किसानोंके लिये शिक्षा

खेती करनेवाले तथा करानेवाले—दोनोंके लिये कुछ उपयोगी बातें लिखी जाती हैं। मेरी प्रार्थना है कि इन बातोंपर विशेष ध्यान दें।

खेतीमें हिंसा

लोगोंके मनमें यह बात जँची हुई है कि खेतीके जन्तु, कीड़े-मकोड़े मारनेसे अनाज बहुत पैदा होता है। यह बिलकुल वहमकी बात है। पहले ऐसी हत्या नहीं हुआ करती थी। पहले इतनी टिड्डी आया करती थी कि जैसे बादल हों और जमीनपर छाया हो जाती थी! उस समय लोग कहते कि इस साल वर्षा होगी और फसल अच्छी होगी; क्योंकि भगवान् हमारे लिये नहीं करेंगे, पर इन जीवोंके लिये तो करेंगे ही। इसलिये जिस साल टिड्डी आती थी, उस साल अकाल नहीं पड़ता था। वे तीन वर्ष लगातार आती थीं, फिर बारह वर्षतक नहीं आतीं। बारह वर्षके बाद फिर आती थीं। अब उस टिड्डीको मारकर नष्ट कर दिया! खेतोंमें तरह-तरहकी दवाइयाँ छिड़कते हैं, जिससे जन्तु मर जायँ। पहले चौमासेके दिनोंमें दीपकपर जितने जन्तु आते थे, उतने अब नहीं आते। परन्तु जन्तुओंको मारनेसे कभी भला नहीं होता। पहले गेहूँ-बाजराके क्या भाव थे और आज क्या भाव हैं? अगर जन्तुओंको मारनेसे अनाज ज्यादा पैदा होता है तो फिर आज अनाज सस्ता होना चाहिये। परन्तु अनाज महँगा क्यों हो गया? हत्याके कारण हो गया। अगर आप हत्या न करें तो इससे नुकसान नहीं होता।

आज आप मनुष्य हो, इसलिये जानवरोंको मारते हो। परन्तु कभी आपकी भी जानवर बननेकी बारी आयेगी और वे मनुष्य बनेंगे तो वे आपको मारेंगे। किये हुए कर्मोंका फल अवश्य भोगना पड़ता है—

अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।

नाभुक्तं क्षीयते कर्म जन्मकोटिशतैरपि॥

आप बड़े होकर छोटे जीवोंको मारते हो और बड़ोंसे कृपा चाहते हो, क्या यह न्याय है? सन्त-महात्मा हमारेपर कृपा करें, भगवान् हमारेपर कृपा करें, बड़े आदमी हमारेपर कृपा करें—ऐसा चाहनेका हक है आपका? अगर आप छोटोंपर कृपा करो तो बड़े भी आपपर कृपा करेंगे, नहीं तो आपको कृपा माँगनेका कोई हक नहीं है। जो छोटोंपर कृपा नहीं करते, उनपर बड़ोंको कृपा नहीं करनी चाहिये। परन्तु बड़े छोटोंपर कृपा करते ही रहते हैं, इसलिये आपको भी छोटोंपर कृपा करते रहना चाहिये।

आप तरह-तरहकी दवाइयाँ खरीदकर कीड़ोंको मारते हो, क्या यह बड़ोंका काम है? समर्थ तो वह है, जो दूसरोंको भी समर्थ बना दे, बड़ा बना दे। जो दूसरोंका नाश करे, वह समर्थ नहीं है, प्रत्युत महान् असमर्थ है! लोमड़ी अगर ब्याई हुई हो और कोई आदमी पासमें आ जाय तो वह पकड़कर फाड़ देती है; क्योंकि उसके मनमें भय रहता है कि मेरे बच्चोंका कहीं नुकसान न हो जाय! तो क्या लोमड़ी समर्थ हो गयी? समर्थ वह है, जो सबकी रक्षा करे, सबका पालन करे। आपको भगवान् ने बुद्धि दी है, खेत दिये हैं, जमीन दी है, उसमें अनाज पैदा करो। यह दूसरोंको मारनेके लिये नहीं दी है।

खेतोंमें जो जहरीली दवाएँ डालते हैं, उनका अनाजपर बुरा असर पड़ता है, जिससे स्वास्थ्य खराब होता है। शहरोंमें भी पानीमें दवाई डाल देते हैं। पानीमें उसकी दुर्गन्ध आती है। उससे भी स्वास्थ्य खराब होता है। हिम्मटसर (नोखा) की बात है। घासको कीड़ोंसे बचानेके लिये उसमें दवा छिड़क दी, जिससे उस घासको खाकर गाय मर गयी। दवामें ऐसा जहर होता है, जिससे जानवर मर जाते हैं। ऐसी खतरनाक दवाओंसे आप अनाज पैदा करते हो तो उससे स्वास्थ्यका कितना नुकसान होगा?

खेतोंमें जो कचरा होता है, उसमें आग लगा देते हैं, जिससे छोटे-छोटे असंख्य जीव जलकर मर जाते हैं। रायड़ा आदिका जो कचरा हो, उसको जंगलमें फेंक दो तो घास पैदा होगी और खेतोंमें फेंक दो तो उसकी खाद बन जायगी। जंगलमें घास पैदा होगी तो गायोंको लाभ होगा। परन्तु उसमें आग लगाकर दूसरोंका नाश क्यों करते हो? आपको थोड़ी-सी आग लग जाय तो कैसी बुरी लगती है? पर आप आग लगाकर कितने जीवोंका नाश कर देते हो!

