माँ!

एक सूरदास भगवान् के मन्दिरमें गये तो लोगोंने उनसे कहा—‘आप कैसे आये?’ वे बोले—‘भगवान् का दर्शन करनेके लिये।’ लोगोंने पूछा—‘तुम्हारे आँखें तो हैं नहीं, दर्शन किससे करोगे?’ वे बोले—‘दर्शनके लिये मेरे नेत्र नहीं हैं तो क्या ठाकुरजीके भी नेत्र नहीं हैं? वे तो मेरेको देख लेंगे न! वे मेरेको देखकर प्रसन्न हो जायँगे तो बस, हमारा काम हो गया।’

अब भाइयो! बहिनो! ध्यान दो। जैसे हमारे नेत्र न हों तो भी भगवान् के तो नेत्र हैं ही, उनसे वे हमारेको देखते हैं, ऐसे ही सज्जनो! हमारेको भगवान् का ज्ञान न हो, तो क्या भगवान् को भी हमारा ज्ञान नहीं है? हमारी जानकारीमें भगवान् नहीं आये तो हम सूरदास हुए, तो क्या भगवान् की जानकारीमें हम नहीं हैं? जब हम उनकी जानकारीमें हैं तो हमें कभी किसी बातकी चिन्ता करनी ही नहीं चाहिये। जैसे, बालक जबतक अपनी माँकी दृष्टिमें है, तबतक उसका अनिष्ट कोई कर नहीं सकता और उसके लिये जो कुछ भी चाहिये, उसका सब प्रबन्ध माँ करती है, ऐसे ही जब हम भगवान् की दृष्टिमें हैं, उनकी दृष्टिसे कभी ओझल होते ही नहीं तो हमारे लिये रक्षा, पालन, पोषण आदि जो कुछ आवश्यक है, वह सब कुछ वे करेंगे।

भगवान् ने गीतामें कहा—अप्राप्तिकी प्राप्ति करा देना और प्राप्तकी रक्षा करना—ये दोनों काम मैं करता हूँ—‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ (९।२२) मेरेमें चित्त लगनेसे तू सम्पूर्ण विघ्नोंको मेरी कृपासे तर जायगा’—‘मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि’ (१८। ५८) और ‘अविनाशी शाश्वतपदकी प्राप्ति भी मेरी कृपासे हो जायगी’—मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्’ (१८।५६)। तात्पर्य है कि उनके ज्ञानमें हम हैं, हमारेपर उनकी कृपा है, तो वे विघ्नोंसे भी रक्षा करेंगे और अपनी प्राप्ति भी करा देंगे। परंतु हमारा चित्त भगवान् में रहना चाहिये। हमारा विश्वास, भरोसा सब भगवान् पर रहना चाहिये। हमारा विश्वास, भरोसा उनपर न रहनेपर भी वे तो हमपर कृपा करते ही हैं। हमारा सब प्रबन्ध वे कर ही रहे हैं। हमारा जैसे कल्याण हो, हमारे प्रति उनकी वैसी ही चेष्टा रहती है।

हम सुख और दु:खको दो रूपोंमें देखते हैं कि सुख अलग है और दु:ख अलग है। परन्तु भगवान् के यहाँ सुख-दु:ख दोनों अलग-अलग नहीं हैं। जैसे—‘लालने ताडने मातुर्नाकारुण्यं यथार्भके। तद्वदेव महेशस्य नियन्तुर्गुणदोषयो:॥’ लालन-प्यारमें और मारमें माँके दो भाव नहीं होते। एक ही भावसे माँ बच्चेका लालन-प्यार करती है और ताड़ना भी कर देती है अर्थात् प्यारभरे हृदयसे प्यार भी करती है और हितभरे हाथसे थप्पड़ भी लगा देती है। तो क्या माँ बालकका अनिष्ट करती है? कभी नहीं। ऐसे ही भगवान् कभी हमारी मनचाही बात कर दे और कभी हमारी मनचाही न करके थप्पड़ लगा दे, तो भगवान् के ऐसा करनेमें देखना चाहिये कि वह हमारी माँ है! माँ! वह हमारे मनके अनुकूल-प्रतिकूल जो कुछ करे, उसमें हमारा हित ही भरा है, चाहे हम उसे न समझें। माँकी चेष्टाको बालक समझ सकता है क्या? माँकी चेष्टाको समझनेकी बालकमें ताकत है क्या? बालकमें वह ताकत है ही नहीं, जो माँकी चेष्टाको समझ सके। बालकको तो माँकी चेष्टाको समझनेकी जरूरत ही नहीं है। वह तो बस, माँकी गोदमें पड़ा रहे। ऐसे ही ‘भगवान् क्या करते हैं, कैसे करते हैं’ इसे समझनेकी हमें कोई जरूरत नहीं है। वे कैसे हैं, कहाँ रहते हैं, इसको जाननेकी भी हमें कोई जरूरत नहीं है। क्या बच्चा माँको जानता है कि माँ कहाँ पैदा हुई है? किसकी बेटी है? किसकी बहिन है? किसकी स्त्री है? किसकी देवरानी है? किसकी जेठानी है? किसकी ननद है? किसकी बूआ है? माँ कहाँ रहती है? किससे इसका पालन होता है? माँ क्या करती है? किस समय किस धन्धेमें लगी रहती है? आदि बातोंको बालक जानता ही नहीं और उसको जाननेकी जरूरत भी नहीं है। ऐसे ही हमारी माँ (भगवान्) कैसी है? कौन है? वह सुन्दर है कि असुन्दर है? वह क्रूर है कि दयालु है? वह ठीक है कि बेठीक है? वह हमारे अनुकूल है कि प्रतिकूल है? आदि-आदि बातोंसे हमें क्या मतलब! बस, वह हमारी माँ है। वह हमारे लिये जो ठीक होगा, वह आप ही करेगी। हम क्या समझें कि यह ठीक है या बेठीक? अपना ठीक-बेठीक समझना भी क्या हमें आता है? है हमें यह ज्ञान? क्या हमें यह दीखता है? अरे! सूरदासको क्या दीखे! हम क्या समझें कि यह ठीक है कि बेठीक; अच्छा है कि मन्दा है। इन बातोंको हम क्या समझें और क्यों समझें? हमें इन बातोंके समझनेकी कुछ भी जरूरत नहीं है। बस, हम उनके हैं और वे हमारे हैं। वे ही हमारे माता, पिता, भाई, बन्धु, कुटुम्बी आदि सब कुछ हैं और वे ही हमारे धन, सम्पत्ति, वैभव, जमीन, जायदाद आदि सब कुछ हैं—

