सेवा कैसे करें?
श्रोता—सेवा करनेके लिये हमारे पास न तो धन है, न बल है, न बुद्धि है, न योग्यता है, न सामर्थ्य है; कोई भी सामग्री हमारे पास नहीं है, पर हम सेवा करना चाहते हैं तो कैसे करें?
स्वामीजी—बहुत बढ़िया प्रश्न है। इसका उत्तर भी घटिया नहीं होगा, ध्यान देकर सुनना। सेवा करनेका अर्थ है—दूसरेका हित हो और प्रसन्नता हो। वर्तमानमें उसकी प्रसन्नता हो और परिणाममें उसका हित (कल्याण) हो, इसके सिवाय सेवा और क्या होती है?
जब हमारे पास शक्ति ही नहीं, तो फिर हम दूसरेकी प्रसन्नता कैसे लें—इसके लिये आपको अपनी दृष्टिमें बहुत बढ़िया बात बताता हूँ। एक धनी आदमी है। उसको घाटा लग जाय, कोई भयंकर बीमारी हो जाय, बेटा मर जाय, ऐसी हालतमें आप उसके दु:खमें सहमत हो जाओ कि आपका बेटा मर गया, यह बहुत बुरी बात हुई। आपको घाटा लग गया, यह बड़ा बेठीक काम हुआ। इस तरह हृदयसे उसके दु:खमें सम्मिलित हो जाओ तो वह प्रसन्न हो जायगा, उसकी सेवा हो जायगी। ऐसे ही किसीके पास बहुत धन-सम्पत्ति हो जाय, लड़का बड़ा होशियार हो जाय तो उसे देखकर हृदयसे खुश हो जाओ और कहो कि वाह-वाह बहुत अच्छा हुआ। इससे वह प्रसन्न हो जायगा।
संतोंके लक्षणोंमें आया है—‘पर दुख दुख सुख सुख देखे पर’ (मानस ७।३८।१)। दूसरोंके दु:खसे दु:खी हो जायँ और दूसरोंके सुखसे सुखी हो जायँ—यह सेवा आप बिना रुपये-पैसेके, बिना बलके, बिना सामग्रीके कर सकते हैं। दूसरोंको दु:खी देखकर आप दु:खी हो जाओ कि ‘हे नाथ! क्या करें? हमारे पास कोई सामग्री नहीं, धन नहीं, बल नहीं, जिससे हम दूसरोंको सुखी कर सकें, हम क्या करें?’—इस तरह आप हृदयसे दु:खी हो जाओ और दूसरोंको सुखी देखकर हृदयसे प्रसन्न हो जाओ तो यह आपकी बड़ी भारी सेवा होगी। जिसके हृदयमें ऐसा भाव होता है, उस पुरुषके दर्शनमात्रसे लोगोंको शान्ति मिलती है।
धन आदिसे हम दूसरोंकी सेवा करेंगे, उपकार करेंगे, यह बहुत ही स्थूल बुद्धि है। मैं तो कहता हूँ कि नीच बुद्धि है। आपने सेवाको महत्त्व नहीं दिया है, धनको महत्त्व दिया है। जो धनको महत्त्व देता है, वह नीच है। जो आपके हाथका मैल है, उसको आप अपनेसे भी बढ़कर महत्त्व देते हो और लोगोंकी सेवाके लिये भी उसकी आवश्यकता समझते हो—यह बहुत ही खोटी (खराब) बुद्धि है। धन आदिसे सेवा करनेपर अभिमान होता है, तिरस्कार होता है। जिसकी सेवा करोगे, उसपर भी रोब जमाओगे कि ‘हमने इतना तुम्हारेको दिया है, इतनी सहायता की है।’ वह अगर आपके विरुद्ध हो जायगा तो निन्दा करोगे कि ‘देखो, हमने इसकी इतनी सहायता की और यह हमारा विरोध करता है।’ इस प्रकार संघर्ष पैदा होगा! आप अपनी विद्वत्तासे सेवा करोगे और कहीं दूसरा भी ऐसे करेगा तो ईर्ष्या पैदा होगी। हम बढ़िया व्याख्यान देते हैं और दूसरेका व्याख्यान हमारेसे भी बढ़िया हो गया तो ईर्ष्या होगी। कहते हो कि जनताकी सेवा करते हैं, पर वास्तवमें सेवा नहीं करते हो, लड़ाई करते हो।
ऐसे आदमी बहुत कम मिलेंगे, जो वास्तवमें सेवा करते हैं। हम राम-नामका माहात्म्य बताते हैं, लोगोंको नाम-जपमें लगाते हैं, पर दूसरा कोई लोगोंको नाम-जपमें लगाता है तो वह इतना नहीं सुहाता। हमारे कहनेसे कोई नाम-जपमें लग जाय तो हम राजी होते हैं, पर दूसरेके कहनेसे कोई नाम-जपमें लग जाय तो हम उतने राजी नहीं होते, जब कि हमें उससे भी ज्यादा राजी होना चाहिये कि हमारा परिश्रम तो हुआ ही नहीं और काम हमारा हो गया!
