सबका कल्याण कैसे हो?

प्रश्न—सबका कल्याण कैसे हो?

उत्तर—ऐसा मनमें आता है कि मैं जो बात कहता हूँ, इसको आप और हम सब करें तो सबका कल्याण हो जाय। सबसे पहले तो हमारा यह उद्देश्य हो कि हमें अपना उद्धार करना है। हमारी यह एक ही इच्छा है, एक ही माँग है, जरूरत है, आवश्यकता है। कहावत भी है—

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।

—एकके सिद्ध करनेसे सब काम सिद्ध हो जाते हैं और सब कामोंको सिद्ध करना चाहें तो कोई-सा भी सिद्ध नहीं होता। अत: सबसे पहली आवश्यकता तो इस बातकी है कि सब ओरसे वृत्तियोंको हटाकर एक अपने कल्याणकी ओर ही कर लिया जाय। अब इस उद्देश्यके अनुसार निरन्तर साधन होना चाहिये। उस निरन्तरताके लिये विचार करना है।

हमारे सामने ये चीजें आती हैं—काम-धंधा, समय, व्यक्ति, वस्तु आदि-आदि। भाव यह कि हमारे सामने अनेक तरहके काम-धंधे कर्तव्यरूपसे आते हैं और एक हमारे पास है समय (वक्त) यानी हमें जो रात-दिन, महीना-वर्ष आदिके रूपमें आयु मिली हुई है। तीसरी हमारे सामने माता-पिता, स्त्री-पुत्र, कुटुम्बी आदि व्यक्ति आते हैं। चौथी आती हैं धन, मकान आदि वस्तुएँ। इनके लिये हमें अलग-अलग क्रिया करनी पड़ती है। कभी ऐसा होता है कि अभी सत्सङ्गका समय है सत्सङ्ग करो, अभी समय भोजनका हो गया तो भोजन कर लो, अब आरामका समय है, आराम कर लो, अब पुस्तक पढ़ना है तो यह कर लो। इसी प्रकार जीविकाका काम है, रसोईका काम करना है, बाल-बच्चोंके पालन-पोषणका काम होता है, सोनेका काम होता है, शारीरिक शुद्धिका काम है, गङ्गास्नान आदिका काम होता है। ऐसे अलग-अलग धंधे सामने आते हैं, वे समय-समयपर आते हैं। अत: कामका विभाग होगा और समयका विभाग होगा। ऐसे ही व्यक्तियोंका और वस्तुओंका भी विभाग होगा कि ये हमारी हैं और ये हमारी नहीं हैं। किंतु ये जो अलग-अलग हैं, इन सबको एक कर देना तो हमारे वशकी बात नहीं है और उचित भी नहीं है। तब फिर उद्देश्य एक कैसे हो? तो हम विचारसे इस अलग-अलगपनेको मिटा दें। यह कैसे हो? वस्तुएँ भी अलग-अलग रहेंगी, व्यक्ति भी अलग-अलग रहेंगे, उनका उपयोग भी अलग-अलग होगा, समय भी अलग-अलग रहेगा और काम-धंधा भी अलग-अलग रहेगा ही। यह रहना ही चाहिये। यह रहना कोई अन्याय नहीं है। तब हम एक साधन क्या और कैसे करें? क्योंकि हमारा उद्देश्य एक होता है तो वस्तुएँ इतनी सामने आ जाती हैं। हमें कुटुम्ब-पालनके लिये धन भी कमाना है, अपने परिवारके लिये वस्तुएँ भी लानी हैं, वक्तपर आराम भी करना है, सोना भी है, खाना-पीना भी है। यह सब अलग-अलग होगा। तब फिर एक उद्देश्य कैसे हो? यह प्रश्न आता है।

