साधकका कर्तव्य

साधकका मुख्य कर्तव्य है—साधनविरुद्ध कार्य न करना अर्थात् जो कार्य परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें बाधक हो, उसका त्याग करना। साधनविरुद्ध कार्यका त्याग करनेपर साधन करना नहीं पड़ता, प्रत्युत स्वत: होता है। स्वत: होनेवाले साधनमें कर्तृत्वाभिमान (करनेका अभिमान) नहीं आता। वास्तवमें साधन स्वत:सिद्ध है। साधनविरुद्ध कार्य तो हमने पकड़ा है। जैसे, बालक स्वत: सत्य बोलता है, पर जब वह झूठको स्वीकार कर लेता है अर्थात् झूठ बोलना सीख जाता है, तब उसको सत्य बोलनेके लिये उद्योग करना पड़ता है। उद्योगसे किये गये साधनसे कर्तृत्वाभिमान पैदा होता है। तात्पर्य है कि जैसे साध्य (परमात्मा) अविनाशी है, ऐसे ही साधन भी अविनाशी है*। परन्तु जब साधक साधनको अविनाशी न मानकर कृतिसाध्य (अपने उद्योगसे किया गया) मान लेता है, तब उसमें कर्तृत्वाभिमान आ जाता है।

जो अपना नहीं है, प्रत्युत मिला हुआ है और बिछुड़ जायगा, उसको अपना मानना और जो अनादिकालसे स्वत: अपना है, उसको अपना न मानना साधनविरुद्ध कार्य है। अत: साधनविरुद्ध कार्यके त्यागका तात्पर्य है—जो मिला है, उसको अपना नहीं मानना। कारण कि जो मिला है, वह बिछुड़ेगा—यह नियम है। इसलिये मिले हुएको अपना न मानकर, प्रत्युत संसारका ही मानकर उसका सदुपयोग करना है।

साधकको जो देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदि मिली है, उसका सदुपयोग करना चाहिये। सदुपयोग करनेका तात्पर्य है—प्राप्त वस्तु आदिको अपनी न मानकर, प्रत्युत अभावग्रस्तोंकी ही मानकर नि:स्वार्थभावसे उनकी सेवामें लगा देना। यह ‘कर्मयोग’ है।

साधकको अपनी जानकारीका आदर करना चाहिये, उसको महत्त्व देना चाहिये। अपनी जानकारीको महत्त्व देनेका तात्पर्य है—अपने विवेकसे जैसा जाना है, वैसा मान लेना और वैसा ही आचरण करना। जैसे किसी भी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिके साथ हमारा सम्बन्ध था नहीं, होगा नहीं, हो सकता नहीं और वर्तमानमें भी उससे निरन्तर सम्बन्ध-विच्छेद हो रहा है—इस प्रकार साधक अपनेको असंग स्वीकार करे। यह ‘ज्ञानयोग’ है।

साधकको एकमात्र भगवान् पर ही विश्वास करना चाहिये। विश्वास करनेका तात्पर्य है—भगवान् के सिवाय दूसरी चीजको भूलकर भी अपना न मानना और उसपर विश्वास, भरोसा न करना१। यह ‘भक्तियोग’ है। मिली हुई वस्तु आदिका सदुपयोग करनेकी अपेक्षा उसका दुरुपयोग न करना श्रेष्ठ है।२ अपनी जानकारीका आदर करनेकी अपेक्षा उसका अनादर न करना श्रेष्ठ है। भगवान् पर विश्वास करनेकी अपेक्षा संसारपर विश्वास न करना श्रेष्ठ है। कारण यह है कि विधिकी अपेक्षा निषेध श्रेष्ठ और बलवान् होता है। विधि सीमित होती है और निषेध (त्याग) असीम होता है। विधिमें कमी रह सकती है और अभिमान भी आ सकता है, पर निषेधमें कोई कमी नहीं रहती और अभिमान भी नहीं आता। जैसे, सत्य बोलनेवाला कभी झूठ भी बोल सकता है और उसको ‘मैं सत्य बोलनेवाला हूँ’ ऐसा अभिमान भी आ सकता है; परन्तु झूठ न बोलनेवाला सावधान साधक जब भी बोलेगा, सत्य ही बोलेगा अथवा चुप रहेगा और उसको सत्य बोलनेका अभिमान भी नहीं आयेगा३।

अगर साधक प्राप्त वस्तु, परिस्थिति आदिका दुरुपयोग न करे तो ‘कर्मयोग’ सिद्ध हो जायगा अर्थात् कुछ करना बाकी नहीं रहेगा। अगर वह अपनी जानकारीका अनादर न करे तो ‘ज्ञानयोग’ सिद्ध हो जायगा अर्थात् कुछ जानना बाकी नहीं रहेगा। अगर वह संसारपर विश्वास न करे तो ‘भक्तियोग’ सिद्ध हो जायगा अर्थात् कुछ पाना बाकी नहीं रहेगा। साधकसे भूल यही होती है कि वह प्राप्त वस्तु, परिस्थिति आदिका सदुपयोग न करके अप्राप्त वस्तु, परिस्थिति आदिकी इच्छा करता है, अपनी जानकारीको महत्त्व न देकर नाशवान् को महत्त्व देता है और भगवान् पर विश्वास न करके संसारपर विश्वास करता है। इस भूलके कारण उसका करना, जानना और पाना बाकी रहता है अर्थात् उसको पूर्णताकी प्राप्ति नहीं होती।

