संत और उनकी सेवा
‘तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात्।’
(नारदभक्तिसूत्र ४१)
संत भगवान् से अपना अलग अस्तित्व नहीं मानते, इसलिये उनमें स्वार्थकी गन्ध भी नहीं रहती। भगवान् से अलग उनकी कोई इच्छा नहीं, वे स्वाभाविक ही भगवान् की इच्छामें अपनी इच्छा, उनकी रुचिमें अपनी रुचि मिलाये रहते हैं। अत: उनके हरेक विधानमें परम संतुष्ट रहते हैं।
संत भगवान् पर ही निर्भर रहते हैं। ‘जाही बिधि राखै राम, ताही बिधि रहिये’—को वे अपने जीवनमें अक्षरश: चरितार्थ कर लेते हैं और इस प्रकार भगवान् के विधानानुसार रहनेमें वे बड़े प्रसन्न होते हैं। हमलोग भी भगवान् के विधानानुसार ही रहते हैं। (क्योंकि भगवान् की इच्छाके विरुद्ध एक पत्ता भी नहीं हिलता।) पर उसमें हमारी प्रसन्नता नहीं होती, हमें बाध्य होकर रहना पड़ता है। यदि हममें मन-इन्द्रियोंके प्रतिकूल भगवद्विधानको बदलनेकी शक्ति-सामर्थ्य होती तो हम उसे अपने अनुकूल बना लेते। परंतु करें क्या, हमारा वश नहीं चलता, तो भी शक्ति-सामर्थ्य न रहनेपर भी उससे बचनेका असफल प्रयत्न तो निरन्तर करते ही रहते हैं। पर संतमें ऐसी बात नहीं है, संतके मनमें भगवान् के विधानानुसार बरतनेमें कुछ भी विचार नहीं होता; प्रत्युत भगवान् के विधानके अनुसार प्राप्त परिस्थिति उसके लिये अनुकूल-से-अनुकूल प्रतीत होती है तथा उसके हृदयमें सदा-सर्वदा भगवान् के विराजमान रहनेके कारण उसपर प्रतिकूलताका कोई असर नहीं होता।
भगवान् स्वयं कहते हैं—
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥
(गीता ९।२९)
‘अर्जुन! मैं सब भूतोंमें समभावसे व्यापक हूँ, न कोई मेरा प्रिय है, न अप्रिय है; परंतु जो मुझको प्रेमसे भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ।’ विचार कर देखें तो यह बात ठीक समझमें आ जाती है। जैसे एक अच्छा मकान है, उसमें किसीका कब्जा-दखल नहीं है, अतएव अच्छे पुरुषको उसमें स्वाभाविक ही प्रसन्नता होगी। इसी प्रकार संतके अहंता-ममतासे रहित निर्मल अन्त:करणमें भगवान् प्रकटरूपसे रहकर बड़े प्रसन्न होते हैं; क्योंकि वहाँ उनके रहनेमें कोई किसी प्रकारका प्रतिबन्ध नहीं लगाता, विघ्न नहीं डालता। भगवान् ऐसे घरमें बड़े नि:संकोचभावसे रहते हैं। श्रीरामचरितमानसमें गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा भी है—
जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥
इस प्रकार संतके हृदयमें भगवान् का वास होनेसे, वह जो कार्य करता है, वह भी भगवान् ही करते हैं, वह जो भी सोचता है, वह भगवान् ही सोचते हैं; इत्यादि कथन सर्वथा सत्य है।
संत और भगवान् के विषयमें तीन प्रकारकी बातें मिलती हैं—(१) दोनोंमें कुछ अन्तर नहीं।
संत-भगवंत अंतर निरंतर नहीं किमपि मति मलिन कह दास तुलसी॥
(विनयपत्रिका)
संत ही भगवान् हैं और भगवान् ही संत हैं अर्थात् संतोंका भगवान् के अतिरिक्त कोई पृथक् अस्तित्व ही नहीं रहता। केवल भगवान् ही रह जाते हैं। किसीने कहा भी है—
ढूँढ़ा सब जहाँमें पाया पता तेरा नहीं।