इसमें एक खास बात समझनेकी है। हम अलग-अलग काम किसलिये करते हैं? वह ‘लिये’—उद्देश्य हमारे अनेक हो जाते हैं, तब हम फँसते हैं। कभी हमारा उद्देश्य विद्या हो जाती है, कभी यश हो जाता है, कभी धन हो जाता है, कभी मान-बड़ाई और स्वास्थ्य उद्देश्य हो जाता है। कभी भगवत्प्राप्ति उद्देश्य हो जाता है, कभी भजन-ध्यान करना उद्देश्य होता है। ऐसा होनेसे हम साधन नहीं कर सकते। ‘सब साधे सब जाय’—कोई-सा भी काम सिद्ध नहीं हो पाता। इसलिये हमारा भाव एक ही होना चाहिये कि हम सभी काम करेंगे और करेंगे प्रभुकी प्रीतिके लिये—भगवान् की प्रसन्नताके लिये। सोकर उठनेपर यह सोचें कि अब काम क्या करना है, भगवान् की आज्ञाका पालन करना है, भगवान् के लिये करना है और मैं भगवान् का ही काम कर रहा हूँ। मान लें वह काम आप हाथ-मुँह धोनेका कर रहे हैं। तो उसमें अनुभव यह होना चाहिये कि यह भगवान् का काम है। यदि आप कहें कि इसे हम भगवान् का काम कैसे मानें, हम तो अपना मुँह धोते हैं, अपने हाथ धोते हैं। तो समझना चाहिये आप अपने हाथ-मुँह धोते हैं—इससे सिद्ध हुआ कि आप अपनेको स्वयं अपना मानते हैं, भगवान् का नहीं मानते। अत: इस प्रकार अपनेको भगवान् का नहीं माननेसे उद्देश्यकी सिद्धि नहीं होगी। तो क्या होगा? बन्धन होगा, और क्या होगा? जो होता आया है, वही होगा। प्रश्न होता है कि इस शरीरको भगवान् का कैसे मान लें? इसका उत्तर यह है—जब हम भगवान् को प्राप्त करना चाहते हैं और हम भगवान् के हैं तो हमारा शरीर भी भगवान् का है। हम हाथ धोनेके समय यह समझें कि भगवान् की अनन्त सृष्टिमें यह भी उनका एक छोटा-सा क्षुद्र अंश है। जैसे छोटे-से-छोटा रज (बालू) का एक कण भी पृथ्वीसे अलग नहीं है, ऐसे ही एक शरीर यह है। बहुत छोटा है अनन्त ब्रह्माण्डमें। परंतु यह भी है भगवान् का। अत: यह अनुभव होना चाहिये कि मैं मुँह धो रहा हूँ, यह भगवान् का काम कर रहा हूँ; हाथ धो रहा हूँ। यह भगवान् का काम कर रहा हूँ। यह मैं बहुत महत्त्वकी बात समझनेके लिये कहता हूँ, हँसी-दिल्लगीकी बात नहीं है। आप टट्टी जा रहे हैं, पेशाब कर रहे हैं—उसमें भी यह अनुभव होना चाहिये कि मैं भगवान् का काम कर रहा हूँ। स्वत: भीतरसे ही यह वृत्ति रहनी चाहिये। यह शरीर जब भगवान् का है, तब इसको साफ करना क्या भगवान् का काम नहीं है? हम किसीके घरकी टट्टी साफ करते हैं तो क्या उस घरके मालिकका काम नहीं कर रहे हैं? उसमें झाड़ू लगाते हैं तो उस घरका जो मालिक है, उसीका तो काम कर रहे हैं। इसी प्रकार जब यह शरीर भगवान् का है तो इससे टट्टी-पेशाब करके इसको साफ करना भी भगवान् का ही काम करना है। ऐसे ही स्नान कर रहे हैं—यह भी भगवान् का काम कर रहे हैं। कपड़ा धो रहे हैं, यह भगवान् का काम कर रहे हैं। अब रसोई बनाते हैं तो भगवान् का काम करते हैं। भोजन करते हैं तो यह भी भगवान् का काम करते हैं। ऐसी कोई क्रिया न हो, जो क्रिया भगवान् की न होती हो। यदि हमें यह अनुभव न हो कि प्रत्येक काम हम भगवान् का ही कर रहे हैं तो हम इसे मानना शुरू कर दें कि हम प्रत्येक काम भगवान् का ही कर रहे हैं।

जैसे सभी काम भगवान् के हैं, वैसे ही सब समय भी तो भगवान् का ही है। यह समय तो भगवद्भजनका है और यह समय अभी काम-धंधेका है—यह विभाग हम न करें। जब भगवान् के भजन करनेका काम भी भगवान् का है और यह रसोई बनानेका काम भी भगवान् का है, तब यह सब-का-सब समय भी भगवान् का ही हुआ। अत: कार्य-विभाग भी नहीं रहा और समय-विभाग भी नहीं रहा। साधक कभी यह समय-विभाग न करे कि यह समय तो भजनका है और यह भजनका नहीं है। हाँ, भजनके रूप अलग-अलग हैं। उस समय नाम-जप, ध्यान आदि भजन था; अब रसोई बनाना भजन है। विचार करें, भजन नाम किसका है? भगवान् की सेवाका। जब भगवान् के लिये काम कर रहे हैं तो वह सेवा ही तो भजन है; अत: भगवान् का काम भजन है ही। अब भोजन करना भी भगवान् का भजन है। यह समय भी भगवान् का है। इसलिये यह नहीं सोचना चाहिये कि भोजन करनेका समय भगवान् का समय नहीं है। ऐसे ही काम-धंधा करते समय यह अनुभव हो कि सब काम भगवान् का है, तो सब-का-सब समय भगवान् का हो गया।

