सभी कर्तव्य कर्मोंका नाम यज्ञ है
गीताजीके श्लोकोंसे तो यही बात सिद्ध होती है कि सब कर्मोंका नाम यज्ञ है। कैसे सिद्ध होती है, इसपर विचार किया जाता है। यज्ञोंका विशेष वर्णन आता है गीताके चौथे अध्यायमें २४ वें श्लोकसे ३२वें श्लोकतक। इनका प्रकरण आरम्भ होता है चौथे अध्यायके २३वें श्लोकसे। उसमें भगवान् कहते हैं—
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतस:।
यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते॥
इसमें बतलाया गया है कि यज्ञके लिये आचरित सम्पूर्ण कर्म सर्वथा विलीन हो जाते हैं। अर्थात् वे शुभाशुभ फलका उत्पादन नहीं करते, फलदायक—बन्धनकारक नहीं होते, जन्म देनेवाले नहीं होते। कर्मोंकी प्रविलीनताका यही अर्थ है।
इसी बातको दूसरे ढंगसे भगवान् कहते हैं तीसरे अध्यायके ९वें श्लोकमें—
यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:।
यज्ञार्थ कर्मसे भिन्न कर्ममें लगनेपर यह लोकसमुदाय कर्मोंके बन्धनमें बँधता है।
अर्थात् यज्ञके अतिरिक्त जो भी कर्म होते हैं, वे सभी बन्धनकारक होते हैं। केवल यज्ञार्थ कर्म बन्धनकारक नहीं होते। उपर्युक्त दोनों ही स्थलोंमें ‘यज्ञ’ शब्द आया है। चौथे अध्यायके २४ वें श्लोकसे भगवान् यज्ञोंका वर्णन आरम्भ करते हैं—
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
इस प्रकरणमें चौदह यज्ञोंका उल्लेख किया गया है, जिनमें ‘प्राणायाम’ का नाम भी आया है—
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणा:॥
(४।२९)
अपरे नियताहारा: प्राणान् प्राणेषु जुह्वति।
(४।३०)
ऊपर ‘जुह्वति’ क्रिया दी गयी है, आगे और भी क्रियाएँ बतायी गयी हैं। जैसे उसी अध्यायके २८वें श्लोकमें भगवान् कहते हैं—
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतय: संशितव्रता:॥
दान-पुण्य आदि जितने भी कर्म पैसोंसे या पदार्थोंसे सिद्ध होते हैं, उन्हींको ‘द्रव्ययज्ञ’ कहा गया है। इसी प्रकार जिसमें इन्द्रियोंका, मनका, शरीरका संयम किया जाय, उस तपस्याको भी ‘यज्ञ’ कहा गया है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि—पातञ्जलयोगके ये आठ अङ्ग तथा हठयोग, लययोग, मन्त्रयोग आदि जो अन्य योग हैं, उन्हें भगवान् ने ‘योगयज्ञ’ कहा है। स्वाध्याय अर्थात् वेदोंका अध्ययन, स्मृतियोंका पाठ तथा इन सबका मनन—इन्हींको भगवान् ने ‘स्वाध्याययज्ञ’ नाम दिया है तथा इनके द्वारा उत्पन्न हुई समझको, इतना ही नहीं, किसी भी बातको गहराईसे समझनेको ‘ज्ञानयज्ञ’ कहा है। भगवान् ने ‘यज्ञ’ नामसे इन सबको अभिहित किया है। वे इस यज्ञके प्रकरणका उपसंहार करते हैं चौथे अध्यायके ३२वें श्लोकमें—
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
कर्मजान् विद्धि तान् सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥
इस श्लोकमें यज्ञोंको कर्मजन्य बताया गया है। इसके पूर्ववर्ती श्लोकमें श्रीभगवान् कहते हैं—
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।
—जो बात भगवान् ने चौथे अध्यायके २३वें श्लोकमें कही थी—
यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते।
—उसीका उपसंहार एक प्रकारसे वे चौथे अध्यायके ३१वें श्लोकमें करते हैं—‘यज्ञशिष्ट अमृतका भोजन करनेवाले सनातन ब्रह्मको प्राप्त होते हैं*।’
इसी प्रकार तीसरे अध्यायके १३वें श्लोकमें देखिये—
यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।
‘यज्ञशेष भोजन करनेवाले सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं।’ अब देखिये—सब पापोंसे मुक्त हो जाना, सम्पूर्ण कर्मोंका लीन हो जाना और यज्ञसे ब्रह्मकी प्राप्ति—ये तीनों एक ही बात है, सबका तात्पर्य एक ही निकलता है। तीसरे अध्यायके नवें और तेरहवें तथा चौथे अध्यायके तेईसवें और इकतीसवें—इन चारों श्लोकमें यज्ञका फल बताया गया है—परमात्म-तत्त्वकी प्राप्ति, सम्पूर्ण पापोंका नाश और संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद। अत: जितने भी उपाय परमात्माकी प्राप्तिके हैं, वे सब-के-सब गीतामें ‘यज्ञ’ नामसे अभिहित हुए हैं—यह बात उपर्युक्त विवेचनसे सिद्ध हो गयी। बीचमें द्रव्ययज्ञ, तपोयज्ञ, योगयज्ञ, स्वाध्याययज्ञ, ज्ञानयज्ञ, प्राणायामयज्ञ आदि सभी यज्ञोंकी चर्चा आ गयी। दान, तप, होम, तीर्थसेवन, व्रत—ये सब-के-सब ‘यज्ञ’ शब्दके अन्तर्गत आ गये—यह मानना ही पड़ेगा।
चौथे अध्यायके ३२वें श्लोकमें यह कहकर कि ‘वेदकी वाणीमें बहुत-से यज्ञोंका विस्तारसे वर्णन हुआ है’—भगवान् ने दहरादिकी उपासनाका भी ‘यज्ञ’ शब्दमें अन्तर्भाव कर दिया, जिनका वर्णन गीतामें नहीं है, अपितु उपनिषद्में आया है। भगवान् अर्जुनसे कहते हैं—
‘इन सबको तू कर्मोंसे उत्पन्न जान—‘कर्मजान् विद्धि’ और इस प्रकार जाननेसे तू मुक्त हो जायगा—‘एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे।’
चौथे अध्यायके १५वें श्लोकमें श्रीभगवान् कहते हैं—
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभि:।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वै: पूर्वतरं कृतम्॥
