं होता। जैसे, ‘काठ है’ तो विकृति काठमें आती है, ‘है’ में नहीं आती। काठ जलता है, ‘है’ नहीं जलता। काठ जलकर कोयला हो गया तो जो पहले ‘काठ है’, वही अब ‘कोयला है’, तो ‘है’ में क्या फर्क पड़ा? ऐसे ही काठ कटता है, ‘है’ नहीं कटता। पानीमें काठ बहता है, ‘है’ नहीं बहता। काठ कभी गीला होता है, कभी सूखा होता है, पर ‘है’ कभी गीला या सूखा नहीं होता। काठ कभी एकरूप रहता ही नहीं और ‘है’ कभी अनेकरूप होता ही नहीं।

जो बदले, वह संसार है और जो कभी न बदले, वह ‘है’ अर्थात् परमात्मतत्त्व है। संसारकी सत्ता तो उत्पन्न होनेके बाद है, पर ‘है’ की सत्ता उत्पन्न होनेके बाद नहीं है, प्रत्युत पहलेसे ही स्वत:सिद्ध है—‘नायं भूत्वा भविता वा न भूय:’ (गीता २। २०)। अत: संसारकी सत्ता अवास्तविक (मानी हुई) तथा एकदेशीय है और ‘है’ की सत्ता वास्तविक और अनन्त है।

संसारको ‘है’ की आवश्यकता है, पर ‘है’ को संसारकी आवश्यकता नहीं है। कारण कि संसारकी सत्ता ‘है’ के अधीन है, पर ‘है’ की सत्ता संसारके अधीन नहीं है। जैसे प्रकाशमें सब वस्तुएँ दीखती हैं तो सबसे पहले प्रकाश दीखता है, वस्तुएँ पीछे दीखती हैं, ऐसे ही सबसे पहले ‘है’ दीखता है, संसार पीछे दीखता है। परन्तु भोग तथा संग्रहमें आसक्त मनुष्य केवल संसारको ही देखते हैं—‘कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता:’ (गीता १६। ११) और तत्त्वज्ञ महापुरुष संसारको न देखकर केवल ‘है’ को ही देखते हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’ (गीता ७। १९)।

९. एकदेशीय सत्ता और अनन्त सत्ता

साधककी समस्या यह है कि जिसकी सत्ता नहीं है, जो एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता, उस संसारका (भोगोंका) तो आकर्षण होता है, पर जिसकी सत्ता है, जो नित्य-निरन्तर विद्यमान है, उस तत्त्वका आकर्षण नहीं होता! जो ‘नहीं’ है, उसका असर पड़ता है और जो ‘है’, उसका असर नहीं पड़ता! अब इसपर विचार किया जाता है।

वास्तवमें ‘नहीं’ को ‘है’ माननेसे ही भोग होता है। संसारको स्थायी माने बिना उसका भोग हो ही नहीं सकता। संसारकी स्थिति वास्तवमें है ही नहीं। उसका प्रतिक्षण ही नाश हो रहा है। नाशके इस क्रम (प्रवाह)को ही स्थिति कह देते हैं। परन्तु भोग भोगते समय इस बातका ज्ञान नहीं रहता। सुखभोगकी इच्छा इस ज्ञानको तिरस्कृत (रद्दी) कर देती है अर्थात् सुखभोगकी इच्छा भोगोंको सत्ता दे देती है। अत: भोगोंकी सत्ता नहीं है, नहीं है, नहीं है—ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाय तो सुखभोगकी इच्छा मिट जायगी अथवा एक परमात्मतत्त्वकी ही सत्ता है, है, है—ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाय तो सुखभोगकी इच्छा मिट जायगी।

‘नहीं’ निरन्तर ‘नहीं’ में जा रहा है और ‘है’ निरन्तर ‘है’ में रह रहा है। नित्यनिवृत्तकी निरन्तर निवृत्ति हो रही है और नित्यप्राप्तकी निरन्तर प्राप्ति हो रही है। इस वास्तविकताका अनुभव करनेके लिये अहंकार (एकदेशीयपना)को मिटाना बहुत आवश्यक है।

अपनेमें ‘मैं हूँ’ इस प्रकार जो एकदेशीयपना (अहम्) दीखता है, उसीसे परिच्छिन्नता, विषमता, व्यक्तित्व, अभाव, जडता, अशान्ति, कर्तृत्व, भोगेच्छा आदि विकार पैदा होते हैं। यह एकदेशीयपना ही तत्त्वसे भेद, दूरी तथा विमुखता पैदा करता है। जबतक अपनेमें एकदेशीयपना रहता है, तभीतक भोगोंमें आकर्षण रहता है। इस एकदेशीयपने (मैंपन) को मिटानेका उपाय है—अपनेमें परमात्मतत्त्वकी सत्ता (‘है’) को स्वीकार करना।

