शरणागतिका रहस्य

शरणागतिका रहस्य क्या है?—इसको वास्तवमें भगवान् ही जानते हैं। फिर भी अपनी समझमें आयी बात कहनेकी चेष्टा की जाती है; क्योंकि हरेक आदमी जो बात कहता है, उससे वह अपनी बुद्धिका ही परिचय देता है। पाठकोंसे प्रार्थना है कि वे यहाँ आयी बातोंका उलटा अर्थ न निकालें; क्योंकि प्राय: लोग किसी तात्त्विक, रहस्यवाली बातको गहराईसे समझे बिना उसका उलटा अर्थ जल्दी ले लेते हैं। इस वास्ते ऐसी बातको कहने-सुननेके पात्र बहुत कम होते हैं।

भगवान् ने गीतामें शरणागतिके विषयमें दो बातें बतायी हैं—(१) ‘मामेकं शरणं व्रज’ (१८। ६६) ‘अनन्यभावसे केवल मेरी शरणमें आ जा’ (२) ‘स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत’ (१५। १९) ‘वह सर्वज्ञ पुरुष सर्वभावसे मेरेको भजता है,’ ‘तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत’ (१८। ६२) ‘तू सर्वभावसे उस परमात्माकी शरणमें जा’। तो हम भगवान् के शरण कैसे हो जायँ? केवल एक भगवान् के शरण हो जायँ अर्थात् भगवान् के गुण, ऐश्वर्य आदिकी तरफ दृष्टि न रखें और सर्वभावसे भगवान् के शरण हो जायँ अर्थात् साथमें अपनी कोई सांसारिक कामना न रखें।

केवल एक भगवान् के शरण होनेका रहस्य यह है कि भगवान् के अनन्त गुण हैं, प्रभाव हैं, तत्त्व हैं, रहस्य हैं, महिमा है, लीलाएँ हैं, नाम हैं, धाम हैं; भगवान् का अनन्त ऐश्वर्य है, माधुर्य है, सौन्दर्य है—इन विभूतियोंकी तरफ शरणागत भक्त देखता ही नहीं। उसका यही एक भाव रहता है कि ‘मैं केवल भगवान् का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं। अगर वह गुण, प्रभाव आदिकी तरफ देखकर भगवान् की शरण लेता है तो वास्तवमें वह गुण, प्रभाव आदिके ही शरण हुआ, भगवान् के शरण नहीं हुआ। परंतु इन बातोंका उलटा अर्थ न लगा लें।’

उलटा अर्थ लगाना क्या है? भगवान् के गुण, प्रभाव, नाम, धाम, ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य आदिको मानना ही नहीं है, इनकी तरफ जाना ही नहीं है। अब कुछ करना है ही नहीं, न भजन करना है, न भगवान् के गुण, प्रभाव, लीला आदि सुननी है, न भगवान् के धाममें जाना है—यह उलटा अर्थ लगाना है। इनका ऐसा अर्थ लगाना महान् अनर्थ करना है।

केवल एक भगवान् के शरण होनेका तात्पर्य है—केवल भगवान् मेरे हैं, अब वे ऐश्वर्य-सम्पन्न हैं तो बड़ी अच्छी बात और कुछ भी ऐश्वर्य नहीं है तो बड़ी अच्छी बात। वे बड़े दयालु हैं तो बड़ी अच्छी बात और बड़े निष्ठुर, कठोर हैं कि उनके समान दुनियामें कोई कठोर है ही नहीं तो बड़ी अच्छी बात। उनका बड़ा भारी प्रभाव है तो बड़ी अच्छी बात और उनमें कोई प्रभाव नहीं है तो बड़ी अच्छी बात। शरणागतमें इन बातोंकी कोई परवाह नहीं होती। उसका तो एक ही भाव रहता है कि भगवान् जैसे भी हैं, हमारे हैं*। भगवान् की इन बातोंकी परवाह न होनेसे भगवान् का ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, गुण, प्रभाव आदि चले जायँगे, ऐसी बात नहीं है। पर हम उनकी परवाह नहीं करेंगे तो हमारी असली शरणागति होगी।

