सत्सङ्ग सुननेकी विद्या
सत्सङ्ग सुननेकी भी एक विद्या है। यदि उस विद्याको काममें लिया जाय तो सत्सङ्गसे बहुत लाभ उठाया जा सकता है। अगर किसीको सत्सङ्ग सुननेकी विद्या आ जाय तो वह बहुत बड़ा विद्वान् बन जाय! पढ़ाई करके कोई इतना विद्वान् नहीं बनता, जितना सत्सङ्गसे बनता है। सत्सङ्गमें जैसी पढ़ाई होती है, वैसी पढ़ाई ग्रन्थ पढ़नेसे नहीं होती। ग्रन्थ पढ़नेसे तो एक विषयका ज्ञान होता है, पर सत्सङ्गसे पारमार्थिक और व्यावहारिक सब तरहका ज्ञान होता है, सत्सङ्ग करनेवाला भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, लययोग, राजयोग, अष्टाङ्गयोग, हठयोग आदि अनेक विषयोंसे परिचित हो जाता है। इतना ही नहीं, जिस विषयको सत्सङ्गमें सुना ही नहीं, उस विषयमें भी उसकी बुद्धि काम करने लगती है। जैसे सत्सङ्गमें विवाहकी चर्चा सुनी ही न हो, पर उसमें भी सत्सङ्ग करनेवालेकी बुद्धि काम करेगी। मेरी तो ऐसी धारणा है कि कोई ठीक तरहसे सत्सङ्ग सुनेगा अथवा गीताका ठीक तरहसे अध्ययन करेगा, उसकी बुद्धि किसी विषयमें प्रवेश न करे—यह नहीं हो सकेगा। वह जिस विषयमें चाहे, उसीमें उसकी बुद्धि प्रविष्ट हो जायगी। इसलिये मन लगाकर सत्सङ्ग सुनना चाहिये।
जो प्रत्येक काम मन लगाकर करता है, वही मन लगाकर सत्सङ्ग सुन सकेगा। इसलिये जो भी काम करें, मन लगाकर करें। रसोई बनायें तो मन लगाकर बनायें, भोजन करें तो मन लगाकर करें, शौच-स्नान आदि करें तो मन लगाकर करें। ऐसा करनेसे प्रत्येक काम मन लगाकर करनेका स्वभाव पड़ जायगा। वह स्वभाव पारमार्थिक मार्गमें भी काम आयेगा, जिससे सत्सङ्ग, भजन, ध्यान आदिमें मन लगने लगेगा। इसलिये ऐसा न समझें कि केवल भजन-ध्यान ही मन लगाकर करने हैं, दूसरे काम मन लगाकर नहीं करने हैं। प्रत्येक काम मन लगाकर करना है, जिससे काम भी बढ़िया होगा और स्वभाव भी सुधरेगा। वास्तवमें काम सुधरनेसे इतना लाभ नहीं है, जितना स्वभाव सुधरनेसे लाभ है। स्वभावमें सुधार होनेसे प्रत्येक काममें बुद्धि प्रवेश करेगी, प्रत्येक काम करनेकी विद्या आ जायगी।
यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि जिस कामको लोग वर्षोंसे प्रतिदिन करते आ रहे हैं, उसको भी वे ठीक तरहसे नहीं करते। जैसे, स्त्रियाँ उम्रभर बालकोंको पालते-पालते बूढ़ी हो जाती हैं, पर बालकोंको भोजन कराना प्राय: नहीं आता! बालकको एक साथ ज्यादा परोस दें तो वह थोड़ा खाकर छोड़ देगा, पर थोड़ा-थोड़ा करके परोसें तो वह ज्यादा खा लेगा। इसी तरह वक्ताको प्राय: कहना नहीं आता और श्रोताको प्राय: सुनना नहीं आता। इसका कारण यह है कि प्रत्येक काम मन लगाकर करनेका स्वभाव नहीं है।
कई सज्जन प्रश्न किया करते हैं कि मन कैसे लगे? अत: मन लगानेकी एक सुगम युक्ति बतायी जाती है। चुपचाप बैठ जायँ और मनसे भगवन्नामका जप करें तथा मनसे ही उसकी गिनती करें। हाथमें न तो माला रखें, न अँगुलियोंसे गिनें और न मुँहसे ही बोलें, केवल मनसे ही गिनती करें। इस प्रकार कम-से-कम एक माला (१०८ बार) भगवन्नामका जप करें। गिनतीमें चूकें नहीं। अगर चूक जायँ तो पुन: एकसे शुरू करें। ऐसा करके देखें तो बड़ा लाभ होगा। कुछ लोग केवल तमाशेकी तरह पूछ लेते हैं कि मन कैसे लगे, पर जो उपाय बताया जाता है, उसको करते ही नहीं! किसी व्यक्तिने एक सन्तसे पूछा कि महाराज! मन कैसे लगे? तो उन्होंने पूछा कि तुमने यह प्रश्न मेरेसे ही किया है या पहले और भी किसीसे किया था? उसने कहा कि और भी किसीसे किया था। सन्तने पूछा कि उसने क्या उपाय बताया था? वह बोला कि यह तो मेरेको याद नहीं है। सन्त बोले—तो फिर यही दशा मेरी भी होगी! मेरेसे उपाय पूछकर मेरी फजीती ही करोगे!
