कर्म किसके लिये?

आप कृपा करके इस बातको समझनेकी चेष्टा करें, इसका दुरुपयोग न करें। थोड़ी गहरी बात है। वह यह है कि अपने लिये कुछ करना नहीं है। ‘अपने’ का अर्थ है—स्वयं अर्थात् परमात्माका अंश चेतन, स्वयंके लिये करना कुछ नहीं है। करना जितना होता है, वह सब प्रकृतिके सम्बन्धसे होता है। प्रकृतिके सम्बन्धके बिना करना है ही नहीं। अत: जो कुछ करना है, वह सब शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिके लिये करना है, संसारके लिये करना है, भगवान् के लिये करना है; परन्तु अपने लिये कुछ करना नहीं है—यह सार बात है।

हम जो भी कर्म करते हैं, उस कर्मका आरम्भ और अन्त होता है। जिसका आरम्भ और अन्त होता है, उसके साथ हमारा सम्बन्ध नहीं है; क्योंकि स्वयंका आरम्भ और अन्त नहीं होता। अनन्त जन्मोंसे यह जीव चला आ रहा है, पर इसका कभी आरम्भ और अन्त नहीं हुआ है। यह अनादि और अनन्त है। अत: इसके लिये करना नहीं होता। करना मात्र संसारके लिये होता है।

मेरेको कुछ मिले—यह इच्छा होते ही बन्धन हो जाता है। मिली हुई चीज कभी अपने साथ रहनेवाली है ही नहीं। कृपा करके इस बातपर थोड़ा ध्यान दो। हमें कुछ भी मिल जाय, धन मिल जाय, मान मिल जाय; विद्या,पद, अधिकार मिल जाय, पर ये मिली हुई चीजें हमारे साथ रह नहीं सकतीं। परन्तु परमात्मा सबको मिले हुए हैं और सदा सबके साथ रहते हैं, कभी बिछुड़ते नहीं। उनको न जाननेसे ही उनका अभाव दीखता है। किसी देशमें, किसी कालमें, किसी वस्तुमें, किसी व्यक्तिमें, किसी क्रियामें, किसी घटनामें, किसी परिस्थितिमें परमात्मा न हों—यह है ही नहीं, हो सकता ही नहीं। वे तो निरन्तर रहनेवाले हैं और उनको ही प्राप्त करना है। मिलने और बिछुड़नेवाली चीजोंका आश्रय लेना बड़े भारी अनर्थका कारण है। मिले हुए शरीर, इन्द्रियाँ, अन्त:करण आदि अपने कामके हैं ही नहीं। इनको अपने लिये मानते हैं—यह बहुत बड़ी गलती है। इस विषयको ठीक तरहसे समझना चाहिये।

भगवान् कहते हैं—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५। ७) ‘यह जीव मेरा ही अंश है।’ यह जीव चेतन, अमल और सहज सुखराशि है—‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥’ (मानस, उत्तर० ११७। १)। इसमें जडता है ही नहीं तो फिर इसके लिये क्या करना बाकी रहा? इसमें मल है ही नहीं तो फिर दूर क्या करोगे? यह सहज सुखराशि है तो फिर इसमें सुख कहाँसे लाओगे? मिली हुई सब चीजें बिछुड़नेवाली हैं। मिली हुई चीजोंका जो आश्रय लेना है, आधार लेना है, उनसे सुखकी आशा रखना है, उनको महत्त्व देना है—यह महान् पतनका कारण है। आप कृपा करके इस विषयको समझ लो तो बहुत ही आनन्दकी बात है।

मिली हुई चीज हमारे साथ रहनेवाली नहीं है; क्योंकि मिली हुई उसको कहते हैं, जो पहले नहीं थी और पीछे भी नहीं रहेगी। परन्तु परमात्मा और उनका अंश जीवात्मा (स्वयं) पहले भी थे और पीछे भी रहेंगे। शरीर, धन-सम्पत्ति, घर-परिवार आदि मिली हुई वस्तुओंका आश्रय लेना, इनको महत्त्व देना खास पतनकी बात है। नित्य-निरन्तर रहनेवालेके लिये ये मिलकर बिछुड़नेवाली वस्तुएँ क्या काम आयेंगी? हाँ, इनका सदुपयोग किया जा सकता है। परन्तु इनका आश्रय लेना और इनसे सुखकी आशा रखना भूल है। खास भूल यही होती है कि हम मिली हुई चीजसे सुख लेते हैं। इस सुखकी आसक्ति ही बाँधनेवाली है। यह आसक्ति साधनको ऊँचा बढ़ने नहीं देती।

