सावधान रहो!
आप अभी सावधान हो जायँ कि कोई भी समय निरर्थक न जाय। व्यर्थकी बातें करना, आलस्य-प्रमाद करना, हँसी-दिल्लगी करना, बीड़ी-सिगरेट पीना आदि निरर्थक कामोंमें झूठ-कपट, पापके कामोंमें अगर समय लगता है तो यह बड़े भारी दु:खकी बात है! इसका परिणाम बड़ा भयंकर होगा। यह समय परमात्माकी प्राप्तिके लिये मिला है। इसमें अपने स्वार्थ और अभिमानको लेकर किसीको दु:ख, कष्ट देना भविष्यमें अपने लिये बड़ा भारी दु:ख तैयार करना है। इसलिये सावधान रहें। एक-एक क्षण उत्तम-से-उत्तम काममें लगायें।
रुपयोंको तो आप तिजोरीमें बंद करके रख सकते हैं, पर समयको बंद करके नहीं रख सकते। समयको सावधानीसे अच्छे-से-अच्छे काममें लगाओ तो ठीक है, नहीं तो यह खर्च हो जायगा। यह बहुत बड़ी पूँजी है। धन-जैसी पूँजी नहीं है, धनसे बहुत ऊँची है। पासमें लाखों-करोड़ों रुपये रहते हुए भी मर जाओगे, पर समय रहते एक मिनट भी पहले नहीं मरोगे। जीना समयके अधीन है। समय खर्च होनेपर जी सकोगे नहीं। रुपये आपको जिला नहीं सकते। आपको समय जिलाता है। समय ही आपके जीवनका आधार है। रुपये तो तभी खर्च होते हैं, जब आप खर्च करते हैं, परन्तु समय तो अपने-आप खर्च हो रहा है, बैठे हैं तो भी खर्च हो रहा है, काम करते हैं तो भी खर्च हो रहा है, भजन करते हैं तो भी खर्च हो रहा है। यह खर्चा तो निरन्तर ही हो रहा है। मौत निरन्तर नजदीक आ रही है, जिसमें एक क्षणका भी अन्तर नहीं पड़ता। चाहे काम-धंधा कर लो, चाहे भजन कर लो, चाहे समाधि लगा लो, समय तो दनादन जा रहा है। समय समाप्त होते ही उसी क्षण मरना पड़ेगा। फिर ऐसा कोई बल नहीं है, जिससे हम जी सकें। ऐसा अपने जीवनका खास आधार जा रहा है। उसे उत्तम-से-उत्तम काममें लगाओ। इसके लिये सावधानीके सिवाय और कोई उपाय नहीं है। अत: हरदम सावधान रहो। सन्तोंने कहा है—
दिलमें जाग्रत रहियै बंदा।
हेत प्रीत हरिजन सुं करियै, परहरियै दुखद्वंद्वा॥
हम क्या कर रहे हैं? इसका नतीजा किसको भोगना पड़ेगा? इसपर गम्भीरतासे विचार करें। ऐसा विचार, ऐसी सावधानी मनुष्य ही रख सकता है। पशु-पक्षियोंमें, वृक्षोंमें इसका ज्ञान नहीं है। भोगयोनि देवताओंमें भी इसका ज्ञान नहीं है। अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके दूसरोंका हित करनेकी योग्यता मनुष्यमें ही है। अगर वह दूसरोंका हित, दूसरोंकी सेवा नहीं करता तो यह बड़ी भारी गलती है। भगवान् को याद करनेका और दूसरोंकी सेवा करनेका अवसर दूसरी जगह नहीं मिलेगा। यह अवसर चूकें नहीं। अगर आप यह काम कर लेते हैं तो बहुत बड़ा काम कर लिया। समय सार्थक बनानेवालेको पश्चात्ताप नहीं करना पड़ता। समय बरबाद करनेवालेको पश्चात्ताप करना पड़ता है—
सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ।
कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोस लगाइ॥
(मानस ७। ४३)