कई भाई-बहन सत्सङ्गके समय माला फेरते रहते हैं अथवा कापीमें भगवन्नाम लिखते रहते हैं। अगर तत्परतासे मन लगाकर सत्सङ्ग सुनते हों, पर पूर्वाभ्यासके कारण (स्वभाववश) स्वत: जप होता हो तो कोई बाधा नहीं आती। परन्तु ध्यान एक तरफ ही रहेगा, दो तरफ नहीं। जो कभी सत्सङ्गमें ध्यान रखता है और कभी मालामें ध्यान रखता है, उसको सत्सङ्ग सुनना आता ही नहीं। सत्सङ्गके समय जिसका मन और जगह चला जाता है, घर आदिकी बातें याद आती रहती हैं, वह ठीक तरहसे सत्सङ्ग सुन ही नहीं सकता। स्वर्गाश्रम (ऋषिकेश) में गङ्गाजीके तटपर वटवृक्षके नीचे सत्सङ्ग हो रहा था। वहाँ मैंने भाई-बहनोंसे कहा कि आपलोग ध्यान देकर सुनोगे तो एक ही बात सुन सकोगे, दो बात नहीं सुन सकोगे। मैंने उदाहरण दिया कि अभी गङ्गाजीका शब्द हो रहा है न? वे बोले कि हाँ, हो रहा है। मैंने पूछा कि इतनी देरसे क्या आप गङ्गाजीका शब्द सुन रहे थे? वे बोले—नहीं सुन रहे थे। क्यों नहीं सुन रहे थे? कि मन सत्सङ्ग सुननेमें लगा था। कान भी थे और शब्द भी था, पर मन उस तरफ न रहनेसे वह सुनायी नहीं देता था। इसी तरह श्रोताका मन दूसरी तरफ रहेगा तो वह सत्सङ्ग नहीं सुन सकेगा। जैसे सत्सङ्ग सुनते समय अपने-आप श्वास चलते हैं, नब्ज चलती है, उसमें मन नहीं लगाना पड़ता, ऐसे ही बिना मन लगाये अपने-आप जप होता हो तो सत्सङ्ग सुना जा सकता है। परन्तु सत्सङ्ग सुनते समय कोई जप करना चाहे तो नहीं हो सकता और लिखना तो हो ही नहीं सकता। मेरे विचारसे जिनको घरमें राम-राम लिखनेके लिये समय नहीं मिलता, घरमें काम-धंधा रहता है, वे सोचते हैं कि यहाँ निकम्मे बैठे हैं, कोई काम तो है नहीं, इसलिये यहाँ राम-रामकी कापी भर लें! तात्पर्य यह निकला कि जो सत्सङ्गको फालतू समझते हैं, वे वहाँ बैठकर कापी भरते हैं। ऐसे लोग सत्सङ्ग नहीं सुन सकते।
ध्यानपूर्वक सत्सङ्ग न सुननेसे मन संसारका चिन्तन करने लगता है, जिससे सात्त्विकी वृत्ति नहीं रहती, प्रत्युत राजसी वृत्ति आ जाती है। राजसी वृत्ति आनेसे फिर तत्काल तामसी वृत्ति आ जाती है, जिससे श्रोताको नींद आ जाती है। तात्पर्य है कि मन लगाकर सत्सङ्ग न सुननेसे सात्त्विकी वृत्तिसे सीधे तामसी वृत्ति (नींद) नहीं आती, प्रत्युत क्रमसे सात्त्विकीसे राजसी और राजसीसे तामसी वृत्ति पैदा होती है।
सत्सङ्गके समय श्रोताको चाहिये कि वह अपनी दृष्टि वक्ताके मुखपर रखे। वक्ताके मुखकी तरफ देखते हुए ध्यानपूर्वक सुननेसे उसकी बातें हृदयमें धारण हो जाती हैं। जो कभी इधर और कभी उधर देखते हुए सुनते हैं, उनको सुनना नहीं आता। सुनते समय तत्परतासे मन लगाकर सुनना चाहिये कि वक्ताने किस विषयपर बोलना आरम्भ किया और उसमें कौन-सा दृष्टान्त दिया, कौन-सी युक्ति दी, कौन-सा दोहा या श्लोक कहा आदि-आदि। इस प्रकार मन लगाकर सुननेसे श्रोताको पहले ही यह पता चल जाता है कि अब वक्ता आगे क्या कहेगा? कौन-सा विषय कहेगा?
