उद्देश्यकी दृढ़तासे लाभ
मनुष्यजन्मका उद्देश्य क्या है, हमारे जीवनका लक्ष्य क्या है—इसको जानना बहुत आवश्यक है। जैसे, कोई आदमी अपने घरसे तो निकल जाय, पर कहाँ जाना है—इसका पता ही न हो तो क्या दशा होती है? वह किसीसे पूछे कि मुझे मार्ग बताओ। कहाँका बतायें? कहींका बता दो! तो फिर कहीं चले जाओ, बतानेकी जरूरत क्या है? अगर यह उद्देश्य बन जाय कि हमें बद्रीनारायण जाना है तो फिर उसका मार्ग भी मिल जायगा, वहाँ जानेके साधन भी मिल जायँगे और बतानेवाला भी मिल जायगा। कहाँसे जाना है, कैसे जाना है, पैदल जाना है कि मोटरसे, यह सब तो बादमें हो जायगा, पर ‘हमें बद्रीनारायण जाना है’—यह विचार तो पहले ही खुदका होना चाहिये। ऐसे ही मनुष्यजन्मका मूल उद्देश्य भगवान् की प्राप्ति करना है। परन्तु मनुष्यजन्म पाकर भी इस उद्देश्यको न पहचाननेके कारण मनुष्य पतनके मार्गपर जा रहा है!
यह मनुष्यजन्म बहुत जन्मोंके अन्तमें मिलता है—
‘लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते’
(श्रीमद्भा० ११।९।२९)
‘बहूनां जन्मनामन्ते’
(गीता ७।१९)
एक मार्मिक बात है कि यह मनुष्यजन्म सब जन्मोंका आदि जन्म भी है और अन्तिम जन्म भी है। जन्मोंका आरम्भ भी मनुष्यजन्मसे हुआ है और उनका अन्त भी मनुष्यजन्ममें ही होगा। जन्मोंका आरम्भ कब हुआ, कैसे हुआ, किसने किया आदि बातोंको जान भी नहीं सकते और जाननेकी जरूरत भी नहीं है। परन्तु जन्मोंका अन्त कर सकते हैं और अन्त करनेकी जरूरत भी है। गीतामें आया है—
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित:॥
(८।६)
‘हे कौन्तेय! मनुष्य अन्तकालमें जिस-जिस भी भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह उस (अन्तकाल)के भावसे सदा भावित होता हुआ उस-उसको ही प्राप्त होता है अर्थात् उस-उस योनिमें ही चला जाता है।’
—इस बातसे यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यजन्म मिलनेके बाद आगेका जन्म हम तैयार करते हैं—‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥’ (गीता १३।२१)। तात्पर्य है कि जन्म-मरणमें जानेके लिये अथवा उससे मुक्त होनेके लिये हम स्वतन्त्र हैं। अगर हमें सदाके लिये जन्म-मरणसे मुक्त होना है तो इसके लिये सबसे मुख्य बात यह है कि हमारा एकमात्र उद्देश्य परमात्माकी प्राप्ति हो। अपना कल्याण करना है, जीवन्मुक्त होना है, मुक्ति प्राप्त करनी है, विदेह कैवल्य प्राप्त करना है, सदाके लिये जन्म-मरणसे छूटना है, दु:खोंका अत्यन्त अभाव करना है, महान् आनन्दको प्राप्त करना है, परतन्त्रतासे छूटकर परम स्वतन्त्रताको प्राप्त करना है, भगवान् के दर्शन करना है, भगवत्प्रेम प्राप्त करना है—ये अलग-अलग नाम साधनके अनुसार हैं, पर तत्त्वसे एक ही हैं। साधन अलग-अलग हैं, पर उद्देश्य सबका एक ही है। वह उद्देश्य जितना दृढ़ होगा, उतना ही मनुष्य स्वत: आगे बढ़ जायगा।
