राग-द्वेषका त्याग

प्रकृति और पुरुष—ये दो हैं। इन दोनोंके अंशसे बना हुआ यह जीवात्मा है। अब इसका मुख जबतक प्रकृतिकी तरफ रहेगा, तबतक इसको शान्ति नहीं मिल सकती; और यह परमात्माके सम्मुख हो जायगा तो अशान्ति टिकेगी नहीं—यह पक्की बात है।

संयोग-वियोग प्रकृतिकी चीज है। हमें जो कुछ मिला है, वह सब प्रकृतिका है, उत्पन्न होकर होनेवाला है। परन्तु परमात्मा आने-जानेवाले, मिलने-बिछुड़नेवाले नहीं हैं। परमात्मा सदा मिले हुए रहते हैं; किन्तु प्रकृति कभी मिली हुई नहीं रहती। आपको यह बात अलौकिक लगेगी कि संसार आजतक किसीको भी नहीं मिला है और परमात्मा कभी भी वियुक्त नहीं हुए हैं। संसार मेरे साथ है, शरीर मेरे साथ है, इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि मेरे साथ हैं और परमात्मा न जाने कहाँ हैं, पता नहीं—यह विस्मृति है, मूर्खता है।

जो कभी हों और कभी न हों, कहीं हों और कहीं न हों, किसीके हों और किसीके न हों, वे परमात्मा हो ही नहीं सकते। सर्वसमर्थ परमात्मामें यह सामर्थ्य नहीं है कि वे किसी समयमें हों और किसी समयमें न हों, किसी देशमें हों और किसी देशमें न हों, किसी वेशमें हों और किसी वेशमें न हों, किसी सम्प्रदायके हों और किसी सम्प्रदायके न हों, किसी व्यक्तिके हों और किसी व्यक्तिके न हों, किसी वर्ण-आश्रमके हों और किसी वर्ण-आश्रमके न हों। भगवान् तो प्राणिमात्रमें समान रहते हैं—

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।

(गीता ९।४)

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:।

(गीता ९।२९)

आपके देखने-सुननेमें जितना जगत् आता है, उस सबमें वे परमात्मा परिपूर्ण हैं—

भूमा अचल शाश्वत अमल सम ठोस है तू सर्वदा।

यह देह है पोला घड़ा बनता बिगड़ता है सदा॥

परमात्मा व्यापक हैं, अचल हैं, ठोस हैं, सर्वत्र ठसाठस भरे हुए हैं; परन्तु यह शरीर बिलकुल पोला है, इसमें कोरी पोल-ही-पोल है! वहम होता है कि इतना मान मिल गया, इतना आदर मिल गया, इतना भोग मिल गया, इतना सुख मिल गया! वास्तवमें मिला कुछ नहीं है। केवल वहम है, धोखा-है-धोखा! कुछ नहीं रहेगा। क्या यह शरीर रहनेवाला है? अनुकूलता रहनेवाली है? सुख रहनेवाला है? मान रहनेवाला है? बड़ाई रहनेवाली है? इनमें कोई रहनेवाली चीज है क्या? संसार नाम ही बहनेवालेका है। जो निरन्तर बहता रहे, उसका नाम ‘संसार’ है। यह हरदम बदलता ही रहता है—‘गच्छतीति जगत्।’ कभी एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता। परन्तु परमात्मा एक क्षण भी कहीं जाते नहीं; जायँ कहाँ? कोई खाली जगह हो तो जायँ! जहाँ जायँ, वहाँ पहलेसे ही परमात्मा भरे हुए हैं।

भगवान् सबके हैं और सबमें हैं, पर मनुष्य उनसे विमुख हो गया है। संसार रात-दिन नष्ट होता जा रहा है, फिर भी वह उसको अपना मानता है और समझता है कि मेरेको संसार मिल गया। भगवान् कभी बिछुड़ते हैं ही नहीं, पर उनके लिये कहता है कि वे हैं ही नहीं, मिलते हैं ही नहीं; भगवान् से मिलना तो बहुत कठिन है, पर भगवान् तो सदा मिले हुए ही रहते हैं। भाई! आप अपनी दृष्टि उधर डालते ही नहीं, उधर देखते ही नहीं। जहाँ-जहाँ आप देखते हो, वहाँ-वहाँ भगवान् मौजूद हैं। अगर यह बात स्वीकार कर लो, मान लो कि सब देशमें, सब कालमें, सब वस्तुओंमें, सम्पूर्ण घटनाओंमें, सम्पूर्ण परिस्थितियोंमें, सम्पूर्ण क्रियाओंमें भगवान् हैं, तो भगवान् दीखने लग जायँगे। दृढ़तासे मानोगे तो दीखेंगे, संदेह होगा तो नहीं दीखेंगे। जितना मानोगे, उतना लाभ जरूर होगा। दृढ़तासे मान लो तो छिप ही नहीं सकते भगवान्! क्योंकि—