कीड़ी-नगरेको सींचनेके विषयमें भी एक बात ध्यान देनेकी है। गरमीके दिनोंमें जब तेज धूप हो, कीड़ियाँ बाहर नहीं हों, उस समय कीड़ी-नगरेके ऊपर सूखे काँटे (पायी) रख दे और उसके ऊपर मोटे-मोटे पत्थर रख दे। ऐसे ही जाड़ेके दिनोंमें जब रातमें तेज ठण्डी हो जाय, कीड़ियाँ बाहर नहीं हों, उस समय कीड़ी-नगरेके ऊपर काँटे रख दे। अगर कीड़ियाँ बाहर होंगी तो काँटोंमें पोई जायँगी, इसलिये जब कीड़ियाँ बिलके भीतर हों, तब काँटे रखे। काँटे नहीं रखनेसे कौवे, चिड़ियाँ, स्याल आदि आकर कीड़ियोंसहित अन्नको खा जाते हैं, जिससे आप करते हो पुण्य, हो जाता है पाप! काँटोंके ऊपर बड़े-बड़े पत्थर रख दे, नहीं तो स्याल आकर काँटोंको अलग कर देता है और अनाजसहित कीड़ियोंको खा जाता है।

आपसे प्रार्थना है कि कृपानाथ! जन्तुओंको मारना बन्द करो। पाप करके अपने लोक और परलोकका नाश मत करो।

गौरक्षा

खेती करनेवाले सज्जनोंको चाहिये कि वे गाय, बछड़ा, बैल आदिको बेचें नहीं। खेती और गायका परस्पर बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। खेतीसे गाय पुष्ट होती है और गायसे खेती पुष्ट होती है। गोबर और गोमूत्रसे जमीन बड़ी पुष्ट होती है। मैंने सौ-सौ वर्षोंकी ढाणियाँ तथा उनके खेतोंको देखा है, जो अभीतक पुराने नहीं हुए और उनमें खेती हो रही है। कारण कि उसमें गायें बैठती हैं, बैल बैठते हैं और उनके गोमूत्र तथा गोबरसे जमीन पुष्ट होती रहती है, खराब नहीं होती। अब विदेशी खाद लाकर खेतोंमें डालते हैं तो उससे आरम्भमें कुछ वर्ष खेती अच्छी होगी, पर कुछ वर्षोंके बादमें जमीन उपजाऊ नहीं रहेगी, निकम्मी हो जायगी। विदेशोंमें तो खादसे जमीन खराब हो गयी है और वे लोग बम्बईसे जहाजोंमें गोबर लादकर ले जा रहे हैं, जिससे गोबरसे जमीन ठीक हो जाय। गायोंके गोबर और गोमूत्रसे होनेवाली खाद बहुत बढ़िया होती है। गाँवोंमें तो भेड़-बकरी बैठनेके लिये पैसा देते हैं कि आज रात एवड़ (भेड़-बकरीके समूह) को हमारे यहाँ ही रखो, जिससे वहाँ खाद हो जाय। एवड़को रखनेके लिये उलटा पैसा देते हैं! गायका गोबर और गोमूत्र तो बड़ा पवित्र होता है। गोबरमें लक्ष्मीका और गोमूत्रमें गङ्गाका निवास है। घरमें किसीकी मृत्यु हो जाय अथवा बालक पैदा हो जाय तो घरकी शुद्धिके लिये गोमूत्र लाकर छिड़कते हैं, गोबरका चौका लगाते हैं। कोई मरनेवाला हो तो गोबरका चौका लगाकर उसपर सुलाते हैं। जब बालकका नामकरण करते हैं, तब गोबरका चौका लगाकर उसपर बालकको बैठाते हैं। इतनी पवित्र चीज पैदा करती हैं गायें! उन गायोंको ही आज खत्म कर रहे हैं, फिर गोबर कहाँसे मिलेगा? इसलिये खेती करनेवालोंसे कहना है कि गायोंको, बछड़ोंको बेचो मत। बूढ़े बैल और बूढ़ी गायोंकी बिक्री मत करो। उनको कसाइयोंके हाथ मत बेचो। गाय बूढ़ी हो गयी, बछड़ा नहीं देती, दूध नहीं देती, उसको बेच देते हो, फिर घरमें जो बूढ़ी माताएँ हैं, बूढ़े पिता हैं, उनको क्या करोगे? सेठ श्रीजयदयालजी गोयन्दका कहा करते थे कि जैसे गायोंके लिये पिंजरापोल खोलते हैं, ऐसे ही बूढ़ोंके लिये भी पिंजरापोल खोलना पड़ेगा! कोलायतमें मैंने अपनी आँखोंसे देखा है कि एक अन्धा और बहरा बूढ़ा घाटके पासमें ही गलीपर बैठा था और बार-बार ‘भूखाँ मरूँ रे!’ ऐसे कह रहा था। पूछनेपर पता चला कि एक छोटा छोरा उसको यहाँ लाया और छोड़कर भाग गया! अब अन्धा और बहरा बूढ़ा बेचारा कहाँ जाय! यह दशा हो रही है! कितनी स्वार्थपरता चल पड़ी है!