त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥

कोई आपसे पूछे कि तुम्हारी माँ कौन है? ईश्वर! तुम्हारा बाप कौन है? ईश्वर! भाई कौन है? ईश्वर! तुम्हारा साथी कौन है? ईश्वर! तुम्हारा काम करनेवाला कौन है? ईश्वर! हमारे तो सब कुछ वही हैं। सब कुछ माँ ही है। जैसे बच्चेके लिये धोबी भी माँ है, नाई भी माँ है, दाई भी माँ है, धाई भी माँ है, ईश्वर भी माँ है, गुरु भी माँ है, नौकर भी माँ है, मेहतर भी माँ है, आदि-आदि छोटे-से-छोटा और बड़े-से-बड़ा सब कुछ काम करनेवाली माँ है। ऐसे ही हमारे सब कुछ भगवान् ही हैं, तो हमें किस बातकी चिन्ता! चिन्ता दीनदयाल को मो मन सदा अनन्द’ हमारे मनमें तो सदा आनन्द-ही-आनन्द है, मौज-ही-मौज है! हमारी चिन्ता वे करें, न करें, हमें इस बातकी क्या परवाह है! जैसे माँ बालककी चिन्ता करे, न करे इससे बालकको क्या मतलब! वह आप ही चिन्ता करती है बालककी; क्योंकि बालक उसका अपना है। यह उसपर कोई अहसान है कि वह बालकका पालन करे। अरे, यह तो उसका काम है। वह करे, न करे, इससे बालकको क्या मतलब? बालकको तो इन बातोंसे कुछ मतलब नहीं। ऐसे ही भगवान् हमारी माँ है बस, वह हमारी माँ है और हमें न कुछ करना है, न जानना है, न पढ़ना है, किन्तु हरदम मस्त रहना है, मस्तीसे खेलते रहना है। माँकी गोदीमें खेलता रहे, हँसता रहे, खुश होता रहे। क्यों खुश होता रहे कि इससे माँ खुश होती है, राजी होती है अर्थात् हम प्रसन्न रहें तो इससे माँ राजी होती है। माँकी राजीके लिये हम रहते हैं, खेलते हैं, कूदते हैं और काम-धन्धा भी हम माँकी राजीके लिये ही करते हैं। और बातोंसे हमें कोई मतलब ही नहीं है। हमें तो एक माँसे ही मतलब है।

जैसे माँके पास जो कुछ होता है, वह सब बालकके पालनके लिये ही होता है। माँका बल है, बुद्धि है, योग्यता है, विद्या है, शरीर है, कपड़े हैं, घर आदि सब कुछ बच्चेके लिये ही होता है। ऐसे ही भगवान् के पास जो कुछ सामर्थ्य है, शक्ति है, विलक्षणता है वह सब केवल हमारे लिये ही है। अगर हमारे लिये नहीं है तो किसके लिये है? इस वास्ते हमें कभी किसी भी बातकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। कभी चिन्ता आ भी जाय तो भगवान् से कह दो—‘हे नाथ! देखो! यह चिन्ता आ गयी।’ जैसे बालकको प्यास लगती है, वह ‘बू-बू’ करता है तो माँ पानी पिला देती है। अब किसी भी कोशमें ‘बू’ नाम पानीका नहीं आया है, पर ‘बू’ कहते ही माँ पानी पिला देती है। ऐसे ही हम किसी भी भाषामें कुछ भी कह दें तो उसको माँ (भगवान्) समझ जाती है—