अब आप कहें कि हम सोते हैं तो क्या सोनेका काम भी भगवान् का है और क्या सोनेका समय भी भगवान् का है? अवश्य। यह कैसे? जब आप सोयें, तब यह बात काममें लानेकी है। यह बहुत बढ़िया बात जान पड़ती है। सोयें तब हम नींद लेनेके लिये, आरामके लिये न सोयें। तो किसलिये सोयें? इतनी देर बैठे हुए, चलते-फिरते हुए काम करते थे भगवान् का। अब छ: या पाँच घंटा लेटकर भगवान् का भजन करना है; क्योंकि यह शरीर भगवान् का है। इसे चलाना-फिराना भी इसका काम है, काम-धंधा करना भी इसका काम है और इसे लंबा डालकर थोड़ा आराम देना भी काम इसीका है। किंतु इसका होते हुए भी हमें करना भगवान् का काम है। सोकर—नींद लेकर हमें भगवान् का भजन करना है, आराम नहीं करना है, सुख नहीं लेना है। ऐसा विचार करते सो जायँ। सोते समय हमें नींद न आ जाय, तबतक भगवान् के चरणोंमें पड़े रहें, भगवान् का चिन्तन होता रहे, यह अनुभव करते रहें कि हमपर भगवान् का कृपामय हाथ है, कृपादृष्टि है। जैसे, माँ अपने बच्चेको गोदमें लिये बैठी है, बालक उसके चरणोंमें पड़ा है तो माँकी उसपर कृपा है, वैसे ही मैं भगवान् के चरणोंमें पड़ा हूँ, भगवान् की मुझपर कृपा है, भगवान् मुझे कृपादृष्टिसे देख रहे हैं, मेरे सिरपर भगवान् का हाथ है। इस प्रकार चिन्तन करते हुए उनका नाम लेते रहें। अब यह लेटनेका समय भजन हो गया। ऐसा करते हुए नींद आ गयी तो आ गयी। नींद लेनेकी चिन्ता नहीं कि नींद नहीं आयी। अपने तो नींद लेनेसे मतलब नहीं है; भगवान् के चरणोंमें पड़े रहनेसे मतलब है। हम प्रभुके हैं। नींद आ गयी तो प्रभुका ही नींदरूपी काम कर रहे हैं। नींद नहीं आती तो भी भगवान् का ही चिन्तनरूपी काम कर रहे हैं।

इस प्रकार सब-का-सब काम-धंधा भगवान् का है और सब-का-सब समय भगवान् का। अब रह गये व्यक्ति। ये जो हमारे भाई-बन्धु, माता-पिता, स्त्री-पुत्र, कुटुम्बी, प्रेमी-सम्बन्धी हैं—ये सब व्यक्ति हैं। ये भी भगवान् के हैं। ये भगवान् के हैं तो भगवान् के जनोंकी सेवा कैसे करनी है? जैसे श्रेष्ठ बहू अपनी सासकी सेवा करती है, इसी प्रकार सासको अपनी बहूके प्रति कर्तव्य-पालन करना है यानी उसे सुख देना है, अपना सुख लेना नहीं है, अपना सुख लेना तो हमारा उद्देश्य नहीं है, अपना सुख न लेकर उसको सुख कैसे पहुँचाना है? माता सीताको और कौसल्या अम्बाको याद कर लो। माँ कौसल्या तो यह कहती हैं कि मैंने दीपककी बत्ती भी ठीक करनेके लिये सीताको कभी नहीं कहा और भूमिपर, जो कठोर है, पैर नहीं रखने दिया। ऐसा तो माता कौसल्याने किया और सीता कहती हैं—मैं बड़ी अभागिनी हूँ कि मैंने आपकी सेवा नहीं की। दोनोंको पश्चात्ताप इसीका है। बहूको यह विचार नहीं हुआ कि सासने मुझे सुख नहीं दिया और सासको यह विचार नहीं कि बहूने मेरा धंधा नहीं किया। विचार यही है कि प्रभुका काम करना है। अत: इसकी सेवा कर देना है। जैसे वह प्रसन्न रहे, उसका हित हो, वैसे कर दे और अनुकूल बननेकी भावना रखे।

