राजाका कर्तव्य
सामाजिक व्यवस्थापर समाजका अधिकार है, राजा (शासक या सरकार)-का अधिकार नहीं। अत: समाजके नियम बनाना राजाका कर्तव्य नहीं है। विवाह, व्यापार, जीविका, सन्तानोत्पत्ति, वर्णाश्रमधर्मका पालन आदि प्रजाके धर्म हैं। प्रजाके धर्मोंमें हस्तक्षेप करना राजाका कर्तव्य नहीं है। अगर राजा उनमें हस्तक्षेप करता है तो यह अन्याय है। राजाका मुख्य कर्तव्य है—प्रजाकी रक्षा करना और उससे बलपूर्वक धर्मका पालन करवाना।
कोई धर्मका उल्लंघन न करे, इसलिये धर्मका पालन करवाना राजाका अधिकार है। परन्तु धर्मशास्त्रके विरुद्ध कानून बनाना राजाका घोर अन्याय है। हिन्दू एकसे अधिक विवाह न करे, अमुक उम्रमें विवाह करे, दोसे अधिक सन्तान पैदा न करे आदि कानून बनाना राजाका अधिकार नहीं है। राजाका कर्तव्य अपने राज्यमें जन्म लेनेवाले प्रत्येक व्यक्तिके जीवन-निर्वाहकी व्यवस्था करना है, न कि उसके जन्मपर ही रोक लगा देना। अपने धर्म, वर्ण, आश्रम, जाति आदिके अनुसार आचरण करना प्रजाका अधिकार है। अगर प्रजा धर्म, वर्णाश्रम आदिकी मर्यादाके विरुद्ध चले तो उसको शासनके द्वारा मर्यादामें लगाना राजाका कर्तव्य है।
एष राज्ञां परो धर्मो ह्यार्तानामार्तिनिग्रह:।
(श्रीमद्भा० १।१७।११)
‘राजाओंका परम धर्म यही है कि वे दु:खियोंका दु:ख दूर करें।’
राज्ञो हि परमो धर्म: स्वधर्मस्थानुपालनम्।
शासतोऽन्यान् यथाशास्त्रमनापद्युत्पथानिह॥
(श्रीमद्भा० १।१७।१६)
‘बिना आपत्तिकालके मर्यादाका उल्लंघन करनेवालोंको शास्त्रानुसार दण्ड देते हुए अपने धर्ममें स्थित लोगोंका पालन करना राजाओंका परम धर्म है।’
य उद्धरेत्करं राजा प्रजा धर्मेष्वशिक्षयन्।
प्रजानां शमलं भुङ्क्ते भगं च स्वं जहाति स:॥
(श्रीमद्भा० ४।२१।२४)
‘जो राजा प्रजाको धर्ममार्गकी शिक्षा न देकर केवल उससे कर वसूल करनेमें लगा रहता है, वह केवल प्रजाके पापका ही भागी होता है और अपने ऐश्वर्यसे हाथ धो बैठता है।’
श्रेय: प्रजापालनमेव राज्ञो
यत्साम्पराये सुकृतात् षष्ठमंशम्।
हर्तान्यथा हृत्पुण्य: प्रजाना-
मरक्षिता करहारोऽघमत्ति॥
(श्रीमद्भा० ४।२०।१४)
‘राजाका कल्याण प्रजापालनमें ही है। इससे उसे परलोकमें प्रजाके पुण्यका छठा भाग मिलता है। इसके विपरीत जो राजा प्रजाकी रक्षा तो नहीं करता, पर उससे कर वसूल करता जाता है, उसका सारा पुण्य प्रजा छीन लेती है और बदलेमें उसे प्रजाके पापका भागी होना पड़ता है।’
यस्य राष्ट्रे प्रजा: सर्वास्त्रस्यन्ते साध्व्यसाधुभि:।
तस्य मत्तस्य नश्यन्ति कीर्तिरायुर्भगो गति:॥
(श्रीमद्भा० १।१७।१०)
‘जिस राजाके राज्यमें दुष्टोंके उपद्रवसे सारी प्रजा त्रस्त रहती है, उस मतवाले राजाकी कीर्ति, आयु, ऐश्वर्य और परलोक नष्ट हो जाते हैं।’
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।
सो नृपु अवसि नरक अधिकारी॥
(मानस, अयोध्या० ७१।३)
प्रजाका शासक राजा होता है और राजाके शासक वीतराग सन्त-महात्मा होते हैं। धर्म और धर्माचार्यपर राजाका शासन नहीं चलता। उनपर शासन करना राजाका घोर अन्याय है। धर्म और धर्माचार्यका राजापर शासन होता है। यदि उनका राजापर शासन न हो तो राजा उच्छृंखल हो जाय! निर्बुद्धि राजा ही धर्म और धर्माचार्यपर शासन करता है, उनपर अपनी आज्ञा चलाता है; क्योंकि वह समझता है कि बुद्धि मेरेमें ही है! दूसरा भी कोई बुद्धिमान् है—यह बात उसको जँचती ही नहीं।
