वासुदेव: सर्वम्
गीतामें भगवान् ने एक बड़ी विलक्षण बात बतायी है—
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:॥
(७। १९)
‘बहुत जन्मोंके अन्तमें अर्थात् मनुष्यजन्ममें* ‘सब कुछ वासुदेव ही हैं’—ऐसे जो ज्ञानवान् मेरे शरण होता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।’
ज्ञान किसी अभ्याससे पैदा नहीं होता, प्रत्युत जो वास्तवमें है, उसको वैसा ही यथार्थ जान लेनेका नाम ‘ज्ञान’ है। ‘वासुदेव: सर्वम्’ (सब कुछ परमात्मा ही हैं)—यह ज्ञान वास्तवमें है ही ऐसा। यह कोई नया बनाया हुआ ज्ञान नहीं है, प्रत्युत स्वत:सिद्ध है। अत: भगवान् की वाणीसे हमें इस बातका पता लग गया कि सब कुछ परमात्मा ही है, यह कितने आनन्दकी बात है! यह ऊँचा-से-ऊँचा ज्ञान है। इससे बढ़कर कोई ज्ञान है ही नहीं। कोई भले ही सब शास्त्र पढ़ ले, वेद पढ़ ले, पुराण पढ़ ले, पर अन्तमें यही बात रहेगी कि सब कुछ परमात्मा ही है; क्योंकि वास्तवमें बात है ही यही!
संसारमें प्राय: कोई भी आदमी यह नहीं बताता कि मेरे पास इतना धन है, इतनी सम्पत्ति है, इतनी विद्या है, इतना कला-कौशल है। परन्तु भगवान् ने ऊँचे-से-ऊँचे महात्माके हृदयकी गुप्त बात हमें सीधे शब्दोंमें बता दी कि सब कुछ परमात्मा ही है। इससे बढ़कर उनकी क्या कृपा होगी!
जितना संसार दीखता है, वह चाहे वृक्ष, पहाड़, पत्थर आदिके रूपमें हो, चाहे मनुष्य, पशु, पक्षी आदिके रूपमें हो, सबमें एक परमात्मा ही परिपूर्ण हैं। परमात्माकी जगह ही यह संसार दीख रहा है। बाहरसे संसारका जो रूप दीख रहा है, यह तो एक चोला है, जो प्रतिक्षण परिवर्तनशील है, नाशवान् है। परन्तु इसके भीतर सत्तारूपसे एक परमात्मतत्त्व है, जो अपरिवर्तनशील है, अविनाशी है। भूल यह होती है कि ऊपरके चोलेकी तरफ तो हमारी दृष्टि जाती है, पर उसके भीतर क्या है—इस तरफ हमारी दृष्टि जाती ही नहीं! इसलिये भगवान् कहते हैं—‘ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्’ (गीता १८।५५) ‘मनुष्य मेरेको तत्त्वसे जानकर फिर तत्काल मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है।’ तत्त्वसे जानना क्या है? जैसे सूती कपड़ोंमें रूईकी सत्ता है, मिट्टीके बर्तनोंमें मिट्टीकी सत्ता है, लोहेके अस्त्र-शस्त्रोंमें लोहेकी सत्ता है, सोनेके गहनोंमें सोनेकी सत्ता है, ऐसे ही संसारमें परमात्माकी सत्ता है—यह जानना ही तत्त्वसे जानना अर्थात् अनुभव करना है*।
सोनेसे बने गहनोंके अनेक प्रकार हैं; कोई गलेमें पहननेका है, कोई हाथोंमें पहननेका है, कोई कानोंमें पहननेका है, कोई नाकमें पहननेका है, आदि-आदि। उन गहनोंकी अनेक प्रकारकी आकृतियाँ हैं, अनेक प्रकारके नाम हैं, अनेक प्रकारका उपयोग है, अनेक प्रकारका तौल है, अनेक प्रकारका मूल्य है। वे सब तो अनेक प्रकारके हैं, पर सोना अनेक प्रकारका नहीं है। जिसमें कोई प्रकार नहीं है, जो एक ही है, उसको जानना ही तत्त्वसे जानना है। ऐसे ही संसारमें मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष, पहाड़, पत्थर, ईंट, रेत, चूना, मिट्टी आदि तो अनेक प्रकारके हैं, पर जो उनके भीतर रहनेवाला है, उसका कोई प्रकार नहीं है। वह प्रकाररहित तत्त्व ही परमात्मा है।