यहाँ भी भगवान् ने कर्मपर जोर दिया है। उपर्युक्त श्लोकमें ‘एवं ज्ञात्वा’ से इस तत्त्वको जाननेकी बात जो कही गयी है, वह जिस प्रसंगसे कही गयी है, वह प्रसंग चौथे अध्यायके १३वें श्लोकमें आता है। वह इस प्रकार है—
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:।
यहाँ भी ‘कर्म’ शब्द आया है। इस कर्मके तत्त्वपर ध्यान देना चाहिये। कर्ममात्रका नाम ‘यज्ञ’ है—यह बात अब बतलायी जाती है। चौथे अध्यायके १३वें श्लोककी अवतारणा हुई है उसी अध्यायके नवें श्लोकसे। नवें श्लोकमें भगवान् कहते हैं—‘जन्म कर्म च मे दिव्यम्’—मेरा जन्म-कर्म दिव्य है। वह कर्म दिव्य क्यों है? अपने कर्मोंकी दिव्यताका प्रकरण भगवान् ने चलाया है १३वें श्लोकसे और जन्मकी दिव्यता भगवान् ने कही है चौथे अध्यायके छठे श्लोकसे। वहाँ उन्होंने जन्मकी दिव्यताके साथ अपने जन्मका हेतु बताया और कहा कि ‘मेरा जन्म-कर्म दिव्य है, इस बातको जो जानता है, वह मुक्त हो जाता है।’ चौथे अध्यायके १३वें श्लोकमें श्रीभगवान् कहते हैं—
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:।
तस्य कर्तारमपि मां विद्धॺकर्तारमव्ययम्॥
‘चातुर्वर्ण्यकी जब मैंने रचना की, तब यह मेरा कर्म हुआ; और मैं उसका कर्ता हुआ; तथापि तू मुझ कर्ताको भी अकर्ता जान।’ इसके बाद वे कहते हैं—
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥
‘मुझे कर्म बाँधते नहीं और मेरी कर्मफलमें कोई स्पृहा नहीं है—इस प्रकार जो जान लेता है, वह कर्मोंसे नहीं बँधता।’ इस प्रकार भगवान् ने अपना कर्म बताया और यह भी बताया कि जो उनके कर्मोंका रहस्य जान लेता है, वह बँधता नहीं है। वह क्यों नहीं बँधता? इसके दो हेतु बताये गये हैं—तस्य कर्तारमपि मां विद्धि अकर्तारम्’—उन कर्मोंके कर्ता होते हुए भी मुझको अकर्ता समझ।’ इस कथनसे तात्पर्य यह निकला कि ‘भगवान् कर्तृत्वाभिमानसे रहित हैं।’ साथ ही ‘न मे कर्मफले स्पृहा’ कहकर वे बताते हैं कि मुझमें कर्मफलकी इच्छा नहीं होती।’ जिस कर्ममें कर्तृत्वका अभिमान न हो और फलकी इच्छा न हो, वह कर्म बन्धनकारक नहीं होता, यह सिद्धान्त है। इसलिये भगवान् कहते हैं—‘इति मां योऽभिजानाति’—‘जो कोई भी मुझे ऐसा जान लेता है,’ ‘कर्मभिर्न स बध्यते’—‘कर्मसे वह नहीं बँधता है।’ मेरी तरह कर्तृत्व-अभिमान और फलासक्तिसे रहित होकर कोई भी कर्म करेगा, वह भी नहीं बँधेगा। इस प्रकार भगवान् ने अपने कर्मोंकी दिव्यता बतायी। जो कर्म बाँधनेवाले हैं, वे ही कर्म मुक्तिदायक हो जायँ, यह दिव्यता है कर्मोंकी। इसीलिये कर्मयोगके प्रसंगमें भगवान् ने दूसरे अध्यायमें कहा है—‘योग: कर्मसु कौशलम्’—‘कर्मोंमें योग ही ‘कुशलता’ है।’ ‘योग’ किसका नाम है? ‘समत्वं योग उच्यते’—‘समताको ही योग कहा जाता है।’ यह समता कैसे प्राप्त होती है? ‘सङ्गं त्यक्त्वा’ और ‘सिद्धॺसिद्धॺो: समो भूत्वा’—मनुष्य आसक्तिका त्याग करे और सिद्धि-असिद्धिमें सम हो जाय, तब समता आती है। समताका नाम ही योग है और योग ही कर्ममें कुशलता है। जो कर्म बाँधनेवाले हैं, वे ही मुक्ति देनेवाले हो जायँ—यही कर्मोंकी कुशलता है। इसीलिये कहा गया है—
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभि:॥
कुछ लोग कहते हैं कि जबतक मुमुक्षा उत्पन्न न हो, तभीतक कर्म करना है और मुमुक्षा उत्पन्न हो जानेपर मनुष्यको चाहिये कि वह संन्यास ले ले और कर्मोंका त्याग कर दे। यह अद्वैत-वेदान्तकी प्रक्रिया है। पर चौथे अध्यायके पंद्रहवें श्लोकमें भगवान् कहते हैं—
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभि:।
‘मुमुक्षु पुरुषोंने ऐसा जानकर कर्म किया है।’—कर्म किया है, कर्मोंका त्याग नहीं।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वै: पूर्वतरं कृतम्।
‘इसलिये तू कर्म ही कर,’ ‘कर्मैव कुरु।’ इस प्रकार भगवान् ने यहाँ कर्म करनेपर ही जोर दिया। फिर चौथे अध्यायके १६वें श्लोकमें वे कहते हैं—
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिता:।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥
‘कर्म क्या है, अकर्म क्या है’—इस बातको लेकर बड़े-बड़े पण्डित भी मोहमें पड़ जाते हैं। अब मैं तुझे वह कर्म कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभसे—बन्धनसे मुक्त हो जायगा।’ इस प्रकार १६वें श्लोकसे उपर्युक्त प्रसंगका उपक्रम करके उपसंहार करते हैं उसी अध्यायके ३२वें श्लोकमें। १६वें श्लोकमें उन्होंने जो बात कही—‘यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्’ वही बात चौथेके ३२वेंमें उपसंहार करते हुए कही है—‘एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे।’ इसी कर्मके अन्तर्गत यज्ञ हैं। जितने भी शुभ कर्म हैं, उन्हींका नाम है—‘यज्ञ’ और उन्हीं कर्मोंके द्वारा भगवान् के पूजनकी बात कही गयी है। अठारहवें अध्यायके ४६वें श्लोकमें—‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:।’ पूजाका ही नाम यज्ञ है। इस प्रकार जितने भी कर्म हैं, वे सब-के-सब यज्ञ हैं। ‘यज्ञ’ शब्दके अन्तर्गत जितने भी कर्तव्य-कर्म हैं, वे सब आ गये। अब जरा ध्यान देकर विचार करें—‘यज्ञ’ शब्दका क्या अर्थ होना चाहिये? गीताके अनुसार यज्ञ आदि जितने भी शुभ कर्म हैं, सब-के-सब ‘यज्ञ’ शब्दके अन्त:पाती हैं। इसी ‘यज्ञ’ शब्दका चतुर्थी विभक्तिमें रूप होता है, ‘यज्ञाय’—यज्ञके लिये। ‘यज्ञार्थ’ का भी वही अर्थ होता है जो ‘यज्ञाय’ का है। तीसरे अध्यायके ९वें श्लोकमें आया है—‘यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:’।’ यज्ञार्थ कर्मको छोड़कर अन्य सभी कर्म बन्धनकारक होते हैं।’ ‘यज्ञार्थ कर्म’ का अर्थ है—यज्ञके लिये किये जानेवाले कर्म। चौथे अध्यायके २३वें श्लोकमें कहा है—‘यज्ञायाचरत:’ यज्ञके लिये कर्म करनेका अर्थ है—कर्मके लिये कर्म करना अर्थात् लोकसंग्रहके लिये कर्तव्यमात्र करना। फलकी इच्छा, आसक्ति, कामना, कर्तृत्व-अभिमान आदि कुछ भी नहीं रखना। लोकसंग्रहकी बात भगवान् कहते हैं—तीसरे अध्यायके २०वें, २१वें श्लोकोंमें—‘लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि।’ इसके बाद वे २२ वें श्लोकमें कहते हैं—
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥
‘मेरे लिये तीनों लोकोंमें न तो कोई कर्तव्य शेष है और न कोई ऐसी प्राप्तव्य वस्तु ही बाकी है, जो अबतक मुझे प्राप्त न हुई हो, तो भी मैं कर्ममें प्रवृत्त होता हूँ।’ इसका अर्थ यह हुआ कि केवल कर्तव्य-बुद्धिसे, लोकसंग्रहकी दृष्टिसे, लोक-शिक्षाके लिये कर्म किये जाने चाहिये। अपना कोई स्वार्थ न रहे, कोई कर्तृत्व-अभिमान नहीं, ममता नहीं, आसक्ति नहीं, विषमता नहीं, किसी प्रकारकी कोई इच्छा नहीं, कोई आग्रह नहीं एवं कहीं कोई लगाव नहीं। निर्लिप्त होकर जो कर्म किये जाते हैं, वे सब कर्म ‘यज्ञ’ हो जाते हैं। कर्म किया जाय यज्ञार्थ—यज्ञके लिये ही; लोकपरम्परा सुरक्षित रखना ही उसका उद्देश्य हो, लोगोंका पतन न हो—इसी भावसे कर्म किया जाय, वह होगा ‘यज्ञार्थ कर्म’। ‘यज्ञ’ शब्दका यह तात्पर्य निकला।
अब दूसरी दृष्टिसे देखिये कि ‘यज्ञ’ शब्दका क्या अर्थ होना चाहिये। गीताके चौथे अध्यायमें जो ‘यज्ञ’ शब्द आया है, उसी यज्ञके विषयमें अर्जुनने सत्रहवें अध्यायके प्रारम्भमें एक बात पूछी है—
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विता:।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तम:॥
‘शास्त्रविधिका त्याग करके जो यजन करते हैं, उनकी निष्ठा कौन-सी है?’ जितने यज्ञ होते हैं, सब-के-सब शास्त्र-विधिसे सम्पन्न होते हैं—‘कर्मजान्विद्धि तान्सर्वान्।’ ‘एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे’—‘वे यज्ञ वेदवाणीमें कहे गये हैं।’ वेदवाणीमें कहे गये अर्थात् शास्त्रोंमें उनका विधान किया गया है। परंतु अर्जुनके प्रश्नमें शास्त्रविधिके त्यागपूर्वक यजनकी बात कही गयी है। इसीपर यह प्रश्न उठाया गया है कि शास्त्रविधिका उल्लङ्घन करके जो यजन करते हैं, उनकी निष्ठा कौन-सी होगी। शास्त्रविधिके त्यागका फल तो विपरीत होना चाहिये और यजन-पूजनका फल उत्तम होना चाहिये। दोनोंके सम्मिलित परिणामस्वरूप उनकी निष्ठा कौन-सी होगी—यही प्रश्न अर्जुनके मनमें उठा, जिसका उत्तर भगवान् ने दिया है सत्रहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें। वैसे तो सत्रहवाँ अध्याय पूरा इस प्रश्नके उत्तरके रूपमें है, पर यज्ञके विषयमें उत्तर दिया गया है चौथे श्लोकमें—
यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसा:।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जना:॥
इससे यह सिद्ध हो गया कि सात्त्विक, राजस, तामस—तीन तरहकी निष्ठा उनकी होती है। पूजा होती है देवताओंकी। प्रश्न यह होता है कि ‘यजन्ते’ द्वारा जिनके पूजनकी बात कही गयी है, वे देवता कौन हैं और उनका यजन क्या है? इनमेंसे पहले प्रश्नका उत्तर उपर्युक्त श्लोकमें यह दिया गया है कि सात्त्विकोंके पूजनीय सात्त्विक देवता हैं; राजस पुरुषोंके पूजनीय यक्ष-राक्षस और तामस पुरुषोंके पूजनीय प्रेत और भूतगण हैं। इनमें जो सात्त्विक आराधक हैं वे क्या करते हैं तथा राजस-तामस आराधक क्या करते हैं?—इसका उत्तर चौदहवें अध्यायमें विस्तारसे दिया गया है तथा उनकी गति चौदहवें अध्यायके १८वें श्लोकमें कही गयी है। विस्तारमें जानेकी यहाँ आवश्यकता नहीं है। यहाँ सातवें श्लोकसे भगवान् इसका प्रकरण प्रारम्भ करते हैं। भगवान् कहते हैं—आहार तीन तरहका होता है। परंतु उसके प्रकारोंका उल्लेख करते हुए वे यह नहीं कहते कि ‘उक्त आहार कौन-कौन-से हैं’ प्रत्युत यह बतलाते हैं कि ‘सात्त्विक, राजस एवं तामस लोगोंके प्रिय लगनेवाले आहार कौन-कौन-से हैं।’ यहाँ यह प्रश्न होता है कि ‘उन्होंने ऐसा क्यों किया?’ इसका उत्तर यह है कि ‘अर्जुनने शास्त्रविधिको छोड़कर श्रद्धापूर्वक यजन करने-वालोंकी निष्ठा पूछी थी।’ इसपर भगवान् सत्रहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें कहते हैं—
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्ध: स एव स:॥