जैसे भाई-बहन सत्संगमें आते हैं तो सबसे पहले उनका यह विचार होता है कि हमें सत्संगमें चलना है। फिर किस तरह चलना है, बससे चलना है, टैक्सीसे चलना है, साइकिलसे चलना है या पैदल चलना है—यह सब प्रबन्ध हो जाता है। सत्संगमें जानेके लिये तो दूसरेकी सहायता भी ले सकते हैं; पर वहाँ जानेका विचार तो खुदको ही करना पड़ेगा। ऐसे ही हमारा यह विचार बन जाय कि अब हमें परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करनी है। दूसरे लोग क्या करते हैं, क्या नहीं करते—इससे हमारा कोई मतलब न रहे।
तेरे भावे जो करौ, भलौ बुरौ संसार।
नारायन तू बैठि कै, अपनौ भुवन बुहार॥
संसार अच्छा करे या बुरा करे, हमें उससे क्या मतलब? हमें तो अपना असली काम करना है। परमात्म-प्राप्तिके सिवाय कोई भी काम स्थायी नहीं है। कोई धन कमाता है, कोई यश कमाता है, कोई शरीरको ठीक करता है, कोई नीरोगताके पीछे लगा है, पर ये काम सिद्ध होनेवाले नहीं हैं। अगर हो भी जायँ तो इन सबका अन्त होगा। परन्तु परमात्मप्राप्ति होगी तो वह सदाके लिये होगी, उसका अन्त नहीं होगा।
एक मार्मिक बात है कि सब-के-सब मनुष्य परमात्मप्राप्तिके अधिकारी हैं। भगवान् ने कहा है—
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:॥
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति॥
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनय:।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥
किं पुनर्ब्राह्मणा: पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥
(गीता ९। ३०—३३)
‘अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है तो उसको साधु ही मानना चाहिये। कारण कि उसने निश्चय बहुत श्रेष्ठ और अच्छी तरह कर लिया है। वह तत्काल धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है। हे कुन्तीनन्दन! तुम प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्तका विनाश (पतन) नहीं होता।’
‘हे पार्थ! जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर नि:सन्देह परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। जो पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और ऋषिस्वरूप क्षत्रिय भगवान् के भक्त हों, वे परमगतिको प्राप्त हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है। इसलिये इस अनित्य और सुखरहित शरीरको प्राप्त करके तू मेरा भजन कर’।
यहाँ भगवान् ने परमात्मप्राप्तिके सात अधिकारियोंके नाम लिये हैं—दुराचारी, पापयोनि, स्त्रियाँ, वैश्य, शूद्र, ब्राह्मण और क्षत्रिय। इन सातोंसे बाहर कोई भी मनुष्य नहीं है। कैसा ही जन्म हो, कैसी ही जाति हो, कैसा ही आचरण हो और पूर्वजन्मके कितने ही पाप हों, पर भगवान् की प्राप्तिमें सब अधिकारी हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चारों वर्णोंका नाम आ गया। कोई चारों वर्णोंमें केवल पुरुष-ही-पुरुष न समझ ले, इसलिये स्त्रियोंका नाम अलगसे आया है। जो चारों वर्णोंसे नीचे हैं, वे यवन, हूण, खस् आदि सब पापयोनिमें आ गये*। मनुष्योंके सिवाय दूसरे जीव (पशु, पक्षी आदि) भी ‘पापयोनि’ में लिये