जब पता तेरा लगा तो अब पता मेरा नहीं॥
(२) वास्तवमें भगवान् भगवान् ही हैं। संत संत ही हैं। संत भगवान् के बराबर नहीं, भगवान् उससे बड़े हैं। संतके ज्ञान, सामर्थ्य, शक्ति आदि सीमित हैं और भगवान् का सब कुछ अनन्त और असीम है। माना, संत भगवान् को प्राप्त हो गया और दूसरेको भी उनकी प्राप्ति करा सकता है, पर वह भगवान् नहीं बन जाता। न्यायसे भी यह ठीक लगता है। जैसे जब हमें कोई संत मिलता है तो हम कहते हैं—‘महाराजजी! भगवान् के दर्शन करा दो।’ इससे प्रत्यक्ष है कि संतके मिलनेसे हमारी आत्यन्तिक तृप्ति नहीं हुई; उनसे बड़ी जो एक वस्तु—भगवान् है, उसको पानेकी इच्छा बनी रही। इससे स्वाभाविक ही भगवान् का बड़ा होना प्रकट होता है और संत सदा भगवान् को बड़ा मानते आये हैं।
(३) संत भगवान् से बढ़कर हैं। गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—
राम सिंधु घन सज्जन धीरा।
चंदन तरु हरि संत समीरा॥
मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा।
राम तें अधिक राम कर दासा॥
श्रीभगवान् ने भी दुर्वासासे कहा है—
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।
साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रिय:॥
संतोंने तो भगवान् को बड़ा बतलाया और भगवान् संतोंको बड़ा बतलाते हैं। परन्तु संतोंको भगवान् और संत दोनों ही बड़ा बतलाते हैं। भगवान् ने कहीं भी अपनेको संतसे बड़ा बतलाया हो—ऐसा देखनेमें नहीं आया। इस दृष्टिसे बड़े हुए संत ही। और हम यदि अपने लाभके लिये विचार करते हैं, तो भी संत ही बड़े हैं; क्योंकि परमात्माके सच्चिदानन्दरूपमें जीवमात्रके हृदयमें रहते हुए भी संत-कृपा और सत्सङ्गके बिना भगवान् के उस परम आनन्दमय स्वरूपके अनुभवसे वञ्चित रहकर जीव दु:खी ही रहते हैं। भगवत्स्वरूपका अनुभव तो भगवद्भक्तिसे ही होता है और वह मिलती है संत-कृपा तथा सत्सङ्गसे—
भगति तात अनुपम सुखमूला।
मिलइ जो संत होहिं अनुकूला॥
भगति सुतंत्र सकल सुख खानी।
बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥
अतएव हमारे लिये तो संत ही बड़े हुए। भगवत्कृपासे प्राप्त हुए मानवदेहका फल मनुष्यके कर्म एवं साधनके अनुसार स्वर्ग, नरक अथवा मोक्ष—सभी हो सकता है। किंतु संतोंकी कृपासे प्राप्त हुए सत्सङ्गका फल केवल परम पद ही होता है।
भगवान् तो दुष्टोंका उद्धार करते हैं उनका विनाश करके, पर संत दुष्टोंका उद्धार करते हैं उनकी वृत्तियोंका सुधार करके। भगवान् अपने बनाये हुए कानूनमें बँधे हुए हैं। परन्तु संतोंमें दया आ जाती है। इस प्रकार भी संत भगवान् से बड़े हैं। भगवान् सब जगह मिल सकते हैं, पर संत कहीं-कहीं ही हैं। अतएव वे भगवान् से दुर्लभ भी हैं—
हरि दुरलभ नहिं जगत में, हरिजन दुरलभ होय।
हरि हेरॺा सब जग मिलै, हरिजन कहिं एक होय॥
हमारा उद्धार करनेमें तो संत ही बड़े हुए, अतएव हमें उन्हींको बड़ा मानना चाहिये।
तात्त्विक दृष्टिसे देखें तो संत और भगवान् दोनों एक ही हैं; क्योंकि संत भगवान् से पृथक् अपनी आसक्ति, ममता, रुचि आदि नहीं रखते। अत: वे भगवत्स्वरूप ही हैं—
