ममताका त्याग

प्राप्त वस्तुओंमें ममता होती है और अप्राप्त वस्तुओंकी कामना होती है। अत: जो प्राप्त है, उनमें ममता न रखें और नयी कामना न करें तो इतनेमात्रसे जीवन्मुक्ति है। जिसको मुक्ति कहते हैं, जिसको दुर्लभ पद कहा है, जिसको ऋषि-मुनि, सन्त-महात्मा प्राप्त हुए हैं, जिसको अक्षर कहते हैं—‘यदक्षरं वेदविदो वदन्ति’, जिसकी प्राप्तिकी इच्छासे ब्रह्मचारीलोग ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं—‘यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति’, जिसको वीतराग पुरुष प्राप्त होते हैं—‘विशन्ति यद्यतयो वीतरागा:’, उस परमपदकी प्राप्ति हो जाय केवल इतनी बातसे कि मिली हुई वस्तुमें ममता न करें और जो न मिला हो उसकी कामना न करें!

मिली हुई वस्तुओंको आप नष्ट कर दो, फेंक दो, जला दो—यह नहीं कहता मैं। वस्तुएँ हैं जैसे ही रहें, पर उनमें मेरा-पन न रखें। उनके रहते हुए मेरा-पन कैसे न रखें? देखो, आपलोगोंके अनुभवकी बात है। आप उसको काममें लेते ही हैं। जैसे, आपके मनमें कन्यादान करनेकी इच्छा हुई और आपने कन्यादान कर दिया। विवाह कर देनेके बाद कन्यामें आपकी वैसी ममता नहीं रहती। आपकी पुत्री थी और आप भी कहते थे कि मेरी कन्या है; परन्तु विवाह होनेके बाद क्या वैसी ममता है? तो आपको ममता छोड़ना आता है न? ध्यान दो इस बातपर।

श्रोता—कन्याकी ममता तो बिना प्रयास ही छूट जाती है; परन्तु वस्तुओंकी ममता तो प्रयाससे भी नहीं छूटती!

स्वामीजी—कन्याकी ममता भी बहुत प्रयाससे छूटती है महाराज! उसको छोड़नेमें खर्चा लगता है; भाई-बन्धुओं, सम्बन्धियों, कुटुम्बियों आदि कइयोंकी गरज करनी पड़ती है! इतना तो वस्तुओंकी ममता छोड़नेमें नहीं करना पड़ता। मैं तो कहता हूँ कि वस्तुओंके पासमें रहते हुए उनकी ममता छोड़ दो। उनकी ममता छोड़नेमें न तो आदमियोंको बुलाना पड़ेगा, न भोजन कराना पड़ेगा, न घरको सजाना पड़ेगा, कुछ भी नहीं करना पड़ेगा! कन्याके विवाहमें कितना जोर आता है! लखपतियों-करोड़पतियोंको चिन्ता लग जाती है। परन्तु ऐसी कठिनता लेकर भी आप कन्याकी ममता सुगमतापूर्वक छोड़ देते हो, तो फिर इस ममताको छोड़नेमें क्या जोर आता है आपको?

दूसरी बात बताऊँ! जैसे, आप मेरेको कपड़ा देना चाहो और मैंने कपड़ा ले लिया तो आपकी ममता छूटी कि नहीं छूटी? तो आपको ममता छोड़ना आता है न? कन्या देना बड़ा दान हुआ, छोटा-सा कपड़ा देना छोटा दान हुआ। दान छोटा हो या बड़ा, इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता। अपनापन छोड़ना ही खास है। छोटी-बड़ी वस्तु देनेका मूल्य नहीं है, मूल्य तो ममता छोड़नेका है; क्योंकि मुक्ति ममता छोड़नेसे होती है। महाभारतमें साफ आया है—

द्वॺक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्राॺक्षरं ब्रह्म शाश्वतम्।

ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम्॥

(महा० शान्ति० १३।४)

‘दो अक्षरोंका ‘मम’ (यह मेरा है) मृत्यु है और तीन अक्षरोंका ‘न मम’ (यह मेरा नहीं है) अमृत, सनातन ब्रह्म है।’