अपनेमें अपने सिवाय परमात्मतत्त्वकी सत्ता माननेसे क्या द्वैत नहीं आ जायगा? द्वैत नहीं आयेगा, प्रत्युत द्वैतभावका नाश हो जायगा। कारण कि अपनेमें जो एकदेशीय सत्ता दीखती है, उसमें परमात्मतत्त्वकी अनन्त सत्ताको स्वीकार करनेसे वह एकदेशीय सत्ता मिट जायगी। एकदेशीय सत्ता मिटते ही द्वैतभाव, परिच्छिन्नता, विषमता, व्यक्तित्व आदि विकारोंका नाश हो जायगा। ये सब विकार एकदेशीय सत्तामें ही दीखते हैं।

जिस सत्ताके अन्तर्गत अनेक ब्रह्माण्ड हैं, उस अनन्त सत्तामें और एकदेशीय सत्तामें वस्तुत: कोई भेद नहीं है। भगवान् कहते हैं—

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।

(गीता १३। २)

‘हे भारत! तू सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ मेरेको ही समझ।’

तात्पर्य है कि वास्तविक सत्ता दो नहीं है, प्रत्युत एक ही है—‘वासुदेव: सर्वम्’। अपरा प्रकृतिके जिस अंशमें सम्पूर्ण क्रियाएँ हो रही हैं, उस अंश अर्थात् ‘अहम्’ के साथ सम्बन्ध मान लेनेसे सत्तामें भेद दीखने लग जाता है। जिसने अहम् के साथ सम्बन्ध माना है, वह एकदेशीय सत्ता हो जाती है। इस एकदेशीय सत्ताको ही जीव, ईश्वरका अंश, परा प्रकृति, क्षेत्रज्ञ आदि नामोंसे कहते हैं। इस एकदेशीय सत्ताको ही ‘मैं हूँ’—इस रूपसे जाना जाता है। यह एकदेशीय सत्ता जिस अनन्त सत्ताका अंश है, उस अनन्त सत्ताको ब्रह्म, परमात्मा, भगवान् आदि नामोंसे कहते हैं। उस अनन्त सत्ताको भी ‘है’-रूपसे जाना जाता है। इस प्रकार अहम् के कारण एक ही सत्ताके दो भेद हो जाते हैं—एकदेशीय सत्ता (जीव) और अनन्त सत्ता (ब्रह्म)।

‘मैं हूँ’—यह जड-चेतनकी ग्रन्थि है। इसमें ‘मैं’ जड (प्रकृति)का अंश है और ‘हूँ’ चेतन (परमात्मा)का अंश है। ‘मैं’-पनकी प्रकृतिके साथ एकता है और ‘हूँ’ की परमात्मा (‘है’)के साथ एकता है। ‘मैं’-पनके कारण ही ‘है’ ‘हूँ’-रूपसे दीखता है। अगर ‘मैं-पन’ न रहे तो ‘हूँ’ ‘है’ में समा जायगा। सभी ‘हूँ’ ‘है’ में समा जाते हैं, पर ‘है’ ‘हूँ’ में नहीं समा सकता। वास्तवमें ‘हूँ’ ‘है’ में समाया हुआ ही है! उस ‘है’ में ‘मैं’-पन नहीं है। तात्पर्य है कि ‘मैं’-पन (अहम्)से ही सत्तामें ‘हूँ’ और ‘है’ का भेद होता है। इसलिये सत्ताभेदको मिटानेके लिये ‘मैं’-पनका नाश करना आवश्यक है। यह ‘मैं’-पन भूलसे माना हुआ है। यह भूल अपनेमें अर्थात् व्यक्तित्वमें है, सत्ता (तत्त्व)में नहीं। इस एक भूलमें ही अनेक भूलें हैं! इस भूलको मिटानेके लिये ‘हूँ’ को ‘है’ में मिलाना बहुत आवश्यक है। ‘हूँ’ को ‘है’ में मिलानेसे ‘मैं’ नहीं रहेगा, प्रत्युत ‘है’ (तत्त्व) रह जायगा।

हम मानी हुई एकदेशीय सत्ता ‘मैं हूँ’ को तो दृढ़तासे अनुभव करते हैं, पर तत्त्वकी अनन्त सत्ताको मानते हैं* इस विपरीतताका कारण अहंकार ही है। अहंकारको मिटानेके लिये एकदेशीय सत्ताको अनन्त सत्तामें मिला दें अर्थात् समर्पित कर दें, जो कि वास्तवमें है। ऐसा करनेसे मानी हुई एकदेशीय सत्ता नहीं रहेगी, प्रत्युत देश-कालादि भावोंसे अतीत अनन्त सत्ता रह जायगी। तात्पर्य है कि अनन्त सत्ताकी मान्यता मान्यतारूपसे नहीं रहेगी, प्रत्युत पहले जितनी दृढ़तासे एकदेशीय सत्ताका भान होता था, उससे भी अधिक दृढ़तासे अनन्त सत्ताका अनुभव स्वत: होने लगेगा।

