स्वाधीनताका रहस्य

मनुष्य-शरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मिला है। इसके सामने जो भी परिस्थिति आती है, वह सब-की-सब साधन-सामग्री है। उसीके सदुपयोगसे परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। मनुष्यके मनमें रहती है कि परिस्थिति बदल जाय, शरीर ठीक नहीं है तो ठीक हो जाय, धन नहीं है तो धनवान् हो जायँ; ऐसी परिस्थिति हो जाय तो फिर हम भजन करें। वास्तवमें परिस्थितिके बदलनेकी बिलकुल आवश्यकता नहीं है। जैसी स्थितिमें स्थित हैं, उसी स्थितिमें परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है! सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्तिमें तो अलग-अलग स्थिति, योग्यता, परिस्थिति आदिकी आवश्यकता होती है! पर परमात्माकी प्राप्तिमें आपकी जो योग्यता है, जो स्थिति है, जो परिस्थिति है, उसीमें परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। कितनी विलक्षण बात है! केवल आपकी इच्छा चाहिये कि हमें एकमात्र परमात्माकी प्राप्ति करनी है। यह इच्छा प्रबल होनी चाहिये अर्थात् इस इच्छाके सिवाय दूसरी सम्पूर्ण इच्छाएँ नष्ट हो जायँ। भगवान् के लिये यह कहा गया है—‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिक: कुतोऽन्य:।’ (गीता ११। ४३) ‘आपके समान भी कोई नहीं है, फिर आपसे श्रेष्ठ कैसे होगा?’ अत: वे परमात्मा सर्वोपरि हैं, इसलिये उनकी इच्छा भी सर्वोपरि होनी चाहिये।

परमात्मप्राप्तिकी एक ही उत्कट अभिलाषा हो। मैं जीता रहूँ, नीरोग हो जाऊँ, धनवान् हो जाऊँ, विद्वान् हो जाऊँ, योग्य बन जाऊँ; लोग मेरेको अच्छा मानें, मेरी महिमा गायें, मेरा आदर करें आदि कोई भी इच्छा न हो। कुछ भी योग्यता, विद्या आदि न होनेपर भी परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है—यह बात मेरेको बिलकुल स्पष्ट दीखती है। जितनी भिन्नता है, वह सांसारिक दृष्टिसे है। कोई योग्य है, कोई अयोग्य है; कोई विद्वान् है, कोई मूर्ख है; कोई धनवान् है, कोई निर्धन है; कोई होशियार है, कोई भोलाभाला है—इस तरह संसारकी दृष्टिसे तो भिन्नता रहती है, परन्तु जब संसारका त्याग और परमात्माको प्राप्त करना हो, तब यह भिन्नता नहीं रहती। संसारकी कैसी ही अवस्था, परिस्थिति क्यों न हो, उसका मनसे त्याग करना है, उससे ऊँचा उठना है, उससे अपना कुछ भी सम्बन्ध नहीं रखना है। जिसका त्याग ही करना है, वह चाहे बढ़िया हो, चाहे घटिया हो, उससे हमारा क्या सम्बन्ध?

कोई विद्वान् है, कोई मूर्ख है; कोई धनवान् है, कोई निर्धन है, कोई योग्य है, कोई अयोग्य है—ये अवस्थाएँ संसारकी हैं। संसारसे विमुख होना है तो विद्वत्ता, धनवत्ता आदि भी छोड़नी है और मूर्खता, निर्धनता आदि भी छोड़नी है। कारण कि परमात्माकी प्राप्ति संसारके द्वारा नहीं होती, प्रत्युत संसारके त्यागसे होती है। सांसारिक योग्यता आदि तो सीमित होती है, पर त्याग सीमित नहीं होता। त्याग असीम होता है, जिससे असीम परमात्माकी प्राप्ति होती है। अत: सांसारिक चीजोंका जो सहारा है, अन्त:करणमें उनका जो महत्त्व है, उसका त्याग करना है। स्वरूपसे संसारका त्याग कोई कर सकता नहीं और करनेसे मुक्ति होती नहीं। अगर मुक्ति होती तो सब मरनेवालोंकी मुक्ति होनी चाहिये; क्योंकि वे शरीर, धन, परिवार आदिको छोड़कर जाते हैं और पीछे कोई तार, चिट्ठी, समाचारतक नहीं भेजते—इतना त्याग करते हैं! परन्तु ऐसे बाहरी त्यागसे मुक्ति नहीं होती। त्याग भीतरका होना चाहिये। भीतरमें जो राग, आसक्ति, प्रियता, महत्ता है, वही बन्धनका कारण है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३।२१)। जब भीतरसे सम्बन्ध-विच्छेद करना है, तो फिर वस्तु बढ़िया हो, घटिया हो; ज्यादा हो, कम हो—इससे क्या फर्क पड़ेगा?