—यह वेदव्यासजी महाराजकी वाणी है, जो सबसे बड़े महापुरुष हुए हैं! ग्रन्थ लिखनेवालोंमें व्यासजीके समान कोई नहीं है।

ममता छोड़नेके लिये है और आपको ममता छोड़ना आता है। किसको नहीं आता है ममता छोड़ना? आपके घरपर भिक्षुक आता है और आप उसे रोटी दे देते हो तो आप उस रोटीको अपनी मानते हो क्या? आप कहेंगे कि दे देते हैं, तब ऐसा होता है। परन्तु जब नहीं देते हैं, तब भी ऐसा होता है; जैसे—अधिक मासमें बीस-तीस चीजें दान करनी हों तो बहनें-माताएँ पहले ही चीजें मँगाकर घरमें रख लेती हैं, पर उनमें आपकी ममता होती है क्या? छोरा उन चीजोंमेंसे एक गिलास भी उठा लाये तो आप कहते हो कि इसको वापिस रखकर आओ; यह चीज देनेकी है, अपनी नहीं है। इस तरह जो चीज घरमें पड़ी है, उसकी रक्षा भी करते हो और मोल भी लाते हो, सब कुछ करते हो, पर मेरा-पन नहीं करते। कन्यादान किया, कपड़ा दे दिया, रोटी दे दी और घरमें पड़ी चीजें भी देनी हैं—इस विचारसे आप अपनापन छोड़ देते हो। ऐसे ही आपको बताऊँ कि एक दिन आपको शरीरसहित सम्पूर्ण वस्तुओंको छोड़ना पड़ेगा। एक दिन सब छूटेगा ही, छोड़े बिना आप रह सकते नहीं। धनको, घरको, शरीरको भी क्या आप सदा साथमें रख सकते हो? नहीं रख सकते। ऐसी असमर्थ अवस्थामें यदि आप पहलेसे ही उनका त्याग कर दो तो क्या जोर आये?

अन्तहुँ तोहिं तजैंगे पामर, तू न तजै अबही ते।

आप नहीं छोड़ोगे तो जबर्दस्ती छुड़ाया जायगा और आपको दु:ख होगा, सन्ताप होगा। अगर आप छोड़ दो तो अनन्त सुख प्राप्त होगा—‘स्वयं त्यक्ता ह्येते शमसुखमनन्तं विदधति।’ (भर्तृहरि वैराग्यशतक) इस बातपर आप थोड़ा विचार करो। देखो, कथा सुन ली, कहानी सुन ली तो अब चलो भाई—यह बात यहाँ नहीं है। मेरी बातें कथा-कहानीकी तरह नहीं हैं। मर्मकी बातें सुनो और अभी-के-अभी निहाल हो जाओ—ऐसी बात है! परन्तु यह बात लोगोंको जँचती नहीं। वे यही कहते हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है! अरे, नहीं हो सकता तो मैं क्यों कहता हूँ? नहीं हो सके तो आप होनेका विचार कर लो। कठिनता पड़े तो पूछो!

देखो! आवश्यकता और कामना दो चीज हैं। आवश्यकता पूरी होनेवाली होती है, पर कामना कभी पूरी नहीं होती। कन्यादान करना आवश्यक है, पर उसके लिये चिन्ता करना आवश्यक नहीं है। कन्याको जहाँ जाना है, वहाँका प्रबन्ध अपने-आप बैठेगा। आपको उद्योग करना है, चिन्ता नहीं करनी है। कर्म करनेमें आपका अधिकार है, फलमें अधिकार नहीं है—‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ (गीता २।४७)। कन्यादानके लिये उद्योग करना आपका काम है। कन्यादान हो ही जाय—यह आपके हाथकी बात नहीं है।