अन्त:करणके अनुसार श्रद्धा होती है, ऐसी दशामें श्रद्धासे ही उसकी निष्ठाका पता लगेगा। उसकी यजन-क्रिया और श्रद्धासे ही उसकी पहचान होगी। शास्त्रविधि तो उसने छोड़ दी, अत: उस कसौटीपर उसे नहीं कसा जायगा। ऊपर कहा गया है कि ‘श्रद्धा तीन प्रकारकी होती है और जैसी जिसकी श्रद्धा होती है, वैसा ही वह होता है;—इस न्यायसे श्रद्धावान् पुरुष भी तीन ही तरहके होंगे। श्रद्धा होती है अन्त:करणके अनुरूप। इसलिये तीन ही तरहके आहार उन्हें रुचिकर होंगे। जो किसी भी प्रकारकी पूजा—उपासना नहीं करते, उनकी निष्ठाका पता लगेगा उनके आहारसे। पूजा चाहे कोई न करे, आहार तो वह करेगा ही। उसीसे उसकी निष्ठाकी पहचान हो जायगी। इसीलिये भगवान् आहारकी बात कहते हैं—‘आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रिय:।’ कुछ लोग कहते हैं कि सत्रहवें अध्यायके ७वें श्लोकमें तीन प्रकारके आहारका वर्णन है, परंतु वास्तवमें यह बात है नहीं। भगवान् ने आहारके साथ ‘प्रिय’ शब्द दिया है। ‘प्रिय’ शब्द इसलिये दिया गया है कि जैसा आहार मनुष्यको प्रिय होता है, वैसी ही उसकी प्रकृति होगी और जैसी उसकी प्रकृति है, श्रद्धा है, निष्ठा है; वैसा ही आहार उसे प्रिय लगेगा। आहारकी प्रियतामें आहारका वर्णन तो स्वत: हो गया। सात्त्विक पुरुषोंको सात्त्विक आहार प्रिय लगता है; राजस पुरुषोंको राजस एवं तामस पुरुषोंको तामस आहार प्रिय लगता है। अन्त:करण आहारके अनुरूप बनता है। सातवें श्लोकके पूर्वार्द्धमें आहारकी बात कहकर फिर उत्तरार्धमें यज्ञ, तप तथा दानके तीन भेद किये हैं। यहाँ यह प्रश्न होता है कि आहारके साथ भगवान् ने यज्ञ, तप और दानकी बात क्यों छेड़ी? आहारकी चर्चा तो आयी थी परीक्षाके लिये। इसका उत्तर यह है कि अर्जुनने अपने मूल प्रश्नमें यजन-पूजन करनेवालोंके विषयमें पूछा था। यजनके अन्तर्गत दान और तप भी आ जाते हैं। इसीलिये आगे चलकर सत्रहवें अध्यायके २३वें श्लोकमें भगवान् कहते हैं—
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध: स्मृत:।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिता: पुरा॥
‘परमात्माके नाम हैं—‘ॐ, तत् और सत्। ब्राह्मणोंको, वेदोंको, यज्ञोंको जिस परमात्माने बनाया, उसी परमात्माके ये तीनों नाम हैं।’ यज्ञकी क्रिया सम्पन्न करनेवाले ब्राह्मण, यज्ञकी विधि बतानेवाले वेद और यजनकी क्रियाका नाम यज्ञ। परमात्माने इन तीनोंको रचा, इसीलिये सत्रहवें अध्यायके २४वें श्लोकमें भगवान् कहते हैं—
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतप: क्रिया:।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ता: सततं ब्रह्मवादिनाम्॥
अतएव ‘हरि: ॐ’ इस प्रकार उच्चारण करके ही यज्ञानुष्ठान प्रारम्भ करना चाहिये एवं इसी प्रकार ब्रह्मवादी पुरुष करते आये हैं। इसके बाद भगवान् कहते हैं—
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतप: क्रिया:।
दानक्रियाश्च विविधा: क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभि:॥
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्द: पार्थ युज्यते॥
(१७। २५-२६)
भगवान् के नामोंका उल्लेख यहाँ इसलिये किया गया कि यज्ञ-दान-तपमें कोई अङ्ग-वैगुण्य रह जाय या कोई कमी रह जाय तो परमात्माके नामोच्चारणसे उसकी पूर्ति कर दी जाय; क्योंकि परमात्मासे ही यज्ञ पैदा हुए, परमात्मासे ही ब्राह्मण पैदा हुए और वेद भी प्रकट हुए परमात्मासे ही। इनमें कोई कमी रहेगी तो इन सबके मूल परमात्माका नाम लेनेसे उसकी पूर्ति हो जायगी। अठारहवें अध्यायके ५ वें श्लोकमें भी इन्हीं तीन शुभ कर्मोंका उल्लेख हुआ है—
यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥
कहीं-कहीं शुभ कर्मोंकी संख्या चार भी कही गयी है, जैसे आठवें अध्यायके २८ वें श्लोकमें वेदाध्ययन, यज्ञ, तप और दान—चारका नाम आया है। कहीं-कहीं पाँचका भी उल्लेख हुआ है—जैसे ग्यारहवें अध्यायके ४८वें श्लोकमें—‘न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रै:।’ वेद, यज्ञ, दान, तपके अतिरिक्त पाँचवीं क्रिया भी आ गयी। नवें अध्यायके २७वें श्लोकमें यज्ञ, दान आदिके साथ भोजनका उल्लेख हुआ है—‘यदश्नासि’ कहकर। इस प्रकार शुभ कर्मोंके नामपर कहीं छ:का, कहीं पाँचका, कहीं चारका, कहीं तीनका और कहीं केवल एक यज्ञका ही निर्देश भगवान् ने किया है। एक यज्ञके उल्लेखसे सम्पूर्ण शुभ कर्मोंका उल्लेख हो गया। ‘यत्करोषि’ के अन्तर्गत चारों वर्णोंके जीविकोपयोगी कर्म भी आ गये, जिनका वर्णन श्रीभगवान् ने १८वें अध्यायके ४१वें श्लोकसे प्रारम्भ करके ४२वें श्लोकमें ब्राह्मणके कर्म, ४३वेंमें क्षत्रियके एवं ४४वेंमें वैश्यके तथा शूद्रके कर्म बताये हैं। फिर ४५वें श्लोकमें उन कर्मोंसे होनेवाली सिद्धिका उल्लेख किया है—‘स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धं लभते नर:।’ जो सिद्धि यज्ञोंसे बतायी गयी, वही यहाँ वर्णोचित कर्मोंसे बतायी गयी है और उसकी प्राप्तिका प्रकार ४६ वें श्लोकमें कहा गया है—
यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥
‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य’ से कर्मद्वारा पूजाकी बात आयी। तब ये कर्म यज्ञरूप ही हुए न?
