योग: कर्मसु कौशलम्
गीता समतामें ही साधनकी पूर्णता मानती है। यदि समता आ जाय तो सिद्ध पुरुषोंके सब लक्षण अपने-आप आ जाते हैं। यदि किसी साधकमें अन्य लक्षण तो हैं, पर समता नहीं है तो उसका साधन पूर्ण नहीं है। इसलिये गीतामें जहाँ-जहाँ सिद्धोंके लक्षण आये हैं, वहाँ-वहाँ समताकी मुख्यता आयी है। तात्पर्य है कि समता ही गीताका ध्येय है।
गीताका उपदेश दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे आरम्भ होता है। उपदेशके आरम्भमें भगवान् ने ग्यारहवें श्लोकसे तीसवें श्लोकतक शरीरी-शरीर, सत्-असत्, नित्य-अनित्य विवेकका वर्णन किया। फिर इकतीसवेंसे अड़तीसवें श्लोकतक क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करनेकी आवश्यकताका वर्णन करके उन्तालीसवें श्लोकमें भगवान् ने कहा—
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु।
(२। ३९)
‘यह (अड़तीसवें श्लोकमें वर्णित*) समता पहले सांख्य-योगमें कही गयी, अब तू इसको योगके विषयमें सुन।’
यहाँ पहली बार ‘बुद्धि’ शब्दका प्रयोग हुआ है। इससे पहले कहीं ‘बुद्धि’ शब्द नहीं आया। उन्तालीसवें श्लोकसे जो प्रकरण आरम्भ हुआ है, उसमें ‘समता’ को ही कहीं ‘बुद्धि’ शब्दसे (२। ३९, ४९—५१), कहीं ‘योग’ शब्दसे (२। ४८, ५०, ५३) और कहीं ‘बुद्धियोग’ शब्दसे (२। ४९) कहा गया है। अड़तालीसवें श्लोकमें भगवान् ‘योग’ की परिभाषा बताते हैं—
योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्धॺसिद्धॺो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
(२। ४८)
‘हे धनञ्जय! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समताको ही योग कहा जाता है।’
इसके बाद पचासवें श्लोकमें भगवान् कहते हैं—
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम्॥
(२।५०)
‘बुद्धि (समता) से युक्त मनुष्य वर्तमानमें ही पुण्य और पाप दोनोंसे रहित (निर्लिप्त) हो जाता है। अत: तू योग (समता) में लग जा; क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है।’
इस श्लोकमें आये ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ पदोंपर विचार करें तो इनके दो अर्थ लिये जा सकते हैं—
(१) ‘कर्मसु कौशलं योग:’ अर्थात् कर्मोंमें कुशलता ही योग है।
(२) ‘कर्मसु योग: कौशलम्’ अर्थात् कर्मोंमें योग ही कुशलता है।
अगर पहला अर्थ लिया जाय कि ‘कर्मोंमें कुशलता ही योग है’ तो जो बड़ी कुशलतासे, सावधानीसे चोरी, ठगी आदि कर्म करता है, उसका कर्म ‘योग’ हो जायगा! परंतु ऐसा मानना उचित नहीं है और यहाँ निषिद्ध कर्मोंका प्रसंग भी नहीं है। अगर यहाँ शुभ कर्मोंको ही कुशलतापूर्वक करनेका नाम योग मानें तो मनुष्य कुशलतापूर्वक, सांगोपांग किये हुए शुभ कर्मोंके फलसे बँध जायगा—‘फले सक्तो निबध्यते’ (गीता ५। १२); अत: उसकी स्थिति समतामें नहीं रहेगी और उसके दु:खोंका नाश नहीं होगा।
शास्त्रमें आया है—‘कर्मणा बध्यते जन्तु:’ ‘कर्मोंसे मनुष्य बँध जाता है।’ अत: जो कर्म स्वभावसे ही मनुष्यको बाँधनेवाले हैं, वे ही मुक्ति देनेवाले हो जायँ—यही वस्तुत: कर्मोंमें कुशलता है। मुक्ति योग (समता) से होती है, कर्मोंमें कुशलतासे नहीं। कर्म कितने ही बढ़िया हों, उनका आरम्भ तथा अन्त होता है और उनके फलका भी संयोग तथा वियोग होता है। जिसका आरम्भ और अन्त, संयोग और वियोग होता है, उसके द्वारा मुक्तिकी प्राप्ति कैसे होगी? नाशवान् के द्वारा अविनाशीकी प्राप्ति कैसे होगी? अत: महत्त्व योगका है, कर्मोंका नहीं।
अगर उपर्युक्त अर्थ ही ठीक माना जाय तो भी ‘कुशलता’ के अन्तर्गत समता, निष्कामभावको ही लेना पड़ेगा अर्थात् कर्मोंमें कुशलता ही योग है तो ‘कुशलता’ क्या है? इसके उत्तरमें यह कहना ही पड़ेगा कि योग (समता) ही कुशलता है। ऐसी स्थितिमें ‘कर्मोंमें योग ही कुशलता है’ ऐसा सीधा अर्थ क्यों न ले लिया जाय? जब उपर्युक्त पदोंमें ‘योग’ शब्द आया ही है, तो फिर ‘कुशलता’ का अर्थ योग लेनेकी जरूरत ही नहीं है!
