सर्वश्रेष्ठ हिन्दूधर्म और उसके ह्रासका कारण

सर्वश्रेष्ठ धर्म

संसारमें मुख्यरूपसे चार धर्म प्रचलित हैं—हिन्दूधर्म (सनातनधर्म), मुस्लिमधर्म, बौद्धधर्म और ईसाईधर्म। इन चारों धर्मोंमेंसे एक-एक धर्मको माननेवाले करोड़ों मनुष्य हैं। इन चारों धर्मोंमें भी अवान्तर कई धर्म हैं। हिन्दूधर्मको छोड़कर शेष तीनों धर्मोंके मूलमें धर्म चलानेवाला कोई व्यक्ति मिलेगा; जैसे—मुस्लिमधर्मके मूलमें मोहम्मद साहब, बौद्धधर्मके मूलमें गौतम बुद्ध और ईसाईधर्मके मूलमें ईसामसीह मिलेंगे। परन्तु हिन्दूधर्मके मूलमें कोई व्यक्ति नहीं मिलेगा। कारण कि हिन्दूधर्म किसी व्यक्तिके द्वारा चलाया हुआ धर्म नहीं है, प्रत्युत यह अनादिकालसे चला आ रहा है। जैसे भगवान् सनातन (शाश्वत) हैं, ऐसे ही हिन्दूधर्म भी सनातन है। इसलिये हिन्दूधर्मको ‘सनातनधर्म’ भी कहते हैं। भगवान् ने भी इस सनातनधर्मको अपना स्वरूप बताया है—‘ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहं......शाश्वतस्य च धर्मस्य०’ (गीता १४।२७)। जिस युगमें जब-जब इस सनातनधर्मका ह्रास होता है, हानि होती है, तब-तब भगवान् अवतार लेकर इसकी संस्थापना करते हैं।* तात्पर्य है कि भगवान् भी इसकी संस्थापना, रक्षा करनेके लिये ही अवतार लेते हैं, इसको बनाने अथवा उत्पन्न करनेके लिये नहीं। अर्जुनने भी भगवान् को सनातनधर्मका रक्षक बताया है—‘त्वमव्यय: शाश्वतधर्मगोप्ता’ (गीता ११।१८)।

एक उपज होती है और एक खोज होती है। जो वस्तु पहले मौजूद न हो, उसकी उपज होती है; और जो वस्तु पहलेसे ही मौजूद हो, उसकी खोज होती है। मुस्लिम, बौद्ध और ईसाई—ये तीनों ही धर्म व्यक्तिके मस्तिष्ककी उपज हैं। परन्तु सनातन हिन्दूधर्म किसी व्यक्तिके मस्तिष्ककी उपज नहीं है, प्रत्युत यह विभिन्न ऋषियोंके द्वारा किया गया अन्वेषण (खोज) है—‘ऋषयो मन्त्रद्रष्टार:’। अत: हिन्दूधर्मके मूलमें किसी व्यक्तिविशेषका नाम नहीं लिया जा सकता। यह अनादि, अनन्त और शाश्वत है। अन्य सभी धर्म तथा मत-मतान्तर भी इसी हिन्दूधर्मसे उत्पन्न हुए हैं। इसलिये उन धर्मोंमें मनुष्योंके कल्याणके लिये जो साधन बताये गये हैं, उनको भी हिन्दूधर्मकी ही देन मानना चाहिये। अत: उन धर्मोंमें बताये गये अनुष्ठानोंका भी निष्कामभावसे कर्तव्य समझकर पालन किया जाय तो कल्याण होनेमें सन्देह नहीं करना चाहिये*। प्राणिमात्रके कल्याणके लिये जितना गहरा विचार हिन्दूधर्ममें किया गया है, उतना और किसी धर्ममें नहीं मिलता। हिन्दूधर्मके सभी सिद्धान्त पूर्णतया वैज्ञानिक और कल्याण करनेवाले हैं। अत: हिन्दूधर्म सर्वश्रेष्ठ है।

हिन्दुओंकी वृद्धि आवश्यक क्यों?