जहाँ गुण, प्रभाव आदिको लेकर भगवान् की शरण होते हैं, वहाँ केवल भगवान् की शरण नहीं होते, प्रत्युत गुण, प्रभाव आदिकी ही शरण होते हैं; जैसे—कोई रुपयोंवाले आदमीका आदर करे तो वास्तवमें वह आदर उस आदमीका नहीं, रुपयोंका है। किसी मिनिस्टरका कितना ही आदर किया जाय तो वह आदर उसका नहीं, मिनिस्टरी (पद) का है। किसी बलवान् व्यक्तिका आदर किया जाय तो वह उसके बलका आदर है, उसका खुदका आदर नहीं है। परंतु अगर कोई केवल व्यक्ति (धनी आदि)का आदर करे तो इससे धनीका धन या मिनिस्टरकी मिनिस्टरी चली जायगी—यह बात नहीं है। वह तो रहेगी ही। ऐसे ही केवल भगवान् की शरण होनेसे भगवान् के गुण, प्रभाव आदि चले जायँगे—ऐसी बात नहीं है। परंतु हमारी दृष्टि तो केवल भगवान् पर ही रहनी चाहिये; उनके गुण आदिपर नहीं।

सप्तर्षियोंने जब पार्वतीजीके सामने शिवजीके अनेक अवगुणोंका और विष्णुके अनेक सद्‍गुणोंका वर्णन करते हुए उन्हें शिवजीका त्याग करनेके लिये कहा तो पार्वतीजीने उन्हें यही उत्तर दिया—

महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।

जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥

(मानस १।८०)

ऐसी ही बात गोपियोंने भी उद्धवजीसे कही थी—

ऊधौ! मन माने की बात।

दाख छोहारा छाड़ि अमृतफल बिषकीरा बिष खात॥

जो चकोर को दै कपूर कोउ, तजि अंगार अघात।

मधुप करत घर कोरे काठ में, बँधत कमल के पात॥

ज्यों पतंग हित जान आपनो, दीपक सों लपटात।

‘सूरदास’ जाको मन जासों, ताको सोइ सुहात॥

भगवान् के प्रभाव आदिकी तरफ देखनेवालेको, उससे प्रेम करनेवालेको मुक्ति, ऐश्वर्य आदि तो मिल जायगा, पर भगवान् नहीं मिल सकते। भगवान् के प्रभावकी तरफ न देखनेवाला भगवत्प्रेमी भक्त ही भगवान् को पा सकता है। इतना ही नहीं, वह प्रेमी भक्त भगवान् को बाँध सकता है, उनकी भी बिक्री कर सकता है! भगवान् देखते हैं कि वह मेरेसे प्रेम करता है, मेरे प्रभावकी तरफ देखतातक नहीं तो भगवान् के मनमें उसका बड़ा आदर होता है।

प्रभावकी तरफ देखना यह सिद्ध करता है कि हमारेमें कुछ पानेकी कामना है। हमारे मनमें उस कामनावाले पदार्थका आदर है। जबतक हमारेमें कामना है, तबतक हम प्रभावको देखते हैं। अगर हमारे मनमें कोई कामना न रहे तो भगवान् के प्रभाव, ऐश्वर्यकी तरफ हमारी दृष्टि नहीं जायगी। केवल भगवान् की तरफ दृष्टि होगी तो हम भगवान् के शरण हो जायँगे, भगवान् के अपने हो जायँगे।

विचार करें, पूतना राक्षसी जहर लगाकर स्तन मुखमें देती है। उसको भगवान् ने माताकी गति दे दी*—‘जसुमति की गति पाई’ अर्थात् जो मुक्ति यशोदा मैयाको मिले, वह मुक्ति पूतनाको मिल गयी। जो मुखमें जहर देती है, उसे तो भगवान् ने मुक्ति दे दी। अब जो रोजाना दूध पिलाती है, उस मैयाको भगवान् क्या दें? तो अनन्त जीवोंको मुक्ति देनेवाले भगवान् मैयाके अधीन हो गये, उन्हें अपने-आपको ही दे दिया। मैयाके इतने वशीभूत हो गये कि मैया छड़ी दिखाती है तो वे डरकर रोने लग जाते हैं। कारण कि मैयाकी भगवान् के प्रभाव, ऐश्वर्यकी तरफ दृष्टि ही नहीं है। इस प्रकार जो भगवान् से मुक्ति चाहते हैं, उन्हें भगवान् मुक्ति दे देते हैं, पर जो कुछ भी नहीं चाहता, उसे भगवान् अपने-आपको ही दे देते हैं।

‘अहो! इस पापिनी पूतनाने जिसे मार डालनेकी इच्छासे अपने स्तनोंपर लगाया हुआ कालकूट विष पिलाकर भी वह गति प्राप्त की, जो धात्रीको मिलनी चाहिये, उसके अलावा और कौन दयालु है, जिसकी शरणमें जायँ!’

