सर्वश्रेष्ठ साधन
भगवान् की प्राप्ति करानेवाले तीन साधन हैं—
१. जगत् में भगवान् को देखना—‘यो मां पश्यति सर्वत्र’ (गीता ६।३०)।
२. भगवान् में जगत् को देखना—‘सर्वं च मयि पश्यति’ (गीता ६।३०)।
३. जगत् को भगवत्स्वरूप देखना—‘वासुदेव: सर्वम्’ (गीता ७।१९)।
—इन तीनोंमें शीघ्र भगवत्प्राप्ति करानेवाला सर्वश्रेष्ठ साधन है—जगत् को भगवत्स्वरूप देखना अर्थात् सब कुछ भगवान् ही हैं—ऐसा स्वीकार करना। यह सर्वश्रेष्ठ इसलिये है कि जो भाव (वासुदेव: सर्वम्) पहलेके दो साधनोंके अन्तमें होता है, वह भाव इस (तीसरे) साधनमें आरम्भसे ही रहता है। श्रीमद्भागवतमें आया है—
अयं हि सर्वकल्पानां सध्रीचीनो मतो मम।
मद्भाव: सर्वभूतेषु मनोवाक्कायवृत्तिभि:॥
(११।२९।१९)
‘मेरी प्राप्तिके जितने साधन हैं, उनमें मैं सबसे श्रेष्ठ साधन यही समझता हूँ कि समस्त प्राणियों और पदार्थोंमें, मन, वाणी तथा शरीरके समस्त बर्ताव (व्यवहार)में मेरी ही भावना की जाय।’
उपनिषदोंमें इस बातको समझनेके लिये तीन दृष्टान्त दिये गये हैं—सोनेका, लोहेका और मिट्टीका। जैसे, सोनेके अनेक गहने होते हैं। उन गहनोंकी अलग-अलग आकृति, नाम, रूप, तौल, उपयोग, मूल्य आदि होते हैं, पर उन सबमें सोना एक ही होता है। सोनेके सिवाय उनमें कुछ नहीं होता। लोहेके अनेक अस्त्र-शस्त्र होते हैं, पर उनमें लोहेके सिवाय कुछ नहीं होता। ऐसे ही मिट्टीके अनेक बर्तन होते हैं, पर उसमें मिट्टीके सिवाय कुछ नहीं होता। अत: जैसे सोनेसे बने हुए गहनोंको सोनारूपसे देखना है, लोहेसे बने हुए अस्त्र-शस्त्रोंको लोहारूपसे देखना है और मिट्टीसे बने हुए बर्तनोंको मिट्टीरूपसे देखना है, ऐसे ही परमात्मासे उत्पन्न हुई सृष्टिको परमात्मारूपसे देखना है। अत: यह सब जगत् परमात्माका स्वरूप है—इस बातको ठीक समझनेके लिये यहाँ विचार किया जाता है।
संसारकी जितनी भी वस्तुएँ हैं, उन सबके मूलमें एक अनुत्पन्न वस्तु है, जिसको मनुष्य बना नहीं सकता। जैसे, हम गेहूँकी कई तरहकी चीजें बना सकते हैं, पर गेहूँका दाना नहीं बना सकते, चनोंकी कई चीजें बना सकते हैं, पर चना नहीं बना सकते, आलूकी कई तरहकी चीजें बना सकते हैं, पर आलू नहीं बना सकते। एक मनुष्यशरीरसे कई मनुष्य पैदा हो सकते हैं, पर जिनसे शरीर पैदा होता है, वे रज-वीर्य हम नहीं बना सकते। तात्पर्य है कि जितनी भी वस्तुएँ हैं, उनकी मूलभूत धातु (बीज) को बड़ा-से-बड़ा वैज्ञानिक भी नहीं बना सकता। उन वस्तुओंमें हम परिवर्तन कर सकते हैं, दोको परस्पर मिला सकते हैं। पेड़-पौधोंकी कलम करके दूसरा फल लगा सकते हैं, उसमें विकृति पैदा कर सकते हैं, पर उसके मूल तत्त्वको नहीं बना सकते। कारण कि मूल तत्त्व स्वत:सिद्ध है। वह मनुष्यका बनाया हुआ नहीं है, प्रत्युत भगवान् का बनाया हुआ है*। वे भगवान् सम्पूर्ण संसारके आदि बीज हैं। भगवान् कहते हैं—
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥
(गीता १०। ३९)
‘हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणियोंका जो बीज है, वह बीज मैं ही हूँ। कारण कि मेरे बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है अर्थात् चर-अचर सब कुछ मैं ही हूँ।’