जैसे गहनोंमें परिवर्तन होता है, पर सोनेमें परिवर्तन नहीं होता। गहने बदल जाते हैं, पर सोना वही रहता है। ऐसे ही संसारमें निरन्तर परिवर्तन हो रहा है, पर इसमें जो अपरिवर्तनशील परमात्मतत्त्व है, वह ज्यों-का-त्यों रहता है। भगवान् ने कहा है—‘विनश्यत्स्वविनश्यन्तं य: पश्यति स पश्यति’ (गीता १३। २७) अर्थात् नष्ट होनेवालोंमें जो एक नष्ट न होनेवाला तत्त्व है, उसको देखनेवाला ही वास्तवमें सही देखता है। जैसे, स्थूल-दृष्टिसे देखा जाय तो कपड़े सब नष्ट हो जाते हैं, पर रूई रहती है। बर्तन सब नष्ट हो जाते हैं, पर मिट्टी रहती है। अस्त्र-शस्त्र सब नष्ट हो जाते हैं, पर लोहा रहता है। गहने सब नष्ट हो जाते हैं, पर सोना रहता है। ऐसे ही सब-का-सब संसार नष्ट होनेवाला है, पर परमात्मतत्त्व नष्ट होनेवाला नहीं है। उस कभी न बदलनेवाले और कभी नष्ट न होनेवाले तत्त्वकी तरफ ही देखना है, उसको ही मानना है, उसको ही जानना है, उसको ही महत्त्व देना है।
जैसे हम कहते हैं कि ‘यह पदार्थ है’ तो इसमें पदार्थ तो परिवर्तनशील संसार है और ‘है’ अपरिवर्तनशील परमात्मतत्त्व है। संसारमें देश, काल, क्रिया, वस्तु, व्यक्ति आदि तो अनेक हैं, पर उन सबमें ‘है’ (सत्ता) रूपसे विद्यमान परमात्मतत्त्व एक ही है। साधककी दृष्टि निरन्तर उस ‘है’ (परमात्मतत्त्व) पर ही रहनी चाहिये*। वह ‘है’ एक ठोस चीज है और सबको नित्य-निरन्तर प्राप्त है। संसार कभी किसीको प्राप्त हुआ नहीं, प्राप्त है नहीं, प्राप्त होगा नहीं और प्राप्त हो सकता नहीं। हमसे भूल यह होती है कि हम उस शरीर-संसारको ‘है’ (प्राप्त) मान रहे हैं, जो वास्तवमें है नहीं। शरीर पहले नहीं था—यह सबका अनुभव है, आगे यह शरीर नहीं रहेगा—यह भी सबका अनुभव है और शरीर प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है—यह भी सबका अनुभव है। इस अनुभवको ही महत्त्व देना है।
अगर भक्तिकी दृष्टिसे देखें तो सब रूपोंमें एक परमात्मा ही हमारे सामने आते हैं। हमें भूख लगती है तो अन्नरूपसे वे ही आते हैं, हमें प्यास लगती है तो जलरूपसे वे ही आते हैं, हम रोगी होते हैं तो ओषधिरूपसे वे ही आते हैं, हम भोगी होते हैं तो भोग्यरूपसे वे ही आते हैं, हमें गरमी लगती है तो छायारूपसे वे ही आते हैं, हमें सर्दी लगती है तो वस्त्ररूपसे वे ही आते हैं। तात्पर्य है कि सब रूपोंसे परमात्मा ही हमें प्राप्त होते हैं। परन्तु हम उन रूपोंमें आये परमात्माका भोग करने लग जाते हैं तो परमात्मा दु:खरूपसे, नरकरूपसे आते हैं!
प्रश्न—परमात्मा अन्न, जल आदि नाशवान् वस्तुओंके रूपमें क्यों आते हैं?
उत्तर—हम अपनेको शरीर मानकर अपने लिये वस्तुओंकी आवश्यकता मानते हैं और उनकी इच्छा करते हैं तो परमात्मा भी वैसे ही बनकर हमारे सामने आते हैं। हम असत् में स्थित होकर देखते हैं तो परमात्मा भी असत्-रूपसे ही दीखते हैं। हम परमात्माको जैसा देखना चाहते हैं, वे वैसे ही दीखते हैं—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ (गीता ४।११)। जैसे बालक खिलौना चाहता है तो माँ रुपये खर्च करके भी उसको खिलौना लाकर देती है, ऐसे ही हम जो चाहते हैं, परम दयालु परमात्मा उसी रूपसे हमारे सामने आते हैं। अगर हम भोगोंको न चाहें तो भगवान् को भोगरूपसे क्यों आना पड़े? बनावटी रूप क्यों धारण करना पड़े?