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥

(गीता ६।३०)

‘जो सबमें मेरेको देखता है और सबको मेरे अन्तर्गत देखता है, मैं उसके लिये अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।’

जहाँ देखें, जब देखें, जिस देशमें देखें, वहीं भगवान् हैं। परन्तु जहाँ राग-द्वेष होंगे, वहाँ भगवान् नहीं दीखेंगे। भगवान् के दीखनेमें राग-द्वेष ही बाधक हैं। जहाँ अनुकूलता मान लेंगे, वहाँ राग हो जायगा और जहाँ प्रतिकूलता मान लेंगे, वहाँ द्वेष हो जायगा। एक आदमीकी दो बेटियाँ थीं। दोनों बेटियाँ पास-पास गाँवमें ब्याही गयी थीं। एक बेटीवालोंका खेतीका काम था और एकका कुम्हारका काम था। वह आदमी उस बेटीके यहाँ गया, जो खेतीका काम करती थी और उससे पूछा कि क्या ढंग है बेटी? उसने कहा—पिताजी! अगर पाँच-सात दिनोंमें वर्षा नहीं हुई तो खेती सूख जायगी, कुछ नहीं होगा। अब वह दूसरी बेटीके यहाँ गया और उससे पूछा कि क्या ढंग है? तो वह बोली—पिताजी! अगर पाँच-सात दिनोंमें वर्षा आ गयी तो कुछ नहीं होगा; क्योंकि मिट्टीके घड़े धूपमें रखे हैं और कच्चे घड़ोंपर यदि वर्षा हो जायगी तो सब मिट्टी हो जायगी! अब आपलोग बतायें कि भगवान् वर्षा करें या न करें! दोनों एक आदमीकी बेटियाँ हैं। माता-पिता सदा बेटीका भला चाहते हैं। अब करें क्या? एकने वर्षा होना अनुकूल मान लिया और एकने वर्षा होना प्रतिकूल मान लिया। एकने वर्षा न होना अनुकूल मान लिया और एकने वर्षा न होना प्रतिकूल मान लिया। उन्होंने वर्षा होनेको ठीक-बेठीक मान लिया। परन्तु वर्षा न ठीक है न बेठीक है। वर्षा होनेवाली होगी तो होगी ही। अगर कोई वर्षा होनेको ठीक मानता है तो उसका वर्षामें ‘राग’ हो गया और वर्षा होनेको ठीक नहीं मानता तो उसका वर्षामें ‘द्वेष’ हो गया। ऐसे ही यह संसार तो एक-सा है, पर इसमें ठीक और बेठीक—ये दो मान्यताएँ कर लीं तो फँस गये! यह ठीक हुआ, यह बेठीक हुआ। नफा हुआ, नुकसान हुआ। राजी हुए, नाराज हुए। यह वैरी है, यह मित्र है। इसने मान कर दिया, इसने अपमान कर दिया। इसने निन्दा कर दी, इसने प्रशंसा कर दी। इसने आराम, सुख दिया, इसने दु:ख दिया। अब इनको देखते रहोगे तो भगवान् नहीं मिलेंगे। अत: राग-द्वेषके वशीभूत न हों, राजी-नाराज न हों—‘तयोर्न वशमागच्छेत्’ (गीता ३।३४)। राजी-नाराज न होनेवालेको भगवान् ने त्यागी बताया है—‘ज्ञेय: स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न कांक्षति।’ (गीता ५। ३) जो राग-द्वेष नहीं करता, उसको भगवान् ने अपना प्यारा भक्त बताया है (गीता १२।१७)। संसारमें अच्छा और मन्दा तो होता ही रहता है। अत: साधकके लिये इसमें क्या ठीक और क्या बेठीक ‘किं भद्रं किमभद्रं वा’ (श्रीमद्भा० ११।२८।४)।