बम्बईमें देवनार-कसाईखानेमें मैंने देखा है कि वहाँ अच्छे-अच्छे, जवान-जवान बैल ट्रकोंमें भरकर लाये जाते हैं और खड़े कर दिये जाते हैं। दूर-दूरतक सींग-ही-सींग दीखते थे। ऐसे बैलोंको मशीनोंके द्वारा बड़ी बुरी तरहसे मारते हैं। जीते-जी उनका चमड़ा उतारा जाता है; क्योंकि जीते हुएका चमड़ा उतारा जाय तो वह बहुत नरम होता है। जो गायों और बैलोंको बेचते हैं, उनको यह हत्या लगती है!

नागौरके बैल बड़े नामी होते हैं। एक आदमीने थानेमें आकर शिकायत की कि मेरे बैलोंको गाड़ीमें जोतकर चोर ले गये हैं। उन्होंने कहा कि अभी घोड़ोंपर चढ़कर जाते हैं और बैलोंको छुड़ाते हैं। वह आदमी बोला कि घोड़ोंपर चढ़कर मेरे बैलोंको पकड़ा नहीं जा सकता। सिपाहियोंको उसकी बातपर विश्वास नहीं हुआ और वे उसके साथ घोड़ोंपर चढ़कर वहाँसे चल पड़े। कुछ दूर जानेपर वे बैल जाते हुए दिख पड़े। उस आदमीने देखा कि अगर मेरे बैलोंको पकड़ लिया तो मेरी बात झूठी हो जायगी। वह जोरसे चिल्लाया—‘अरे! रास खाँच थारे बापों री जोरसे!’ चोरोंने रास खींची और बैल इतनी तेजीसे भागे कि घोड़े पीछे रह गये! सिपाहियोंने कहा कि बैलोंको तो चोर ले गये न? वह बोला—बैल भले ही चले गये, पर मेरे बाड़ेकी आब (इज्जत) तो रह गयी! ऐसे बैल नागौर पट्टीके हुआ करते थे, जिनका आज नाश किया जा रहा है! उनके छोटे बछड़े-बछड़ियाँ बेच देते हैं। कारण कि गाय-बैलोंकी अपेक्षा बछड़े-बछड़ियोंका मांस विदेशोंमें बहुत महँगा बिकता है।

गाय और माय बेचनेकी नहीं होती। जबतक गाय दूध और बछड़ा देती है, बैल काम करता है, तबतक उनको रखते हैं। जब वे बूढ़े हो जाते हैं, तब बेच देते हैं। यह कितनी कृतघ्नताकी बात है! कितने पापकी बात है! गाँधीजीने ‘नवजीवन’ अखबारमें लिखा था कि बूढ़ा बैल जितना गोबर और गोमूत्र करता है, उससे कम खर्चा करता है। जितना घास खाता है, उतना गोबर और गोमूत्र कर देता है।

राजस्थानमें कई जगह ऐसा हुआ है कि बिजली चली जाती है, जिससे टोंटीमें जल आना बन्द हो जाता है और जलके बिना लोग दु:ख पाते हैं! पहले घरोंमें बैल होते, लाव (रस्सी) और चरस होता, जिससे कुएँमेंसे पानी निकाल लेते थे। अब बैल बेच दिये, फिर कुएँसे जल कैसे आये? मेहनत किये बिना खाने-पीनेकी आदत पड़ गयी। बस, टोंटी खोल दी और पानी आ गया। परन्तु बिना मेहनत मिलनेवाली चीज अधिक दिन चलेगी नहीं। वैज्ञानिकोंने कहा है कि एक समय ऐसा आनेवाला है, जब न बिजली मिलेगी, न पेट्रोल-डीजल! फिर क्या दशा होगी लोगोंकी? इसलिये आप लोगोंसे कहता हूँ कि गाय-बैलको, बछड़ा-बछड़ीको बेचो मत। अभी भी तेल महँगा हो रहा है और आप ट्रेक्टरोंसे तेल खर्च कर रहे हो। जब तेल नहीं मिलेगा, तब बिना ट्रेक्टरोंके खेती कैसे करोगे? बैलोंको तो खत्म कर रहे हो!

जब ट्रेक्टर चलता है, तब बड़ी हत्या होती है। खेतमें रहनेवाले कितने ही चूहे, गिलहरियाँ आदि जीव मारे जाते हैं। जहाँ पाला, घास, सेवन आदि होती है, वहाँ ट्रेक्टर चलता है तो पाला आदि नहीं होता। पाला, घास, बूर, सेवन, बुड़ेसी, गँठिया आदिकी जड़ें उखड़ जाती हैं और वे नष्ट हो जाते हैं। ट्रेक्टरोंके कारण गायोंके खानेके लिये घास आदि नहीं होता। खेतोंकी पुष्टि गाय-बैलोंसे होती है, ट्रेक्टरोंसे नहीं। इसलिये गाय-बैलोंकी रक्षा करो।

गर्भपात महापाप

गर्भपात करना, नसबन्दी करना आदि महापापोंसे भी आप बचो। पराशरस्मृतिमें आया है—

यत्पापं ब्रह्महत्याया द्विगुणं गर्भपातने।

प्रायश्चित्तं न तस्यास्ति तस्यास्त्यागो विधीयते॥

(४।२०)