एक मार्मिक बात है कि अनन्त सत्ताको एकदेशीय सत्तामें मिलानेकी अपेक्षा एकदेशीय सत्ताको अनन्त सत्तामें मिलाना श्रेष्ठ है। कारण कि एकदेशीय सत्तामें अनादिकालसे माने हुए अहंकारके संस्कार रहते हैं; अत: जब उसमें अनन्त सत्ताकी स्थापना करेंगे, तब वह अहंकार जल्दी नष्ट नहीं होगा। परन्तु एकदेशीय सत्ताको अनन्त सत्तामें मिलानेसे अहंकार सर्वथा नहीं रहेगा। कारण कि अनन्त सत्ता मानी हुई नहीं है, प्रत्युत वास्तविक है।

वास्तवमें जीव और ब्रह्मकी एकता करना ही भूल है। जीव और ब्रह्मकी एकता आजतक न कभी हुई है, न होगी और न हो ही सकती है। कारण कि जीवमें ब्रह्मभाव नहीं है और ब्रह्ममें जीवभाव नहीं है। अत: जीव और ब्रह्मकी एकता न करके जीवभाव अर्थात् अहम् (मैं-पन)को मिटाना है। अहम् के मिटते ही केवल ब्रह्म रह जाता है। इसीको गीताने ‘वासुदेव: सर्वम्’ (७। १९) कहा है। इसीलिये यह कहा गया है कि जीवको ब्रह्मकी प्राप्ति नहीं होती, प्रत्युत जीवभाव मिटनेपर ब्रह्मको ही ब्रह्मकी प्राप्ति होती है—

‘ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति’ (बृहदारण्यक० ४। ४। ६)

‘ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति’ (मुण्डक० ३। २। ९)

‘ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थित:’ (गीता ५। २०)

भगवान् ने अहम् मिटनेके बाद ही ब्राह्मी स्थिति होनेकी बात कही है—

निर्ममो निरहङ्कार: स शान्तिमधिगच्छति।

एषा ब्राह्मी स्थिति: पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति॥

(गीता २। ७१-७२)

ब्राह्मी स्थिति प्राप्त होनेपर फिर कभी अहम् से मोहित (अहंकारविमूढात्मा) होनेकी सम्भावना नहीं रहती।

तात्पर्य है कि वास्तविक सत्ता एक ही है। एकदेशीय, उत्पन्न होनेवाली, व्यावहारिक और प्रातिभासिक (प्रतीत होनेवाली) सत्ता वास्तवमें सत्ता नहीं है, प्रत्युत सत्ताका आभासमात्र है अर्थात् वह सत्ताकी तरह दीखती है, पर सत्ता नहीं है। वास्तविक सत्ता अनुभवमें आनेवाली वस्तु नहीं है, प्रत्युत अनुभवरूप है। हम उसको इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि (करण)के द्वारा देखना, अनुभव करना चाहते हैं—यह हमारी भूल है। जो इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे देखा जायगा, वह सत् कैसे होगा? जो सबको देखनेवाला (प्रकाशित करनेवाला) है, उसको कौन देख सकता है? अत: उस वास्तविक सत्ताका अनुभव करना हो तो साधक बाहर-भीतरसे चुप हो जाय, कुछ भी चिन्तन न करे।

१०. शरणागति

जिसमें विचारकी प्रधानता नहीं है, प्रत्युत श्रद्धा-विश्वासकी प्रधानता है, ऐसा साधक ‘मैं संसारका नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है, प्रत्युत मैं परमात्माका हूँ और परमात्मा मेरे हैं’—इस प्रकार संसारसे विमुख होकर परमात्माके सम्मुख हो जाय अर्थात् परमात्माके शरण हो जाय।

जब साधक अपनेको किसी साधनके योग्य नहीं मानता अर्थात् अपनी शक्तिसे कुछ कर नहीं सकता और परमात्माको प्राप्त किये बिना रह नहीं सकता, तब वह शरणागतिका अधिकारी होता है१। जैसे नींद स्वाभाविक आती है, उसके लिये कोई परिश्रम (अभ्यास) नहीं करना पड़ता, ऐसे ही जब साधक संसारसे निराश हो जाता है और परमात्माकी आशा छूटती नहीं, तब वह स्वाभाविक ही परमात्माके शरण हो जाता है। शरण होनेके लिये उसको कोई अभ्यास नहीं करना पड़ता। कारण कि शरण होनेमें किसी करणकी जरूरत नहीं है, प्रत्युत भावकी जरूरत है। भाव स्वयंका होता है, किसी करणका नहीं। जैसे, कन्याका विवाह होता है तो ‘अब मैं पतिकी हूँ’ ऐसा भाव होते ही उसका माँ-बापसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और पतिके साथ सम्बन्ध हो जाता है। पतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेमें किस करणकी जरूरत है? किस अभ्यासकी जरूरत है? अर्थात् किसी भी करणकी, अभ्यासकी जरूरत नहीं है। ‘मैं पतिकी हूँ’—यह मान्यता (स्वीकृति) स्वयंकी है, किसी करणकी नहीं२। मन-बुद्धि प्रकृतिके अंश हैं और स्वयं परमात्माका अंश है। अत: परमात्माके शरण होनेमें मन-बुद्धि आदि किसीकी किञ्चिन्मात्र भी जरूरत नहीं है, प्रत्युत स्वयंकी जरूरत है। परमात्माके शरण स्वयं होता है, मन-बुद्धि नहीं। तात्पर्य है कि परमात्माकी प्राप्तिमें बोध और भावकी अपेक्षा है, करणकी अपेक्षा नहीं है। जहाँ स्वयंसे काम होता है, वहाँ करणकी अपेक्षा नहीं होती।

