सत्सङ्गकी आवश्यकता
प्रत्येक मनुष्यको शास्त्रके विधानके अनुसार कार्य करना चाहिये। भगवान्, सन्त-महात्मा और शास्त्र—ये तीनों निष्पक्ष हैं, समतावाले हैं, प्राणिमात्रके सुहृद् हैं और सबका हित चाहते हैं; अत: इनकी बात कभी टालनी नहीं चाहिये। ये हमारेसे कुछ भी नहीं चाहते, प्रत्युत केवल हमारा हित करते हैं। गोस्वामीजी कहते हैं—
हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥
स्वारथ मीत सकल जग माहीं।
सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥
(मानस ७।४७।३)
एक भगवान् और एक भगवान् के भक्त—ये दोनों नि:स्वार्थभावसे सबका हित करनेवाले हैं। भगवान् में तो यह बात स्वाभाविक है और वही स्वभाव भक्तोंमें भी उतर आता है। अत: हमें इनकी बात माननी चाहिये।
स्त्रियोंके लिये पति ही गुरु माना गया है; अत: उनको स्वतन्त्र गुरु बनानेकी जरूरत नहीं है। गुरुके विषयमें आया है कि यदि गुरु अभिमानी है, अहंकार रखता है, शरीरको बड़ा मानता है, कर्तव्य-अकर्तव्यका विवेक नहीं रखता, खराब रास्ते चल पड़ा है तो ऐसे गुरुका परित्याग कर देना चाहिये—‘परित्यागो विधीयते।’ अगर वह भजन-स्मरण, सत्सङ्ग करनेमें, भगवान् के सम्मुख होनेमें बाधा देता हो तो उसकी बात नहीं माननी चाहिये। कारण कि वह तो इस जन्मका गुरु है, पर आध्यात्मिक उन्नति सदाकी उन्नति है। गुरु, पति, माता-पिता आदि तो इस जन्मके हैं, पर भगवान् हैं, तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुष हैं, धर्म है—ये सब नित्य हैं। इसमें एक मार्मिक बात बताता हूँ, आप ध्यान दें।
पति आदि बड़ोंका कहना कहाँ नहीं मानना चाहिये कि जहाँ उनका अहित होता हो। जिससे पति, माँ-बाप आदिका अहित होता हो, उस आज्ञा-पालनसे क्या लाभ? जैसे, पति सत्सङ्ग जानेमें रुकावट देता है, जाने नहीं देता तो उसकी बात नहीं माननी चाहिये। जिस भाई या बहनकी सत्सङ्गमें जानेकी जोरदार इच्छा है, जो केवल पारमार्थिक लाभके लिये ही सत्सङ्गमें जाना चाहता है, जिसके भाव और आचरण बहुत ठीक शुद्ध हैं, उसको यदि गुरुजन सत्सङ्गमें जानेके लिये मना करते हैं और वह सत्सङ्गमें नहीं जाता तो उसको कोई पाप नहीं लगेगा, पर मना करनेवालोंको पाप लग जायगा। इसलिये उनके भलेके लिये उनकी बात नहीं माननी चाहिये कि वे कहीं पापी न बन जायँ, उनको कहीं नरक न हो जाय! तात्पर्य है कि जो भगवत्सम्बन्धी बातोंके लिये, आत्मोद्धारकी बातोंके लिये मना करते हैं, उनकी बातको नहीं मानना चाहिये। खूब निधड़क होकर सत्सङ्गमें जाना चाहिये और साफ कह देना चाहिये कि मैं तो सत्सङ्गमें जाऊँगा। परन्तु बहनो! इतनी बात जरूर हो कि उद्दण्डता न हो, उच्छृंखलता न हो, मनमाना आचरण न हो। एक ही ध्येय, लक्ष्य हो कि हमें पारमार्थिक उन्नति ही करना है। मेरी तो यहाँतक धारणा है कि यदि हृदयमें सत्सङ्गकी जोरदार इच्छा होगी तो उसको सत्सङ्गमें गये बिना लाभ हो जायगा, दूर बैठे ही उसके मनमें उस सत्सङ्गके भाव पैदा हो जायँगे! भगवान् तो भावको ग्रहण करते हैं—‘भावग्राही जनार्दन:।’
भगवान् हमारे सदाके माँ, बाप, पति, गुरु, आचार्य हैं; अत: उनकी आज्ञामें चलो। कर्तव्य-अकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र प्रमाण है—‘तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ’ (गीता १६।