जैसे, भूख लगी तो यह पेटमें अन्नकी ‘आवश्यकता’ है और उसमें स्वाद चाहना कि अमुक भोजन मिले—यह ‘कामना’ है। आवश्यकता पूरी होती है, पर कामना आजतक किसीकी पूरी नहीं हुई। किसीके भी जीवनमें ऐसा नहीं हुआ कि सब कामनाएँ पूरी हो गयी हों। परन्तु आवश्यकताका विधान है कि वह पूरी होती है। इस तरह एक आवश्यकता होती है और एक कामना होती है। इनको आप ध्यानसे सुनो और धारण करो। वर्षोंतक मेरेको यह बात समझमें नहीं आयी। व्याख्यान देता था और दिया भी वर्षोंतक, पर आवश्यकता और कामना दो हैं—यह बात मेरेको बहुत देरीसे मिली। मेरेको ऐसी बातें बहुत कठिनतासे मिली हैं। इनके मर्मको समझनेमें मेरेको जोर पड़ा है और समय लगा है। यह आपको इसलिये कहा है कि आप इस बातका कुछ आदर करो। इसमें कोई आत्मश्लाघा नहीं, कोई महिमा नहीं, कोई विशेषता नहीं, नहीं तो पहले ही जान लेता। पर नहीं आयी अक्लमें! ऐसे कई झंझट थे, जो गीतासे खुले हैं। परन्तु आप जानना चाहो तो बहुत सुगमतासे जान सकते हो। बहुत सरल, सीधी-सादी बातें हैं।

आवश्यकता और कामना क्या है? मूलमें आवश्यकता तो है परमात्माकी और कामना है संसारकी। यह मूल बात है। हम सदा जीते रहें, हम जानकार बनें, हम सदा सुखी रहें—यह आवश्यकता है; क्योंकि आपकी यह चाहना वास्तवमें सत्-चित्-आनन्दघन परमात्माकी है। परन्तु संसारकी जितनी आवश्यकता मानते हो, जितनी चाहना करते हो, वह सब-की-सब कामना है। ये दो भेद मेरेको मिले तो बड़ी प्रसन्नता हुई मनमें कि आज तो एक काँटा निकल गया भीतरसे! आवश्यकता और चीज है, कामना और चीज है। अँग्रेजीमें हमने want और desire—ये दो शब्द सुने हैं। मैंने अच्छे पढ़े-लिखोंसे पूछा कि इन दो शब्दोंमें क्या भेद है, पर वे ठीक तरहसे बता नहीं सके। जैसे मैं कहता हूँ कि आवश्यकता केवल परमात्माकी है और इच्छा केवल संसारकी है। पर इतना साफ नहीं बताया अँग्रेजी पढ़े-लिखोंने। आवश्यकता पूरी होनेवाली होती है, वह मिटनेवाली हो ही नहीं सकती। परमात्मतत्त्वकी जो आवश्यकता है और हमारी जो कमी है, वह पूरी हुए बिना कभी मिट नहीं सकती और कामना कभी पूरी नहीं हो सकती—यह नियम है। नियमका भंग होता हो तो बताओ।

श्रोता—रोटी-कपड़ा लोगोंकी आवश्यकता है; परन्तु यह बहुत-से लोगोंको सुलभ नहीं है?