इसी तरह जितने भी कुटुम्बी हैं, सभी भगवान् के हैं। अब विचार करें, उनमें हमें दो विभाग जान पड़ते हैं कि ये तो हमारे कुटुम्बी हैं, हमारे सम्प्रदायके हैं और ये हमारे नहीं हैं। ये हमारे कुटुम्बी हैं—इसका अर्थ यह हुआ कि इस कुटुम्बकी सेवा करना मेरा पहला कर्तव्य—धर्म है; क्योंकि इस कुटुम्बका मैं ऋणी हूँ, इसलिये इसका ऋण पहले चुकाना है और जो हमारे नहीं जान पड़ते, समय-समयपर उनकी भी सेवा करनी है। यानी उनकी सेवा करनेकी अधिक आवश्यकता होनेपर समय निकालकर पहले उनकी सेवा करे। सेवा क्यों करनी है? भगवान् की प्रसन्नताके लिये; क्योंकि ये भगवान् के हैं। ‘ये हमारे हैं’—इसका तात्पर्य होता है कि इनकी सेवा विशेषतासे कर देनी है; क्योंकि वे हमसे विशेषतासे सेवा चाहते हैं। अत: उनकी सेवा पहले कर दो और विशेषतासे कर दो। परंतु मानो यह कि ये भगवान् के हैं, मेरे नहीं हैं। इनमें जो ‘मेरापन’ प्रतीत होता है, इसका अर्थ यह है कि हमें इनको सुख पहुँचाना है, इसलिये ये हमारे कुटुम्बी हैं, यह भावना सदा जाग्रत् रखे।

अब अन्तमें रहीं वस्तुएँ। वस्तुओंका उपयोग अलग-अलग होगा। भोजनकी थाली-गिलासका उपयोग अलग होगा, लिखनेकी कलमका उपयोग अलग होगा। वस्तुएँ अलग-अलग काममें आती हैं। यह अलग-अलग उपयोग किसलिये है? भगवान् की प्रसन्नताके लिये। इनको भगवान् की सेवामें लेना है। ये अपनी और ये दूसरेकी—भगवान् के नाते तो यह विभाग है नहीं। किंतु जो हमारी कहलाती है, उस अपनी वस्तुसे तो पहले काम लेना है। इस तरह इन वस्तुओंसे प्रभुकी और प्रभुके जनोंकी सेवा करनी है।

तात्पर्य क्या निकला? यही कि कोई-सा भी काम भगवान् का न हो—ऐसा नहीं। कोई-सा भी क्षण भगवान् का न हो, ऐसा नहीं। कोई-सा भी व्यक्ति भगवान् का न हो, ऐसा नहीं और कोई-सी भी वस्तु भगवान् की न हो, ऐसा नहीं। अब बताइये, निरन्तर भजनके सिवा और हुआ क्या। स्वत: निरन्तर भजन—निरन्तर साधन हो जायगा।

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।

(गीता ८। ७)

सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च—यहाँ ‘युध्य च’ कहनेका अर्थ है—समय-समयपर जो आवश्यक काम आ पड़े वह करना, परंतु करना भगवान् की आज्ञासे और उनकी प्रसन्नताके लिये। अर्जुनने और क्या किया? जब वे कर्णको मारने लगे तब कर्णने कहा—‘अर्जुन! तुम अन्याय करते हो।’ भगवान् ने कहा—‘अर्जुन! कर्णको बाण मार दो।’ अर्जुन बोले—‘हमें न्याय-अन्याय कुछ नहीं देखना है, हमें तो प्रभुकी आज्ञाका पालन करना है। प्रभुकी आज्ञा है—इसे मार दो।’

किंतु हमलोगोंके सामने प्रत्यक्षरूपसे प्रभु हैं नहीं तो भगवान् की वाणी देख लो और हृदयमें टटोलकर देख लो कि हम ऐसा आचरण क्या दूसरोंसे चाहते हैं। दूसरोंसे नहीं चाहते तो वैसा मत करो। साक्षात् भगवान् आज्ञा दें तो न्याय-अन्यायको भी देखनेकी जिम्मेवारी हमपर नहीं रही। भगवान् सामने प्रत्यक्ष नहीं हैं तो भगवान् की आज्ञा— गीतादि ग्रन्थ हैं। उनमें देख लो, उनके अनुसार न्याय करो, अन्याय मत करो और उनसे समझमें न आये तो घबराओ मत, किंतु भाव शुद्ध रखो, फिर समझमें आ जायगी।