अगर प्रकरणपर विचार करें तो योग (समता) का ही प्रकरण चल रहा है, कर्मोंकी कुशलताका नहीं। भगवान् ‘समत्वं योग उच्यते’ (२। ४८) कहकर योगकी परिभाषा भी बता चुके हैं। अत: इस प्रकरणमें योग ही विधेय है, कर्मोंमें कुशलता विधेय नहीं है। योग ही कर्मोंमें कुशलता है अर्थात् कर्मोंको करते हुए हृदयमें समता रहे, राग-द्वेष न रहें—यही कर्मोंमें कुशलता है। इसलिये ‘योग: कर्मसु कौशलम्’—यह योगकी परिभाषा नहीं है; किन्तु योगकी महिमा है।
इसी (पचासवें) श्लोकके पूर्वार्धमें भगवान् ने कहा है कि समतासे युक्त मनुष्य पुण्य और पाप दोनोंसे रहित हो जाता है। यदि मनुष्य पुण्य और पाप दोनोंसे रहित हो जाय तो फिर कौन-सा कर्म कुशलतासे किया जायगा?
गीतामें ‘कुशल’ शब्दका प्रयोग अठारहवें अध्यायके दसवें श्लोकमें भी हुआ है—
न द्वेष्टॺकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशय:॥
‘जो अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थित है।’
यहाँ ‘अकुशल कर्म’ के अन्तर्गत सकामभावसे किये जानेवाले और शास्त्रनिषिद्ध कर्म आते हैं तथा ‘कुशलकर्म’ के अन्तर्गत निष्काम भावसे किये जानेवाले शास्त्रविहित कर्म आते हैं। अकुशल और कुशल कर्मोंका तो आदि-अन्त होता है, पर योग (समता)-का आदि-अन्त नहीं होता। बाँधनेवाले राग-द्वेष ही हैं, कुशल-अकुशल कर्म नहीं। अत: रागपूर्वक किये गये कर्म कितने ही श्रेष्ठ क्यों न हों, वे बाँधनेवाले ही हैं; क्योंकि उन कर्मोंसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति भी हो जाय तो भी वहाँसे लौटकर पीछे आना पड़ता है—‘आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन’ (गीता ८।१६)। इसलिये जो मनुष्य अकुशल कर्मका त्याग द्वेषपूर्वक नहीं करता और कुशल कर्मका आचरण रागपूर्वक नहीं करता, वही वास्तवमें त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थित है*।
उपर्युक्त विवेचनसे सिद्ध हुआ कि ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ पदोंका अर्थ ‘कर्मोंमें कुशलता ही योग है’—ऐसा न मानकर ‘कर्मोंमें योग ही कुशलता है’—ऐसा ही मानना चाहिये। अब ‘योग’ क्या है—इसपर विचार किया जाता है।
गीतामें ‘योग’ शब्दके तीन अर्थ हैं—(१) समता, जैसे—‘समत्वं योग उच्यते’ (२।४८); (२) सामर्थ्य, ऐश्वर्य, प्रभाव; जैसे—‘पश्य मे योगमैश्वरम्’ (९।५); और (३) समाधि; जैसे—‘यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया’ (६।२०)। यद्यपि गीतामें ‘योग’ का अर्थ मुख्यतासे ‘समता’ ही है, तथापि ‘योग’ शब्दके अन्तर्गत तीनों ही अर्थ लेने चाहिये।
पातञ्जलयोगदर्शनमें चित्तवृत्तियोंके निरोधको ‘योग’ कहा गया है—‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:’ (१। २)। इस योगके परिणामस्वरूप द्रष्टाकी स्वरूपमें स्थिति हो जाती है—‘तदा द्रष्टु:स्वरूपेऽवस्थानम्’ (१। ३)। इस प्रकार पातञ्जलयोगदर्शनमें योगका जो परिणाम बताया गया है, उसीको गीता ‘योग’ कहती है*। तात्पर्य है कि गीता चित्तवृत्तियोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक स्वत:सिद्ध सम-स्वरूपमें स्वाभाविक स्थितिको ‘योग’ कहती है। इस समतामें स्थित होनेपर फिर कभी इससे वियोग अर्थात् व्युत्थान नहीं होता, इसलिये इसको ‘नित्ययोग’ कहते हैं। चित्तवृत्तियोंका निरोध होनेपर तो ‘निर्विकल्प अवस्था’ होती है, पर समतामें स्वत:सिद्ध स्थितिका अनुभव होनेपर ‘निर्विकल्प बोध’ होता है। निर्विकल्प बोध अवस्था नहीं है, प्रत्युत सम्पूर्ण अवस्थाओंसे अतीत तथा उनका प्रकाशक एवं सम्पूर्ण योग-साधनोंका फल है। इस प्रकार गीताका योग पातञ्जलयोगदर्शनके योगसे बहुत विलक्षण है।
