वैराग्य

तपसामपि सर्वेषां वैराग्यं परमं तप:।

यज्ञ, दान, योग, तीर्थ, व्रत, स्वाध्याय आदि पुण्य कर्मरूप सभी प्रकारकी तपस्याओंमें वैराग्य परम तप है; क्योंकि अन्यान्य धार्मिक कार्य (तप) सकामभावसे करनेपर उनके द्वारा स्वर्गादिकी प्राप्ति होती है और निष्कामभावसे करनेपर ही वे परमात्माकी प्राप्तिके साधन बनते हैं, परंतु वैराग्य तो निष्कामभावसे ही होता है। सकामभाव और वैराग्य—दोनों एक जगह रह ही कैसे सकते हैं? अत: पारमार्थिक साधकके लिये एक वैराग्य ही बहुत आवश्यक और परम उपयोगी है। जबतक वैराग्य नहीं, तबतक चाहे जितनी डीगें मारें, उनसे कोई भी आध्यात्मिक कार्य सिद्ध नहीं होता। दूसरी ओर यदि हमें बातें करना नहीं आता; ज्ञानयोग तथा हठयोगकी युक्तियाँ भी हम नहीं जानते; तो भी केवल वैराग्य होनेपर ध्यान आदि साधन सरलतासे स्वयमेव होने लगते हैं, ध्यान आदिकी युक्तियाँ बिना सीखी हुई स्वत: स्फुरित होने लगती हैं। जबतक संसारके पदार्थोंमें राग है और प्रभुमें प्रेम नहीं तबतक वैराग्य नहीं। वैराग्य नाम है सांसारिक पदार्थोंमें आन्तरिक रागके अभावका। बाहरी स्वाँगका नाम वैराग्य नहीं है। वैराग्य भीतरी त्यागके भावका वाचक है।

वैराग्य कई हेतुओंसे होता है—दु:खसे, भयसे, विचारसे, साधनसे और परमात्मतत्त्वके बोधसे। इन सबमें पूर्व-पूर्व वैराग्यकी अपेक्षा उत्तरोत्तरका वैराग्य श्रेष्ठ है।

दु:खसे होनेवाला वैराग्य—घर, धन, स्त्री, पुत्र, परिवार आदिकी अनुकूलता न होनेपर तथा परिस्थितिकी प्रतिकूलता प्राप्त होनेपर जो मनमें संसारके त्यागकी उकताहटसे भरी भावना होती है, उसे दु:खसे होनेवाला वैराग्य कहते हैं। यह दु:खसे होनेवाला वैराग्य असली नहीं; क्योंकि हमें आराम नहीं मिला, दुत्कार मिली, तिरस्कार मिला या मनमानी चीज नहीं मिली तो मनमें भाव आया कि छोड़ो संसारको, इसमें क्या पड़ा है। संसारमें तो केवल दु:ख-ही-दु:ख भरा है। इस प्रकारका वैराग्य तो सभीको हो सकता है। कुत्ता भी तनी हुई लाठी देखकर भागता है, अपनी जान बचाता है। अत: वह यथार्थ वैराग्य नहीं। इसमें जो कुछ उकताहट है और अनुकूलताका अनुसन्धान है, वह वैराग्य नहीं। उसमें तो राग ही कारण है; क्योंकि दु:खके कारण हटनेपर अर्थात् अनुकूलता प्राप्त हो जानेपर वह त्यागका भाव रहना कठिन है। यदि प्रतिकूलता न रहे, सब कुटुम्बीजन मनोनुकूल सेवा करने लगें, तो फिर वैराग्य भूल जाता है। उसमें केवल जो पदार्थोंको दु:खका कारण समझनेका भाव है, वही वैराग्यका अंश है। इस प्रकार दु:खके कारण होनेवाला वैराग्य यथार्थ वैराग्य नहीं है, किंतु उस समय यदि सङ्ग अच्छा मिल जाय तो वही वैराग्य अधिक बढ़कर आत्मोद्धारमें कारण बन सकता है। इसलिये उसे भी वैराग्य कह सकते हैं।

भयसे होनेवाला वैराग्य—दु:खसे होनेवाले वैराग्यकी अपेक्षा भयसे होनेवाला वैराग्य श्रेष्ठ है। स्वास्थ्यका भय, राज्यका भय, समाजका भय, मान-प्रतिष्ठाका भय, जन्म-मरणका भय और नरकोंका भय—इन अनेक प्रकारके भयोंसे होनेवाले रागके अभावको ‘भयसे होनेवाला वैराग्य’ कहते हैं।

भोगोंके भोगनेसे शरीर शिथिल होता है, रोग बढ़ते हैं, शक्तिका ह्रास होता है, कार्य करनेका साहस नहीं होता—आदि-आदि क्लेशोंके भयसे जो हरेक चीजके खाने-पीने और स्त्रीसङ्ग आदि भोगोंसे मनका हटना है, एवं इसी प्रकार रोगादिके हो जानेपर उसकी वृद्धि न हो जाय; अत: उनमें कुपथ्यरूप भोगोंसे जो मनका हटना है, यह ‘स्वास्थ्यनाशके भयके कारण होनेवाला वैराग्य’ है।

जुर्माना, कारागार, फाँसी आदिके भयसे चोरी, व्यभिचार, डकैती, हिंसा आदि अत्याचार-अनाचारसे प्राप्त होनेवाले भोगोंसे जो मनका हट जाना है, यह ‘राज्यभयसे होनेवाला वैराग्य’ है।

जाति-बहिष्कार, आर्थिक व्यय, लड़के-लड़कीके विवाहमें कठिनता; समाजमें बदनामी आदिके भयसे जो जातिके नियमोंको भङ्ग करके भोगोंके भोगनेकी इच्छाका त्याग करना है, यह ‘समाज-भयसे होनेवाला वैराग्य’ है।

