संघर्षका कारण
आजकल ऐसा प्रचार किया जाता है कि जातिभेदके कारण ही समाजमें संघर्ष होता है; अत: जातिभेदको नहीं मानना चाहिये। यह बिलकुल गलत मान्यता है। वास्तवमें संघर्ष जातिको लेकर नहीं होता, प्रत्युत अहंकारसे पैदा होनेवाले स्वार्थ और अभिमानको लेकर होता है।
सृष्टिमें जातिभेद स्वाभाविक है। विभिन्न देशोंमें मनुष्योंकी अनेक जातियाँ विद्यमान हैं। केवल मनुष्यमें ही नहीं, प्रत्युत पशु-पक्षी, वृक्ष-लता आदिमें भी जातिभेद स्वाभाविक विद्यमान है। गाय, भैंस, भेड़, बकरी, घोड़ा, ऊँट, कुत्ता आदिकी अनेक जातियाँ हैं और उनकी एक-एक जातिमें भी अनेक भेद हैं। जातिसे ही उनके गुणोंकी पहचान होती है। इनका क्रय-विक्रय करनेवाले लोग इनकी जातियोंसे भलीभाँति परिचित होते हैं। जातिको देखकर ही इनका मूल्य लगाया जाता है। ऐसे ही वृक्षोंमें भी एक-एक वृक्षकी अनेक जातियाँ होती हैं। फलों तथा सब्जियोंमें और अनाजोंमें भी अनेक जातियाँ होती हैं। इस जातिभेदका कारण यह है कि सृष्टि विषम है और इसमें एक समान दीखनेवाली दो चीजें भी वास्तवमें समान नहीं होतीं। अत: वैरका कारण जाति नहीं है। स्वार्थ और अभिमानको लेकर ही वैर पैदा होता है, जो कि आसुरी सम्पत्ति है।
एक बात यह भी देखनेमें आती है कि अलग-अलग जातिमें परस्पर लड़ाई या वैर नहीं होता, प्रत्युत एक ही जातिमें परस्पर स्वार्थ और अभिमानको लेकर वैर होता है। जैसे, पुरुष जातिका पुरुष जातिसे और स्त्री जातिका स्त्री जातिसे वैर होता है। पशुओंमें भी नरकी लड़ाई नरसे और मादाकी लड़ाई मादासे होती है। जैसे कुत्ता कुत्तासे ही लड़ता है और कुतिया कुतियासे ही लड़ती है, दूसरा इस लड़ाईमें सहायकमात्र होता है। बन्दरोंमें भी बँदरियोंके समूहमें एक बन्दर होता है। अगर किसी बँदरीका नर बच्चा पैदा होता है तो वह उसको लेकर भाग जाती है; क्योंकि अपने भोगका स्वार्थ रहनेसे बन्दर उस नर बच्चेको मार डालता है! परन्तु मादा बच्चा पैदा होनेपर वह उसको नहीं मारता। यही बात कुत्तोंमें भी पायी जाती है। नर बच्चा पैदा हो तो उसको कुत्ता मार देता है और मादा बच्चा हो तो उसको कुतिया मार देती है।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके बीच परस्पर लड़ाई या वैर नहीं होता। ब्राह्मणका ब्राह्मणसे, क्षत्रियका क्षत्रियसे, वैश्यका वैश्यसे और शूद्रका शूद्रसे वैर होता है। तात्पर्य है कि जहाँ एक जीविका होती है, वहीं स्वार्थवश लड़ाई होती है। अगर सब काममें सबका अधिकार मान लिया जाय तो इससे संघर्ष बहुत ज्यादा बढ़ेगा। कारण कि ऐसा माननेसे जिस जीविकासे अधिक रुपये, मान-बड़ाई आदि प्राप्त होते हों, उसको सब करने लगेंगे और जिस जीविकामें रुपये, मान-बड़ाई आदि कम प्राप्त होते हों, उसको कोई नहीं करेगा। ऊँचा काम सब करना चाहेंगे, पर नीचा काम कोई करना नहीं चाहेगा। जैसे, पहले राज्यके लिये केवल राजपूत ही लड़ते थे, पर अब राज्यके लिये सभी लड़ते हैं। पहले चारों वर्ण अपना-अपना कार्य करते थे, पर अब चारों वर्णोंके कामोंमें सबका अधिकार होनेसे संघर्ष भी कम-से-कम सोलह गुना तो बढ़ेगा ही! पहले लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रमकी मर्यादामें चलते थे और सुख-शान्तिपूर्वक रहते थे। परन्तु आज वर्णाश्रमकी मर्यादाको मिटाकर स्वार्थवश अनेक पार्टियाँ बन रही हैं, जो राज्यके लिये आपसमें लड़ती हैं। दूसरे सम्प्रदायवालोंके वोटके लिये हिन्दू ही हिन्दुओंका नाश कर रहे हैं! माँ, बाप और बेटा—तीनों अलग-अलग पार्टियोंको वोट देते हैं और घरमें लड़ते हैं! प्रचार तो यह किया जाता है कि सबमें परस्पर एकता होनी चाहिये, पर वास्तवमें एक एकता हो रही है अर्थात् माँ अलग, बाप अलग, पत्नी अलग, बेटा अलग, भाई अलग—सब एक-एक हो रहे हैं! कारण यह है कि वर्णाश्रमकी रचना तो मर्यादा, कर्तव्यको लेकर हुई थी, पर पार्टियोंकी रचना स्वार्थको लेकर हुई है।