ब्रह्महत्याका जितना पाप लगता है, उससे दुगुना पाप गर्भपातका लगता है। उसका कोई प्रायश्चित्त नहीं है। जिस स्त्रीने गर्भपात किया हो, उसका त्याग कर देना चाहिये। परन्तु आज तो पुरुष भी गर्भपातमें सहमत हो जाते हैं; घरवाले भी सहमत हो जाते हैं। सब-के-सब पापी हो गये, क्या करें? शास्त्रोंकी बात सुनते ही नहीं। न तो स्वयं पढ़ते हैं, न पढ़े हुएकी बात सुनते हैं। ‘सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव स:’ ‘शास्त्र सभीके नेत्र हैं। जिसको शास्त्रकी जानकारी नहीं है, वह अन्धा ही है।’

जो पुत्रको ही खा जाय, वह सर्पिणी होती है। अण्डे फूटनेपर जो बच्चे सर्पिणीके घेरेसे बाहर निकल जाते हैं, वे तो बच जाते हैं; परन्तु जो भीतर रह जाते हैं, उनको सर्पिणी खा जाती है। आज तो सन्तानको जन्मने ही नहीं देते, पहले ही उसकी हत्या कर देते हैं। इतना बड़ा पाप आपलोग मत करो। माँ बनो, सर्पिणी मत बनो! गर्भ गिरानेवाली स्त्री माँ कहलानेके लायक है ही नहीं।

हम नारनौल गये थे। वहाँ देखा कि गर्भ गिरानेके काममें कई मोटरें लगी हुई हैं, जिनसे जगह-जगह जाकर ऑपरेशन करते हैं, गर्भ गिराते हैं। गर्भका जो खून गिरता है, उसको पीपोंमें भरकर ले जाते हैं। उसका वे क्या करते हैं, यह भगवान् जानें! मेरेको तो ऐसा वहम होता है कि गर्भको राक्षसी लोग खा जाते होंगे। गर्भपात, नसबन्दी, ऑपरेशन करवानेवालोंको सरकार रुपये देती है। अभी यहाँ एक सज्जन मेरे पास आये थे। उन्होंने कहा कि मेरेको आज्ञा हुई है कि दो-तीन ऑपरेशनके केस तुम लाओ, तभी नौकरीमें रखेंगे, नहीं तो नौकरीसे निकाल देंगे! कितने अन्यायकी बात है! ऑपरेशनसे नौकरीमें क्या फायदा होगा। केवल जनताका नाश करना है! राजस्थानमें फरमान निकला है कि जिसके दोसे अधिक बच्चे हैं, वह पंचके चुनाव (इलेक्शन) में खड़ा नहीं हो सकता। अब बच्चोंसे और चुनावसे क्या मतलब है? मतलब केवल हिन्दुओंका नाश करनेसे है। मुसलमानलोग तीन-तीन, चार-चार ब्याह करते हैं। एक मुसलमानके साठ बालक होनेकी बात मैंने सुनी है। उसकी तीन स्त्रियाँ हैं और चौथा ब्याह करनेको तैयार है। यहाँसे भी लड़कियोंको ले जाकर पाकिस्तान, ईरान, इराक आदि मुस्लिम देशोंमें उनकी बिक्री की जाती है।

पिछले दिनोंमें हिन्दू-मुसलमानोंकी लड़ाई हुई तो मुसलमान लोग एक हिन्दू स्त्रीके मुँहमें कपड़ा डालकर तथा उसके हाथ पीछे बाँधकर बुरका पहनाकर ले जा रहे थे। टिकटकी जाँच करने टीटी आया तो उस स्त्रीने टीटीके पैरको अपने पैरसे दबाया। उसने सोचा कि स्त्री मेरा पैर क्यों दबा रही है? बात क्या है? बुरका हटाया तो वह स्त्री निकली। फिर टीटीने रेलवे पुलिससे कहकर स्त्रीको उन लोगोंसे मुक्त किया। इस प्रकार वे स्त्रियोंको ले जाकर अपनी बना रहे हैं और ज्यादा-से-ज्यादा सन्तान पैदा कर रहे हैं। भारतकी स्वतन्त्रताके समय कितने हिन्दू और मुसलमान थे, अब कितने हिन्दू और मुसलमान हैं? अभी जो जनगणना हुई है, उसमें सरकारने यह प्रकट नहीं किया है कि हिन्दू कितने हैं और मुसलमान कितने हैं? सरकार प्रकट करते हुए काँप रही है! सरकार कितना अन्याय कर रही है! अब भी वह मुसलमानोंका पक्ष ले रही है—केवल वोटोंके लिये। मुसलमानोंके साथ हमारा पीढ़ियोंसे काम पड़ा है। क्या दशा हुई, आप जानते हैं। नागौरमें ऐसी बात मैंने सुनी है। मुसलमानोंने कहा कि यह बाजार हमारेको दे दो, यह दुकान हमारेको दे दो तो हम तुम्हारेको वोट दे देंगे। नेतालोग तो पाँच वर्षोंतक पदपर रहेंगे, पर उनकी जायदाद उम्रभरके लिये हो गयी! हिन्दू तो जमीन बेच रहे हैं और वे जमीन खरीद रहे हैं।

