मनकी हलचलके नाशके सरल उपाय

संत-महात्मा या महापुरुष प्राय: अपने प्रवचनमें बार-बार कहा करते हैं कि जिस कामको हमलोग कर नहीं सकते अर्थात् जिसका होना हमसे सम्भव ही नहीं है, तथा जिसे करना भी नहीं चाहिये, उसको करनेकी इच्छासे अशान्ति होगी ही। अत: उसे करनेकी इच्छा नहीं करनी चाहिये। क्योंकि ऐसी इच्छा होनेसे कोई चीज पूरी मिलती नहीं, यदि मिल भी जाय तो ठहरती नहीं, ठहरती है तो अपूर्ण होनेके कारण उससे तृप्ति नहीं हो सकती। इसलिये इच्छा या कामना रखकर क्रिया करना उचित नहीं है। यदि यही चाह परमात्माकी प्राप्तिके लिये उत्कट हो जाय तो उनकी प्राप्ति हो जाय। श्रीभगवान् नित्य प्राप्त हैं, इसलिये केवल चाहमात्रसे ही मिल जाते हैं। उनकी प्राप्ति होनेके बाद कृतकृत्यता, ज्ञात-ज्ञातव्यता और प्राप्त-प्राप्तव्यता सभी प्राप्त हो जाती है, कुछ भी बाकी नहीं रहता।

विचार करना चाहिये—जो होनेवाला है वह होकर रहेगा। जो नहीं होनेवाला है वह होगा नहीं। फिर नयी चाह करें ही क्यों? केवल अपने कर्तव्यका तत्परतासे पालन करते रहें।

जब भी मनमें दु:ख, शोक, चिन्ता, विषाद और हलचल हो तभी यदि नीचे लिखे सिद्ध मन्त्रोंकी कई बार आवृत्ति कर ली जाय तो ये सभी विकार शीघ्र ही दूर हो सकते हैं।

भविष्यकी चिन्ता मिटानेके लिये

(सिद्ध मन्त्र)

(क) यदभावि न तद्भावि भावि चेन्न तदन्यथा।

इति चिन्ताविषघ्नोऽयमगद: किं न पीयते॥

अर्थ—जो नहीं होनेवाला है वह होगा नहीं, जो होनेवाला है वह होकर ही रहेगा। चिन्तारूपी विषका शमन करनेवाली इस ओषधिका पान क्यों न किया जाय!

(ख) होइहि सोइ जो राम रचि राखा।

को करि तर्क बढ़ावै साखा॥

भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालकी चिन्ता मिटानेके लिये

(सिद्ध मन्त्र)

(क) अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।

गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिता:॥

(गीता २। ११)

अर्थ—तू शोक न करनेयोग्य मनुष्योंके लिये शोक करता है और पण्डितोंके-से वचनोंको कहता है; परंतु जिनके प्राण चले गये हैं, उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं, उनके लिये भी पण्डितजन शोक नहीं करते।

(ख) होतब होत बड़ो बली ताको अटल बिचार।

किंण मानी मानी नहीं होनहार से हार॥

हर समय भगवान् के भरोसे प्रसन्न रहनेके लिये

(सिद्ध मन्त्र)

(क) सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥

(गीता १८।६६)

अर्थ—सम्पूर्ण धर्मोंको अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको मुझमें त्यागकर (समर्पितकर) तू केवल एक मेरी ही शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।

(ख) चिन्ता दीनदयाल को मो मन सदा अनन्द।

जायो सो प्रतिपालिहै रामदास गोविन्द॥

अन्त:करणमें अधिक उथल-पुथल होनेपर मनको समझानेके लिये

(सिद्ध मन्त्र)

(क) मना मनोरथ छोड़ दे तेरा किया न होय।

पानी में घी नीपजे तो रूखा खाय न कोय॥

भजन

(ख) जीव तू मत करना फिकरी, जीव तू मत करना फिकरी।

भाग लिखी सो हुई रहेगी, भली बुरी सगरी॥ टेर॥

तप करके हिरनाकुश आयो, वर पायो जबरी।

लोह लकड़ से मरॺो नहीं, वो मरॺो मौत नखरी॥ १॥

सहस्र पुत्र राजा सगरके, तप कीनो अकरी।

थारी गति ने तू ही जाने, आग मिली ना लकरी॥ २॥

तीन लोक की माता सीता, रावण जाय हरी।

जब लक्ष्मणने लंका घेरी, लंका गइ बिखरी॥ ३॥

आठ पहर साहेब को रटना, ना करना जिकरी।

कहत कबीर सुनो भाई साधो रहना बे-फिकरी॥ ४॥

चिन्ता छोड़ते हुए अपने कर्तव्यसे कभी च्युत

न हों। श्रीभगवान् की आज्ञा है—

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

(गीता २। ४७)