पहले हमारे देशमें राजालोग राज्य तो करते थे, पर सलाह ऋषि-मुनियोंसे लिया करते थे। कारण कि अच्छी सलाह वीतराग पुरुषोंसे ही मिल सकती है, भोगी पुरुषोंसे नहीं। इसलिये कानून बनानेका अधिकार वीतराग पुरुषोंको ही है। महाराज दशरथ और भगवान् राम भी प्रत्येक कार्यमें वसिष्ठजीसे सम्मति लेते थे और उनकी आज्ञासे सब काम करते थे। परन्तु आजकलके शासक सन्तोंसे सम्मति लेना तो दूर रहा, उलटे उनका तिरस्कार, अपमान करते हैं। जो शासक खुद वोटोंके लोभमें, स्वार्थमें लिप्त है, उसके बनाये हुए कानून कैसे ठीक होंगे? धर्मके बिना नीति विधवा है और नीतिके बिना धर्म विधुर है। अत: धर्म और राजनीति—दोनों साथ-साथ होने चाहिये, तभी शासन बढ़िया होता है। बढ़िया शासनका नमूना महाराज अश्वपतिके इन वचनोंसे मिलता है—
न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यप:।
नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुत:॥
(छान्दोग्य० ५।११।१५)
‘मेरे राज्यमें न तो कोई चोर है, न कोई कृपण है, न कोई मदिरा पीनेवाला है, न कोई अनाहिताग्नि (अग्निहोत्र न करनेवाला) है, न कोई अविद्वान् है और न कोई परस्त्रीगामी ही है, फिर कुलटा स्त्री (वेश्या) तो होगी ही कैसे?’
जो वोटोंके लिये आपसमें लड़ते हैं, कपट करते हैं, हिंसा करते हैं, लोगोंको रुपये दे-देकर, फुसला-फुसलाकर वोट लेते हैं, उनसे क्या आशा रखी जाय कि वे न्याययुक्त राज्य करेंगे? नेतालोग वोट लेने तो आ जाते हैं, पर वोट मिलनेके बाद सोचते ही नहीं कि लोगोंकी क्या दशा हो रही है? वोट लेनेके लिये तो खूब मोटरें दौड़ायेंगे, तेल फूँकेंगे, लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करेंगे, अपना और लोगोंका समय बरबाद करेंगे, पर वोट मिलनेके बाद आकर पूछेंगे ही नहीं कि भाई, तुमलोगोंकी सहायतासे हमें वोट मिले हैं, तुम्हारे घरमें कोई तकलीफ तो नहीं है? तुम्हारा जीवन-निर्वाह कैसा हो रहा है? पहले राजालोग शासन करते थे तो वे राज्यकी सम्पत्तिको अपनी न मानकर प्रजाकी ही मानते थे और उसको प्रजाके ही हितमें खर्च करते थे। प्रजाके हितके लिये ही वे प्रजासे कर लेते थे। सूर्यवंशी राजाओंके विषयमें महाकवि कालिदास लिखते हैं—
प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत्।
सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रवि:॥
(रघुवंश १।१८)
‘वे राजालोग अपनी प्रजाके हितके लिये प्रजासे उसी प्रकार कर लिया करते थे, जिस प्रकार सहस्रगुना करके बरसानेके लिये ही सूर्य पृथ्वीसे जल लिया करता है।’
जब राजाओंमें स्वार्थभाव आ गया और वे प्रजाकी सम्पत्तिका खुद उपभोग करने लगे, तब उनका परम्परासे अरबों वर्षोंसे चला आया राज्य भी नहीं रहा। आज झूठ-कपट आदिके बलपर जीतकर आये हुए नेतालोग सोचते हैं कि हमें तो पाँच वर्षोंतक कुर्सीपर रहना है, आगेका कोई भरोसा नहीं; अत: जितना संग्रह करके लाभ उठा सकें, उतना उठा लें, देश चाहे दरिद्र हो जाय। वे यह सोचकर नीति-निर्धारण करते हैं कि धनियोंका धन कैसे नष्ट हो? यह नहीं सोचते कि सब-के-सब धनी कैसे हो जायँ? महाभारतमें आया है—