सर्वभावसे भगवान् की शरण होनेका रहस्य यह है कि हमारा शरीर अच्छा है, इन्द्रियाँ वशमें हैं, मन शुद्ध निर्मल है, बुद्धिसे हम ठीक जानते हैं, हम पढ़े-लिखे हैं, हम यशस्वी हैं, हमारा संसारमें मान है—इस प्रकार ‘हम भी कुछ हैं’ ऐसा मानकर भगवान् की शरण होना शरणागति नहीं है। भगवान् की शरण होनेके बाद शरणागतको ऐसा विचार भी नहीं करना चाहिये कि हमारा शरीर ऐसा होना चाहिये; हमारी बुद्धि ऐसी होनी चाहिये; हमारा मन ऐसा होना चाहिये; हमारा ऐसा ध्यान लगना चाहिये; हमारी ऐसी भावना होनी चाहिये; हमारे जीवनमें ऐसे-ऐसे लक्षण आने चाहिये; हमारे ऐसे आचरण होने चाहिये; हमारेमें ऐसा प्रेम होना चाहिये कि कथा-कीर्तन सुननेपर आँसू बहने लगें, कण्ठ गद्‍गद हो जाय; पर ऐसा हमारे जीवनमें हुआ ही नहीं तो हम भगवान् की शरण कैसे हुए? आदि-आदि। ये बातें अनन्य शरणागतिकी कसौटी नहीं हैं। जो अनन्य शरण हो जाता है, वह यह देखता ही नहीं कि शरीर बीमार है कि स्वस्थ है? मन चंचल है कि स्थिर है? बुद्धिमें जानकारी है कि अनजानपना है? अपनेमें मूर्खता है कि विद्वत्ता है? योग्यता है कि अयोग्यता है? आदि। इन सबकी तरफ वह स्वप्नमें भी नहीं देखता; क्योंकि उसकी दृष्टिमें ये सब चीजें कूड़ा-करकट हैं, जिन्हें अपने साथ नहीं लेना है। यदि इन चीजोंकी तरफ देखेगा तो अभिमान ही बढ़ेगा कि मैं भगवान् का शरणागत भक्त हूँ अथवा निराश होना पड़ेगा कि मैं भगवान् के शरण तो हो गया, पर भक्तोंके गुण (अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कार: समदु:खसुख: क्षमी॥ इत्यादि, गीता १२। १३—१९) तो मेरेमें आये ही नहीं! तात्पर्य यह हुआ कि अगर अपनेमें भक्तोंके गुण दिखायी देंगे तो उनका अभिमान हो जायगा और अगर नहीं दिखायी देंगे तो निराशा हो जायगी। इस वास्ते यही अच्छा है कि भगवान् की शरण होनेके बाद इन गुणोंकी तरफ भूलकर भी नहीं देखें। इसका यह उलटा अर्थ न लगा लें कि हम चाहे वैर-विरोध करें, चाहे द्वेष करें, चाहे ममता करें, चाहे जो कुछ करें! यह अर्थ बिलकुल नहीं है। तात्पर्य है कि इन गुणोंकी तरफ खयाल ही नहीं होना चाहिये। भगवान् के शरण होनेवाले भक्तमें ये सब-के-सब गुण अपने-आप ही आयेंगे, पर इनके आने या न आनेसे उसको कोई मतलब नहीं रखना चाहिये। अपनेमें ऐसी कसौटी नहीं लगानी चाहिये कि अपनेमें ये गुण या लक्षण हैं या नहीं।

सच्चा शरणागत भक्त तो भगवान् के गुणोंकी तरफ भी नहीं देखता और अपने गुणोंकी तरफ भी नहीं देखता। वह भगवान् के ऊँचे-ऊँचे प्रेमियोंकी तरफ भी नहीं देखता कि ऊँचे प्रेमी ऐसे-ऐसे होते हैं; तत्त्वको जाननेवाले जीवन्मुक्त ऐसे-ऐसे होते हैं।