हमारा मुसलमानोंसे कोई विरोध नहीं है। हमारे तो सत्संगमें मुसलमान आते हैं। मुसलमान गीता पढ़ते हैं। किशनगढ़में जब हमने चातुर्मास किया, तब एक मुसलमान सत्संगमें आता था, जो गीताका पाठ किया करता था तथा कई बातें पूछता था। कलकत्तेमें ईरानके मुसलमान हमारे सत्संगमें आये। मेरी उनके साथ बातें भी हुई हैं। तात्पर्य है कि उनमें भी अच्छे आदमी होते हैं। ऐसा ठेका नहीं है कि अच्छे आदमी हिन्दुओंमें ही होते हैं, मुसलमानोंमें नहीं होते। सब जातियोंमें सब तरहके आदमी होते हैं। साधुओंमें अच्छे-अच्छे साधु भी होते हैं और रावण तथा कालनेमि भी होते हैं। उन्होंने साधु-वेश धारण किया था। स्त्रियोंमें सीता, सावित्री-जैसी स्त्रियाँ भी होती हैं और शूर्पणखा-जैसी स्त्रियाँ भी होती हैं। समुद्रमें बड़े-बड़े रत्न भी होते हैं और शङ्ख तथा कौड़ियाँ भी होती हैं।

एक सच्ची बात मैंने सुनी है। मेरे पास पक्का प्रमाण नहीं है, पर मैंने सुना है कि सौ वर्षोंमें हिन्दू नष्ट हो जायँ—ऐसी एक दुरभिसन्धि है। जितने मरेंगे, उतने तो कम होंगे ही, नसबंदी, ऑपरेशन आदि करानेसे हिन्दू और कम हो जायँगे और सौ वर्षोंतक सब नष्ट हो जायँगे—ऐसा विचार हो गया है। उसी स्कीमको आप काममें ले रहे हो! मेरेको कई साधुओंने कहा कि ये बातें आप क्यों कहते हो? यह काम तो गृहस्थोंका है। परन्तु विचार करें, गृहस्थोंमेंसे ही तो साधु होते हैं। हिन्दू गृहस्थ नहीं रहेंगे तो फिर साधु कौन होगा? गीता, रामायण आदि ग्रन्थ कौन पढ़ेगा? क्या ईसाई और मुसलमान पढ़ेंगे?

आज खेतीके लिये मजदूर नहीं मिलते। मिलें भी कैसे? गर्भ गिराकर, ऑपरेशन करके, नसबंदी करके आदमियोंको नष्ट कर दिया। खेती करनेवाले कहते हैं कि मजदूरोंको चालीस-पचास रुपया प्रतिदिन और कारीगरोंको डेढ़-दो सौ रुपया प्रतिदिन देना पड़ता है। अगर आपके घर बालकोंकी कमी न हो तो दूसरोंको इतना रुपया क्यों देना पड़े? अगर घरमें दस बालक हों, वे अगर काम करें तो चालीस रुपयेके हिसाबसे चार सौ रुपये रोजाना आयेंगे। अन्न इतना महँगा तो है नहीं कि वे चार सौ रुपयेका अन्न रोजाना खा जायँ! अगर चार सौ रुपयोंमेंसे दो सौ रुपयेका अन्न खा लें, तो भी दो सौ रुपये बचते हैं! दूसरी बात, घरके आदमी जितना काम करेंगे, उतना काम मजदूर नहीं करेंगे।

सारा अन्न इकट्ठा करनेपर बस, इतना ही है, अब ज्यादा आदमी पैदा हो जायँगे तो उनके हिस्सेमें थोड़ा-थोड़ा ही आयेगा—यह बात है ही नहीं! जहाँ आदमी ज्यादा होंगे, वहाँ अन्न भी ज्यादा होगा। जहाँ वृक्ष ज्यादा होते हैं, वहाँ वर्षा भी ज्यादा होती है। आवश्यकता आविष्कारकी जननी है। भगवान् के यहाँ कोई अँधेरा नहीं है। आप थोड़े-से लोभमें आकर बड़ा भारी पाप, अन्याय और नाश (भ्रूणहत्या) कर रहे हो! खेतीमें तो ज्यादा पैदा करनेकी चेष्टा करते हो और आदमियोंका नाश करनेकी चेष्टा करते हो। पर विचार करो कि खेती किसके काम आयेगी? इकट्ठा किया हुआ धन किसके काम आयेगा?

नशा-सेवन

दूसरा महापाप है—मदिरा पीना। ऋषिकेशमें एक सन्तसे बात हुई तो उन्होंने कहा कि अपने-आप मरी हुई गायका मांस खानेसे हिन्दूको जो पाप लगता है, उससे भी ज्यादा पाप मदिरा पीनेसे लगता है। इसलिये भाइयो! मदिराका त्याग करो। मदिरा पीनेमें महान् नुकसान है। शरीरका नुकसान है। पैसोंका नुकसान है। तीस-चालीस रुपये रोजाना मजदूरीमें लेते हैं, पर घरमें तंगी रहती है। मदिरामें रुपये खो देते हैं। मदिराके कारण बड़े-बड़े राज्य चले गये। मदिरा पीनेमें बड़ी भारी हानि है। मदिरा पीकर पुरुष आपसमें लड़ते हैं, गालियाँ निकालते हैं, स्त्रियोंको मारते हैं; बच्चोंको मारते हैं! घरमें भी कलह करते हैं, बाहर भी कलह करते हैं। ऐसा खराब व्यसन मत करो।

अन्न और जल—इन दोनोंके सिवाय और किसी चीजका व्यसन नहीं होना चाहिये। अन्न और जलके बिना काम नहीं चलता। जीनेके लिये इन्हें लेना ही पड़ता है। परन्तु चाय, काफी, बीड़ी, सिगरेट, जर्दा, तम्बाकू, अफीम, चिलम आदि न लें तो मनुष्य मरता थोड़े ही है?

