सच्चा आश्रय

किसी-न-किसीका आश्रय लेना मनुष्यमात्रका स्वभाव है। ऐसे तो जीवमात्र किसी-न-किसीका आश्रय लेना चाहता है, किसी-न-किसीको आधार बनाना चाहता है। ऐसा स्वभाव क्यों है? क्योंकि यह परमात्माका अंश है। अगर यह परमात्माका ही आश्रय ले तो फिर इसको दूसरा आश्रय लेनेकी जरूरत नहीं पड़ेगी। परन्तु जबतक यह परमात्माका आश्रय नहीं लेता, तबतक यह अनेक आश्रय लेता रहता है। लेना तो चाहिये भगवान् का आश्रय, पर उस जगह दूसरी चीजका आश्रय ले लेता है। धनका आश्रय ले लेता है, परिवारका आश्रय ले लेता है, विद्याका आश्रय ले लेता है, योग्यताका आश्रय ले लेता है, बलका आश्रय ले लेता है, पर यह आश्रय टिकता नहीं।

आश्रय परमात्माका ही लेना चाहिये—यह बात समझनेमें ठीक दीखती है और मानते भी हैं, पर दूसरा आश्रय छोड़ते नहीं। यद्यपि दूसरा आश्रय छोड़नेमें आप पराधीन नहीं हैं, स्वाधीन हैं, परन्तु दूसरेका विशेष आश्रय लेनेसे, उसका सुख पाते रहनेसे अपनेमें एक ऐसा वहम हो गया है कि इनका आश्रय छोड़नेपर हम कैसे रहेंगे, कैसे जीयेंगे? हमारा निर्वाह कैसे होगा? ऐसा भाव होनेसे अपनेमें यह कायरता आ गयी कि इनका आश्रय हम छोड़ नहीं सकते।

जब गाढ़ी नींद आती है, उस समय किसका आश्रय रहता है? किसीका आश्रय नहीं रहता, परमात्माका भी आश्रय नहीं रहता। उस अवस्थामें एक बेहोशी रहती है। बेहोशीमें संसारका आश्रय तो छूटता है, पर मूढ़ता (अज्ञान) का आश्रय रहता है। यह जो वहम है कि संसारके आश्रयके बिना हम जी नहीं सकेंगे, तो फिर सुषुप्तिमें आप कैसे जीते हैं? सुषुप्तिमें संसारका आश्रय न रहनेपर भी आप रहते हैं। कृपा करके एक और बातकी तरफ आप ध्यान दें। संसारका आश्रय लेनेसे इतना सुख नहीं मिलता, जितना सुख संसारका आश्रय छोड़नेसे, नींदमें मिलता है। संसारका आश्रय छोड़नेसे जो सुख मिलता है, जो ताजगी मिलती है, जो काम करनेकी शक्तिका संचय होता है, वह संसारका आश्रय लेते हुए नहीं होता। शक्तिका संचय दूर रहा, उलटे शक्ति खर्च होती है। धन, परिवार, बुद्धि, योग्यता आदि किसीका भी आश्रय लेते रहनेसे आप बेचैन हो जाते हैं, थक जाते हैं, आपकी शक्ति क्षीण हो जाती है, फिर आप सबको छोड़कर सो जाते हैं। सोते-सोते आपमें पुन: शक्ति आ जाती है। इस प्रकार संसारका आश्रय छूटनेसे आपके पास बहुत विलक्षण ताकत आयेगी; और परमात्माका आश्रय लेनेसे ताकतका कोई पारावार नहीं रहेगा, इतनी असीम, अपार ताकत आयेगी कि फिर भय, चिन्ता आदि रहेंगे ही नहीं। उसीके लिये कहा है—‘यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:’ (गीता ६।२२)। उससे बढ़कर कोई लाभ हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं, हो सकता नहीं—परन्तु वह नाशवान् का आश्रय छोड़नेसे ही मिलेगा।