एक बाबाजी थे। कहीं जा रहे थे नौकामें बैठकर। नौकामें और भी बहुत लोग थे। संयोगसे नौका बीचमें बह गयी। ज्यों ही वह नौका जोरसे बही, मल्लाहने कहा— ‘अपने-अपने इष्टको याद करो, अब नौका हमारे हाथमें नहीं रही। प्रवाह जोरसे आ रहा है और आगे भँवर पड़ता है, शायद डूब जाय। अत: प्रभुको याद करो।’ यह सुनकर कई तो रोने लगे, कई भगवान् को याद करने लगे। बाबाजी भी बैठे थे। पासमें था कमण्डलु। उन्होंने ‘जय सियाराम जय जय सियाराम, जय सियाराम जय जय सियाराम’ बोलना शुरू कर दिया और कमण्डलुसे पानी भर-भरकर नौकामें गिराने लगे। लोगोंने कहा—‘यह क्या करते हैं?’ पर कौन सुने! वे तो नदीसे पानी नौकामें भरते रहे और ‘जय सियाराम जय जय सियाराम’ कहते रहे। कुछ ही देरमें नौका घूमकर ठीक प्रवाहमें आ गयी, जहाँ नाविकका वश चलता था। तब नाविकने कहा—‘अब घबरानेकी बात नहीं रही, किनारा निकट ही है।’ यह सुनकर बाबाजी नौकासे जलको बाहर फेंकने लगे और वैसे ही ‘जय सियाराम जय जय सियाराम.....कहने लगे। लोग बोले—‘तुम पागल हो क्या? ऐसे-ऐसे काम करते हो?’ बाबाजी—‘क्या बात है भाई?’ लोग—‘तुमको दया नहीं आती? साधु बने हो। वेष तो तुम्हारा साधुका और काम ऐसा मूर्खके-जैसा करते हो? लोग डूब जाते तब?’ बाबाजी—‘दया तो तब आती जब मैं अलग होता। मैं तो साधु ही रहा, मूर्खका काम कैसे किया जाय?’ लोग—‘जब नौका बह गयी तब तो तुम पानी नौकाके भीतर भरने लगे और जब नौका भँवरसे निकलने लगी तब पानी वापस बाहर निकालने लगे। उलटा काम करते हो?’ बाबाजी—‘हम तो उलटा नहीं सीधा ही करते हैं। उलटा कैसे हुआ?’ लोग—‘सीधा कैसे हुआ?’ बाबाजी—‘सीधा ऐसे कि हम तो पूरा जानते नहीं। मैंने समझा कि भगवान् को नौका डुबोनी है। उनकी ऐसी मर्जी है तो अपने भी इसमें मदद करो और जब नौका प्रवाहसे निकल गयी तो समझा कि नौका तो उन्हें डुबोनी नहीं है, तब हमें तो उनकी इच्छाके अनुसार करना है—यह सोचकर पानी नौकासे बाहर फेंकने लगे। साधु ही हो गये तब हमें हमारे जीने-मरनेसे तो मतलब नहीं है, भगवान् की मर्जीमें मर्जी मिलाना है। पूरी जानते हैं नहीं। पहले यह जान लेते कि भगवान् खेल ही करते हैं, उन्हें नौका डुबोनी नहीं है तो हम उसमें पानी नहीं भरते। पर उस समय मनमें यह बात समझमें नहीं आयी। हमने यही समझा था कि नौका डुबोनी है, यही इशारा है।’