एक ‘पर’ का आश्रय (पराश्रय) है और एक ‘स्व’ का आश्रय (स्वाश्रय) है। आठ भेदोंवाली अपरा प्रकृति (पंचमहाभूत, मन, बुद्धि तथा अहंकार) अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म, तथा कारण—तीनों शरीर तथा संसार ‘पर’ है और इनका आश्रय ‘पराश्रय’ है। क्रिया और पदार्थका आश्रय स्थूल-शरीरका आश्रय है, मन-बुद्धिका अर्थात् चिन्तन, मनन, ध्यान, आदिका आश्रय सूक्ष्मशरीरका आश्रय है और अहङ्कारका, स्वभावका एवं समाधिका आश्रय कारण शरीरका आश्रय है।

स्वरूपका आश्रय भी ‘स्वाश्रय’ है और परमात्माका आश्रय भी ‘स्वाश्रय’ है* कारण कि ‘स्व’ के दो अर्थ होते हैं—स्वयं (स्वरूप) और स्वकीय। परमात्मा स्वकीय हैं; क्योंकि उनका हमारे साथ अखण्ड सम्बन्ध है। तात्पर्य है कि जो किसी भी देश, काल, क्रिया, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति, घटना आदिमें हमारेसे अलग नहीं हो सकता और हम उससे अलग नहीं हो सकते, वही ‘स्वकीय’ (अपना) हो सकता है। जो प्रत्येक देश, काल, क्रिया, वस्तु आदिमें निरन्तर हमारेसे अलग हो रहा है, उसका आश्रय (पराश्रय) लेनेके कारण ही स्वकीयका आश्रय (स्वाश्रय) अनुभवमें नहीं आ रहा है।

जीवके बन्धनका मुख्य कारण है—अहंकारका आश्रय (पराश्रय)। अहङ्कारका आश्रय ही ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है—‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३। २१)। अहंकारका संग ही गुणोंका संग है; क्योंकि अहंकार भी सात्त्विक, राजस और तामस—तीनों गुणोंवाला होता है—‘वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिवृत्’ (श्रीमद्भा० ११। २४। ७)। अहङ्कारका आश्रय लेनेसे जीव अपनेको और अहम् को अलग-अलग नहीं देखता, प्रत्युत एक ही देखता है। अत: उसमें परिच्छिन्नता, व्यक्तित्व, पराधीनता, अभाव, बन्धन, कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि दोष आ ही जाते हैं। अहङ्कारका आश्रय छूटते ही सब दोष निवृत्त हो जाते हैं। अहङ्कारका आश्रय (पराश्रय) छोड़नेके लिये ‘निराश्रय’ अथवा ‘स्वाश्रय’ होना आवश्यक है।

कर्मयोगमें ‘निराश्रय’ अर्थात् कर्मफलके आश्रयका त्याग होता है—‘अनाश्रित: कर्मफलम्’ (गीता ६। १); ‘त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रय:’ (गीता ४।२०)। जो भी उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तु है, वह सब ‘कर्मफल’ है। कर्मफलका आश्रय लेनेसे बार-बार जन्म-मरण होता है और मिलता कुछ नहीं—‘फले सक्तो निबध्यते’ (गीता ५। १२)। कारण कि प्रत्येक कर्मका आदि और अन्त होता है, फिर उससे मिलनेवाला फल अविनाशी कैसे हो सकता है? निराश्रय होते ही स्वत:सिद्ध ‘स्वाश्रय’ (स्वरूपके आश्रय)का अनुभव हो जाता है।

ज्ञानयोगमें ‘स्वाश्रय’ अर्थात् स्वरूपका आश्रय होता है। स्वरूपके आश्रयसे साधकको मुक्ति प्राप्त होती है। परन्तु स्वरूपके आश्रयमें अहंकारका लेश रह सकता है; क्योंकि इसमें मुक्ति (स्वतन्त्रता)का अभिमानी रह जाता है। इसीलिये गीताने ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (मैं ब्रह्म हूँ)को ऊँचा नहीं माना है, प्रत्युत ‘वासुदेव: सर्वम्’ (सब कुछ परमात्मा ही हैं) को ऊँचा माना है; क्योंकि इसमें अहंकार (व्यक्तित्व) सर्वथा नहीं रहता।

भक्तियोगमें ‘स्वाश्रय’ अर्थात् स्वकीय परमात्माका आश्रय होता है। ‘स्व’ (स्वरूप)का आश्रय लेनेकी अपेक्षा ‘स्वकीय’ का आश्रय लेना श्रेष्ठ है; क्योंकि ‘स्व’ का आश्रय लेनेसे मनुष्य मुक्ति (अखण्डरस) प्राप्त कर सकता है, पर अलौकिक प्रेम (अनन्तरस) प्राप्त नहीं कर सकता१। प्रेमकी प्राप्ति स्वकीय परमात्माका आश्रय लेनेसे ही होती है। प्रेम प्राप्त होनेपर अहंकार सर्वथा नष्ट हो जाता है२।