वेश्यागमन, मदिरापान, हिंसा आदिसे कुलपरम्परागत मानका नाश होगा तथा लोग हमें नीची दृष्टिसे देखेंगे—ऐसे विचारसे लौकिक मर्यादाको छोड़कर भोगोपभोगके त्यागका जो भाव है, यह ‘मान-प्रतिष्ठाके भयसे होनेवाला वैराग्य’ है।

जन्म-मरणका प्रधान कारण है—पदार्थ, क्रिया, भाव और व्यक्ति आदिमें आसक्त रहना। अत: इन पदार्थोंका चिन्तन होगा तो मरनेके समय भी इन्हींका स्मरण होगा और अन्तकालीन स्मरणके अनुसार ही आगे जन्म होगा—इस भयसे पदार्थ-क्रिया आदिमें जो रागका न रहना है, यह ‘जन्म-मरणके भयसे होनेवाला वैराग्य’ है।

काम, क्रोध, लोभ आदि वृत्तियोंके वश होकर शास्त्रके विपरीत पदार्थोंका अन्यायपूर्वक सेवन करनेसे वैतरणी, असिपत्रवन, लालाभक्ष्य, रौरव, महारौरव, कुम्भीपाक आदि नरकोंकी प्राप्ति होगी, वहाँ अनेक भयानक कष्ट भोगने पड़ेंगे; यहाँका विषय-सुख तो क्षणिक होगा परंतु इसके परिणाममें प्राप्त होनेवाली नारकीय पीड़ा अत्यन्त भयानक और बहुत समयतक रहनेवाली होगी—इस भयके कारण मनके काम-क्रोधादिसे हटनेको ‘नरकोंके भयसे होनेवाला वैराग्य’ कहते हैं।

इस प्रकार भयसे होनेवाले वैराग्यके कई रूप हैं। इनमें नरकोंके भयसे होनेवाला वैराग्य अन्य भयोंसे होनेवाले वैराग्यकी अपेक्षा स्थायी और श्रेष्ठ है, पर यह भी असली वैराग्य नहीं है। इनमें भी पदार्थोंसे सूक्ष्म राग नहीं छूटा है। केवल भयके कारण पदार्थोंसे मन हटा है—यह भयसे होनेवाला वैराग्य है; भय न रहे तो इस वैराग्यका रहना भी कठिन है।

विचारसे होनेवाला वैराग्य—भयसे होनेवालेकी अपेक्षा विचार—विवेकसे होनेवाला वैराग्य ऊँचा है। विचारका अर्थ है—सत्-असत्, सार-असार, हेय-उपादेय और कर्तव्य-अकर्तव्य आदिका विवेक। इस विवेकसे जो असत्, असार, हेय और अकर्तव्यका मनसे परित्याग है अर्थात् इनके प्रति मनके रागका जो अभाव हो जाना है, उसको विचारसे होनेवाला वैराग्य कहते हैं। विषय-सेवन करनेसे परिणामत: विषयोंमें राग-आसक्ति बढ़ती है, जो कि सम्पूर्ण दु:खोंका कारण है और विषयोंमें वस्तुत: सुख है भी नहीं। केवल आरम्भमें सुख प्रतीत होता है। गीतामें कहा है—

ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते।

आद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध:॥

विषयेन्द्रियसंयोगाद् यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।

परिणामे विषमिव तत् सुखं राजसं स्मृतम्॥

(५।२२, १८।३८)

‘जो ये इन्द्रिय तथा विषयोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले सब भोग हैं, वे यद्यपि विषयी पुरुषोंको सुखरूप भासते हैं तो भी दु:खके ही हेतु हैं और आदि-अन्तवाले अर्थात् अनित्य हैं। इसलिये हे अर्जुन! बुद्धिमान्—विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता।’

‘जो सुख विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे होता है, वह पहले—भोगकालमें अमृतके तुल्य प्रतीत होनेपर भी परिणाममें विषके तुल्य है इसलिये वह सुख राजस कहा गया है।’

विषयोंमें सुख होता तो बड़े-बड़े धनी, भोगी और पदाधिकारी भी सुखी होते। पर विचारपूर्वक देखनेपर पता चलता है कि वे भी दु:खी ही हैं। पदार्थोंमें शान्ति है नहीं, हुई नहीं, होगी नहीं और हो सकती नहीं। विचारशील व्यक्तिको तो पद-पदपर अनुभव भी होता है कि इनमें सुख नहीं है।

चाख चाख सब छाड़िया माया-रस खारा हो।

नाम-सुधारस पीजिये छिन बारंबारा हो॥

जो-जो भोग सुख-बुद्धिसे भोगे गये, उन-उन भोगोंसे धीरज नष्ट हुआ, ध्यान नष्ट हुआ, रोग उत्पन्न हुए, चिन्ता हुई, व्यग्रता हुई, पश्चात्ताप हुआ, बेइज्जती हुई, बल गया, धन गया, शान्ति गयी एवं प्राय: दु:ख-शोक-उद्वेग आये—ऐसा यह परिणाम प्रत्यक्ष देखनेमें आता है। इससे मालूम होता है कि विषयोंमें सुख नहीं है। जिस प्रकार स्वप्नमें जल पीते हैं, पर प्यास नहीं मिटती, उसी प्रकार पदार्थोंसे न तो शान्ति मिलती है और न जलन ही मिटती है। मनुष्य सोचता है कि इतना धन हो जाय, इतना ऐश्वर्य हो जाय तो शान्ति मिलेगी; किंतु उतना हो जानेपर भी शान्ति नहीं होती, उलटे पदार्थोंके बढ़नेसे उनकी लालसा और बढ़ जाती है—‘जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।’ धन-परिवार होनेपर उनके और बढ़नेकी लालसा होती है। राज्य होनेपर राज्य और बढ़ जाय, यह लालसा होती है। इस प्रकार ‘और हो जाय’, ‘और हो जाय’—यह क्रम चलता ही रहता है। किंतु संसारमें जितना धन-धान्य है, जितनी स्त्रियाँ हैं, जितनी सामग्रियाँ हैं, वे सब-की-सब एक साथ किसी एक व्यक्तिको मिल जायँ, तब भी उनसे उसे तृप्ति नहीं हो सकती। शास्त्रमें कहा है—

यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशव: स्त्रिय:।

एकस्यापि न पर्याप्तमिति मत्वा शमं व्रजेत्॥

इसका कारण यह है कि जीव परमात्माका अंश तथा चेतन है और पदार्थ प्राकृत तथा जड हैं। चेतनकी भूख जड पदार्थोंके द्वारा कैसे मिट सकती है। भूख है पेटमें और हलवा बाँधा जाय पीठपर तो भूख कैसे मिटे। प्यास लगनेपर गरमागरम बढ़िया-से-बढ़िया हलवा खानेसे भी प्यास नहीं मिट सकती। भूखे व्यक्तिकी भूख ठंडा जल पीनेसे कैसे निवृत्त हो सकती है। इसी प्रकार जीवको प्यास तो है चिन्मय परमात्माकी, किंतु वह उस प्यासको मिटाना चाहता है जड पदार्थोंके द्वारा! इसमें मुख्य कारण है— अविवेक! जीवका अविवेक मिटानेमें पदार्थ सर्वथा असमर्थ हैं; अत: वे शान्ति प्रदान नहीं कर सकते। उलटी राह चलनेसे गन्तव्य स्थानपर कैसे पहुँचेंगे। चाहे ब्रह्माजीकी आयुके कालतक जीव ऐश्वर्यके संग्रह और भोगोंके भोगनेमें लगा रहे तो भी उसकी भूख कभी नहीं मिट सकती, उसे शान्ति नहीं मिल सकती। शान्ति तो तभी मिलेगी, जब कामनाका अत्यन्त अभाव होगा।

यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत् सुखम्।

तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हत: षोडशीं कलाम्॥

‘जो भी संसारमें इष्ट पदार्थोंके मिलनेसे सुख होता है तथा जो स्वर्गीय महान् सुख है, वे सब सुख मिलकर भी तृष्णा-नाशके सुखके सोलहवें हिस्सेके बराबर भी नहीं हो सकते।’

न सुखं देवराजस्य न सुखं चक्रवर्तिन:।

यत् सुखं वीतरागस्य मुनेरेकान्तशीलिन:॥

‘एकान्तशील वीतराग मुनिको जो सुख है, वह सुख न तो इन्द्रको है न चक्रवर्ती सम्राट्को ही।’ संतोंने क्या ही सुन्दर कहा है—

ना सुख काजी पंडिताँ ना सुख भूप भयाँ।

सुख सहजाँ ही आवसी तृष्णा रोग गयाँ॥

‘तृष्णारूपी रोगके चले जानेपर सुख सहज ही आ जायगा।’ जबतक पदार्थोंकी लोलुपता है, दासता है, तबतक सुख कहाँ? दासता, लोलुपता, दीनता मिटनेपर ही सुख होगा और यह मिटेगी चाहके न रहनेपर।

चाह गयी चिंता मिटी मनुवा बेपरवाह।

जिनको कछू न चाहिये सो जग शाहंशाह॥

जबतक चाह है, तबतक चिन्ता नहीं मिटती और जबतक चिन्ता नहीं मिटती, तबतक सुख नहीं हो सकता।

पिङ्गला नामकी एक वेश्या थी। वह बड़ी प्रसिद्ध थी। बहुत-से भोगी, धनी उसके यहाँ आया करते थे और उसे धन दिया करते थे, किंतु एक दिन रात्रिको वह राह देखती ही रह गयी, पर कोई धन देनेवाला आया ही नहीं। इससे वह बड़ी उद्विग्न थी। इतनेमें ही उसने देखा कि उधरसे दत्तात्रेयजी अपनी मस्तीमें घूमते हुए चले आ रहे हैं। उनको देखकर वह विचारने लगी कि ‘इस जनक राजाकी विदेहनगरीमें मैं ही एक ऐसी मूर्खा हूँ, जो दूसरे पुरुषोंसे सुख और तृप्ति चाहती हूँ। वे मुझे क्या सुख देंगे, मेरी क्या तृप्ति करेंगे। यदि उनके पास सुख होता और वे मुझे सुख दे सकते तो मेरे पास उसे लेने क्यों आते? जो स्वयं अपनी प्यास नहीं बुझा सकता, वह दूसरेकी क्या बुझायेगा। जो स्वयं टुकड़ेके पीछे कुत्तेकी तरह सुखके लिये दर-दर भटकता है, वह औरोंको क्या सुख देगा?’ दत्तात्रेयजीकी मस्ती देखकर उसके मनमें ऐसे विचार आये और उसे वैराग्य हो गया। उसने सोचा—‘अबतक मैंने बड़ी भूल की, अब मैं अपना अमूल्य समय नष्ट नहीं करूँगी।’ उसके विषयमें श्रीशुकदेवजीने कहा है—

आशा हि परमं दु:खं नैराश्यं परमं सुखम्।

यथा संछिद्य कान्ताशां सुखं सुष्वाप पिंगला॥

(श्रीमद्भा० ११। ८। ४४)

‘आशा ही सबसे बड़ा दु:ख और निराशा ही सबसे बड़ा सुख है। पिङ्गला वेश्याने जब पुरुषकी आशा त्याग दी, तभी वह सुखसे सो सकी।’

