विषयासक्ति और भगवत्प्रीतिमें भेद

आसक्ति — प्रीति

१. अनित्य — नित्य

२. उत्पन्न — अनुत्पन्न

३. अविवेकसिद्ध — विवेकसिद्ध

४. घटती, बढ़ती, मिटती है — केवल बढ़ती ही है

५. सीमित — असीम

६. परिच्छिन्न — अपरिच्छन्न

७. बाँधती है — मुक्त करती है

८. मृत्यु देती है — अमर करती है

९. पराधीन करती है — स्वाधीन करती है

१०. एकतामें अनेकता दिखती है — अनेकतामें एकता दिखती है

११. रुलाती है — हँसाती है

१२. अप्रसन्नता लाती है — प्रसन्नता लाती है

१३. दु:खदायिनी — सुखदायिनी

१४. अशान्तिदा — शान्तिदा

१५. भयदा — अभयदा

१६. आदि-अन्तमें नीरस — सदा रसवर्द्धिनी

१७. सबसे निरादर कराती है — भगवान् से भी आदर कराती है

१८. मलिनता लाती है — शुद्धि लाती है

१९. चिन्ता देती है — निश्चिन्त करती है

२०. पतन करती है — उत्थान करती है

२१. औरोंके लिये भी दु:खद — भगवान् के लिये भी सुखद

२२. सदोष — निर्दोष

२३. लेना-ही-लेना — देना-ही-देना

२४. अप्राप्त — प्राप्त

२५. कृत्रिम — सहज

२६. जडता — चिन्मयता