यथा मधु समादत्ते रक्षन् पुष्पाणि षट्पद:।
तद्वदर्थान्मनुष्येभ्य आदद्यादविहिंसया॥
(महा० उद्योग० ३४। १७)
‘जैसे भौंरा फूलोंकी रक्षा करता हुआ ही उनके मधुको ग्रहण करता है, उसी प्रकार राजा भी प्रजाको कष्ट दिये बिना ही उनसे धन (कर) ग्रहण करे।’ परन्तु आज सरकार धनियोंका धन छीननेके लिये उनके घरों और दूकानोंमें छापा मारती है, जो कि डाका डालना ही है, और धनीलोग टैक्ससे बचनेके लिये तरह-तरहकी बेईमानी सीखते हैं। दोनों ही देशका हित नहीं सोचते कि इस नीतिसे भविष्यमें देशकी क्या दशा होगी? सरकार धनियोंसे जबर्दस्ती धन लेनेकी चेष्टा करेगी तो धनियोंके भीतर भी जबर्दस्ती धन छिपानेका भाव पैदा होगा। इसलिये सरकारको चाहिये कि वह धनियोंका धन न छीनकर उनके भीतर उदारताका, परोपकारका भाव जाग्रत् करे। यह भाव वीतराग पुरुषोंके द्वारा ही जाग्रत् किया जा सकता है।
वर्तमान राजनीति संघर्ष पैदा करनेवाली है। हमें वोट दो, दूसरी पार्टीको वोट मत दो, वह ठीक नहीं है—इससे संघर्ष पैदा होता है। वोट-प्रणालीमें मूर्खताकी प्रधानता है। जिस समाजमें मूर्खोंकी प्रधानता होती है, वहीं वोट-प्रणाली लागू की जाती है। महात्मा गाँधीका भी एक वोट और भेड़ चरानेवालेका भी एक वोट! सज्जन पुरुषका भी एक वोट और दुष्ट पुरुषका भी एक वोट! यह समानता मूर्खोंमें ही होती है। ‘अँधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा।’ वोट-प्रणालीमें भी बेईमानी होती है। जिनके हाथमें सत्ता होती है, वे वोट-प्रणालीका खूब दुरुपयोग करते हैं। वोट प्राप्त करनेके लिये विधर्मियोंका पक्ष लेते हैं, समाजकण्टकोंका पक्ष लेते हैं, अपराधियोंका सहारा लेते हैं। ये बातें किसीसे छिपी नहीं हैं।
वास्तवमें वोट देनेका, सरकार चुननेका अधिकार केवल उन्हीं पुरुषोंको है, जो सच्चे समाजसेवक, त्यागी, धर्मात्मा, सदाचारी, परोपकारी हैं। उनमें भी विशेष अधिकार जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ महापुरुषोंको है। माँ कोई कार्य करती है तो बालककी सलाह नहीं लेती; क्योंकि बालक मूर्ख (बेसमझ) होता है। परन्तु वोट देनेकी वर्तमान प्रणालीके अनुसार यदि बुद्धिमानोंकी संख्या निन्यानबे है और मूर्खोंकी संख्या सौ है तो एक वोट अधिक होनेसे मूर्ख जीत जायँगे, बुद्धिमान् हार जायँगे, जब कि वास्तवमें सौ मूर्ख मिलकर भी एक बुद्धिमान् की बराबरी नहीं कर सकते*। वर्तमान वोट-प्रणालीके अनुसार जिसकी संख्या अधिक होती है, वह जीत जाता है और राज्य करता है और जिसकी संख्या कम होती है, वह हार जाता है। विचार करें, समाजमें विद्वानोंकी संख्या अधिक होती है या मूर्खोंकी? सज्जनोंकी संख्या अधिक होती है या दुष्टोंकी? ईमानदारोंकी संख्या अधिक होती है या बेईमानोंकी? अध्यापकोंकी संख्या अधिक होती है या विद्यार्थियोंकी? जिनकी संख्या अधिक होगी, वे ही वोटोंसे जीतेंगे और देशपर शासन करेंगे, फिर देशकी क्या दशा होगी—विचार करें!