मुक्ति और भक्ति

भगवान् का अंश होनेसे जीवमात्रमें भगवान् के प्रति स्वत: एक आकर्षण विद्यमान है। यह सिद्धान्त है कि आकर्षण सजातीयतामें होता है; अत: अंशका अंशीकी तरफ स्वत: आकर्षण होता है; जैसे—पृथ्वीका अंश होनेसे ऊपर फेंके गये पत्थरका स्वत: पृथ्वीकी तरफ (नीचे) आकर्षण होता है। जैसे भगवान् और उनका अंश जीव—दोनों अविनाशी हैं, ऐसे ही उनके बीच यह आकर्षण भी अविनाशी है। परन्तु जब जीव अहम् के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, शरीरमें मैं-मेरापन कर लेता है, तब यही आकर्षण संसारकी तरफ हो जाता है। वास्तवमें संसारकी तरफ शरीरका ही आकर्षण होता है; क्योंकि शरीर समष्टि संसारका अंश है; परन्तु शरीरसे तादात्म्यके कारण जीव उस आकर्षणको अपना मानता है।

जीवमें जो एक स्वत:सिद्ध आकर्षण है, वह भगवान् की तरफ होनेसे ‘प्रेम’ और संसारकी तरफ होनेसे ‘राग’ हो जाता है। संसारका आकर्षण (राग) भी बढ़ता रहता है१ और भगवान् का आकर्षण (प्रेम) भी बढ़ता रहता है२। परन्तु दोनोंमें फर्क यह है कि अनित्य होनेसे संसारका आकर्षण भी अनित्य होता है और नित्य होनेसे भगवान् का आकर्षण भी नित्य होता है। इसलिये संसारका रस तो नीरसतामें बदल जाता है, पर प्रेमका रस सदा सरस ही रहता है। वह प्रेम-रस प्रतिक्षण बढ़ता ही रहता है, उसका कभी अन्त आता ही नहीं! ‘दिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसम्भवम्।’

एक मार्मिक बात है कि जैसे जीवका भगवान् की ओर आकर्षण है, ऐसे ही भगवान् का भी जीवकी ओर आकर्षण है—‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’ (मानस ७।८६।२)। जीव तो संसारमें आकर्षण (राग) पैदा करके भगवान् से विमुख हो जाता है, पर भगवान् कभी जीवसे विमुख नहीं होते। जीवके प्रति उनके प्रेममें कभी किंचिन्मात्र भी कमी नहीं आती; क्योंकि वे पूर्ण हैं। इस प्रेमके कारण ही भगवान् जीवको निरन्तर अपनी ओर खींचते रहते हैं, उसको किसी भी अवस्था, परिस्थिति आदिमें टिकने नहीं देते! कोई भी अवस्था, परिस्थिति नित्य नहीं रहती। जीव जिसको भी पकड़ता है, उसको भगवान् छुड़ा देते हैं, यही भगवान् का जीवको अपनी ओर खींचना है। इतना ही नहीं, जीवको सांसारिक भोग और संग्रहसे स्वत: अरुचि, ग्लानि भी होती है; परन्तु हृदयमें भोग और संग्रहका ही महत्त्व होनेसे वह उनको पकड़े रखता है, छोड़ता नहीं। भगवान् छुड़ाते रहते हैं और वह नया-नया पकड़ता रहता है! आखिर भगवान् का अंश जो ठहरा!

बच्चेका माँसे जितना प्रेम होता है, उससे भी बहुत अधिक प्रेम माँका बच्चेसे होता है। परन्तु बच्चा माँके प्रेमको पहचानता नहीं। अगर बच्चा माँके प्रेमको पहचान ले तो वह माँकी गोदीमें रो ही नहीं सकता! अगर माँकी गोदीमें रोयेगा तो हँसेगा कहाँ? ऐसे ही भगवान् का जीवसे कम प्रेम नहीं है। काकभुशुण्डिजी बालरूप भगवान् श्रीरामके साथ खेलते-खेलते जब उनके पास आते हैं, तब भगवान् हँसने लगते हैं और जब उनसे दूर चले जाते हैं, तब भगवान् रोने लगते हैं—‘आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं’ (मानस ७।७७ क)। यह भगवान् का जीवके प्रति कितना प्रेम है! परन्तु अपनेको शरीर माननेके कारण, संसारमें आकर्षण (राग) होनेके कारण, भगवान् से विमुख होनेके कारण जीव भगवान् के आकर्षण (प्रेम) को पहचानता नहीं। अगर वह भगवान् के प्रेमको पहचान जाय तो उसका संसारमें आकर्षण हो ही नहीं!