सचमुच आशा ही दु:खों और पापोंकी जड़ है। गीतामें अर्जुनने भगवान् से प्रश्न किया है कि ‘मनुष्य पाप करना नहीं चाहता, फिर भी बलात् किसकी प्रेरणासे पाप करता है?’ इसपर भगवान् ने उत्तरमें कामनाको ही पापका कारण बतलाया। जितने व्यक्ति जेलमें पड़े हैं, जितने नरकोंकी भीषण यातना सह रहे हैं और जिनके चित्तमें शोक-उद्वेग हो रहे हैं तथा जो न चाहते हुए पापाचारमें प्रवृत्त होते हैं, उन सबमें कारण भीतरकी कामना ही है। संसारमें जितने भी दु:खी हैं, उन सबका कारण एक कामना ही है। कामना प्रत्येक अवस्थामें दु:खका अनुभव कराती रहती है—जैसे पुत्रके न होनेपर पुत्र होनेकी लालसाका दु:ख, जन्मनेपर उसके पालन-पोषण, विद्याध्ययन और विवाहादिकी चिन्ताका दु:ख और मरनेपर अभावका दु:ख होता है। कामनाके रहनेपर तो प्रत्येक हालतमें दु:खी ही होगा। अतएव जिस प्रकार आशा ही परम दु:ख है, इसी प्रकार निराशा—वैराग्य ही परम सुख है। स्त्री, पुत्र, परिवार—सब आज्ञाकारी मिल जायँ, तब भी सुख नहीं होगा, सुख तो इनकी कामनाके परित्यागसे ही होगा। ऐसा विचारकर पिङ्गला अपनी सारी धन-सम्पत्तिको लुटाकर वैराग्यके नशेमें निकल जाती है और निश्चय करती है कि मैं परमात्माका ही भजन-ध्यान करूँगी और परम सुखी हो जाऊँगी।

मैवं स्युर्मन्दभाग्याया: क्लेशा निर्वेदहेतव:।

येनानुबन्धं निर्हृत्य पुरुष: शममृच्छति॥

तेनोपकृतमादाय शिरसा ग्राम्यसंगता:।

त्यक्त्वा दुराशा: शरणं व्रजामि तमधीश्वरम्॥

संतुष्टा श्रद्दधत्येतद् यथालाभेन जीवती।

विहराम्यमुनैवाहमात्मना रमणेन वै॥

(श्रीमद्भा० ११।८।३८—४०)

‘(अवश्य मुझपर आज भगवान् प्रसन्न हुए हैं) अन्यथा मुझ अभागिनीको ऐसे क्लेश ही नहीं उठाने पड़ते, जिससे ‘वैराग्य’ होता है। मनुष्य वैराग्यके द्वारा ही सब बन्धनोंको काटकर शान्ति-लाभ करता है। अब मैं भगवान् का यह उपकार आदरपूर्वक सिर झुकाकर स्वीकार करती हूँ और विषयभोगोंकी दुराशा छोड़कर उन परमेश्वरकी शरण ग्रहण करती हूँ। अब मुझे प्रारब्धानुसार जो कुछ मिल जायगा, उसीसे निर्वाह कर लूँगी और संतोष तथा श्रद्धाके साथ रहूँगी। मैं अब किसी दूसरेकी ओर न ताककर अपने हृदयेश्वर आत्मस्वरूप प्रभुके साथ ही विहार करूँगी।’

सुख यदि पदार्थोंमें होता तो राजा-महाराजा राज्यका और पदार्थोंका त्याग क्यों करते। राजा भर्तृहरिने कहा है—

एकाकी नि:स्पृह: शान्त: पाणिपात्रो दिगम्बर:।

कदा शम्भो भविष्यामि कर्मनिर्मूलने क्षम:॥

‘अकेला, स्पृहारहित, शान्तचित्त, करपात्री और दिगम्बर होकर हे शम्भो! मैं कब अपने कर्मोंको निर्मूल करनेमें समर्थ होऊँगा।’

भर्तृहरि सब कर्मोंका निर्मूलन यानी अत्यन्ताभाव—ऐसी अवस्था केवल चाहते ही थे, ऐसी बात नहीं, वे उसे प्राप्त करके ही रहे। उनकी व्याकरणके नियमोंकी कारिकाएँ (श्लोक) देखनेमें आती हैं, उनका बड़ा सुन्दर साहित्य मिलता है। वे व्याकरण-साहित्य आदिके प्रकाण्ड विद्वान् थे और अध्ययन आदि जिस काममें लगे, उसे उन्होंने बड़ी तल्लीनतासे किया। जब राज्यकार्य हाथमें लिया, तब उसे बड़ी तत्परतासे और लगनसे सँभालते रहे। रात्रिमें स्वयं वेष बदलकर घूमते और निरीक्षण करते कि मेरी प्रजाको कोई कष्ट तो नहीं है। इस प्रकार प्रजाका पालन भी किया। सारे काम किये, पर किसी जगह भी टिके नहीं, अटके नहीं। पर जब वैराग्य ले लिया, तब फिर उसे छोड़कर कहीं गये नहीं। ठीक ही है—रहनेयोग्य, ठहरनेयोग्य एक निर्भय स्थान तो वैराग्य ही है; अन्य तो सभी भयप्रद हैं। स्वयं भर्तृहरिजी कहते हैं—

भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयं

माने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम्।

शास्त्रे वादभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भयं

सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्॥

‘भोगोंमें रोगादिका, कुलमें गिरनेका, धनमें राजाका, मानमें दैन्यका, बलमें शत्रुका, रूपमें बुढ़ापेका, शास्त्रमें विवादका, गुणमें दुर्जनका और शरीरमें मृत्युका भय सदा बना रहता है। इस पृथ्वीमें मनुष्योंके लिये सभी वस्तुएँ भयसे युक्त हैं। एक वैराग्य ही ऐसा है, जो सर्वथा भयरहित है!’