सांसारिक बीज तो वृक्षसे पैदा होता है, पर भगवान् पैदा नहीं होते। इसलिये भगवान् ने अपनेको ‘सनातन बीज’ कहा है—
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्॥
(गीता ७। १०)
सांसारिक बीज तो वृक्षको पैदा करके स्वयं नष्ट हो जाता है, पर भगवान् अनन्त सृष्टियोंको पैदा करके भी स्वयं ज्यों-के-त्यों ही रहते हैं। इसलिये भगवान् ने अपनेको ‘अव्यय बीज’ कहा है—
प्रभव: प्रलय: स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।
(गीता ९। १८)
तात्पर्य है कि भगवान् सम्पूर्ण जगत् के आदिमें भी रहते हैं और अन्तमें भी रहते हैं। जो आदि और अन्तमें रहता है, वही मध्य (वर्तमान)में भी होता है—यह सिद्धान्त है। जैसे, अनेक तरहकी चीजें मिट्टीसे पैदा होती हैं, मिट्टीमें ही रहती हैं और अन्तमें मिट्टीमें ही लीन हो जाती हैं। ऐसे ही संसारमात्रके जितने भी बीज हैं, वे सब भगवान् से ही पैदा होते हैं, भगवान् में ही रहते हैं और अन्तमें भगवान् में ही लीन हो जाते हैं। तात्पर्य है कि सांसारिक बीज तो उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं, पर भगवान् रूप अविनाशी बीज आदि, मध्य और अन्तमें ज्यों-का-त्यों रहता है। अत: वर्तमानमें संसाररूपसे भगवान् ही हैं। भगवान् के सिवाय कुछ नहीं है।
प्रश्न—वर्तमानमें तो पञ्चभूतोंसे बना हुआ जड संसार ही प्रत्यक्षरूपसे दीख रहा है, जो कि उत्पत्ति-विनाशशील है। अत: इसको अविनाशी भगवत्स्वरूप कैसे समझें?
उत्तर—बीजसे जितनी चीजें पैदा होती हैं, वे सब बीजरूप ही होती हैं। जैसे, गेहूँसे पैदा होनेवाली खेतीको भी गेहूँ ही कहते हैं। किसानलोग कहते हैं कि गेहूँकी खेती बहुत अच्छी हुई है, देखो, खेतमें गेहूँ खड़े हैं, गेहूँसे खेत भरा है! परन्तु कोई शहरमें रहनेवाला व्यापारी हो, वह उसको गेहूँ कैसे मान लेगा? वह कहेगा कि मैंने बोरे-के-बोरे गेहूँ खरीदा और बेचा है, क्या मैं नहीं जानता कि गेहूँ कैसा होता है? यह तो घास है, डंठल और पत्ती है, यह गेहूँ नहीं है। परन्तु खेती करनेवाला जानकार आदमी तो यही कहेगा कि यह वह घास नहीं है, जो पशु खाया करते हैं। यह तो गेहूँ है। खेतीको गाय खा जाती है तो कहते हैं कि गाय हमारा गेहूँ खा गयी, जबकि उसने गेहूँका एक दाना भी नहीं खाया। खेतमें भले ही गेहूँका एक दाना भी न हो, पर यह गेहूँ है—इसमें सन्देह नहीं है। कारण कि यह पहले भी गेहूँ ही था, अन्तमें भी गेहूँ रहेगा, अत: बीचमें खेतीरूपसे भी गेहूँ ही है। अभी तो यह हरी-हरी घास दीखती है, पर बादमें पकनेपर इससे गेहूँ ही निकलेगा। इसी तरह संसारके पहले भी परमात्मा थे—‘सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्’ (छान्दोग्य० ६।२।१), अन्तमें भी परमात्मा ही रहेंगे—‘शिष्यते शेषसंज्ञ:’ (श्रीमद्भा० १०।३।२५)। अत: बीचमें भी सब कुछ परमात्मा ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’ (गीता ७।१९), ‘सदसच्चाहम्’ (गीता ९।१९)।