११. चुप-साधन

परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ साधन है—चुप होना अर्थात् कुछ भी चिन्तन न करना। यह सर्वोपरि करण-निरपेक्ष साधन है। चिन्तन करनेसे ही संसारका सम्बन्ध चिपकता है। कारण कि चिन्तन करने, वृत्ति लगानेका अर्थ है—नाशवान्, परिवर्तनशील वस्तुको महत्त्व देना। नाशवान् को महत्त्व देना, उसकी आवश्यकता मानना, उसकी सहायता लेना ही तत्त्वप्राप्तिमें मुख्य बाधा है। अविनाशीकी प्राप्ति नाशवान् के द्वारा नहीं होती, प्रत्युत नाशवान् के त्यागसे होती है। जडके द्वारा चेतनकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? असत् के द्वारा सत् की प्राप्ति कैसे हो सकती है? परिवर्तनशीलके द्वारा अपरिवर्तनशीलकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? क्षणभंगुरके द्वारा सर्वथा निर्विकार तत्त्वकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? नाशवान्, जड, असत्, परिवर्तनशील, क्षणभंगुरसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर तत्त्वकी प्राप्ति स्वत: ही है! इसलिये नाशवान् को महत्त्व देनेका, उसकी सहायता लेनेका भाव साधकको आरम्भसे ही नहीं रखना चाहिये। शास्त्रमें आया है—‘देवो भूत्वा देवं यजेत्’ ‘देवता होकर देवताका पूजन करे।’ अत: अक्रिय एवं अचिन्त्य होकर ही अक्रिय एवं अचिन्त्य तत्त्वको प्राप्त करना चाहिये।

गीतामें आया है—

‘आत्मसंस्थं मन: कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्।

(६। २५)

‘परमात्मस्वरूपमें मन (बुद्धि)को सम्यक् प्रकारसे स्थापन करके फिर कुछ भी चिन्तन न करे।’

तात्पर्य है कि सम्पूर्ण देश, काल, क्रिया, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति, घटना आदिमें एक ही परमात्मतत्त्व ‘है’ (सत्ता)-रूपसे ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है। देश, काल आदिका तो अभाव है, पर परमात्मतत्त्वका नित्य भाव है। इस प्रकार साधक पहले मन-बुद्धिसे यह निश्चय कर ले कि ‘परमात्मतत्त्व है’। फिर इस निश्चयको भी छोड़ दे और चुप हो जाय अर्थात् कुछ भी चिन्तन न करे। न तो संसारका चिन्तन करे, न स्वरूपका चिन्तन करे और न परमात्माका ही चिन्तन करे। कुछ भी चिन्तन करेगा तो संसार आ ही जायगा। कारण कि कुछ भी चिन्तन करनेसे चित्त (करण) साथमें रहेगा। करण साथमें रहेगा तो संसारका त्याग नहीं होगा; क्योंकि करण भी संसार ही है। इसलिये ‘न किञ्चिदपि चिन्तयेत्’ (कुछ भी चिन्तन न करे)—इसमें करणसे सम्बन्ध-विच्छेद है; क्योंकि जब करण साथमें नहीं रहेगा, तभी असली ध्यान होगा। सूक्ष्म-से-सूक्ष्म चिन्तन करनेपर भी वृत्ति रहती ही है, वृत्तिका अभाव नहीं होता। परन्तु कुछ भी चिन्तन करनेका भाव न रहनेसे वृत्ति स्वत: शान्त हो जाती है। अत: साधकको चिन्तनकी सर्वथा उपेक्षा करनी है।

कुछ भी चिन्तन न करनेके बाद यदि अपने-आप कोई चिन्तन आ जाय तो साधक उससे न राग करे, न द्वेष करे; न उसको अच्छा माने, न बुरा माने और न अपनेमें माने। चिन्तन करना नहीं है, पर चिन्तन हो जाय तो उसका कोई दोष नहीं है। अपने-आप हवा बहती है, सरदी-गरमी आती है, वर्षा होती है तो उसका हमें कोई दोष नहीं लगता। दोष तो करनेका लगता है। अत: चिन्तन हो जाय तो उसकी उपेक्षा रखे, उसके साथ अपनेको मिलाये नहीं अर्थात् ऐसा न माने कि चिन्तन मेरेमें होता है और मेरा होता है। चिन्तन मनमें होता है और मनके साथ मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है।

साधकमें चिन्तन न करनेका भी आग्रह नहीं होना चाहिये। उसमें न मन लगानेका आग्रह हो, न मन हटानेका आग्रह हो; न मनको स्थिर करनेका आग्रह हो, न मनकी चंचलता मिटानेका आग्रह हो; न किसी वृत्तिको लानेका आग्रह हो, न किसी वृत्तिको हटानेका आग्रह हो; न आँख-कान खोलनेका आग्रह हो, न आँख-कान बन्द करनेका आग्रह हो; न कुछ करनेका आग्रह हो, न कुछ नहीं करनेका आग्रह हो—‘नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन’ (गीता ३। १८)। इस प्रकार कोई भी आग्रह न रखकर साधक उदासीन हो जाय तथा चुप हो जाय—