हिन्दूधर्ममें मुक्ति, तत्त्वज्ञान, कल्याण, परमशान्ति, परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति जितनी सुगमतासे बतायी गयी है, उतनी सुगमतासे प्राप्तिकी बात ईसाई, मुस्लिम, बौद्ध, यहूदी, पारसी आदि किसी भी धर्ममें नहीं सुनी गयी है। इसलिये मैं चाहता हूँ कि हिन्दुओंकी वृद्धि हो। कारण कि हिन्दूधर्मके अलौकिक, विलक्षण ग्रन्थोंकी बातोंको हिन्दुओंके सिवाय और कौन सुनेगा और उनका आदर करेगा? मुसलमानोंने तो हिन्दूधर्मके असंख्य अच्छे-अच्छे ग्रन्थोंको जला डाला। इसलिये आज वेदोंकी पूरी संहिता नहीं मिलती, सभी शास्त्र नहीं मिलते। इस कारण कितनी विलक्षण-विलक्षण विद्याएँ नष्ट हो गयीं, कला-कौशल नष्ट हो गये, जिनसे केवल हिन्दुओंको ही नहीं, संसारमात्रको लाभ पहुँचता। अब मुसलमानोंकी संख्या बढ़ रही है और हिन्दुओंकी संख्या घट रही है तो आगे चलकर क्या दशा होगी? हिन्दुओंमें कोई-न-कोई तो हिन्दूधर्मके ग्रन्थोंको पढ़ेगा, पर जो हिन्दुओंके ग्रन्थोंको जला-जलाकर हमामका पानी गरम करते रहे, उन मुसलमानोंसे क्या ये आशा रखें कि वे हिन्दुओंके ग्रन्थोंको पढ़ेंगे? जो हिन्दुओंका धर्म-परिवर्तन करके उनको मुसलमान या ईसाई बनानेमें लगे हुए हैं, उनसे क्या यह आशा की जाय कि वे हिन्दुओंके ग्रन्थोंका आदर करेंगे? असम्भव है। इसी दृष्टिसे मैं हिन्दुओंमें परिवार-नियोजनका विरोध किया करता हूँ। वास्तवमें मेरा यह उद्देश्य बिलकुल नहीं है कि हिन्दुओंकी संख्या बढ़ जाय, जिससे उनको राज्य मिल जाय। मेरा उद्देश्य यह है कि मनुष्यका जल्दी और सुगमतासे कल्याण हो जाय। मैं कल्याणका पक्षपाती हूँ, राज्यका पक्षपाती नहीं।

मेरे मनमें मुसलमानोंके प्रति किञ्चिन्मात्र भी द्वेष नहीं है। परन्तु वे हिन्दुओंका नाश करना चाहते हैं, इसलिये उनकी क्रिया मेरेको अच्छी नहीं लगती। कोई मेरेसे वैर, द्वेष रखनेवाला हो, मेरा बुरा करनेवाला हो, वह भी अगर मेरेसे अपने कल्याणकी बात पूछे तो मैं उसको वैसे ही बड़े प्रेमसे कल्याणका उपाय बताऊँगा, जैसे मैं अपनेमें श्रद्धा-प्रेम रखनेवालेको बताया करता हूँ। अगर कोई मुसलमान हृदयसे अपने कल्याणका उपाय पूछे तो मैं सबसे पहले उसको बताऊँगा, पीछे हिन्दूको बताऊँगा। मेरा कभी किसीसे भेदभाव रखनेका विचार है ही नहीं।