प्राय: लोग ऐसी कसौटी लगाते हैं कि यह भगवान् का भजन करता है तो बीमार कैसे हो गया? भगवान् का भक्त हो गया तो उसको बुखार क्यों आ गया? उसपर दु:ख क्यों आ गया? उसका बेटा क्यों मर गया? उसका धन क्यों चला गया? उसका संसारमें अपयश क्यों हो गया? उसका निरादर क्यों हो गया? आदि-आदि। ऐसी कसौटी कसना बिलकुल फालतू बात है, बड़े नीचे दर्जेकी बात है। ऐसे लोगोंको क्या समझायें! वे सत्सङ्गके नजदीक ही नहीं आये, इसी वास्ते उनको इस बातका पता ही नहीं है कि भक्ति क्या होती है? शरणागति क्या होती है? वे इन बातोंको समझ ही नहीं सकते, परंतु इसका अर्थ यह भी नहीं है कि भगवान् का भक्त दरिद्र होता ही है, उसका संसारमें अपमान होता ही है, उसकी निन्दा होती ही है। शरणागत भक्तको तो निन्दा-प्रशंसा, रोग-नीरोगता आदिसे कोई मतलब ही नहीं होता। इनकी तरफ वह देखता ही नहीं। वह यही देखता है कि मैं हूँ और भगवान् हैं, बस। अब संसारमें क्या है, क्या नहीं है? त्रिलोकीमें क्या है, क्या नहीं है? प्रभु ऐसे हैं, वे उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाले हैं—इन बातोंकी तरफ उसकी दृष्टि जाती ही नहीं।

किसीने एक सन्तसे पूछा—‘आप किस भगवान् के भक्त हो? जो उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय करते हैं, उनके भक्त हो क्या?’ तो उस सन्तने उत्तर दिया—‘हमारे भगवान् का तो उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयके साथ कोई सम्बन्ध है ही नहीं। यह तो हमारे प्रभुका एक ऐश्वर्य है। यह कोई विशेष बात नहीं है।’ शरणागत भक्तको ऐसा होना चाहिये। ऐश्वर्य आदिकी तरफ उसकी दृष्टि ही नहीं होनी चाहिये।

ऋषिकेशमें गङ्गाजीके किनारे टीबड़ीपर शामको सत्सङ्ग हो रहा था। गरमी पड़ रही थी। उधरसे गङ्गाजीकी ठण्डी हवाकी लहर आयी तो एक सज्जनने कहा—‘कैसी ठण्डी हवाकी लहर आ रही है!’ पास बैठे दूसरे सज्जनने उनसे कहा—‘हवाको देखनेके लिये तुम्हें वक्त कैसे मिल गया? यह ठण्डी हवा आयी, यह गरम हवा आयी—इस तरफ तुम्हारा खयाल कैसे चला गया?’ भगवान् के भजनमें लगे हो तो हवा ठण्डी आयी या गरम आयी, सुख आया या दु:ख आया—इस तरफ जबतक खयाल है, तबतक भगवान् की तरफ खयाल कहाँ? इसी विषयमें हमने एक कहानी सुनी है। कहानी तो नीचे दर्जेकी है, पर उसका निष्कर्ष बड़ा अच्छा है।

एक कुलटा स्त्री थी। उसको किसी पुरुषसे संकेत मिला कि इस समय अमुक स्थानपर तुम आ जाना। तो वह समयपर अपने प्रेमीके पास जा रही थी। रास्तेमें एक मस्जिद पड़ती थी। मस्जिदकी दीवारें छोटी-छोटी थीं। दीवारके पास ही वहाँका मौलवी झुककर नमाज पढ़ रहा था। वह कुलटा अनजानेमें उसके ऊपर पैर रखकर निकल गयी। मौलवीको बड़ा गुस्सा आया कि कैसी औरत है यह! इसने मेरेपर जूतीसहित पैर रखकर हमको नापाक (अशुद्ध) बना दिया! वह वहीं बैठकर उसको देखता रहा कि कब आयेगी। जब वह कुलटा पीछे लौटकर आयी तो मौलवीने उसको धमकाया कि ‘कैसी बेअक्ल हो तुम! हम परवरदिगारकी बंदगीमें बैठे थे, नमाज पढ़ रहे थे और तुम हमारेपर पैर रखकर चली गयी!’ तब वह बोली—