२४)। शास्त्रकी आज्ञा है कि सत्सङ्ग, भजन, ध्यान करो। इसलिये कभी मत डरो, निधड़क रहो। पतिकी सेवा करो उत्साहपूर्वक। जैसे, कोई मुनीम या नौकर है, पर उसका मालिक उसको भजन-ध्यानके लिये मना करता है तो उसको मालिकसे कड़वा नहीं बोलना चाहिये, पर मनमें यह विचार पक्का रखना चाहिये कि मैंने इसको समय दिया है और समयके मैं पैसे लेता हूँ, पर मैंने अपना धर्म नहीं बेचा है। यदि वह कहे कि झूठी बही लिखनी पड़ेगी, झूठ-कपट करना पड़ेगा, सेल्स टैक्स और इन्कम टैक्सकी चोरी करनी पड़ेगी, नहीं तो मैं नौकर नहीं रखूँगा तो उसको यह बात मनमें रखनी चाहिये कि अच्छी बात है। वह हमें छोड़ दे तो ठीक है, पर अपने मत छोड़ो। यदि मालिक ऐसे नौकरका त्याग करेगा तो ऐसा ईमानदार नौकर उसको फिर नहीं मिलेगा। जो आदमी मालिकके कहनेपर सरकारकी चोरी नहीं करता, वह मालिककी भी चोरी नहीं करेगा। उसको मालिक छोड़ देगा तो पीछे वह रोयेगा ही। अपने तो निधड़क, नि:शंक रहो कि हमने तो कोई पाप नहीं किया। हम पाप, अन्याय नहीं करते तो कुटुम्बी, सम्बन्धी भले ही नाराज हो जायँ, उस नाराजगीसे बिलकुल मत डरो। मीराँबाईने कहा है—‘या बदनामी लागे मीठी!’ वे भगवान् की पक्की भक्त थीं। उन्होंने कलियुगमें गोपी-प्रेम दिखा दिया। उनको कितना मना किया, जहर दिया, सिंह छोड़ दिया और कहा कि तू हमारेपर कलंक लगानेवाली है तो भी मीराँबाईने कोई परवाह नहीं की। अत: आपका हृदय यदि सच्चा है और भजन-ध्यान कर रहे हैं तो कोई धड़कन लानेकी जरूरत नहीं है।
यदि पति सत्सङ्गमें जानेके लिये मना करता है तो पतिके हितके लिये उससे बड़ी नम्रता, सरलतासे कह दो कि मैं सत्सङ्गकी बात नहीं छोड़ूँगी। आप जो कहो, वही काम करूँगी। आपकी सेवामें कभी त्रुटि नहीं पड़ने दूँगी, पर सत्सङ्ग-भजन नहीं छोड़ूँगी। आप सत्सङ्गमें जानेकी आज्ञा दे दो और खुद भी सत्सङ्गमें चलो तो बड़ी अच्छी बात है, आपकी-हमारी दोनोंकी इज्जत रहेगी, नहीं तो सत्सङ्गमें मैं जाऊँगी। घरमें कोई शोक हो जाय, कोई मर जाय तो ऐसे समयमें भी सत्सङ्गमें, मन्दिरोंमें और तीर्थोंमें जानेके लिये कोई मना नहीं है अर्थात् जरूर जाना चाहिये। शोकके समय सत्सङ्गमें जानेसे शोक मिटता है, जलन मिटती है, शान्ति मिलती है, इसलिये जरूर जाना चाहिये।
एक बात बहनोंसे कहता हूँ, ध्यान देकर सुनें। भाई भी सुनें। घरमें कोई शोक हो जाय और कोई बहन सत्सङ्गमें चली जाय तो ये माताएँ बहुत चर्चा करती हैं कि ‘देखो! कल इसका बाप मरा, पति मरा और आज यह सत्सङ्गमें जा रही है!’ इस तरह किसीको सत्संगमें जानेसे रोकना पाप है, हत्या है। वह कहीं विवाहमें जाय, गीत-गाने गाये तो ठीक नहीं है, पर सत्संगमें जाय तो क्या हर्ज है! सत्संगमें जानेसे उसका शोक दूर होगा, चिन्ता दूर होगी, पाप दूर होगा। अत: उसको सत्संगमें ले जाना चाहिये और कहना चाहिये कि हम भी जाती हैं, तुम भी चलो। बाप मर गया, माँ मर गयी, गुरुजन मर गये, पति मर गया तो यह बड़े दु:खकी बात है, पर यह दु:ख मिटेगा सत्संग करनेसे, भजन-ध्यान करनेसे, भगवान् के शरण होनेसे। आप ऐसा सोचें कि सत्संग, भजन-ध्यानसे हमें जो पुण्य मिले, वह हमारे माँ-बापको, पतिको, गुरुजनोंको मिले। माँ-बाप आदिके लिये सत्सङ्ग करो, भजन-ध्यान करो। अत: शोकके समय भी उत्साहपूर्वक सत्संगमें जाना चाहिये।
कई जगह यह बहुत बुरी रीति है कि पति मर जाय तो स्त्री दो-दो, तीन-तीन वर्षतक एक जगह बैठी रोती रहती है। बाहर जा नहीं सकती। इस रीतिको मिटाना है। मेरे काम पड़ा है। कलकत्तेकी बात है। दो स्त्रियाँ ऐसी थीं, जिनके पति मर गये। सेठजीके छोटे भाई मोहनलालजीकी मृत्यु हो गयी। उनकी स्त्री सावित्री वहाँ थी। मैं उनके घरपर गया और कहा कि तुम सत्संगमें आओ, रामायणके पाठमें आओ। वह सत्संगमें आने लगी। एक अन्य सज्जन मर गये तो उनकी पत्नीको भी मैंने सत्संगमें आनेके लिये कहा। उसने कहा कि लोग क्या कहेंगे! तो मैंने कहा कि हमें ऐसी रीति शुरू करनी है। शोकके समय सत्संगमें, तीर्थोंमें, मन्दिरोंमें अवश्य जाना चाहिये और दु:ख मिटाना चाहिये। घरमें तो शोक ही होगा और स्त्रियाँ भी जा-जाकर शोककी ही बातें सुनायेंगी। दु:खकी बातें सुननेसे दु:ख होता है और सत्संगकी बातें सुननेसे सुख होता है। अत: माताओ! कृपा करो, यह भिक्षा दो कि जो सत्सङ्गमें जाये, उसकी चर्चा मत करो। आपकी चर्चासे बड़ा नुकसान होता है। वह सत्संगमें जाती है, भजन-ध्यान करती है तो कौन-सा पाप, अन्याय करती है?