आपसे गलती यह होती है कि जिसको आप नाशवान् मानते हैं, जानते हैं, उसका आश्रय नहीं छोड़ते। जप-ध्यान करते हैं, कीर्तन करते हैं, चिन्तन करते हैं, पर साथ-साथ नाशवान् का आश्रय भी रखते हैं। नाशवान् संसारका आश्रय सर्वथा छोड़े बिना परमात्माका आश्रय पूरा नहीं लिया जाता। पूरा आश्रय लिये बिना पूरी शक्ति नहीं मिलती। परमात्माकी तरफसे कोई कमी नहीं है। आप परमात्माका जितना आश्रय लोगे, उतना आपको आश्वासन मिलेगा, शक्ति मिलेगी, लाभ होगा। परन्तु संसारका आश्रय सर्वथा छोड़कर परमात्माके आश्रित हो जाओगे तो अपार बल मिलेगा।

वे परमात्मा कहाँ हैं—इसमें एक बात बतायें कि वे सबके हृदयमें हैं—‘सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्ट:’ (गीता १५। १५); ‘ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति’ (गीता १८।६१)। वे सम्पूर्ण जीवोंके भीतर हैं; परन्तु यह बाहरकी तरफ ही देखता है, भीतरकी तरफ देखता ही नहीं। आप अपनेको मानते हो कि मैं हूँ, उस मैं-पनका आश्रय आत्मा है, और आत्माका भी आश्रय परमात्मा है—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५।७)। आपका आत्मा उस परमात्माका अंश है। आप एक क्षेत्रमें हैं और आपका अंशी परमात्मा सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें हैं—‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत’ (गीता १३।२)। गोपिकाओंने कहा है—

न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनामन्तरात्मदृक्।

—‘आप केवल यशोदानन्दन ही नहीं हैं, प्रत्युत जितने भी शरीरधारी हैं, चाहे वे स्थावर हों, जंगम हों, देवता हों, राक्षस हों, भूत-प्रेत-पिशाच हों, नरकोंमें रहनेवाले हों, भजन-ध्यान करनेवाले हों, तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त हों, भगवत्प्रेमी हों, उन सबकी अन्तरात्माके द्रष्टा आप हैं। पर ऐसा होते हुए आप यहाँ कैसे आ गये?’

विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान् सात्वतां कुले॥

(श्रीमद्भा० १०।३१।४)

—‘ब्रह्माजीने प्रार्थना की तो आप प्रकट हुए। किस लिये प्रार्थना की? ‘विश्वगुप्तये’ अर्थात् संसारकी रक्षा करनेके लिये, क्योंकि संसारकी रक्षा आप ही कर सकते हैं और किसीमें ताकत नहीं है करनेकी। आप इन यादवोंके कुलमें प्रकट हुए हैं—‘उदेयिवान्’, पैदा नहीं हुए हैं।’ जैसे सूर्यका उदय होता है तो ऐसा कोई नहीं कहता कि सूर्य पैदा हो गया; क्योंकि उदय होनेसे पहले भी सूर्य है। जब वह हमारे सामने आ जाता है, तब उसका उदय होना कहते हैं। ऐसे ही वे परमात्मा प्रकट होते हैं, हमारे शरीरोंकी तरह जन्म नहीं लेते।

मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर, व्यक्ति, वस्तुएँ, पदार्थ, रुपये-पैसे आदि कोई भी आपका नहीं है, आपके साथ रहता नहीं है, प्रतिक्षण आपसे अलग हो रहा है, फिर भी आप इनका आश्रय लेते हैं। ये मन, बुद्धि आदि आपके आश्रित रहते हैं, पर अपने आश्रित रहनेवाले वस्तुओंका आप आश्रय लेते हैं, अपने उद्योगसे पैदा होनेवाले धनका आश्रय लेते हैं—यह गलती करते हैं। इनका आश्रय न लेकर एक भगवान् का आश्रय लें—‘मामेकं शरणं व्रज’ (गीता १८। ६६)। ‘तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥’ (गीता १८। ६२)—जो सबके हृदयमें विराजमान है, उस ईश्वरकी ही सर्वभावसे शरण ले लो। उसकी कृपासे परमशान्ति (संसारसे सर्वथा उपरति) और अविनाशी परमपदकी प्राप्ति हो जायगी। भगवान् का आश्रय लेनेमें हम सब-के-सब स्वतन्त्र हैं, कोई भी पराधीन नहीं है! उनका आश्रय लेनेमें कोई अयोग्य भी नहीं है।