माताएँ रसोई बनायें और ऐसा मानें कि मैं इस रूपमें भगवान् का पूजन कर रही हूँ तो रसोई बनाना भी भगवान् का पूजन हो जायगा। मनुजी महाराजने रसोई बनानेकी क्रियाको भी ‘यज्ञ’ कहा है। मनुजी महाराजने लिखा है कि स्त्रीका पतिदेवके घरमें जाना ही उसका गुरुकुल-वास है। कारण, पति ही उसका एकमात्र गुरु है—‘पतिरेको गुरु: स्त्रीणाम्।’ वहाँ रसोई बनाना उसके लिये है—‘अग्निहोत्र’। अग्निहोत्र ही यज्ञ है। इसी प्रकार विद्यार्थी अपने अध्ययनको यज्ञ मान सकता है। निष्कामभावसे तथा शुद्ध रीतिसे किये गये सांसारिक सभी कार्य ‘यज्ञ’ रूप होते हैं। आयुर्वेदका जाननेवाला केवल जनताके हितके लिये वैद्यका काम करे तो उसके लिये वही यज्ञ है। इस प्रकार गीताके अनुसार कर्तव्यमात्र ही यज्ञ—भगवान् का पूजन बन जाता है। अवश्य ही कर्ममात्र भगवान् का पूजन तब होगा, जब आप उसे भगवान् की पूजाके लिये करें। परंतु यदि भाव आपका वैसा नहीं होगा तो ‘यो यच्छ्रद्ध: स एव स:।’ जो जैसी श्रद्धावाला होगा उसकी निष्ठा वैसी ही होगी। आप रुपयोंके लिये व्यापार करेंगे तो आपको रुपया मिलेगा, आपका किया हुआ व्यापार यज्ञ नहीं होगा; क्योंकि आपकी वैसी श्रद्धा और वैसा भाव नहीं है। जहाँ आपका वैसा भाव होगा वहीं आपका कर्म यज्ञ बन जायगा।
अब अपने विचार करें कि यज्ञ क्या है और देवता क्या हैं? देवता तो हुए यज्ञका फल देनेवाले उसके अधिष्ठातृ-देवता। अब उनका यज्ञके द्वारा पूजन करना है तो पूजन आहुतिके द्वारा भी होता है और कर्तव्यकर्मोंके द्वारा भी। कर्तव्यकर्मोंके द्वारा पूजन सब कोई कर सकते हैं। मनुष्य है मध्यलोक—मर्त्यलोकका निवासी। स्वर्गलोक, मर्त्यलोक और पाताललोक—इन तीन लोकोंके समुदायका नाम है—त्रिलोकी। त्रिलोकीके मध्यमें रहनेवाला है—मनुष्य। भगवान् ने मनुष्यको मध्यमें निवास इसीलिये दिया है कि वह देवताओंकी भी तृप्ति कर सकता है और नरक एवं अधोलोकोंमें रहनेवालोंकी भी तृप्ति कर सकता है। सबका तर्पण होता है। द्विजातिलोग देवताओंका तर्पण करते हैं, ऋषियोंका तर्पण करते हैं, पितरोंका तर्पण करते हैं, भूतप्राणियोंका तर्पण करते हैं तथा भूत, प्रेत, पिशाच आदि योनियोंमें गये हुए बान्धवोंका तर्पण करते हैं। जिनके वंशमें कोई नहीं रहा, उनका भी तर्पण करते हैं। इस विषयमें तर्पणकी विधि देखें। जिनके कोई जल देनेवाला नहीं, उनका भी तर्पण करते हैं। साँप-बिच्छू आदि जितने अधोगतिमें गये हुए जन्तु हैं, जितने मध्यगतिको प्राप्त हैं और जितने ऊर्ध्वगतिमें गये हुए हैं सबको, यहाँतक कि ऊँचे-से-ऊँचे भगवान् को भी तर्पण करते हैं। समुद्रको तर्पण करते हैं। समुद्रमें जल कम है क्या, जो जलसे उसकी तृप्ति की जाय? तात्पर्य यह कि मध्यमें रहनेवाला यह मनुष्य सम्पूर्ण लोकोंके जीवोंको तृप्त करता है। इस प्रकार सबको तृप्त करनेका अधिकार भगवान् ने मनुष्यको दिया है। वह त्रिलोकीके जीवोंको ही नहीं, भगवान् को भी तृप्त करता है। भगवान् की भी भूख-प्यास मिटानेवाला यदि कोई है तो वह मनुष्य ही है। भगवान् नवें अध्यायके ३४वें श्लोकमें कहते हैं—
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
‘मुझमें मन लगा, मेरा ही भजन कर, मेरा पूजन कर और मुझे ही नमस्कार कर।’ यहाँ यह प्रश्न होता है ‘भगवान् को भी भूख लगती है क्या?’ ‘हाँ’! ‘क्यों उनमें भी कोई कमी है?’ ‘हाँ’—विनोदकी-सी बात है। जीव जो अधोगतिमें जा रहे हैं, यही भगवान् में कमी है। सारा संसार मिलकर भगवान् का स्वरूप है। अत: जो अधोगतिमें जाते हैं, उतना अङ्ग भगवान् का ही तो अधोगतिमें जाता है। यही भगवान् की भूख है। भगवान् कहते हैं—‘तू अपना सब कुछ मेरे अर्पण कर दे तो तेरा कल्याण हो जाय और मेरा काम बन जाय।’ इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि भगवान् की तृप्ति भी मनुष्य कर सकता है। जीव-जन्तुओंकी तृप्ति तो वह करता ही है। भगवान् तो यहाँतक कहते हैं कि ‘भक्त मुझे बेच दे तो मैं बिक जाता हूँ।’ ‘मैं तो हूँ भगतनको दास, भगत मेरे मुकुटमणि’—ऐसी दशामें बताइये कि भक्त भगवान् के इष्ट हैं कि नहीं? अर्जुनको भी भगवान् अठारहवें अध्यायके ६४ वें श्लोकमें कहते हैं—‘इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।’ ‘तू मेरा इष्ट है.....।’ जीव भगवान् को इष्ट मानता है। भगवान् कहते हैं—‘तू मेरा इष्ट है।’ जो भगवान् को अपना मन सौंप देता है, उसे भगवान् अपना इष्ट मान लेते हैं, उसका आज्ञापालन करते हैं। रामावतारमें भगवान् कहते हैं—‘मैं सीताका त्याग कर सकता हूँ, समुद्रमें कूद सकता हूँ, अग्निमें प्रवेश कर सकता हूँ, परंतु पिताकी आज्ञा भंग करनेकी मुझमें शक्ति नहीं।’ यह मनुष्य चाहे तो भगवान् का माँ-बाप बन जाय, भगवान् का दास बन जाय, भगवान् का भाई-बन्धु बन जाय, भगवान् की स्त्री बन जाय, भगवान् का बच्चा बन जाय, भगवान् का शिष्य बन जाय या गुरु बन जाय। अपने कुटुम्बसे ही तो आप राजी होते हैं। भगवान् का सम्पूर्ण यह मनुष्य बन सकता है। यह भगवान् का सब कुछ बन सकता है। भगवान् उसे वही बना लेंगे और वैसी-की-वैसी मर्यादा उसके साथ निभायेंगे। वे उसके सुपुत्र बन जायँगे। भाई भी बनेंगे तो असली। सुपुत्र-सत्पति-सन्माता सब कुछ बन जायँगे भगवान्। शिष्य बने तो श्रेष्ठ चेला बनेंगे भगवान्। वसिष्ठजीके चेला श्रीराम थे ही। विश्वामित्रजीका चरण वे चाँपते ही थे। वे जहाँ जो भी बनते हैं, स्वाँग पूरा उतारते हैं। भगवान् का सब कुछ मनुष्य बन सकता है, इतना बड़ा अधिकार मनुष्यको भगवान् ने दिया है।
अब उसके लिये कहते हैं—‘यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:।’ इसके पूर्व ८वें श्लोकमें कहा—‘नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:।’ ‘नियत कर्म कर और न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है।’ ‘अकर्मण: ते शरीरयात्रापि न प्रसिद्धॺेत्।’ ‘कुछ नहीं करेगा तो तेरा निर्वाह भी नहीं होगा, जीवन भी नहीं चलेगा। कर्म करनेसे ही जीवन-निर्वाह होगा।’ साथ ही शास्त्रोंमें यह भी कहा है कि कर्मोंसे जन्तु बँधता है।’ ‘कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते।’ यह ध्यान देनेकी बात है कि यहाँ ‘जन्तु’ शब्दका प्रयोग हुआ है। ‘जन्तु’ शब्दका स्वारस्य यह है कि जन्तु (जानवर) ही बन्धनमें आते हैं, मनुष्य नहीं। मनुष्य बँधता है सकाम कर्म करके, स्वार्थबुद्धिसे। ऐसे मनुष्यको जन्तु ही समझें। गीता भी कहती है—‘अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तव:।’ जो स्वार्थबुद्धिसे प्रेरित होकर मोहमें फँसे हुए हैं, वे मनुष्य थोड़े ही हैं, वे तो जन्तु हैं—भले ही उनकी आकृति मनुष्यकी-सी ही हो। ‘यद् यद्धि कुरुते जन्तुस्तत् तत् कामस्य चेष्टितम्।’ जानवरकी सारी चेष्टाएँ कामयुक्त—स्वार्थप्रेरित होती हैं। कामनासे ही कर्म बन्धनकारक होता है।
इसलिये भगवान् कहते हैं—
यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:।
जो कर्म परमात्माकी प्रसन्नताके लिये, लोकसंग्रहके लिये, सब लोगोंके उद्धारके लिये, आसक्ति, स्वार्थ और कामनाको त्यागकर किया जाता है, वह बाँधता नहीं है। यही है ‘यज्ञ’।
इसके अगले श्लोकमें भगवान् कहते हैं—‘सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:।’ सृष्टिके आदिमें प्रजापति ब्रह्माने यज्ञोंके साथ प्रजाओंको उत्पन्न किया। यहाँ ‘प्रजा:’ शब्दके अन्तर्गत ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—सभी आ जाते हैं। ‘प्रजा:’ शब्दके साथ ‘सहयज्ञा:’ विशेषणको देखकर यह शङ्का होती है कि यज्ञमें सबका अधिकार तो है नहीं, फिर भगवान् ने सारे प्रजाजनोंके साथ यह विशेषण क्यों लगाया? इसका उत्तर यही है कि यहाँ उस यज्ञकी बात नहीं है, जिसमें सबका अधिकार नहीं। यहाँ ‘यज्ञ’ का व्यापक अर्थ—‘कर्तव्यकर्म’ लेना चाहिये। ‘यज्ञ’ का इसी अर्थमें प्रयोग समझना चाहिये। ‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य’ द्वारा भगवान् ने आगे चलकर यही बताया है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—सभी अपने-अपने कर्मद्वारा उनका पूजन करें। इसी कर्तव्य-कर्मरूप यज्ञके साथ प्रजाकी सृष्टि करके प्रजापतिने कहा—इसके द्वारा तुम सबकी वृद्धि करो और यही तुम्हारी इष्ट कामनाकी पूर्ति करनेवाला हो—
सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥
परंतु साथ ही भगवान् कहते हैं—‘इष्टकामनाके साथ अपना सम्बन्ध मत जोड़ो। तुम यज्ञके द्वारा देवताओंका पूजन करो।’ जैसे गीता अध्याय २ श्लोक ४५ में भगवान् अर्जुनको ‘निर्योगक्षेम आत्मवान्’ बननेको कहते हैं और ९वें अध्यायके २२वेंमें कहते हैं—‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ ‘तुम्हारे योगक्षेमका वहन मैं करूँगा, तू उसकी चिन्ता छोड़ दे।’ इसी प्रकार यहाँ भी वे कहते हैं—‘देवताओंका तुम पूजन करो, पर देवताओंसे कुछ चाहो मत। देवता तुम्हारा काम करें, पर यह तुम उनसे चाहो मत।’ चाहनेसे सम्बन्ध जुड़ जाता है। चाहयुक्त कर्म हो जाता है ‘तुच्छ’। उदाहरणके लिये—गीताका विवेचन किया हमने, भिक्षा दे दी आपने, दोनोंका काम हो गया। पर गीताका विवेचन किया हमने और उसके साथ यह स्वार्थका सम्बन्ध जोड़ लिया कि गीताकी बात सुनानेसे हमें रोटी मिल जायगी तो हमारा यह काम तुच्छ हो जायगा। किसी भी क्रियाके साथ स्वार्थका सम्बन्ध जोड़ लेनेसे वह क्रिया तुच्छ हो जाती है, निकृष्ट हो जाती है, बन्धनकारक हो जाती है। कोई पूछे—‘परम श्रेय कैसे होगा?’ उत्तर है—‘अपने कर्तव्यका पालन करो; परंतु लोकहितके लिये। उससे अपने स्वार्थका सम्बन्ध मत जोड़ो।’