भक्ति भक्त भगवंत गुरु चतुर नाम बपु एक।
इन के पद बंदन किएँ नासत बिघ्न अनेक॥
अब प्रश्न होता है कि संतोंका सेवन किस प्रकार किया जाय? इसके उत्तरमें यही कहा जा सकता है कि संतोंके सेवनका सर्वोत्तम ढंग है उनके मन, उनकी आज्ञाके अनुसार चलना, उनके सिद्धान्तोंका आदरपूर्वक पालन करना। यह संत-सेवनकी ऊँची-से-ऊँची विधि है। इसका कारण यह है कि संतोंको अपना सिद्धान्त जितना प्यारा होता है, उतने उनको अपने प्राण भी नहीं होते, जो हमलोगोंको सबसे अधिक प्यारे हैं। यही कारण है कि आवश्यकता पड़नेपर वे अपने प्राण छोड़ सकते हैं, पर सिद्धान्त नहीं। अतएव उनके सिद्धान्तका साङ्गोपाङ्ग पालन करना, उनके मनके अनुसार चलना और यदि मनका पता न लगे तो इशारे-आज्ञा आदिके अनुसार चलना चाहिये, यह उनकी सबसे बड़ी सेवा है—‘अग्या सम न सुसाहिब सेवा।’ अत: शरीरसे सेवा करनेके साथ ही श्रद्धा-प्रेमपूर्वक मनसे भी सेवा की जाय तो कहना ही क्या है। उनका सिद्धान्त जाननेके लिये उनका सङ्ग करके उनसे भगवत्सम्बन्धी बात पूछनी चाहिये; इससे हम अधिक लाभ उठा सकते हैं। संतोंसे पुत्र, स्त्री, धन, मान, बड़ाई आदिसे सम्बन्ध रखनेवाले सांसारिक पदार्थ चाहना अमूल्य हीरेको पत्थरसे फोड़ना है; यह संतोंके सङ्गका सदुपयोग नहीं है। यों संतोंके कहने आदिसे पुत्र आदिकी प्राप्ति भी हो सकती है, किंतु यह तो उनकी कीमत न समझना है।
संतको प्राय: हम समझते नहीं। हमलोग तो उसकी बाहरी क्रियाओंकी अर्थात् अधिक खाने, नंगा रहने, मिट्टीको सोना बना देने आदि चामत्कारिक बातोंकी विशेषता देखना चाहते हैं; किंतु इन बातोंसे संतपनेका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। संतोंका यह लक्षण कहीं भी नहीं लिखा है। गीतामें स्थान-स्थानपर भक्त आदिके लक्षण लिखे हैं, पर उसमें एक स्थानपर भी नहीं लिखा है कि ‘वे बेटा दे देते हैं, वचनसिद्ध होते हैं’ आदि।
तो फिर संतोंकी पहचान कैसे हो? संतोंकी पहचानका सीधा-सा उपाय यही है कि जिस व्यक्तिके सङ्गसे हमारा साधन बढ़े, हममें दैवी सम्पत्ति आये, हमारे आचरणमें न्याय आने लगे, भगवत्तत्त्वका ज्ञान होने, सत्-शास्त्र, भगवान्, महात्मा, परलोक और धर्ममें श्रद्धा बढ़े और भगवान् की स्मृति अधिक रहने लगे, हमारे लिये वही संत है। संतोंसे ऐसा ही लाभ लेना चाहिये और उनसे इस प्रकारका आध्यात्मिक लाभ लेना ही सच्चा लाभ है।
भगवान् से लाभ उठानेकी पाँच बातें हैं—नाम-जप, ध्यान, सेवा, आज्ञापालन और सङ्ग। पर संतोंसे लाभ लेनेमें सङ्ग, आज्ञा और सेवा—ये तीन ही साधन उपयुक्त हैं। संत-महात्मा पुरुष अपने नामका जप और अपने स्वरूपका ध्यान कभी नहीं बताते और जो अपने नाम और रूपका प्रचार करते हैं, वे कदापि संत नहीं। सच्चा संत तो भगवान् के ही नाम-जप और ध्यान करनेका उपदेश देता है। हाँ, वह सेवा, आज्ञापालन और सङ्ग—इन तीनके लिये प्राय: मना नहीं करता। सेवामें कुछ संकोच रखता है और जहाँतक सम्भव होता है, नहीं करवाता है। सेवाके