अर्थ—तेरा कर्म करनेमात्रमें ही अधिकार है, फलमें कभी नहीं; और तू कर्मोंके फलकी वासनावाला भी मत हो तथा तेरी कर्म न करनेमें भी प्रीति न हो।

इसलिये करनेमें सावधान रहे और जो हो जाय, उसमें प्रसन्न रहे एवं सदा भगवन्नाम जपता रहे।

श्रीभगवन्नाम-माहात्म्य

सम्पूर्ण पापोंके नाशके लिये भगवन्नाम खास औषध है। चारों ही युग और चारों ही वेदोंमें नामकी महिमा है, परंतु कलियुगमें विशेष है; क्योंकि कलियुगमें इसके समान कोई उत्तम उपाय नहीं है—

चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ।

कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ॥

तुलसी हठि हठि कहत नित, चित सुनि हित करि मानि।

लाभ राम सुमिरन बड़ो, बड़ी बिसारे हानि॥

बिगरी जन्म अनेक की सुधरै अबहीं आजु।

होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु॥

जितनी ही प्रतिकूल परिस्थिति आती है, वह सब पूर्व-पापोंका नाश करनेके लिये तथा अपने कर्तव्यके विषयमें सचेत करनेके लिये आती है। उस समय यह विचार करे—‘इससे मेरा अन्त:करण पवित्र हो रहा है।’ हृदयकी सारी हलचल मिटाने और अन्त:करणको भगवन्मुखी बनानेके लिये जप और कीर्तन करना चाहिये एवं श्रीभगवान् को बारम्बार प्रणाम करना चाहिये। श्रीमद्भागवतके अन्तिम श्लोकमें कहा है—

नामसंकीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम्।

प्रणामो दु:खशमनस्तं नमामि हरिं परम्॥

अर्थ—जिनके नामोंका संकीर्तन सारे पापोंको सर्वथा नष्ट कर देता है और जिनको किया हुआ प्रणाम सारे दु:खोंको शान्त कर देता है, उन्हीं परमेश्वर श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ।

मनकी हलचलका कारण क्या है?

जब मनमें हलचल होने लगे तभी यह विचार करना चाहिये कि इसका कारण क्या है। गहराईसे विचार करनेपर पता लगेगा कि अपनी मनचाहीका न होना और अनचाहीका हो जाना—यही मनकी हलचलका कारण है।

भक्तियोगकी दृष्टिसे शरीर, प्राण, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि तथा मैंपन अपना नहीं है; अपितु सब कुछ भगवान् का है। इनको अपना और अपनेको भगवान् से अलग मानना, इस विपरीत मान्यतासे ही मनमें दु:ख और हलचल होती है। हलचल होनेका और कोई कारण नहीं है। जो कुछ होता है वह हमारे परमसुहृद् प्रभुका मङ्गलमय विधान है, यह सोचकर प्रसन्न होना चाहिये; उलटे मनको मैला करना सर्वथा नासमझी ही है।

ज्ञानयोगकी दृष्टिसे शरीर, प्राण, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि तथा मैंपन सब कुछ प्रकृतिका है। मैंका आधार परमात्मतत्त्व है, वह अपना स्वरूप ही है। प्रकृति ही प्रकृतिके गुणोंमें बर्त रही है (गीता अध्याय १३ श्लोक २९), स्वरूप तो अपने आपमें नित्य स्थित है ही। उसमें क्रिया करना-कराना सम्भव ही नहीं है। तब फिर हलचल कैसी?

कर्मयोगकी दृष्टिसे शरीर, प्राण, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि तथा मैंपन—यह सब कुछ अपना नहीं, संसारका है और इनको संसारकी सेवामें ही लगाना है। अपने लिये इनकी आवश्यकता नहीं है। इनको अपना तथा अपने लिये माननेसे ही दु:ख आता और हलचल होती है। यह मान्यता—यह भूल मिट गयी, फिर दु:ख और हलचल कैसे रह सकती है?

ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, पुरुषार्थवाद और प्रारब्धवाद इन सबका तात्पर्य मनकी चिन्ताको मिटानेमें ही है, कर्तव्य-कर्मको छुड़ा देनेमें बिलकुल नहीं है।

उपर्युक्त दृष्टियोंसे यह बात सिद्ध होती है कि शरीर आदिको चाहे तो भगवान् का, चाहे प्रकृतिका और चाहे संसारका मान लो। ‘ये अपने नहीं है’—इस नित्य-सिद्ध बातको न मानकर अपना मानना भूल और बेसमझी है। यही दु:खोंका और हलचलका कारण है। भूल मिटनेके बाद हलचलके लिये किञ्चिन्मात्र भी स्थान नहीं है। फिर तो केवल आनन्द-ही-आनन्द है।