राजा भर्तृहरिको अपनी पहली अवस्थामें किये हुए कार्योंपर तो पश्चात्ताप ही हुआ, अन्तमें संतोष तो वैराग्यसे ही हुआ। वे कहते हैं—

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता-

स्तपो न तप्तं वयमेव तप्ता:।

कालो न यातो वयमेव याता-

स्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा:॥

‘हमने भोगोंको नहीं भोगा, भोगोंने ही हमें भोग लिया, हमें समाप्त कर दिया।’ अच्छे कुलमें जन्म होनेपर भी उससे गिरनेका भय रहता है। धनवान् को अपने पुत्रसे भी भय लगता है; फिर राजासे भय हो, इसमें तो कहना ही क्या है! मानमें दीनताका भय बना रहता है तो बलमें रिपुका भय उत्पन्न हो जाता है। बुढ़ापेका भय तो प्रसिद्ध ही है। उस अवस्थामें मनुष्य तीन पगोंसे चलता है।

लकरी पकरी सुखरी करमें पग पंथ परे न भरे डग री।

नगरी तनरी सुपुरानि परी, अब लूटत है भगरी बगरी॥

न घरी भर बैठ भज्यो सुहरी कथ कूर करी जगरी सगरी।

अब री बिरधापन बात बुरी सु अरी सम लागत है सुत री॥

एक संत कहते हैं—

जरा कुती जोबन ससो काल अहेरी लार।

पाव पलकमें मारसी गरब्यो कहा गँवार॥

जरा आनेपर वह बल, वह उत्साह, वह साहस कहाँ गया!

शास्त्रमें वाद-विवादका बड़ा भय रहता है। अन्य व्यक्तियोंकी अपेक्षा तो पढ़े-लिखेको ताप भी अधिक होता है। गँवारके केवल आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक—ये तीन ताप होते हैं, पर पढ़े-लिखे विद्वान् के ताप सात होते हैं—(१) आधिभौतिक, (२) आधिदैविक, (३) आध्यात्मिक, (४) अभ्यास (शास्त्रका अभ्यास), (५) भङ्ग (अपमानका भय), (६) विस्मार (भूल न जाऊँ-इसकी चिन्ता) और (७) गर्व (विद्वत्ताका अभिमान)।

‘गुणे खलभयम्’—जहाँ परीक्षक नहीं, गुणी नहीं, गुणग्राही नहीं, वहाँ मूर्खोंमें हमारा मूल्य ही क्या। एक गवैये थे। वे बड़ा सुन्दर सितार लेकर राजाके पास गये। पर राजा मूर्ख था, संगीतको क्या समझता! इसपर किसी कविने कहा—

रे गायक ये गायसुत तू जानत परबीन।

ये गाहक कड़बीन के तै लीन्हीं कर बीन॥

गुण कितने ही हों, पर गुणग्राहक नहीं तो उन्हें कौन लेगा। भर्तृहरि कहते हैं—‘हमारे पास बहुत विद्या थी, पर किसीने नहीं ली’—

बोद्धारो मत्सरग्रस्ता: प्रभव: स्मयदूषिता:।

अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमङ्गे सुभाषितम्॥

इसी प्रकार एक कविने कहा है—

कौन सुनै कासों कहूँ सुने तो समुझै नाहिं।

कहना सुनना समझना मन ही का मन माहिं॥

‘काये कृतान्ताद्भयम्’—शरीरके पीछे तो यमराज सदा ताकमें ही रहते हैं कि कब कलेवा करें—

इस स्वासका मूढ़ विस्वास कहा पल आवत ही रह जावता है।

सब पीर पैगम्बर खाक मिले तेरो का अनुमान फुलावता है॥

बड़े-बड़े राजा महाराजा हो गये। अब उनके महलोंके टूटे-फूटे खँडहर पड़े हैं। उनको देखनेसे मनमें वैराग्य होता है, जो सर्वथा अभयप्रद है। जिसके हृदयमें वैराग्य है, उसे शरीरके जानेका भी भय नहीं; फिर नाशवान् पदार्थोंके चले जानेका तो भय ही क्या है। क्योंकि—

अवश्यं यातारश्चिरतरमुषित्वापि विषया

वियोगे को भेदस्त्यजति न जनो यत् स्वयममून्।

व्रजन्त: स्वातन्त्रॺादतुलपरितापाय मनस:

स्वयं त्यक्ता ह्येते शमसुखमनन्तं विदधति॥

विषय-पदार्थ चाहे दीर्घ कालतक रहें, पर एक दिन वे अवश्य जानेवाले हैं—चाहे हम उनका त्याग कर दें अथवा वे हमें त्याग दें। उनका विछोह अवश्य होगा। पर संसारी मानव स्वयं उनका त्याग नहीं करते। जब विषय-पदार्थ स्वतन्त्रतासे उनका त्याग करते हैं, तब उनके मनको बड़ा संताप होता है; परन्तु यदि वे स्वयं उनका त्याग कर दें तो उन्हें अनन्त सुख-शान्तिकी प्राप्ति हो सकती है।

मनसे छोड़ देनेपर ये ही पदार्थ सुख देनेवाले हो जायँगे। जैसे, दस रुपये चोरी चले गये तो दु:ख होता है, पर अपनी इच्छासे दान दे दिया तो सुख देता है, किंतु उनसे सम्बन्ध विच्छेदमें तो कोई भेद नहीं।

कहा परदेसीकी प्रीति जावतो बार न लावै।

आत न देख्यो जात न जाण्यो क्या कहियाँ बणि आवै। १।

जैसे बास फूलन तें बिछुरे मांहो माहि समावै। २।

जैसे संग सरायको दिन ऊगे उठि जावै। ३।

जैमलदास अगम रस घटमें, जो खोजै सो पावै। ४।

—जानेवाला हो, उसे एक धक्का अपनी तरफसे दे और कह दे कि जा, चला जा तो मौज हो जाय!