चुगल जुआरी मसखरा अन्यायी अरु चोर,
वरण-भेल विधवा-भखी गर्भगेर अघ घोर।
गर्भगेर अघ घोर ऊँच वेश्या-घर जाई,
मद मांसी रत वाम हत्यारा पलट सगाई।
‘रामचरण’ संसारमें इन सबहनको ठौर,
राम-भगत मावै नहीं, जगत हरामीखोर॥
इतने-इतने पापी तो जगत् में रह सकते हैं, पर भगवान् का भक्त जगत् में नहीं रह सकता! ऐसा मत करो। सत्संगमें जानेके लिये उत्साहित करो। पाँच-दस बहनें साथमें होकर कहें कि तुम सत्संगमें चलो। कोई कहे कि यह कैसे आ गयी? तो कहो कि हम इसे साथमें ले आयीं। मैंने कई जगह कहा है कि कोई तुमसे कहे कि तुम सत्संगमें क्यों जाती हो तो उससे कह देना कि स्वामीजीने हमारे घर आकर सत्संगमें आनेके लिये कह दिया, इस कारण जाती हूँ। उनका कहना मानना ही पड़ता है! इस तरह सब कलंक मेरेपर दे दो! ऐसे आप भी अपनेपर कलंक ले लो कि हम भी जायँगी और साथमें इसको भी ले जायँगी। इस तरह आप उत्साह रखो तो सत्संगका प्रचार होगा, सबका हृदय शुद्ध होगा, सबके लाभकी बात होगी।
हमने एक बात सुनी है और पद भी पढ़े हैं। मीराँबाईने तुलसीदासजी महाराजको पत्र लिखा कि मेरे तो आप ही माँ-बाप हैं, अत: मैं आपसे पूछती हूँ कि मैं भजन-ध्यान करना चाहती हूँ, पर मेरे पति मना करते हैं तो मेरेको क्या करना चाहिये*?
उत्तरमें गोस्वामीजी महाराजने लिखा—
जाके प्रिय न राम-बैदेही।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही॥ १॥
तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी।
बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी॥ २॥
नाते नेह रामके मनियत सुहृद सुसेब्य जहाँ लौं।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं॥ ४॥
तुलसी सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रानते प्यारो।
जासों होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो॥ ५॥
(विनयपत्रिका १७४)
जिसको सीतारामजी प्यारे नहीं लगते, उसको करोड़ों वैरियोंके समान समझना चाहिये। इस विषयमें गोस्वामीजीने अनेक उदाहरण दिये। प्रह्लादजीका उदाहरण दिया कि उन्होंने पिताको छोड़ दिया। परन्तु इससे यह उलटी बात मत पकड़ लेना कि हम भी पिताको छोड़ देंगे, पिताका कहना नहीं मानेंगे! प्रह्लादजीने तो केवल पिताजीकी भजन-निषेधकी बात नहीं मानी। भगवान् ने प्रह्लादजीसे कहा कि वरदान माँग तो उन्होंने कहा कि महाराज! माँगनेकी इच्छा नहीं है, पर आप माँगनेके लिये कहते हो तो मालूम होता है कि मेरे मनमें कामना है। अगर मेरे मनमें कामना न होती तो आप अन्तर्यामी होते हुए ऐसा कैसे कहते? अत: मैं यही वरदान माँगता हूँ कि मेरे मनमें जो कामना हो, वह नष्ट हो जाय। भगवान् ने कहा कि ठीक है। फिर प्रह्लादजीने कहा कि मेरे पिताका कल्याण हो जाय। इस तरह भजनमें बाधा देनेवालेके लिये प्रह्लादजी वरदान माँगते हैं, निष्काम होते हुए भी कामना करते हैं कि मेरे पिताका कल्याण हो जाय! क्यों माँगते हैं वरदान? इसलिये कि भगवान् और सब सह सकते हैं, पर भक्तका अपराध नहीं सह सकते—
सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ।
निज अपराध रिसाहिं न काऊ॥
जो अपराधु भगत कर करई।
राम रोष पावक सो जरई॥
(मानस २।२१८।२-३)
प्रह्लादजीने विचार किया कि मेरेको पिताजीने सत्सङ्ग, भजन-ध्यानके लिये मना किया है, अत: ठाकुरजी उनपर नाराज हैं। इसलिये प्रह्लादजीने ठाकुरजीसे क्षमा माँग ली कि महाराज! पिताजीको क्षमा करो, जिससे उनका कल्याण हो जाय। भगवान् ने कहा कि तेरे वंशका कल्याण हो गया, पिताकी क्या बात है!