सत्सङ्गके समय जब वक्ता दुर्गुण-दुराचारके त्यागकी बात कहता है, तब श्रोता दूसरे व्यक्तियोंमें दुर्गुण-दुराचारका चिन्तन करता है और जब वक्ता सद्गुण-सदाचारको ग्रहण करनेकी बात कहता है, तब श्रोता अपनेमें सद्गुण-सदाचारका चिन्तन करने लगता है—इन दोनों बातोंसे सत्सङ्गके समय कुसङ्ग होने लगता है! कारण कि दूसरे व्यक्तिमें अवगुणोंका चिन्तन करनेसे उन अवगुणोंसे तादात्म्य हो जाता है और तादात्म्य होनेसे वे अवगुण अपनेमें स्वत:-स्वाभाविक आने लगते हैं तथा दूसरोंमें दोषदृष्टि करनेका स्वभाव बन जाता है। अपनेमें सद्गुणोंका चिन्तन करनेसे अपनेमें अभिमान आ जाता है, जो अवगुणोंका मूल है। अत: अवगुणोंकी बात सुननेपर श्रोताको यह देखना चाहिये कि मेरेमें कौन-कौनसे अवगुण हैं और मेरेको किन-किन अवगुणोंका त्याग करना है? सद्गुणोंकी बात सुननेसे श्रोताको यह विचार करना चाहिये कि दैवी अर्थात् भगवान् की सम्पत्ति होनेसे सभी सद्गुण भगवान् के हैं और उनकी कृपासे ही अपनेमें आते हैं और आये हैं। ऐसा विचार करते हुए श्रोता भगवान् में तल्लीन हो जाय। भगवान् में तल्लीन होनेसे वे सद्गुण अपनेमें स्वत:-स्वाभाविक आने लगते हैं।
अनुभवी पुरुष यदि किसी विषयका विवेचन करता है तो उसका विवेचन और तरहका (विलक्षण) होता है और जो शास्त्रकी दृष्टिसे विवेचन करता है, उसका विवेचन और तरहका होता है। दोनोंमें बड़ा फर्क होता है। शास्त्रकी दृष्टिसे विवेचन करनेसे वे विषय श्रोताको याद हो जाते हैं। इससे वह श्रोता वक्ता तो बन सकता है, पर उसका जीवन नहीं बदल सकता। परन्तु अनुभवी पुरुषके द्वारा विवेचन करनेसे श्रोताका जीवन बदल जाता है। गीता, रामायण, भागवत आदि सुननेसे, भगवान् की लीलाएँ सुननेसे भी असर पड़ता है। परन्तु वे भी यदि अनुभवी पुरुषके द्वारा, प्रेमी भक्तके द्वारा सुना जाय तो उसमें बड़ी विलक्षणता होती है। भगवान् के भक्तोंके चरित्र पढ़ने, सुनने, कहनेसे स्वाभाविक ही अन्त:करण निर्मल होता है। इसलिये मैं भाई-बहनोंसे बहुत कहा करता हूँ कि आप भक्तोंके चरित्र पढ़ो और बालकोंको भी पढ़ाओ तथा उनसे सुनो। बालक उनको कहानीके रूपमें शौकसे पढ़ेंगे तो उनपर भगवद्भावोंका असर पड़ेगा। भगवान् और उनके भक्तोंके चरित्रोंमें एक विलक्षण शक्ति है। उनको यदि मन लगाकर सुना जाय तो हृदय गद्गद हो जायगा, नेत्रोंमें आँसू आ जायँगे, गला भर जायगा, एक मस्ती आ जायगी! श्रीमद्भागवतमें आया है—
वाग्गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं
रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।
विलज्ज उद्गायति नृत्यते च
मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति॥
(११।१४।२४)
‘जिसकी वाणी मेरे नाम, गुण और लीलाका वर्णन करते-करते गद्गद हो जाती है, जिसका चित्त मेरे रूप, गुण, प्रभाव और लीलाओंका चिन्तन करते-करते द्रवित हो जाता है, जो बारम्बार रोता रहता है, कभी हँसने लग जाता है, कभी लज्जा छोड़कर ऊँचे स्वरसे गाने लगता है और कभी नाचने लग जाता है, ऐसा मेरा भक्त सारे संसारको पवित्र कर देता है।’