जबतक शरीरमें अपनापन है, भोगोंका महत्त्व है, राग है, आसक्ति है, तबतक भगवान् का प्रेम प्रकट नहीं होता। बाहरसे भोगोंका त्याग कर देनेपर भी भीतरमें भोगोंके प्रति एक सूक्ष्म आकर्षण रहता है, जिसको ‘रसबुद्धि’ कहते हैं। जबतक यह रसबुद्धि रहती है, तबतक भोग और संग्रहके सुखकी पराधीनता रहती है। इस रसबुद्धिके निवृत्त होनेपर पराधीनता नहीं रहती और स्वाधीनता आ जाती है। इस स्वाधीनताको ही ‘मुक्ति’ कहते हैं। जो पहले प्रकृतिकी परवशताके कारण ‘प्रकृतिस्थ’ था, वही प्रकृतिकी परवशता मिटनेपर ‘स्वस्थ’ हो जाता है। रसबुद्धि निवृत्त होनेपर भी संस्कार-(स्मृति-) रूपसे अहंकारकी एक गन्ध रह जाती है। परंतु अहंकारकी इस गन्धको मिटानेके लिये कोई उद्योग नहीं करना पड़ता। साधनावस्थामें अपनी प्रक्रिया (साधन, मत) का एक आग्रह रहता है। सिद्ध (मुक्त) होनेपर यह आग्रह तो नहीं रहता, पर जिस साधनसे सिद्धि मिली है, उस साधनका एक महत्त्व (आदर) रहता है। यह महत्त्व ही अहंकारकी गन्ध है, जिसके कारण दार्शनिकोंमें तथा दर्शनोंमें मतभेद रहता है। परन्तु प्रेमकी प्राप्ति होनेपर यह अहंकारकी गन्ध भी निवृत्त हो जाती है और जीवकी परमात्माके साथ सहज एकता प्रकट हो जाती है।

ज्ञानयोगमें तो मुक्तिके बाद प्रेम प्राप्त होता है, पर भक्तियोगमें सीधे ही प्रेम प्राप्त हो जाता है। ज्ञानयोगके जिस साधकमें भक्तिके संस्कार होते हैं और जो मुक्तिको ही सर्वोपरि नहीं मानता, उसको मुक्तिमें सन्तोष नहीं होता। अत: ऐसे साधकको मुक्ति प्राप्त होनेके बाद प्रेमकी प्राप्ति हो जाती है*। परन्तु जिस साधकमें भक्तिके विशेष संस्कार नहीं होते और जो मुक्तिको ही सर्वोपरि मानता है, वह सदा मुक्त ही रहता है अर्थात् उसको प्रेमकी प्राप्ति होनी कठिन है। अपने मतका आग्रह और अभिमान प्रेमकी प्राप्तिमें आड़ लगा देता है।

जैसे, कोई मनुष्य राकेटमें बैठकर पृथ्वीकी गुरुत्वाकर्षण-शक्तिसे बाहर निकल जाता है, तो वह चन्द्रमाकी गुरुत्वाकर्षणशक्तिमें प्रवेश कर जाता है अर्थात् उसका आकर्षण चन्द्रमाकी तरफ हो जाता है। ऐसे ही सांसारिक रसबुद्धिकी निवृत्ति होनेपर जब साधक संसारके आकर्षणसे बाहर निकल जाता है, तब उसका आकर्षण स्वत: भगवान् की तरफ हो जाता है। संसारके आकर्षणसे बाहर निकलना ही मुक्ति है और भगवान् की तरफ आकर्षण होना ही भक्ति (प्रेम) है। मुक्तिमें एकरस तथा अखण्ड आनन्द है और भक्तिमें प्रतिक्षण वर्धमान तथा अनन्त आनन्द है।

प्रश्न—सभी भेद अहम् से पैदा होते हैं, तो फिर अहम् का नाश होनेपर प्रेमी-प्रेमास्पदका भेद कैसे सम्भव है?

उत्तर—तत्त्वसे प्रेमी और प्रेमास्पदमें किंचिन्मात्र भी भेद नहीं है। प्रेमी-प्रेमास्पदका भेद तो केवल प्रेमकी लीलाके लिये कल्पित है—

द्वैतं मोहाय बोधात्प्राग्जाते बोधे मनीषया।

भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥

पारमार्थिकमद्वैतं द्वैतं भजनहेतवे।

तादृशी यदि भक्ति: स्यात्सा तु मुक्तिशताधिका॥

(बोधसार)

‘बोधसे पहलेका द्वैत मोहमें डाल सकता है; परंतु बोध हो जानेपर भक्तिके लिये कल्पित द्वैत अद्वैतसे भी अधिक सुन्दर (सरस) होता है। वास्तविक तत्त्व तो अद्वैत ही है, पर भजनके लिये द्वैत है। ऐसी यदि भक्ति है तो वह मुक्तिसे भी सौगुनी श्रेष्ठ है।’

तात्पर्य है कि अहम् मिटनेसे पहलेका द्वैत बन्धनके लिये है और अहम् मिटनेके बादका द्वैत प्रेमके लिये है। ज्ञानमें तो द्वैतका अद्वैत होता है अर्थात् दो होकर एक हो जाते हैं और भक्तिमें अद्वैतका द्वैत होता है अर्थात् एक होकर दो हो जाते हैं। जीव और ब्रह्म एक हो जायँ तो ज्ञान होता है और एक ही ब्रह्म दो रूप हो जायँ तो भक्ति होती है।

एक ही अद्वैत तत्त्व प्रेमकी लीलाके लिये श्रीकृष्ण और श्रीजी—इन दो रूपोंमें प्रकट होता है। दोनोंमें कौन प्रेमी है और कौन प्रेमास्पद—इसका पता ही नहीं चलता; क्योंकि दोनों ही प्रेमी हैं और दोनों ही प्रेमास्पद हैं! मुक्त होनेके बाद प्रेमी भक्त श्रीजीमें लीन हो जाते हैं अर्थात् उनका दर्जा श्रीजीकी तरह हो जाता है। तात्पर्य है कि भगवान् में श्रीजीका तथा श्रीजीमें भगवान् का जैसा आकर्षण है, वैसा ही आकर्षण भगवान् में उन भक्तोंका तथा भक्तोंमें भगवान् का हो जाता है।