विवेककी जागृति
मानव-शरीरकी महिमा विवेकके कारण ही है। विवेक प्राणिमात्रमें है; परन्तु जिससे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कर सकें, ऐसा (सत्-असत्, कर्तव्य-अकर्तव्यका) विवेक मनुष्यमें ही है। यह विवेक कर्मोंका फल नहीं है, प्रत्युत भगवत्प्रदत्त है। यह बुद्धिमें आता है, बुद्धिका गुण नहीं है। अत: बुद्धि तो कर्मानुसारिणी होती है, पर विवेक कर्मानुसारी नहीं होता। अगर विवेकको पुण्य-कर्मोंका फल मानें तो यह शंका पैदा होगी कि बिना विवेकके पुण्यकर्म कैसे हुए? कारण कि ये पुण्यकर्म हैं और ये पापकर्म हैं—ऐसा विवेक पहले होनेपर ही मनुष्य पापोंका त्याग करके पुण्यकर्म करता है। अत: विवेक पुण्यकर्मोंका फल नहीं है, प्रत्युत यह पुण्यकर्मोंका कारण और अनादि है।
लौकिक पदार्थोंकी प्राप्ति तो क्रियासे होती है, पर परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति विवेकसे होती है। मुक्त करनेकी शक्ति विवेकमें है, क्रियामें नहीं। अगर मनुष्यमें विवेककी प्रधानता हो तो वह प्रत्येक देशमें, प्रत्येक कालमें, प्रत्येक अवस्थामें, प्रत्येक परिस्थितिमें परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कर सकता है। कारण कि परमात्मतत्त्वसे कभी किसीका वियोग नहीं है। अत: मनुष्यका खास काम है—प्राप्त विवेकका आदर करना, उसको महत्त्व देना। विवेकका आदर करनेसे वह विवेक ही बढ़कर तत्त्वबोधमें परिणत हो जाता है।
प्रश्न—अन्त:करणको शुद्ध किये बिना विवेकका आदर कैसे होगा?
उत्तर—विवेक अन्त:करणकी शुद्धिके आश्रित नहीं है, प्रत्युत अन्त:करणकी शुद्धि विवेकके आश्रित है। विवेक अनादि तथा अनन्त है और अन्त:करणकी अशुद्धि सादि और शान्त है। विवेक असीम है और अशुद्धि सीमित है। विवेक स्वत:सिद्ध है, अशुद्धि स्वत: सिद्ध नहीं है। विवेक नित्य है, अशुद्धि अनित्य है। नित्यको अनित्य कैसे ढक सकता है? जडताका महत्त्व ही अन्त:करणको अशुद्ध करनेवाली चीज है। अत: विवेकको महत्त्व देनेसे अन्त:करण स्वत: शुद्ध हो जाता है।
शुद्ध करनेसे अन्त:करण शुद्ध नहीं होता। कारण कि शुद्ध करनेसे अन्त:करणके साथ सम्बन्ध बना रहता है। जबतक ‘मेरा अन्त:करण शुद्ध हो जाय’—यह भाव रहेगा, तबतक अन्त:करणकी शुद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि ममता ही अशुद्धिका कारण है—‘ममता मल जरि जाइ’ (मानस ७। ११७ क)। इसलिये गीताने अन्त:करणके साथ ममता न रखनेकी बात कही है; जैसे—
कायेन मनसा बुद्धॺा केवलैरिन्द्रियैरपि।
योगिन: कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये॥
(५।११)
‘कर्मयोगी आसक्तिका त्याग करके अन्त:करणकी शुद्धिके लिये केवल अर्थात् ममतारहित इन्द्रियाँ-शरीर-मन-बुद्धिके द्वारा कर्म करते हैं।’ कारण कि ममता-आसक्ति रखनेसे कर्म होते हैं, कर्मयोग नहीं होता।
विवेकके बिना केवल क्रियासे अन्त:करणकी शुद्धि नहीं होती।* शक्ति विवेकमें है, क्रियामें नहीं। क्रिया करनेमें करणकी मुख्यता रहेगी तो करणका आदर होगा। करणका आदर (महत्त्व) ही अन्त:करणकी अशुद्धि है।
अन्त:करणकी अशुद्धि वास्तवमें कर्ताकी अशुद्धि है; क्योंकि कर्ताका दोष ही करणमें आता है। जैसे, मनुष्य चोरी करनेसे चोर नहीं बनता, प्रत्युत चोर बनकर चोरी करता है। चोरी करनेसे उसका चोरपना दृढ़ होता है। अगर कर्ताकी नीयत शुद्ध हो तो वह चोरी नहीं कर सकता। अत: करणको शुद्ध करनेकी उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी कर्ताको शुद्ध होनेकी आवश्यकता है। अगर करणको शुद्ध करेंगे तो परिणाममें क्रिया शुद्ध होगी, कर्ता कैसे शुद्ध होगा? जैसे, कलम बढ़िया होगी तो लेखन-कार्य बढ़िया होगा, लेखक कैसे बढ़िया हो जायगा? कर्ता शुद्ध होता है—अन्त:करणसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर और अन्त:करणसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है—विवेकका आदर करनेसे।
एक मार्मिक बात है कि अन्त:करण अशुद्ध होनेपर भी विवेक जाग्रत् हो सकता है। इसीलिये गीतामें आया है कि पापी-से-पापी और दुराचारी-से-दुराचारी मनुष्य भी ज्ञान और भक्ति प्राप्त कर सकता है*। तात्पर्य है कि अपने कल्याणका दृढ़ उद्देश्य हो जाय तो पूर्वकृत पाप विवेककी जागृतिमें बाधक नहीं हो सकते। पाप तभी बाधक हो सकते हैं, जब विवेक कर्मोंका फल हो। परन्तु विवेक कर्मोंका फल है ही नहीं। कर्मोंके साथ विवेकका सम्बन्ध है ही नहीं। अत: विवेकका पापोंसे विरोध नहीं है। इसलिये साधकको चाहिये कि वह अपने विवेकको जाग्रत् करे।
प्रश्न—विवेक कैसे जाग्रत् होता है?