गूँगा तेरी बातको और न समझे कोय।

कै समझै तेरी मावड़ी कै समझै तेरी जोय॥

जैसे गूँगेकी भाषा उसकी माँ समझे या लुगाई (स्त्री) समझे। और कौन समझे उसकी भाषाको? परन्तु हमारी भाषाको भगवान् समझें कि नहीं समझें, इससे भी हमें मतलब नहीं रखना है। अपने तो माँ! माँ! करते जाओ, बस। जैसे बालक माँको किसी विधिसे थोड़े ही याद करता है। वह तो बस, माँ! माँ! करता रहता है। ऐसे ही माँ! माँ! करते रहो, बस; और हमें कुछ करना ही नहीं है। माँ प्रिय लगती है, माँका नाम अच्छा लगता है। इस वास्ते प्यारसे कहो—माँ! माँ!! माँ!!!

हमें एक सज्जन मिले थे। वे कहते थे कि हम कभी माला फेरते हैं तो क्या करते हैं कि जैसे जीमने (भोजन करने) में आनन्द आता है तो सबड़का लेते हैं। ऐसे ही माला फेरते हैं तो सबड़का लेते हैं। अब भजनकी क्या विधि है! अपनेको सबड़का लेना है, बस! मौजसे नाम उच्चारण करें, कीर्तन करें। कुछ भी करे तो मस्त होकर करे। ‘क्या होगा? कैसे होगा?’

[तरल पदार्थ—खीर, कढ़ी, दाल आदिको चम्मचकी भी सहायता लिये बिना केवल अँगुलियोंको एक साथ सटाकर उनसे पीनेकी क्रियाको राजस्थानी भाषामें ‘सबोड़ना’ कहते हैं। ]

इन बातोंसे अपना कोई मतलब ही नहीं है। इन बातोंसे मतलब माँको है और इन बातोंकी माँको ही बड़ी चिन्ता होती है। जैसे माता यशोदा और माता कौसल्याको चिन्ता होती है कि मेरे लालाका ब्याह कब होगा? पर लाला तो समझता ही नहीं कि ब्याह क्या होता है, क्या नहीं होता है। वह तो अपनी मस्तीमें खेलता ही रहता है। ऐसे ही हमारी माँको चिन्ता होती है कि ‘बच्चेका कैसे होगा, क्या होगा? पर हमें तो इससे कोई मतलब नहीं है और इसको जाननेकी जरूरत भी नहीं है। माँ जाने, माँका काम जाने! अपने तो आनन्द-ही-आनन्दमें रहना है और माँकी गोदमें रहना है। हमारेमें और बालकमें फर्क इतना ही है कि हम रोते नहीं। बालक तो भोलेपनसे मूर्खतासे रोता है। पर हमारी तो माँ है, हम रोवें क्यों? हम तो केवल हँसते रहें। मस्तीसे माँकी गोदीमें पड़े रहें। कैसी मौजकी बात है। कितने आनन्दकी बात है! ‘तू जाने तेरा काम जाने’—ऐसा कहकर निश्चिन्त हो जाओ, निर्भय हो जाओ, नि:शोक हो जाओ और नि:शंक हो जाओ। हमें तो आनन्द-ही-आनन्दमें रहना है, हरदम मस्तीमें रहना है। अपना तो कुछ काम है ही नहीं, सिवाय मस्तीके, सिवाय आनन्दके! हमारी जिम्मेदारी तो एक ही है कि हरदम मस्त रहना, आनन्दमें रहना। माँ! माँ! नाम लेना अच्छा लगता है। माँ! माँ! ऐसा कहना हमें प्यारा लगता है, इस वास्ते लेते हैं। राम! राम! नाम मीठा लगता है, इस वास्ते लेते हैं, इसमें कोई विधि थोड़ी है कि इतना नाम लें। इतना-उतना क्या! हम अपनी मर्जीसे माँ-माँ करते रहें। किस तरह करना है? कितना करना है? कैसा भजन किया? कितना भजन किया? इससे हमें क्या मतलब? हमें माँका नाम प्यारा लगता है, इस वास्ते खुशीसे, प्रसन्नतासे लेते हैं। बस, अपने तो मौज हो रही है। आनन्द हो रहा है! खुशी आ रही है! प्रसन्नता हो रही है!

मुख राम कृष्ण राम कृष्ण कीजिये रे!

सीताराम ने भजन लावो लीजिये रे!!

राम राम राम राम राम