श्रोता—भगवान् ने यह संसार बनाया, तो फिर यह माया-जाल क्यों फैलाया?

स्वामीजी—देखो, यह जो कहते हैं कि भगवान् की मायाने हमें फँसा दिया, वास्तवमें देखा जाय तो भगवान् की मायाने हमें नहीं फँसाया है। भगवान् की मायाको हमने अपनी मान लिया—इस बेईमानीने हमें फँसाया है! जिन प्राणी-पदार्थोंको हम अपना मान लेते हैं, उनमें ही हम फँसते हैं। जिनको अपना नहीं मानते, उनमें हम नहीं फँसते।

श्रोता—आपने फरमाया कि भगवान् सबका कल्याण चाहते हैं?

स्वामीजी—चाहते तो हैं, पर जबर्दस्ती नहीं करते। जो बड़े पुरुष होते हैं, वे जबर्दस्ती नहीं करते। भगवान् तो बड़ोंके सरदार हैं, वे जबर्दस्ती कैसे करेंगे?

जैसा मैं कहूँ, जैसा मैं चाहूँ, दूसरा वैसा ही करे—यह बात तो पशुओंमें भी है। अच्छे पुरुषोंमें यह बात नहीं होती। अच्छे पुरुषोंको तो आप आग्रह करो, आप गरज करो, तब वे बड़े बनते हैं, गुरु बनते हैं। उनमें यह बात नहीं होती कि मैं ही सबका गुरु बन जाऊँ। मैं अपनी इच्छाके अनुसार दूसरेसे कार्य करा लूँ—यह अच्छी बात नहीं है, बहुत नीची बात है। भगवान् श्रीरामने जहाँ प्रजाको उपदेश दिया है, वहाँ भी साफ कहा है कि अगर मैं अनुचित बात कह दूँ तो तुम लोग भय छोड़कर मेरेको मना कर देना—

जौं अनीति कछु भाषौं भाई।

तौ मोहि बरजहु भय बिसराई॥

(मानस, उत्तर० ४३।३)

ऐसा कहनेका अर्थ यह हुआ कि मैं जैसा कहूँ, वैसा ही करो—यह बात नहीं है, आपको जो अच्छा लगे, वैसा करो। भगवान् किसीके साथ जबर्दस्ती नहीं करते।

आपको अस्पतालमें आपरेशन करवाना हो तो पहले यह लिखकर देना पड़ेगा कि अगर मैं मर जाऊँ तो कोई हर्ज नहीं है, तब वे आपरेशन करेंगे। किसीसे भी काम कराना हो तो उसको पूरा अधिकार देना चाहिये। अधिकार देना हाथकी बात है, पर अधिकार लेना हाथकी बात नहीं है। अत: भगवान् किसीका अधिकार लेते नहीं हैं। भगवान् अर्जुनके घोड़े हाँकते हैं, उनकी आज्ञाका पालन करते हैं—‘सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्’ (गीता १। २४)। परन्तु उनको शरणमें नहीं लेते, प्रत्युत उनको शरणमें आनेके लिये कहते हैं—‘मामेकं शरणं व्रज’ (गीता १८। ६६)। शरणमें लेना भगवान् का काम नहीं है।*