कोई व्यक्ति हमारे मतको नहीं मानता, हमारे सिद्धान्तको नहीं मानता, प्रत्युत हमारे सिद्धान्तका खण्डन करता है, हमारी मान्यताका, हमारी साधन-पद्धतिका खण्डन करता है, पर राम-नामका प्रचार करता है, लोगोंसे नाम-जप करनेके लिये कहता है तो उससे हमारे भीतर क्या बुद्धि पैदा होती है? हमें नामका प्रचार तो अच्छा लग जायगा, पर उसके कहनेसे लोग नाम-जप करते हैं—यह अच्छा नहीं लगेगा, क्योंकि वह हमारे सिद्धान्तका, हमारे मतका, हमारी साधन-प्रणालीका खण्डन करता है। इस प्रकार हम खण्डनको जितना महत्त्व देते हैं, उतना नामके प्रचारको नहीं देते हैं। हम नामके प्रेमी नहीं हैं, हम अपने मतके, अपने गुरुके प्रेमी हैं। हमारे गुरुजीको मानो, तब तो ठीक है, पर हमारे गुरुजीको नहीं मानो और राम-राम करो तो कुछ नहीं होगा—यह मतवालेकी बात है। अगर वास्तवमें हमें नामकी महिमा अभीष्ट है तो कोई नास्तिक-से-नास्तिक, नीच-से-नीच व्यक्ति भी नामकी महिमा कहे तो मन-ही-मन आनन्द आना चाहिये, हृदयमें उल्लास होना चाहिये कि वाह-वाह, इसने बात बहुत बढ़िया कही। इसका नाम है—सेवा।
दूसरेका सदाव्रत बहुत अच्छा चलता है, वह बढ़िया भोजन देता है और सबका आदर करता है। लोगोंमें उसकी महिमा होती है। हम भी सदाव्रत खोलते हैं, पर हमारी महिमा नहीं होती तो हमारे भीतर ईर्ष्या होती है कि नहीं? अगर ईर्ष्या होती है तो हमारे द्वारा बढ़िया सेवा नहीं हुई। वास्तवमें तो हमें खुशी आनी चाहिये कि वहाँ बढ़िया भोजन मिलता है, हमारे यहाँ तो साधारण भोजन मिलता है। हम उपकारका जो काम करते हैं, वही काम दूसरा शुरू कर दे तो उससे हमारेमें ईर्ष्या पैदा होती है, द्वेष पैदा होता है तो यह हम सेवा नहीं कर रहे हैं, सेवाका वहम है।
किसी भी तरहसे, किसीके द्वारा ही सेवा हो जाय तो हम प्रसन्न हो जायँ। जो सेवा करता है, उसको देखकर और जिनकी सेवा होती है, उनको देखकर हम प्रसन्न हो जायँ कि वाह-वाह, कितनी बढ़िया बात है! हमारे पास एक कौड़ी भी लगानेको नहीं हो, पर हम प्रसन्न हो जायँ, उस सेवामें सहमत हो जायँ तो हमारे द्वारा सेवा हो जायगी। बोलो, इसमें क्या कठिनता है? इसमें कोई सामग्री नहीं चाहिये, अपना हृदय चाहिये। सेवा वस्तुओंसे नहीं होती है, हृदयसे होती है।
लोगोंमें यह वहम रहता है कि इतना धन हो जाय तो हम ऐसी-ऐसी सेवा करेंगे। विचार करना चाहिये कि जिनके पास उतना धन है, वे सेवा करते हैं क्या? वे तो सेवा नहीं करते और हम करेंगे! जब धन हो जाय, तब देखना! नहीं होगी सेवा। जिस समय पैसा हो जायगा, उस समय यह भाव नहीं रहेगा। भाव बदल जायगा। हमने देखे हैं ऐसे आदमी। केवल पुस्तकोंकी बात नहीं कहता हूँ। कलकत्तेके एक सज्जन दलाली करते थे और स्वर्गाश्रम, ऋषिकेशमें सत्संगके लिये