प्रेम, प्रेमी तथा प्रेमास्पद

१. हम भगवान् में तथा भगवान् हमारेमें हैं

एक मार्मिक बात है कि हम वास्तवमें जो चाहते हैं, वह सदा हमारेमें है और हम सदा उसमें हैं। हमारी वास्तविक इच्छाएँ तीन हैं—(१) ‘सत्’ की इच्छा कि मैं सदा जीता रहूँ, कभी मरूँ नहीं (२) ‘चित्’ की इच्छा मैं सब कुछ जान जाऊँ, कभी किसी विषयमें अनजान न रहूँ और (३) ‘आनन्द’ की इच्छा कि मैं सदा सुखी रहूँ, कभी दु:खी न रहूँ। ये तीनों ही इच्छाएँ सत्-चित्-आनन्दस्वरूप परमात्माकी हैं। वे सच्चिदानन्दघन परमात्मा सदा हमारेमें हैं और हम सदा उनमें हैं। परन्तु हमारेसे भूल यह होती है कि हम इन इच्छाओंको उससे पूरी करना चाहते हैं, जो हमारेमें नहीं है और हम उसमें नहीं हैं। तात्पर्य है कि हम शरीरसे जीना चाहते हैं, बुद्धिसे जानकार बनना चाहते हैं और इन्द्रियोंसे सुखी होना चाहते हैं—इस प्रकार हम तीनों इच्छाओंको संसारसे पूरी करना चाहते हैं, जो कि असत्, जड़ और दु:खस्वरूप है। इसलिये ये इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं और हम अनादिकालसे दु:ख पा रहे हैं। चाह तो करें सत्-चित्-आनन्दकी और पूरी करना चाहें असत्-जड-दु:खरूप संसारसे, कितनी मूर्खताकी बात है!

शरीर और संसारके निरन्तर बदलनेका अनुभव सबको होता है, पर अपने बदलनेका अनुभव कभी किसीको नहीं होता। शरीर बालकसे जवान और जवानसे बूढ़ा हो जाता है, पर ‘मैं वही हूँ’—इसमें अर्थात् स्वयंमें कोई परिवर्तन नहीं होता। इसलिये हम संसारमें नहीं हैं और संसार हमारेमें नहीं है। तात्पर्य है कि संसार हमारेसे अलग है और परमात्मा हमें नित्यप्राप्त हैं। जो अलग है, उसको प्राप्त मानना और जो नित्यप्राप्त है, उसको अलग (अप्राप्त) मानना—इसके समान कोई पाप नहीं है।

योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते।

किं तेन न कृतं पापं चौरेणात्मापहारिणा॥

(महा० उद्योग० ४२।३७)

‘जो अन्य प्रकारका होते हुए भी आत्माको अन्य प्रकारका मानता है, उस आत्मघाती चोरने कौन-सा पाप नहीं किया? अर्थात् उसने सब पाप कर लिये।’

जो हमारेसे अलग है, उसकी सेवा करनी है और जो हमारेमें है, उसको अपना मानना है। ऐसा करनेसे संसारसे माना हुआ सम्बन्ध टूट जायगा और परमात्माका वास्तविक सम्बन्ध जाग्रत् हो जायगा। परमात्माका सम्बन्ध जाग्रत् होनेपर प्रेमकी प्राप्ति हो जायगी, जो मनुष्यजीवनका चरम लक्ष्य है।

२. भगवान् अपने हैं

जबतक संसारके साथ अपने सम्बन्धकी मान्यता रहती है, तबतक मनुष्यको जो भी वस्तु मिलती है, उसको वह अपनी ही मान लेता है। परन्तु जब सत्संगके द्वारा उसको इस बातका ज्ञान होता है कि संसार मेरा नहीं है, प्रत्युत भगवान् ही मेरे हैं, तब उसको अनुभव होता है कि जो भी वस्तु मिली है, वह भगवान् की ही है और भगवान् से ही मिली है। अत: वस्तु अपनी नहीं है, प्रत्युत उसको देनेवाला अपना है।

मनुष्यसे यह बहुत बड़ी भूल होती है कि वह मिली हुई वस्तुको तो देखता है, पर उसको देनेवालेकी तरफ उसकी दृष्टि जाती ही नहीं! वह वस्तुको तो अपना मानता है, पर उसे देनेवालेको अपना मानता ही नहीं! वास्तवमें मिली हुई वस्तु जितनी प्यारी लगती है, उससे अधिक भगवान् (देनेवाले) प्यारे लगने चाहिये। मिली हुई वस्तुसे तो प्यार करना, पर उसको देनेवालेसे प्यार न करना कृतज्ञबुद्धि नहीं है, प्रत्युत भोगबुद्धि है।