जा सकते हैं; क्योंकि जीवमात्र भगवान् का ही अंश होनेसे भगवान् की तरफ चलनेमें (भगवान् की ओरसे) किसीके लिये भी मना नहीं है। जो वर्तमानमें पाप कर रहा है, वह ‘दुराचारी’ है और पूर्वजन्मके पापोंके कारण जिसका नीच योनिमें जन्म हुआ है, वह ‘पापयोनि’ है। तात्पर्य है कि दुराचारी-से-दुराचारी और नीच-से-नीच योनिवाला भी परमात्मप्राप्तिका अधिकारी है। जो पूर्वजन्मके पुण्यात्मा हैं, उनको पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण कहा और जो इस जन्ममें पुण्यात्मा हैं, उनको ऋषिस्वरूप क्षत्रिय कहा, ऐसे ही जो पूर्वजन्मके पापी हैं, उनको पापयोनि कहा और जो इस जन्ममें पापी हैं, उनको सुदुराचारी कहा। ये सभी प्रकारके मनुष्य परमात्माको प्राप्त कर सकते हैं। इसलिये अनित्य और सुखरहित इस शरीरको पाकर अर्थात् हम जीते रहें और सुख भोगते रहें—ऐसी कामनाको छोड़कर भगवान् का भजन करना चाहिये। यह मनुष्य-शरीर भजन करनेके लिये है सुख-भोगके लिये नहीं—‘एहि तन कर फल बिषय न भाई’ (मानस ७।४४।१)। भजन करनेके लिये ही सबसे पहला काम है—अपने उद्देश्यको पहचानना। उद्देश्यकी दृढ़ता होनेपर उसकी पूर्तिकी सामग्री अपने-आप मिलेगी।
‘किं पुनर्ब्राह्मणा: पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा’— इसके बीचमें ‘भक्ता:’ पद आया है, जिसका तात्पर्य है कि पवित्र आचरणवाले ब्राह्मणोंकी और ऋषिस्वरूप क्षत्रियोंकी महिमा नहीं है, प्रत्युत उनमें जो भक्ति है, उस भक्तिकी महिमा है। इसलिये भगवान् ने पहले ही कह दिया—
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥
(गीता ९।२९)
‘मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ। उन प्राणियोंमें न तो कोई मेरा द्वेषी है और न कोई प्रिय है। परन्तु जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, वे मेरेमें हैं और मैं उनमें हूँ।’
तात्पर्य है कि भगवान् का न तो दुराचारी तथा पापयोनिके साथ द्वेष है और न पुण्यात्मा ब्राह्मणों तथा क्षत्रियोंके साथ स्नेह है। वे तो सब प्राणियोंमें समान हैं। परन्तु जो भक्तिपूर्वक भगवान् का भजन करता है, वह किसी भी देश, वेश, वर्ण, आश्रम, जाति, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो, उसका भगवान् से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसलिये भगवान् ने भजन करनेकी आज्ञा दी है—‘भजस्व माम्’। परन्तु यह तभी सिद्ध होगा, जब हमारा यह दृढ़ उद्देश्य होगा कि हमें इसी जन्ममें परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना है।
यह कितनी विलक्षण बात है कि हम कैसे ही हों, पर भगवत्प्राप्तिके लिये हम सब-के-सब अधिकारी हैं। भगवान् ने कितनी छूट दी है! भगवान् ने भजन करनेके लिये मनुष्य-शरीर दिया है तो फिर भजन करनेकी सामग्री भी बचाकर नहीं रखी है, अन्यथा ‘ये भजन्ति तु मां भक्त्या’ और ‘भजस्व माम्’ कैसे कहते? हम भी भगवान् से कह सकते थे कि महाराज! आपने हमारेको साधन-सामग्री दी ही नहीं, हमारी सहायता की ही नहीं, फिर