नशा काढ़ लीवी नसां, नशा किया सब नाश।

नशा नाकिया नरक में, अड़ी नशा में आश॥

नशा-सेवन करके अपनी आदत खराब कर रहे हो, समय खराब कर रहे हो, पैसा खराब कर रहे हो, शरीर खराब कर रहे हो। नशा-सेवनसे कई बीमारियाँ लग जाती हैं। जो चाय पीते हैं, मदिरा पीते हैं, उनकी भीतरी आँतें जल जाती हैं, जिससे उनको कोई दवाई नहीं लगती। एक बार नशेसे थोड़ा भभका-सा आता है, पर वह शक्ति स्थायी नहीं होती। जोधपुरमें मेरा काम पड़ा तो नहीं कहने लायक बात मैंने कह दी! मैंने कहा कि जो ज्यादा-से-ज्यादा नशा करनेवाला हो, वह चाहे तो मेरे साथ कुश्तीके लिये आ जाय! जैसे मैं बोलता हूँ, वैसे वह बोले; जितना मैं चलता हूँ, उतना वह चले। किसी काममें मेरे साथ बराबरी करके दिखाये! परन्तु उन बेचारोंके पास बल कहाँ है? खर्चा लगा-लगाकर कमजोरी खरीदते हैं! दाम दे-देकर परतन्त्रता खरीदते हैं! जगत् में पराधीन होनेके समान कोई दु:ख नहीं है—‘पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं’ (मानस १।१०२।३)। परन्तु आप मदिराके वशमें हो गये, चिलमके वशमें हो गये, हुक्काके वशमें हो गये, बीड़ी-सिगरेटके वशमें हो गये! इनके बिना रहा नहीं जाता। मालवेकी भाषामें कहा है—

हुक्को हिड़क्यो टेकड़ो, चिलम बणी है चंगी।

पीवणवाला ऐसे लपके, ज्यूँ ब्रज पर भंगी॥

आप साक्षात् भगवान् के अंश हो—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५।७), ‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी॥’ (मानस ७।११७।१)। ऐसे होते हुए भी आप नशेके वशमें हो गये, उसके गुलाम बन गये! कितने पतनकी बात है! चिलम-तम्बाकू पीकर पैसोंका धुआँ कर दिया, समयका धुआँ कर दिया, स्वतन्त्रताका धुआँ कर दिया, जीवनका धुआँ कर दिया, स्वास्थ्यका धुआँ कर दिया! जोधपुरमें मैंने कहा कि जो भाई चिलम पीते हैं, वे मेरेको बता दें कि चिलममें बड़े गुण हैं तो मैं भी खूब मौजसे चिलम खींचना शुरू कर दूँगा! अगर इसमें बड़ा लाभ है तो मैं पीछे क्यों रहूँ? परन्तु वास्तवमें कोई लाभ नहीं है, नुकसान-ही-नुकसान है। हमारे यहाँ तो साधुओंमें अगर कोई नशा करे तो उसे पंक्तिमें नहीं बैठाते।

भाई-बहनोंसे प्रार्थना है कि आप नशा-सेवनसे बचो। आप मेरेपर कृपा करो, अपने-आपपर कृपा करो, अपने बाल-बच्चोंपर कृपा करो। आप व्यसन करोगे तो आपके बच्चे भी वैसा ही सीख जायँगे। बालकपनमें ही उनको व्यसन लग जायगा तो फिर पीछे छूटना मुश्किल हो जायगा। इसलिये सावधान रहो। आजकल बहनें-माताएँ छोटे-छोटे बच्चोंको चाय पीना सिखा देती हैं। आजकलके बच्चे दूध नहीं पीते। बालकपनमें हम दूधमें घी डालकर पिया करते थे। माँसे कहते थे कि दूध लूखा है, इसमें घी डालकर तारा कर दे! परन्तु आजकल दूधमें मलाई भी दीख जाय तो बच्चे नाक-मुँह सिकोड़ते हैं! पीछे वे कमजोर ही रहते हैं। आजकल बालकोंको जवानी आती ही नहीं; बालकपनसे सीधे वृद्धावस्थामें चले जाते हैं! बालकपनमें घी-दूधसे जो ताकत आती है, जो शरीर बनता है, वह वृद्धावस्थामें भी काम देता है। नशेसे तो बच्चे छोटी अवस्थामें ही नष्ट हो जायँगे! इसलिये बहनों-माताओंसे प्रार्थना है कि वे बालकोंको चाय पीना, अफीम, पानपराग आदि खाना मत सिखायें। बच्चा बीमार हो जाय, टट्टी लग जाय तो अफीम दे देती हैं, जिससे बड़ा नुकसान होता है। बच्चा बीमार हो तो माँको दवाई लेनी चाहिये, जिससे माँका दूध पीकर बच्चा ठीक हो जाय। वास्तवमें वही माँ कहलानेलायक है।