जो अपना समय व्यर्थ खो देता है, वह बहुत बड़ा नुकसान करता है। जो समय भगवान् के चिन्तनके लिये है, वह भोगोंके चिन्तनमें लगता है, जो समय दूसरोंका हित, उपकार करनेके लिये है, वह दूसरोंके अहित, अपकारमें लगता है—वह बड़े भारी नुकसानकी बात है। इस नुकसानसे बचो और सावधान रहो। पशुको भी अगर सावधान किया जाय तो वह सावधान हो जाता है। ऊँटको ‘सावधान! सावधान!’ कह दो तो वह अखड़ता नहीं, स्खलित नहीं होता। गधेको ‘बचो! बचो!’ कह देनेसे वह ठीक चलने लग जाता है। मनुष्यको तो आप-से-आप सावधान होना चाहिये—
उदीरितोऽर्थ पशुनापि गृह्यते
हयाश्च नागाश्च वहन्ति चोदिता:।
अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जन:
परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धय:॥
‘कही हुई बातका अर्थ तो पशु भी समझ लेते हैं, जैसे, प्रेरणा करनेपर घोड़े और हाथी सवारको लेकर चलते हैं। परन्तु बुद्धिमान् लोग बिना कही हुई बातको भी संकेतमात्रसे समझ लेते हैं, क्योंकि उनकी बुद्धि दूसरोंके भीतरी भावोंको जाननेवाली होती है।’
मनुष्यमें स्वयं सावधान रहनेकी योग्यता है। परन्तु इस योग्यताको वह काममें नहीं ले रहा है, पशु-पक्षियोंकी तरह ही समय बरबाद कर रहा है! इधर तो वह टी० वी० देख रहा है, तमाशा देख रहा है, पर उधर यमराज आ रहे हैं, मौत आ रही है! अभी जो समय मिला है, वह बरबाद करनेके लिये नहीं मिला है। अच्छे-से-अच्छे काममें लगानेके लिये मिला है। दूसरोंकी सेवा करना और भगवान् को याद करना—ये दो काम खास करनेके हैं। पशुओंसे, वृक्षोंसे आप सेवा ले सकते हो, पर वे स्वयं सेवा नहीं कर सकते। दूसरोंकी सेवा करनेकी बुद्धि और योग्यता मनुष्यके सिवाय और किसीमें नहीं है। ऐसे ही भगवान् को याद करना, भगवान् से प्रेम करना, मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे हैं—ऐसा भाव रखना भी मनुष्य-शरीरमें ही सम्भव है। इसलिये मनुष्यको हरदम सावधान, सावचेत रहना चाहिये। अपने घरोंमें बड़े-बड़े अक्षरोंमें ‘सावधान’ लिख देना चाहिये, जिससे उसपर दृष्टि पड़ती रहे और सावधानी रहे।
समय बड़ी तेजीसे खर्च हो रहा है और खर्च होनेपर उसी क्षण मरना पड़ेगा। मरते क्यों हैं? कि जीनेका समय बाकी नहीं रहा। आप कितने ही बुद्धिमान् हों, आपमें कितना ही बल हो, आपके पास कितने ही रुपये हों, आपका कितना ही बड़ा राज्य हो, आपके पास सब कुछ हो, पर मरनेके समय वह कुछ कामका नहीं है—
अरब खरब लौं द्रव्य है, उदय अस्त लौं राज।
तुलसी जो निज मरन है, तो आवहि किहि काज॥
इसलिये सावधान रहो। बहुत ही सीधा-सरल उपाय है कि ‘राम-राम-राम’ करना शुरू कर दो और भीतर बार-बार भगवान् से कहो कि ‘हे नाथ! ऐसी कृपा करो कि मैं आपको भूलूँ नहीं।’ भगवान् की स्मृति सम्पूर्ण विपत्तियोंका नाश करनेवाली है—‘हरिस्मृति: सर्वविपद्विमोक्षणम्’ (श्रीमद्भा० ८।१०।५५)। बड़ी सीधी-सरल और बहुत महत्ताकी बात है। केवल सावधानीकी आवश्यकता है कि समय खाली न चला जाय। एक नामका उच्चारण कर सकें, उतना समय भी अगर खाली चला गया तो बहुत बड़ी हानि है।
श्रोता—राम-नाम भीतरसे जपना चाहिये या जबानसे?
