मातृशक्तिका घोर अपमान
मन जाने सब बात, जान बूझ अवगुण करे।
क्यों चाहत कुसलात, कर दीपक कूएँ पड़े॥
वर्तमानमें ऐसे भयंकर-भयंकर पाप हो रहे हैं कि सुनकर रोंगटे खड़े हो जायँ, आँखें डबडबा जायँ, हृदय द्रवित हो जाय! राम-राम-राम, कितना घोर अन्याय, घोर पाप आप कर रहे हो, पर उधर आपका खयाल ही नहीं है! मनुष्यशरीरको सबसे दुर्लभ बताया गया है—
दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभङ्गुर:।
(श्रीमद्भा० ११।२।२९)
लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते
मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीर:।
(श्रीमद्भा० ११।९।२९)
बड़ें भाग मानुष तनु पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥
(मानस ७।४३।७)
ऐसे दुर्लभ मनुष्य-शरीरके आरम्भको ही खत्म कर देना, काट देना जीवोंके साथ कितना घोर अपराध है, कितना अन्याय है, कितना पाप है! मेरे मनमें बड़ा दु:ख हो रहा है, जलन हो रही है, पर क्या करूँ! जिस मनुष्य-शरीरसे परमात्माकी प्राप्ति हो जाय, उस मनुष्य-शरीरको पैदा ही नहीं होने देना, नष्ट कर देना पापकी आखिरी हद है! किसी जीवको दुर्लभ मनुष्य-शरीर प्राप्त न हो जाय, किसीका कल्याण न हो जाय, उद्धार न हो जाय, इसलिये गर्भको होने ही नहीं देना है, पहले ही दवाइयाँ लेकर नष्ट कर देना है, गिराकर नष्ट कर देना है, काटकर नष्ट कर देना है, गर्भस्राव करके नष्ट कर देना है, गर्भपात करके नष्ट कर देना है, भ्रूणहत्या करके नष्ट कर देना है; हमारा पाप भले ही हो, हम नरकोंमें भले ही जायँ, पर किसीको कल्याणका मौका नहीं मिलने देना है—ऐसी कमर कस ली है! अब मैं क्या करूँ? किसको कहूँ? और कौन सुने मेरी? कोई सुनता नहीं?
हम साधुओंके लिये शास्त्रोंमें कहा गया है कि चातुर्मासमें मत घूमो। हम दो महीने एक जगह रहते हैं, कई तीन महीने रहते हैं, कई चार महीने रहते हैं। कारण यह है कि चातुर्मासमें वर्षा होती है तो हरेक बीजका अंकुर उगता है। अंकुर होकर वह पौधा बनता है और फिर बड़ा होकर वृक्ष बनता है। चलने-फिरनेसे अंकुर पैरोंके नीचे आकर नष्ट हो जाते हैं। इसलिये चातुर्मासमें चलना-फिरना बन्द करते हैं, जिससे किसीकी हिंसा न हो जाय। भागवतमें आया है कि अगर हिंसापर विजय प्राप्त करनी हो तो शरीरकी चेष्टा कम करो—‘हिंसा कायाद्यनीहया’ (७।१५।२३)। जब स्थावर जीवोंकी हिंसाका भी इतना विचार है कि चातुर्मासमें घूमना-फिरना मना कर दिया तो फिर जंगम जीवोंके विषयमें कहना ही क्या है! परन्तु आज लोग जंगम जीवोंमें भी सबसे श्रेष्ठ, यहाँतक कि देवताओंसे भी श्रेष्ठ मनुष्य-शरीरका नाश करनेके लिये उद्योग कर रहे हैं, क्या दशा होगी!
