सब कुछ भगवान् ही हैं
गीतामें भगवान् कहते हैं—
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:॥
(७। १९)
‘बहुत जन्मोंके अन्तमें ‘सब कुछ वासुदेव ही है’— ऐसा जो ज्ञानवान् मेरे शरण होता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।’
तात्पर्य है कि ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—यही असली ज्ञान है। ऐसे ज्ञानवाला महात्मा* भक्त भगवान् के शरण हो जाता है अर्थात् अपना अस्तित्व (मैंपन) मिटाकर भगवान् में लीन हो जाता है। फिर मैंपन नहीं रहता अर्थात् ज्ञानवाला नहीं रहता, प्रत्युत केवल ज्ञानस्वरूप भगवान् रह जाते हैं, जिसमें मैं-तू-यह-वह चारों ही नहीं हैं।
संसारका मूल ‘अहम्’ (मैंपन) है; अत: किसी भी साधनसे इस अहम् को मिटाना है। अहम् के मिटनेपर सब साधन एक हो जाते हैं। सब कुछ भगवान् ही हैं—इस भावसे ‘अहम्’ (मैंपन) सुगमतापूर्वक मिट जाता है। संसार अहम् के कारण ही दीखता है अर्थात् अहंभाव (व्यक्तित्व) को स्वीकार करनेसे, अहम् के संस्कार रहनेसे ही संसारकी स्वतन्त्र सत्ता दीखती है। अहंभाव मिटते ही संसारकी स्वतन्त्र सत्ता मिट जाती है और ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—इसका अनुभव हो जाता है। अत: जबतक अपनी अथवा संसारकी स्वतन्त्र सत्ता दीखती है, तबतक मुक्ति नहीं हुई, वास्तविक ज्ञान नहीं हुआ।
सब कुछ भगवान् ही हैं—सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (छान्दोग्य० ३। १४। १), ‘ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्’ (मुण्डक० २। २। ११)। एक परमतत्त्व भगवान् के सिवाय और कुछ हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं और हो सकता ही नहीं*। सब कुछ भगवान् ही हैं—इसको जाननेवाला भी भगवान् ही है; क्योंकि भगवान् में मैं-तू, यह-वह नहीं है। जबतक भगवान् को जाननेवालेकी सत्ताका भान है, तबतक ‘वासुदेव: सर्वम्’ सिद्ध नहीं हुआ। कारण कि इसके सिद्ध होनेपर स्वयंकी अलग सत्ता, अस्तित्व नहीं रहता, प्रत्युत भगवान्-ही-भगवान् रहते हैं। इसलिये कहा है—
ढूँढा सब जहाँ में, पाया पता तेरा नहीं।
जब पता तेरा लगा, अब पता मेरा नहीं॥
अर्जुन कहते हैं—
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम॥
(गीता १०।१५)
‘हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने-आपसे अपने-आपको जानते हैं।’
तात्पर्य है कि जाननेवाले भी भगवान् ही हैं, जाननेमें आनेवाले भी भगवान् ही हैं और जानना भी भगवान् ही हैं अर्थात् सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान् के सिवाय कुछ भी नहीं है। भगवान् ने भी कहा है—
मत्त: परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥
(गीता ७। ७)
‘हे धनञ्जय! मेरेसे बढ़कर इस जगत् का दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण तथा कार्य नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओतप्रोत है।’
तात्पर्य है कि सूत भी भगवान् ही हैं, मणियाँ भी भगवान् ही हैं; माला भी भगवान् ही हैं और माला फेरनेवाले भी भगवान् ही हैं अर्थात् सब कुछ भगवान् ही हैं। प्रह्लादजी भगवान् से कहते हैं—
त्वं वायुरग्निरवनिर्वियदम्बुमात्रा:
प्राणेन्द्रियाणि हृदयं चिदनुग्रहश्च।
सर्वं त्वमेव सगुणो विगुणश्च भूमन्
नान्यत् त्वदस्त्यपि मनोवचसा निरुक्तम्॥
(श्रीमद्भा० ७।९।४८)