भगवान् ने सम्पूर्ण सृष्टिकी रचना अपनेमेंसे ही की है, अत: भगवान् के सिवाय और कुछ भी नहीं है। जो मनकी कल्पनामें आता है और जो कल्पनामें नहीं आता, वह सब भगवत्स्वरूप ही है। जाग्रत् और स्वप्नमें जो कुछ देखते हैं, वह सब केवल भगवान् ही हैं, सत् भी भगवान् हैं, असत् भी भगवान् हैं और सत्-असत् से परे भी भगवान् ही हैं—‘सदसत्तत्परं यत्’ (गीता ११। ३७)। जिनके चरण-चिह्नोंको भगवान् ने भी अपने हृदयमें धारण किया है, ऐसे पूज्य ब्राह्मण और अत्यन्त नीच श्वपाक (चाण्डाल)—दोनों ही भगवान् के स्वरूप हैं। जैसे सोनेसे बने गणेशजीकी लोग पूजा करते हैं और सोनेसे बने चूहेकी पूजा नहीं करते, पर सुनारकी दृष्टिमें दोनोंका एक ही मूल्य (भाव) है, ऐसे ही ब्राह्मण और चाण्डाल, साधु और कसाई, गाय और कुत्ता, हाथी और चींटी, मिट्टीका ढेला और स्वर्ण—ये सब जाति, गुण, कर्म आदिसे विषम होते हुए भी भक्तकी दृष्टिमें सम अर्थात् भगवत्स्वरूप ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’ तात्पर्य है कि जैसे शरीरके सब अंगोंसे यथायोग्य व्यवहार करते हुए भी उनमें आत्मबुद्धि एक ही रहती है तथा उन अंगोंकी पीड़ा दूर करने तथा उनको सुख पहुँचानेकी चेष्टा भी समान ही रहती है, ऐसे ही ‘जैसा देव, वैसी पूजा’ के अनुसार ब्राह्मण और चाण्डाल आदि सबसे शास्त्रमर्यादाके अनुसार यथायोग्य व्यवहार करते हुए भी भक्तकी
भगवद्बुद्धिमें तथा उनका दु:ख दूर करने और उनको सुख पहुँचानेकी चेष्टामें कोई अन्तर नहीं आता।
संसारमें जो परिवर्तन दीखता है, वह भगवान् की ही एक झलक है, आभा है, स्फूर्ति है, लीला है। संसारी मनुष्य भगवान् की उस झलकको देखकर उसमें फँस जाता है। भोगबुद्धिके कारण उसकी दृष्टि परिवर्तनशील संसारमें ही अटक जाती है, भगवान् तक नहीं जाती। जब सत्सङ्गके प्रभावसे वह संसारसे विमुख होकर भगवान् के सम्मुख हो जाता है, तब भगवान् विशेष कृपा करके उसको अद्वैत भक्ति अर्थात् भगवद्भाव प्रदान करते हैं।
सब कुछ भगवान् ही हैं—इससे बढ़कर कोई साधन नहीं है, कोई भजन नहीं है। इस भगवद्भावसे भगवत्प्राप्ति अत्यन्त सुगम हो जाती है। इसी भगवद्भावका उपदेश देते हुए भगवान् ब्रह्माजीसे कहते हैं—
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम्।
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥
(श्रीमद्भा० २।९।३२)
‘सृष्टिके पूर्व भी मैं ही था, मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं था और सृष्टिके उत्पन्न होनेके बाद जो कुछ भी यह दृश्यवर्ग है, वह मैं ही हूँ, जो सत्, असत् और उससे परे है, वह सब मैं ही हूँ तथा सृष्टिके बाद भी मैं ही हूँ एवं इन सबका नाश हो जानेपर जो कुछ बाकी रहता है, वह भी मैं ही हूँ।’
गीतामें भी भगवान् ने कहा है—
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।
(१०।२०)
‘सम्पूर्ण प्राणियोंके आदिमें भी मैं ही हूँ, मध्यमें भी मैं ही हूँ और अन्तमें भी मैं ही हूँ।’
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।
(१०।३२)
‘हे अर्जुन! सम्पूर्ण सृष्टिके आदिमें भी मैं ही हूँ, मध्यमें भी मैं ही हूँ और अन्तमें भी मैं ही हूँ।’
इस प्रकार परमात्मासे पैदा हुई सृष्टिको परमात्माका स्वरूप जानना ज्ञान है। जबतक अपनी और संसारकी अलग सत्ता दीखती है, तबतक अज्ञान है। जैसे, गेहूँके खेतको गेहूँरूपसे देखना ज्ञान है और घासरूपसे देखना अज्ञान है।
प्रश्न—गेहूँसे गेहूँ ही पैदा होता है, बाजरेसे बाजरा ही पैदा होता है, फिर परमात्मासे तरह-तरहके स्थावर-जङ्गम प्राणी कैसे पैदा होते हैं?