माँका ऋण सबसे बड़ा होता है। परन्तु पुत्र भगवान् का भक्त हो जाय तो माँका ऋण नहीं रहता और माँका कल्याण भी हो जाता है!
कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुन्धरा पुण्यवती च तेन।
अपारसंवित्सुखसागरेऽस्मिन् लीनं परे ब्रह्मणि यस्य चेत:॥
(स्कन्दपुराण, माहे० कौमार० ५५।१४०)
ज्ञान एवं आनन्दके अपार समुद्र परब्रह्म परमात्मामें जिसका चित्त विलीन हो गया है, उसका कुल पवित्र हो जाता है, माता कृतार्थ हो जाती है और पृथ्वी पवित्र हो जाती है।
इसलिये बहनो! माताओ! अपने बालकोंको भगवान् में लगाओ, उनको भक्त बनाओ—
जननी जणै तो भक्त जण, कै दाता कै सूर।
नहिं तो रहिजै बाँझड़ी, मती गमाजे नूर॥
आपकी गोदीमें भक्त आये, भगवान् का भजन करनेवाला आये। ‘गोद लिये हुलसी फिरे, तुलसी सो सुत होय’— ऐसा बेटा हो। गोस्वामीजी महाराजकी वाणीसे जगत् का कितना उपकार हुआ है! उनकी वाणीसे कितनोंको शान्ति मिलती है! ऐसे बालक होना बिलकुल आपके हाथकी बात है। बालकका पहला गुरु माँ है। माँका स्वभाव पुत्रपर ज्यादा आता है—‘माँ पर पूत, पिता पर घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा-थोड़ा।’ कारण कि वह माँके पेटमें रहता है, माँका दूध पीता है, माँसे बोली सीखता है, माँसे चलना-बैठना, खाना-पीना आदि सीखता है। माँ दाईका, नाईका, दर्जीका, धोबीका, मेहतरका काम भी करती है और ऊँची-से-ऊँची शिक्षा देनेका काम भी करती है। माँकी शिक्षा पाये बालक बड़े सन्त होते हैं। जितने-जितने सन्त हुए हैं, मूलमें उनकी माताएँ बड़ी श्रेष्ठ, ऊँचे दर्जेकी हुई हैं। उनकी शिक्षा पाकर बालक श्रेष्ठ हुए। ऐसे आप भी अपने बालकोंको तैयार करो। आपका बेटा हो, पोता हो, दौहित्र हो, उसको बचपनमें ऐसी बातें सिखाओ कि वह भक्त बन जाय, भजनमें लग जाय। आपको कितना पुण्य होगा! उस बालकका उद्धार होगा और उसके द्वारा कितनोंको लाभ होगा, कितनोंका कल्याण होगा! भक्तके द्वारा दूसरोंको स्वत:-स्वाभाविक लाभ होता है। उसके वचनोंसे, दर्शनसे, चिन्तनसे, उसका स्पर्श करके बहनेवाली हवासे दूसरोंको लाभ होता है। अत: माताएँ, बहनें, भाई सब-के-सब भगवान् के भजनमें तल्लीन हो जाओ, भक्त बन जाओ। इससे बड़ा भारी उपकार होगा।
प्राय: बहनोंके मनमें आती है कि हमारे पास रुपये हों तो हम दान-पुण्य करें। परन्तु दान-पुण्यसे इतना ऊँचा काम नहीं होगा, जितना भजन-ध्यानसे होगा। भजन-ध्यानसे भगवान् में तल्लीन होकर पवित्र बनोगे। दान-पुण्यसे आप इतने पवित्र नहीं बन सकते। इसलिये भजन करो, भगवान् में तल्लीन हो जाओ। इसका बहुत ज्यादा माहात्म्य है। अच्छे-अच्छे गुण धारण करो। किसीको कोई तकलीफ न हो—इसका खयाल रखो। चुगली करना, इधर-उधर बात फैलाना, द्वेष पैदा करना, कलह करवाना—यह महान् हत्या है, बड़ा भारी पाप है।
