मनकी चञ्चलता कैसे मिटे?
आजकल यह बड़ी शिकायत रहती है कि मन नहीं लगता, मन बहुत चंचल है! अत: मनको रोकनेके लिये, मनकी चंचलता मिटानेके लिये एक बहुत बढ़िया उपाय बताया जाता है।
आप अध्ययन करें कि मनमें क्या आता है? मनमें विशेषरूपसे बीती हुई बातोंकी याद आती है। बीती हुई बातें चाहे बालकपनकी हों, चाहे अभी एक क्षण पहलेकी हों, वह सब भूतकाल है। भूतकालमें जो बातें सुनीं, देखीं, पढ़ीं, विचारमें आयीं, उन बातोंकी याद आती है। ऐसे ही कुछ भविष्यकी बातें भी याद आती हैं कि हमें वह काम करना है, वहाँ जाना है, उससे मिलना है, इतना धंधा करना है आदि। इस तरह भूतकी और भविष्यकी बातें याद आती हैं। इस चिन्तनको मिटानेके लिये बहुत तरहकी युक्तियाँ और उपाय हैं। उनमें सबसे बढ़िया उपाय है कि मनमें जो भी याद आये, वह अब है ही नहीं—ऐसा समझकर उसकी उपेक्षा कर दें और उससे तटस्थ हो जायँ अर्थात् वर्तमानमें उससे हमारा सम्बन्ध है ही नहीं—यह दृढ़ विचार कर लें। यह सीखनेकी बात नहीं है, प्रत्युत अनुभव करनेकी बात है।
भूतकालका सर्वथा अभाव है। जैसे उस कालका अभाव है, ऐसे उस कालकी (बीती हुई) घटनाओंका भी अभाव है। बीती हुई घटनाओंमें दो तरहकी बातें हैं। एक हमने भोगोंको भोगा और एक हमने ऐसे ही देख लिया, सुन लिया, पढ़ लिया और छोड़ दिया। अत: मनोराज्यके दो भेद बताये गये हैं—मन्द और तीव्र। बिना भोगे हुए जो भोग याद आते हैं, वह मन्द मनोराज्य है और भोगे हुए भोग याद आते हैं, वह तीव्र मनोराज्य है। भोग जितना ही आसक्तिपूर्वक, लगनपूर्वक भोगा है, उतना ही उसका स्मरण ज्यादा होता है और जल्दी नहीं मिटता*।
मधुसूदनाचार्यके ‘भक्तिरसायन’ ग्रन्थमें आया है—
कामक्रोधभयस्नेहहर्षशोकदयाऽऽदय:।
तापकाश्चित्तजतुनस्तच्छान्तौ कठिनं तु तत्॥
(१।५)
‘काम, क्रोध, भय, स्नेह, हर्ष, शोक, दया आदि भाव चित्तरूपी लाखको तपाकर द्रवित करनेवाले हैं। भावरूपी उष्णताके शान्त होनेपर चित्तरूपी लाख ज्यों-की-त्यों कठोर हो जाती है।’
लाख कठोर होती है, पर तापक द्रव्य मिल जाय तो वह पिघल जाती है। मोम भी थोड़ा-सा ताप लगनेपर पिघल जाता है। यदि उसके ऊपर रंग लगाकर दबायें तो उसपर थोड़ा-सा रंग बैठ जाता है, पर नखसे उतारनेपर वह रंग उतर जाता है। अगर एक कटोरीमें मोम डालकर उसको आगपर रख दें और उसमें रंग डाल दें तो वह रंग मोममें एकदम मिल जाता है। मोम ठण्डा होनेपर भी वही रंग दीखता है। ऐसे ही जिन भोगोंको भोगनेमें, जिन घटनाओंमें हमारा चित्त ज्यादा पिघला है, हम उसमें ज्यादा तल्लीन हुए हैं, उनका रंग हमारे मनमें बैठा हुआ है। अत: उनकी याद ज्यादा आती है। भूतकालमें हमने जो भोग भोगा है, वह अब बिलकुल नहीं है; परन्तु वह पिघले हुए चित्तमें बैठ गया है, इसलिये वह बड़ी तेजीसे आता है। रागपूर्वक, आसक्तिपूर्वक भोगा गया भोग कई वर्ष बीतनेपर भी ज्यों-का-त्यों दीखता है। ज्यों-का-त्यों दीखनेपर भी वह भूतकालमें ही है, अभी तो वह है ही नहीं! यह उसको हटानेकी बहुत बढ़िया युक्ति है! इसलिये आप इसका अनुभव करें कि वह अभी नहीं है। यह बिलकुल शंकारहित, पक्की बात है कि वह घटना अभी नहीं है, वह वस्तु अभी नहीं है, वह क्रिया अभी नहीं है, वह संग अभी नहीं है। हम उस घटना आदिको मिटाना चाहते हैं, चित्तको ठीक करना चाहते हैं। परन्तु उस घटना आदिको मिटानेसे वह नहीं मिटेगी। चित्तको ठीक करनेसे वह ठीक नहीं होगा। उसको मिटानेकी, ठीक करनेकी चेष्टा करना तो उसको सत्ता देकर दृढ़ करना है। वास्तवमें वह अभी है ही नहीं। जब वह है ही नहीं, तो फिर चंचलता क्या रही? आश्चर्यकी बात है कि जो नहीं है, उसीसे हम दु:खी हो रहे हैं! जिसका अभाव है, उसीसे हम भयभीत हो रहे हैं!