दो भेद हैं—(१) पूजा, आरती करना आदि, (२) वस्त्र देना, भोजन देना, अनुकूल वस्तुओंको प्रस्तुत करना इत्यादि। भगवान् की तो ये दोनों ही सेवाएँ उचित हैं, परन्तु संत पुरुष पहले प्रकारकी सेवा नहीं चाहते और यदि कोई ऐसी सेवाके लिये आग्रह करता है तो वे अपने स्थानपर भगवान् की ही वैसी सेवा करवाते हैं; क्योंकि वे जानते हैं कि ‘मेरा शरीर हाड़-मांसका है, इसकी सेवासे क्या लाभ! दूसरे प्रकारकी सेवा वे आश्रम और वर्णके अनुसार स्वीकार कर सकते हैं। इस प्रकार सेवा भी वह संतपनेकी दृष्टिसे नहीं लेता, आश्रम और वर्णकी ही दृष्टिसे लेता है, अतएव इन अन्न, वस्त्र आदि वस्तुओंकी पूर्ति करना अनुचित नहीं। इस प्रकारकी सेवा केवल संत ही नहीं, जो भी हो ले सकता है। यदि कोई संत नहीं है, पर उसे भूख-प्यास लगी है तो वह कोई भी क्यों न हो, जिस व्यक्तिके पास ये भोजनादि वस्तुएँ हों, उससे शरीरनिर्वाहार्थ ले सकता है।
रही आज्ञापालनकी बात। सो वे प्राय: कोई बात आज्ञाके रूपमें नहीं कहते। वे अपनी नम्रताके कारण जब किसी व्यक्तिको कुछ कार्य करनेके लिये कहते हैं तब प्राय: ऐसा संकेत किया करते हैं कि अमुक परिस्थितिमें शास्त्रोंकी ऐसी आज्ञा है, भगवान् की ऐसी आज्ञा है, संतोंने ऐसा कहा है और किया है आदि-आदि। पर यह निश्चित है कि उनके कथनानुसार करनेसे लाभ अवश्य होता है; अतएव वे जो कुछ निर्देश करें उसे उन्हींकी आज्ञा समझकर पालन करें तो वे उसका विरोध नहीं करते। यह उनकी हमारे प्रति उदारता है, कृपा है, यह उन्होंने हमारे लिये छूट दे रखी है। आज्ञापालनका स्थान सेवामें सबसे ऊँचा माना गया है। शरीरकी पूजासे उनके वचन अधिक महत्त्वके हैं। अतएव वचनोंको ही प्रधानता देनी चाहिये। एक संत थे। उनके पास रहनेवाले श्रद्धालु व्यक्तियोंमेंसे एक व्यक्तिकी एक दिन संतने परीक्षा लेनी चाही। वे बोले—‘मेरी कमरमें दर्द हो रहा है, जरा अपने पैरसे इसे दबा दो।’ श्रद्धालुने कहा—‘महाराज। आपके शरीरपर पैर कैसे रखूँ?’ संतने तुरंत उत्तर दिया, ठीक है, मेरे शरीरपर तो तुम पैर नहीं रखते, पर मेरी जबानपर तो पैर रख दिया न?’ यह एक दृष्टान्त है। इससे हमें यह शिक्षा लेनी चाहिये कि सेवामें शरीरकी अपेक्षा वचनोंके पालनको अधिक महत्त्व दें। हाँ, यह सम्भव है कि हम संतके वचनका पूरा पालन न कर सकें, किंतु यदि मनमें वचन-पालनकी नीयत है तथा उसके लिये यथा-सामर्थ्य प्रयत्न भी किया गया है तो फिर चाहे उसका अक्षरश: पालन न भी हो पाया हो तो भी उससे बहुत बड़ा लाभ होता है।
यदि संतोंके वचनोंका भाव कहीं पूर्णरूपसे समझमें नहीं आये तो नम्रतापूर्वक उन्हींसे पूछकर समाधान कर लेना चाहिये; पर समझमें आ जानेपर पालन करनेमें किञ्चिन्मात्र भी कमी नहीं लानी चाहिये। संतके वचन-पालनमें यदि कहीं उनकी सेवाका भी त्याग करना पड़े तो वह भी कर देना चाहिये। सेवा करनेसे जब लाभ है तो सेवा-त्यागसे अधिक लाभ होना चाहिये, क्योंकि जो कीमती चीज है, उसका त्याग उस चीजसे भी बड़ा है, फिर यह त्याग यदि संतकी आज्ञासे ही किया जाता