स्वामीजी—भूखा तो लखपति और करोड़पतिको भी रहना पड़ सकता है। वैद्य, डॉक्टर मना कर दें तो करोड़ों रुपये पासमें होनेपर भी रोटी नहीं खा सकते। अत: रोटी-कपड़ा नहीं मिलता तो वहाँ आवश्यकता नहीं है। आवश्यकतावाली चीज तो मिलेगी ही। साफ कहा है—‘यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम्’ अर्थात् जो चीज हमें मिलनेवाली है, वह दूसरोंको नहीं मिल सकती। जो हमारी चीज है, वह हमारेसे अलग कैसे रहेगी? उसको मिलना पड़ेगा। कोई भूखा मरनेवाला हो, उसको भूखा ही मरना पड़ेगा। यह आवश्यक नहीं है कि अन्न-जल ही मिले। यह तो मैंने संसारकी रीतिमें दो चीज समझनेके लिये बतायी है कि भूख-प्यासकी आवश्यकता है और स्वादकी इच्छा है। वास्तवमें आवश्यकता है परमात्माकी और इच्छा है संसारकी। संसारकी इच्छा किसी भी तरहकी हो, वह सब कामना ही है, जो कभी पूरी होगी ही नहीं। परमात्माकी आवश्यकता कभी मिटेगी नहीं, आप जानें चाहे न जानें, मानें चाहे न मानें। आप नास्तिक हो जायँ तो भी भीतरसे परमात्माकी इच्छा नहीं मिटेगी। कारण कि जो ईश्वरको, परमात्माको बिलकुल नहीं मानते, वे भी हरदम रहना चाहते हैं, ज्ञान चाहते हैं, सुख-शान्ति चाहते हैं। उनकी यह इच्छा सच्चिदानन्दघन परमात्माकी है। रहना (जीना) चाहते हैं—यह ‘सत्’ की इच्छा हुई। ज्ञान चाहते हैं—यह ‘चित्’ की इच्छा हुई। सुख चाहते हैं—यह ‘आनन्द’ की इच्छा हुई। जो ईश्वरका खण्डन करता है, दुनियासे ईश्वरका नाम उठा देना चाहता है, ऐसे नास्तिक-से-नास्तिक आदमीके भीतर भी ईश्वर-प्राप्तिकी इच्छा रहती है। क्या वह जीना नहीं चाहता? क्या वह ज्ञान नहीं चाहता? क्या वह सुख नहीं चाहता? चाहता है तो सच्चिदानन्द परमात्माकी इच्छा है। इस चाहको कोई मिटा नहीं सकता; क्योंकि यह हमारी असली चाह है, असली जिज्ञासा है, असली भूख है। यह कभी मिटनेवाली नहीं है, प्रत्युत पूरी होनेवाली ही है। संसारकी इच्छा कभी किसीकी पूरी नहीं हुई, होगी नहीं, हो सकती नहीं। आपने भी देख लिया कि जीवनमें कभी इच्छा पूरी नहीं हुई। अब उसको छोड़नेमें क्या बाधा है?

श्रोता—हम इतना मान लें कि हमने सब छोड़ दिया तो क्या इतना माननेसे परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी?

स्वामीजी—नहीं होगी। यह कोई तमाशा नहीं है। भीतरसे इच्छा छोड़ोगे, तब होगी। मैंने इच्छा छोड़ दी—ऐसा कहनेसे क्या हो जायगा? केवल कहनेसे नहीं होगा। केवल ऊपरसे मान लेनेसे नहीं होगा। भीतरसे कोई इच्छा नहीं हो। जीनेकी भी इच्छा न हो। अभी मर जायँ तो कोई चिन्ता नहीं। इच्छा छोड़नेसे आप मरोगे नहीं और चाहनेपर भी बचोगे नहीं। मरना तो पड़ेगा ही, नहीं चाहनेपर भी और चाहना छोड़नेपर भी—यह पक्की बात कहता हूँ। आप विचार करो कि क्या अपनी चाहनासे हम जी रहे हैं। चाहनेमात्रसे कोई जी नहीं सकता। जीनेके उपायके लिये मैं मना नहीं करता। रोटी खाओ, दवाई लो, संयमसे रहो—यह बात मैं कहता हूँ। परन्तु हम जीते रहें—यह हमारे हाथकी बात नहीं है। इसमें आपको क्या बाधा लगती है? पूछो।

आप सोचते हैं तो उलटा सोचते हैं कि यह चुप कैसे हो जाय? ऐसा प्रश्न पूछें कि यह बोल नहीं सके। यह नहीं सोचते कि बातको काममें कैसे लायें? जैसे सरकारी कानूनके विषयमें सोचते हैं कि इस कानूनसे कैसे बचें? कैसे झूठ-कपट करें? कैसे चकमा दें? यही बर्ताव आप दूसरोंसे करते हैं। ऐसा करना ठीक नहीं है। आप ऐसा सोचो कि यह ममता कैसे मिटे? यह कामना कैसे मिटे? इसके लिये सोचना होता है, चेष्टा नहीं होती। वस्तुको ज्यों-की-त्यों रहने दो, एक कौड़ी भी खर्च मत करो; परन्तु ‘यह मेरी नहीं है’ इतना मान लो। आस्तिकके लिये बहुत सरल उपाय है कि ‘यह सब भगवान् की है’। सच्ची बात है। आस्तिक आदमी सब वस्तुओंको भगवान् की मानते ही हैं। अब बोलो, ममता छूटेगी कि नहीं? हमारी है ही नहीं, ठाकुरजीकी है। अब वस्तु चली जाय तो ठाकुरजीकी वस्तु चली गयी। रक्षा करना, ठीक तरहसे रखना हमारा काम है; क्योंकि हम ठाकुरजीके हैं तो हम ठाकुरजीकी चीजको निरर्थक नष्ट कैसे होने देंगे!