अन्त:करणकी जो सूक्ष्म वासना है, वह जैसे भगवच्चरित्रोंको पढ़ने-सुननेसे दूर होती है, वैसे विवेकसे दूर नहीं होती। विवेकपूर्वक गहरे उतरकर वेदान्तके ग्रन्थोंको पढ़नेसे उतना लाभ नहीं होता, जितना लाभ भगवान् तथा उनके भक्तोंके चरित्रोंको मन लगाकर पढ़नेसे होता है। वेदान्तके ग्रन्थोंको मन लगाकर पढ़नेसे विवेक विकसित होता है और भगवान् तथा उनके भक्तोंका चरित्र मन लगाकर पढ़नेसे अन्त:करण निर्मल तथा कोमल होता है। अन्त:करणका कोमल होनेसे स्वत: भगवद्भक्ति होती है। तात्पर्य है कि विवेकमें अन्त:करण पिघलता नहीं, प्रत्युत कठोर रहता है; परन्तु भक्तिमें अन्त:करण पिघलता है, जिससे उनमें भक्तिके नये संस्कार बैठते हैं।
विवेक ‘विचिर् पृथग्भावे’ धातुसे बनता है। तात्पर्य है कि विवेकमें दो चीजें होती हैं; जैसे—सत् और असत्, नित्य और अनित्य, शुभ और अशुभ, कर्तव्य और अकर्तव्य, ग्राह्य और त्याज्य आदि। सत् और असत् के विवेकमें साधक असत् का त्याग करता है। असत् का त्याग करनेपर भी असत् की सूक्ष्म सत्ता बनी रहती है। परन्तु तत्परतापूर्वक भगवान् के चरित्रोंको, स्तोत्रोंको तल्लीन होकर पढ़नेसे एक भगवान् की ही सत्ता रहती है, दूसरी सत्ता नहीं रहती। इसलिये भीतरकी जो सूक्ष्म वासनाएँ हैं, वे भगवान् और उनके भक्तोंके चरित्र पढ़ने-सुननेसे सुगमतापूर्वक नष्ट हो जाती हैं—
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई।
अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥
(मानस, उ० ४९।३)
भूख लगनेपर भोजन जितना गुण करता है, वैसा बिना भूखके नहीं करता; क्योंकि भूखके बिना रस नहीं बनता और रस बने बिना शक्ति नहीं आती। अत: भूखके बिना बढ़िया भोजन भी किस कामका? इसी तरह अगर श्रोतामें जाननेकी भूख हो और वक्ता अनुभवी हो तो श्रोताके अन्त:करणमें वक्ताकी बात प्रविष्ट हो जाती है। श्रोतामें तीव्र जिज्ञासा हो और किसी एक मतका पक्षपात न हो तो सुननेमात्रसे बोध हो जाता है। गीतामें आया है—
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत:॥
(७।३)
‘हजारों मनुष्योंमें कोई एक वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जानता है।’
इसका तात्पर्य यह नहीं है कि तत्त्वकी प्राप्ति कठिन है। इसका तात्पर्य है कि श्रोता ध्यान नहीं देते। हजारों मनुष्योंमें कोई एक ठीक ढंगसे सुनता है और तत्त्वप्राप्तिके लिये साधन करता है। जो साधन करके बहुत दूरतक पहुँच गये हैं, ऐसे सिद्धोंमें भी कोई एक ही तत्त्वसे जानता है। इस प्रकार इस श्लोकमें मनुष्योंकी सामान्य वस्तुस्थितिका वर्णन किया गया है, तत्त्वप्राप्तिकी कठिनताका वर्णन नहीं किया गया है। तत्त्वप्राप्तिकी अलौकिकताका वर्णन करते हुए भगवान् कहते हैं—
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य:।
आश्चर्यवच्चैनमन्य: शृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्॥