स्वामीजी—चाहे भीतरसे जपो, चाहे जबानसे जपो, जिस किसी तरहसे जपो, नाम-जप छूटना नहीं चाहिये। ‘तस्मात् केनाप्युपायेन मन: कृष्णे निवेशयेत् (श्रीमद्भा० ७।१।३१)—किसी तरहसे आपका मन, आपकी वाणी भगवान् में लग जाय। इसके लिये कोई समय, मुहूर्त नहीं देखना है। मनुष्य-शरीर मिल गया तो मुहूर्त मिल गया।
सोई तित्थ सुतित्थ है, सोई बार सुबार।
भद्रा भागी मानवा, सुमरॺा सिरजणहार॥
श्रोता—भगवान् का नाम लेना और भगवान् का कार्य करना—दोनोंमें ज्यादा आवश्यक कौन-सा है?
स्वामीजी—यह प्रश्न ऐसा ही है कि जैसे कोई पूछे—रोटी खायें या पानी पीयें, क्या करें बताओ? दोनों ही आवश्यक हैं। नाम भी लो और काम-धंधा भी करो। नाम तो हरदम लिया जा सकता है, पर कार्य हरदम नहीं किया जा सकता। अत: नाम हरदम लो और मौका पड़नेपर कार्य भी करो—‘तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च’ (गीता ८। ७)। जो शास्त्रविहित काम सामने आ जाय, उसे भगवान् का समझकर करो और नाम निरन्तर लेते रहो, नाम छूटे नहीं।
चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ।
कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ॥
(मानस १।२२।४)
—चारों ही युगोंमें और चारों ही वेदोंमें नामका प्रभाव है, पर कलियुगमें इसका विशेष प्रभाव है। इसके समान दूसरा कोई उपाय है नहीं। सभी सन्तोंने एक स्वरसे नामकी महिमा गायी है। नामके विषयमें भेद हो सकता है। कोई ‘ॐ’ कहेगा, कोई ‘राम’ कहेगा, कोई ‘हरे राम०’ बतायेगा, कोई ‘ॐ नमो नारायणाय’ बतायेगा—इस प्रकार नामोंमें भेद हो सकता है, पर नाम-जपमें सब-के-सब एक हैं।
श्रोता—राम-राम करनेसे प्रारब्ध कट जायगा क्या?
स्वामीजी—प्रारब्ध तो भोगनेसे कट ही जायगा। प्रारब्धकी क्या चिन्ता करें? यह तो भोगा और कटा, आप-से-आप ही कट जायगा। प्रारब्ध तो हरदम स्वत:-स्वाभाविक ही कटता रहता है।
श्रोता—ऊपरसे राम-राम करते हैं, मन तो लगता नहीं, फिर क्या फायदा?
स्वामीजी—ऊपरसे करनेपर भी फायदा होता है। कोई भी क्रिया निरर्थक नहीं जाती। कोई भी शब्द उच्चारण करो, वह निरर्थक नहीं जाता। फिर भगवान् का नाम तो भगवान् का ही है, वह निरर्थक नहीं जाता—इतनी ही बात नहीं है, प्रत्युत नामका उच्चारण करनेसे त्रिलोकीका बड़ा भारी उपकार होता है। कारण कि शब्द यहीं नहीं रहता, प्रत्युत व्यापक हो जाता है, सब जगह चला जाता है। व्यापक होनेके कारण ही शब्द रेडियोके द्वारा प्रकट हो जाता है। अगर कोई खराब शब्द बोलता है तो वह त्रिलोकीका बड़ा भारी अपराध करता है। अगर कोई मनसे किसीका अनिष्ट-चिन्तन करता है तो वह त्रिलोकीका अनिष्ट करता है। जैसे पानीमें एक छोटा-सा कंकड़ डालो तो उसकी भी तरंगें उठती हैं, पर सूक्ष्म होनेके कारण वे दीखती नहीं। ऐसे छोटा-सा शब्द उच्चारण किया जाय तो वह भी त्रिलोकीमें फैल जाता है। शब्दकी शक्ति अचिन्त्य है—‘शब्दशक्तेरचिन्त्यत्वात्।’ अत: बिना मन लगे भी कोई भगवान् का नाम लेगा तो उसको जरूर लाभ होगा। मन लगाकर नाम लिया जाय, तब तो कहना ही क्या है!