समाज-सुधार

गीता और रामायणके क्रियात्मक प्रचारकी आवश्यकता

परम कृपालु प्रभुकी परम अनुकम्पासे मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ है। इस शरीरकी महिमा ऋषि-महर्षि सभी बड़े हर्षसे गाते हैं; क्योंकि इससे बहुत बड़े प्रयोजनकी सिद्धि हो सकती है।

श्रीमद्भगवद्गीतामें कहा है कि जिस लाभसे बढ़कर कोई लाभ नहीं और जिसमें स्थित होनेपर बड़ा भारी दु:ख कभी भी विचलित नहीं कर सकता—

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:।

यस्मिन् स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते॥

(६।२२)

—ऐसा अनुपम लाभ अभी इसी शरीरमें और हर एक मनुष्यको हो सकता है। मूर्ख-से-मूर्ख एवं पापी-से-पापी मनुष्य भी थोड़े-से-थोड़े समयमें दुर्लभ परमपद परमात्माको प्राप्त कर सकता है। भगवद्गीतामें श्रीभगवान् ने कहा है—

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥

(१०।१०)

भगवान् स्वयं जब बुद्धियोग प्रदान करेंगे, तब मूर्खसे भी मूर्ख क्यों न हो, उसे उनकी प्राप्तिमें कौन-सी अड़चन रहेगी। भगवान् ने यहाँतक कह दिया कि ‘अपि चेत्सुदुराचार:’ सुष्ठुदुराचारी अर्थात् साङ्गोपाङ्ग पापी भी अनन्यभाक् होकर भजन करे तो उसको भी साधु मानना चाहिये; क्योंकि उसने निश्चय बहुत ही अच्छा कर लिया है। इससे वह क्षिप्र—बहुत ही शीघ्र धर्मात्मा बन जायगा और शाश्वती शान्तिको प्राप्त हो जायगा। अधिक समयकी भी आवश्यकता भगवान् नहीं बताते—

अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम्।

य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:॥

(८। ५)

इस श्लोकमें ‘च’ अव्यय ‘अपि’ के अर्थमें प्रयुक्त हुआ है। इसका अर्थ होता है कि ‘अन्तकालमें भी मुझको याद करता हुआ शरीर छोड़कर जाता है, तो भी मुझको प्राप्त हो जाता है—इसमें संदेह नहीं।’ तब, जो सब समय भगवान् का चिन्तन करे, उसके कल्याणमें तो कहना ही क्या है। गीता आदि ग्रन्थोंके विचार करनेपर यह बात समझमें आती है कि प्रभुकी प्राप्ति वास्तवमें कठिन नहीं तथा उसके लिये अधिक समयकी भी आवश्यकता नहीं, आवश्यकता है—अपनी हार्दिक लगनकी तथा परमात्माकी प्राप्तिके मार्ग—तरीके जाननेकी।

मार्गोंको जानने और बतानेवाले हैं—सच्चे महात्मा एवं शास्त्र, वेद, स्मृति, पुराण, इतिहास आदि ग्रन्थ। इनमें महात्माओंको तो हरेक मनुष्य पहचान ही नहीं सकता, तब वह उनसे कैसे लाभ उठाये और वेदादि ग्रन्थोंका सम्यक् रीतिसे अध्ययन करके विचारपूर्वक यथाधिकार साधन चुन लेना साधारण बात नहीं। शास्त्रका पारावार नहीं, ऐसी हालतमें हमें सुगमतासे सरल और सुखमय मार्गका बोध करा देनेवाले छोटे तथा सरल ग्रन्थ हों तो हम अनायास ही अपने जीवनको सफल बना सकते हैं और इसके लिये मेरी साधारण बुद्धिके अनुसार श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीतुलसीदासकृत मानस-रामायण—ये दो ग्रन्थ बहुत ही उपादेय हैं। श्रीगीतोपदेशके समय अर्जुनकी जो दशा थी, वही किंकर्तव्यविमूढ़ दशा आज भारतवर्षकी है और इधर राज्यव्यवस्थाको देखते रामायणकी अर्थात् रामराज्यकी अत्यधिक आवश्यकता प्रतीत होती है। जीवनमें रामजीका आदर्श बर्ताव नितान्त प्रयोजनीय है और इसके लिये रामायण और गीताका श्रद्धापूर्वक पाठ करना, उसका अर्थ समझना और उसीके अनुसार जीवन बनाना परम आवश्यक है और यह सब तभी सम्भव है, जब कि हम गीता और रामायणको अच्छी तरह समझकर तदनुकूल आचरण करें—उनको अपने जीवनमें उतारें। इसलिये गीता और रामायणका स्वयं पठन-पाठन करना चाहिये और दूसरोंसे करवाना चाहिये। उन बालकोंको जो आधुनिक समयानुसार धर्मरहित शिक्षा पाये हुए हैं* विशेषरूपसे सच्ची धार्मिक शिक्षाकी आवश्यकता है, हमारे शास्त्रोंका तो कहना है—‘धर्मेण हीना: पशुभि: समाना:।’ यह पशुवृत्ति बड़े जोरोंसे हमारे देशमें फैल रही है और घर कर रही है। अत: इसे निकालनेके लिये उनकी शरण लेनी चाहिये जो स्वार्थ-त्यागी और हमारे यथार्थ हितैषी हैं। ऐसे हैं—भगवान् और उनके प्यारे भक्त—

सुर नर मुनि सब कै यह रीती।

स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती॥

स्वारथ मीत सकल जग माहीं।

सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥

हेतु रहित जग जुग उपकारी।

तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥

संतन मिलि निरनै कियो मथि पुरान इतिहास।

भजिबे को दोई सुघर, कै हरि, कै हरिदास॥

इन दोनोंके ही साक्षात् वचनामृतरूप ये दो पवित्र ग्रन्थरत्न हैं—श्रीभगवान् के श्रीमुखकी वाणी गीता और भक्तराज तुलसीकी मधुर वाणी श्रीरामायण। भाषाएँ अनेक हैं, पर उनमें सर्वश्रेष्ठ है—देवभाषा संस्कृत और दूसरी है राष्ट्रभाषा हिंदी। गीता संस्कृतमें है और रामायण हिंदीमें। हमारे अवतार भी दो ही मुख्य माने जाते हैं—एक श्रीराम और दूसरे श्रीकृष्ण। उक्त दोनों ग्रन्थ भी इन दोनोंकी महिमा हैं। उपदेश देनेके तरीके भी दो ही हैं—एक मुखसे कहकर और एक आचरण करके।

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत् तदेवेतरो जन:।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

(३।२१)

वही श्रीगीतामें श्रीभगवान् ने कहकर उपदेश दिया और भगवान् श्रीरामजीने श्रीरामायणमें उसीको करके दिखलाया। काव्य भी दो ही तरहके होते हैं—एक दृश्य और दूसरा श्रव्य। रामायण दृश्य और गीता श्रव्य है।

श्रीमद्भगवद्गीता संक्षिप्त उपदेशसे और रामायण विशद उदाहरणों और लीला-कथाओंसे हमें समझा रही है। इसलिये इन दोनों ग्रन्थरत्नोंका अच्छी तरहसे अध्ययन करके अनुसरण करना चाहिये।