उत्तर—गेहूँ, बाजरा आदि तो लौकिक बीज हैं, पर भगवान् अलौकिक और विलक्षण (सनातन और अव्यय) बीज हैं। अत: एक ही भगवान् से तरह-तरहकी सृष्टि पैदा होती है। तीन लोक, चौदह भुवन, जड-चेतन, स्थावर-जङ्गम, थलचर-जलचर-नभचर, जरायुज-अण्डज-स्वेदज-उद्भिज्ज, सात्त्विक-राजस-तामस, मनुष्य, देवता, पशु, पक्षी,भूत-प्रेत-पिशाच, ब्रह्मराक्षस आदि सब-का-सब उस विलक्षण बीजकी ही खेती है! गीतामें भगवान् कहते हैं—
‘मत्त: परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति’
(७।७)
‘मेरे सिवाय इस संसारका दूसरा कोई कारण है ही नहीं।’
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।
मत्त एवेति तान्विद्धि...................................॥
(७।१२)
‘जितने भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं, वे सब मेरेसे ही होते हैं—ऐसा समझ।’
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधा:।
(१०। ५)
‘प्राणियोंके (बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह आदि) अनेक प्रकारके और अलग-अलग भाव मेरेसे ही होते हैं।’
‘मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च’
(१५।१५)
‘स्मृति, ज्ञान और अपोहन (संशय आदि दोषोंका नाश) मेरेसे ही होता है।’
श्रीमद्भागवतमें भगवान् कहते हैं—
मनसा वचसा दृष्टॺा गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियै:।
अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमञ्जसा॥
(११।१३।२४)
‘मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे जो कुछ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि) ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। अत: मेरे सिवाय और कुछ भी नहीं है—यह सिद्धान्त आप विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें अर्थात् स्वीकार कर लें।’
तात्पर्य है कि शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे जो भी सात्त्विक राजस और तामस भाव, क्रिया, पदार्थ आदि ग्रहण किये जाते हैं, वे सब भगवान् ही हैं। मनकी स्फुरणामात्र, चाहे अच्छी हो या बुरी, भगवान् ही है। संसारमें अच्छा-बुरा, शुद्ध-अशुद्ध, शत्रु-मित्र, दुष्ट-सज्जन, पापात्मा-पुण्यात्मा, अपना-पराया आदि जो कुछ भी देखने, सुनने, कहने, सोचने, समझने आदिमें आता है, वह सब केवल भगवान् ही हैं। शरीर-शरीरी, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ, परा-अपरा, क्षर-अक्षर—सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान् के सिवाय कहीं कुछ भी नहीं है—‘मया ततमिदं सर्वम्’ (गीता ९।४)। जब सब कुछ भगवान् ही हैं, तो फिर उसमें ‘मैं’ (व्यक्तित्व) कहाँसे आया? ‘मैं’ है ही नहीं, केवल तू-ही-तू है—
तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझमें रही न हूँ।
वारी फेरी बलि गई, जित देखूँ तित तूँ॥
जैसे ज्ञानकी दृष्टिसे गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं— ‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ (गीता ३।२८), ऐसे ही भक्तिकी दृष्टिसे भगवान् की वस्तु ही भगवान् के अर्पित हो रही है। जैसे कोई गङ्गाजलसे गङ्गाका पूजन करे, दीपकसे सूर्यका पूजन करे, पृथ्वीसे उत्पन्न होनेवाले पुष्पोंसे पृथ्वीका पूजन करे, ऐसे ही भगवान् की वस्तुसे भगवान् का ही पूजन हो रहा है। वास्तवमें देखा जाय तो पूज्य भी भगवान् हैं, पूजाकी सामग्री भी भगवान् हैं, पूजा भी भगवान् हैं तथा पूजक भी भगवान् हैं! भगवान् कहते हैं—
अहं क्रतुरहं यज्ञ: स्वधाहमहमौषधम्।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥
(गीता ९।१६)
‘क्रतु भी मैं हूँ, यज्ञ भी मैं हूँ, स्वधा भी मैं हूँ, औषध भी मैं हूँ, मन्त्र भी मैं हूँ, घृत भी मैं हूँ, अग्नि भी मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ।’
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
(गीता ४। २४)
‘जिस यज्ञमें अर्पण भी ब्रह्म है, हवि भी ब्रह्म है, ब्रह्मरूप कर्ताके द्वारा ब्रह्मरूप अग्निमें आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म है और ऐसे यज्ञको करनेवाले जिस मनुष्यकी ब्रह्ममें ही कर्म-समाधि हो गयी है, उसके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य फल भी ब्रह्म ही है।’
इस प्रकार सब जगह भगवान् को देखनेसे साधकके राग-द्वेष रहते ही नहीं! कारण कि जब सब कुछ भगवान् ही हैं, तो फिर राग-द्वेष कौन करे और किससे करे?
उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥
(मानस, उत्तर० ११२ ख)
एक मार्मिक बात है कि ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—ऐसा अनुभव करनेके लिये क्रिया और पदार्थकी आवश्यकता नहीं है, प्रत्युत विवेक अथवा भावकी आवश्यकता है। विवेकमें खोज होती है और भावमें स्वीकृति अथवा मान्यता होती है। विवेक और भाव—दोनों ही अन्तमें तत्त्वज्ञानमें परिणत हो जाते हैं। ज्ञानमार्गमें विवेककी प्रधानता है और भक्तिमार्गमें भावकी प्रधानता है। ज्ञानमार्गमें जानकर मानते हैं और भक्तिमार्गमें मानकर जानते हैं। दोनोंका परिणाम एक ही होता है। तात्पर्य है कि तत्त्वसे जाननेका जो परिणाम होता है, वही परिणाम दृढ़तासे माननेका भी होता है*। भक्तिमार्गमें पहले भक्त ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—ऐसा दृढ़तासे मान लेता है, फिर वह इसको तत्त्वसे जान लेता है अर्थात् उसको ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—ऐसा अनुभव हो जाता है।
ज्ञानयोगकी दृष्टिसे सभी गुण (सत्त्व-रज-तम) प्रकृतिसे उत्पन्न होते हैं—‘सत्त्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसम्भवा:’ (गीता १४।५) और भक्तियोगकी दृष्टिसे सभी गुण भगवान् से उत्पन्न होते हैं—‘ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। मत्त एवेति तान्विद्धि....’ (गीता ७। १२)। इसलिये ज्ञानयोगीकी दृष्टिमें जो कुछ दीखता है, वह सब प्रकृति है१ और जो परिवर्तन हो रहा है, वह गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं। भक्तियोगीकी दृष्टिमें जो कुछ दीखता है, वह सब भगवान् का ही रूप है२ और जो परिवर्तन हो रहा है, वह भगवान् की ही लीला है।
जगत् न तो जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ, भगवत्प्रेमी महापुरुषकी दृष्टिमें है और न भगवान् की दृष्टिमें है। जिसमें जगत् की वासना है अर्थात् जिसने जगत् को सत्ता और महत्ता दे रखी है, उस जीवकी दृष्टिमें ही जगत् है—‘जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७। ५)। यह जगत् की वासना ही जन्म-मरणरूप बन्धनका बीज है—
वासना यस्य यत्र स्यात् स तं स्वप्नेषु पश्यति।
स्वप्नवन्मरणे ज्ञेयं वासना तु वपुर्नृणाम्॥
‘जिस मनुष्यकी जहाँ वासना होती है, उसी वासनाके अनुरूप वह स्वप्न देखता है। स्वप्नके समान ही मरण होता है अर्थात् वासनाके अनुरूप ही अन्तसमयमें चिन्तन होता है और उस चिन्तनके अनुसार ही मनुष्यकी गति होती है।’
इस वासनाको ही गीताने गुणसंग कहा है—‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (१३। २१) ‘गुणोंका संग ही जीवके ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बनता है।’ यदि वासना न हो तो जीवबुद्धि और जगत्-बुद्धिके अभावका तथा भगवान् के भावका अनुभव हो जाता है—‘वासुदेव: सर्वम्’।
ज्ञानमार्गमें साधक विवेकपूर्वक जगत् से असंग होता है और भक्तिमार्गमें साधक भाव (श्रद्धा) पूर्वक जगत् को भगवत्स्वरूप देखता है। सब कुछ भगवान् ही हैं—यह विवेक (विचार)का विषय नहीं है, प्रत्युत भाव (श्रद्धा)का विषय है। इसलिये ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—यह बात भक्तोंकी वाणीमें अधिक आती है।