मैं नर-राची ना लखी, तुम कस लख्यो सुजान।

पढ़ि कुरान बौरा भया, राच्यो नहिं रहमान॥

एक पुरुषके ध्यानमें रहनेके कारण मेरेको इसका पता ही नहीं लगा कि सामने दीवार है या कोई मनुष्य है, पर तू तो भगवान् के ध्यानमें था, फिर तूने मेरेको कैसे पहचान लिया कि वह यही थी? तू केवल कुरान पढ़-पढ़कर बावला हो गया है। अगर तू भगवान् के ध्यानमें रचा हुआ होता तो मुझे पहचान लेता? कौन आया, कैसे आया, मनुष्य था कि पशु-पक्षी था, क्या था, क्या नहीं था, कौन ऊपर आया, कौन नीचे आया, किसने पैर रखा—इधर तेरा खयाल ही क्यों जाता? तात्पर्य है कि एक भगवान् को छोड़कर किसीकी तरफ ध्यान ही कैसे जाय? दूसरी बातोंका पता ही कैसे लगे? जबतक दूसरी बातोंका पता लगता है तबतक वह शरण कहाँ हुआ?

कौरव-पाण्डव जब लड़के थे तो वे अस्त्र-शस्त्र सीख रहे थे। सीखकर जब तैयार हो गये तो उनकी परीक्षा ली गयी। एक वृक्षपर एक बनावटी चिड़िया बैठा दी गयी और सबसे कहा गया कि उस चिड़ियाके कण्ठपर तीर मारकर दिखाओ। एक-एक करके सभी आने लगे। गुरुजी पहले सबसे अलग-अलग पूछते कि बताओ तुम्हें वहाँ क्या दीख रहा है? तो कोई कहता कि हमें तो वृक्ष दीखता है; कोई कहता कि हमें तो टहनी दीखती है; कोई कहता कि हमें तो चिड़िया दीखती है, चोंच भी दीखती है, पंख भी दीखते हैं। ऐसा कहनेवालोंको वहाँसे हटा दिया गया। जब अर्जुनकी बारी आयी तो उनसे पूछा गया कि तुमको क्या दीखता है तो अर्जुनने कहा कि मेरेको तो केवल कण्ठ ही दीखता है और कुछ भी नहीं दीखता। तब अर्जुनसे बाण मारनेके लिये कहा गया। अर्जुनने अपने बाणसे उस चिड़ियाका कण्ठ बेध दिया क्योंकि उसकी लक्ष्यपर दृष्टि ठीक थी। अगर चिड़िया दीखती है, वृक्ष, टहनी आदि दीखते हैं तो लक्ष्य कहाँ सँधा है? अभी तो दृष्टि फैली हुई है। लक्ष्य होनेपर तो वही दीखेगा, जो लक्ष्य होगा। लक्ष्यके सिवाय दूसरा कुछ दीखेगा ही नहीं। इसी प्रकार जबतक मनुष्यका लक्ष्य एक नहीं हुआ है, तबतक वह अनन्य कैसे हुआ? अव्यभिचारी ‘अनन्ययोग’ होना चाहिये—‘मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी’ (गीता १३।१०)। ‘अन्ययोग’ नहीं होना चाहिये अर्थात् शरीर, मन, बुद्धि, अहं आदिकी सहायता नहीं होनी चाहिये। वहाँ तो केवल एक भगवान् ही होने चाहिये।

गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजसे किसीने कहा—‘तुम जिन रामललाकी भक्ति करते हो, वे तो बारह कलाके अवतार हैं, पर सूरदासजी जिन भगवान् कृष्णकी भक्ति करते हैं, वे सोलह कलाके अवतार हैं! यह सुनते ही गोस्वामीजी महाराज उसके चरणोंमें गिर पड़े और बोले—‘अहो! आपने बड़ी भारी कृपा कर दी! मैं तो रामको दशरथजीके लाडले कुँवर समझकर ही भक्ति करता था। अब पता लगा कि वे बारह कलाके अवतार हैं! इतने बड़े हैं वे? आपने आज नयी बात बताकर बड़ा उपकार किया।’ अब कृष्ण सोलह कलाके अवतार हैं—यह बात उन्होंने सुनी ही नहीं, इस तरफ उनका ध्यान ही नहीं गया।