(गीता २।२९)
‘कोई इस शरीरीको आश्चर्यकी तरह देखता अर्थात् अनुभव करता है। वैसे ही अन्य कोई इसका आश्चर्यकी तरह वर्णन करता है तथा अन्य कोई इसको आश्चर्यकी तरह सुनता है और इसको सुन करके भी कोई नहीं जानता।’
उस तत्त्वका अनुभव, वर्णन आदि सब विलक्षण रीतिसे होता है, लौकिक बातोंकी तरह नहीं होता। ‘अन्य’ कहनेका तात्पर्य है कि तत्त्वका अनुभव करनेवालोंमें भी वर्णन करनेवाला कोई एक ही होता है। सब-के-सब अनुभव करनेवाले उसका वर्णन नहीं कर सकते*। इसको सुन करके भी कोई नहीं जानता; क्योंकि वह मन लगाकर जिज्ञासापूर्वक नहीं सुनता।
सैकड़ों मनुष्योंमें कोई एक शूर पैदा होता है, हजारोंमें कोई एक पण्डित पैदा होता है, लाखोंमें कोई एक वक्ता पैदा होता है, दाता तो पैदा हो भी अथवा न भी हो!’
‘यत्न करनेवाले सिद्धोंमें कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जानता है’—ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि यत्नसे अर्थात् भीतरकी लगनसे ही परमात्मतत्त्वको जाना जा सकता है और ‘इसको सुन करके भी कोई नहीं जानता’—ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि सुननेमात्रसे अर्थात् अभ्याससे उस तत्त्वको कोई नहीं जान सकता। अभ्यासमें मन-बुद्धिकी प्रधानता होती है, पर लगनमें स्वयंकी प्रधानता होती है। अभ्याससे एक नयी अवस्थाका निर्माण होता है, जबकि लगनसे स्वयंमें सदासे विद्यमान तत्त्व प्रकट हो जाता है।
अनुभवी मनुष्यके द्वारा सुना जाय तो भीतर एक शक्ति प्रवेश करती है। पर सब आदमी उसकी बातोंको पकड़ नहीं पाते। कारण कि वक्ताका जो अनुभव है, उसको वह वाणीके द्वारा नहीं कह सकता। उसका जो अनुभव है, उतना बुद्धिमें नहीं आता। बुद्धिमें जितनी बातें आती हैं, उतनी मनमें नहीं आतीं। मनमें जितनी बातें आती हैं, उतनी वाणीमें नहीं आतीं। वाणीमें जितनी बातें आती हैं, उतनी श्रोताके कानोंतक नहीं पहुँचतीं। कानोंतक जितनी बातें पहुँचती हैं, उतनी उसका मन मनन नहीं करता। मन जितनी बातोंका मनन करता है, उतनी बातोंका बुद्धिमें निश्चय नहीं होता। बुद्धिमें जितना निश्चय होता है, उतना अनुभवमें नहीं आता। इस प्रकार क्रमसे देखें तो कहनेवालेके अनुभव और सुननेवालेके अनुभवमें बहुत अन्तर पड़ जाता है। परन्तु यदि श्रोता जिज्ञासु हो और वह मन लगाकर सुने तो बहुत जल्दी अनुभव हो जाता है।
सतगुरु भूठा इन्द्र सम, कमी न राखे कोय।
वैसा ही फल नीपजै, जैसी भूमिका होय॥
जैसे वर्षा सब जगह एक समान ही बरसती है। वर्षा, जमीन, खाद, धूप, वायु और जलमें कोई फर्क न होनेपर भी एक साथ पैदा होनेवाले मतीरेके स्वादमें और तस्तुम्बा (विसलुम्बा)के स्वादमें बड़ा भारी फर्क होता है; क्योंकि दोनोंका बीज अलग-अलग होता है। जैसा बीज होता है, वैसा ही फल होता है। परन्तु मनुष्यकी बात इससे विलक्षण है! मनुष्यका बीज अर्थात् भाव पलट भी सकता है और वह दुष्टसे सन्त बन सकता है, दुरात्मासे महात्मा बन सकता है (गीता ९।