यह शरणागत भक्तका लक्षण है। यह तो उन संतोंने कर दिया; पर आपलोगोंसे यह कहना है कि कहीं नौका डूबने लगे तो उसमें पानी तो नहीं भरना, परंतु रोना बिलकुल नहीं। यही समझना कि बहुत ठीक है, बड़ी मौजकी, बड़े आनन्दकी बात है; इसमें भी कोई छिपा हुआ मङ्गल है। हमने ऐसी भी एक बात सुनी है। एक संतोंका आश्रम है, उसी आश्रमकी बात कई वर्षों पहलेकी सुनी है। वहाँके महन्त थे, बड़े अच्छे थे, बहुत विद्वान् और भगवान् के बड़े भक्त थे। एक बार गङ्गाजी बहुत बढ़ गयीं। पहाड़से पानीका प्रवाह आया बहुत जोरसे। आश्रमके पीछे ऐसे बड़े जोरसे पानीका नाला आया कि मानो मकानको काटकर बहा ही देगा। उस समय जो वहाँके बड़े महन्त थे, उनका नाम याद नहीं रहा, बहुत खुश हो गये, प्रसन्न हो गये और गद्‍गद हो गये कि अब मैयाकी गोदमें जायँगे—मतलब, गङ्गाजीमें जायँगे। दूसरे जितने थे, घबरा रहे थे कि मकान बह जायगा और वे खुश हो रहे थे। हुआ क्या? पानीका नाला आया और साथमें पत्थर-ही-पत्थर आकर पत्थरोंका ढेर लग गया। तब पानी एक ओरसे निकलने लगा और मकान बच गया। बच गया तो बच गया। उन संतोंके हृदयमें तो यही भाव हुआ कि मैयाकी गोदमें जायँगे। विचार कीजिये, माँकी गोदमें बच्चेको आनन्द आता है कि दु:ख होता है? उनको यही खुशी थी। प्रत्यक्ष बात तो डूबनेकी थी कि इतना पानीका प्रवाह बढ़ा आ रहा है; किंतु इन्हें खुशी हो रही है। इससे सिद्ध क्या हुआ? करनेमें तो भगवान् की आज्ञा, इशारेके अनुसार करना है और होनेमें हरदम प्रसन्न रहना है। चाहे सुख आये चाहे दु:ख, जो घटना घटे, उसमें खुश रहना है; क्योंकि जो होना है वह तो सब-का-सब भगवान् के हाथमें है और करना हमारे हाथमें है। अत: करना सब भगवान् की आज्ञासे। होनेके नामपर जो होये उसमें खुश हो कि वाह! वाह!! प्रभुकी बड़ी कृपा है। जो हो रहा है, उसमें यह नहीं देखना कि यह ठीक है, यह बेठीक है। बल्कि यह देखे कि यह कर कौन रहा है, यह किसके हुक्मसे, किसके इशारेसे हो रहा है। ‘करी गोपालकी सब होइ।’

जो दु:ख आता है, दर्द होता है, उसमें भगवान् की विशेष कृपा है। दर्द, दु:ख, प्रतिकूलता—यह पापोंका फल है कि पुण्यका? पापोंका फल मानते हैं तो फल भोगनेसे पाप रहेंगे कि नष्ट होंगे? एवं पाप नष्ट होना भगवान् की कृपा है या अकृपा है? शुद्धि हो रही है, भगवान् कृपा कर रहे हैं—ऐसा विचारकर मस्त होता रहे। ज्यों टीस चले, ज्यों पीड़ा हो, त्यों अनुभव हो कि भगवान् की बड़ी कृपा है। प्रभु बड़ी कृपा कर रहे हैं—पवित्र बना रहे हैं। सुनार सोनेको अपनाता है तो उसको खूब तपाता और पीटता है, खराबी-खराबी निकाल देता है। इसका अर्थ यह होता है कि अब वह अपनायेगा। इसी तरह प्रभुने हमको अपना लिया तो अब अपनी वस्तुको साफ कर रहे हैं, अत: अपनेको मस्त होना चाहिये।

अभिप्राय यह कि जो होता है, उसमें तो कोई अनिष्टकी सम्भावना है नहीं, उसमें तो प्रसन्नता लानी है; क्योंकि वह भगवान् के हाथमें है और जो हमें करना है, वह उसकी आज्ञासे करना है, उसकी आज्ञाके विरुद्ध नहीं करना है—यह हमारा उद्देश्य है। इन दोके सिवा और कोई बात है नहीं—एक होना और दूसरा करना। तो फिर हमारा जीवन सब-का-किंतु हम मस्त नहीं रहते, तभी तो कहना पड़ता है—इधर लक्ष्य नहीं है, लक्ष्य हो तो ऐसे हो सकता है।

इसलिये चौबीस घंटोंमें एक मिनट भी ऐसा नहीं, जिस समयमें साधन न होता हो। अब बताओ, कौन-सा समय ऐसा शेष रहा, जिसमें साधन न हो। सब समय साधन ही हो रहा है। और अब कौन-सी प्रवृत्ति, कौन-सी क्रिया है, जो भगवान् का भजन न हो। इससे ‘सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर’ हो जायगा। जब यह कहा है—