स्वार्थ और अभिमानके कारण ही विभिन्न वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिके मनुष्योंमें अपने वर्ण आदिका पक्षपात रहता है, जिससे वे अपने वर्ण आदिका मण्डन और दूसरे वर्ण आदिका खण्डन करते हैं। इस विषयमें एक कहानी है। एक वेश्या थी। उसके मनमें विचार आया कि मेरा कल्याण कैसे हो? अपने कल्याणके लिये वह साधुओंके पास गयी। उन्होंने कहा कि तुम साधुओंका संग करो। साधु त्यागी होते हैं, इसलिये उनकी सेवा करो तो कल्याण होगा। फिर वह ब्राह्मणोंके पास गयी तो उन्होंने कहा कि साधु तो बनावटी हैं, पर हम जन्मसे ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण सबका गुरु होता है। अत: तुम ब्राह्मणोंकी सेवा करो तो कल्याण होगा। इसके बाद वह संन्यासियोंके पास गयी तो उन्होंने कहा कि संन्यासी सब वर्णोंका गुरु होता है, इसलिये उसकी सेवा करनेसे कल्याण होगा। फिर वह वैरागियोंके पास गयी तो उन्होंने कहा कि वैरागी सबसे तेज होता है; अत: उसकी सेवा करो तो कल्याण होगा। फिर वह अलग-अलग सम्प्रदायोंके गुरुओंके पास गयी तो उन्होंने कहा कि हम सबसे ऊँचे हैं, शेष सब पाखण्डी हैं। तुम हमारी चेली बन जाओ, हमारेसे मन्त्र लो, तब हम वह बात बतायेंगे, जिससे तुम्हारा कल्याण हो जायगा। इस प्रकार वह वेश्या जहाँ भी गयी, वहीं उसको अपने-अपने वर्ण, आश्रम, मत, सम्प्रदाय आदिका पक्षपात दिखायी दिया। यह देखकर उसके मनमें आया कि अब तत्त्व समझमें आ गया! युक्ति हाथ लग गयी! साधु कहते हैं कि साधुओंको पूजो, ब्राह्मण कहते हैं कि ब्राह्मणोंको पूजो तो हम क्यों न वेश्याओंको पूजें! ऐसा सोचकर उसने वेश्याभोज करनेका विचार किया। उसमें सब वेश्याओंको निमन्त्रण दिया। निश्चित समयपर सब वेश्याएँ वहाँ आने लगीं।
उस गाँवके बाहर एक विरक्त, त्यागी सन्त रहते थे। उन्होंने देखा तो विचार किया कि आज क्या बात है? जब उनको मालूम हुआ कि आज वेश्याभोज हो रहा है तो वे वेश्याको क्रियात्मक शिक्षा देनेके लिये वहाँ पहुँच गये। रसोई बन रही थी। रसोई बनानेवालोंने पकाये हुए चावलोंका पानी (माँड़) नालीमें गिराया। वेश्या छतपर खड़ी होकर जिधर देख रही थी, उधर बाबाजी बैठ गये और उस माँड़से हाथ धोने लगे। वेश्याने देखा तो बोली कि बाबाजी, यह क्या कर रहे हो? बाबाजीने कहा कि तू अन्धी है क्या? तेरेको दिखायी नहीं देता, मैं तो अपने हाथ धो रहा हूँ! वेश्याने बाबाजीको ऐसा करनेसे रोका तो वे माने नहीं। वेश्या उतरकर नीचे आयी और बोली कि बाबाजी, यह चावलोंका पानी है, इससे तो हाथ और मैले होंगे! आप साफ पानीसे हाथ धोओ। बाबाजीने कहा कि अगर इससे हाथ मैले हो जायँगे तो क्या वेश्याएँ ज्यादा साफ, निर्मल हैं, जिससे इनकी सेवासे कल्याण हो जायगा? हाथ मैले पानीसे साफ होते हैं या साफ पानीसे? यह सुनकर वेश्याको होश आया कि बाबाजी बात तो ठीक कहते हैं! तो फिर कल्याण कैसे होगा? बाबाजी बोले—जिस सन्तमें किसी मत, सम्प्रदाय आदिका पक्षपात, आग्रह न हो, जिसके आचरण शुद्ध हों, जिसके भीतर एक ही भाव हो कि जीवका कल्याण कैसे हो, जिसमें किसी प्रकारकी कामना न हो—वह सन्त चाहे स्त्री हो या पुरुष, साधु हो या ब्राह्मण, किसी भी वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो, उस सन्तका संग करो, उनकी बातें सुनो तो कल्याण होगा।
तात्पर्य यह हुआ कि जहाँ स्वार्थ और अभिमान होगा, भोग और संग्रहकी इच्छा होगी, वहाँ आसुरी सम्पत्ति आयेगी ही। जहाँ आसुरी सम्पत्ति आयेगी, वहाँ शान्ति नहीं रहेगी, प्रत्युत अशान्ति होगी, संघर्ष होगा, पतन होगा।
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:।
काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥
(गीता १६।२१)
‘काम, क्रोध और लोभ—ये तीन प्रकारके नरकके दरवाजे जीवात्माका पतन करनेवाले हैं, इसलिए इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये।’