सांसारिक सुख दु:खोंके कारण हैं
संयोगजन्य सुख लेनेवाला व्यक्ति अपना और संसारका—दोनोंका नुकसान करता है। जितने भी संयोगजन्य सुख हैं, वे सब-के-सब दु:खोंके कारण हैं—‘ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते।’ (गीता ५।२२)। सुख भोगनेवाला अपने लिये और संसारके लिये भी दु:खोंका कारण बनता है अर्थात् सबको दु:ख देता है, सबकी हिंसा करता है। इसलिये संसारका सुखभोग बिना हिंसाके नहीं होता। पर जो सब जगह परमात्माको देखता है, वह अपनी और दूसरेकी हिंसा नहीं करता—
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥
(गीता १३। २८)
सब जगह परमात्माको देखनेवाला एक विशेष आनन्दमें स्थित रहता है। वह आनन्द हिंसासे रहित है; क्योंकि वह आनन्द या सुख अपना स्वरूप है—
ईस्वर अंस जीव अबिनासी।
चेतन अमल सहज सुखरासी॥
(मानस ७। ११७। १)
सांसारिक सुख भोगनेवाले व्यक्तिको देखकर दूसरोंके मनमें दु:ख होता है। अपने पास भी वैसा सुख न होनेके कारण दूसरेके हृदयमें जलन होती है, दु:ख होता है। अत: दूसरेके दु:खका कारण बननेवाला सुखका भोगी व्यक्ति हिंसा करनेवाला हुआ। अब कोई कहे कि जीवन्मुक्त महात्मा हो और उसके पास सांसारिक सुखकी सामग्री भी हो, तो उसे देखकर भी दूसरेको दु:ख, जलन होती है। पर वास्तवमें महात्मा दूसरोंके दु:खका कारण नहीं होता। कारण यह कि जीवन्मुक्त महात्मा सांसारिक सुखका भोग नहीं करता। उसकी दृष्टिमें समस्त सांसारिक सुख दु:खरूप ही होते हैं—‘दु:खमेव सर्वं विवेकिन:’ (योगदर्शन२। १५) अत: उनकी दृष्टिमें संसारका सुख है ही नहीं। वह तो अपने-आपमें निज-सुखसे सुखी रहता है। उसका सुख परमात्माका है। जो दु:खी हो रहे हैं, उनका भी तो स्वरूप सुखरूप ही है—‘चेतन अमल सहज सुखरासी।’ पर वे अपने निज-सुखसे विमुख होकर ही दु:ख पा रहे हैं। यदि वे भी सांसारिक सुखसे विमुख होकर अपने सुखमय स्वरूपमें स्थित हो जायँ, तो दोनों ही सुखी हैं। इस सुखका बँटवारा नहीं होता। किसी महापुरुषके पास संसारके सुख और दु:ख आ भी जाते हैं, तो वे उसे सुख या दु:ख नहीं दे सकते। वह तो समुद्रकी भाँति शान्त और पूर्ण रहता है—
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमाप: प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥
(गीता २।७०)
जैसे सब जल आकर समुद्रमें मिलते हैं, तो भी समुद्र अपनी मर्यादामें स्थित रहता है। ऐसे ही संसारके सब सुख आनेपर भी जीवन्मुक्त महापुरुष अपनी मर्यादामें स्थित रहता है, शान्त रहता है। परंतु भोगोंकी कामनावाला पुरुष कभी सुखी नहीं हो सकता। भोग नहीं होते, तब उनके अभावसे दु:खी होता है और भोग होते हैं, तब अभिमान करके दु:ख पाता है, जैसे दादकी बीमारीमें खुजली और जलन दोनों होती हैं; खुजली अच्छी लगती है और जलन बुरी। इसीलिये सांसारिक भोग मिलनेसे जो सुख होता है, वह भी एक प्रकारकी व्यथा ही है। जीवन्मुक्त महात्माको कितने ही पदार्थ मिल जायँ, वह शान्त रहता है और पदार्थ न मिलें, तब भी वह शान्त रहता है। उसकी शान्ति पदार्थोंके अधीन नहीं होती। वह तो साधन-अवस्थामें भी सिद्धि-असिद्धिमें सम रहता है, फिर सिद्ध-अवस्थामें तो सम होगा ही।