उत्तर—विवेक दो चीजोंसे जाग्रत् होता है— सत्सङ्गसे* और दु:ख (आफत) से। सत्सङ्ग परमात्मामें लगाता है और दु:ख संसारसे हटाता है। परमात्मामें लगना भी योग है ‘समत्वं योग उच्यते’ (गीता २।४८) और संसारसे हटना भी योग है ‘तं विद्याद् दु:खसंयोगवियोगं योग-सञ्ज्ञितम्’ (गीता ६।२३)।
रामचरितमानसमें आया है—‘बिनु सतसंग बिबेक न होई’ (१।३।४)। इसका तात्पर्य यह है कि सत्सङ्गके बिना विवेक जाग्रत् नहीं होता। सत्सङ्गसे बहुत विलक्षण लाभ होता है और स्वाभाविक शुद्धि होती है—
सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो
भवन्ति हृत्कर्णरसायना: कथा:।
तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि
श्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति॥
(श्रीमद्भा० ३।२५।२५)
‘संतोंके संगसे मेरे पराक्रमोंका यथार्थ ज्ञान करानेवाली तथा हृदय और कानोंको प्रिय लगनेवाली कथाएँ होती हैं। उनका सेवन करनेसे शीघ्र ही मोक्षमार्गमें श्रद्धा, प्रेम और भक्तिका क्रमश: विकास होगा।’
बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग॥
(मानस ७।६१)
केवल सत्सङ्गसे, सन्तोंकी आज्ञाका पालन करनेसे साधकको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है—
अन्ये त्वेवमजानन्त: श्रुत्वान्येभ्य उपासते।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणा:॥
(गीता १३।२५)
‘दूसरे जो मनुष्य इस प्रकार ध्यानयोग, ज्ञानयोग आदि साधनोंको नहीं जानते, प्रत्युत केवल जीवन्मुक्त महात्माओंसे सुनकर उपासना करते हैं अर्थात् उनके वचनोंको महत्त्व देते हैं तथा उसके अनुसार अपना जीवन बनाते हैं, ऐसे वे सुननेके परायण मनुष्य भी मृत्युको तर जाते हैं।’
अत: जहाँतक बने, साधकको सत्सङ्ग नहीं छोड़ना चाहिये और कुसङ्गसे बचना चाहिये। सत्सङ्गसे जितना लाभ होता है, उतनी ही कुसङ्गसे हानि होती है। परन्तु दोनोंमें फर्क है। कुसङ्गसे होनेवाली हानि तो फल देकर नष्ट हो जाती है, पर सत्सङ्गसे होनेवाला लाभ (विवेक) फल देकर नष्ट नहीं होता; क्योंकि यह सत् है और सत् कभी मिटता नहीं—‘नाभावो विद्यते सत:’ (गीता २।१६)।
संसारकी एक चाल है कि वह विश्वासघात करता ही है। वास्तवमें उससे विश्वासघात होता है, वह करता नहीं। कारण कि जीव संसारको सुखदायी समझकर उसकी तरफ आकृष्ट होता है, पर वह दु:खदायी सिद्ध होता है! इस प्रकार जब विश्वासघात होता है, तब हृदयमें एक रेख आती है कि ‘संसारमें मेरा कोई नहीं’! यह रेख ही मनुष्यको साधनमें लगा देती है, उसका विवेक जाग्रत् करा देती है।
दु:ख आनेपर भी यदि सुखकी इच्छा रहेगी तो विवेक जाग्रत् नहीं होगा; क्योंकि सुखकी इच्छा महान् दोषी है। सुखके द्वारा दु:ख दूर करनेकी इच्छा होनेपर दु:खकी वृद्धि ही होती है। कारण कि वास्तवमें सुखकी इच्छा ही सम्पूर्ण दु:खोंका कारण है। अत: दु:ख आनेपर सुखकी इच्छाका त्याग करना चाहिये और दु:खके कारणकी खोज करनी चाहिये। सुखकी इच्छाका त्याग करनेपर और दु:खके कारणकी खोज करनेपर विवेक जाग्रत् हो जाता है।