कोई भी काम करो, उसका न करनेसे ही आरम्भ होता है और न करनेमें ही उसकी समाप्ति होती है। अत: कर्मका आदि और अन्त होगा ही। ऐसे ही कर्म करनेसे जो कुछ मिलेगा, वह भी आदि-अन्तवाला होगा। क्रियाका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा पदार्थोंका भी संयोग और वियोग होता है। क्रिया और पदार्थ—यह प्रकृति है। प्रकृतिसे सर्वथा अतीत जो परमात्मतत्त्व है, उसीका साक्षात् अंश यह जीवात्मा है। अत: जो क्रियाओंमें और वस्तुओंमें आसक्त है और इनसे अपनी उन्नति मानता है, वह गलतीमें है।

यह बड़े भारी आश्चर्यकी बात है कि धन मिलनेसे हम अपनेको बड़ा मान लेते हैं! अगर हम धनसे बड़े हो गये तो धन बड़ा हुआ कि हम बड़े हुए? धनके बिना तो हम छोटे ही रहे! धन तो आपका कमाया हुआ है। धन आपके पास आता है और चला जाता है। वह आपके पास रहेगा तो आप चले जाओगे। वह साथ रहनेवाला नहीं है। ऐसे ही विद्या, योग्यता, पद, अधिकार आदिसे जो अपनेको बड़ा मानता है, वह बहुत बड़ी गलती करता है। वास्तवमें आप खुद इतने बड़े हैं कि आपसे ही ये वस्तुएँ सार्थक होती हैं। आपसे ही रुपये सार्थक होते हैं, आपसे ही भोजन सार्थक होता है। आपसे ही कपड़े सार्थक होते हैं। संसारकी जितनी वस्तुएँ हैं, वे सब आपसे ही सार्थक होती हैं। आप इन वस्तुओंसे अपनेको बड़ा मानते हो—यह गलती है। मिली हुई चीजसे अपना महत्त्व समझना, अपनेको बड़ा मानना बहुत बड़ी गलती है। अगर यह गलती मिट जाय तो समता अपने-आप आ जायगी; क्योंकि समतामें हमारी स्थिति स्वत:—स्वाभाविक है। यह उद्योगसाध्य, कृतिसाध्य नहीं है। करनेकी आसक्तिको मिटानेके लिये ही कर्म करना है, कुछ पानेके लिये नहीं।

हमारा मान हुआ तो उसमें हम राजी हो गये और अपमान हुआ तो हम नाराज हो गये। थोड़ा गहरा विचार करो कि मान होनेसे हमें मिल क्या गया और अपमान होनेसे हमारी हानि क्या हो गयी? आने-जानेवाली वस्तुसे आपको कोई हानि-लाभ नहीं होता। अनादिकालसे कई सर्ग-प्रलय, महासर्ग-महाप्रलय हुए, पर आप स्वयं वे-के-वे ही रहे—‘भूतग्राम: स एवायम्’ (गीता ८। १९)। ऐसे निरन्तर रहनेवाले आपको मान मिल गया तो क्या हुआ? और अपमान मिल गया तो क्या हुआ? धन मिल गया तो क्या हुआ? और धन चला गया तो क्या हुआ? शरीर मिल गया तो क्या हुआ? और शरीर चला गया तो क्या हो गया? बीमारी आ गयी तो क्या हो गया? और बीमारी चली गयी तो क्या हो गया? ये सब तो आने-जानेवाले हैं—‘आगमापायिनोऽनित्या:’ (गीता २।१४)। आने-जानेवाले पदार्थोंसे राजी और नाराज होना बहुत बड़ी भूल है। इस भूलका अभी त्याग न हो सके तो न सही, पर इस बातको समझ तो लें। ठीक समझ लो तो स्वत:—स्वाभाविक त्याग हो जायगा। बालक टट्टी-पेशाब करके उसमें हाथ डालता है; क्योंकि वह समझता नहीं। परन्तु समझनेके बाद फिर छूयेगा क्या? छूनेपर हाथ धोयेगा। आप समझ लें कि ये मान, बड़ाई, सुख, आराम, पद, अधिकार आदि सब मलसे भी निकृष्ट हैं।