है, तो वह और भी अधिक महत्त्वकी वस्तु है। सच्चा श्रद्धालु इसमें क्यों चूकेगा। हाँ, एक बात है जो सेवाके कष्टसे बचकर सेवाका त्याग करते हैं, वे तो सेवाके महत्त्वको जानते ही नहीं। उनको तो सेवा करनेमें कष्टका अनुभव होता है। इसलिये वे उस लाभसे वञ्चित रहते हैं। संत कभी किसीको किञ्चिन्मात्र भी कष्ट देना नहीं चाहता, इसलिये वह ऐसे व्यक्तियोंसे सेवा क्यों करवायेगा; क्योंकि उनको सेवा करानेकी कोई भूख तो है ही नहीं। जो लोग दूसरोंसे अपनी सेवा करवाना चाहते हैं, उनके अन्त:करणमें स्वार्थ और अहङ्कारके कारण यह नहीं सूझ पड़ता कि किसको क्या कष्ट और हानि हो रही है; किंतु संतोंके नि:स्वार्थ हृदयमें तो प्रकाश है। वे तो जानते हैं कौन व्यक्ति सेवामें सुखका अनुभव करता है और कौन दु:खका।
सत्सङ्गके लिये तो संत स्वयं अपनी ओरसे चले जाते हैं; क्योंकि प्रेमी जिज्ञासुओंके पास जानेसे भगवत्-वाक्योंका मनन, विचार और अनुशीलन होता है, जो उन्हें अत्यन्त प्यारे हैं। इतना ही नहीं, वे अपना सङ्ग करनेवाले व्यक्तिका उपकार भी मानते हैं कि इसके कारण हमारा कुछ समय भगवच्चर्चामें व्यतीत हुआ। काकभुशुण्डिजीने गरुड़जीसे कहा—‘महाराज! मुझपर आपकी बड़ी कृपा हुई, जो मुझे सत्सङ्ग दिया।’
तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा।
नाथ कीन्ह मो पर अति छोहा॥
पूँछिहुँ राम कथा अति पावनि।
सुक सनकादि संभु मन भावनि॥
(रामचरितमानस)
संतोंकी बातें इतनी अलौकिक हैं कि हम उनका विवेचन भी नहीं कर सकते, फिर अनुभवकी तो बात ही अलग है!
अपनी बुद्धिसे संतोंकी पहचान करना बड़ा कठिन है। उनकी पहचान तो संत एवं भगवान् की कृपासे ही सम्भव है। कसौटीसे पहचान करनेपर तो हम ही फेल हो जाते हैं; क्योंकि हमारी कसौटी ही गलत है। संतोंकी पहचान पहले बताये हुए तरीकेसे ही की जा सकती है कि (१) जिस व्यक्तिके सङ्ग, वार्तालाप तथा दर्शनसे हममें दैवी सम्पत्ति आये, भगवान् में हमारी रुचि बढ़े, आध्यात्मिक पथपर हम अग्रसर हों, (२) जो हमसे कभी किञ्चिन्मात्र किसी तरहकी सेवाकी इच्छा न रखता हो, (३) जो हमारा सदा ही बिना स्वार्थके हित करता रहता हो एवं (४) हमारी दृष्टिमें जो आध्यात्मिक विषयमें सबसे बढ़कर जानकार हो, वही हमारे लिये संत है। एवं स्थूल रीतिसे संतकी पहचान करनेका यह उपाय भी है कि सच्चा संत स्त्री, सम्पत्ति नहीं चाहता, मान-बड़ाई नहीं चाहता, जितनी भौतिक वस्तुएँ हैं उनकी उसको इच्छा या लालसा नहीं रहती।
संतोंका सङ्ग किया जाय तो वह कभी निष्फल नहीं जाता। पर उनका महत्त्व समझकर उनके सिद्धान्तानुसार आचरण करते हुए उनका सङ्ग करना उनका वास्तविक सङ्ग करना है। इस प्रकार करनेसे ही उनके सङ्गका वास्तविक लाभ शीघ्र प्रकट होता है।