हम भजन कैसे करें? पर हम ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि भगवान् ने सबको भजनकी पूरी साधन-सामग्री दी है। जैसे, कहीं सत्संगका आयोजन होता है तो पहले उसकी तैयारी करते हैं, बादमें लोगोंको निमन्त्रण देते हैं। पण्डाल पहले बनता है, लोगोंको बादमें बुलाते हैं। ऐसे ही भगवान् ने मनुष्यजन्म दिया है तो अपनी प्राप्तिकी सामग्री पहले दी है। भगवान् ने दुराचारी-से-दुराचारी तथा पापयोनिको भी अपनी प्राप्तिका निमन्त्रण दिया है और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा स्त्रियोंको भी अपनी प्राप्तिका निमन्त्रण दिया है। अब जरूरत इस बातकी है कि हम अपना उद्देश्य भगवत्-प्राप्तिका बना लें।
संसारमें बिना स्वार्थके सबका हित करनेवाले दो ही हैं—भगवान् और उनके भक्त।
हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥
(मानस ७।४७।३)
परोक्षरूपसे सबका हित करनेवाले भगवान् हैं और प्रत्यक्ष तथा परोक्ष—दोनों रूपसे सबका हित करनेवाले सन्त-महात्मा हैं। भगवान् में एक विलक्षणता और भी है कि वे सब कुछ देकर भी लेनेवालेको उसका पता नहीं लगने देते। इस ढंगसे देते हैं कि लेनेवाला उन वस्तुओंको अपनी ही समझने लगता है। यह विलक्षणता एक नम्बरमें भगवान् में है और दो नम्बरमें सन्तोंमें। भगवान् और सन्त बिना हेतु सबका उपकार करते हैं, किसी हेतुको लेकर नहीं। वे किसी देश, वेश, व्यक्ति, वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका पक्षपात न करके स्थावर-जंगमरूप मात्र जगत् का उपकार करते हैं। ऐसे परम उपकारी भगवान् ने कृपा करके मानव-जीवनका समय दिया है, सामग्री दी है, समझ दी है और सामर्थ्य दी है। ये चारों चीजें भगवान् ने केवल जीवमात्रके उद्धारके लिये दी हैं।
समय, सामग्री, समझ और सामर्थ्य—ये चारों सबके पास बराबर नहीं हैं; किसीके पास कम हैं, किसीके पास ज्यादा। परन्तु एक मार्मिक बात है कि हमारे पास जितना समय है, जितनी सामग्री है, जितनी समझ है और जितनी सामर्थ्य है, उतनी भगवान् में लगा दें तो पूर्णता प्राप्त हो जायगी, भगवान् की प्राप्ति हो जायगी। साधकसे गलती यह होती है कि वह प्राप्त सामग्री आदिका सदुपयोग न करके और अधिक (नयी-नयी) सामग्री आदिकी इच्छा करता है, उसको और अधिक बढ़ाना चाहता है। वह सामग्री आदिको जितना महत्त्व देता है, उतना भगवान् को महत्त्व नहीं देता। सामग्री आदिको महत्त्व देना भगवत्प्राप्तिमें बाधक होता है। अत: हमें जो समय, सामग्री आदि मिली है, उसीसे भगवान् की प्राप्ति हो सकती है। अगर कोई कमी रह जायगी तो उसकी पूर्ति भगवान् कर देंगे। भगवान् का दरबार सबके लिये सब समय खुला है—‘यहि दरबार दीन को आदर, रीति सदा चलि आई॥’ (विनय० १६५।५)। हमारेमें जिस चीजकी कमी होगी, आवश्यकता पड़नेपर उसकी पूर्ति भी हो जायगी। जैसे, चलते-चलते थक जाते हैं तो बिना कुछ उद्योग किये, चुपचाप पड़े-पड़े पुन: चलनेकी शक्ति प्राप्त हो जाती है—यह सबका प्रत्यक्ष अनुभव है। सदुपयोगसे शक्ति बढ़ती है और दुरुपयोगसे नष्ट होती है।