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।

गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥

(गीता १४। २३)

‘जो उदासीनकी तरह स्थित है और जो गुणोंके द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता तथा गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं—इस भावसे जो अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है और स्वयं कोई भी चेष्टा नहीं करता।’

जैसे नींद लेनेके लिये कोई उद्योग, परिश्रम नहीं करना पड़ता, प्रत्युत स्वत:-स्वाभाविक नींद आती है, ऐसे ही चुप होनेके लिये कोई उद्योग नहीं करना है, प्रत्युत स्वत:-स्वाभाविक चुप, शान्त हो जाना है। साधक दिनमें कई बार, काम करते-करते एक-दो सेकेण्डके लिये भी चुप, शान्त हो जाय तो उसको वास्तवमें चुप होना आ जायगा अर्थात् जडतासे सम्बन्ध-विच्छेद तथा स्वत:सिद्ध तत्त्वका अनुभव हो जायगा। फिर वह सब कार्य करते हुए भी निरन्तर चुप रहेगा, यही समाधिसे भी ऊँची ‘सहजावस्था’ है।

उत्तमा सहजावस्था मध्यमा ध्यानधारणा।

कनिष्ठा शास्त्रचिन्ता च तीर्थयात्राऽधमाऽधमा॥

अवस्थाके संस्कारवालोंको समझानेके लिये इसको ‘सहजावस्था’ कह देते हैं, पर वास्तवमें यह अवस्था नहीं है, प्रत्युत अवस्थातीत है। कारण कि अवस्था प्रकृतिमें होती है, तत्त्वमें नहीं। वास्तवमें चुप-साधनसे साधक सहजावस्था (सहज समाधि), तत्त्वज्ञान, जीवन्मुक्ति, भगवद्दर्शन आदि जो चाहता है, वही उसको मिल जाता है। चुप होनेसे साधक स्थूल, सूक्ष्म और कारण—तीनों शरीरोंसे सुगमतापूर्वक अतीत हो जाता है तथा उसका अहम् अपने-आप मिट जाता है। कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि किसी भी योगमार्गका साधक क्यों न हो, चुप-साधन सभीके लिये अत्यन्त उपयोगी है। यह चुप-साधन सभी शक्तियोंका खजाना है; क्योंकि सम्पूर्ण शक्तियाँ अक्रिय तत्त्वसे ही पैदा होती हैं और उसीमें लीन होती हैं। इस साधनसे एक विलक्षण शान्ति मिलती है, जिससे राग-द्वेषादि दोषोंको दूर करनेकी सामर्थ्य स्वत: आती है और अनुकूलता-प्रतिकूलताका असर नहीं पड़ता। इतना ही नहीं, जो लाभ धर्ममेघ समाधिसे भी नहीं होता, वह लाभ चुप-साधनसे हो जाता है। तात्पर्य है कि चुप-साधन सम्पूर्ण साधनोंका अन्तिम साधन है, जिससे पूर्णता हो जाती है अर्थात् ‘वासुदेव: सर्वम्’ (सब कुछ परमात्मा ही हैं)—ऐसा अनुभव हो जाता है*।

शंका—करणनिरपेक्ष साधनका जो विवेचन हुआ है, उसका चिन्तन-मनन करेंगे, तभी तो अपने विवेकका आदर होगा! चिन्तन-मनन मन-बुद्धि (करण)से ही होता है, फिर यह करणनिरपेक्ष साधन कैसे हुआ?

समाधान—साधनको ‘करणनिरपेक्ष’ (विवेकप्रधान) कहा गया है, ‘करणरहित’ (क्रियारहित) नहीं। करणनिरपेक्ष साधनमें जबतक साधकमें किञ्चित् भी परिच्छिन्नता है, तबतक वह चिन्तन-मनन करता है, पर उसमें मुख्यता चिन्तन-मनन करनेकी अर्थात् तत्त्वमें मन-बुद्धि लगानेकी न होकर विवेककी ही होती है। अचिन्त्य तत्त्वकी तरफ दृष्टि रहनेसे उसमें विवेकका आदर मुख्य होता है। तात्पर्य है कि इस विवेचनका लक्ष्य चिन्तन-मनन, ध्यान, एकाग्रता, समाधि आदिकी तरफ नहीं है, प्रत्युत चिन्तन-मनन आदिसे अतीत तथा इनको प्रकाशित करनेवाला जो वास्तविक तत्त्व है, उसकी तरफ है।