प्रतिक्षण वर्धमान आनन्द (प्रेम) का आस्वादन एक (अकेला) होनेसे नहीं होता—‘एकाकी न रमते’ (बृहदारण्यक० १। ४। ३)। इसलिये प्रेमलीलाका आस्वादन करनेके लिये भगवान् ने ‘मैं एक ही बहुत हो जाऊँ’— ऐसा संकल्प किया—‘सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति’ (तैत्तिरीय० २।६) भगवान् के इस संकल्पसे असंख्य जीवोंकी सृष्टि हुई। भगवान् ने श्रीजी (राधाजी) को भी अपनेमेंसे प्रकट किया, जीवोंको भी अपनेमेंसे प्रकट किया और लीलाकी सामग्री (संसार) को भी अपनेमेंसे ही प्रकट किया। प्रेमलीला तभी होती है, जब प्रेमी और प्रेमास्पद दोनों बराबर हों, कोई भी छोटा-बड़ा न हो। अत: भगवान् ने जीवोंको अपने समान अर्थात् पूर्ण स्वतन्त्र बनाया। इस प्रेमलीलामें श्रीजीका तो केवल भगवान् में ही आकर्षण रहा, उनसे भूल नहीं हुई, पर अन्य जीवोंने मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके लीलाकी वस्तुओं (संसार) को अपना मान लिया और वे उनकी तरफ खिंच गये! वे भगवान् से प्रेम न करके उनकी दी हुई वस्तुओंमें ही रमण करने लगे। वे खुद उन वस्तुओंके मालिक बन गये और अपने मालिकको भूल गये। उन्होंने वस्तुओंको अपना मान लिया और जिसने उनको दिया था, उससे विमुख हो गये। इस प्रकार मिली हुई स्वाधीनताका दुरुपयोग करके जीव पराधीन हो गया तथा जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़ गया।

भगवान् जीवपर कृपा करके उसको विवेक देते हैं। जब मनुष्य उस विवेकको महत्त्व देता है, तब भगवान् उसको बोध देते हैं। उस बोधको पाकर मनुष्य पूर्णताका अनुभव करता है और ‘मैं धन्य हूँ! मैं धन्य हूँ!!’ कहकर हर्षित हो उठता है। परन्तु यह भी उसकी भूल ही है। वास्तवमें पूर्णता अपनी नहीं है, प्रत्युत पूर्णताको देनेवाला अपना है। इसलिये हमें पूर्णता नहीं चाहिये, प्रत्युत पूर्णताको देनेवाला चाहिये। भगवान् बोध इसलिये देते हैं कि यह मुक्त होकर, स्वाधीन होकर मेरेसे प्रेमका आदान-प्रदान करे। परन्तु जब मनुष्य उस बोधमें ही सन्तुष्ट होकर भगवान् को भूल जाता है, तब भगवान् कृपा करके उसको प्रेमका आस्वादन करानेके लिये उस बोधमें भी नीरसता पैदा कर देते हैं! इसीलिये बोधवान् मनुष्यको अपनेमें कभी तो बड़ा आनन्द दीखता है और कभी नीरसता दीखती है, कभी तो पूर्णता दीखती है और कभी कमी दीखती है। तात्पर्य है कि साधक भले ही भगवान् को भूल जाय, पर भगवान् उसको कभी नहीं भूलते और उसको अपनी तरफ खींचनेके लिये चेत कराते रहते हैं।

भगवान् का यह एक विलक्षण स्वभाव है कि वे कुछ भी देते हैं तो इस ढंगसे अपनेको छिपाकर देते हैं कि लेनेवालेको वह वस्तु अपनी ही मालूम देती है! कारण कि संसारमें देनेवाला बड़ा और लेनेवाला छोटा माना जाता है। इसलिये भगवान् अपनेको छिपाकर देते हैं, जिससे अपनेमें बड़प्पन भी न आये और लेनेवालेमें छोटापन भी न आये! अत: मिली हुई वस्तुको लेकर अपनेमें अभिमान नहीं होना चाहिये, प्रत्युत भगवान् के प्रति कृतज्ञबुद्धि होनी चाहिये। जब लेनेवाला मिली हुई वस्तुको अपना न मानकर देनेवाले—भगवान् को अपना मानता है, तब भगवान् उसके ऋणी हो जाते हैं और कहने लगते हैं—‘मैं तो हूँ भगतनको दास, भगत मेरे मुकुटमणि’!