मिली हुई वस्तुओंसे केवल दूसरोंका हित करना है, अपने लिये कुछ नहीं करना है। गीता स्पष्ट कहती है—‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता:’ (१२।४) ‘सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें जिनकी रति है, ऐसे मनुष्य मेरेको ही प्राप्त होते हैं।’ जैसे लोभीकी धनमें, भोगीकी भोगोंमें रति (प्रीति) होती है, आकर्षण होता है, ऐसे ही हमारी रति, हमारी लगन, हमारा आकर्षण दूसरोंके हितमें होना चाहिये। सब काम दूसरोंके हितके लिये ही करना है, अपने लिये नहीं करना है। कारण कि अपने लिये करना बनता ही नहीं। प्रकृतिके सम्बन्धके बिना स्वयंमें कर्तापन है ही नहीं।

गाढ़ नींदमें अहङ्कार भी लुप्त हो जाता है, पर आप रहते हो। हमें यह बात बढ़िया मालूम दी है कि नींदसे पहले भी मैं था तथा नींदके बादमें भी मैं हूँ और नींदमें मेरेको कुछ पता नहीं था—इसका अनुभव तो होता है, पर नींदमें मैं नहीं था—इसका अनुभव नहीं होता। नींदमें मैं नहीं था और जागनेपर मैं उत्पन्न हो गया—ऐसा आप नहीं मानते। हमने शास्त्रोंकी कई बातें सुनी हैं, पर यह दृष्टान्त किसी पुस्तकमें आया हो—ऐसा हमें याद नहीं है। गाढ़ नींदमें शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंकार आदिका भान नहीं था—यह तो आप कह सकते हैं, पर गाढ़ नींदमें ‘मैं’ नहीं था—यह आप नहीं कह सकते। अपनी सत्ताका अनुभव करनेके लिये यह युक्ति बहुत बढ़िया है। गाढ़ नींदमें मेरेको कुछ भी पता नहीं था तो ‘कुछ भी पता नहीं था’—इसका तो पता था न? तात्पर्य है कि उस समयमें भी आप थे। ऐसे नित्य-निरन्तर रहनेवाले आपको आने-जानेवाली वस्तु क्या निहाल करेगी?

जो आया है, वह जायगा ही। जिसका संयोग हुआ है, उसका वियोग होगा ही। उसमें राजी-नाराज होओगे तो अपने कल्याणसे वञ्चित रह जाओगे—इसके सिवाय और कुछ नहीं होनेका है! हमने एक कहानी सुनी है। एक मकानमें गुरु और चेला रहते थे। एक दिन मकानके भीतर एक कुत्ता आ गया। चेला बोला कि महाराज! मकानमें कुत्ता आ गया, क्या करूँ? गुरुने कहा कि किवाड़ बन्द कर दो; क्योंकि उसको यहाँ तो कुछ मिलेगा नहीं और दूसरी जगह जा सकेगा नहीं। अपने पास कुछ है नहीं तो खायेगा क्या? और मकानके भीतर बन्द होनेसे दूसरोंको तंग करेगा नहीं; अत: किवाड़ बन्द कर दो। इसी तरह संसारमें जाते ही किवाड़ बन्द हो जाता है! तात्पर्य है कि जैसे कुत्ता कुछ खानेके लिये घरमें गया तो वहाँ भी कुछ नहीं मिला और घरके भीतर बन्द हो जानेसे बाहर भी नहीं जा सका तो वह दोनों तरफसे रीता रह गया! ऐसे ही आप संसारमें कुछ लेने जाओगे तो संसारमें कुछ मिलेगा नहीं और परमात्माकी तरफसे विमुख हो जाओगे; अत: दोनों तरफसे रीते रह जाओगे। हमें संसारसे कुछ लेना ही नहीं है—इस बातसे आप निहाल हो जाओगे। इस बातको काममें लानेका तरीका है—‘सर्वभूतहिते रता:’ अर्थात् प्राणिमात्रके हितमें रति हो जाय। तो क्या होगा इससे? हमारेमें जो लेनेकी इच्छा है, वह मिट जायगी। दूसरोंका हित करनेकी, उनको सुख पहुँचानेकी लगन लग जायगी। तो अपनी सुख लेनेकी इच्छा मिट जायगी। सुख लेनेकी इच्छा सर्वथा मिटते ही परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जायगी; क्योंकि आप जहाँ हैं, परमात्मा वहीं पूर्णरूपसे विद्यमान हैं, अंशरूपसे (अधूरे) नहीं। आपको (जीवात्माको) भी अंश तब कहते हैं, जब आप प्रकृतिके अंश शरीरके साथ सम्बन्ध जोड़ते हो। प्रकृतिके अंशके साथ सम्बन्ध न जोड़ो तो आप स्वयं अंशी हो।