परमात्मा सम हैं—‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’ (गीता ५। १९)। जीव परमात्माका अंश है—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५। ७); अत: समरूप परमात्माके साथ जीवका सम्बन्ध अर्थात् योग नित्य है। इस स्वत:सिद्ध नित्ययोगका ही नाम ‘योग’ है। यह नित्ययोग सब देशमें है, सब कालमें है, सब क्रियाओंमें है, सब वस्तुओंमें है, सब व्यक्तियोंमें है, सब अवस्थाओंमें है, सब परिस्थितियोंमें है, सब घटनाओंमें है। तात्पर्य है कि इस नित्ययोगका कभी वियोग हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं और हो सकता नहीं। परन्तु असत् (शरीर) के साथ अपना सम्बन्ध मान लेनेसे इस नित्ययोगका अनुभव नहीं होता। दु:खरूप असत् के साथ माने हुए संयोगका वियोग (सम्बन्ध-विच्छेद) होते ही इस नित्ययोगका अनुभव हो जाता है—‘तं विद्याद् दु:खसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्’ (गीता ६।२३)। यही गीताका मुख्य योग है और इसी योगका अनुभव करनेके लिये गीताने कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, ध्यानयोग आदि साधनोंका वर्णन किया है। परंतु इन साधनोंको योग तभी कहा जायगा, जब असत् से सम्बन्ध-विच्छेद और परमात्माके साथ नित्य सम्बन्धका अनुभव होगा।
पातञ्जलयोगदर्शनके योगका अधिकारी वह है, जो मूढ़ और क्षिप्त वृत्तिवाला नहीं है, प्रत्युत विक्षिप्त वृत्तिवाला है। परन्तु भगवान् की प्राप्ति चाहनेवाले सब-के-सब मनुष्य गीताके योगके अधिकारी हैं। इतना ही नहीं, जो मनुष्य भोग और संग्रहको महत्त्व न देकर इस योगको ही महत्त्व देता है और इसको प्राप्त करना चाहता है—ऐसा योगका जिज्ञासु भी वेदोंमें वर्णित सकाम कर्मोंका अतिक्रमण कर जाता है—‘जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते’ (गीता ६। ४४)।
इस योग-(समता-) की महिमा भगवान् ने दूसरे अध्यायके उन्तालीसवें-चालीसवें श्लोकोंमें चार प्रकारसे कही है—
(१) ‘कर्मबन्धं प्रहास्यसि’—समताके द्वारा मनुष्य कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
(२) ‘नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति’—इसके आरम्भका भी नाश नहीं होता।
(३) ‘प्रत्यवायो न विद्यते’—इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता।
(४) ‘स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्’— इसका थोड़ा-सा भी अनुष्ठान जन्म-मरणरूप महान् भयसे रक्षा कर लेता है।
यद्यपि पहली बातके अन्तर्गत ही शेष तीनों बातें आ जाती हैं, तथापि सबमें थोड़ा अन्तर है; जैसे—
(१) भगवान् पहले सामान्य रीतिसे कहते हैं कि समतासे युक्त मनुष्य कर्मबन्धनसे छूट जाता है। बन्धनका कारण गुणोंका संग अर्थात् प्रकृतिसे माना हुआ सम्बन्ध है—‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३।२१)। समता आनेसे प्रकृतिका सम्बन्ध नहीं रहता; अत: मनुष्य कर्मबन्धनसे छूट जाता है। जैसे संसारमें अनेक शुभाशुभ कर्म होते रहते हैं, पर वे कर्म हमें बाँधते नहीं; क्योंकि उन कर्मोंसे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं होता, ऐसे ही समतायुक्त मनुष्यका अपने कर्मोंसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता।