भक्त अपने-आपको भगवान् के अर्पित कर देता है तो भगवान् भी अपने-आपको उसके अर्पित कर देते हैं। भक्त भगवान् को प्रेम-रस देता है और भगवान् भक्तको प्रेम-रस देते हैं—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ (गीता ४। ११)। इस प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी लीलामें कौन भक्त है और कौन भगवान् है—इसका पता नहीं लगता। मुक्ति (तत्त्वज्ञान) में तो अखण्ड रस है, पर इस प्रेममें अनन्त रस है। इस अनन्त रसकी प्राप्तिमें ही मानवजीवनकी पूर्णता है।

३. भगवान् प्रेमके अधीन हैं

भगवत्प्रेममें कितना आनन्द है—इसका कोई वर्णन कर ही नहीं सकता। उस प्रेममें जो आनन्द है, वह आनन्द मुक्तिमें, जन्म-मरणसे रहित होनेमें भी नहीं है। कारण कि मुक्त होनेपर, जन्म-मरणसे रहित होनेपर दु:खोंका नाश हो जाता है और मनुष्य सन्तुष्ट हो जाता है, कृतकृत्य, ज्ञात-ज्ञातव्य और प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है परन्तु प्रेम प्राप्त होनेपर मनुष्य सन्तुष्ट नहीं होता, प्रत्युत उसका आनन्द उत्तरोत्तर बढ़ता ही रहता है। वह प्रेम अविनाशी और चिन्मय है। उसकी प्राप्ति किसी क्रियासे, अभ्याससे अथवा विचारसे नहीं होती। विचारसे जडताका त्याग हो सकता है, अपने स्वरूपका बोध हो सकता है, पर प्रेम नहीं हो सकता। प्रेमकी प्राप्ति ‘मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे हैं’—इस विश्वासकी गाढ़तासे होती है। दूसरे शब्दोंमें, संसारमें हमारा जो खिंचाव है वह भगवान् में हो जाय तो वह प्रेम प्राप्त हो जाता है। उस प्रेमको देनेवाले भी भगवान् ही हैं।

भगवान् की दी हुई सामर्थ्यसे ही मनुष्य कर्मयोगी होता है, उनके दिये हुए ज्ञानसे ही मनुष्य ज्ञानी होता है और उनके दिये हुए प्रेमसे ही मनुष्य प्रेमी होता है। मनुष्यमें जो भी विशेषता, विलक्षणता देखनेमें आती है, वह सब-की-सब उन्हींकी दी हुई है। सब कुछ देकर भी वे अपनेको प्रकट नहीं करते—यह उनका स्वभाव है।

अगर भगवान् से कुछ माँगना है तो प्रेम ही माँगना है, कुछ पाना है तो प्रेम ही पाना है। एक प्रेमके सिवाय मनुष्यको कुछ नहीं चाहिये। मनुष्यको इस प्रेम-रसका आस्वादन करानेके लिये ही भगवान् मनुष्यरूपसे संसारमें अवतार लेते हैं, अपने-आपको प्रकट करते हैं, तरह-तरहकी लीलाएँ करते हैं और अपने हृदयकी अन्तिम तथा सर्वगुह्यतम (सबसे अत्यन्त गोपनीय) बात-शरणागतिका उपदेश देते हैं*।

भगवान् ने मनुष्यकी रचना न तो अपने सुखभोगके लिये की है, न उसको भोगोंमें लगानेके लिये की है और न उसपर शासन करनेके लिये की है, प्रत्युत इसलिये की है कि वह मेरेसे प्रेम करे, मैं उससे प्रेम करूँ, वह मेरेको अपना कहे, मैं उसको अपना कहूँ, वह मेरेको देखे, मैं उसको देखूँ! तात्पर्य है कि भगवान् मनुष्यको अपना दास (पराधीन) नहीं बनाते, प्रत्युत अपने समान बनाते हैं, अपने समान आदर देते हैं। इसलिये भगवान् भक्ति देनेमें संकोच करते हैं, क्योंकि भक्तिमें मनुष्य भगवान् का दास बन जाता है। इसलिये श्रीमद्भागवतमें आया है—

मुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्म न भक्तियोगम्।

(श्रीमद्भा० ५।६।१८)

‘भगवान् मुक्ति तो कभी दे देते हैं, पर भक्तियोग सहजमें नहीं देते।’

भगवान् श्रीरामने जब काकभुशुण्डिजीसे कहा कि तू अणिमादि सिद्धियाँ, ज्ञान, वैराग्य, मुक्ति आदि जो चाहे, सो वर माँग ले। तब काकभुशुण्डिजीने विचार किया कि भगवान् ने सब कुछ देनेकी बात तो कही है, पर अपनी भक्ति देनेकी बात कही ही नहीं—

सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ।

मन अनुमान करन तब लागेउँ॥

प्रभु कह देन सकल सुख सही।

भगति आपनी देन न कही॥

भगति हीन गुन सब सुख ऐसे।

लवन बिना बहु बिंजन जैसे॥

(मानस, उत्तर० ८४।२-३)

इसलिये काकभुशुण्डिजीने और कुछ न माँगकर भक्तिका ही वर माँगा। इससे भगवान् बड़े प्रसन्न हुए और ‘एवमस्तु’ कहकर बोले—

सुनु बायस तैं सहज सयाना।

काहे न मागसि अस बरदाना॥

सब सुख खानि भगति तैं मागी।

नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी॥

जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं।

जे जप जोग अनल तन दहहीं॥

रीझेउँ देखि तोरि चतुराई।

मागेहु भगति मोहि अति भाई॥

(मानस, उत्तर० ८५।१—३)

तात्पर्य है कि भगवान् अपनी ओरसे भक्ति नहीं देते, पर कोई भक्ति ही चाहे तो वे भक्ति देकर बड़े प्रसन्न होते हैं। कारण कि भक्तिसे भगवान् और भक्त—दोनोंको ही आनन्द मिलता है, इसलिये भगवान् भक्ति चाहनेवालेको भक्ति देकर स्वयं उसके दास बन जाते हैं—

‘मैं तो हूँ भगतनको दास, भगत मेरे मुकुटमणि’

भगवान् दुर्वासाजीसे कहते हैं—

अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।

साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रिय:॥

(श्रीमद्भा० ९।४।६३)

‘हे द्विज! मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ, स्वतन्त्र नहीं। मुझे भक्तजन बहुत प्रिय हैं। उनका मेरे हृदयपर पूर्ण अधिकार है।’

मयि निर्बद्धहृदया: साधव: समदर्शना:।

वशीकुर्वन्ति मां भक्त्या सत्स्त्रिय: सत्पतिं यथा॥

(श्रीमद्भा० ९।४।६६)

‘जैसे सती स्त्री अपने पातिव्रत्यसे सदाचारी पतिको वशमें कर लेती है, वैसे ही मेरे साथ अपने हृदयको प्रेम-बन्धनसे बाँध रखनेवाले समदर्शी साधु भक्तिके द्वारा मुझे अपने वशमें कर लेते हैं।’

भगवान् किसी भी साधनसे वशमें नहीं होते, पर भक्तिसे वे वशमें हो जाते हैं। इसलिये भगवान् कहते हैं—

न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव।

न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता॥

(श्रीमद्भा० ११।१४।२०)

‘हे उद्धव! योग, सांख्य (ज्ञान), धर्म, स्वाध्याय, तप और त्याग भी मुझे वशमें करनेमें उतने समर्थ नहीं हैं, जितनी मेरी अनन्य भक्ति।’

पराधीन होनेसे जीवको तो स्वतन्त्र होनेमें आनन्द आता है, पर परम स्वतन्त्र होनेसे भगवान् को पराधीन होनेमें ही आनन्द आता है! कारण कि जीवको स्वतन्त्रता दुर्लभ है और भगवान् को पराधीनता!

४. नित्यविरह और नित्यमिलन

मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे हैं—इस प्रकार भगवान् में आत्मीयताके समान दूसरा कोई साधन नहीं है, भजन नहीं है। आत्मीयतासे आनन्दघन भगवान् को भी आनन्द मिलता है। भगवान् अपने आत्मीय जनको अपना सर्वस्व प्रदान कर देते हैं। भगवान् उसको अपना अनन्तरस (प्रेम) प्रदान करते हैं। परन्तु जो पराधीनतासे, जन्म-मरणके बन्धनसे दु:खी होकर मुक्तिकी कामना करते हैं, उनको भगवान् मुक्ति प्रदान करते हैं, किन्तु स्वयं उससे छिपकर रहते हैं। जब मुक्त पुरुषको मुक्ति (अखण्डरस)में भी सन्तोष नहीं होता, तब उसमें अनन्तरसकी भूख जाग्रत् होती है। कारण कि मुक्त होनेपर नाशवान् रसकी कामना तो मिट जाती है, पर अनन्तरसकी भूख नहीं मिटती। इसलिये ब्रह्मसूत्रमें आया है—

मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात्।

(१।३।२)

‘उस प्रेमस्वरूप भगवान् को मुक्त पुरुषोंके लिये भी प्राप्तव्य बताया गया है।’ अत: भगवान् का एक नाम ‘आत्मारामगणाकर्षी’ भी है।