एक कहानी आती है। एक नौकर मुसलमानके यहाँ जाकर रहा। रहनेसे पहले उसने कह दिया कि मेरी इधर-की-उधर करनेकी आदत है, पहले ही कह देता हूँ! मियाँने सोचा कि कोई परवाह नहीं, ‘मियाँ बीबी राजी तो क्या करेगा काजी’ और रख लिया उसे। अब वह एक दिन जाकर रोने लगा तो बीबीने पूछा कि रोता क्यों है? तो बोला कि आपके घर रहता हूँ, तनखाह पाता हूँ, जिससे मेरा काम चलता है। आपके हितकी बात कहनेकी मनमें आती है, पर क्या करूँ, आपको जँचे, न जँचे! दु:ख होता है! बीबीने कहा कि बता तो दे, क्या दु:ख है? उसने कहा कि मियाँ साहब तो दूसरी शादी करना चाहते हैं, आपके आफत आ जायगी! तो बीबीने पूछा कि इसका कोई उपाय है? उसने कहा—‘हाँ, इसका उपाय है। आप मियाँकी दाढ़ीके कुछ केश ले आओ तो मैं उसकी एक ताबीज (यन्त्र) बना दूँगा, फिर सब ठीक हो जायगा।’ उधर उस मियाँको जाकर कह दिया कि ‘बीबी आपसे बड़ा द्वेष रखती है, कभी मारेगी आपको! मेरे आगे बात करती है, इसलिये आप खयाल रखना।’ अब मियाँ भी सजग रहने लगा कि कहीं मेरेको मार न दे। एक दिन मियाँ नींदका बहाना बनाकर लेटे हुए थे। वह दाढ़ीके केश काटनेके लिये छुरी लेकर आयी तो उसने सोचा कि यह तो मेरा गला काटेगी। अत: दोनोंमें बड़ी कलह हो गयी। इसलिये कहा है—
चुगलखोरसे बात न करना, खड़ा न रहना पास।
मियाँ बीबी दोनों मरे, भयो कुटुम्ब को नास॥
चुगलखोर बड़ा खराब होता है। बहनों-माताओंमें यह आदत होती है कि इसकी बात उसको कहकर दोनोंमें झगड़ा करा देती हैं। क्या हाथ आता है, बताओ? सास-बहू, जेठानी-देवरानीमें लड़ाई करा देती हैं, भाई-भाईको न्यारा करा देती हैं।
बायाँ सुणो तो सरी, रामजी दयालजी ने क्यूँ बिसरी॥
पाँच सात तो भाई भेला, कैसा लागे प्यारा।
जे बायाँ रो हुकुम चले तो कर दे न्यारा न्यारा॥ बायाँ०॥
परमारथ ने पतली पोवे, घर काँ ताँयी जाड़ी।
साहेब के दरबार में तेरी किस विध आसी आड़ी॥ बायाँ०॥
चोखा चावल मोठ बाजरी, घर में आघा मेले।
अलियो धाण अरु घणा कांकरा, माँगणियाँने ठेले॥ बायाँ०॥
खावण ने खाथी घणी अरु राम भजन ने माठी।
जवायाँ रा गीत गावणने, जाय जगत में नाठी॥ बायाँ०॥
घर में बातां बाहर बातां, बातां आता जातां।
आ बातां में नफो नहीं है, जम मारेला लातां॥ बायाँ०॥
आपकी क्या दशा होगी? सारे दिन बातें करती रहती हो। राम-राम करो तो निहाल हो जाओ! उतना ही तो खर्चा है और क्या है? दुनियाकी कथा क्यों करो, राम-राम करो, जिससे अपना भी कल्याण और दूसरोंका भी कल्याण! कोई ऐसी-वैसी बात करने आ जाय तो आप राम-राममें; भजनमें लग जाओ। जैसे मक्खियाँ मुँहपर बैठती हैं तो बढ़िया इत्र मुँहपर लगा लो, एक भी मक्खी मुँहपर नहीं बैठेगी, ऐसे ही कोई बात करने आ जाय तो भगवान् की बात, सत्सङ्गकी बात छेड़ दो, राम-राम करो। वह चली जायगी, टिकेगी नहीं। मक्खियाँ तो गन्दगीपर ही ठहरती हैं, उनको सुगन्ध नहीं सुहाती।
तुलसी पूरब पाप ते, हरिचर्चा न सुहात।
जैसे ज्वरके जोर से, भूख बिदा हो जात॥
किसीको ज्वर आ जाय तो उसको अन्नकी गन्ध आती है। अन्न अच्छा नहीं लगता; क्योंकि भीतरमें खराबी है। ऐसे ही जिसका अन्त:करण खराब है, उसको सत्संग-भजन अच्छा नहीं लगता।