‘अनन्त प्रभो! वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश, जल, पञ्चतन्मात्राएँ, प्राण, इन्द्रिय, मन, चित्त, अहङ्कार, सम्पूर्ण जगत् एवं सगुण और निर्गुण—सब कुछ केवल आप ही हैं। अधिक क्या कहूँ, मन और वाणीके द्वारा जो कुछ निरूपण किया गया है, वह सब आपसे अलग नहीं है।’
सब कुछ भगवान् ही हैं—यह भाव विवेकसे भी तेज है। ज्ञानमार्गमें विवेककी और भक्तिमार्गमें भावकी मुख्यता है। ज्ञानमार्गमें जड और चेतन, सत् और असत् का विवेक मुख्य होनेसे यह द्वैतमार्ग है; परन्तु भक्तिमार्गमें एक भगवान् का ही भाव मुख्य होनेसे यह अद्वैतमार्ग है। ज्ञानयोगके आरम्भमें विवेक है, पर भक्तियोगमें आरम्भसे ही भगवान् के साथ सम्बन्ध है। अत: भक्ति ज्ञानसे श्रेष्ठ है।
ज्ञानयोग उन साधकोंके लिये है, जो अत्यन्त वैराग्यवान् हैं—‘निर्विण्णानां ज्ञानयोग:’ (श्रीमद्भा० ११।२०।७)। जो न अत्यन्त वैराग्यवान् हैं और न अत्यन्त आसक्त हैं, उनके लिये भक्तियोग ही सिद्धि देनेवाला है— ‘न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिद:’ (श्रीमद्भा०११।२०।८)। ज्ञानयोग विवेकमार्ग है। जबतक विवेक है, तबतक तत्त्वज्ञान नहीं है, प्रत्युत तत्त्वज्ञानका साधन है। अत्यन्त वैराग्य न होनेसे विवेकमार्गमें असत् की सत्ताका भाव रहता है। असत् की सत्ताका भाव रहनेसे विवेकप्रधान साधकमें निरन्तर आनन्द नहीं रहता। कारण कि संसार दु:खालय है, इसलिये संसारकी सत्ताका किञ्चिन्मात्र भी संस्कार रहेगा तो विवेक होते हुए भी दु:ख आ जायगा। इस असत् की सत्ताके संस्कार भीतर रहनेके कारण ही साधककी यह शिकायत रहती है कि बात तो ठीक समझमें आती है, पर वैसी स्थिति नहीं होती! उसको कभी तो अपने साधनमें अच्छी स्थिति दीखती है और कभी राग-द्वेष अधिक होनेपर ग्लानि, व्याकुलता होती है कि साधन करते हुए इतने वर्ष बीत गये, पर अभीतक अनुभव नहीं हुआ! भावमें सत् और असत् दोनों रहनेसे ही ऐसी दुविधा होती है। यदि भावमें एक भगवान् ही रहें—‘वासुदेव: सर्वम्’ तो ऐसी दुविधा रह ही नहीं सकती।
ज्ञानमार्गमें साधक असत् का त्याग करता है तो अहम् (त्याग करनेवाला) रह सकता है। परन्तु भक्तिमार्गमें भगवान् (प्रापणीय वस्तु) की मुख्यता रहनेसे प्रेम बढ़ जाता है और प्रेम बढ़नेसे अहम् स्वत: छूट जाता है। तात्पर्य है कि ज्ञानमार्गमें अनुभविता (साधक)की मुख्यता रहती है और भक्तिमार्गमें अनुभाव्य (भगवान्)की मुख्यता रहती है। इसलिये ज्ञानमार्गमें मैंपन बहुत दूरतक साथ रहता है, जबकि भक्तिमार्गमें मैंपन जल्दी मिट जाता है। जैसे, ‘मैं देखता हूँ’—इसमें ‘मैं’ (देखनेवाले) की मुख्यता रहती है और ‘वह दीखता है’—इसमें ‘वह’ (दीखनेवाले) की मुख्यता रहती है। ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—इसमें अनुभव, अनुभाव्य और अनुभविता तीनों ही नहीं रहते।
विवेकमार्गमें साधक असत् का निषेध करता है। निषेध करनेसे असत् की सत्ता बनी रहती है। साधक असत् के निषेधपर जितना जोर लगाता है, उतनी ही असत् की सत्ता दृढ़ होती है। अत: असत् का निषेध करना उतना बढ़िया नहीं है, जितना उसकी उपेक्षा करना बढ़िया है। उपेक्षा करनेकी अपेक्षा ‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’—यह भाव और भी बढ़िया है। अत: भक्त न असत् को हटाता है, न असत् की उपेक्षा करता है, प्रत्युत सत्-असत् सब कुछ परमात्मा ही हैं—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९)—ऐसा मान लेता है।