जीवमात्र परमात्माका अंश है। अत: मेरा जो स्वरूप है, वही-का-वही स्वरूप मुसलमानोंका भी है। जैसे मेरा स्वरूप परमात्माका अंश है, ऐसे ही मुसलमानोंका स्वरूप भी परमात्माका अंश है। अगर मैं उनसे वैर करता हूँ तो वास्तवमें अपने स्वरूपसे तथा अपने इष्टसे वैर करता हूँ। कारण कि जो दूसरे सम्प्रदायकी निन्दा करते हैं, वे वास्तवमें अपने सिद्धान्तका अपमान करते हैं। जैसे—कोई विष्णुका भक्त है और वह शंकरकी निन्दा करता है तो वह समझता है कि विष्णुकी महिमा बढ़ा रहा हूँ और मेरा विष्णुमें अनन्यभाव है। परन्तु वास्तवमें शंकरकी निन्दा करनेसे यह सिद्ध होता है कि शंकर और शंकरके भक्तोंमें विष्णु नहीं है। अत: दूसरेके इष्टदेवकी निन्दा करनेवाला वास्तवमें अपनी ही हानि करता है, अपने ही इष्टदेवको कमजोर सिद्ध करता है। ऐसे ही अगर मैं मुसलमानोंकी निन्दा करूँगा तो उनमें मेरा परमात्मा नहीं है—यह सिद्ध होगा। इसलिये मुसलमान मेरे निजस्वरूप, आत्मस्वरूप, अभिन्नस्वरूप हैं। परन्तु मुसलमान हिन्दुओंकी हत्या करते हैं, उनकी स्त्रियोंका अपहरण करते हैं, उनके ग्रन्थोंको जलाते हैं, उनके मन्दिरोंको तोड़ते हैं, उनकी गायोंकी हत्या करते हैं—सब प्रकारसे हिन्दुओंका नाश-ही-नाश करते हैं, यह क्रिया मुझे बहुत बुरी लगती है।

जब देशमें मुसलमानोंका राज्य हुआ, तब उन्होंने कितने हिन्दुओंको मारा, कितनी स्त्रियोंका अपहरण किया, कितने मन्दिरोंको तोड़ा, हिन्दुओंपर कितना अत्याचार किया—इसका कोई पारावार नहीं है! चित्तौड़में मुसलमानोंने इतने हिन्दुओंकी हत्या की थी कि केवल उनके जनेऊ साढ़े चौहत्तर मन इकट्ठे हुए थे! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तो जनेऊ धारण करते हैं, पर शूद्र आदि जनेऊ धारण नहीं करते। ऐसी स्थितिमें कितने हिन्दू मारे गये, इसकी कोई गणना नहीं! लोग अबतक चिट्ठियोंपर साढ़े चौहत्तरका अंक ७४॥—इस प्रकार लिखा करते थे, जिसका अभिप्राय यह होता था कि अन्य कोई व्यक्ति इस चिट्ठीको खोलकर पढ़ेगा तो उसको चित्तौड़के नरसंहारका पाप लगेगा। विचार करें, अगर देशमें पुन: मुसलमानोंकी बहुलता हो गयी और उनका राज्य हो गया तो फिर क्या दशा होगी? वोट-प्रणालीमें जिसकी संख्या अधिक होती है, उसीकी विजय होती है, उसीका राज्य होता है। इसलिये देशमें हिन्दुओंकी वृद्धि अत्यन्त आवश्यक है। इसमें केवल हिन्दुओंका ही नहीं, प्रत्युत सभी धर्मोंके लोगोंका हित निहित है; क्योंकि हिन्दूधर्म प्राणिमात्रका हित चाहता है। हिन्दू ही ‘विश्व-कल्याण-यज्ञ’ के आयोजन करता है। ‘विश्वका कल्याण हो’—यह नारा भी हिन्दू ही लगाता है। घर-घरमें ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत्॥’—ऐसी प्रार्थना भी हिन्दू ही करता है। ‘वासुदेव: सर्वम्’, ‘सब जग ईश्वररूप है’—ऐसी शिक्षा भी हिन्दू ही देता है।