एक शंका होती है कि भगवान् ने हमें समय, समझ, सामग्री आदि सब कुछ तो दे दिया, पर स्वतन्त्रता क्यों दी? इस स्वतन्त्रताका हम सदुपयोग भी कर सकते हैं और दुरुपयोग भी कर सकते हैं; पाप भी कर सकते हैं और पुण्य भी कर सकते हैं; बन्धनमें भी जा सकते हैं और मुक्तिमें भी जा सकते हैं, सब कुछ कर सकते हैं। अत: जिससे हम अपना पतन कर लें, ऐसी स्वतन्त्रता भगवान् ने क्यों दी? इसका समाधान यह है कि अगर भगवान् मनुष्यको परतन्त्र बना देते तो मनुष्य-शरीरका कुछ महत्त्व ही नहीं रहता। उत्तम-से-उत्तम शरीर गायका है, जिसका गोबर और गोमूत्र भी शुद्ध होता है; परन्तु वह भगवान् का भजन-स्मरण नहीं कर सकती; क्योंकि वह केवल भोगयोनि है। अगर भगवान् मनुष्यको स्वतन्त्रता नहीं देते तो वह भी सदाके लिये भोगयोनि बन जाता, कर्मयोनि (साधनयोनि) नहीं बनता। भगवान् ने स्वतन्त्रता दी है अपना कल्याण करनेके लिये। परन्तु हम अपना कल्याण न करके उस स्वतन्त्रताको दूसरे कामोंमें लगा देते हैं। इस प्रकार भगवान् से मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग तो हम करते हैं और उलाहना भगवान् को देते हैं कि उन्होंने हमें स्वतन्त्रता क्यों दी! अगर भगवान् स्वतन्त्रता न देते तो हम पुण्य भी नहीं कर सकते। अशुभ काम नहीं कर सकते तो शुभ काम भी नहीं कर सकते। स्वतन्त्रता मुक्तिके लिये मिली है, बन्धनके लिये नहीं। शिवलिङ्ग पूजा करनेके लिये होता है, पर उससे कोई अपना सिर फोड़ ले तो भगवान् शंकर क्या करें? इसलिये भगवान् ने कृपा करके हमें जो स्वतन्त्रता दी है, उसका सदुपयोग करना हमारा कर्तव्य है।
कोई कैसा ही प्राणी क्यों न हो, उसको भगवान् ने मुक्तिका पूरा अवसर दिया है। मनुष्यको भगवान् ने दो चीजें दी हैं—भोगके लिये कर्म-सामग्री और मोक्षके लिये विवेक। कर्म-सामग्रीके साथ विवेक इसलिये दिया है कि मनुष्यको यह जानकारी रहे कि इन कर्मोंसे वह चौरासी लाख योनियोंमें तथा नरकोंमें जायगा, इन कर्मोंसे वह स्वर्गमें जायगा, इन कर्मोंसे वह पुन: मनुष्यजन्ममें आयेगा और इन कर्मोंसे (कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर) वह सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जायगा। अब इस विवेकका वह सदुपयोग करे या दुरुपयोग करे, इसमें वह स्वतन्त्र है। भगवान् ने मनुष्यको कितनी स्वतन्त्रता दी है कि वह जिस-जिस भावका स्मरण करता हुआ शरीर छोड़े, उस-उसको ही प्राप्त हो जाता है। यह भगवान् की कितनी उदारता है!
जो दयालु होता है, वह न्यायकारी नहीं हो सकता और जो न्यायकारी होता है, वह दयालु नहीं हो सकता। न्याय करनेवालेको तो ठीक मर्यादामें चलना पड़ेगा। अगर वह दया करेगा तो ठीक मर्यादामें नहीं चल सकेगा। परन्तु यह अड़चन तभी आती है, जब कानून बनानेवाला निर्दयी हो। भगवान् तो अनन्त दयालु हैं; अत: उनके बनाये हुए कानूनमें न्याय भी है और दया भी! उनकी न्यायकारितामें दयालुता परिपूर्ण है और दयालुतामें न्यायकारिता परिपूर्ण है। जैसे, अन्तकालमें