ज्ञानमार्गमें ‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ ‘गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं’—इसमें इन्द्रियाँ, विषय और क्रिया तीनों हैं, पर ‘वासुदेव: सर्वम्’ ‘सब कुछ वासुदेव ही है’—इसमें इन्द्रियाँ, विषय (पदार्थ) और क्रिया तीनों ही नहीं हैं, प्रत्युत केवल भगवान्-ही-भगवान् हैं।
जैसे ज्ञानमार्गमें अत्यन्त वैराग्यकी जरूरत है, ऐसे ही भक्तिमार्गमें दृढ़ मान्यताकी अर्थात् अचल विश्वासकी जरूरत है। जैसे अत्यन्त वैराग्य होनेपर विवेक बोधमें परिणत हो जाता है, ऐसे ही अचल विश्वास होनेपर ‘वासुदेव: सर्वम्’ की मान्यता अनुभवमें परिणत हो जाती है।
वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो संसारकी मानी हुई सत्ताको हटानेके लिये ही ‘वासुदेव: सर्वम्’ की दृढ़ मान्यता करनेकी आवश्यकता है, अन्यथा ‘वासुदेव: सर्वम्’—यह मान्यता नहीं है, प्रत्युत वास्तविकता है। मान्यता करनेमें मान्यता करनेवाला (अहम्) रहता है, जबकि वासुदेव: सर्वम्’ में मान्यता करनेवाला अथवा अनुभव करनेवाला नहीं है, प्रत्युत वासुदेव ही है। कारण कि जबतक अहम् है अर्थात् मान्यता करनेवाला अथवा अनुभव करनेवाला है, तबतक संसारकी सत्ता है।
प्रश्न—‘वासुदेव: सर्वम्’ का भाव विध्यात्मक साधन है या निषेधात्मक?
उत्तर—विधि और निषेधकी बात कर्मयोग और ज्ञानयोगमें है। भक्तियोग कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनोंसे अतीत है। कारण कि कर्मयोग और ज्ञानयोग तो लौकिक निष्ठाएँ हैं, पर भक्तियोग लौकिक निष्ठा नहीं है*। विधि-निषेध संसारमें हैं, भगवान् संसारसे अतीत हैं। सब कुछ भगवान् ही हैं—इसमें निषिद्ध वस्तु (असत् ) की सत्ता ही नहीं है। अत: कर्मयोग और ज्ञानयोगमें निषिद्धका त्याग मुख्य है और भक्तियोगमें विश्वासपूर्वक भगवान् का आश्रय लेना मुख्य है। भगवान् का आश्रय लेना निषिद्धके त्यागसे भी तेज है। आश्रय लेनेका तात्पर्य है—‘सब कुछ भगवान् ही हैं’ ऐसा दृढ़तासे मानकर ‘मैं’ और ‘मेरा’ दोनोंको भगवान् में लीन कर देना।
प्रश्न—‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’—इस बातको सीख लेना और अनुभव करना—इन दोनोंमें क्या भेद है?
उत्तर—सीखनेपर मनुष्य ‘सब कुछ परमात्मा ही है’ इस बातको याद कर लेगा, इसका ठीक तरहसे वर्णन कर देगा, इस विषयमें पुस्तक लिख देगा, व्याख्यान दे देगा, पर उसके भीतर जगत् की सत्ता रहेगी। अनुभव होनेपर उसकी एक परमात्मतत्त्वमें ही समान स्थिति रहेगी। तात्पर्य है कि सीखनेमें जगत् की सत्ता रहती है और अनुभव करनेमें जगत् की स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती, प्रत्युत सब समय तथा सब जगह एक परमात्मा ही रहते हैं।
सब कुछ भगवान् ही हैं—इसको सीख लेनेपर कभी तो ऐसा दीखेगा कि मैं परमात्माको प्राप्त हूँ और बड़ी शान्ति, बड़ा आनन्द मालूम देगा। परन्तु कभी यह मान्यता ढीली पड़ेगी और जगत् की सत्ता सामने आ जायगी, तब ऐसा दीखेगा कि मेरी वैसी स्थिति हुई ही नहीं। कभी-कभी ऐसा मालूम देगा कि जब हम इस बातको नहीं जानते थे, उस समय जैसी शान्ति थी, वैसी भी अब नहीं है और बड़ी हलचल हो रही है! जगत् की सत्ता जितनी दृढ़ होगी, उतनी ही अशान्ति, हलचल, दु:ख, सन्ताप पैदा होंगे और जब विचारपूर्वक जगत् की सत्ता हटेगी, तब सब कुछ परमात्मा ही हैं—ऐसा दीखेगा। परन्तु जब ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—ऐसा अनुभव हो जायगा, तब इसमें कभी फर्क नहीं पड़ेगा। कारण कि भगवान् में जगत् नहीं है।
प्रश्न—‘सब कुछ भगवान् ही हैं—यह करणसापेक्ष है या करणनिरपेक्ष?