एक जाट-दम्पति थे। दोनोंमें खटपट चला करती। जाटनी बार-बार कहा करती कि ‘मैं अब तुम्हारे घर नहीं रहूँगी, चली जाऊँगी।’ जाटने सोचा—‘नित्य लड़ाई करती है, अन्तमें यह जायगी ही; इज्जत भी लेती जायगी।’ इससे तो इसे पहले ही त्याग देना अच्छा है, एक दिन जब रातमें स्त्रीने स्पष्ट कह दिया कि ‘कल सबेरे मैं चली ही जाऊँगी,’ तब जाटने रातमें अपने कोठेपर खड़े होकर गाँववालोंको जोरसे घोषणा कर दी कि ‘अब मुझे कोई उलाहना न देना, मैंने आजसे ही अपनी पत्नीका परित्याग कर दिया है। स्त्री चली नहीं गयी, उसे मैंने निकाल दिया है।’ ऐसे ही संसारके समस्त पदार्थ जाटनीकी तरह हैं, अत: इन्हें पहलेसे ही त्याग दें। पदार्थोंको स्वयं त्याग देनेपर ये परम शान्ति देनेवाले हो जाते हैं—

अंतहु तोहि तजैंगे पामर! तू न तजे अबही ते।

ऐसा विचार करके भर्तृहरि कहते हैं—

अजानन् दाहार्त्तिं पतति शलभस्तीव्रदहने

न मीनोऽपि ज्ञात्वा वडिशयुतमश्नाति पिशितम्।

विजानन्तोऽप्येते वयमिह विपज्जालजटिलान्

न मुञ्चाम: कामानहह! गहनो मोहमहिमा॥

‘पतिंगा इस बातको नहीं जानता कि जलनेपर कैसी पीड़ा होती है, इसीलिये वह प्रचण्ड अग्निमें कूद पड़ता है। मछलीको भी बंसीमें लगा हुआ मांसका टुकड़ा खाते समय पता नहीं रहता कि उसके भीतर लोहेका काँटा है। परंतु हम तो यह जानते हुए भी कि विषय-भोग विपत्तिके जालमें फँसानेवाले हैं, उन्हें छोड़ नहीं पाते। अहो! हमारा कितना बड़ा और घना अज्ञान है।’

कई बार पदार्थोंको देखा, अनेक बार भोगोंको भोगकर देखा। फिर भी उनके पीछे पड़े हैं। पतिंगे आदि जानवर तो विषयसङ्गसे एक बार ही मरे, पर हमलोग तो भोगोंको भोगकर बार-बार मर रहे हैं; पर फिर भी चेत नहीं हो रहा है। बार-बार ठोकर लगनेपर भी सँभलनेका नाम नहीं लेते। आखिर कब अक्ल आयेगी। बूढ़े हो गये, जीवनका अमूल्य समय चला गया; फिर भी विषयोंकी ओर लोलुपतासे देख रहे हैं! पौत्रका, प्रपौत्रका मुँह देखना चाहते हैं। अरे, धनसे सुख मिलता दीखे तो धनीसे पूछो; स्त्रियोंमें सुखका भ्रम हो तो जिसके दो-तीन स्त्रियाँ हों, उससे पूछो; सामग्रीमें सुख दीखे तो अधिक सामग्रीवालोंसे मिलो। राज्यमें सुख दीखे तो राजाओंसे मिलकर बात कर लो। सुख तो कहीं नहीं मिलेगा; क्योंकि सुख केवल चाहके त्याग—वैराग्यसे ही है। कहा है—

चाह चूहड़ी रामदास सब नीचोंमें नीच।

तू तो केवल ब्रह्म था चाह न होती बीच॥

पर रागभरी दृष्टिवालोंको कोई वैराग्यवान् दीखता ही नहीं, जहाँ देखो वहाँ रागी-ही-रागी दीखते हैं। बात भी ठीक है, सच्चे वैराग्यवान् हैं ही कम; क्योंकि—

आदि अविद्या अटपटी घट घट बीच अड़ी।

कहो कैसे समझाइये कूएँ भाँग पड़ी॥

बातें बड़ी-बड़ी वैराग्यकी बनाते हैं; पर पदार्थोंको, भोगोंको देखकर जीभ लपलपाने लगती है। गीध बड़ा ऊँचा उड़ता है, पर उसकी दृष्टि नीचे सड़े मांसपर रहती है! यह तो राग ही है!

जो सच्चा वैराग्यवान् होता है, उसकी दृष्टि ही निराली हो जाती है। वैराग्यवान् जिधरसे निकल जाता है, उधर ही बड़ी मस्ती लहराने लगती है। वैराग्यवान् पुरुषकी सुखमयी स्थितिका वर्णन करते हुए भर्तृहरिजी कहते हैं—

मही रम्या शय्या मसृणमुपधानं भुजलता

वितानश्चाकाशो व्यजनमनुकूलोऽयमनिल:।

स्फुरद्दीपश्चन्द्रो विरतिवनितासङ्गमुदित:

सुखी शान्त: शेते विगतभवभीतिर्नृप इव॥

‘विरतिरूपी कान्ताके प्रसङ्गसे प्रमुदित होकर पृथ्वीकी रमणीय शय्या, अपनी भुजलताका सुन्दर तकिया, आकाश-रूपी चँदोवा, पवनरूप अनुकूल पंखा, चन्द्रमारूप सुन्दर दीपक आदि विविध सामग्रियोंसे युक्त भवभयसे विमुक्त पुरुष शान्तचित्त होकर राजाकी भाँति सुखसे सोता है।’

वैराग्यवान् पुरुष शहरकी गंदी गलियोंमें विष्ठाके कीड़ोंकी तरह क्यों घूमेगा। एक साधु कहा करते थे कि ‘मैं अपने मनको समझाता हूँ कि भोजन-वस्त्रादिकी कोई चाहना मत कर; नहीं तो तुझे शहरकी गंदी गलियाँ सूँघनी पड़ेंगी और बार-बार जन्मना-मरना पड़ेगा।’ श्रीशंकराचार्यजी कहते हैं—