मनुष्य भगवान् का स्मरण करता हुआ शरीर छोड़ता है तो वह भगवान् को प्राप्त हो जाता है और कुत्तेका स्मरण करता हुआ शरीर छोड़ता है तो कुत्तेकी योनिको प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य है कि जितने मूल्यमें कुत्तेकी योनि मिलती है, उतने ही मूल्यमें भगवान् की प्राप्ति हो जाती है—यह भगवान् के न्यायमें भी महान् दया भरी हुई है। जिस स्वतन्त्रतासे नीच योनि मिल जाय, उसी स्वतन्त्रतासे देवादि ऊँची योनि प्राप्त हो जाय, कल्याण हो जाय, मुक्ति हो जाय—यह भगवान् ने कितनी विलक्षण स्वतन्त्रता दी है। जो अन्तकालमें किसीका स्मरण नहीं करता, प्रत्युत केवल ममता और अहंकारका त्याग कर देता है, वह भी निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है१। इस प्रकार भगवान् ने कल्याणकी सामग्री देनेमें कोई कमी नहीं रखी है। प्रत्येक परिस्थितिमें भगवान् की दया लबालब भरी हुई है! पुण्यके फल (अनुकूल परिस्थिति) में भी भगवान् की दया है और पापके फल (प्रतिकूल परिस्थिति) में भी भगवान् की कृपा है२। अनुकूल परिस्थितिमें साधन करनेमें सहायता मिलती है और प्रतिकूल परिस्थितिमें पापोंका नाश होकर कष्ट सहनेकी सामर्थ्य आती है। चाहे अनुकूल परिस्थिति आये, चाहे प्रतिकूल परिस्थिति आये, हमारा काम तो भगवान् के सम्मुख होकर उनका भजन करना है३ और वह भजन तब होगा, जब हम दृढ़तापूर्वक एक उद्देश्य, लक्ष्य बना लेंगे कि हमें तो भगवान् की प्राप्ति ही करनी है। जैसा कि पार्वतीजीने कहा है—
जन्म कोटि लगि रगर हमारी।
बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥
तजउँ न नारदकर उपदेसू।
आप कहहिं सत बार महेसू॥
(मानस १।८१।५)
एक भक्त इमलीके वृक्षके नीचे बैठकर भगवान् का भजन कर रहा था। एक दिन वहाँ नारदजी महाराज आ गये। उस भक्तने नारदजीसे कहा कि आप इतनी कृपा करें कि जब भगवान् के पास जायँ, तब उनसे पूछ लें कि वे मुझे कब मिलेंगे? नारदजी भगवान् के पास गये और पूछा कि अमुक स्थानपर एक भक्त इमलीके वृक्षके नीचे बैठा है और भजन कर रहा है, उसको आप कब मिलेंगे? भगवान् ने कहा कि उस वृक्षके जितने पत्ते हैं, उतने जन्मोंके बाद मिलूँगा। ऐसा सुनकर नारदजी उदास हो गये। वे उस भक्तके पास गये, पर उससे कुछ कहा नहीं। भक्तने प्रार्थना की कि भगवान् ने क्या कहा है, कह तो दो। नारदजी बोले कि तुम सुनोगे तो हताश हो जाओगे। जब भक्तने बहुत आग्रह किया, तब नारदजी बोले कि इस वृक्षके जितने पत्ते हैं, उतने जन्मोंके बाद भगवान् की प्राप्ति होगी। भक्तने उत्सुकतासे पूछा कि क्या भगवान् ने खुद ऐसा कहा है? नारदजीने कहा कि हाँ, खुद भगवान् ने कहा है। यह सुनकर वह भक्त खुशीसे नाचने लगा कि भगवान् मेरेको मिलेंगे, मिलेंगे, मिलेंगे!! क्योंकि भगवान् के वचन झूठे नहीं हो सकते। इतनेमें ही भगवान् वहाँ प्रकट हो गये! नारदजीने देखा तो उनको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे भगवान् से बोले कि महाराज! अगर यही बात थी तो मेरी फजीती क्यों