उत्तर—यह करणनिरपेक्ष है। जैसे हम सीढ़ियोंसे छतपर चढ़ते हैं तो ऊपर जाते ही सीढ़ियाँ अपने-आप छूट जाती हैं, ऐसे ही भक्तिमें करण अपने-आप छूट जाता है, उसको छोड़ना नहीं पड़ता। विवेकमार्गका साधक विवेक-विचारपूर्वक सीढ़ियोंको छोड़कर ऊपर चढ़ता है; अत: छोड़नेवाला और छूटनेवाली वस्तुकी सत्ता रहनेसे अहङ्कार दूरतक साथ रहता है। परन्तु भक्त आरम्भसे ही भगवन्निष्ठ अर्थात् भगवान् के परायण (आश्रित) रहता है। इसलिये भक्तिमें करणका भगवान् के साथ सम्बन्ध रहता है, जबकि ‘मैं साधन करता हूँ’—इस प्रकार साधननिष्ठ होनेपर करणके साथ अपना सम्बन्ध रहता है। भक्तिमें साध्य भी भगवान् हैं और साधन भी भगवान् का भरोसा है। अत: भक्तमें ‘मैं साधन करता हूँ’—यह भाव नहीं होता, प्रत्युत यह भाव होता है कि भगवान् की कृपासे साधन हो रहा है अर्थात् भगवान् ही करवा रहे हैं, मैं नहीं कर रहा हूँ—‘करी गोपाल की सब होइ।’ इसलिये भक्तमें कर्तृत्व नहीं रहता। अगर कुछ कर्तृत्व रह भी जाय तो उसको भगवान् नष्ट कर देते हैं*।
प्रश्न—सब कुछ भगवान् ही हैं—इसका अनुभव करनेका साधन क्या है?
उत्तर—इसका अनुभव करनेके लिये तीन साधन हैं—कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। कर्मयोगमें साधक कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म देखता है—
कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य:।
(गीता ४।१८)
ज्ञानयोगमें साधक सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्मा और आत्मामें सम्पूर्ण प्राणी देखता है—
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
(गीता ६। २९)
भक्तियोगमें साधक संसारमें भगवान् और भगवान् में संसार देखता है—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति॥
(गीता ६। ३०)
कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म देखनेसे कर्म नहीं रहता, प्रत्युत ‘अकर्म’ शेष रहता है। सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्मा और आत्मामें सम्पूर्ण प्राणी देखनेसे प्राणी नहीं रहते, प्रत्युत ‘आत्मा’ शेष रहता है। संसारमें भगवान् और भगवान् में संसार देखनेसे संसार नहीं रहता, प्रत्युत ‘भगवान्’ शेष रहते हैं। अकर्म (निर्लिप्तता), आत्मा और भगवान्—तीनों एक ही हैं। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों योगोंसे परिणाममें ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—इसका अनुभव हो जाता है।
कर्मयोगी स्वार्थभावका त्याग करके केवल दूसरोंके सुखके लिये ही सब कर्म करता है, इसलिये उसकी सुखासक्ति मिट जाती है। सुखासक्ति मिटनेसे उसमें मैं-पन नहीं रहता। मैं-पन मिटनेसे संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव हो जाता है और एक भगवान् ही रह जाते हैं।
ज्ञानयोगी सत्-असत् के विवेकको महत्त्व देकर असत् का निषेध करता है और सत् में स्थित होता है। विवेकके द्वारा सत् में स्थिति होनेपर भी संसारकी सत्ता सूक्ष्मरूपसे रहती है; क्योंकि साधन करते समय तेजीका वैराग्य नहीं था। तीव्र वैराग्य न होनेसे अनुभव होनेपर भी रागका थोड़ा अंश अथवा मैं-पन सूक्ष्मरूपसे रहता है। उस सूक्ष्म मैं-पनके रहनेसे ही दर्शनोंमें भेद रहता है और अपना दर्शन, सिद्धान्त, साधन बढ़िया मालूम देता है। यदि तेजीका वैराग्य हो जाय और वास्तविक तत्त्वका साक्षात्कार हो जाय तो यह सूक्ष्म मैं-पन नहीं रहता और ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—इसका अनुभव हो जाता है*।
भक्तियोगी सबमें भगवान् को और भगवान् में सबको देखता है, इसलिये उसकी दृष्टिमें न मैं-मेरा रहता है, न तू-तेरा रहता है, न यह-इसका रहता है और न वह-उसका रहता है, प्रत्युत केवल भगवान् ही रहते हैं। साधारण रीतिसे मैं हूँ, जगत् है और भगवान् हैं—यह भाव रहता है, पर भक्तमें केवल भगवद्भाव ही रहता है। इसलिये उसमें मैं-पन सुगमतासे नष्ट हो जाता है* और ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—इसका अनुभव हो जाता है।
प्रश्न—जब सब कुछ भगवान् ही हैं तो फिर सात्त्विक-राजस-तामस भाव त्याज्य क्यों हैं?