अपने अन्त:करणमें कोई गड़बड़ी आ जाय तो भगवान् को पुकारो, हे नाथ! हे नाथ!! पुकारो। यह एक दवाई है असली भगवान् को याद करो, खूब मस्त रहो। अपने कल्याणके लिये, पतिके कल्याणके लिये, माता-पिताके कल्याणके लिये भगवान् के भजनमें लग जाओ। पुरुष यदि श्रेष्ठ, उत्तम होता है तो वह अपने ही कुलका उद्धार करता है; परन्तु स्त्री श्रेष्ठ होती है तो वह दोनों कुलोंका उद्धार कर देती है—
एवा उत्तम गुण थी उभय सुकुल उजवालिये हे।
सखियाँ निज-निज नीति धर्म सदा सम्भालिये हे॥
महाराज जनक चित्रकूट गये। वहाँ सीताजी सादे वेशमें थीं। कितने प्रेमसे पली थीं सीताजी! माता-पिताका उनपर बड़ा स्नेह था। जनकपुरीके कई राजकीय आदमी जनकजीके साथमें आये थे। उन्होंने सीताजीको साधारण वेशमें देखा तो रो पड़े कि हमारे महाराजकी पुत्री जंगलमें रहकर दु:ख पा रही है! रहनेको जगह नहीं, खानेको अन्न नहीं, पहननेको पूरा बढ़िया कपड़ा नहीं! परन्तु महाराज जनक बड़े राजी हुए और बोले कि बेटी! तूने दोनों कुलोंको पवित्र कर दिया—‘पुत्रि पबित्र किए कुल दोऊ’ (मानस २।२८७।१)। स्त्रियाँ श्रेष्ठ होती हैं तो दोनों कुलोंका उद्धार करती हैं और खराब होती हैं तो दोनों कुलोंका नाश करती हैं। इसलिये बहनो! धर्मकी, कुलकी मर्यादामें चलो। बालकोंपर, कुटुम्बियोंपर आपके आचरणोंका असर पड़ता है। समुद्रके बीचमें यह पृथ्वी किस बलपर धारण की हुई है?—
गोभिर्विप्रैश्च वेदैश्च सतीभि: सत्यवादिभि:।
अलुब्धैर्दानशीलैश्च सप्तभिर्धार्यते मही॥
(स्कन्दपुराण, माहे० कुमार० २।७१)
‘गायें, ब्राह्मण, वेद, सती स्त्री, सत्यवादी, लोभरहित और दानशील सन्त-महापुरुष—इन सातोंके द्वारा यह पृथ्वी धारण की जाती है अर्थात् इनपर पृथ्वी टिकी हुई है।’ अत: सती स्त्रियोंसे पृथ्वीकी, दुनियाकी रक्षा होती है—‘एक सती और जगत् सारा, एक चन्द्रमा नौ लख तारा।’ इतना बल आपमें है! इसलिये आप धर्मका अच्छी तरहसे पालन करें। आप धर्मकी रक्षा करो तो धर्म लोकमें, परलोकमें, सब जगह आपकी रक्षा करेगा—‘धर्मो रक्षति रक्षित:।’ कई बहनोंको पता नहीं है कि धर्म क्या कहता है? शास्त्र क्या कहता है? तो वाल्मीकिरामायण, तुलसीकृत रामायण आदि ग्रन्थ पढ़ो। परन्तु ग्रन्थोंको पढ़नेमें हमारी बुद्धिकी प्रधानता रहती है, जिससे पूरा अर्थ खुलता नहीं। पुस्तकोंमें अच्छी-अच्छी बातें पढ़नेपर भी अपनी बुद्धिकी मुख्यता रहनेसे हम उन बातोंको इतना नहीं समझ पाते, जितना हम सत्संगके द्वारा सुनकर समझ पाते हैं। इसलिये भाइयो! बहनो! सत्संग करो। आजकल अच्छी बातें मिलती नहीं हैं। बहुत कम जगह मिलती हैं। अगर मिल जायँ तो विशेषतासे लाभ लेना चाहिये। करोड़ों काम बिगड़ते हों तो भी यह मौका चूकने नहीं देना चाहिये—‘कोटिं त्यक्त्वा हरिंस्मरेत्।’ खेत सूख जाय तो फिर वर्षासे क्या होगा—
का बरषा सब कृषी सुखानें।
समय चुकें पुनि का पछितानें॥
(मानस १।२६१।२)
इसलिये मौका चूकने मत दो और खूब उत्साहपूर्वक सत्सङ्ग, भजन, ध्यानमें लग जाओ। बड़ोंकी सेवा करो। उनकी आज्ञामें रहो। सत्संगके लिये उनके चरणोंमें गिर करके, रो करके आज्ञा माँग लो कि मेरेको यह छुट्टी दो! आप जो कहो, वही मैं करूँगी; परन्तु यह एक छुट्टी चाहती हूँ। इतना हृदयका कड़ा कौन होगा, जो सेवा करनेवालेकी एक इतनी-सी बात भी नहीं मानेगा!