भगवान् सबको स्वतन्त्रता देते हैं। उदार वही होता है जो सबको स्वतन्त्रता देता है, किसीपर भी अपना हक नहीं जमाता। जो दूसरोंपर हक जमाता है, वह नीचे दरजेका आदमी होता है। परन्तु आजकल लोगोंकी उलटी बुद्धि हो गयी कि अगर हम किसीपर हक जमायें तो हम बड़े आदमी हो जायँगे, दूसरे हमारा कहना मानें तो हम बड़े हो जायँगे! वास्तवमें तुम्हारा कहना माननेसे तुम गुलाम हो जाओगे, बड़े नहीं हो जाओगे। कहना माननेवाला मालिक हो जाता है और कहना मनानेवाला गुलाम हो जाता है। जो गुलामी कराना ही नहीं चाहता, कोई मेरा मातहत हो जाय—ऐसी इच्छा ही नहीं रखता, उसका भी अगर कोई कहना माने, उसके मनके अनुकूल चले तो उसको भी गुलाम बनना पड़ेगा। भगवान् की आज्ञाके अनुसार चलनेवाला भक्त भगवान् का मुकुटमणि हो जाता है। भगवान् कहते हैं—‘भगत मेरे मुकुटमणि’, ‘अहं भक्तपराधीन:’ (श्रीमद्भा० ९।४।६३)। कोई नौकर मालिकके कहे अनुसार काम करता है तो वक्तपर मालिकको उसकी बात माननी पड़ती है। अत: जो दूसरेको मातहत बनाता है, उसको परतन्त्रता भोगनी ही पड़ेगी—यह नियम है।

दूसरा मेरा कहना माने, मेरे कहनेके अनुसार चले, मेरे मनकी करे; मैं जैसा चाहूँ, वैसा हो जाय—इसीका नाम ‘कामना’ है। अपने मनकी करानेका नाम ही कामना है। कामनावाले व्यक्तिको कभी शान्ति नहीं मिलती—‘तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी’ (गीता २। ७०)। कामनाका त्याग करते ही तत्काल शान्ति मिलती है—‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२।१२)। परन्तु आज उलटी बात हो रही है, शान्ति भी चाहते हैं और मनमें यह कामना भी रखते हैं कि स्त्री मेरा कहना करे, पुत्र मेरा कहना करे, माँ-बाप मेरा कहना करें, गुरुजी भी मेरा कहना करें। इतना ही नहीं, भगवान् भी मेरा कहना करें! हम भक्त हैं; अत: भगवान् को हमारा कहना करना चाहिये। नारदजीने भी यही कहा—‘करहु सो बेगि दास मैं तोरा’ (मानस, बाल० १३२।४)। मैं आपका दास हूँ, जल्दी करो मेरा काम! सभी चाहते हैं कि दूसरा मेरा कहना करे, तो फिर कहना करेगा कौन? यह कहे कि वह मेरा कहना करे, वह कहे कि यह मेरा कहना करे, तो दोनों ही ठग हैं! दो ठगोंमें ठगाई नहीं होती। श्रेष्ठ, शूरवीर पुरुष वही है, जो दूसरेका कहना करे। मैं सबका कहना करूँ, ये जैसा कहें, वैसे करूँ—ये श्रेष्ठ पुरुषके लक्षण हैं। भगवान् सबसे श्रेष्ठ हैं तो वे कैसे कहेंगे कि तू यह कर, ऐसे कर?

कोई अच्छी बात है तो हम उसको दूसरेसे कराना क्यों चाहें? दूसरा अच्छा करना नहीं चाहता है क्या? उस बातको दूसरेके सामने रख दें कि अच्छी लगे तो करो, नहीं तो मत करो। भगवान् ने भी यही कहा है—‘सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई’ (मानस, उत्तर० ४३।२)। वह करे अथवा न करे—इसमें हमें सम रहना है—‘सिद्धॺसिद्धॺो: समो भूत्वा’ (गीता २।४८)। अच्छी-से-अच्छी बात सामने रख देना हमारा काम है, दूसरोंसे करवाना हमारा काम नहीं है। दूसरेसे करवायेंगे तो उसके पराधीन होना ही पड़ेगा, चाहे उसको मालूम पड़े चाहे न पड़े। वह हमारा कहना करे तो आनन्दकी बात, न करे तो बहुत आनन्दकी बात क्योंकि वह कहना करेगा तो उसका मातहत बनना पड़ेगा, पर वह कहना करता ही नहीं तो हमारी छुट्टी हो गयी उससे! हम उससे बँधेंगे नहीं। जो कहें भी नहीं, चाहें भी नहीं ऐसे भगवान्, सन्त, महात्मा, विरक्त-त्यागी, जीवन्मुक्त महापुरुषोंके मनके अनुकूल भी कोई चले तो उनको भी बँधना पड़ता है, परवश होना पड़ता है।