पुनरपि जननं पुनरपि मरणं

पुनरपि जननीजठरे शयनम्॥

मनुष्य विषयोंकी गंदगीका तनिक-सा विचार कर ले तो उसे उलटी होने लग जाय।

गंदगीको कीड़ो मूढ़ मानत अनंदगी।

मायाको मजूर बंदो कहा जाने बंदगी॥

विषयलोलुप जीव विषयोंमें रचे-पचे रहकर सुख मानते हैं। ऐसे व्यक्तियोंमें और कीड़ोंमें क्या अन्तर है।

गुल शोर बबूला आग हवा सब कीचड़ पानी मिट्टी है।

हम देख चुके इस दुनियाको, सब धोखेकी-सी टट्टी है॥

दूरहि ते पर्वत दिषै, बेस्या बदन बिभात।

रनका बरनन, रम्य त्रय दूरहि से दरसात॥

पर्वत और वेश्याका मुख दूरसे ही सुन्दर दीखता है तथा दूरसे ही रणका वर्णन रम्य प्रतीत होता है, पर वहाँ पहुँचनेपर अच्छे-से-अच्छोंके छक्के छूट जाते हैं। इसी तरह वैराग्यवान् की मस्तीका अनुभव विरक्त ही करता है। हम पदार्थोंमें सुख खोजते हैं, पर पदार्थोंमें सुख कहाँ। भगवान् तो इस जगत् को दु:खालय और अशाश्वत बतलाते हैं। जिसमें हमारे बाप-दादोंको भी सुख नहीं मिला, उसमें हमें सुख कैसे मिलेगा? रज्जबजी दूल्हा बने जा रहे थे। रास्तेमें गुरुसे मिलने गये तो गुरुने कहा—

रज्जब तैं गज्जब कियो, माथे बाँध्यो मौर।

आयो थो हरिभजनको, करी नरक महँ ठौर॥

रज्जबजीने कहा—‘रज्जब गज्जब जब हुतो, जातो दुनिया साथ!’ रज्जबजी ऐसे थे, जिन्हें—

दादूसे सतगुरु मिले, सिष रज्जबसे जान।

एकहि सब्द सुलझि गये, रही न खैंचातान॥

एक ही शब्द काम कर गया! वैराग्यवान् पुरुषोंको तो देखनेसे ही वैराग्य हो जाता है। वेश्याको दत्तात्रेयजीने कहा कुछ नहीं, उसे उनको देखते ही वैराग्य हो गया! क्योंकि वैराग्यवान् की मुद्रा ऐसी ही होती है।

खंडी हंडी हाथ में बंडी-सी कौपीन।

रंडी दिसि देखे नहीं, काया दंडी कीन॥

वैराग्यकी बातमें भी इतना आनन्द है तो फिर यदि हृदयसे सच्चा वैराग्य हो जाय, तब तो आनन्दका कहना ही क्या। सच्चे वैराग्यवान् के सामने बढ़िया वस्त्र पहनकर, इत्र आदि लगाकर एवं शृङ्गार करके बैठनेवालेको बैठनेमें भी संकोच होता है। उपर्युक्त प्रकारका वैराग्य विवेक-विचारसे होनेवाला वैराग्य है।

किंतु साधनसे होनेवाला वैराग्य विचारसे होनेवाले वैराग्यसे भी श्रेष्ठ है। वाणीसे रामनामका जप प्रारम्भ कर दिया—‘राम राम राम राम राम।’ शरीर रोमाञ्चित और पुलकित हो रहा है तथा हृदयमें लबालब प्रेम भरा है, भगवान् की बात सुनकर ही नाचने लग जाता है। उस हालतमें कभी भूलकर भी पदार्थोंकी ओर मन नहीं जाता, उसे स्वाभाविक ही भोगोंसे वैराग्य रहता है। मन तो भगवान् की ओर ही प्रतिक्षण बरबस खिंचता रहता है। उसके हृदयमें प्रेमानन्द समाता नहीं। वह तो यही कहता रहता है कि ‘गिरधारीलाल! चाकर राखो जी’ और वह मीराकी तरह प्रेममें मस्त होकर नाचने लगता है।

पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे।

मतवाली मीरा प्रेममें मस्त होकर लगी नाचने। कारण क्या? भजनका रस मिल गया। सांसारिक दृष्टिसे ज्यादा-से-ज्यादा आकर्षक मान-बड़ाई, यश-कीर्ति है; इनकी तो परवा ही क्या हो, उलटी बदनामीसे डर न लगकर वह मीठी लगने लगती है। मीरा कहती है—

या बदनामी लागे मीठी। राणाजी! म्हाँने या बदनामी लागे मीठी।

थारे शहरको राणा! लोक निमाणो, बात करे अणदीठी॥

हरि मंदिरको नेम हमारे दुरजन लोकां म्हाने दीठी॥ राणाजी०

साँकड़ी सेरयाँमें म्हारा सतगुरु मिलिया, किस बिधि फिरूँ अफूटी।

म्हारो साँवरियो राणा घट-घट ब्यापक, थाँरे हियें री काँई फूटी॥

सासु ननद म्हारी देराणी जेठानी बल जल हो गयी अँगीठी।

मीराके प्रभु गिरधर नागर चढ़ गयो चोल मजीठी॥ राणाजी०

इस प्रकार साधन-भजन करनेपर जो वैराग्य होता है, उससे पदार्थोंमें राग अपने-आप अनायास मिट जाता है। भजनानन्दीको पदार्थोंसे अरुचि करनी नहीं पड़ती। उसका मन तो भगवान् में सहज ही संलग्न हो जाता है। यदि कहें कि हमलोगोंका मन हर जगह जाता है, तो ठीक है; हर जगह जाता है, पर भगवान् पर नहीं जाता। और अगर भगवान् पर चला जाय तो फिर लौटकर संसारमें आयेगा नहीं। मक्खी सब जगह जाकर बैठती है, पर आगपर नहीं। वह आगपर बैठती ही नहीं; पर यदि आगपर बैठ जाय तो फिर उठती ही नहीं, इसी प्रकार भगवान् में मन लग जानेपर फिर कहीं नहीं जाता, तद्रूप हो जाता है। अत: संसारसे वैराग्य और भगवान् में प्रेम होनेके लिये हमलोगोंको बड़ी तेजीसे भगवान् का भजन करना चाहिये—