सांसारिक पदार्थोंके पासमें होनेसे जिसे अभिमान होता है, वह हिंसा करता है। ऐसे ही जिसे गुणोंका अभिमान है, वह भी हिंसा करता है। गुण तो आने-जानेवाले हैं, उनको लेकर अभिमान करता है, तो जिनके पास वे गुण नहीं हैं, उनके मनमें जलन पैदा होती है; क्योंकि वे किसीसे कम तो हैं नहीं। सब-के-सब परमात्माके अंश हैं; अत: स्वरूपसे समान हैं। आने-जानेवाले पदार्थोंसे अपनेको सुखी मानना भूल है। जो अपनेको बड़ा और दूसरोंको नीचा समझकर दूसरोंका तिरस्कार करता है, वह भी हिंसा करता है। अपनेमें दूसरोंकी अपेक्षा विशेषताका अनुभव करना भी भोग है, और उससे दूसरोंकी हिंसा होती है। मान-बड़ाईका सुख भोगनेवाला भी हिंसा करता है; क्योंकि वह अपनेको मान-बड़ाईके योग्य समझकर अभिमान करता है और दूसरोंको अयोग्य समझकर उनका तिरस्कार करता है। वह सोचता है कि कहीं दूसरेकी बड़ाई हो जायगी तो मेरी बड़ाईमें धब्बा लगेगा। ऐसे ही काम-धन्धा न करनेवाला मनुष्य आलस्यका सुख लेता है तो दूसरे कहते हैं कि हम तो मेहनत करते हैं और यह आरामसे बैठा माल खाता है तो यह भी हिंसा है। तो सांसारिक सुखोंको भोगनेवाला व्यक्ति खुद तो दु:ख पाता ही है, दूसरोंको भी दु:खी करता है।
सभी भोग दु:खोंके कारण हैं। सांसारिक सुख पहले भी नहीं थे और बादमें भी नहीं रहेंगे। स्वयं अविनाशी होते हुए भी ऐसे नाशवान् सुखोंके वशमें होना अपनी हत्या करना ही है। सुखका भोगी व्यक्ति कभी पापों और दु:खोंसे बच ही नहीं सकता। इसलिये जो अपना कल्याण चाहता है, उसके लिए आवश्यक है कि वह किसी वस्तु, परिस्थिति, व्यक्ति आदिके कारण प्रसन्नता या सुखका अनुभव न करे। इनसे प्रसन्न होनेवाला व्यक्ति मुक्त नहीं होता। कर्मयोगमें यही खास बात है। कर्मयोगी सभी कर्तव्य-कर्म करता है, पर संयोगजन्य सुखका भोग नहीं करता। किसी बातसे वह प्रसन्नता नहीं खरीदता।
त्यागसे सुख होता है। जो पुरुष विरक्त, त्यागी होता है, उसे देखकर दूसरोंको सुख होता है। अत: जो संयोगजन्य सुखोंका भोगी नहीं है, ऐसा त्यागी पुरुष दूसरोंको सुख पहुँचाता है और संसारका बड़ा भारी उपकार करता है। त्यागी महापुरुष संसारका जितना उपकार करता है, उतना उपकार कोई कर सकता ही नहीं। उसे देखनेसे, उसकी बातें सुननेसे भी दूसरोंको सुख मिलता है। ऐसा महापुरुष यदि एकान्तमें बैठा हो, तो भी संसारके दु:खका नाश करता है। उसका भाव संसारको सुख पहुँचानेवाला होता है—
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत्॥
अपने प्रति वैर रखनेवालोंको भी वह सुख पहुँचाता है। जिसके हृदयमें अभिमान और स्वार्थ नहीं है, जिसका भाव दूसरोंको सुख पहुँचानेका है, उसकी भगवान् की उस शक्तिके साथ एकता हो जाती है, जो संसारमात्रका पालन कर रही है। इसलिये भगवान् का किया हुआ उपकार उसीका है। और उसका किया हुआ उपकार भगवान् का है। इसलिये जो सुखकी इच्छा और सुखका भोग करता है, वह अपना और संसारका नुकसान करता है। और जो सांसारिक सुखोंका त्यागी तथा भगवान् का अनुरागी है, वह संसारमात्रका उपकार करता है।