भगवान् के प्रति भक्तोंके अलग-अलग भाव होते हैं। कोई कहता है कि दशरथजीकी गोदमें खेलनेवाले जो रामलला हैं, वे ही हमारे इष्ट हैं—‘इष्टदेव मम बालक रामा’ (मानस ७। ७५। ३); राजाधिराज रामचन्द्रजी नहीं, छोटा-सा रामलला। कोई भक्त कहता है कि हमारे इष्ट तो लड्डूगोपाल हैं, नन्दके लाला हैं। वे भक्त अपने रामललाको, नन्दलालाको सन्तोंसे आशीर्वाद दिलाते हैं तो भगवान् को यह बहुत प्यारा लगता है। तात्पर्य है कि भक्तोंकी दृष्टि भगवान् के ऐश्वर्यकी तरफ जाती ही नहीं।

या ब्रजरज की परस से, मुकति मिलत है चार।

वा रजको नित गोपिका, डारत डगर बुहार॥

आँगनकी जिस रजमें कन्हैया खेलते हैं, वह रज कोई ले ले तो उसको चारों प्रकारकी मुक्ति मिल जाय। पर यशोदा मैया उसी रजको बुहारकर बाहर फेंक देती है। मैयाके लिये तो वह कूड़ा-करकट है। अब मुक्ति किसको चाहिये? मैयाका केवल कन्हैयाकी तरफ ही खयाल है। न तो कन्हैयाके ऐश्वर्यकी तरफ खयाल है और न योग्यताकी तरफ ही खयाल है।

सन्तोंने कहा है कि अगर भगवान् से मिलना हो तो साथमें साथी नहीं होना चाहिये और सामान भी नहीं होना चाहिये अर्थात् साथी और सामानके बिना उनसे मिलो। जब साथी, सहारा साथमें है तो तुम क्या मिले भगवान् से? और मन, बुद्धि, विद्या, धन आदि सामान साथमें बँधा रहेगा तो उसका परदा (व्यवधान) रहेगा। परदेमें मिलन थोड़े ही होता है? वहाँ तो कपड़ेका भी व्यवधान होता है। कपड़ा ही नहीं, माला भी आड़में आ जाय तो मिलन क्या हुआ? इस वास्ते साथमें कोई साथी और सामान न हो तो भगवान् से जो मिलन होगा, वह बड़ा विलक्षण और दिव्य होगा।

एक महात्माजीको खेतमें काम करनेवाला एक व्रजवासी ग्वाला मिल गया। वह भगवान् का भक्त था। महात्माजीने उससे पूछा—‘तुम क्या करते हो?’ उसने कहा—‘हम तो अपने लाला कन्हैयाका काम करते हैं।’ महात्माजीने कहा—‘हम भगवान् के अनन्य भक्त हैं, तुम क्या हो?’ उसने कहा—‘हम फनन्य भक्त हैं।’ महात्माजीने पूछा—‘फनन्य भक्त क्या होता है?’ तो उसने भी पूछा—‘अनन्य भक्त क्या होता है?’ महात्माजीने कहा—‘अनन्य भक्त वह होता है जो सूर्य, शक्ति, गणेश, ब्रह्मा आदि किसीको भी न माने, केवल हमारे कन्हैयाको ही माने।’ उसने कहा—‘बाबाजी, हम तो इन ससुरोंका नाम भी नहीं जानते कि ये क्या होते हैं, क्या नहीं होते; हमें इनका पता ही नहीं है; तो हम फनन्य हो गये कि नहीं?’ इस प्रकार ब्रह्म क्या होता है? आत्मा क्या होती है? सगुण और निर्गुण क्या होता है? साकार और निराकार क्या होता है? इत्यादि बातोंकी तरफ शरणागत भक्तका खयाल ही नहीं होना चाहिये।