वास्तवमें विवेकका आदर करनेके लिये चिन्तन-मनन अथवा अभ्यास करनेकी जरूरत ही नहीं है, प्रत्युत गलत मान्यताको मिटाकर वास्तविक बातकी स्वीकृति करनेमात्रकी जरूरत है। अभ्यास करणोंसे होता है और स्वीकृति स्वयंसे होती है। अभ्याससे तत्त्वबोध कभी हुआ नहीं, होगा नहीं, होना सम्भव ही नहीं। कारण कि अभ्याससे एक नयी अवस्था बनती है तथा परिच्छिन्नता और दृढ़ होती है, फिर उससे अवस्थातीत तथा अपरिच्छिन्न तत्त्वकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? तात्पर्य है कि केवल गलत मान्यताका निषेध करना है, अभ्यास नहीं करना है।

करणसापेक्ष साधनमें भी विवेक रहता है और करणनिरपेक्ष साधनमें भी करण रहता है। परन्तु करणसापेक्ष साधनमें करण (क्रिया)की प्रधानता रहती है तथा करणनिरपेक्ष साधनमें विवेककी प्रधानता रहती है।

करणसापेक्ष साधनकी महिमा भी विवेकके कारण ही है, करणके कारण नहीं। विवेकके बिना करण अन्धा है। अगर करणके साथ विवेक न हो तो करणसापेक्ष साधन चलेगा ही नहीं। इसीलिये साधनको ‘करणरहित’ न कहकर ‘करणसापेक्ष’ अथवा करणनिरपेक्ष कहा गया है। अगर करणसापेक्ष साधनमेंसे विवेक निकाल दिया जाय तो जडता आ जायगी अर्थात् साधन बनेगा ही नहीं और करणनिरपेक्ष साधनमेंसे करण निकाल दिया जाय तो चिन्मयता आ जायगी अर्थात् बोध हो जायगा, साधन सिद्ध हो जायगा। विवेकके बिना करण जड, पत्थर है और करणके बिना विवेक बोध है। चिन्मयता (बोध)की प्राप्तिमें जडकी मानी हुई सत्ता ही बाधक है।

विवेक आधा सत् और आधा असत् है अर्थात् विवेकमें सत्-असत् दोनों हैं, पर करण पूरा असत् ही है! विवेकमें सत्-असत् दोनों रहनेसे असत् तो छूट जायगा और सत् रह जायगा। अत: विवेकमें तो ग्राह्य (सत्) और त्याज्य (असत्) दोनों अंश रहते हैं, पर करणमें केवल त्याज्य अंश (असत्) ही रहता है। अत: विवेक तो बोधमें परिणत होता है और करणका सम्बन्ध-विच्छेद होता है, जो कि पहलेसे ही है। तात्पर्य यह हुआ कि विवेकमें जडके त्यागकी सामर्थ्य है, पर करणमें जडके त्यागकी सामर्थ्य नहीं है; क्योंकि करण खुद जड ही है।

करणसापेक्ष और करणनिरपेक्ष साधनमें भेद

एक निर्माण होता है और एक अन्वेषण होता है। निर्माण उस वस्तुका होता है, जो पहले न हो तथा कृतिसाध्य हो और अन्वेषण उस वस्तुका होता है, जो पहलेसे ही स्वत:सिद्ध हो। करणसापेक्ष साधनमें अभ्यासके द्वारा एक नयी वस्तुका निर्माण होता है और करणनिरपेक्ष साधनमें अवस्थातीत तथा नित्यप्राप्त तत्त्वका अन्वेषण होता है—‘ह्यतत्त्यजन्तो मृगयन्ति सन्त:’ (श्रीमद्भा० १०। १४। २८); ‘तत: पदं तत्परिमार्गितव्यम्’ (गीता १५।४)।

करणसापेक्ष साधनकी मुख्य बात है—मन-बुद्धि (करण)को परमात्मामें लगानेसे ही उनकी प्राप्ति होती है। करणनिरपेक्ष साधनकी मुख्य बात है—नित्यप्राप्त परमात्माकी प्राप्ति करणके द्वारा नहीं होती, प्रत्युत करणके त्यागसे स्वत: होती है।

करणसापेक्ष साधनमें बुद्धिकी प्रधानता होती है; अत: उसमें ब्रह्म, ईश्वर, जीव, प्रकृति, जगत् आदि सब बुद्धिके विषय होते हैं। करणनिरपेक्ष साधनमें विवेककी प्रधानता होती है। करणके उपयोगमें तो विवेककी आवश्यकता है, पर विवेकके उपयोगमें करणकी आवश्यकता नहीं है।

करणसापेक्ष साधनमें करण (बुद्धि)-से सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर बोध होता है और करणनिरपेक्ष साधनमें विवेक ही बोधमें परिणत हो जाता है; क्योंकि विवेक नित्य है और करण अनित्य है।

ज्ञानमयी वृत्तिसे जगत् को ब्रह्ममय देखना अर्थात् वृत्तियोंको लेकर चेतनको देखना करणसापेक्ष साधन है और विवेकके द्वारा वृत्तियोंकी उपेक्षा करके स्वत:सिद्ध स्वरूपमें स्थित होना करणनिरपेक्ष साधन है। जैसे, तुलसीसे बनी मालामें मणियोंके मध्यमें सूतको देखना अर्थात् मणियोंको साथ रखते हुए सूतको देखना करणसापेक्ष साधन है और आरम्भमें मणियोंके मध्यमें सूतको देखकर फिर मणियोंको छोड़ देना अर्थात् केवल सूतको देखना करणनिरपेक्ष साधन है।