इसपर यह शङ्का होती है कि अग्नि अनजानमें भी स्पर्श किये जानेपर जला डालती है, इसी प्रकार अनजानमें भी किया हुआ संतोंका सङ्ग पापोंका नाशक अवश्य होना चाहिये। तो इसका उत्तर यह है कि यह बात उचित ही है। पापोंका नाश तो अनजानमें भी किये हुए सन्त-सङ्गसे अवश्य होता है, परन्तु जिस प्रकार अग्निमें दाहिकाशक्ति, प्रकाशिकाशक्ति, पाचनशक्ति एवं स्वर्ग तथा मोक्ष देनेकी भी शक्ति है, पर दाहिकाशक्तिको छोड़कर अन्य शक्तियोंका लाभ हम बिना जाने नहीं उठा सकते। अग्नि अनजानमें स्पर्श करनेपर जलाता तो है, पर उससे जलानामात्र ही होता है। किंतु जो उस अग्निको अग्नि (अग्निका वास्तविक महत्त्व) जानकर उसके अनुकूल क्रिया करते हैं, वे उससे प्रकाश भी ले सकते हैं और उससे रोटी बनाकर अपनी भूख भी मिटा सकते हैं। इतना ही नहीं, अग्निसे ये काम तो श्रद्धारहित व्यक्ति भी ले सकता है, पर वैदिक मन्त्र और परलोकमें श्रद्धा रखनेवाला मनुष्य तो वैदिक मन्त्रोंसे श्रद्धापूर्वक विधिसहित अग्निमें आहुति देकर स्वर्गप्राप्ति भी कर सकता है और जो भगवान् की आज्ञा मानकर निष्कामभावसे अग्निमें आहुति देकर यज्ञ करता है, वह तो अग्निसे भगवान् की प्राप्ति भी कर सकता है। इसी प्रकार संतोंको न जाननेपर भी उनके सङ्गसे पापोंका नाश तो होता ही है, पर जाने बिना परमात्म-विषयक ज्ञान और सांसारिक पदार्थोंसे वैराग्य नहीं होता। संतोंको जानकर उनका सङ्ग करनेसे सत्-असत्, कर्तव्य-अकर्तव्य, हेय-उपादेय और सार-असारका ज्ञान एवं अपने लिये अभी और परिणाममें अनिष्टकारक वस्तु तथा क्रियाओंका त्याग हो सकता है एवं श्रद्धापूर्वक निष्कामभावसे उनकी आज्ञाके अनुसार अनुष्ठान करनेसे तो अज्ञान, क्लेश, कर्म, विकार, वासना आदिका अत्यन्त अभाव होकर परमानन्दरूप परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। यह सब लाभ संत-महात्माओंको जानकर उनका श्रद्धापूर्वक सङ्ग और तदनुकूल आचरण करनेसे ही होता है।
इस विषयमें एक बात और भी है। अग्निसे जलना तभी होता है, जब अग्नि और अपने बीचमें कोई व्यवधान नहीं होता। पैरमें जूता पहनकर अग्निका स्पर्श किया जाय तो वह जला भी नहीं सकता। इसी प्रकार यदि संतोंके सङ्गमें कुतर्क, निन्दा, तिरस्कार आदिकी आड़ लगा दी जाय तो पापनाशरूपी लाभ भी नहीं हो सकता। अग्नि तो अनजानमें स्पर्श किये जानेपर केवल जलाता ही है, पर यदि कोई संतके प्रति तिरस्कार और निन्दाका भाव नहीं रखकर अनजानमें भी उनका सङ्ग करता रहे तो संतोंका सङ्ग तो उनके पापनाशके सिवा उन्हें परमात्माकी प्राप्तिका अधिकारी भी बना देता है। जैसे पारस और लोहेको टकराते रहो तो पहले लोहेपर लगी हुई मिट्टी, जंग आदि व्यवधान दूर होंगे और बादमें स्पर्श होनेपर लौह स्वर्ण बन जायगा। बस, इसी प्रकार बार-बारके सङ्गसे पापरूपी मल (मिट्टी, जंग आदि) दूर हो जायगा और अन्तमें कल्याण हो जायगा। ऋषिकेश-(उत्तराखण्ड-) की ओर देखा होगा, गङ्गाजीमें गोल-गोल पत्थर मिलते हैं। पहाड़ोंकी चट्टानके टेढ़े-मेढ़े पत्थर पानीके प्रवाहमें लुढ़कते-लुढ़कते गोल हो गये; उन्होंने कोई उद्योग नहीं किया और न उनमें गोल होनेकी इच्छा ही थी। पर प्रवाहमें पड़े रहे तो गोल और चिकने हो गये। इसी प्रकार संत-महात्माओंकी शरणमें पड़ा रहे तो अन्तमें कल्याण हो ही जाता है।