काम, क्रोध, भय, स्नेह, हर्ष, शोक और दया—ये सात बातें हैं, जिनसे चित्त पिघलता है (इन सबमें मुख्य राग-द्वेष हैं)। कामनासे कोई भोग भोगते हैं तो कामना जितनी तेज होती है, उतना ही चित्त ज्यादा पिघलता है और उतना ही वह ज्यादा याद आता है। क्रोध तेजीका आता है तो चित्त ज्यादा पिघलता है। कभी किसी कारणसे जोरसे भय लगता है तो वह भी भीतर बैठ जाता है, जल्दी निकलता नहीं। ऐसे ही किसीसे ज्यादा स्नेह होता है तो चित्त पिघल जाता है। मित्रके मिलनेसे बड़ा हर्ष होता है तो इससे चित्त पिघलता है। कोई मर जाता है और उसका बहुत ज्यादा शोक होता है तो वह चित्तमें बैठ जाता है। थोड़ा शोक हो तो थोड़ा बैठता है। किसीको देखकर दया आ जाती है तो वह भी चित्तमें बैठ जाती है। परन्तु ‘अभी वह नहीं है’—यह बिलकुल पक्की बात है।
कुत्तेके शरीरमें कहीं घाव हो जाय तो वह उसको जीभसे चाटता है। उसकी जीभकी लारमें एक शक्ति होती है, जिससे वह घाव मिट जाता है। परन्तु बन्दरके शरीरमें घाव हो जाय तो वह उसको बार-बार कुरेदता है, जिससे वह घाव मिटता नहीं। ऐसे ही दो तरहकी बात है—चाटना और कुरेदना। अभी नहीं है—यह चाटना है और बार-बार याद करना और उसको मिटानेके लिये बार-बार चेष्टा करना कुरेदना है। जैसे, किसीका लड़का मर जाय तो वह उसको बार-बार याद करता है कि वह बड़ा अच्छा था, मर गया! उसको याद नहीं आये तो लोग आकर याद करा देते हैं! स्त्रियाँ प्राय: याद करा देती हैं। वे आती हैं और कहती हैं कि छोरा मेरी गोदीमें ऐसे आता था, इस तरहसे मेरेसे चिपक जाता था! वह ऐसा था, ऐसा उसका रूप था, ऐसी उसकी चंचलता थी! इन बातोंसे घाव गीला हो जाता है, घाव बढ़ जाता है, शोक बढ़ जाता है और लड़केकी याद ज्यादा आती है। ऐसे ही काम, क्रोध, भय आदिकी बात याद करना घावको बढ़ानेकी रीति है। उसको चाटकर साफ कर दें कि कितना ही काम, क्रोध, लोभ हुआ, मोह, आसक्ति हुई, कैसा ही भोग भोगा, वह वास्तवमें उस समय भी नहीं था, अब तो है ही नहीं—‘नासतो विद्यते भाव:’। जिन व्यक्तियोंमें हमारा स्नेह था, मोह था, मित्रता थी, वे मर गये अथवा अलग हो गये। वे कहीं रहते हैं, हम कहीं रहते हैं। अभी न वे व्यक्ति हैं, न वह देश है, न वह समय है, न वह अवस्था है, न वह परिस्थिति है। उसका जितनी दृढ़तासे अभाव मान सकें, मान लें और उसकी उपेक्षा कर दें। न उससे राग करें, न द्वेष करें, प्रत्युत तटस्थ हो जायँ।
प्रश्न—भूतकाल और भविष्यकाल तो अभी नहीं है, पर वर्तमानकाल तो अभी है ही?
उत्तर—वास्तवमें वर्तमानकाल है ही नहीं। भूत और भविष्यकालकी सन्धिको ही वर्तमानकाल कह देते हैं। पाणिनिव्याकरणका एक सूत्र है—‘वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा’ (३।३।१३१) अर्थात् वर्तमानसामीप्य भी वर्तमानकी तरह होता है। जैसे, भूतकालको लेकर कहते हैं कि ‘मैं अभी आया हूँ’ और भविष्यकालको लेकर कहते हैं कि ‘मैं अभी जा रहा हूँ’—यह वर्तमानसामीप्य है। वास्तवमें वर्तमानसामीप्यको ही वर्तमानकाल कह देते हैं। अगर वर्तमानकाल वास्तवमें होता तो वह कभी भूतकालमें परिणत नहीं होता।
वास्तवमें देश, काल, आदि वर्तमान नहीं हैं, प्रत्युत तत्त्व (सत्ता) ही वर्तमान है। तात्पर्य है कि जो प्रतिक्षण बदलता है, वह वर्तमान नहीं है, प्रत्युत जो कभी बदलता नहीं, वही वर्तमान है। वह तत्त्व, भूत, भविष्य और वर्तमान—सबमें सदा वर्तमान है, पर उस तत्त्वमें न भूत है, न भविष्य है और न वर्तमान है। कालमें तो सत्ता है, पर सत्तामें काल नहीं है। सत्ता कालसे अतीत है।
वर्तमान (सत्ता, स्वरूप) सबका सदा ही निर्दोष और शान्त है। अत: भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंको छोड़कर उसी निर्दोष और शान्त सत्तामें स्थित होना है अर्थात् उसमें अपनी स्वत:सिद्ध स्थितिका अनुभव करना है। अनुभव होनेपर न मन रहेगा, न मनकी चञ्चलता रहेगी, प्रत्युत सत्तामात्र रहेगी।