हिन्दुओंके ह्रासका मुख्य कारण

पिछली जनगणनाके परिणामके अनुसार सन् १९८१—१९९१ के बीच भारतमें मुसलमानोंकी जनसंख्या ३२.७६ प्रतिशत और हिन्दुओंकी जनसंख्या २२.७८ प्रतिशत बढ़ी है। इस बातसे देशका हित चाहनेवाली हिन्दू-संस्थाओंका चिन्तित होना स्वाभाविक है। उन संस्थाओंका विचार है कि देशमें मुसलमानोंकी संख्यामें वृद्धि होनेका मुख्य कारण ‘धर्मान्तरण’ है अर्थात् प्रतिवर्ष बहुत बड़ी संख्यामें हिन्दू लोभवश अपना धर्म छोड़कर मुसलमान बन जाते हैं, जिससे मुसलमानोंकी संख्या बढ़ रही है। अत: धर्माचार्योंको, साधु-सन्तोंको यथासम्भव धर्मान्तरण रोकनेका और धर्मान्तरित हुए हिन्दुओंको वापिस हिन्दूधर्ममें लानेका प्रयत्न करना चाहिये। परन्तु वास्तविक बात दूसरी ही है! हिन्दुओंकी संख्या कम होनेका मुख्य कारण ‘परिवार-नियोजन’ है। इस तरफ हिन्दू-संस्थाओंकी दृष्टि नहीं जाती तो यह बड़े आश्चर्य एवं खेदकी बात है!

परिवार-नियोजन अधिकतर हिन्दू ही करते हैं और यह हिन्दुओंपर ही जबर्दस्ती लागू किया जाता है। दूसरी बात, कानूनकी दृष्टिसे हिन्दू एकसे अधिक विवाह नहीं कर सकता, जब कि मुसलमानोंको चार विवाह करनेकी छूट है। इसलिये हिन्दू तो कहते हैं—‘हम दो, हमारे दो’, पर मुसलमान कहते हैं—‘हम पाँच, हमारे पचीस’! जो ईसाई या मुसलमान राज्य पानेके लोभसे अपनी संख्या बढ़ानेमें लगे हुए हैं और इसके लिये हिन्दुओंका धर्म-परिवर्तन भी कर रहे हैं, उनसे क्या यह आशा रखी जा सकती है कि वे परिवार-नियोजनके द्वारा अपनी जनसंख्या बढ़नेसे रोकेंगे?

परम्परासे मैंने एक बात सुनी है कि कुछ समय पहले दिल्लीकी एक मस्जिदमें मुसलमानोंकी सभा हुई। उसमें एक मुस्लिम नेताने कहा कि मुसलमानोंको अधिक बच्चे पैदा करने चाहिये। यह सुनकर एक मुसलमान बोला कि हम गरीब हैं, अधिक बच्चोंका पालन कैसे करेंगे? तो उस नेताने उत्तर दिया कि अभी आपलोग थोड़ा कष्ट सह लो, पीछे हिन्दुओंकी सम्पत्ति हमारी ही तो होगी! उसके कथनका अभिप्राय यह था कि गरीब हिन्दुओंको तो हम युक्तिसे मुसलमान बना लेंगे और धनी हिन्दू परिवार-नियोजन करके धीरे-धीरे अपने-आप खत्म हो जायँगे। आजकल वोटका जमाना है। जिसकी संख्या अधिक होगी, उसीका राज्य होगा।

मैं लगभग उन्तीस-तीस वर्षोंसे परिवार-नियोजनके विरुद्ध बोल रहा हूँ। परन्तु अभीतक हिन्दू-संस्थाओंने इस विषयपर थोड़ा भी गम्भीरतापूर्वक विचार नहीं किया अथवा उनको मेरी बात जँची ही नहीं! परिवार-नियोजनके द्वारा परिश्रम करके, समय खर्च करके, रुपये खर्च करके, तरह-तरहके उपायोंके द्वारा लाखों-करोड़ोंकी संख्यामें हिन्दुओंको पैदा होनेसे रोका जा रहा है। परन्तु इस तरफ ध्यान न देकर हिन्दुओंकी कम होती जनसंख्या और मुसलमानोंकी बढ़ती जनसंख्या पर चिन्ता प्रकट की जा रही है—यह आश्चर्यकी बात है। अगर हिन्दुओंकी घटती जन्मदर (अल्पमत) चिन्ताका विषय है, तो फिर परिवार-नियोजनके द्वारा घरमें खुली हिन्दुओंकी खानको बन्द करनेकी चेष्टा क्यों की जा रही है? अगर परिवार-नियोजन (कम जनसंख्या) अभीष्ट है तो फिर धर्मान्तरित लोगोंको पुन: हिन्दू बनाकर हिन्दुओंकी जनसंख्या बढ़ानेका परिश्रम क्यों किया जा रहा है?