मुफ्तमें अपना नुकसान मत करो। भगवान् का दिया अन्न-जल लो। साधारण कपड़ा पहनो, जिससे लज्जाका निवारण हो, शीत-घामका निवारण हो। इससे आपके लोक और परलोक दोनोंका सुधार होगा।

चाहे तो ज्यादा पैदा कर लो और चाहे फालतू खर्चा मिटा दो—दोनोंका टोटल एक बैठेगा। ज्यादा पैदा करना तो हाथकी बात नहीं है, पर ज्यादा खर्चा नहीं करना, व्यसन नहीं करना हाथकी बात है। इसलिये फालतू खर्चा मत करो और अन्न तथा जलके सिवाय किसी भी नशेका सेवन मत करो।

निरर्थक बातचीतमें अपना समय बर्बाद मत करो, बैठकर हथाई मत करो। हथाई (निरर्थक बातचीत) करनेमें, चिलम पीनेमें समय बरबाद मत करो, अपनी आदत खराब मत करो।

मालिकोंके प्रति

ये जो बड़े-बड़े सेठ हैं, धनी हैं, ये भी मजदूरोंको दबाते हैं और उनको कम दाम देकर ज्यादा-से-ज्यादा अनाज खींचते हैं! उधर तो वे दान-पुण्य करते हैं, सन्तोंको, ब्राह्मणोंको भोजन कराते हैं, पर इधर बेचारे गरीबोंपर छुरी चलाते हैं! एक गरीब आदमी साहूकारके यहाँ गया। वह उससे उधार लिया करता था। साहूकारके कानपर टँगी कलम नीचे गिर गयी तो वह बोला सेठजी! सेठजी!! आपकी छुरी नीचे गिर गयी। सेठजीने कहा कि यह तो कलम है, छुरी कहाँ है? वह आदमी बोला कि महाराज! मेरा गला तो इसीने काटा है! आप साहूकार कहलाते हो तो गरीबोंकी रक्षा करो, उनको पैसा ज्यादा दो, उनके घरमें वस्तु बचाओ।

दरसावे जगमें दया, पाप उठावे पोट।

हितमें चितमें हाथमें, खतमें मतमें खोट॥

सब जगह खोट-ही-खोट है। किसानोंसे अनाज लेते समय तो अधिक लेते हो, कम दाम देते हो, पर उनको वस्तु देते समय कम वस्तु देते हो, कितना पाप है!

लेतां तो बदतो लेवे, देतां कसर पाव री।

पीपां प्रत्यक देखिये, बजारां में बावरी॥

गरीबोंका कितना नुकसान करते हो और कहते हो कि दान-पुण्य करते हैं! दान-पुण्यका फल तो कम होगा, पर पापका पलड़ा बहुत भारी होगा। दान-पुण्य करनेसे पाप नहीं कटते। दान-पुण्य करना ‘दीवानी’ है और पाप करना ‘फौजदारी’ है। दीवानी और फौजदारी—दोनों परस्पर कटते नहीं हैं। पुण्यका फल अलग होगा, पापका फल अलग होगा।

ऐरण की चोरी करै, करै सुई को दान।

चढ़ चौबारे देखण लाग्यो, कद आसी बीमान॥

एक वेश्या थी। उसने सुन लिया कि सोमवती अमावस्याके दिन ब्राह्मणोंको जिमाने (भोजन कराने) से और दक्षिणा देनेसे बड़ा भारी पुण्य होता है। उसने जाकर ब्राह्मणोंसे कहा कि आप हमारे घर जीमने आओ। ब्राह्मणोंने कहा कि हम तेरा अन्न नहीं खायेंगे। एक भाँड़ (बहुरूपिया) था और उसने ब्राह्मणका रूप धारण किया हुआ था। वेश्याने उसके पास जाकर पूछा कि तुम कौन हो? उसने कहा कि मैं पांडिया हूँ, तुम कौन हो? वेश्याने कहा कि मैं तो खत्राणी हूँ। अच्छा पांडियोजी! अमावस्याके दिन हमारे यहाँ भोजन कर लो। वह बोला—हाँ-हाँ, कर लेंगे। सुबह पांडेजी आ गये। वेश्याने खीर, मालपूआ आदि बढ़िया-बढ़िया भोजन बनाकर खिलाया और दक्षिणा भी खूब दी। यह सब करनेके बाद वेश्या बाहर आकर आकाशकी तरफ देखने लगी। पांडे बने हुए भाँड़ने पूछा कि क्या देखती हो? वह बोली कि सोमवती अमावस्याके दिन ब्राह्मणको भोजन कराकर दक्षिणा दे तो ठाकुरजीका विमान आता है, उसको देखती हूँ कि कहाँसे आता है? भाँड़ बोला—