क्या बतायें सज्जनो! आप सब काम करते हैं। घरोंमें बहनें, माताएँ, भाई, बच्चे, छोटे-बड़े सब काम करते हैं; परंतु बड़ी भारी भूल होती है यह कि आसक्ति, कामना और स्वार्थके साथ हमलोग सम्बन्ध जोड़ लेते हैं; किंतु उससे लाभ कुछ नहीं होता। लौकिक लाभ भी नहीं होता; फिर अलौकिककी तो बात ही क्या। इच्छावालेको लोग अच्छा भी नहीं कहते। कहते हैं—‘अमुक बड़ा स्वार्थी है, पेटू है, चट्टू है।’ उसके चाहनेपर हम कौन-सा अधिक दे देंगे? उलटा कम देंगे। स्वार्थका सम्बन्ध रखनेवालेको अधिक देना कोई नहीं चाहता। किसी साधु-ब्राह्मणको कुछ देंगे तो त्यागी देखकर ही देंगे या भोगी-रागी समझकर देंगे? घरमें भी रागीसे, भोगीसे वस्तु छिपायी जाती है। जो रागी नहीं होगा, उसके सामने वस्तु बेरोक-टोक आयेगी। रागीको वस्तु मिलनेमें भी बाधा लगेगी और कल्याणमें तो महती बाधा लगेगी ही। इसके विपरीत अपना कर्तव्य समझकर सेवा करोगे तो सेवा तो मूल्यवती होगी और वस्तु अनायासमें मिलेगी। आराम मुफ्तमें मिलेगा। मान-सत्कार-बड़ाई मुफ्तमें मिलेगी। पर चाहोगे तो फँस जाओगे। यह बात गीता ग्रन्थि खोलकर बताती है। तुम जो काम करो, इस रीतिसे करो। तीसरे अध्यायके १०-११-१२ श्लोकमें भगवान् कहते हैं—
सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥
देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व:।
परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ॥
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविता:।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव स:॥
इस यज्ञसे वृद्धिको प्राप्त हो। यज्ञके द्वारा पूजित देवता तुम्हारी उन्नति करेंगे। अपने-अपने कर्तव्यद्वारा सृष्टिमात्रको सुख दो। इससे विश्वब्रह्माण्डका, प्राणिमात्रका हित होगा। स्वार्थ, ममता, आसक्ति छोड़कर कामना एवं कर्तृत्व-अभिमानका त्याग करके कर्तव्य-कर्म करनेसे सृष्टिमात्रको शान्ति मिलती है, सृष्टिमात्रका उद्धार होता है, कल्याण होता है, हित होता है। कितना बड़ा उपकार होता है केवल कामना छोड़नेसे। जो-जो कर्तव्य-कर्म करते हो, उसे किये जाओ; अकर्तव्य तो करो नहीं और कर्तव्य-कर्ममें कामना-आसक्ति न करो तो सारे संसारका हित होगा, सबका कल्याण होगा—‘श्रेय: परमवाप्स्यथ।’ जो दूसरोंको उनका हिस्सा न देकर अकेला खाता है, वह चोर है—‘स्तेन एव स:।’
श्रीभगवान् कहते हैं—
यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥
‘यज्ञशेष खानेवाले सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं और जो अपने लिये पकाते-कमाते हैं वे पापी पापका ही भक्षण करते हैं—निरा पाप खाते हैं।’ मनुष्यमें स्वार्थबुद्धि जितनी अधिक होगी, उतना ही बड़ा पापी वह होगा। एक बात और है। यज्ञ जो किया जाता है, उसमें होम मुख्य है—आहुति देना मुख्य है।
अग्नौ प्रास्ताहुति: सम्यगादित्यमुपतिष्ठते।
आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं तत: प्रजा:॥
अग्निमें दी हुई आहुति सूर्यनारायणकी किरणोंको पुष्टि पहुँचाती है और वे किरणें पुष्ट होकर जल खींचती हैं तथा वह जल मेघ बनकर बरसता है। उस वर्षासे जगत् की तृप्ति होती है। इससे भी यही बात प्रकट होती है। शुभ कर्म करनेसे देवताओंकी संतुष्टि होती है। आप यदि अपने माता-पिताकी आज्ञाको मानकर शुभ कर्म करेंगे तो इससे माता-पिता प्रसन्न होंगे ही। उनकी प्रसन्नता क्या सामान्य अर्थ रखती है? वह बड़ी मूल्यवान् निधि है। इसी प्रकार यदि आप अपने शास्त्रोंकी मर्यादाका पालन करेंगे तो इससे क्या ऋषि-मुनि-देवता आपसे प्रसन्न नहीं होंगे? यही है यज्ञके द्वारा उनका पूजन। उनका पूजन किस प्रकार होगा—यह भी भगवान् बतलाते हैं—
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भव:।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ: कर्मसमुद्भव:॥
प्राणी जितने भी पैदा होते हैं, वे अन्नसे होते हैं। अन्न होता है पर्जन्यसे—वर्षासे और वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ किससे होता है? ‘यज्ञ: कर्मसमुद्भव:।’ यज्ञ कर्मसे निष्पन्न होता है। कर्म होता है वेदसे। वेद प्रकट होते हैं अक्षर परमात्मासे। इसलिये भगवान् कहते हैं—
ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध: स्मृत:।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिता: पुरा॥
(१७।२३)