अगर साधक प्राप्त वस्तुका दुरुपयोग न करे तो उसमें अपनी जानकारीका आदर करनेकी योग्यता आ जाती है तथा अपनी जानकारीका आदर करनेसे भगवान् पर विश्वास करनेकी योग्यता आ जाती है।

कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—इन तीनोंमेंसे किसी भी एक साधनकी सिद्धि होनेपर शेष दोनों साधनोंकी सिद्धि स्वत: हो जाती है। परन्तु साधकमें अपने साधनका आग्रह और अभिमान रहेगा तो ऐसा होनेमें कठिनता है! हाँ, यदि साधक अपना आग्रह और अभिमान न रखे तो सच्ची बात स्वत: प्रकट हो जायगी।

साधकको इस बातकी सावधानी रखनी चाहिये कि उसके द्वारा कोई साधनविरुद्ध काम न हो। साधनविरुद्ध काम न करनेसे साधककी स्वत: उन्नति होती है और साधनविरुद्ध काम करनेसे साधकका स्वत: पतन होता है। तात्पर्य है कि मनुष्यमें क्रियाका एक वेग रहता है। यदि उसके द्वारा उन्नतिकी क्रिया नहीं होगी तो फिर पतनकी क्रिया होगी। कारण कि स्थिर न रहना, प्रतिक्षण बदलना संसारका स्वभाव है। अत: साधक या तो उन्नतिमें जायगा या पतनमें जायगा। इसलिये साधक किसी भी जाति, वर्ण, आश्रम, मत, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो, उसको साधनविरुद्ध कार्यका त्याग करना ही पड़ेगा* अर्थात् प्राप्त वस्तुका दुरुपयोग, अपनी जानकारीका अनादर और संसारपर विश्वास—इन तीनोंका त्याग करना ही पड़ेगा। साधनविरुद्ध कार्यके त्यागमें ही उसके साधनकी पूर्णता है।

प्रश्न—साधनविरुद्ध कार्यके मूलमें क्या है?

उत्तर—साधनविरुद्ध कार्यके मूलमें सुखभोगकी आसक्ति है। परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें सुखासक्ति बहुत बाधक है। सुखासक्ति अधिक होनेसे उसका त्याग कठिन, असम्भव दीखता है। परन्तु साधक इस सुखासक्तिके त्यागमें स्वतन्त्र है और विचारपूर्वक इसका त्याग कर सकता है। वह विचार करे कि मुझे वह सुख लेना है, जिसमें कोई कमी न हो तथा जो कभी नष्ट न हो—

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:।

यस्मिन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते॥

तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।

(गीता ६।२२-२३)

‘जिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके माननेमें भी नहीं आता और जिसमें स्थित होनेपर वह बड़े भारी दु:खसे भी विचलित नहीं किया जा सकता।’

‘जिसमें दु:खोंके संयोगका ही वियोग है, उसीको ‘योग’ नामसे जानना चाहिये।’

मनुष्यमें विचारकी जितनी शक्ति है, उतनी देवताओंमें भी नहीं है। वह विचार नहीं करता तो यह उसका प्रमाद है, असावधानी है।

सुखभोगसे भोग्य वस्तुका नाश और अपना पतन होता है—यह नियम है। जैसे, रागपूर्वक धनका भोग करते हैं तो धनका नाश और अपना पतन करते हैं। अपनेमें धनका महत्त्व, कामना, लोभ, आसक्ति, जडता, गुलामी आदि आना ही अपना पतन है। रागपूर्वक भोजन करते हैं तो अन्नका नाश और अपना पतन करते हैं। अपनेमें भोजनकी आसक्ति बढ़ना ही अपना पतन है।

सांसारिक सुखभोगका तो कहना ही क्या है, साधनजन्य सुखका भोग करनेसे भी साधकका पतन हो जाता है! जैसे, त्यागसे जो शान्ति मिलती है, उस शान्तिका उपभोग करनेसे वह त्याग नहीं रहता और साधकका पतन हो जाता है। कारण कि साधनजन्य सुखके भोगसे मरा हुआ अहंकार भी जीवित हो जाता है अर्थात् व्यक्तित्व जाग्रत् हो जाता है और दृढ़ हो जाता है, जो कि महान् अनर्थका, जन्म-मरणका हेतु है। जबतक अपनेमें अच्छेपनका भाव रहता है, अपनेमें कोई विशेषता दीखती है, तबतक व्यक्तित्व नष्ट नहीं होता अर्थात् अपनेमें एकदेशीयपना रहता है। अत: साधनमें ऊँची स्थिति होनेपर भी तथा अपनेमें जीवन्मुक्त या गुणातीत-अवस्थाकी मान्यता होनेपर भी उसका सुख नहीं भोगना चाहिये। इस विषयमें साधकको बहुत सावधान रहनेकी आवश्यकता है।