करायी? आपको जल्दी मिलना था तो मिल जाते। मेरेसे तो कहा कि इतने जन्मोंके बाद मिलूँगा और आप अभी आ गये! भगवान् ने कहा कि नारद! जब तुमने इसके विषयमें पूछा था, तब यह जिस चालसे भजन कर रहा था, उस चालसे तो इसको उतने ही जन्म लगते। परन्तु अब तो इसकी चाल ही बदल गयी! यह तो ‘भगवान् मेरेको मिलेंगे’—इतनी बातपर ही मस्तीसे नाचने लग गया! इसलिये मुझे अभी ही आना पड़ा। कारण कि उद्देश्यकी सिद्धिमें जो अटल विश्वास, अनन्यता, दृढ़ता, उत्साह होता है, उससे भजन तेज हो जाता है।
एक सन्त थे। वे एक जाटके घर गये। जाटने उनकी बड़ी सेवा की। सन्तने उससे कहा कि रोजाना नामजप करनेका कुछ नियम ले लो। जाटने कहा कि बाबा, हमारेको वक्त नहीं मिलता। सन्तने कहा कि अच्छा, रोजाना एक बार ठाकुरजीकी मूर्तिका दर्शन कर आया करो। जाटने कहा कि मैं तो खेतमें रह जाता हूँ, ठाकुरजीकी मूर्ति गाँवके मन्दिरमें है, कैसे करूँ? सन्तने उसको कई साधन बताये कि वह कुछ-न-कुछ नियम ले ले, पर वह यही कहता रहा कि मेरेसे यह बनेगा नहीं। मैं खेतमें काम करूँ या माला लेकर जप करूँ! इतना समय मेरे पास कहाँ है? बाल-बच्चोंका पालन-पोषण करना है; तुम्हारे-जैसे बाबाजी थोड़े ही हूँ कि बैठकर भजन करूँ। सन्तने कहा कि अच्छा, तू क्या कर सकता है? जाट बोला कि हमारे पड़ोसमें एक कुम्हार रहता है, उसके साथ मेरी मित्रता है; खेत भी पास-पासमें है और घर भी पास-पासमें है; रोजाना नियमसे एक बार उसको देख लिया करूँगा। सन्तने कहा कि ठीक है, उसको देखे बिना भोजन मत करना। जाटने स्वीकार कर लिया। जब उसकी स्त्री कहती कि रोटी तैयार हो गयी, भोजन कर लो तो वह चट बाड़पर चढ़कर कुम्हारको देख लेता और भोजन कर लेता। इस नियममें वह पक्का रहा।
एक दिन जाटको खेतमें जल्दी जाना था, इसलिये भोजन जल्दी तैयार कर लिया। उसने बाड़पर चढ़कर देखा तो कुम्हार दीखा नहीं। पूछनेपर पता लगा कि वह तो मिट्टी खोदने बाहर गया है! जाट बोला कि कहाँ मर गया, कम-से-कम देख तो लेता। अब जाट उसको देखनेके लिये तेजीसे भागा। उधर कुम्हारको मिट्टी खोदते-खोदते एक हाँडी मिल गयी, जिसमें तरह-तरहके रत्न, अशर्फियाँ भरी हुई थीं। उसके मनमें आया कि कोई देख लेगा तो मुश्किल हो जायगी! अत: वह देखनेके लिये ऊपर चढ़ा तो सामने वह जाट आ गया! कुम्हारको देखते ही जाट वापिस भागा तो कुम्हारने समझा कि उसने वह हाँडी देख ली और अब वह आफत पैदा करेगा। कुम्हारने आवाज लगायी कि अरे, जा मत, जा मत! जाट बोला कि बस, देख लिया, देख लिया! कुम्हार बोला कि अच्छा, देख लिया तो आधा तेरा, आधा मेरा, पर किसीसे कहना मत! जाट वापिस आया तो उसको धन मिल गया। उसके मनमें विचार आया कि सन्तसे अपना मनचाहा नियम लेनेमें इतनी बात है, अगर सदा उनकी आज्ञाका पालन करूँ तो कितना लाभ है! ऐसा विचार करके वह जाट और उसका मित्र कुम्हार—दोनों ही भगवान् के भक्त बन गये।