भगवान् और उसके प्यारे भक्त दूसरेको मातहत नहीं बनाते। परन्तु इसका यह अभिप्राय नहीं है कि वे दूसरेकी दासतासे भयभीत होते हैं अर्थात् हमें मातहत बनना पड़ेगा— इस भयसे दूसरोंको आज्ञा नहीं देते। भक्त इस कारण दूसरोंको आज्ञा नहीं देते कि अगर दूसरा उनकी आज्ञा नहीं मानेगा तो उसका पतन हो जायगा; क्योंकि भक्त दूसरेसे कुछ भी चाहते नहीं, प्रत्युत केवल कृपापरवश होकर उसके हितकी ही बात कहते हैं। कई लोग ऐसा कहते हैं कि जो भक्ति करता है, उससे भगवान् डरते हैं; क्योंकि उनको भक्तके परवश होना पड़ेगा। यह बात नहीं है। भगवान् को तो भक्तके परवश होनेमें, भक्तका काम करनेमें आनन्द आता है।

वृन्दावनमें एक भक्तको बिहारीजीके दर्शन नहीं हुए। लोग कहते कि अरे! बिहारीजी सामने ही तो खड़े हैं! पर वह कहता कि भाई! मेरेको तो नहीं दीख रहे! इस तरह तीन दिन बीत गये, पर दर्शन नहीं हुए। उस भक्तने ऐसा विचार किया कि सबको दर्शन होते हैं और मेरेको नहीं होते, तो मैं बड़ा पापी हूँ कि ठाकुरजी दर्शन नहीं देते; अत: मेरेको यमुनाजीमें डूब जाना चाहिये। ऐसा विचार करके रात्रिके समय वह यमुनाजीकी तरफ चला। वहाँ यमुनाजीके पास एक कोढ़ी सोया हुआ था। उसको भगवान् ने स्वप्नमें कहा कि अभी यहाँपर जो आदमी आयेगा, उसके तुम पैर पकड़ लेना। उसकी कृपासे तुम्हारा कोढ़ दूर हो जायगा। वह कोढ़ी उठकर बैठ गया। जैसे ही वह भक्त वहाँ आया, कोढ़ीने उसके पैर पकड़ लिये और कहा कि मेरा कोढ़ दूर करो। भक्त बोला कि अरे! मैं तो बड़ा पापी हूँ, ठाकुरजी मुझे दर्शन भी नहीं देते! बहुत झंझट किया; परन्तु कोढ़ीने उसको छोड़ा नहीं। अन्तमें कोढ़ीने कहा कि अच्छा, तुम इतना कह दो कि तुम्हारा कोढ़ दूर हो जाय। वह बोला कि इतनी हमारेमें योग्यता ही नहीं। कोढ़ीने जब बहुत आग्रह किया तब उसने कह दिया कि तुम्हारा कोढ़ दूर हो जाय। ऐसा कहते ही क्षणमात्रमें उसका कोढ़ दूर हो गया। तब उसने स्वप्नकी बात भक्तको सुना दी कि भगवान् ने ही स्वप्नमें मुझे ऐसा करनेके लिये कहा था। यह सुनकर भक्तने सोचा कि आज नहीं मरूँगा और लौटकर पीछे आया तो ठाकुरजीके दर्शन हो गये। उसने ठाकुरजीसे पूछा कि महाराज! पहले आपने दर्शन क्यों नहीं दिये? ठाकुरजीने कहा कि तुमने उम्रभर मेरे सामने कोई माँग नहीं रखी, मेरेसे कुछ चाहा नहीं; अत: मैं तुम्हें मुँह दिखानेलायक नहीं रहा! अब तुमने कह दिया कि इसका कोढ़ दूर कर दो, तो अब मैं मुँह दिखानेलायक हो गया! इसका क्या अर्थ हुआ? कि जो, कुछ भी नहीं चाहता, भगवान् उसके दास हो जाते हैं।

हनुमान् जी ने भगवान् का कार्य किया तो भगवान् उनके दास, ऋणी हो गये—‘सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं’ (मानस, सुन्दर० ३२। ४)। सेवा करनेवाला बड़ा हो जाता है और सेवा करानेवाला छोटा हो जाता है। परन्तु भगवान् और उनके प्यारे भक्तोंको छोटे होनेमें शर्म नहीं आती। वे जान करके छोटे होते हैं। छोटे बननेपर भी वास्तवमें वे छोटे होते ही नहीं और उनमें बड़प्पनका अभिमान होता ही नहीं।