यह संसार तो एक तमाशा है, खेल है। सिनेमाके परदेपर कभी लड़ाई दीख जाती है, कभी शान्ति दीख जाती है। कभी दीखता है कि आग लग गयी, हाहाकार मच गया, गाँव-के-गाँव जल गये, पर परदेको देखो तो वह गरम ही नहीं हुआ! कभी दीखता है कि वर्षा आ गयी, नदीमें जोरसे बाढ़ आ गयी, बड़े-बड़े पत्थर बह गये, पशु-पक्षी बह गये, पर परदेको देखो तो वह गीला ही नहीं हुआ! परन्तु दर्शककी दृष्टि तमाशेकी तरफ ही रहती है, परदेकी तरफ नहीं। इसी तरह यह संसार भी मायाका एक परदा है। जैसे सिनेमा अँधेरेमें ही दीखता है, ऐसे ही माया अज्ञानरूपी अँधेरेमें ही दीखती है। यदि पूरे सिनेमा हालमें बत्तियाँ जला दी जायँ तो तमाशा दीखना बन्द हो जायगा। इसी तरह ‘वासुदेव: सर्वम्’ (गीता ७।१९) ‘सब कुछ वासुदेव ही है’—ऐसा प्रकाश हो जाय तो यह तमाशा रहेगा ही नहीं। मशीन तो भगवान् हैं और उसमें मायारूपी फिल्म लगी है। परदेकी जगह यह संसार है। प्रकाश परमात्माका है। अब इस मायाको सच्चा समझकर राजी-नाराज हो गये तो फँस गये! अत: सन्तोंने कहा है—‘देखो निरपख होय तमाशा।’

ठहरनेवाला कोई नहीं है। न अच्छा ठहरनेवाला है, न बुरा ठहरनेवाला है। अपनी उम्रमें कोई वस्तु टिकी है क्या? अवस्था टिकी है क्या? घटना टिकी है क्या? कोई चीज स्थायी रही है क्या? पर आप तो वे-के-वे ही हैं। आपके सामने कितना परिवर्तन हुआ! हमारे देखते-देखते भी कितना परिवर्तन हो गया! इस शहरके मकान, सड़क, रिवाज आदि सब बदल गये। परन्तु संसारमें परमात्मा और शरीरमें आत्मा—ये दोनों नहीं बदले। शरीर संसारका साथी है और आत्मा परमात्माका साथी है। इसमें कोई कहे कि शरीर मेरा है, तो फँस गया! जब शरीर संसारका साथी है तो फिर आप एक शरीरको ही अपना क्यों मानते हो? मानो तो सब शरीरोंको अपना मानो, नहीं तो इस शरीरको भी अपना मत मानो। जैसे दूसरे शरीरोंकी बेपरवाह करते हो, ऐसे ही इस शरीरकी भी बेपरवाह करो अथवा जैसे इस शरीरकी परवाह करते हो, ऐसे ही जो सामने आये, उसकी भी परवाह करो। जैसे इस शरीरकी पीड़ा नहीं सही जाती, ऐसे ही दूसरे शरीरोंकी पीड़ा भी न सही जाय तो काम ठीक बैठ जायगा।

यह बात अच्छी है और यह बुरी है—यह राग और द्वेष है। जहाँ मन खिंचता है, वहाँ राग है और जहाँ मन फेंकता है, वहाँ द्वेष है। ये राग-द्वेष ही पारमार्थिक मार्गमें लुटेरे हैं—‘तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ’ (गीता ३। ३४)। ये आपकी साधन-सम्पत्ति लूट लेंगे, आपको आगे नहीं बढ़ने देंगे। अत: क्या अच्छा और क्या मन्दा? क्या सुख और क्या दु:ख? मनस्वी पुरुष सुख-दु:खको नहीं देखते—‘मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दु:खं न च सुखम्’ (नीतिशतक ८२)। वे तो उसको देखते हैं, जो सुख-दु:खसे अतीत है, जहाँ आनन्द-ही-आनन्द है, मौज-ही-मौज है, मस्ती-ही-मस्ती है! जिसके समान कोई आनन्द हुआ नहीं, हो सकता नहीं, सम्भव ही नहीं, वह आनन्द मनुष्यके सामने है। देवता, पशु, पक्षी, वृक्ष, राक्षस, असुर, भूत-प्रेत, पिशाच एवं नरकके जीवोंके सामने वह आनन्द नहीं है। मनुष्य ही उस आनन्दका अधिकारी है। मनुष्य उस आनन्दको प्राप्त कर सकता है। परन्तु राग-द्वेष करोगे तो वह आनन्द मिलेगा नहीं। अत: आप राग-द्वेषके वशीभूत न हों—