‘यत्क्षणं यन्मुहूर्तं वा वासुदेवं न चिन्तयेत्।’

कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई।

जब तव सुमिरन भजन न होई॥

—तब अपनी विपत्ति तो दूर हो गयी। अब विपत्ति कहाँ रही? सब-का-सब समय भगवान् का, सब-का-सब काम भगवान् का, सब-की-सब वस्तुएँ भगवान् की, सब व्यक्ति भगवान् के, सब-के-सब सम्बन्ध भगवान् के और हमारी कोई वस्तु है ही नहीं। मन भगवान् का, बुद्धि भगवान् की, शरीर भगवान् का, प्राण भगवान् के, सब भगवान् के हैं—

‘त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।’

—‘आपकी वस्तु ही, प्रभो! आपके चरणोंमें समर्पित है।’ ऐसे होकर मस्त होते रहें।

हमारी क्या है? हमारे तो भगवान् हैं और भगवान् हैं इसलिये आनन्द है। फिर मौज और मस्ती रहेगी ही।

चिन्ता दीनदयालको मो मन सदा अनन्द।

भगवान् और हम दो हैं। हमारा उनका बँटवारा हो गया। मौज-मौज हमारे हिस्से आ गयी और चिन्ता-चिन्ता भगवान् के। तुम चिन्ता नहीं करते, मैं क्यों करूँ! भगवान् करें। भगवान् बड़े हैं, बड़े चिन्ता किया करें। भक्त नरसीजीके पत्र आया, बहुत बड़ा चिट्ठा कि इतना-इतना सामान लाओ तो आना। पत्रमें ऊपर भगवान् का नाम लिखनेकी रिवाज अनादि कालसे चली आ रही है। पत्र पढ़ा तो ऊपर भगवान् का नाम लिखा ही था, नरसीजी नाचने लगे—

‘पाती तो बाँच नरसी मगन भया।’

—लाखों-करोड़ोंकी वस्तु चाहिये। पत्रमें इतनी वस्तुएँ लिखी थीं कि उनकी बात पढ़-सुनकर नरसीजी नाचने लगे और खुश हो गये एवं गाने लगे—

ऊपर नाम लिख्यो सो तो मायरो भरसी।

नरसीलो तो बैठॺो बैठॺो भजन करसी॥

आपलोगोंके किसी कुटुम्बी, सम्बन्धीका कोई भी काम पत्रमें लिखा आता है तो पत्रमें ऊपर जिसका नाम होता है, उसीपर भार होता है, कहीं बालकोंपर भी कोई भार होता है? बालक तो यही सोचते हैं, विवाह है, अच्छी बात है, हम तो मौज करेंगे, मीठा-मीठा भोजन करेंगे। अरे! तुम तो मौज करोगे, पर पितापर कितना खर्चा होगा, पता है? पर उनको क्या चिन्ता?

कितनी मौज हो रही है! कोई नरसीजीसे पूछे—तुम किसके भरोसे जा रहे हो? भरोसा क्या? हमारे तो भगवान् भात भरेंगे। तुम भी चलो भैया! मीठा-मीठा भोजन करोगे। यहाँ अपने कोई चिन्ता-फिक्र है? अपने तो मौज हो रही है।

चिन्ता दीनदयालको मो मन सदा अनन्द।

जायो सो प्रतिपालसी रामदास गोविन्द॥

हम तो सबकी चिन्ता-फिक्रसे छूट गये। हमने तो प्रभुकी शरण ले ली। सब काम भगवान् का हो गया। मौज है। भगवान् के दरबारसे नीचे उतरे ही नहीं। ये जो छोटे-छोटे बालक—छोकरे होते हैं, उनमें कोई-कोई तो ऐसे होशियार हो जाते हैं कि माँ गोदसे नीचे रखे तो रोने लगते हैं। उन्हें बड़ी अच्छी युक्ति आ गयी। इसी तरह अपने तो भगवान् की गोदमें चढ़ा ही रहे, नीचे उतरे ही नहीं।