मैं अभिमानसे नहीं कहता हूँ, प्रत्युत मैंने जैसा सुना है, समझा है, वैसा कहता हूँ कि हिन्दू-संस्कृतिने जीवके उद्धारके लिये जितना उद्योग किया है, इतना दूसरी किसी संस्कृतिने नहीं किया है। ईसाई, मुसलमान, यहूदी, बौद्ध, पारसी आदि किस सम्प्रदायने जीवोंके कल्याणके लिये उद्योग किया है? कौन-सा सम्प्रदाय केवल जीवोंके कल्याणके लिये बना है? आप खुद देख लें। वे अपनी संख्या बढ़ानेका, अपने मतका प्रचार करनेका उद्योग तो करते हैं, पर जीवमात्रके कल्याणका उद्योग नहीं करते। जो संस्कृति केवल जीवोंके कल्याणके लिये ही है, उसमें किसी जीवको न आने देना, उसको पहलेसे ही रोक देना, नष्ट कर देना कितना भयंकर पाप है! आश्चर्यकी बात है कि इस पापको आज सामाजिक सभ्यता माना जा रहा है! इसका यही अर्थ हुआ कि जल्दी-से-जल्दी नरकोंमें जाना है, भयंकर-से-भयंकर नरक भोगना है, अगर नरकोंमें जानेसे आड़ लग गयी तो गजब हो जायगा!
विचार करें, किसीकी भी उन्नति रोक देना क्या पुण्य है? कोई धनी होना चाहे तो धनी नहीं होने देंगे, धर्मात्मा होना चाहे तो धर्मात्मा नहीं होने देंगे, कल्याण करना चाहे तो कल्याण नहीं होने देंगे, शरीरसे हृष्ट-पुष्ट होना चाहे तो हृष्ट-पुष्ट नहीं होने देंगे, क्या यह पुण्य है? अपनी थोड़ी सुख-सुविधाके लिये दूसरे जीवोंका नाश कर देना; जो भगवत्प्राप्तिके मार्गमें जा सकते थे, उनको जन्म नहीं लेने देना कितने भारी अन्याय-अत्याचारकी बात है! जान-जानकर घोर पाप मत करो अन्नदाता! इतनी तो कृपा रखो। आपके घरोंका बालक हूँ, आपसे ही पला हूँ, अभी भी आपसे ही निर्वाह होता है। आप सब माँ-बाप हो! थोड़ी कृपा करो कि ऐसा घोर पाप मत करो। पाराशरस्मृतिमें आया है—
यत्पापं ब्रह्महत्याया द्विगुणं गर्भपातने।
प्रायश्चित्तं न तस्यास्ति तस्यास्त्यागो विधीयते॥
(४।२०)
‘ब्रह्महत्यासे जो पाप लगता है, उससे दुगुना पाप गर्भपात करनेसे लगता है। इस गर्भपातरूपी महापापका कोई प्रायश्चित्त नहीं है, इसमें तो उस स्त्रीका त्याग कर देनेका उसको अपनी स्त्री न माननेका ही विधान है।’
अगर कम सन्तान ही चाहते हो तो ब्रह्मचर्यका पालन करो। उसका हम अनुमोदन करेंगे। आप ब्रह्मचर्यका पालन करो तो आपको पाप नहीं लगेगा, प्रत्युत शरीर नीरोग होगा, हृष्ट-पुष्ट होगा। परन्तु शरीरका नाश करना और सन्तान पैदा नहीं करना—यह कितनी लज्जाकी, कितने दु:खकी बात है!
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।
आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥
धर्मसर्वस्व सुनो और सुनकर धारण कर लो। जो आचरण अपनेसे प्रतिकूल हो, उसको दूसरोंके प्रति मत करो। कोई आपकी उन्नति रोक दे, आपका जन्म रोक दे, आपका बढ़ना रोक दे, आपका पढ़ना रोक दे, आपका भजन-ध्यान रोक दे, आपके इष्टकी प्राप्ति रोक दे तो उसको पाप लगेगा कि पुण्य लगेगा? जरा सोचें। कोई जीव मनुष्यजन्ममें आ रहा है, उसमें रुकावट डाल देना, उसको जन्म ही नहीं लेने देना कितने बड़े पापकी बात है! हाँ, आप ब्रह्मचर्यका पालन करो तो आपका शरीर भी ठीक रहेगा और पाप भी नहीं लगेगा। परन्तु भोग तो भोगेंगे, शरीरका नाश तो करेंगे, पर सन्तान पैदा नहीं होने देंगे—यह बड़े भयंकर पतनकी बात है।
छोटे-छोटे जीव-जन्तुओंको आप मार देते हो। वे बेचारे कुछ भी कर नहीं सकते; परन्तु क्या भगवान् के यहाँ न्याय नहीं है? निर्बलको नष्ट कर देना कितना बड़ा पाप है! महाभारतकी कथा आप सुनो-पढ़ो। युद्धमें दूसरेको चेताते हैं कि सावधान हो जाओ, मैं बाण चलाता हूँ! शत्रुपर बाण भी चलाते हैं तो पहले उसको सावधान करते हैं, फिर बाण चलाते हैं। जो बेचारे कुछ कर नहीं सकते, अपना बचाव भी नहीं कर सकते और आपका अनिष्ट भी नहीं कर सकते, ऐसे क्षुद्र जन्तुओंको नष्ट कर देना बड़ा भारी अन्याय, अत्याचार है। सज्जनो! इन बातोंपर थोड़ा ध्यान दो, जरा सोचो। आप अपना बुरा नहीं चाहते हो तो दूसरोंका बुरा करनेका आपको क्या अधिकार है? अत: किसीके भी सुखमें बाधा मत दो, किसीकी भी उन्नतिमें बाधा मत दो, किसीके भी जन्ममें बाधा मत दो, किसीका भी भला होनेमें बाधा मत दो। जो बात आप अपने लिये नहीं चाहते, उसको औरोंके लिये भी मत चाहो। यह सबसे पहला धर्म है।
जो जीव असमर्थ हैं, कुछ कर नहीं सकते, उनके साथ अत्याचार करना भगवान् को सह्य नहीं है। जो दूसरोंका नाश करनेके लिये समर्थ होते हैं, उनको गीताने असुर बताया है—‘प्रभवन्त्युग्रकर्माण: क्षयाय जगतोऽहिता:’ (१६।९)। जान-जानकर मूक, असमर्थ जीवोंकी हत्या करते हो और चाहते हो कि हमारा भला हो जाय; कैसे हो जायगा? कल्याण कैसे हो जायगा? मैं तो हृदयसे चाहता हूँ कि आपकी दुर्गति न हो, आपका कल्याण हो, आपका उद्धार हो! पर मैं करूँ क्या?
हिन्दू-संस्कृति जितनी आध्यात्मिक उन्नति बताती है, उतनी दूसरी कौन-सी संस्कृति बताती है? ईसाई, मुसलमान आदि सब अपनी-अपनी टोली बढ़ानेके लिये काम करते हैं कि हमारे सम्प्रदायको माननेवाले लोगोंकी संख्या ज्यादा हो जाय, हमारा नाम ज्यादा हो जाय। परन्तु जीवमात्रका कल्याण हो जाय, उद्धार हो जाय, वह दु:खोंसे, नरकोंसे, जन्म-मरणसे छूट जाय, उसको सदाके लिये परम आनन्दकी प्राप्ति हो जाय—ऐसी लगन किसमें है? विश्वशान्तिके लिये, विश्वके कल्याणके लिये यज्ञ आदि कौन करता है? मैंने दिल्लीमें छपा एक पन्ना देखा। उसमें लिखा था कि जो मूर्ति-पूजा करे, उसको मार दो! जो मूर्ति-पूजा करते हैं, वे कौन-सा अन्याय करते हैं? कौन-सा पाप करते हैं? किसका नुकसान करते हैं? वे मूर्ति-पूजा करें तो तुम्हारे क्या बाधा लगी? अब आप बतायें कि ऐसा कौन-सा सम्प्रदाय है, जो जीवके कल्याणकी ही बात कहता हो?