उत्तर—जैसे जमीनमें जल सब जगह रहता है, पर उसका प्राप्तिस्थान कुआँ है, ऐसे ही भगवान् सब जगह हैं, पर उनका प्राप्तिस्थान हृदय है—‘हृदि सर्वस्य विष्ठितम्’ (गीता १३।१७), ‘सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्ट:’ (गीता १५।१५)। परन्तु सात्त्विक-राजस-तामस भाव भगवान् के प्राप्तिस्थान नहीं हैं। अत: ये साधकके लिये कामके नहीं हैं। इसीलिये भगवान् ने कहा है कि वे भाव मेरेसे होनेपर भी मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं—
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥
(गीता ७।१२)
जैसे, बाजरीकी खेतीमें बाजरी ही मुख्य होती है, पत्ती-डंठल नहीं। किसानका लक्ष्य केवल बाजरीको प्राप्त करनेका ही होता है। बाजरीको प्राप्त करनेके लिये वह खेतीको जल, खाद आदिसे पुष्ट करता है, जिससे बढ़िया बाजरी प्राप्त हो सके। ऐसे ही साधकका लक्ष्य भी केवल भगवान् का होना चाहिये, संसारका नहीं। भगवान् को प्राप्त करनेके लिये साधकको संसारकी सेवा करनी चाहिये। सेवाके सिवाय संसारसे अपना कोई मतलब नहीं रखना चाहिये। महत्त्व बाजरी (दाने)का है, पत्ती-डंठलका नहीं; क्योंकि आरम्भमें भी बाजरी रहती है और अन्तमें भी बाजरी ही रहती है। बाजरी प्राप्त करनेके बाद जो शेष बचता है, वह (पत्ती-डंठल) अपने लिये किसी कामकी चीज नहीं है, प्रत्युत पशुओंके खानेकी चीज है। ऐसे ही सात्त्विक-राजस-तामस भाव संसारके व्यवहारके लिये हैं, अपने लिये नहीं।
जैसे बाजरी (बीज)से पत्ती-डंठल पैदा होनेपर भी पत्ती-डंठलमें बाजरी नहीं है और बाजरीमें पत्ती-डंठल नहीं हैं, ऐसे ही भगवान् से पैदा होनेपर भी सात्त्विक-राजस-तामस भावोंमें भगवान् नहीं हैं और भगवान् में सात्त्विक-राजस-तामस भाव नहीं है—‘न त्वहं तेषु ते मयि।’
जैसे पत्ती-डंठल उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं तथा उनमें बाजरी नहीं दीखती, फिर भी पत्ती-डंठल बाजरीसे अलग नहीं हैं। कारण कि उनके आरम्भमें भी बाजरी थी और अन्तमें भी बाजरी रहेगी। ऐसे ही संसार उत्पत्ति-विनाशशील है और उसमें भगवान् नहीं दीखते, फिर भी संसार भगवान् से अलग नहीं है। कारण कि संसारके आदिमें भी भगवान् थे और अन्तमें भी भगवान् रहेंगे। जैसे तत्त्वकी दृष्टिसे न देखनेवाला अनजान आदमी बाजरीकी खेतीको देखकर कहता है कि यह तो केवल घास-ही-घास है, बाजरी कैसे हुई? ऐसे ही अज्ञानी मनुष्य कहता है कि जो दीखता है, वह तो संसार है, भगवान् कैसे हुए*? परन्तु जो तत्त्वसे देखते हैं, उन ज्ञानी महापुरुषोंकी दृष्टिमें संसार है ही नहीं, प्रत्युत सब कुछ भगवान् ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’। जो बाजरीको देखते हैं, वही वास्तवमें मनुष्य हैं। जो केवल घासको ही देखते हैं, वे तो पशु हैं! कारण कि मनुष्य तो घासका त्याग करके बाजरीको ग्रहण करते हैं, पर पशु कोरी घास ही चबाते हैं! क्योंकि उनकी दृष्टिमें घासके सिवाय और कुछ है ही नहीं—‘कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता:’(गीता १६। ११)।