व्रजकी एक बात है। एक सन्त कुएँपर किसीसे बात कर रहे थे कि ब्रह्म है, परमात्मा है, जीवात्मा है आदि। वहाँ एक गोपी जल भरने आयी। उसने कान लगाया कि बाबाजी क्या बात कर रहे हैं। जब वह गोपी दूसरी गोपीसे मिली तो उससे पूछा—‘अरी सखी! यह ब्रह्म क्या होता है?’ उसने कहा—‘हमारे लालाका ही कोई अड़ोसी-पड़ोसी, सगा-सम्बन्धी होगा! हमलोग तो जानती नहीं सखी! ये लोग उसीकी धुनमें लगे हैं न? इस वास्ते सब जानते हैं। हमारे तो एक नन्दके लाला ही हैं। कोई काम हो तो नन्दबाबासे कह देंगे, गिरिराजसे कह देंगे कि महाराज! आप कृपा करो। कन्हैया तो भोला-भाला है, वह क्या समझेगा और क्या करेगा? कन्हैयासे क्या मिलेगा? अरी सखी! वह कन्हैया हमारा है, और क्या मिलेगा?’ हम भी अकेले हैं और वह कन्हैया भी अकेला है। हमारे पास भी कुछ सामान नहीं और उसके पास भी कुछ सामान नहीं, बिलकुल नंग-धड़ंग बाबा—‘नगन मूरति बाल-गोपालकी, कतरनी बरनी जग जालकी।’ अब ऐसे कन्हैयासे क्या मिलेगा।

यशोदा मैया दाऊजीसे कहती हैं—‘देख दाऊ! यह कन्हैया बहुत भोला-भाला है, तू इसका खयाल रखा कर कि कहीं यह जंगलमें दूर न चला जाय।’ दाऊजी कहते हैं—‘मैया! यह कन्हैया बड़ा चंचल है। जंगलमें मेरे साथ चलता है तो चलते-चलते कोई साँपका बिल देखता है तो उसमें हाथ डाल देता है, अब इसे कोई साँप काट ले तो?’ मैया कहती है—‘बेटा! अभी यह छोटा-सा अबोध बालक है, तू बड़ा है, इस वास्ते तू इसकी निगाह रखा कर।’ अब दाऊ भैया और सब ग्वाल-बाल कन्हैयाकी निगाह रखते हैं। ग्वाल-बाल और यशोदा मैयासे कोई कहे कि कन्हैया तो सब दुनियाका पालन करता है तो वे यही कहेंगे कि तुम्हारा ऐसा भगवान् होगा जो सब दुनियाका पालन करता होगा। हमारा तो ऐसा नहीं है। हमारा छोटा-सा कन्हैया दुनियाका क्या पालन करेगा?

एक बाबाजीकी गोपियोंसे बातचीत चली। वे बाबाजी बात करते-करते कहने लगे कि कृष्ण इतने ऐश्वर्यशाली हैं, उनका इतना माधुर्य है, उनके पास ऐश्वर्यका इतना खजाना है आदि, तो गोपियाँ कहने लगीं—‘महाराज! उस खजानेकी चाबी तो हमारे पास है! कन्हैयाके पास क्या है? उसके पास तो कुछ भी नहीं है। कोई उससे माँगेगा तो वह कहाँसे देगा?’ इस वास्ते किसीको कुछ चाहिये तो कन्हैयाके पास न जाये। कन्हैयाके पास, उसकी शरणमें तो वही जाये, जिसको कभी कुछ नहीं चाहिये। किसी भी अवस्थामें कुछ भी नहीं चाहिये। अर्थात् विपत्ति, मौत आदिकी अवस्थामें भी ‘मेरी थोड़ी सहायता कर दो, रक्षा कर दो’ ऐसा भाव नहीं हो।

भगवान् श्रीरामसे वाल्मीकिजी कहते हैं—

जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।

बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥

(मानस २।१३१)

कुछ भी चाहनेका भाव न होनेसे भगवान् स्वाभाविक ही प्यारे लगते हैं, मीठे लगते हैं—‘तुम्ह सन सहज सनेहु’ जिसमें चाह नहीं है, वह भगवान् का खास घर है—‘सो राउर निज गेहु।’ यदि चाहना भी साथमें रखें और भगवान् को भी साथमें रखें तो वह भगवान् का खास घर नहीं है। भगवान् के साथ ‘सहज’ स्नेह हो, स्नेहमें कोई मिलावट न हो अर्थात् कुछ भी चाहना न हो। जहाँ कुछ भी चाहना हो जाय, वहाँ प्रेम कैसा? वहाँ तो आसक्ति, वासना, मोह, ममता ही होते हैं। इस वास्ते गोपियाँ सावधान करती हुई कहती हैं—