मैं, तू, यह और वह—इन चारोंमें ‘है’ (सत्ता) समान है; परन्तु ‘मैं’ का साथ होनेसे वह ‘है’ एकदेशीय ‘हूँ’ बन जाता है। ‘मैं’ को लेकर ‘है’ को देखना करणसापेक्ष साधन है। अत: ‘मैं ब्रह्म हूँ’—यह मान्यता (बुद्धिसे होनेके कारण) करणसापेक्ष है और ‘मैं नहीं है, ब्रह्म ही है’—यह मान्यता (स्वयंसे होनेके कारण) करणनिरपेक्ष है।

रस्सीमें साँप दीखता है—इसमें रज्जूपहित (रज्जुकी उपाधिवाला) चेतन ‘अधिष्ठान’ है, साँप ‘अध्यस्त’ है और रस्सीमें साँपका दीखना ‘अध्यास’ है। अध्यस्त वस्तुको लेकर अधिष्ठानका ज्ञान करना करणसापेक्ष साधन है और विवेककी प्रधानतासे अध्यस्त वस्तुका बाध (अत्यन्त अभावका अनुभव) करके अधिष्ठान (चेतन तत्त्व)में स्थित होना करणनिरपेक्ष साधन है।

करणसापेक्ष साधनमें अभ्यास मुख्य है और करणनिरपेक्ष साधनमें विवेकका आदर मुख्य है। अभ्यासमें क्रिया है और विवेक क्रियारहित है।

करणसापेक्ष साधनमें ‘क्रिया’ (करने)की मुख्यता है और करणनिरपेक्ष साधनमें ‘भाव’ (मानने) और ‘बोध’ (जानने)की मुख्यता है।

करणसापेक्ष साधनमें अभ्यास मुख्य होनेके कारण तत्काल सिद्धि नहीं मिलती१ और करणनिरपेक्ष साधनमें विवेकका आदर मुख्य होनेके कारण तत्काल सिद्धि मिलती है। कारण कि करणसापेक्ष साधनमें तो एक अवस्था बनती है, पर करणनिरपेक्ष साधनमें अवस्था नहीं बनती, प्रत्युत अवस्थासे सम्बन्ध-विच्छेद होता है तथा अवस्थातीत स्वत:सिद्ध तत्त्वका अनुभव होता है।

करणसापेक्ष साधनमें मुमुक्षाकी मुख्यता है और करण-निरपेक्ष साधनमें जिज्ञासाकी मुख्यता है। मुमुक्षामें बन्धनसे छूटनेकी इच्छा रहती है और जिज्ञासामें तत्त्वको जाननेकी इच्छा रहती है। अत: मुमुक्षामें बन्धनके दु:खकी प्रधानता है और जिज्ञासामें सत्-असत् के विवेककी प्रधानता है।

मनको भगवान् में लगाना करणसापेक्ष साधन है और संसारके सम्बन्धका निषेध करके ‘मैं भगवान् का हूँ तथा भगवान् मेरे हैं’—इस प्रकार अपने-आपको भगवान् में लगाना करणनिरपेक्ष साधन है।

करणसापेक्ष साधनमें मनको साथ लेकर स्वरूपमें स्थिति होती है—‘यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।’ (गीता ६।१८); अत: मनके साथ सम्बन्ध रहनेसे योगभ्रष्ट होनेकी सम्भावना रहती है—‘योगाच्चलितमानस:’ (गीता ६। ३७)। परन्तु करणनिरपेक्ष साधनमें मनके साथ सम्बन्ध न होनेके कारण योगभ्रष्ट (चलितमना) होनेकी सम्भावना रहती ही नहीं। करणनिरपेक्ष साधनमें पहलेसे ही मनके साथ सम्बन्धका त्याग रहता है।

जैसे आरम्भमें कोई साधक सकाम होता है और कोई निष्काम होता है, पर सकाम साधकको अन्तमें निष्काम होनेपर ही तत्त्वका अनुभव होता है। ऐसे ही आरम्भमें कोई करणसापेक्ष (क्रियाप्रधान) साधन करता है और कोई करणनिरपेक्ष (विवेकप्रधान) साधन करता है, पर करणसापेक्ष साधन करनेवालेको अन्तमें करणनिरपेक्ष होनेपर ही तत्त्वका अनुभव होता है; क्योंकि तत्त्व करणरहित है। दोनोंमें भेद इतना ही है कि करणसापेक्ष साधनमें पराधीनता रहती है, अहम् का जल्दी नाश नहीं होता, साधक अन्तकालमें योगभ्रष्ट हो सकता है और तत्त्वकी प्राप्ति देरीसे तथा कठिनतासे होती है। परन्तु करणनिरपेक्ष साधनमें स्वतन्त्रता रहती है, अहम् का नाश जल्दी होता है, योगभ्रष्ट होनेकी सम्भावना रहती ही नहीं और तत्त्वकी प्राप्ति जल्दी तथा सुगमतासे हो जाती है*।