३०-३१); क्योंकि मूलमें वह परमात्माका ही अंश है। परन्तु उसमें दो बातें होनी चाहिये—वह कपटरहित हो और आज्ञाके अनुसार चले—‘अमाययानुवृत्त्या’ (श्रीमद्भा० ११।३।२२)। इसलिये श्रोतामें कपट नहीं होना चाहिये अर्थात् भीतरमें किसी बातका कोई आग्रह, कोई पकड़ नहीं होनी चाहिये। अपनी बातका आग्रह होगा तो वह दूसरेकी बात सुन नहीं सकेगा और सुनेगा भी तो पकड़ नहीं सकेगा। कारण कि अपना आग्रह रहनेसे श्रोताका हृदय वक्ताकी बातको फेंकता है, ग्रहण नहीं करता। इससे वक्ताकी अच्छी बात भी हृदयमें बैठती नहीं। अत: अपने मत, सिद्धान्त, सम्प्रदायका आग्रह तत्त्वप्राप्तिमें बहुत बाधक है।
श्रोता अपनी कोई आड़ न लगाये तो अनुभवी महापुरुषके भाव उसके भीतर शीघ्र प्रविष्ट हो जाते हैं।
पारस केरा गुण किसा, पलटा नहीं लोहा।
कै तो निज पारस नहीं, कै बिच रहा बिछोहा॥
यदि लोहेसे सोना नहीं बना तो पारस असली नहीं है अथवा लोहा असली नहीं है। यदि पारस भी असली हो और लोहा भी असली हो, जंग लगा हुआ न हो तथा पारस और लोहेके बीचमें कोई आड़ (मिट्टी, पत्ता आदि) न हो तो पारससे स्पर्श होते ही लोहा तत्काल सोना बन जाता है। इसी तरह अगर कहनेवाला अनुभवी हो, सुननेवाला जिज्ञासु हो और बीचमें अपनी कुछ अटकल न लगाये तो वह पारस हो जाता है! इतना ही नहीं, वह पारससे भी विलक्षण हो जाता है—
पारसमें अरु संत में, बहुत अंतरौ जान।
वह लोहा कंचन करै, वह करै आपु समान॥
पारससे बना हुआ सोना दूसरे लोहेको सोना नहीं बना सकता। कारण कि पारस लोहेको सोना बनाता है, पारस (अपने समान) नहीं बनाता। परन्तु अनुभवी महापुरुष निष्कपटभावसे सुननेवाले और आज्ञाके अनुसार चलनेवालेको भी अपने समान सन्त बना देता है, मानो पारसकी टकसाल खुल जाती है!
यदि श्रोतामें एकमात्र परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य नहीं है और वह केवल सीखनेके लिये, सीखकर व्याख्यान देनेके लिये सत्सङ्ग सुनता है तो वह सत्सङ्गको बुद्धिका विषय बनाता है और सीखे हुए ज्ञानको ही अनुभव मान लेता है। ऐसे (सीखनेके उद्देश्यसे सत्सङ्ग करनेवाले) श्रोताको सत्सङ्गमें नयापन नहीं दीखता और वह कहता है कि इन बातोंको मैं जानता हूँ, इनको बार-बार सुननेसे क्या लाभ? सीखे हुए ज्ञानसे श्रोता पण्डित, वक्ता, लेखक तो हो सकता है, पर तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त, भगवत्प्रेमी नहीं हो सकता। वह दूसरोंको उनके प्रश्नोंका उत्तर दे सकता है, उनको ज्ञानकी बातें सिखा सकता है, पुस्तक लिख सकता है, पर तत्त्वका अनुभव नहीं करा सकता। कारण कि वाचिक ज्ञानी बननेसे उसमें ज्ञानका अभिमान पैदा हो जाता है। जैसे बहेड़ेकी छायामें कलियुग रहता है, ऐसे ही अभिमानकी छायामें सम्पूर्ण दोष और उनके कारण विद्यमान रहते हैं। परन्तु जो सच्चे हृदयसे परमात्मप्राप्ति करना चाहता है, वह तो अनुभवके लिये ही सुनता है, सीखनेके लिये नहीं। वह सत्सङ्गको केवल बुद्धिका विषय ही नहीं बनाता, प्रत्युत साथ-साथ उसमें तल्लीन भी होता है।