उमा संत कइ इहइ बड़ाई।
मंद करत जो करइ भलाई॥
(मानस ५।४१।७)
ऐसी बात जिस संस्कृतिमें आयी है, उसमें कोई जीव न आ जाय, इसके लिये आरम्भमें ही नसबन्दी कर देना, गर्भपात कर देना, आपरेशन करा लेना कितना महान् अत्याचार है! अगर कोई जीव मनुष्य बननेवाला है और उसको रोक दोगे तो वे हिन्दू-संस्कृतिको न माननेवाले विधर्मियोंके यहाँ पैदा होंगे और हिन्दुओंका नाश करेंगे! विधर्मियोंकी संख्या बढ़ेगी तो वे क्या करेंगे? सबका कल्याण हो जाय—ऐसी चेष्टा किस सम्प्रदायमें है? घोर-से-घोर युद्ध भी कल्याणकारी हो जाय—ऐसा उपदेश गीताने दिया है। महाभारतका युद्ध भी धर्मक्षेत्र ‘कुरुक्षेत्र’ में जाकर किया गया; क्योंकि उस जगह मरनेसे कल्याण होता है। युद्ध भी उस भूमिपर किया जाय, जिसपर मरनेसे कल्याण हो जाय—इस प्रकार जो संस्कृति प्रत्येक परिस्थितिमें कल्याणकी बात सामने रखती है, उस संस्कृतिमें जीवको जन्म ही नहीं लेने देना कितना घोर अपराध है! मैं अभिमानकी बात नहीं करता हूँ; पर बात अभिमानकी है, इसलिये क्षमा माँग लेता हूँ। आज यहाँ सत्संगका जो समारोह हो रहा है, रामचरितमानसके नवाह्न पारायणका आयोजन हो रहा है—इस तरहका सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणके लिये समारोह ईसाइयोंमें होता है कि मुसलमानोंमें होता है कि यहूदियोंमें होता है कि पारसियोंमें होता है? कहीं होता हो तो बताओ? हमारे सत्संग-समारोहका, रामायण-पाठका उद्देश्य क्या है? टोली बढ़ानेके लिये, रुपया इकट्ठा करनेके लिये, यश-प्रतिष्ठाके लिये, मान-बड़ाईके लिये, भोगकी प्राप्तिके लिये, सांसारिक उन्नतिके लिये, किसके लिये यह समारोह हो रहा है?
रामजीने शत्रुका भी अनहित नहीं किया—‘अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा’ (मानस २।१८३।६)। अंगदको रावणके पास भेजा तो उससे भी कहा—‘काजु हमार तासु हित होई’ (६।१७।८)। जो सीताजीको हरकर ले गया और मरने-मारनेको तैयार है, उसके पास भी दूतको इसलिये भेजते हैं कि काम तो हमारा बन जाय, हमें हमारी स्त्री मिल जाय, पर उसका हित हो जाय! यह बात किस संस्कृतिमें है? उस संस्कृतिमें जन्म लेना बन्द कर देना कितना बड़ा भारी अन्याय है! शास्त्र जिसको महापाप कहता है, जिस महापापको आप जानते हो, उसको बड़े जोरोंसे कर रहे हो और चाहते हो कि सद्गति हो जाय, कैसे हो जायगी?
दो जाट थे। दोनोंके पास गाय-भैंस, भेड़-बकरी आदि खूब धन था। खेती भी बहुत अच्छी होती थी। उनमेंसे एक परिवारकी स्त्री दूसरे परिवारके साथ वैर रखती थी। वह उनके बाड़ेमें जाकर घास जला देती, उनकी खेती नष्ट कर देती, पर ऐसा करनेपर भी उसके बेटे-पोते, गाय-भैंस खूब बढ़ते! उस स्त्रीका पति कहता कि भगवान् के घर बड़ा अंधेर है! वह दूसरोंका अनिष्ट करती है, पर अच्छी तरह फलती-फूलती है! ऐसा करते-करते कई वर्ष बीत गये। अब उस स्त्रीके जवान-जवान बेटे मरने लगे, धन नष्ट हो गया, खेती होनी भी बन्द हो गयी! तब वह बोला कि भगवान् के घर अंधेर नहीं, देर है! वास्तवमें देर भी नहीं है! भगवान् के विधानसे जो होना चाहिये, वह समयपर हो रहा है। मनुष्यकी दृष्टि तुच्छ है, इसलिये उसको ऐसा दीखता है कि देर है।
बहुत-से लोग यह शंका किया करते हैं कि जो धर्मका पालन करते हैं, वे दु:ख पा रहे हैं और जो पाप करते हैं, वे बड़ी उन्नति कर रहे हैं, आरामसे रह रहे हैं, सुख पा रहे हैं। परन्तु इस बातका अभी पता नहीं है। जब परिणाम (फल) सामने आयेगा, तब पता लगेगा। परन्तु फिर रोनेके सिवाय कुछ नहीं होगा!
सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ।
कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोस लगाइ॥
(मानस ७।४३)
इसलिये पहले ही चेत कर लो तो बड़ी अच्छी बात है। कम-से-कम जान-बूझकर तो महान् अत्याचार, महान् पाप मत करो।
जब पाण्डव वनमें रहते थे, उस समय द्रौपदीने युधिष्ठिर महाराजसे प्रश्न किया कि महाराज! आप धर्मको छोड़कर एक पाँव भी आगे नहीं रखते, किसीका भी अनिष्ट नहीं करते, पर जंगलमें भटकते हो! अन्न-जल आदि भी पासमें नहीं है, फल-फूल आदि खाकर जीवन-निर्वाह करते हो! परन्तु जो अन्याय-ही-अन्याय करता है, वह दुर्योधन खूब मौज कर रहा है, राज्य कर रहा है! तो धर्म-कर्म कुछ है कि नहीं? ईश्वर कोई न्याय करता है कि नहीं? युधिष्ठिरजीने कहा कि देवी! तेरे भीतर यह बात कैसे पैदा हुई? जो अपनी सुख-सुविधाके लिये धर्मका पालन करता है, वह धर्मके तत्त्वको नहीं जानता। धर्मका तत्त्व तो वह जानता है, जो कष्ट पानेपर भी धर्मका त्याग नहीं करता। धर्मका महत्त्व है, सुख-सुविधाका नहीं। सुख-सुविधाका महत्त्व तो पशुओंमें भी है! मैं सुख-सुविधा पानेके लिये धर्मका पालन नहीं करता। विचार करें, जब धर्मका पालन भी अपनी सुख-सुविधाके लिये नहीं किया जाता, तो फिर उस सुख-सुविधाके लिये जो गर्भपात जैसे भयंकर पाप कर रहे हैं, उनकी क्या दशा होगी? गर्भपातमें भी विशेषरूपसे गर्भमें स्थित कन्याको गिरा देते हैं, इससे बढ़कर भयंकर पाप और क्या होगा?
मैंने बोर्डपर लिखा हुआ देखा है कि गर्भमें लड़का है, कि लड़की है—इसकी परीक्षा करो। इसका भाव यही है कि अगर गर्भमें लड़की है तो गर्भ गिरा दो! संसारमें स्त्रियोंकी अपेक्षा पुरुषोंको बड़ा दर्जा दिया गया है; परन्तु मातृशक्तिकी जो महिमा है, वह पुरुषशक्तिकी नहीं है! माँका दर्जा पितासे हजार गुना अधिक माना गया है—
सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते॥
(मनु० २।१४५)
पहले माँका नाम लेते हैं, पीछे पिताका नाम लेते हैं; जैसे—राधेश्याम, सीताराम, लक्ष्मीनारायण, गौरीशंकर आदि। कन्याको गर्भसे गिरा देना उस मातृशक्तिका महान् अपमान है। ये जितने भाई-बहन बैठे हैं, सब माँकी गोदीसे आये हैं, बापकी गोदीसे नहीं आये हैं। सबका पालन माँने किया है, बापने नहीं किया है। सबने दूध माँका पिया है, बापका नहीं पिया है। गायका बछड़ा जब दूध पीता है, तब गाय उसको चाटती है, उसकी तरफ देखती है, जिससे वह हृष्ट-पुष्ट होता है। अगर उसको दूसरी गायका दूध पिलाया जाय तो वह वैसा पुष्ट नहीं होता। कारण कि माँके प्यारसे, स्नेहसे बच्चेका जो पालन होता है, वह केवल दूधसे नहीं होता। माँकी बड़ी विलक्षण महिमा है! आप अपने सुख और सुविधाके लिये लोभमें आकर मातृशक्तिका नाश करते हो, कन्याको गिरा देते हो, यह बड़ा भारी पाप है। मातृशक्तिका इतना बड़ा अपमान कोई हो नहीं सकता! गर्भमें जो बच्ची है, वह मातृशक्ति है। उस मातृशक्तिका गर्भसे ही निवारण कर दोगे, उसको जन्म ही नहीं लेने दोगे तो कहाँ जन्मोगे? किसका दूध पीओगे? गोदी कहाँसे लाओगे? किस जगह प्यार पाओगे? कौन हृदयसे लगायेगा?