नहीं किसीसे दोस्ती, नहीं किसीसे वैर।

नहीं किसीके सिरधणी, नहीं किसीकी बैर॥

भाइयो! बहनो! आप थोड़ा ध्यान दें। सुखमें भी आप वही रहते हैं और दु:खमें भी आप वही रहते हैं। यदि आप वही नहीं रहते तो सुख और दु:ख—इन दोनोंको अलग-अलग कौन जानता? बहुत सीधी बात है। हमने भी पहले पढ़ा-सुना, साधारण दृष्टिसे देखा तो सुख-दु:खमें समान रहनेमें कठिनता मालूम दी। परन्तु विचारसे देखा कि सुख-दु:ख तो आने-जानेवाले हैं—‘आगमापायिन:’ (गीता २।१४) और आप हो रहनेवाले। हम यहाँ दरवाजेपर खड़े हो जायँ और इधरसे मोटरें धनाधन आयें तो हम नाचने लगें कि मौज हो गयी, आज तो बहुत मोटरें आयीं! दूसरे दिन एक भी मोटर नहीं आयी तो लगे रोने। रोते क्यों हो? कि आज एक भी मोटर नहीं आयी! तो धूल कम उड़ी, हर्ज क्या हुआ? मोटर आये या न आये, तुम्हें इससे क्या मतलब? ऐसे ही आपके सामने कई अनुकूलताएँ-प्रतिकूलताएँ आयीं, आपका आदर-निरादर हुआ, निन्दा-प्रशंसा हुई, वाह-वाह हुई, पर आप वही रहे कि नहीं? सुख आया तो आप वही रहे, दु:ख आया तो आप वही रहे। अत: आप एक ही हो—‘समदु:खसुख: स्वस्थ:’ (गीता १४।२४)। आप अपनेमें ही रहो, सुख-दु:खसे मिलो मत, फिर मौज-ही-मौज है! ‘सदा दिवाली सन्तकी आठों पहर आनन्द।’ अच्छा और बुरा लगता है, ठीक और बेठीक लगता है—यह राग-द्वेष है। इसके वशमें न होना क्या है? इसको तमाशेकी तरह देखे कि क्या अच्छा है और क्या मन्दा है! न सुख रहनेवाला है, न दु:ख रहनेवाला है। न बीमारी रहनेवाली है, न स्वस्थता रहनेवाली है। कुछ भी रहनेवाला नहीं है। इन सबका वियोग होनेवाला है। बहुत दिनोंतक संयोग रहनेपर भी एक दिन वियोग जरूर होगा—‘अवश्यं यातारश्चिरतरमुषित्वाऽपि विषया:।’ अत: सज्जनो! इस बातको पहलेसे ही समझ लो कि एक दिन इन सबका वियोग होगा। लड़का जन्मे, तभी यह समझ लेना चाहिये कि यह मरेगा जरूर! यह बड़ा होगा कि नहीं होगा, पढ़ेगा कि नहीं पढ़ेगा, इसका विवाह होगा कि नहीं होगा, इसके लड़का-लड़की होंगे कि नहीं होंगे—इसमें सन्देह है; परन्तु यह मरेगा कि नहीं मरेगा—इसमें कोई सन्देह है क्या? जन्म हुआ है तो खास काम मरना ही है, और कोई खास काम नहीं है। अब इसमें राजी और नाराज क्या हों। अपने तो मौजसे भगवान् की तरफ चलते रहें। जो वैराग्यवान् होते हैं, विवेकी होते हैं, भगवान् के प्रेमी भक्त होते हैं, वे इन आने-जानेवाले पदार्थोंकी तरफ दृष्टि रखते ही नहीं। वे करनेमें सावधान और होनेमें सदा प्रसन्न रहते हैं।

रज्जब रोवे कौन को, हँसे सो कौन विचार।

गये सो आवन के नहीं रहे सो जावनहार॥

सब जानेवाला है, मरनेवाला है तो क्या हँसें! जो मर चुके, उनको कितना ही रोयें, वे आनेके हैं नहीं तो क्या रोयें! यह विचार स्थायी कर लो। फिर राग-द्वेष मिट जायँगे।