धर्मान्तरित हिन्दुओंको पुन: हिन्दूधर्ममें लानेमें अनेक कठिनाइयोंका सामना करना पड़ता है, परिश्रम करना पड़ता है, खर्चेके लिये बहुत रुपयोंकी व्यवस्था करनी पड़ती है, बहुत समय लगाना पड़ता है। धर्मान्तरित लोग वापिस हिन्दू बन भी जायँ तो उनसे हिन्दुओंको कोई विशेष लाभ नहीं होता। कारण कि जिनका अन्त:करण इतना अशुद्ध है कि अपने सुखभोग, स्वार्थके लिये अपने धर्मका भी त्याग कर देते हैं, वे यदि वापिस हिन्दूधर्ममें आ भी जायँ तो क्या निहाल करेंगे? परन्तु जो हिन्दू जन्म ले रहे हैं, उनको न रोकनेमें कोई कठिनता नहीं, कोई परिश्रम नहीं, कोई खर्चा नहीं। धर्मान्तरण रोकनेके लिये जो धन खर्च किया जाता है, वह धन हिन्दू बालकोंके पालन-पोषण, शिक्षा आदिमें लगाया जा सकता है। जो हिन्दुओंके घरोंमें जन्म लेंगे, उनमें हिन्दूधर्मके संस्कार स्वाभाविक एवं स्थायीरूपसे पड़ेंगे। धर्मान्तरित लोगोंको वापिस हिन्दू बनाना अपने हाथकी बात भी नहीं है। जो अपने हाथकी बात नहीं है, उसके लिये उद्योग करना और जो (हिन्दुओंको जन्म देना) अपने हाथकी बात है, उसको रोकनेका उद्योग करना बुद्धिमानीका काम नहीं है।

वास्तवमें परिवार-नियोजन-कार्यक्रमसे हिन्दुओंका जितना नुकसान हुआ है, उतना नुकसान मुसलमानों और ईसाइयोंने भी कभी नहीं किया और वे कर सकेंगे भी नहीं! जितने हिन्दू धर्मान्तरित हुए हैं, उससे कई गुना अधिक हिन्दू जन्म लेनेसे रोके गये हैं। जनवरी ८, १९९१ में समाचार-पत्रोंमें छपा था कि देशमें परिवार-नियोजन-कार्यक्रमसे अबतक लगभग बारह करोड़ बच्चोंका जन्म रोका गया है। यह जानकारी तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्रीने राज्यसभामें दी थी। उस समय तो परिवार-नियोजन-कार्यक्रमोंमें बहुत अधिक तेजी नहीं थी। उसके बादके वर्षोंमें इस कार्यक्रममें बहुत तेजी आयी है। एक बच्चेका भी जन्म रोकनेसे आगे उससे होनेवाली संतानोंका जन्म भी स्वत: रुक जाता है। अत: धर्मान्तरणके घाटेकी पूर्ति तो हो सकती है, पर परिवार-नियोजनके घाटेकी पूर्ति किसी प्रकार हो ही नहीं सकती, असम्भव ही है।