आप इसी क्षण परमात्माका आश्रय ले सकते हैं; क्योंकि वह आपके पास है और आप उसके पास हैं। वह आपसे अलग नहीं हो सकता और आप उससे अलग नहीं हो सकते। अगर वह आपसे अलग हो जाय तो ईश्वर दो हो जायँगे, एक वह और एक आप। उसकी जो अखण्डता है, सर्वोपरि भाव है, व्यापकता है, वह खण्डित हो जायगी। आपसे अलग होनेपर उसकी महत्ता रहेगी ही नहीं। अत: वह आपसे अलग हो ही नहीं सकता। आप भी उससे अलग नहीं हो सकते। हाँ, आप अपनेको उससे अलग मान सकते हो, पर अलग हो नहीं सकते। ऐसे ही आप अपनेको संसारके आश्रित मान सकते हो, पर आश्रित हो नहीं सकते। आपने शरीरका आश्रय लिया, धनका आश्रय लिया, कुटुम्बका आश्रय लिया, बल-बुद्धिका आश्रय लिया, पर क्या आप इनके आश्रित रह सकते हैं? इनके आश्रित कोई रह सकता ही नहीं। फिर भी आप इनका आश्रय मान लेते हैं, यह गलती करते हैं, क्योंकि यह निभनेवाला नहीं है। इनका साथ रहनेवाला नहीं है, सब छूटनेवाला है। अत: इनसे विमुख होकर एक भगवान् का ही आश्रय लें, औरका आश्रय मत लें। धनका सदुपयोग करें, सब काम करें, पर आश्रय एक भगवान् का ही रखें।

सन्तोंने कहा है—

पतिव्रता रहे पतिके पासा, यों साहिबके ढिग रहे दासा॥

जैसे पतिव्रता पतिके आश्रित रहती है, ऐसे ही भक्त भगवान् के आश्रित रहते हैं। जगज्जननी जानकीजी सास-ससुरको माता-पितासे भी अधिक आदर देती थीं; परन्तु जब भगवान् वनवासके लिये पधारे, तब जानकीजीने उनको भी छोड़ दिया। दशरथजीने यहाँतक कह दिया कि अगर जनकराजदुलारी यहाँ रह जाय तो मेरे प्राण रह सकते हैं, फिर भी वे नहीं रहीं। वे कहती हैं कि मैं रह सकती ही नहीं। चाँदनी चन्द्रमाको छोड़कर कैसे रह जाय? सूर्यकी प्रभा सूर्यको छोड़कर कैसे रह जाय? शरीरकी छाया शरीरको छोड़कर कैसे रह जाय? ऐसे ही कोई भी जीव परमात्मासे अलग रह सकता ही नहीं, परन्तु यह परमात्माका आश्रय न लेकर अलग होनेवाले (संसार) का आश्रय लेता है, इसीसे यह दु:ख पा रहा है। अगर यह अलग होनेवालेका आश्रय न ले और सदा साथ रहनेवालेका आश्रय ले ले तो निहाल हो जाय। आप अभी यह निश्चय कर लें कि हम संसारका आश्रय नहीं लेंगे। धन कमायेंगे, रखेंगे, पर उसका आश्रय नहीं लेंगे। संसारका काम करेंगे, पर संसारका आश्रय नहीं लेंगे। इतने दिन संसारसे लिया है, अब उसका कर्जा चुकानेके लिये काम करना है, पर आश्रय नहीं लेना है। संसार आश्रय लेनेके योग्य है ही नहीं, क्योंकि यह एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता है। यह इतनी तेजीसे बदलता है कि इसको दुबारा नहीं देख सकते। केवल बदलनेके पुञ्जका नाम संसार है। जैसे भगवान् कृपाकी मूर्ति हैं* ऐसे ही यह संसार बदलनेकी मूर्ति है। बदलनेके सिवाय इसमें और कुछ भी नहीं है। ऐसे संसारका आश्रय आपने मान रखा है। अब इससे विमुख होकर केवल भगवान् के चरणोंका आश्रय ले लें और अभी ले लें, अभी।

‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’, ‘एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की॥’ —दूसरेका आश्रय न लें। सर्वभावसे भगवान् के शरण हो जायँ—‘तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन’ (गीता १८। ६२), ‘स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन’ (गीता १५।१९); ‘सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ’ (मानस ७। ८७ क)। वास्तवमें भगवान् के साथ आपका स्वत:सिद्ध घनिष्ठ सम्बन्ध है। बदलनेवालेके साथ सम्बन्ध न जोड़ें—इतनी ही बात है।