लखनऊके एक कायस्थ घरकी बात है। लड़की वैष्णवोंके घरकी और शुद्ध आचरणोंवाली थी, पर पतिका खाना-पीना सब खराब था। महाराज! सुनकर आश्चर्य आये, ऐसी बात मैंने सुनी शरणानन्दजी महाराजसे! वह लड़की आज्ञा-पालन करती, मांस बनाकर देती। आप भोजन करती तो स्नान करके दूसरे वस्त्र पहनती और अपनी रोटी अलग बनाकर खाया करती। कितनी तकलीफ होती, बताओ! ऐसा गन्दा काम भी कर देना और अपनी पवित्रता भी पूरी रखना! एक बार पति बीमार हो गया। उसने खूब तत्परतासे रातों जगकर पतिकी सेवा की। पति ठीक हो गया तो उसने कहा कि तुम मेरेसे एक बात माँग लो। उसने कहा कि आप सिगरेट छोड़ दो। इस बातका पतिपर इतना असर पड़ा कि उसने मांस-मदिरा सब छोड़ दिया। क्योंकि इतनी सेवा करके भी अन्तमें उसने एक छोटी-सी बात सिगरेट छोड़नेकी माँगी! अत: माताओ! बहनो! अपनी माँग बहुत कम रखनी है और सेवा करनी है। परन्तु पतिके कहनेसे सत्सङ्ग-भजनका त्याग नहीं करना है; क्योंकि इस बातको माननेसे उसको नरक होगा। अपना ऐसा कोई भी आचरण नहीं होना चाहिये, जिससे पतिको नरक हो जाय। अत: पति, माता-पिता आदिको पापसे बचानेके लिये सत्संग करो। अपनी मर्यादा मत छोड़ो। अपना जीवन शुद्ध, निर्मल और मर्यादित हो, फिर कोई डर नहीं। मीराँबाई भजन करती हुई डरती नहीं हैं। इतनी आफत होनेपर भी भजन करती हैं—
राणाजी म्हें तो गोबिन्द का गुण गास्याँ।
हरिमंदिर में निरत करास्याँ, घूँघरिया घमकास्याँ॥
स्त्री-जाति, बड़े घरानेमें पैदा हुई, परदेमें रही, परदेमें ब्याही गयी—वह मीराँबाई निधड़क होकर अकेले ही मेड़तेसे द्वारिका चली गयी! डर है ही नहीं मनमें। ये जो पुरुष बैठे हैं, इनको घरसे निकाल दिया जाय तो इनको मुश्किल हो जाय, भीतरमें खलबली मच जाय कि कहाँ रहेंगे? क्या खायेंगे? परन्तु स्त्री-जाति होनेपर भी मीराँबाईको भगवान् का भरोसा है—
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर-मुकुट, मेरो पति सोई॥
जो सब संसारका पालन-पोषण करनेवाला है, वह क्या भक्तोंकी उपेक्षा कर सकता है? ‘यो हि विश्वम्भरो देव: स भक्तान् किमुपेक्षते।’ अत: किसीसे डरनेकी, चिन्ता करनेकी जरूरत नहीं है। सत्संग आदिके लिये कोई मना करे तो साफ कह देना चाहिये कि आपकी यह बात मैं नहीं मानूँगी; क्योंकि इसमें आपका अहित है और आपका अहित मेरेको अभीष्ट नहीं है। सत्संग, भजन, ध्यान नि:शंक होकर, निधड़क होकर करो। हाँ, दिखावटी भजन नहीं करना है, दम्भ नहीं करना है।
भीतरमें और बात तथा बाहरमें और बात—यह नहीं होना चाहिये—‘ऊपर मीठी बात, कतरनी काँखमें। आगबुझी मत जान, दबी है राखमें।’ ऊपरसे मीठी बात करना और भीतरमें कपट रखना—यह बहुत खराब है!
क्यूँ खोदे तू खाडो रे।
तू तो जाणे दूजो पड़सी, आसी थारे आडो रे॥
इसलिये बड़ी सावधानीसे जीवन पवित्र बनाओ, सुन्दर बनाओ। भगवान् के सम्मुख हो जाओ, फिर डरनेकी जरूरत नहीं। हम त्रिलोकीनाथ परमात्माके सम्मुख हैं, फिर डर किस बातका? परन्तु उद्दण्डता, उच्छृंखलता नहीं करनी है, कटु बर्ताव नहीं करना है। बड़े प्रेमका, आदरका बर्ताव करना है। कारण कि प्रेमका बर्ताव करनेसे आपका भाव शुद्ध, निर्मल होगा, जिसका भगवान् पर, सन्त-महात्माओंपर असर पड़ेगा। वे आपके पक्षमें होंगे।
सत्सङ्गका मौका बहुत कम मिलता है—
तात मिलै पुनि मात मिलै सुत भ्रात मिलै युवती सुखदाई।
राज मिलै गज-बाजि मिलै सब साज मिलै मनवांछित पाई॥
लोक मिलै सुरलोक मिलै बिधिलोक मिलै बैकुंठहु जाई।
‘सुन्दर’ और मिलै सब ही सुख संत समागम दुर्लभ भाई॥
सत्सङ्ग दुर्लभतासे मिलता है। सत्सङ्गकी बड़ी विचित्र महिमा है! हनुमान् जी लङ्कामें जाने लगे तो उनको लंकिनीने पकड़ लिया और कहा कि मेरा निरादर करके कहाँ जाते हो? लङ्कामें जो चोर होता है, वह मेरा आहार होता है! हनुमान् जी ने जोरसे एक मुक्का मारा। लंकिनीके मुँहसे खून बहने लगा। ऐसी दशा होनेपर वह बोली—