कहै दास सगराम बड़गड़ै१ घालो घोड़ा।

भजन करो भरपूर रया दिन बाकी थोड़ा॥

थोड़ा दिन बाकी रया कद पहुँचोला ठेट।

अधबिचमें बासो बसो तो पड़सो किणरे पेट॥

पड़सो किणरे पेट पड़ैला भारी फोड़ा।

कहै दास सगराम बड़गड़ै घालो घोड़ा॥

एक भक्तदम्पति थे। पति-पत्नी दोनों ही बड़े भजनानन्दी थे। उनके भजन करनेका तरीका यह था कि वे अपने पासमें कुछ उड़द रख लेते और एक माला फेरनेपर एक उड़द उठाकर रख देते। इस प्रकार सेर, डेढ़सेर तथा दो-दो, तीन-तीन सेरतक उड़द समाप्त हो जाते। पति कहता कि मैं आध सेर भजन करूँगा तो पत्नी कहती, मैं एक सेर करूँगी। परस्पर होड़ लग जाती। हमें भी इसी प्रकार तेजीसे भजन करना चाहिये। भजन करते-करते क्या स्थिति होती है, इसपर भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—

वाग् गद्‍गदा द्रवते यस्य चित्तं

रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।

विलज्ज उद्गायति नृत्यते च

मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति॥

‘मेरा नाम-गुण-कीर्तन करते समय जिसका गला भर आता है, हृदय द्रवित हो जाता है, जो बार-बार मेरे प्रेममें आँसू ढालता है, कभी हँसने लगता है, कभी लाज-शर्म छोड़कर उच्च स्वरसे गाने और नाचने लगता है, ऐसा मेरा भक्त त्रिलोकीको पवित्र कर देता है।’

इसी प्रकार रामगीतामें भी कहा है—

य: सेवते मामगुणं गुणात्परं

हृदा कदा वा यदि वा गुणात्मकम्।

सोऽहं स्वपादाञ्चितरेणुभि: स्पृशन्

पुनाति लोकत्रितयं यथा रवि:॥

‘जो मेरे निर्गुणस्वरूपकी मनसे उपासना करता है अथवा कभी-कभी मायिक गुणोंसे अतीत मेरे सगुणस्वरूपकी भी सेवा-अर्चा करता है, वह मेरा ही स्वरूप है। वह अपनी चरण-रजके स्पर्शसे सूर्यकी भाँति तीनों लोकोंको पवित्र कर देता है।’

ऐसे भगवान् के प्यारे भक्त भगवान् की स्मृतिमें आनन्द-विभोर होकर घूमते हैं तो उनके दर्शनसे ही वैराग्य हो जाता है। जिस गलीमें होकर वे निकल जायँ, उधर ही वैराग्य और भगवत्प्रेमकी गङ्गा बह जाय। सुतीक्ष्ण-जैसे भक्तोंकी स्मृति हो जाय तो वैराग्य हो जाय। भगवान् भी तरु-ओटसे छिपकर देखते हैं। क्यों? अपने ध्यानमें निमग्न भक्तको देखकर वे भी मस्त हो गये और छिपकर देखने लगे।

साधन करनेसे अन्त:करण निर्मल होता है। फिर उससे वैराग्य होता है। इस प्रकारका वैराग्य विचारसे होनेवाले वैराग्यसे भी ऊँचा है।

परमात्माकी प्राप्ति हो जानेपर होनेवाला वैराग्य बहुत ही अलौकिक है, उसका तो वर्णन ही नहीं हो सकता; उसे न तो राग कह सकते हैं न वैराग्य ही। ऐसा विलक्षण वैराग्य परमात्मप्राप्त महापुरुषोंका ही होता है। ब्रह्मलोकतकके कभी कैसे ही कितने ही भोग क्यों न प्राप्त हों, उनके अन्त:करणमें रागकी, गन्धकी भी कभी जागृति होनेकी सम्भावना नहीं रहती; क्योंकि जब एक परमात्मतत्त्वके सिवा अन्य सत्ता ही मिट जाती है, तब किसके प्रति राग हो। पदार्थोंमें सत्ता न रहनेके कारण उनको परमात्मतत्त्वके सिवा कहीं रस या सार कुछ भी प्रतीत नहीं होता। उनके अन्त:करणमें अन्त:करणसहित संसारका मृगतृष्णा-जलकी भाँति तथा नींदसे जागनेपर स्वप्नकी भाँति अत्यन्त अभाव और परमात्मतत्त्वका भाव नित्य-निरन्तर दृढ़ताके साथ स्वाभाविक ही बना रहता है। फिर परमात्मतत्त्वके सिवा कुछ रहता ही नहीं।

उक्त अनिर्वचनीय स्थितिको प्राप्त करनेके लिये वैराग्यवान् पुरुषों और भगवत्प्राप्त पुरुषोंका सङ्ग करना चाहिये। उनके शब्दोंसे, उनकी क्रियाओंसे शिक्षा लेकर हमें तेजीसे चलना चाहिये। संसारके पदार्थोंमें कभी किसीको सुख हुआ नहीं, होगा नहीं, हो सकता नहीं। ऐसा विचारकर भक्तिमार्गीको भगवान् में मन लगानेकी चेष्टा करनी चाहिये तथा ज्ञानमार्गीको चित्तसे पदार्थोंकी सत्ताको मिटाकर एक सच्चिदानन्दघन पूर्ण ब्रह्म परमात्मा ही है—ऐसा दृढ़ निश्चय निरन्तर रखना चाहिये।