आया करते थे। बड़ा उत्तम स्वभाव था उनका। वे कहते थे कि हम तो दलाली करते हैं, वह भी छोड़कर हम सत्संगमें आ जाते हैं और इनके पास इतना-इतना धन है, पर ये सत्संगमें नहीं आते। इनको क्या बाधा लगती है? परन्तु आगे चलकर जब उनके पास धन हो गया, तब उनका सत्संगमें आना कम हो गया। उनको सत्संगमें आनेका समय ही नहीं मिलता। कारण कि धन बढ़ेगा तो कारोबार भी बढ़ेगा और कारोबार बढ़ेगा तो समय कम मिलेगा। अत: जबतक धन नहीं है, तबतक और विचार रहता है, पर धन होनेपर वह विचार नहीं रहता। किसी-किसीका वह विचार रह भी जाता है, पर वे शूरवीर ही हैं, जिन्होंने धनको पचा लिया। प्राय: धन पचता नहीं, अजीर्ण हो जाता है। बलका अजीर्ण हो जाता है। पहले विचार रहता है कि बल हो तो हम ऐसा-ऐसा करें, पर बल होनेपर निर्बलको दबाते हैं। जब वोट माँगते हैं, उस समय कहते हैं कि हम आपकी सेवाके लिये ये-ये काम करेंगे, पर मिनिस्टर बननेपर आपको पूछेंगे भी नहीं। क्या यह सेवा है? यह सेवा नहीं है, स्वार्थ है। एक गाँवमें एक आदमी गया तो उसने कहा कि तुम्हारे गाँवमें इतना कूड़ा-कचरा पड़ा है, क्या सफाई करनेके लिये मेहतर नहीं आता? वे बोले—पाँच वर्षके बाद आता है मेहतर! पहले कोई नहीं आता? जब वोट माँगने आते हैं, तब मेहतर आता है।
दूसरा कोई सेवा करता है तो हमारेको बुरा क्यों लगता है? कि हमारी महिमा नहीं हुई, उसकी महिमा हो गयी। उसने अन्नक्षेत्र खोल दिया, विद्यालय खोल दिया, व्याख्यान देना शुरू कर दिया तो उसकी महिमा हो गयी, हमारी महिमा नहीं हुई। यह सेवा करना है या अपनी महिमा चाहना है? कसौटी कसकर देखो तो पता लगे। सेवाका तो बहाना है। अच्छाईके चोलेमें बुराई रहती है—‘कालनेमि जिमि रावन राहू’ ऊपर अच्छाईका चोला है, भीतर बुराई भरी है। यह बुराई भयंकर होती है। जो बुराई चौड़े (प्रत्यक्ष) होती है, वह इतनी भयंकर नहीं होती, जितनी यह भयंकर होती है।
असली सेवा करनेका जिसका भाव होगा, वह दूसरेके दु:खसे दु:खी और दूसरेके सुखसे सुखी हो जायगा। दूसरोंके दु:खसे दु:खी और सुखसे सुखी न होकर कोई सेवा कर सकता है क्या? जबतक दूसरोंके दु:खसे दु:खी और सुखसे सुखी नहीं होगा, तबतक सेवा नहीं होगी। जो दूसरोंके दु:खसे दु:खी होगा, वह अपना सुख दूसरोंको देगा, स्वयं सुख नहीं लेगा; और दूसरोंके सुखसे सुखी होगा, उसको अपने सुखके लिये संग्रह नहीं करना पड़ेगा। यह बात कण्ठस्थ कर लो कि दूसरोंके दु:खसे दु:खी होनेवालेको अपने दु:खसे दु:खी नहीं होना पड़ता और दूसरोंके सुखसे सुखी होनेवालेको अपने सुखके लिये भोग और संग्रह नहीं करना पड़ता।
संसारसे मिली हुई सामग्रीको अपनी मानकर सेवामें लगाओगे तो अभिमान आयेगा। अत: सेवाके लिये सामग्रीकी जरूरत नहीं है, हृदयकी जरूरत है।