यद्यपि आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़नेसे तथा प्रवचनोंकी कैसेट सुननेसे भी लाभ होता है, तथापि अनुभवी पुरुषके द्वारा सुननेसे बहुत अधिक विचित्र लाभ होता है। जिसने पहले प्रवचन सुना है, वह यदि उस प्रवचनकी कैसेट सुने तो उसपर जितना असर पड़ता है, उतना नये आदमीपर नहीं पड़ता। कारण कि जिसने पहले सत्सङ्ग सुना है, वह उसकी कैसेट सुनेगा तो वह सब-का-सब दृश्य उसके मनके सामने आ जायगा, जिससे एक विलक्षण असर पड़ेगा। इसी तरह सत्सङ्ग सुननेसे जितना असर पड़ता है, उतना पुस्तक पढ़नेसे नहीं पड़ता। कारण कि सत्सङ्ग सुननेसे वक्ताके नेत्र, हाथ आदिकी मुद्रा, उसके भाव, उसकी दृष्टिका श्रोतापर एक विलक्षण असर पड़ता है। सुननेमें तो सुनानेवालेकी बुद्धिकी प्रधानता रहती है, पर पुस्तक पढ़नेमें तथा कैसेट सुननेमें अपनी बुद्धिकी प्रधानता रहती है। अगर श्रोता वक्ताके विवेचनको ध्यानपूर्वक सुने तो उसकी बुद्धि वक्ताकी बुद्धिमें प्रविष्ट हो जाती है। श्रोता अपनी बुद्धिसे उतना नहीं समझ सकता, जितना सुनानेवालेकी बुद्धिसे समझ सकता है। अगर सुनानेवालेकी कृपादृष्टि हो जाय तो उससे बहुत विशेष लाभ होता है। जैसे गायका बछड़ा अपनी माँके स्तनोंसे दूध पीकर ही पुष्ट होता है। अगर बछड़ेकी माँ मर जाय और उसको दूसरी गायका दूध पिलाया जाय तो वह उतना पुष्ट नहीं होता। कारण कि स्तनपान कराते समय गाय अपने बछड़ेको स्नेहपूर्वक चाटती है, हुंकार करती है तो उससे बछड़ेकी जैसी पुष्टि होती है, वैसी केवल दूध पीनेसे नहीं होती। ऐसे ही सन्त-महात्मा कृपा करके विशेषतासे कहें और सुननेवाला उनके सम्मुख होकर लगनपूर्वक सुने तो तत्काल तत्त्वकी प्राप्ति होती है।
हरेक काममें भविष्य होता है, पर परमात्मतत्त्वमें भविष्य नहीं होता। परमात्माकी प्राप्ति धीरे-धीरे नहीं होती, प्रत्युत तत्काल होती है। सुनानेवाला अनुभवी पुरुष भी विद्यमान हो, सुननेवाला जिज्ञासु साधक भी विद्यमान हो और परमात्मतत्त्व तो विद्यमान है ही, फिर भविष्यका क्या काम? देरी होनेका कोई कारण ही नहीं है! परमात्मतत्त्व नित्य-निरन्तर सबमें विद्यमान है। सुनानेवालेने उधर दृष्टि करायी और सुननेवालेने उसको जान लिया—इसमें देरी किस बातकी? बहुत-से भाई-बहनोंने ऐसी भावना कर रखी है कि सुनते-सुनते, साधन करते-करते, धीरे-धीरे कभी परमात्माकी प्राप्ति होगी। परन्तु वास्तवमें सांसारिक काम ही ‘कभी’ होगा, पारमार्थिक काम ‘कभी’ नहीं होगा,वह तो ‘अभी’ ही होगा।
जो वस्तु पैदा होनेवाली होती है, उसीकी प्राप्तिमें भविष्य होता है। जो पैदा होनेवाली नहीं है, प्रत्युत नित्य-निरन्तर रहनेवाली वस्तु (परमात्मतत्त्व) है, उसकी प्राप्तिमें भविष्य कैसे होगा? सुननेकी भूख ही नहीं है, परमात्मतत्त्वकी तीव्र जिज्ञासा ही नहीं है, उसके लिये तड़पन ही नहीं है, उसके लिये व्याकुलता ही नहीं है, इसी कारण देरी हो रही है!