धर्मान्तरित लोग तो वापिस हिन्दूधर्ममें आ सकते हैं, पर जिनका जन्म रोका गया है, वे वापिस हिन्दुओंके यहाँ जन्म न लेकर मुसलमानों और ईसाइयोंके यहाँ ही जन्मेंगे। कारण कि भगवान् ने कृपापूर्वक जिन जीवोंको अपना कल्याण करनेके लिये मनुष्य-शरीर दिया है, उनको हिन्दूलोग अपने यहाँ नहीं आने देंगे तो फिर वे मुसलमानों और ईसाइयोंके यहाँ ही जन्मेंगे। अगर हिन्दू उनके विशेष ऋणानुबन्धसे अपने यहाँ होनेवाले जन्मको रोकेंगे तो वे सामान्य ऋणानुबन्धसे विधर्मियोंके यहाँ जन्मेंगे। कारण कि हिन्दुओंका ज्यादा सम्बन्ध मुसलमानों और ईसाइयोंसे रहता है; उनकी बनायी वस्तुओंसे वे सुख-आराम लेते हैं; अत: उनके साथ ऋणानुबन्ध रहनेसे वहीं उनका जन्म होगा। तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य-शरीरमें आनेवाले जीवोंको अपने यहाँ आनेसे रोककर हिन्दूलोग मुसलमानों और ईसाइयोंकी संख्याको ही तीव्र गतिसे बढ़ा रहे हैं। इसलिये वास्तवमें परिवार-नियोजनके द्वारा हिन्दूलोग मूल-रूपसे मुसलमानों और ईसाइयोंकी ही संख्या बढ़ानेका उद्योग कर रहे हैं। सन्तति-निरोध करके वे असली (जन्मसे ही) मुसलमान और ईसाई पैदा करनेमें सहायता दे रहे हैं और नकली (धर्मान्तरण करके) मुसलमान और ईसाई बननेवालोंको रोकनेका प्रयास कर रहे हैं। कितने आश्चर्यकी बात है!

कृत्रिम सन्तति-निरोधसे हानि

सब दृष्टियोंसे प्राणी-पदार्थोंके उत्पादन, वृद्धि और संरक्षणमें लाभ-ही-लाभ है और उनके ह्रास अथवा नाशमें हानि-ही-हानि है। किसी भी प्राणी और पदार्थका ह्रास अथवा नाश समष्टि शक्ति (ईश्वर अथवा प्रकृति) के अधीन है, व्यष्टि मनुष्यके अधीन नहीं है। ईश्वर अथवा प्रकृतिके विधानमें हस्तक्षेप करना मनुष्यकी अनधिकार चेष्टा है, जिसका परिणाम भयंकर विनाशकारी होगा।

पालतू पशुओंमें कुत्ता, बिल्ली, घोड़ा, गधा, ऊँट और जंगली पशुओंमें सियार, लोमड़ी आदि असंख्य जातिके पशु हैं, जो परिवार-नियोजन नहीं करते। कुत्ते, बिल्ली, सूअर आदिके एक-एक बारमें अनेक बच्चे होते हैं। परन्तु परिवार-नियोजन न करनेसे क्या उनकी संख्या बढ़ गयी? क्या उन्होंने बहुत-सी जगह रोक ली? फिर उनकी संख्याका नियन्त्रण कौन करता है? जो उनकी संख्याका नियन्त्रण करता है, वही मनुष्योंकी संख्याका भी नियन्त्रण करता है।

भोग-भोगनेसे और ऑपरेशनसे, कृत्रिम गर्भपातसे शरीर स्वाभाविक कमजोर होता है तथा आयुका ह्रास होता है। अत: जल्दी मरनेके दो रामबाण उपाय हैं—भोग-भोगना और ऑपरेशन (नसबंदी आदि), गर्भपात आदि करवाना। आश्चर्यकी बात है कि मरना तो चाहते नहीं, पर उद्योग मरनेका ही कर रहे हैं! घरमें आग लगाकर हर्षित होते हैं कि अहा! कितना बढ़िया प्रकाश हो रहा है कि हाथकी एक-एक रेखा साफ दीख रही है! जब परिणाम सामने आयेगा, तब होश होगा!

मनुष्यको अपना शरीर और रुपये—दोनों बहुत प्यारे लगते हैं और इनको वह बहुत महत्त्व देता है। गर्भपात करवानेसे शरीर भले ही कमजोर हो जाय और रुपये भले ही खर्च हो जायँ, फिर भी गर्भपातरूपी महान् पाप करते हैं—यह कितने पतनका चिह्न है! मनुष्य रुपये पैदा करता है, रुपये मनुष्यको पैदा नहीं करते। उन रुपयोंको खर्च करके उनके उत्पादक (मनुष्य) का नाश कर देना कितनी बेसमझी है!