तू खत्राणी मैं पांडियो, तू बेश्या मैं भाँड।

तेरे जिमाये मो जीमने, पत्थर पड़सी राँड॥

तात्पर्य है कि इस तरह करनेसे पुण्य नहीं होगा। आप अपना हृदय सीधा-सरल, सच्चा रखो। पाप मत करो। कपड़ा मैला करके पीछे धोते हो, तो पहले मैला ही क्यों करो? पहलेसे ही सावधान रहो, पाप करो ही मत, जिससे पीछे उसे धोना ही न पड़े। मैला नहीं करोगे तो कपड़ा ज्यादा दिन चलेगा और बार-बार मैला करोगे तथा साबुनसे धोओगे तो कपड़ा बहुत जल्दी फट जायगा। इसलिये बाहरसे भी सफाई रखो और भीतरसे भी।

सुख-शान्तिका उपाय

खेती करनेवालोंसे प्रार्थना है कि वे अमावस्याके दिन खेती न करें और उस दिन भगवान् का नाम लें, कीर्तन करें। साहूकारोंसे, मजदूरोंसे सबसे कहना है कि वे कम-से-कम अमावस्याके दिन छुट्टी रखें और भजन-कीर्तन, गीता-पाठ, रामायण-पाठ आदिमें समय बितायें। गीता और रामायण प्रासादिक ग्रन्थ हैं। जिनको पढ़ना-लिखना नहीं आता, ऐसे भाई-बहन भी गीता-रामायण पढ़नेका अभ्यास करें तो उनको पढ़ना आ जायगा। ये ग्रन्थ खुद कृपा करते हैं। ये कल्पवृक्ष हैं, जो शरणमें आये हुएका दु:ख दूर करते हैं। इनके पाठसे लोक-परलोक दोनों सुधरते हैं। एक आदमीको टीबी हो गयी। उसने रामायणका पाठ किया तो उसका रोग ठीक हो गया। ऐसी कई घटनाएँ घटी हैं। नापासरमें वर्षा नहीं हुई। सबने मिलकर सात-आठ दिनतक कीर्तन किया तो वर्षा हो गयी। एक घरमें आग लगती थी। बन्द बक्सोंके भीतर पड़े कपड़े भी जल जाते थे। वहाँ सात दिनतक नगाड़ा बजाकर कीर्तन किया तो शान्ति हो गयी। भगवन्नाममें अपार शक्ति है, जिससे जीवकी मुक्ति हो जाय, कल्याण हो जाय। आप रोजाना भगवन्नामकी कम-से-कम एक माला फेरनेका नियम ले लो। छोटे बच्चोंसे भी नामजप करवाओ। वे कहें कि भूख लगी है तो कहो कि पहले माला फेरो, फिर रोटी देंगे। इससे उनकी माला फेरनेकी आदत पड़ जायगी। उनसे बड़ोंके चरणोंमें नमस्कार कराओ। आप भी जहाँ मजदूरी करो, वहाँ मालिकोंको नमस्कार करो। घरमें जो बड़े-बूढ़े हैं, उनको नमस्कार करो। माँके चरणोंमें मस्तक रखकर नमस्कार करो। माँके समान संसारमें दूसरा कोई नहीं है। माँका दर्जा सबसे ऊँचा है। कौसल्या माँ रामजीसे कहती हैं—

जौं केवल पितु आयसु ताता।

तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता॥

जौं पितु मातु कहेउ बन जाना।

तौ कानन सत अवध समाना॥

(मानस २।५६।१)

घरमें परस्पर प्रेमका बर्ताव रखो। एक-दूसरेका हित करो, सेवा करो। बहनों-माताओंसे कहना है कि सासका, काकी सासका, बड़ी सासका आदर करो। जेठानी, ननद, भौजाईका आदर करो। घरमें बड़ोंको खुद भी नमस्कार करो और बच्चोंको भी नमस्कार करना सिखाओ। ऐसा करनेसे घरमें परस्पर प्रेम रहेगा, लड़ाई नहीं होगी। नमस्कार करेंगे तो लड़ाई कैसे करेंगे? सुबह-शाम दोनों समय नमस्कार करनेका नियम ले लें। दिनमें लड़ाई हो जाय तो शामके नमस्कारसे मिट जायगी और रातमें लड़ाई हो जाय तो सुबहके नमस्कारसे मिट जायगी। कितनी सीधी-सरल बात है! चरणोंमें नमस्कार करके माफी माँगी और लड़ाई मिटी! लड़ाईको फैलने मत दो। सप्ताहमें एक दिन सब मिलकर घरमें कीर्तन करो और उस दिन नमस्कार करके, माफी माँगकर या माफी देकर लड़ाई मिटा दो। घरोंमें कलह मत रहने दो। कलह नाम कलिका है। गीता-रामायण पढ़ो, नल-दमयन्तीकी कथा पढ़ो, जिससे कलियुग अपनेपर असर न करे*। नामजप करो। कीर्तन करो। काम-धंधा करते हुए भगवान् को याद रखो। पित्तका बुखार आता है तो मिश्री कड़वी लगती है। परन्तु मिश्री चूसना शुरू कर दे तो वह मीठी लगने लग जायगी। ऐसे ही आपको राम-नाम लेना अच्छा न लगे तो भी राम-राम करना शुरू कर दो तो वह मीठा लगने लग जायगा।

हाथ काम मुख राम है, हिरदै साची प्रीत।

दरिया गृहस्थी साधकी, याही उत्तम रीत॥

अगर सुख-शान्ति चाहते हो, लोक-परलोकका सुधार चाहते हो तो इन बातोंको काममें लाओ।