जबतक सत् और असत्, ब्रह्म और जगत् —दोनों रहते हैं, तबतक विवेक रहता है। असत् की, जगत् की मान्यता मिटनेपर विवेक नहीं रहता, प्रत्युत तत्त्वबोध रहता है। इसलिये विवेकपूर्वक जगत् को अलग करके भगवान् को देखनेसे जगत् की सत्ता रहती है, क्योंकि निषेध उसीका किया जाता है, जिसकी सत्ता मानी है। परन्तु भावपूर्वक जगत् को भगवत्स्वरूप देखनेसे जगत् की स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती। जबतक साधककी दृष्टिमें भगवान् और जगत् दोनों अलग-अलग रहते हैं, तबतक उसके जीवनमें अखण्ड आनन्द नहीं रहता, प्रत्युत कभी आनन्द आता है, कभी नीरसता आती है। कभी साधकको अपने साधनमें बड़ा लाभ दीखता है, कभी दीखता है कि कुछ लाभ नहीं हुआ! अत: सर्वश्रेष्ठ साधन यही है कि साधक जगत् को भगवत्स्वरूप देखे अर्थात् जगत्-रूपसे भगवान् ही हैं—ऐसा देखे।
सब कुछ भगवान् ही हैं—ऐसा अनुभव करनेके लिये साधकको दृढ़तासे यह मान लेना चाहिये कि चाहे मेरी समझमें आये या न आये, अनुभवमें आये या न आये, पर बात यही सच्ची है। उसको बड़ी-से-बड़ी अथवा छोटी-से-छोटी जो भी वस्तु दिखायी दे, वह ऐसा माने कि इसमें पूरे-के-पूरे भगवान् हैं। जैसे जलके एक कणमें और समुद्रमें एक ही जल-तत्त्व परिपूर्ण है, ऐसे ही मिट्टीका ढेला हो या पृथ्वी हो, उसमें भगवान् पूरे-के-पूरे हैं—‘अणोरणीयान्महतो महीयान्’ (कठ० १।२। २०, श्वेता० ३।२०)। ऐसा मानकर वह हर समय मन-ही-मन सबको नमस्कार करता रहे*। ऐसा करनेसे उसको सब जगह भगवान् दीखने लग जायँगे। एक दृष्टिसे देखा जाय तो ज्ञानमार्गमें द्वैतभाव है और भक्तिमार्गमें अद्वैतभाव है। कारण कि ज्ञानमार्गमें प्रकृति और पुरुष, सत् और असत्, ब्रह्म और जगत्, नित्य और अनित्य, जड और चेतन, शरीर और शरीरी, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ आदिका भेद है, पर भक्तिमार्गमें एक भगवान् के सिवाय कुछ नहीं है। ज्ञानमार्गमें तो ब्रह्म सत् और जगत् असत् है—‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’, पर भक्तिमार्गमें सत्-असत् सब कुछ भगवान् ही हैं—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९। १९)। इसलिये ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’—ऐसा मानकर जो भगवान् के शरण हो जाता है अर्थात् अपना स्वतन्त्र अस्तित्व (मैंपन) मिटाकर भगवान् में लीन हो जाता है, उसको भगवान् ने ‘ज्ञानी’ कहा है—‘वासुदेव: सर्वमिति.....ज्ञानवान्मां प्रपद्यते’ (गीता ७। १९)। ऐसे ज्ञानी भक्तको भगवान् ने अपना अत्यन्त प्रिय बताया है—‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रिय:’ (गीता ७। १७) और उसको अपना ही स्वरूप बताया है—‘ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्’ (७। १८)। तात्पर्य यह हुआ कि विवेकसे भी भाव तेज है। अत: भावपूर्वक जगत् को भगवत्स्वरूप देखना सर्वश्रेष्ठ साधन है।