ठाकुरजीके विधानके अनुसार खर्च करेंगे; क्योंकि ठाकुरजीकी चीज है। कितना सुगम उपाय है! इस बातको भीतरसे पक्का मान लो। अब बेटा मर जाय तो हम चिन्ता क्यों करें? भगवान् का बेटा मरा। आप बिलकुल गिनाओ कि हमारे इतने बेटे हैं। गिनानेमें क्या हर्ज हुआ। आप केवल मेरापन छोड़ दो। उनका पालन-पोषण करो, रक्षा करो। अपनी जिम्मेवारीका पालन करो। भगवान् की दी हुई ड्यूटी है। गाड़ीमें बैठनेपर आप कहते हैं कि यह हमारा डिब्बा है, पर गाड़ीसे उतरनेके बाद आप कभी चिट्ठी देकर पूछते हो कि हमारा डिब्बा कैसे है? अत: व्यवहार करनेमें कोई बाधा नहीं लगती। व्यवहार सुचारुरूपसे करो। जैसा अभी करते हो, उससे भी सुचारुरूपसे करो। हमारी चीजकी परवाह नहीं, पर अब तो प्रभुकी चीज है! उसकी अच्छी तरहसे रक्षा करो।

मैं आपका दु:ख मिटानेके लिये कहता हूँ। चीज मिटाने, नष्ट करनेके लिये नहीं कहता हूँ। चीज छोड़कर साधु हो जाइये—यह नहीं कहता हूँ। दु:ख, सन्ताप, अभाव, व्याकुलता, हलचल मिटानेके लिये कहता हूँ। वही घर है, वही स्त्री है, वही परिवार है, वे ही रुपये हैं और वैसे ही आप हो, कुछ फर्क नहीं पड़ेगा, केवल आपकी चिन्ता मिट जायगी! परन्तु ममता, कामना रखोगे तो यह चिन्ता, हलचल, दु:ख, सन्ताप कभी मिटनेका है ही नहीं। ममता, कामनाके रहते चिन्ता, हलचल न हो—यह असम्भव बात है। मनमें इच्छा रखे कि ऐसा हो और ऐसा न हो तो हलचल होगी ही।

श्रोता—तत्त्वका बोध होनेसे पहले ममता, कामना कैसे मिटेगी?

स्वामीजी—तत्त्वका बोध होनेसे ममता मिट जायगी और ममता मिटनेसे तत्त्वका बोध हो जायगा। खुशी आये, ज्यों कर लो। आपको जो सुगम पड़े, वह काम कर लो। कामना-ममताके रहते-रहते तत्त्वबोध हो जायगा! आप ध्यान दो मेरी बातपर। गीताकी बात है—

अपि चेदसि पापेभ्य: सर्वेभ्य: पापकृत्तम:।

सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि॥

(४।३६)

सम्पूर्ण पापियोंसे भी जो अधिक पापी हो, वह भी ज्ञानरूपी नौकासे पापोंको तर जायगा। अत: पापी-से-पापी भी ज्ञानका अधिकारी हुआ कि नहीं? कामना तो दूर रही, पापी बताया है। मनुष्य कामनाके कारण ही पाप करता है (गीता ३।३६-३७)। कामनासे होनेवाले बड़े-बड़े पापोंसे आप तर जाओगे। तात्पर्य है कि ज्ञान पहले भी मिल सकता है और कामना-ममताके त्यागसे भी मिल सकता है—‘विहाय कामान्य: सर्वान् पुमांश्चरति नि:स्पृह:। निर्ममो निरहङ्कार: स शान्तिमधिगच्छति॥’ (गीता २।७१) ये दोनों प्रमाण गीतामें हैं। कामनाके विषयमें मेरेको ऐसी बहुत बातें याद हैं। इस विषयमें मैंने बहुत खोज की है और कर रहा हूँ।