तात्पर्य यह है कि हम दृढ़तासे अपना एक उद्देश्य बना लें कि चाहे जो हो जाय, हमें तो भगवान् की तरफ चलना है, भगवान् का भजन करना है। उद्देश्य बनानेकी अपेक्षा भी उद्देश्यको पहचान लें। कारण कि उद्देश्य पहले बना है, मनुष्यजन्म पीछे मिला है। मनुष्यजन्म केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही मिला है—इस उद्देश्यको पहचान लें, सन्देहरहित मान लें तो फिर भजन अपने-आप होगा।
हम बद्रीनारायण जाते हैं तो रास्तेमें बढ़िया-से-बढ़िया जगह आ जाय तो भी वहाँ ज्यादा नहीं टिकते और घटिया-से-घटिया जगह आ जाय तो भी जाना बन्द नहीं करते, हमारी चाल वैसी ही रहती है। खराब-से-खराब रास्ता आ जाय, चढ़ाई आ जाय, तेज धूप पड़ने लगे, पसीना आने लगे तो भी हम चलते रहते हैं और आगे बढ़िया रास्ता आ जाय, जंगलसे पुष्पोंकी सुगन्ध आने लगे, बादलोंकी छाया हो जाय, ठण्डी हवा चलने लगे तो भी हम चलते रहते हैं। ऐसा मनमें नहीं आता कि अच्छी जगह है, पुष्पोंकी सुगन्ध आ रही है; अत: यहीं आसन लगा लें। कारण कि यह हमारा उद्देश्य नहीं है। जगह अच्छी हो या गन्दी, ये सब तो मार्गकी बातें हैं; हमें तो बद्रीनारायण जाना है। ऐसे ही परिस्थिति अनुकूल हो या प्रतिकूल, ये तो मार्गकी बातें हैं; हमें तो भगवान् की प्राप्ति करनी है। कैसी ही परिस्थिति क्यों न आये, हमारे भजनमें कमी नहीं आनी चाहिये। अगर इस प्रकार हमारा उद्देश्य दृढ़ रहे तो उसकी सिद्धि भगवान् की कृपासे शीघ्र हो जायगी। सिद्धि करनेमें हमारेको जोर नहीं पड़ेगा। भगवान् ने अपनी ओरसे कृपा करनेमें कोई कमी नहीं रखी है। जैसे बछड़ा एक स्तनसे ही दूध पीता है, पर भगवान् ने गायको चार स्तन दिये हैं। ऐसे ही भगवान् चारों तरफसे हमारेपर कृपा कर रहे हैं! हमें तो निमित्तमात्र बनना है। भगवान् अर्जुनसे कहते हैं—
मयैवैते निहता: पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥
(गीता ११। ३३)
‘ये सभी मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम निमित्तमात्र बन जाओ।’ तथा—
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा-
युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्॥
(गीता ११।३४)
‘मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीरोंको तुम मारो। तुम व्यथा मत करो और युद्ध करो। युद्धमें तुम नि:सन्देह वैरियोंको जीतोगे।’
अर्जुनके सामने युद्ध था, इसलिये भगवान् उनसे कहते हैं कि तुम निमित्तमात्र बनकर युद्ध करो, तुम्हारी विजय होगी। ऐसे ही हमारे सामने साधन है; अत: हम भी निमित्तमात्र बनकर साधन करें तो संसारपर हमारी विजय हो जायगी। संसारमें राग, आसक्ति, कामना न करें, सावधान रहें, यही निमित्तमात्र बनना है। भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि ये सभी शूरवीर मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं, ऐसे ही ये राग आदि भी पहलेसे ही मारे हुए हैं, सत्तारहित हैं। इनको हमने ही सत्ता दी है। संसार नित्यनिवृत्त है—‘नासतो विद्यते भाव:’ और परमात्मा नित्यप्राप्त हैं—‘नाभावो विद्यते सत:’। नित्यनिवृत्तिकी ही निवृत्ति करनी है और नित्यप्राप्तकी ही प्राप्ति करनी है।