गर्भ-स्थापन कर सकनेके सिवाय कोई पुरुषत्व नहीं है और गर्भ-धारण कर सकनेके सिवाय कोई स्त्रीत्व नहीं है। पुरुषत्वके बिना पुरुष और स्त्रीत्वके बिना स्त्री निस्तत्त्व, नि:सार है। पुरुष और स्त्रीमें जो तत्त्व, सार है, उसीको वर्तमानमें नष्ट कर रहे हैं! अगर पुरुषमें पुरुषत्व न रहे और स्त्रीमें स्त्रीत्व न रहे तो वे मात्र भोगी ही रहे, मनुष्य रहे ही नहीं। पुरुष भोगी बनकर लम्पट हो गया और स्त्री भोग्या बनकर वेश्या हो गयी! पुरुष पिता न बनकर लम्पट बन जाय और स्त्री माता न बनकर वेश्या बन जाय—इससे अधिक पतन और क्या हो सकता है? मनुष्य यदि मनुष्यको पैदा न कर सके तो वह मनुष्य क्या रहा, एक नाटकीय जीव हो गया। उससे तो पशु अच्छे हैं, जो पशुओंको पैदा तो कर सकते हैं!

गीतामें आसुरी मनुष्योंके लिये आया है—

कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता:॥

(१६।११)

‘आसुरी सम्पदावाले मनुष्य पदार्थोंका संग्रह और उनका भोग करनेमें ही लगे रहते हैं और ‘जो कुछ है, वह इतना ही है’—ऐसा निश्चय करनेवाले होते हैं।’

आजकल ऐसे ही आसुरी लोगोंकी प्रधानता हो रही है! उनका यह भाव रहता है कि देशका चाहे नाश हो जाय, पर हम सुख भोग लें और संग्रह कर लें। वे लोग अपने सुखके लिये अपनी सन्तानका भी नाश कर देते हैं। उनकी केवल वर्तमानके सुखपर ही दृष्टि है, भविष्यमें भले ही दु:ख पाना पड़े! परलोकमें कितना भयंकर दु:ख पाना पड़ेगा, इसका तो कहना ही क्या है, इस लोकमें कितना दु:ख भोगना पड़ेगा, इसकी भी परवाह नहीं है। जिसका मरना निश्चित है, उसके भरोसे सन्तति-निरोध करा लेते हैं, कितनी बेसमझीकी बात है! अभी एक-दो सन्तान है, वह अगर मर जाय तो क्या दशा होगी—इस तरफ खयाल ही नहीं है।

परिवार-नियोजन-कार्यक्रमसे लोगोंका चरित्र भ्रष्ट हो रहा है। सन्तति-निरोधके कृत्रिम उपायोंका प्रचार होनेसे समाजमें व्यभिचारकी वृद्धि हो रही है। कुँआरी लड़कियों और विधवाओंको भी गर्भ रोकने अथवा गिरानेका उपाय मिलनेसे उनका भी पतन हो रहा है। अगर सरकार परिवार-नियोजन करवाना ही चाहती है तो उसे लोगोंको भोगासक्तिके लिये प्रोत्साहित न करके संयम रखने, ब्रह्मचर्यका पालन करनेके लिये प्रोत्साहित करना चाहिये। लोगोंमें पहलेसे ही भोगासक्तिकी आग लगी हुई है, फिर नसबन्दी, निरोध आदि कृत्रिम उपायोंके प्रचारसे उस आगमें और घी डालना कहाँतक उचित है? अगर संयम, ब्रह्मचर्य आदिका प्रचार किया जाय तो लोगोंका स्वास्थ्य भी सुधरेगा, वे भोगी, प्रमादी, चरित्रहीन, अकर्मण्य न बनकर सच्चरित्र और परिश्रमी बनेंगे, जिससे देश भीतरसे खोखला न होकर मजबूत बनेगा। विचार करें, चरित्र मूल्यवान् है या पैसा? अनेक लोगोंने धर्मकी रक्षाके लिये प्राणोंका भी त्याग कर दिया तो धर्म मूल्यवान् हुआ या शरीर?* अँग्रेजीकी एक प्रसिद्ध कहावत है—‘धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया, चरित्र गया तो सब कुछ गया।’ चरित्र-नाशसे बढ़कर देशका और पतन क्या होगा?