राग-द्वेषको सह लो अर्थात् प्रियकी प्राप्ति होनेपर हर्षित न हों और अप्रियकी प्राप्ति होनेपर उद्विग्न न हों। फिर आप जन्म-मरणसे रहित हो जाओगे। सन्तोंने कहा है—‘अब हम अमर भये न मरेंगे।’ अब क्यों मरेंगे? मरनेवाले तो ये राग-द्वेष ही हैं। इन दोनोंको नाशवान् और पतन करनेवाले समझो। चाहे तो ऐसा समझकर इनसे अलग हो जाओ, नहीं तो भगवान् को पुकारो कि ‘हे नाथ! हे नाथ!! रक्षा करो!’ जैसे, मोटर खराब हो जाय तो खुद ठीक कर लो। खुद ठीक न कर सको तो कारखानेमें भेज दो! ऐसे ही राग-द्वेषसे अलग न हो सको तो भगवान् की शरणमें चले जाओ। भगवान् ने गीताके अन्तमें कहा कि ‘तू मेरी शरणमें आ जा’ ‘मामेकं शरणं व्रज’ (गीता १८। ६६)।

एक ब्राह्मण देवताकी कन्या बड़ी हो गयी। उसने एक धर्मात्मा सेठके पास जाकर कहा—‘सेठजी! कन्या बड़ी हो गयी, क्या करूँ?’ सेठने कहा—‘आप वर ढूँढ़ो, तैयारी करो, चिन्ता क्यों करते हो?’ इसका अर्थ यह नहीं है कि सेठ ही आकर वर ढूँढ़ेंगे, विवाह करायेंगे, प्रत्युत इसका अर्थ है कि चिन्ता मत करो; धन हम दे देंगे, काम तुम करो। इसी तरह भगवान् कहते हैं कि ‘तुम अपना काम करो, चिन्ता मत करो। तुम्हें जो अभाव होगा, उसे मैं पूरा करूँगा।’ भगवान् ने आपको जो काम दिया है, उसको ठीक तरहसे करो। अर्जुनने भी यही कहा—‘करिष्ये वचनं तव’ (गीता १८।७३) ‘अब मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा।’ भगवान् का काम है, भगवान् का ही घर है, भगवान् का ही सब द्रव्य है, भगवान् का ही सब परिवार है! अत: भगवान् का काम उत्साहसे करो, अच्छी तरहसे करो। होनेकी चिन्ता मत करो; क्योंकि होना आपके अधीन है ही नहीं। आलस्य-प्रमाद मत करो। निरर्थक समय बरबाद मत करो। उत्तम-से-उत्तम बर्ताव करो। क्या होगा, क्या नहीं होगा—इसको भगवान् पर छोड़ दो कि तू जाने, तेरा काम जाने।

जो भाई-बहन जहाँ हैं, वहीं सुचारुरूपसे, मर्यादासे, उत्साहसे अपने कर्तव्यका पालन करें और चिन्ता न करें।

चिन्ता दीनदयालको, मो मन सदा आनन्द।

जायो सो प्रतिपालसी, रामदास गोबिन्द॥

चिन्ता हम क्यों करें! जो मालिक है, वह चिन्ता करे। हम तो अपनी जिम्मेवारीका काम ठीक तरहसे करेंगे। अच्छा-मन्दा मानना हमारा काम नहीं है।

जो पदार्थ, सामग्री मिली है, उसके द्वारा उदारतापूर्वक सबकी सेवा करो, हित करो। संसारकी चीजोंको अपनी मत मानो। कोई भूखा आ जाय तो उसको भोजन दे दो। नंगा आ जाय तो उसको कपड़ा दे दो। वह कहे कि ‘सब मेरेको दे दो’ तो उससे कह दो कि ‘सब तेरेको कैसे दे दें? मैं भी निर्वाह करता हूँ, तू भी निर्वाह कर ले भाई! न धन तू साथमें लाया है, न मैं लाया हूँ।’ रामजीने भेजा है तो सबका उपकार करना है। नहीं भेजा है तो जै रामजीकी! अपने क्या हर्ज है! ये जो चमगादड़ होते हैं न, जो वृक्षोंपर लटके रहते हैं, उनके यहाँ कोई मेहमान आ जाय तो वे उसका क्या आदर करते हैं? कि हम भी लटकते हैं, आप भी लटको! ऋषिकेशमें सत्सङ्ग करते थे। वहाँ कोई सन्त आता तो कहते कि पधारो महाराज! विराजो। हम भी भिक्षा माँगकर खाते हैं, आप भी भिक्षा माँगो और खाओ!