संसारसे कुछ भी नहीं पाना है और केवल संसारके हितके लिये ही करना है। स्वयंके लिये कुछ करना है ही नहीं। मनमें जो करनेकी एक रुचि होती है, उस करनेकी रुचिको मिटानेके लिये ही करना है। अगर आप मान-सत्कार आदि लेते रहोगे तो यह करनेकी रुचि कभी मिटेगी नहीं। अपने परिवारके सुखके लिये करो, पर उनसे यह मत चाहो कि वे मुझे सुख देंगे। मैं तो परमात्माका अंश हूँ; अत: उनका दिया हुआ सुख शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धितक ही पहुँच सकता है, मेरेतक नहीं पहुँच सकता। मैंने एक गृहस्थाश्रमकी स्त्रीकी बात सुनी है। किसीने उससे कहा कि ये लोग तेरेको दु:ख देते हैं, तो उसने कहा कि मेरेतक दु:ख पहुँचता ही नहीं। कितना ही कष्ट दे दो, निन्दा कर दो, अपमान कर दो, वह मेरेतक पहुँचता ही नहीं। कष्ट, अपमान शरीरका होगा, निन्दा नामकी होगी, वे चेतन-तत्त्वतक कैसे पहुँच सकते हैं? अत: कुछ भी पानेकी इच्छा न रखकर केवल संसारके लिये करना है। केवल संसारके लिये करनेसे आत्मज्ञान हो जायगा, बोध हो जायगा। परमात्माकी प्राप्ति चाहो तो वह हो जायगी। मुक्ति चाहो तो मुक्ति हो जायगी, कल्याण हो जायगा, सदा रहनेवाला लाभ हो जायगा।

आपको शरीर, विद्या, बुद्धि, योग्यता आदि जो कुछ भी मिला है, वह सब-का-सब संसारसे मिला है। संसारसे मिले हुएको बिना शर्त संसारके भेंट कर दो। आप परमात्माके अंश हो; अत: आप परमात्माके शरण हो जाओ। उत्पन्न और नष्ट होनेवालेके शरण मत होओ, उसका आश्रय मत लो। गोस्वामीजी महाराज कहते हैं—

एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास।

एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास॥

(दोहावली २७७)

संसार आपका है नहीं, आपको मिला ही नहीं, आपतक पहुँचा ही नहीं। ऐसे संसारकी आशा, विश्वास, भरोसा रखना ही जीवकी जडता है, मूर्खता है—

यह बिनती रघुबीर गुसाईं।

और आस-बिस्वास-भरोसो,हरौ जीव-जड़ताई॥

(विनयपत्रिका १०३)

भगवान् से प्रार्थना करो तो जडता मिट जाय अथवा केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करो तो जडता मिट जाय। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, योग्यता आदि सब संसारके लिये हैं, अपने लिये हैं ही नहीं। उत्पन्न और नष्ट होनेवाली चीज अनुत्पन्न तत्त्वके लिये क्या काम आयेगी? थोड़ा विचार करो आप। यह जीव परमात्माका अंश है, चेतन है, अमल है, सहज सुखराशि है, अविनाशी है तो इसके लिये जड़, विनाशी चीज कैसे काम आयेगी? विनाशी चीज तो विनाशी संसारके हितके लिये, सुखके लिये, आरामके लिये, खर्च करनेके लिये मिली है। उसको आप अपने लिये मानो तो आप जरूर फँस जाओगे, इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है। मान-बड़ाई मिलनेसे आप राजी हो गये—यह कितना बड़ा अँधेरा है! कारण कि जो मिला है, वह बिछुड़ जायगा, रहेगा नहीं। शरीरको अपना मान लिया तो अब सब बीमारियाँ आयेंगी; क्योंकि मूलमें भूल हो गयी। जोड़ लगाते समय पहली पंक्तिके जोड़में ही भूल हो जाय और आगेकी पंक्तियोंमें बड़ी सावधानीसे जोड़ लगाया जाय तो क्या वह जोड़ सही हो जायगा? आरम्भमें ही भूल हो जाय तो फिर आगे भूल-ही-भूल होगी। एक कहानी याद आ गयी। एक आदमीको ऊँटपर चढ़ाया और कहा कि कहीं जानेसे पहले हमारा ऊँट तीन बार कूदेगा; अत: सावधान रहना। उसने कहा कि मैं तो पहलेमें ही कूद जाऊँगा, दो बार कूदना बच जायगा! अगर पहलेमें ही भूल हो गयी तो फिर भूल-ही-भूल होगी। इसलिये पहलेमें ही भूल मत करो, शरीरको अपना मत मानो और उसके द्वारा सबकी सेवा करो, हित करो।