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥
(मानस ५।४)
लवमात्र सत्सङ्गके समान दूसरा कोई सुख नहीं है। स्वर्ग और मुक्तिका सुख भी उसकी तुलना नहीं कर सकता। इतनी महिमा है भगवत्प्रेमीके संगकी। हनुमान् जी का मुक्का लगा—यह सत्सङ्ग हुआ। लंकिनीने जान लिया कि राक्षसोंका काल आ गया, अब सब राक्षस खत्म हो जायँगे—‘बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥’ (मानस ५।४।४)। मुक्का खाकर वह खुशी मनाती है और आशीर्वाद देती है कि भगवान् को याद रखकर लङ्कामें जाओ, तुम्हारा सब काम सिद्ध होगा। कारण कि भगवान् के प्यारे भक्तका संग हो गया, स्पर्श हो गया! इसलिये सत्सङ्गकी विचित्र महिमा है। कोई कह नहीं सकता।
सन्तोंकी बड़ी विचित्र-विचित्र महिमा आती है। हमने सुना है कि नाभाजीकी आँखें नहीं थीं। भगवान् के भक्त थे। वे सन्तोंके यहाँ चले गये। जूतियोंमें, रज्जीमें पड़े रहते और जो कुछ मिलता, पा लेते तथा मस्त रहते। सन्तोंकी, गुरुकी आज्ञाका पालन करनेमें बड़े तत्पर रहते। उस आज्ञा-पालन और भजनसे उनको बड़े-बड़े अनुभव हो गये। तब गुरुजीने आज्ञा दी कि तुम भक्तोंके चरित्र लिखो। नाभाजीने कहा कि महाराज! भगवान् के चरित्र तो मैं लिख सकता हूँ, पर भक्तोंके चरित्र मैं कैसे लिखूँगा? तो गुरुजीने कहा कि भक्त आकर तुम्हें दर्शन देंगे और अपना चरित्र बतायेंगे। तब उन्होंने ‘भक्तमाल’ लिखी। भीतरके नेत्र खुल गये। भक्तोंका अद्भुत वर्णन किया। अत: सत्सङ्गसे, सन्तोंकी कृपासे क्या नहीं हो सकता?
यह कलियुग और इसमें भगवान् का नाम मिल गया, सत्सङ्ग मिल गया तो मानो सोनेमें सुगन्ध है! ऐसे सुन्दर अवसरको जाने मत दो। कष्ट उठाकर भी किसी तरह लोगोंको सत्सङ्गमें लाओ। बड़ी-बूढ़ी माताओंको सत्सङ्गमें लाओ। उनको हाथ पकड़कर अपने साथ लाओ और सत्सङ्गमें बैठाओ। वे नहीं बैठ सकें तो एक तरफ बिछौना बिछाकर उसपर लिटा दो कि लेटकर सुनती रहो अथवा कुर्सी रखकर उसपर बैठा दो। इस प्रकार उनको सत्सङ्ग सुननेका मौका दो। भाइयोंसे भी यही कहना है कि जो बड़े-बूढ़े हों, उनको लाओ। एक जगह बैठा दो अथवा जहाँ छाया हो, वहाँ लिटा दो। सत्सङ्ग सुनाकर उनको घरपर पहुँचा दो। आपको बड़ा पुण्य होगा। भोजन देनेका भी पुण्य होता है तो क्या सत्सङ्गके लिये अवसर देनेका पुण्य नहीं होगा? जो सत्सङ्गको नहीं मानते, उनको भी पैरोंमें पड़कर सत्सङ्गमें लाओ।
बीकानेरकी ही बात है। एक लड़का माँकी आज्ञाका पालन करता था। वह रोज माँको सत्सङ्गमें पहुँचाता और सत्सङ्ग उठता तो आकर माँको ले जाता। एक दिन माँने उससे कहा कि तू भी दो-तीन दिन सत्सङ्ग सुन ले, बैठ जा। वह सत्सङ्ग सुनने लगा। अब वह कहता है कि सत्सङ्ग छूटता ही नहीं मेरेसे। चखे बिना क्या पता चले कि लड्डूमें कितना स्वाद है! अत: जिन्होंने सत्सङ्ग किया ही नहीं, वे बेचारे क्या जानें? ‘मायाको मजूर बन्दो कहा जाने बन्दगी।’ दूसरे सत्सङ्ग करें—यह बात भी उनसे सही नहीं जाती! दूसरा साधुको भोजन करा दे—यह भी उनसे सहा नहीं जाता और कहते हैं—‘मुफ्तमें खावे मोडा।’ चोरी हम करते नहीं, डाका हम डालते नहीं। लोग खिलायें तब खाते हैं। लोगोंको मना करो तुम! परन्तु उनसे सहा नहीं जाता। सत्सङ्ग सुहाता नहीं,भजन-ध्यानकी बात सुहाती नहीं।
मजाल क्या है जीव की जो राम नाम ले,
पाप देवे थापकी तो मूँडो फोर दे।
न तो खुद सत्सङ्ग करते हैं, न दूसरोंको करने देते हैं— ‘खेतका अड़वा, न खावे न खाने दे।’ पर आप पक्के रहें। आप भगवान् में लग जायँ तो पाप, ताप सब नष्ट हो जायँगे। जैसे सूर्यसे दुनियाका अन्धकार मिट जाता है, ऐसे ही सत्सङ्गसे हृदयका अन्धकार मिट जाता है।