राग-द्वेष न करें। जो मिले, उसमें सन्तुष्ट रहें—‘जथा लाभ संतोष सदाई’ (मानस ७।४६।१)। भगवान् जो सुख-दु:ख भेजें, उसमें ही राजी रहें। जो मालिकके कहनेमें चलता है, मालिक उसके वशमें हो जाता है। ठाकुरजी जो परिस्थिति भेजें, उसीमें राजी रहें तो ठाकुरजी वशमें हो जायँगे! थोड़ी-सी सावधानी रखें कि जो बदलता रहता है, उसमें क्या राजी और क्या नाराज हों! ‘पुन: प्रभातं पुनरेव शर्वरी पुन: शशाङ्क: पुनरुद्यतो रवि:।’ कभी सबेरा होता है, कभी साँझ होती है; कभी रात होती है, कभी दिन होता है—यह तो होता ही रहता है, बदलता ही रहता है। संसारके पदार्थ आते-जाते रहते हैं। परन्तु आप और भगवान् वे-के-वे ही रहते हैं। आपका और भगवान् का साथ है। शरीरका और संसारका साथ है। आप अपने स्वरूपमें स्थित रहोगे तो जीत जाओगे और भगवान् पर दृष्टि रखोगे तो जीत जाओगे। परन्तु शरीर और संसारपर दृष्टि रखोगे तो हार जाओगे। जिनका मन समतामें स्थित हो गया, वे संसारको जीत गये—‘इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:’ (गीता ५।१९)। आप अपने स्वरूपमें स्थित हो जाओ तो समता आ जायगी और भगवान् की शरण ले लो तो समता आ जायगी।

जो सामग्री मिली है, उसके द्वारा दूसरोंको सुख पहुँचाओ। सामग्री नहीं मिली तो मौज करो, आनन्द करो! भगवान् ने जो दिया है, उसमें सन्तोष करो। ‘भगवान् जो करते हैं, ठीक करते हैं।’ उसमें गलती नहीं होती। इसलिये क्या दु:खी और क्या सुखी हों! हमें तो भगवान् को याद रखना है, उनका नाम लेना है, बस। आज दिनतक आप देखते आये हैं कि संसार हरदम बदलता रहता है तो अब नयी बात क्या हो गयी, बताओ? थोड़ा-सा अपने अनुभवका आदर करो तो निहाल हो जाओगे। गीताकी एक टीका है—‘परमार्थप्रपा।’ उसमें लिखा है कि मनुष्य अपने जीवनका खयाल करे तो संसारसे स्वत: वैराग्य हो जाय। आपने अपने जीवनमें कितनी ऊँची-नीची बातें देखी हैं, ठीक-बेठीक देखा है! वही अब भी देख लो। यह तो ऐसे ही होता रहेगा। यह सब तो आने-जानेवाला है और हम रहनेवाले हैं। अब क्या राजी हों और क्या नाराज हों।

पहाड़ दूरसे ही अच्छा दीखता है, नजदीकसे देखो तो कोरा पत्थर-ही-पत्थर है! ऐसे ही संसारको आप नजदीकसे देखोगे, तब इसकी असलियतका पता लगेगा कि यहाँ रहनेवाला कुछ भी नहीं है। आपके यहाँ लड़का भी जन्मता है और लड़की भी जन्मती है। लड़केके जन्मपर तो आप राजी होते हैं और लड़कीके जन्मपर नाराज होते हैं। ठाकुरजीने लड़का दिया है तो उसका भी पालन करो और लड़की दी है तो उसका भी पालन करो। भगवान् ने कन्या दी है तो अच्छी तरहसे कन्यादान करेंगे, विवाह करेंगे, जिससे किसीका वंश बढ़ेगा—ऐसे उत्साहसे उसका पालन करो। परन्तु आप लड़केके जन्मपर राजी और लड़कीके जन्मपर बेराजी होते हैं। सासूजीसे पूछो कि माँजी, क्या हुआ है? वह कहेगी कि ‘भाटो (पत्थर) आयो है भाटो’! उन माँजीसे पूछो कि जब आप जन्मी थीं, तब हीरा आया था क्या? लड़कीको पराया धन कहते हैं। लड़का-लड़की आपसमें लड़ें तो लड़केसे कहते हैं कि बहनसे क्यों लड़ता है? यह तो अपने घर चली जायगी! इसी प्रकार सज्जनो! प्रकृतिका जितना कार्य (संसार) है, वह सब लड़की है और लड़की तो अपने घर जायगी ही, यहाँ रहेगी नहीं। अत: क्यों मोह करते हो? यहाँ कुछ भी नहीं रहेगा। न सम्पत्ति रहेगी, न विपत्ति रहेगी। न अनुकूलता रहेगी, न प्रतिकूलता रहेगी। फिर इसमें क्यों राग और द्वेष करें?