नम्र निवेदन
प्रस्तुत ग्रन्थमें परमश्रद्धेय श्रीस्वामीजी महाराजके उन लेखों एवं प्रवचनोंका अनूठा संग्रह है, जो अबतक अनेक पुस्तकोंके रूपमें अथवा स्वतन्त्र रूपमें प्रकाशित होते रहे हैं। भगवत्प्रेमी साधकोंके लिये यह संग्रह बहुत उपयोगी है और शीघ्र एवं सुगमतापूर्वक परमात्मतत्त्वका अनुभव करानेमें बहुत सहायक है।
वर्तमान समयमें साधन और साध्यका तत्त्व सरलतापूर्वक बतानेवाले ग्रन्थोंका अभाव-सा दीखता है। इसमें साधकोंको सही मार्ग-दर्शनके बिना बहुत कठिनाई होती है। ऐसी स्थितिमें परमात्मप्राप्तिके अनेक सुगम उपायोंसे युक्त तथा बहुत ही सरल एवं सुबोध भाषा-शैलीमें लिखित प्रस्तुत ग्रन्थका प्रकाशन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक देश, वेश, भाषा, मत, सम्प्रदाय आदिके साधकके लिये यह ग्रन्थ अत्यन्त उपयोगी है। प्रत्येक साधकको इस ग्रन्थमें अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये पूरी सामग्री मिलेगी।
इस ग्रन्थमें वि. सं. २०१० से लेकर वि. सं. २०५३ तक अलग-अलग समय पर लिखित एवं प्रकाशित लेखोंका संग्रह किया गया है। अत: प्रत्येक शीर्षकके अन्तर्गत दिये गये लेखोंका क्रम भी समयके अनुसार रखा गया है। पाठकोंसे प्रार्थना है कि यदि उनको कहीं परस्पर विरोध दिखे तो पहलेके लेखोंकी अपेक्षा आगेके लेखको ही महत्त्व दें।
यद्यपि इस ग्रन्थमें पुनरावृत्ति भी हुई है, तथापि समझानेकी दृष्टिसे इस प्रकारकी पुनरावृत्ति होना दोष नहीं है, प्रत्युत उपयोगी है। उपनिषद्में भी ‘तत्त्वमसि’—इस उपदेशकी नौ बार पुनरावृत्ति हुई है। इसलिए ब्रह्मसूत्रमें आया है—‘आवृत्तिरसकृदुपदेशात्’ (४।१।१)।
शुक्लयजुर्वेदसिंहिताके उव्वटभाष्यमें आया है—‘संस्कारोज्ज्वलनार्थं हितं च पथ्यं च पुन: पुनरुपदिश्यमानं न दोषाय भवतीति’ (१। २१) अर्थात् संस्कारोंको उद्बुद्ध करनेके उद्देश्यसे हित तथा पथ्यकी बातका बार-बार उपदेश करनेमें कोई दोष नहीं है।
परमश्रद्धेय श्रीस्वामीजी महाराजने इस ग्रन्थमें जो बातें लिखी हैं, वे केवल सीखने-सिखानेके लिये (बुद्धिका विषय) नहीं हैं, प्रत्युत अनुभव करनेके लिये हैं। परमशान्तिकी प्राप्तिके इच्छुक सभी पाठकोंसे नम्र निवेदन है कि वे इस ग्रन्थको मनोयोगपूर्वक पढ़ें, समझें और लाभ उठायें।