सबका मूल है परमात्मा, परमात्मासे प्रकट हुए वेद। वेदोंने बतायी क्रियाकी विधि। क्रियासे कर्म किया ब्राह्मणोंने अर्थात् प्रजाने। उन कर्मोंसे हुआ यज्ञ, उस यज्ञसे हुई वर्षा। वर्षासे हुआ अन्न; अन्नसे हुए प्राणी और उन्हीं प्राणियोंमेंसे मनुष्योंने यज्ञ किया। यज्ञ पशु-पक्षी तो करनेसे रहे। ये वृक्ष, घास और पहाड़—यज्ञ थोड़े ही कर सकते हैं? मनुष्य ही कर सकते हैं। इस प्रकार यह सृष्टिचक्र चल पड़ा। वह परमात्मा सर्वगत ब्रह्म नित्य यज्ञमें प्रतिष्ठित है। परमात्माकी सर्वगतताके विषयमें भगवान् कहते हैं—
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
(गीता ९। ४)
‘अव्यक्तरूपसे मैं सर्वत्र व्याप्त हूँ।’
इसपर शङ्का होती है कि भगवान् जब सर्वगत हैं, तब उन्हें केवल यज्ञमें नित्य प्रतिष्ठित क्यों कहा? क्या वे अन्यत्र नित्य प्रतिष्ठित नहीं हैं? वे तो सभी जगह नित्य हैं। फिर यज्ञमें क्या विशेषता है? इसका उत्तर यह है कि यज्ञमें परमात्मा प्राप्त होते हैं। जमीनमें सर्वत्र जल है, पर वह मिलता है कुएँमें, सब जगह नहीं मिलता। पाइपमें सब जगह जल भरा रहता है, पर वह मिलता है वहीं; जहाँ कल लगी होती है। सब जगह जल है नहीं, ऐसी बात हम थोड़े ही कह सकते हैं। पर सर्वत्र वह मिलता नहीं। इसीलिये सर्वगत ब्रह्मको यज्ञमें नित्य प्रतिष्ठित कहा गया है। यज्ञ कौन-सा? कर्तव्य-कर्ममात्र, जो निष्कामभावसे किया जाय, वही ‘यज्ञ’ है।
अब देखिये, यज्ञकी परिभाषा ध्यानमें आ गयी और उस यज्ञमें परमात्मा मिलते हैं—यह बात भी समझमें आ गयी। उस यज्ञके विषयमें भगवान् कहते हैं—
यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।
(गीता ३।१३)
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।
(गीता ४।३१)
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।
(गीता ४।१६)
इसलिये कोई परमात्माकी प्राप्ति करना चाहे तो वह यज्ञ करे। जो यज्ञ नहीं करता, उसके विषयमें भगवान् कहते हैं—
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह य:।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥
(गीता ३।१६)
उपर्युक्त चक्रका जो अनुवर्तन नहीं करता, इसके अनुसार नहीं चलता, उसके लिये भगवान् ने तीन विशेषण दिये हैं—‘अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति।’ ‘अघायु’ कहनेका तात्पर्य यह है कि उसकी आयु, उसका जीवन निरा पापमय है। गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीने भी कहा है—
‘जीवत जड़ नर परम अभागी’—वे परम अभागे हैं।
‘जीवत सव सम चौदह प्रानी’—वे जीते ही मुर्देके समान हैं जो भगवान् की दिशामें नहीं चलते। उनकी आयु अघरूप है। कहा है—
पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद।
ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद॥
(मानस ७। ३९)
ऐसे लोग नररूपमें राक्षस हैं। मनुष्यको खा जाय वह राक्षस। उनके लिये दूसरा विशेषण दिया है—‘इन्द्रियाराम’। केवल इन्द्रियोंको सुख पहुँचाना—भोग भोगना, सुस्वादु भोजन खाना, सुन्दर दृश्य देखना, कोमल वस्तुओंका स्पर्श करना, आलस्यसे सोना—यही है—इन्द्रियारामता। तीसरी बात कहते हैं—‘मोघं पार्थ स जीवति’ वह संसारमें व्यर्थ ही जीता है। यह हुई सभ्यताकी भाषा। तात्पर्य है कि वह मर जाय तो अच्छा। उसका न जीना ही अच्छा है। श्रीगोस्वामीजीने कह दिया—‘कुंभकरन सम सोवत नीके’ यह तो सोया रहे तभी अच्छा। अभिप्राय यह कि ऐसे लोग पृथ्वीपर भाररूप ही हैं। पृथ्वीने कहा—‘मुझे भार वनस्पतिका नहीं है, पहाड़ोंका नहीं है, मुझपर भार तो उसका है, जो भगवद्भक्तिसे हीन है—‘भगवद्भक्तिहीनो यस्तस्य भार: सदा मम।’ उसका मुझपर सदा भार है।’ ‘उपर्युक्त सृष्टिचक्रका जो अनुवर्तन नहीं करता’, भगवान् कहते हैं—‘उसका जीवन भाररूप है।’ सृष्टिचक्रका अनुवर्तन क्या है—यह ऊपर बता ही दिया गया। निष्काम भावसे या भगवान् की पूजाके भावसे अपने कर्तव्यका तत्परतासे पालन करना ही सृष्टिचक्रका अनुवर्तन है। जिसका, जहाँ जो कर्तव्य-कर्म है, वह उस कर्मको करे। साथमें कर्तृत्वाभिमान न हो, ममता न हो, आसक्ति न हो, कामना न हो, पक्षपात न हो, विषमता न हो—ये सब विषरूप हैं। सिंगीमोरा, संखिया, कुचिला, भिलावा आदि जो जहर हैं, उन्हें भी वैद्यलोग शुद्ध करके औषधरूपमें प्रयोग करते हैं, तब उनसे रोग दूर होते हैं। उनका जहर यदि बना रहे तो उससे मनुष्य मर जाता है। आसक्ति, कामना, पक्षपात, विषमता, अभिमान, स्वार्थ आदि सब कर्मोंमें जहररूप हैं। इस जहरके भागको निकाल देनेसे हमारे कर्म महान् अमृतमय होकर जन्म-मरणको मिटा देनेवाले बन जायँगे। कैसी बढ़िया बात है! गीता हमें यही सिखाती है!