काशीके विद्वान् मदनमोहनजी महाराज कहते थे कि एक बार मैं किसीके विवाहमें गया हुआ था। उसमें बहनें-माताएँ बढ़िया-से-बढ़िया कपड़े-गहने पहनकर आयी थीं। एक बहनकी गोदमें छोटा बच्चा था। वह बच्चा टट्टी फिर गया। पासमें बैठी एक बहनने उससे कहा कि देख, तेरा बच्चा टट्टी फिर रहा है! यह सुनते ही वह बोली—अरे, चुप रह, हल्ला मत कर, बच्चेकी टट्टी रुक जायगी! ऐसी दया माँके सिवाय किसमें है, बताओ? बढ़िया रेशमी साड़ी खराब हो रही है, पर उसका खयाल न होकर बच्चेका खयाल है कि उसकी टट्टी रुक जायगी तो वह बीमार हो जायगा! कितनी विलक्षण बात है! उस मातृशक्तिका इतना अपमान, इतना तिरस्कार कि उसके गर्भको ही गिरा दो! कौन हमारा पालन करेगा? कौन रक्षा करेगा? कौन गर्भमें धारण करेगा? आजकल स्त्री और पुरुषके समान अधिकारकी बात कही जाती है, तो फिर स्त्रीकी तरह पुरुषको भी गर्भधारण करना चाहिये! वास्तवमें स्त्रियोंका समान अधिकार नहीं है, प्रत्युत ऊँचा अधिकार है; क्योंकि ये माँ हैं, माँ! साधुओंके बहुत मकान होते हैं, पर वे घर नहीं कहलाते। घर तो स्त्रीके कारण ही कहलाता है। इसलिये शास्त्रमें आया है—
न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते।
(महा० शान्ति० १४४।६)
अर्थात् घरका नाम घर नहीं है, प्रत्युत स्त्री (गृहिणी) ही घर कहलाती है। पुरुष बाजारमें नथ खरीदता है, लहँगा खरीदता है तो कोई उससे पूछे कि क्या आप नथ पहनते हो? वह कहेगा कि नहीं, घरमें चाहिये। गृहलक्ष्मी ही खास घर है। बहू घरमें आती है तो बहनें-माताएँ कहती हैं कि बहूरानी आ गयी! अब घर इसका है। लोग डींग हाँकते हैं कि नारी-जातिका बड़ा अपमान किया गया है, सम्मान तो हम अब करते हैं! वास्तवमें अब नारी-जातिका जितना अपमान हो रहा है, उतना पहले कभी नहीं हुआ। नारीके सम्मानके लिये ही महाभारतका युद्ध हुआ। नारी-जातिकी रक्षाके लिये ही रामजीने रावणसे युद्ध किया। नारी-जातिके सम्मानके लिये ही भीष्मजीने अपने प्राण त्याग दिये, पर शिखण्डी (जो पहले स्त्री था, वर्तमानमें नहीं)-पर बाण नहीं चलाया। परन्तु आज नारीकी मातृशक्तिको (परिवार-नियोजनके द्वारा) नष्ट करके उसको केवल भोग्य वस्तु बनाया जा रहा है। गर्भमें आयी कन्याको गिराया जा रहा है। क्या यह नारी-जातिका सम्मान है? यह तो नारी-जातिका घोर अपमान है।
बच्चीको गर्भसे गिरा दोगे तो आगे चलकर क्या दशा होगी? विवाह कहाँ करोगे? आपका गृहस्थ कैसे चलेगा? लड़की लेनेके लिये रुपया देना पड़ेगा। बचपनकी बात मेरेको याद है। उस समय जब बनियोंके यहाँ लड़की जन्मती थी, तब वे कहते थे कि रुपयोंकी थैली आयी है! परन्तु आज कहते हैं कि भाटा (पत्थर) आया है! ये दोनों बातें मेरी देखी हुई हैं। रुपयोंकी थैली इसलिये कहते थे कि विवाहमें रुपया आयेगा! अब यही दशा आगे हो जायगी!