इसीलिये नारदजीने भक्तिसूत्रमें बताया है—

तदर्पिताखिलाचारिता तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति।

सम्पूर्ण आचरणोंको भगवान् के समर्पित कर दिया और भगवान् की विस्मृतिमें परम व्याकुलता—बड़ी घबराहट होती है; क्योंकि भगवान् ने गोदसे नीचे रख दिया। अत: यही निश्चय रखे कि ‘हम तो गोदमें ही रहेंगे, नीचे उतरेंगे ही नहीं। अब तुम दु:ख पाओ चाहे सुख पाओ। हम क्या करें?’ बच्चा तो गोदमें ही रहेगा; भार लगे तो माँको लगे, बच्चा क्या करे। हम नीचे उतरेंगे ही नहीं, हम तो प्रभो! आपके चरणोंमें ही रहेंगे, आपकी गोदमें ही रहेंगे और मस्त रहेंगे। खूब मौज हो रही है। यहाँसे, सत्सङ्गसे जाय तो खुशी-आनन्दमें ही जाय। क्या हो गया? क्या, क्या हो गया, मौज हो गयी। ‘क्या’ तो पीछे रह गया अर्थात् ‘क्या’ का अर्थ प्रश्न होता है, सो प्रश्न तो हमारे रहा ही नहीं। भगवान् के यहाँ ही हम रहते हैं। भगवान् का ही काम करते हैं, भगवान् के ही दरबारमें रहते हैं। मौज-ही-मौज है। प्रभुके यहाँ आनन्द-ही-आनन्द है। खुशी किस बातकी है? तो दु:ख ही किस बातका? चिन्ता किस बातकी? कोई है तो ‘चिन्ता दीनदयालको’। हम तो मौज करते हैं। बस, अभीसे ही मस्तीमें रहे। चले-फिरे, उठे-बैठे—सब समय मौज-ही-मौज है। उसके तो भगवच्चिन्तन ही होता है। फिर भगवान् का चिन्तन करना नहीं पड़ता। ऐसी मस्तीमें चिन्तन स्वत: होता है। इसीलिये ध्रुवजीने कहा है—

विस्मर्यते कृतविदा कथमार्तबन्धो।

आपको भूलें कैसे? आप भूले जायँ कैसे? कैसे भूलें, बताइये। इस जन्ममें माँ थोड़ा ही प्यार करती है। जब वह माँ भी याद रहती है, तब अनन्त जन्मोंसे प्यार करनेवाली माँ कैसे भूली जाय! सदा स्नेह रखनेवाले भगवान् भूले जायँ? हमारा काम तो उनके चरणोंमें पड़े रहना है, उनकी ओर मुँह करना है। हमको याद करते हैं स्वयं वे प्रभु। एक बात याद आ गयी। ध्यान देकर सुनें। हम भगवान् को याद नहीं करते तब भी भगवान् हमको याद करते हैं। इसका क्या पता? आप जिस स्थितिमें स्थित रहते हैं, उस स्थितिसे ऊबते हैं कि नहीं, तंग आते हैं कि नहीं? कुटुम्बसे, रुपये-पैसेसे, शरीरसे, काम-धन्धेसे तंग आते हैं न? क्यों आते हैं? भगवान् आपको याद करते हैं तब तंग आते हैं—भगवान् अपनी तरफ खींचते हैं तब उस स्थितिसे तंग आ जाते हैं। फिर भी हम उसे पकड़ लेते हैं। किंतु भगवान् ऐसी स्थिति रखना नहीं चाहते किसी जीवकी कि वह भोगोंमें, रुपयोंमें, कुटुम्बमें फँसे। अर्थात् ऐसी कोई स्थिति नहीं जहाँ ठोकर न लगे। ऐसी कोई स्थिति हो तो आप बतायें। ठोकर तभी लगती है, जब भगवान् हमें विशेषतासे याद करते हैं कि अरे! कहाँ भूल गया तू? मुझे याद कर। मुझको छोड़कर कहाँ भटकता है। पर हम फिर फँसते हैं। भगवान् यदि हमें याद नहीं करते तो हमें सुखकी इच्छा कभी नहीं रहती। परम सुखस्वरूप, परम आनन्दस्वरूप तो भगवान् ही हैं। हमें भगवान् की इच्छा होती है, यह भगवान् हमें याद करते हैं, अपनी ओर खींचते हैं, पर वे जबरदस्ती नहीं करते।

सार बात यह है कि सभी काम भगवान् के हैं, सभी समय भगवान् का है, सभी व्यक्ति भगवान् के हैं और सभी वस्तुएँ भगवान् की हैं। कोई भी क्रिया करते समय यह अनुभव निरन्तर होता रहे तो साधन निरन्तर हो सकता है, जिससे सबका कल्याण है ही।