मा यात पान्था: पथि भीमरथ्या

दिगम्बर: कोऽपि तमालनील:।

विन्यस्तहस्तोऽपि नितम्बविम्बे

धूत: समाकर्षति चित्तवित्तम्॥

‘अरे पथिको! उस गलीसे मत जाना, वह बड़ी भयावनी है! वहाँ अपने नितम्बविम्बपर दोनों हाथ रखे जो तमालके समान नीले रंगका एक नंग-धड़ंग बालक खड़ा है, वह केवल देखनेमात्रका अवधूत है। वास्तवमें तो वह अपने पासमेंसे होकर निकलनेवाले किसी भी पथिकके चित्तरूपी धनको लूटे बिना नहीं रहता।’

वह जो काला-काला नंग-धड़ंग बालक खड़ा है न? उससे तुम लुट जाओगे, रीते रह जाओगे! वह ऐसा चोर है कि सब खत्म कर देगा। उधर जाना ही मत, पहले ही खयाल रखना। अगर चले गये तो फिर सदाके लिये ही चले गये! इस वास्ते कोई अच्छी तरहसे जीना चाहे तो उधर मत जाय। उसका नाम कृष्ण है न? कृष्ण कहते हैं खींचनेवालेको। एक बार खींच ले तो फिर छोड़े ही नहीं। उससे पहचान न हो, तबतक तो ठीक है। अगर उससे पहचान हो गयी तो फिर मामला खत्म। फिर किसी कामके नहीं रहोगे, त्रिलोकीभरमें निकम्में हो जाओगे!

‘नारायन’ बौरी भई डोलै, रही न काहू काम की॥

जाहि लगन लगी घनस्याम की।

हाँ, जो किसी कामका नहीं होता, वह सबके लिये सब कामका होता है। परंतु उसको किसी कामसे कोई मतलब नहीं होता।

शरणागत भक्तको भजन भी करना नहीं पड़ता। उसके द्वारा स्वत: स्वाभाविक भजन होता है। भगवान् का नाम उसे स्वाभाविक ही बड़ा मीठा, प्यारा लगता है। अगर कोई पूछे कि तुम श्वास क्यों लेते हो? यह हवाको भीतर-बाहर करनेका क्या धंधा शुरू कर रखा है? तो यही कहेंगे कि भाई! यह धंधा नहीं है, इसके बिना हम जी ही नहीं सकते। ऐसे ही शरणागत भक्त भजनके बिना रह ही नहीं सकता। जिसको सब कुछ अर्पित कर दिया, उसके विस्मरणमें परम व्याकुलता, महान् छटपटाहट होने लगती है—‘तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति’ (नारदभक्तिसूत्र १९)। ऐसे भक्तसे अगर कोई कहे कि आधे क्षणके लिये भगवान् को भूल जाओ तो त्रिलोकीका राज्य मिलेगा तो वह इसे भी ठुकरा देगा। भागवतमें आया है—

त्रिभुवनविभवहेतवेऽप्यकुण्ठ-

स्मृतिरजितात्मसुरादिभिर्विमृग्यात्।

न चलति भगवत्पदारविन्दा-

ल्लवनिमिषार्धमपि य: स वैष्णवाग्र्य:॥

(११। २। ५३)

‘तीनों लोकोंके समस्त ऐश्वर्यके लिये भी उन देवदुर्लभ भगवच्चरणकमलोंको जो आधे निमेषके लिये भी नहीं त्याग सकते, वे ही श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं।’

न पारमेष्ठॺं न महेन्द्रधिष्ण्यं

न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।

न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा

मय्यर्पितात्मेच्छति मद्विनान्यत्॥

(श्रीमद्भा० ११।१४।१४)

‘भगवान् कहते हैं कि स्वयंको मेरे अर्पित करनेवाला भक्त मुझे छोड़कर ब्रह्माका पद, इन्द्रका पद, सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य, पातालादि लोकोंका राज्य, योगकी समस्त सिद्धियाँ और मोक्षको भी नहीं चाहता।’

भरतजी कहते हैं—

अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान।

जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन॥

(मानस २।२०४)