यह बात सुनकर बड़ा आश्चर्य होता है कि आदमी अधिक हो जायँगे तो लोगोंको अन्न कैसे मिलेगा? यह बात तो वहाँ लागू होती है, जहाँ पहलेसे सीमित अन्न हो और आगे अन्न पैदा होनेकी सम्भावना न हो। ऐसी दशामें कह सकते हैं कि भाई, अन्न तो इतना ही है, पर जनसंख्या बढ़ रही है तो सबके हिस्सेमें कैसे आयेगा! परन्तु यह बात है ही नहीं! जनसंख्या बढ़ रही है तो अन्न भी पैदा हो रहा है। जहाँ वृक्ष अधिक होते हैं, वहाँ वर्षा अधिक होती है; मनुष्य अधिक होंगे तो क्या अन्न अधिक पैदा नहीं होगा? परन्तु आज अकाल क्यों पड़ता है? अकाल इसलिये पड़ता है कि मनुष्योंने पशुओंको खाना शुरू कर दिया; अत: मनुष्योंके लिये अन्नकी जरूरत नहीं और पशुओंके लिये घासकी जरूरत नहीं, फिर वर्षाकी क्या जरूरत है? आज खेतीमें जीवोंको मार देते हैं, टिड्डियोंको मार देते हैं, चूहोंको मार देते हैं, पक्षियोंको मार देते हैं, छोटे-छोटे जन्तुओंको मार देते हैं कि खेती ज्यादा हो जायगी। परन्तु आज अन्नका क्या भाव है? पहले जीवोंको नहीं मारते थे, तब अनाजका क्या भाव था और आज क्या भाव है? हिंसाका नतीजा बड़ा भयंकर होता है। अभी आप दुर्बलोंको मारते हो तो वे कभी सबल होकर आपको मारेंगे। इसलिये सज्जनो! कृपा करो, गर्भको मत गिराओ, भ्रूणहत्या मत करो।
एक कानूनकी बात है कि जो पुरुष अच्छी चीजका तिरस्कार करता है, उसको फिर वह चीज नहीं मिलती। जो पुरुष अन्नका तिरस्कार करता है, उसको निरर्थक नष्ट करता है, जूठन छोड़ देता है, उसको अन्नके बिना भूखों मरना पड़ेगा; चाहे इस जन्ममें हो, चाहे अगले जन्ममें! जो जलका निरर्थक नाश करता है, उसको जलके बिना प्यासा मरना पड़ेगा। जो नौकर अच्छे मालिकका त्याग करता है, अपमान करता है, ठीक नौकरी नहीं करता, उसको अच्छा मालिक नहीं मिलेगा। जो मालिक अच्छे नौकरका तिरस्कार करता है, उसको अच्छा नौकर नहीं मिलेगा। अच्छे सन्त-महात्मा मिल जायँ, पर उनका तिरस्कार करते हो, उनकी बात नहीं मानते हो तो आगे अच्छे सन्त नहीं मिलेंगे। मनुष्य बन जाओ तो भी अच्छे सन्त नहीं मिलेंगे; क्योंकि उनका आपने तिरस्कार किया है। मनुष्यजन्मको निरर्थक नष्ट करोगे, उसको अच्छे कामोंमें नहीं लगाओगे तो फिर मनुष्य-शरीर नहीं मिलेगा। ऐसे ही गर्भपात करोगे, मनुष्य-शरीरका तिरस्कार करोगे तो अगले जन्ममें सन्तानके बिना रोना पड़ेगा! एक सन्तसे किसीने पूछा कि इन स्त्रीकी सन्तान नहीं हुई, क्या कारण है? उन्होंने कहा कि इसने पूर्वजन्ममें बच्चेकी हत्या की है, इसलिये इसका बच्चा नहीं हुआ और न आगे होगा। उस स्त्रीकी जन्मभर कोई सन्तान नहीं हुई—यह मैं जानता हूँ, सच्ची बात है, पर नाम नहीं बताता हूँ। अगर कोई कहे कि गर्भपात करनेवालेकी सन्तान होती है, तो यह उसके पूर्वजन्ममें किये कर्मोंका फल है। इस जन्ममें किये गर्भपातरूप महान् पापका फल उसको अगले जन्ममें भोगना ही पड़ेगा। पिछले वर्ष की गयी खेतीका अन्न तो खाते हो, पर और खेती नहीं करते हो तो अगले वर्ष क्या खाओगे? अभी किये गये पापोंका भयंकर परिणाम भोगना पड़ेगा। इसलिये पापोंसे बचो, घोर पाप मत करो!*