अनन्तरस-बोधमें नहीं है, प्रत्युत प्रेममें है। इस अनन्तरसकी भूख ही जीवकी वास्तविक तथा अन्तिम भूख है और प्रेमकी प्राप्ति ही जीवका वास्तविक तथा अन्तिम लाभ है। मुक्तिकी तो सीमा है*, पर इस प्रेमकी कोई सीमा नहीं है। इस प्रेमकी प्राप्तिके लिये भगवान् कैसे हैं—यह जाननेकी जरूरत नहीं है, प्रत्युत भगवान् मेरे हैं—यह माननेकी जरूरत है। भगवान् मेरे हैं—यह आत्मीयता भक्त और भगवान्—दोनोंको आनन्द प्रदान करती है, अनन्तरस प्रदान करती है। कारण कि किसी वस्तुका ज्ञान होनेसे केवल अज्ञान मिटता है, मिलता कुछ नहीं। परन्तु ‘वस्तु मेरी है’—इस तरह वस्तुमें ममता होनेसे एक रस मिलता है। तात्पर्य है कि वस्तुके आकर्षणमें जो रस है, वह रस वस्तुके ज्ञानमें नहीं है। सांसारिक वस्तुमें आकर्षण तो अपने सुखके लिये होता है, पर भगवान् में आकर्षण उनको सुख देनेके लिये होता है—‘तत्सुखे सुखित्वम्।’ इसलिये सांसारिक आकर्षणका तो अन्त आ जाता है, पर भगवान् के आकर्षणका अन्त नहीं आता, वह अनन्त होता है। भोगेच्छाका अन्त होता है और मुमुक्षा अथवा जिज्ञासाकी पूर्ति होती है, पर प्रेम-पिपासाका न तो अन्त होता है और न पूर्ति होती है, प्रत्युत वह प्रतिक्षण बढ़ती ही रहती है—‘प्रतिक्षणवर्धमानम्’ (नारदभक्तिसूत्र ५४)।

प्रेमीको सदा अपनेमें प्रेमका अभाव ही दीखता है। जैसे धनी आदमीको सदा धनका अभाव ही दीखता है। ज्यों-ज्यों धन बढ़ता है, त्यों-ही-त्यों उसको धनकी कमी मालूम देती है*। ऐसे ही प्रेमीको अपनेमें प्रेमकी कमी-ही-कमी मालूम देती है। इसलिये प्रेमको प्रतिक्षण वर्धमान कहा गया है। यदि प्रेमीको प्रेममें कमी न मालूम दे तो प्रेम बढ़ेगा कैसे? अपनेमें पूर्णता न मानना, सदा प्रेमकी कमी मानना ही ‘नित्यविरह’ है। नित्यविरह और नित्यमिलन (नित्ययोग) दोनों ही नित्य हैं। अत: न तो प्रेमास्पदसे मिलनकी लालसा पूरी होती है और न प्रेमास्पदसे वियोग ही होता है। नित्यविरहसे प्रेम बढ़ता है और नित्यमिलनसे प्रेममें प्राण आ जाते हैं, चेतना आ जाती है, विशेष विलक्षणता आ जाती है। नित्यविरह और नित्यमिलन एक ही प्रेमके दो रूप हैं।

अरबरात मिलिबेको निसिदिन,

मिलेइ रहत मनु कबहुँ मिलै ना।

‘भगवतरसिक’ रसिक की बातें,

रसिक बिना कोउ समुझि सकै ना॥

गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज नित्यविरह और नित्यमिलनका उदाहरण देते हुए कौसल्या माताकी दशाका वर्णन करते हैं—

माई री! मोहि कोउ न समुझावै।

राम-गवन साँचो किधौं सपनो, मन परतीति न आवै॥ १॥

लगेइ रहत मेरे नैननि आगे, राम लखन अरु सीता।

तदपि न मिटत दाह या उरको, बिधि जो भयो बिपरीता॥ २॥

दुख न रहै रघुपतिहि बिलोकत, तनु न रहै बिनु देखे।

करत न प्रान पयान, सुनहु सखि! अरुझि परी यहि लेखे॥ ३॥

कौसल्या के बिरह-बचन सुनि रोइ उठीं सब रानी।

तुलसिदास रघुबीर-बिरहकी पीर न जाति बखानी॥ ४॥

(गीतावली, अयोध्या० ५३)

यह नित्यविरह और नित्यमिलन भी भगवान् अपनी ओरसे कृपा करके प्रदान करते हैं।