श्रद्धाके दो भेद हैं—(१) स्थायी और (२) अस्थायी। स्थायी श्रद्धा वहाँ होती है, जिसमें कभी कमी नहीं हो सकती। पर अस्थायी श्रद्धा बाजारू भावकी तरह घटती-बढ़ती रहती है। स्थायीमें बढ़नेकी गुंजाइश तो है; पर वह घट कभी नहीं सकती। अस्थायी श्रद्धा भी बढ़ते-बढ़ते अन्तमें स्थायी श्रद्धामें परिणत हो सकती है; क्योंकि अस्थायी श्रद्धामें जो वास्तविक श्रद्धाका अंश रहता है, वह स्थायी श्रद्धामें शामिल होता रहता है। संतोंका बार-बार सङ्ग करनेसे उनके गुण-प्रभावका ज्ञान होनेपर तथा उनकी आज्ञापालन करनेसे उनके प्रति श्रद्धाभावका विकास होता रहता है और अन्तमें स्थायी श्रद्धाका उदय हो जाता है।
संत सर्वदा रहते हैं। ऐसा कोई भी समय नहीं होता, जब पृथ्वी-मण्डलमें यति, सती, धर्मात्मा और संत पुरुष न हों। आज भी संत पुरुष मिल सकते हैं और ऐसे संत मिल सकते हैं, जो हमारा उद्धार कर सकते हैं। पर हमें मिलें कैसे? हममें उनके मिलनेकी लालसा ही नहीं। अतएव यह लालसा बढ़ानी चाहिये कि हमें संत, सच्चे संत मिलें।
संतोंके जीवनकालमें यदि कोई उनसे लाभ लेनेवाला न हो, तो भी उनके सिद्धान्त वायुमण्डलमें स्थिर हो जाते हैं, जिससे भविष्यमें यदि कोई लाभ लेनेवाला उत्पन्न होता है तो उनसे लाभ उठा लेता है।
ऐसी बात नहीं कि सभी संत एक-से हों। उनकी वास्तविक स्थितिमें भेद न रहनेपर भी वर्ण, आश्रम, सङ्ग, स्वाध्याय, प्रकृति, साधनकी प्रणाली आदिका साधनकालमें अन्तर रहनेके कारण सिद्धावस्थामें भी उनकी मान्यता, आचरण और उपदेशप्रणालीमें अन्तर पाया जाता है।
संतलोग किसीको अपना चेला-चेली नहीं बनाते। पर यदि कोई अपनेको उनका अनुयायी मान ले तो इसमें उसको कौन रोक सकता है? जो व्यक्ति ईश्वरपर भरोसा करके सच्चे हृदयसे अपने-आपको किसी संतका अनुयायी मान लेता है, उसका भार भगवान् पर आ जाता है। पर मान्यता होनी चाहिये असली। मतलब यह है कि साधकके मनमें इच्छा हो केवल भगवत्-प्राप्तिकी ही तथा श्रद्धा हो सिद्धान्तको लेकर ही, तो फिर व्यक्तिपर आग्रह न होने तथा इच्छा भौतिक न होनेके कारण वह कहीं भी ठगा नहीं सकता। इस प्रकार यदि मान्यता असली हुई और भगवान् देखेंगे कि इस व्यक्तिका कल्याण इस संतमें श्रद्धा रहनेसे हो सकता है, तब तो वे उसकी श्रद्धा उस संतमें दृढ़ कर देंगे, किंतु यदि वह संत न हो और उसमें श्रद्धा रहनेसे उस साधकको हानि होनेकी सम्भावना हो तो भगवान् उसकी श्रद्धा और कहीं लगा देंगे; क्योंकि साधकके न जाननेपर भी भगवान् तो साधक और संत दोनोंको ही जानते हैं और अनजानमें भी रक्षा करना भगवान् का सर्वभूतसुहृद्-स्वभाव है ही। अत: दोनों अवस्थाओंमें उसका उद्धार होना निश्चित है ही; क्योंकि ‘मेरा कल्याण भगवान् अवश्य करेंगे’ ऐसा उसका भगवान् पर दृढ़ भरोसा रहता है। एकलव्यके भावसे उसको सफलता मिल गयी। वास्तवमें श्रद्धा-भक्ति असली चीज है, नेग-चारसे भगवान् नहीं मिल सकते। संतके विषयमें भी यही बात है। नेग-चार करके चाहे हम किसीको गुरु न बनायें, पर श्रद्धा-भक्तिसे संतको गुरु मानकर उनकी सेवा, आज्ञापालन और सङ्ग करें, लाभ हो ही जायगा।