(२) समताका केवल आरम्भ हो जाय अर्थात् समताको प्राप्त करनेका उद्देश्य, जिज्ञासा हो जाय तो इस आरम्भका भी कभी नाश नहीं होता। कारण कि अविनाशीका उद्देश्य भी अविनाशी ही होता है, जब कि नाशवान् का उद्देश्य भी नाशवान् ही होता है। नाशवान् का उद्देश्य तो नाश (पतन) करता है, पर समताका उद्देश्य कल्याण ही करता है—‘जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते’ (गीता ६।४४)।
(३) समताके अनुष्ठानका उलटा फल नहीं होता। सकामभावसे किये जानेवाले कर्ममें अगर मन्त्रोच्चारण, अनुष्ठान-विधि आदिकी कोई त्रुटि हो जाय तो उसका उलटा फल हो जाता है* परन्तु जितनी समता अनुष्ठानमें (जीवनमें) आ गयी है, उसमें अगर व्यवहार आदिकी कोई भूल हो जाय, सावधानीमें कोई कमी रह जाय तो उसका उलटा फल (बन्धन) नहीं होता। जैसे, कोई हमारे यहाँ नौकरी करता है और अँधेरेमें लालटेन जलाते समय कभी उसके हाथसे लालटेन गिरकर टूट जाय तो हम उसपर नाराज होते हैं। परन्तु उस समय जो हमारा मित्र है, हमारेसे कुछ चाहता नहीं, उसके हाथसे लालटेन गिरकर टूट जाय तो हम उसपर नाराज नहीं होते, प्रत्युत कहते हैं कि हमारे हाथसे भी वस्तु टूट जाती है, तुम्हारे हाथसे वस्तु टूट गयी तो चिन्ताकी क्या बात है? अत: जो सकामभावसे कर्म करता है, उसके कर्मका तो उलटा फल हो सकता है, पर जो किसी प्रकारका फल चाहता ही नहीं, उसके अनुष्ठानका उलटा फल कैसे हो सकता है?
(४) समताका थोड़ा-सा भी अनुष्ठान हो जाय, थोड़ा-सा भी समताका भाव बन जाय तो वह जन्म-मरणरूप महान् भयसे रक्षा कर लेता है अर्थात् कल्याण कर देता है। जैसे सकाम कर्म फल देकर नष्ट हो जाता है, ऐसे यह थोड़ी-सी भी समता फल देकर नष्ट नहीं होती, प्रत्युत इसका उपयोग केवल कल्याणमें ही होता है। यज्ञ, दान, तप आदि शुभ कर्म यदि सकामभावसे किये जायँ तो उनका नाशवान् फल (धन-सम्पत्ति एवं स्वर्गादिकी प्राप्ति) होता है और यदि निष्कामभावसे किये जायँ तो उनका अविनाशी फल (मोक्ष) होता है। इस प्रकार यज्ञ, दान, तप आदि शुभ कर्मोंके तो दो-दो फल हो सकते हैं, पर समताका एक ही फल—कल्याण होता है। जैसे कोई मुसाफिर चलते-चलते रास्तेमें रुक जाय अथवा सो जाय तो वह जहाँसे चला था, वहाँ पुन: लौटकर चला नहीं जाता, प्रत्युत जहाँतक वह पहुँच गया, वहाँतकका रास्ता तो कट ही गया। ऐसे ही जितनी समता जीवनमें आ गयी, उसका नाश योगभ्रष्ट होनेपर भी नहीं होता अर्थात् स्वर्गादि लोकोंमें बहुत वर्षोंतक सुख भोगनेपर अथवा मृत्युलोकमें श्रीमानोंके घरमें सुख भोगनेपर भी उस समताका नाश नहीं होता (गीता ६।४१—४४)।
उपसंहार—
समताकी प्राप्तिके लिये बुद्धिकी स्थिरता बहुत आवश्यक है। पातञ्जलयोगदर्शनमें तो मनकी स्थिरता (वृत्तिनिरोध)को महत्त्व दिया गया है, पर गीता बुद्धिकी स्थिरता (उद्देश्यकी दृढ़ता)को ही महत्त्व देती है (२। ५५—६८)। कारण कि कल्याणप्राप्तिमें मनकी स्थिरताका उतना महत्त्व नहीं है, जितना बुद्धिकी स्थिरताका महत्त्व है। मनकी स्थिरतासे लौकिक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, पर बुद्धिकी स्थिरतासे लौकिक सिद्धियाँ प्राप्त न होकर पारमार्थिक सिद्धि (कल्याणप्राप्ति) होती है। कर्मयोगमें बुद्धिकी स्थिरता ही मुख्य है।* अगर मनकी स्थिरता होगी तो कर्मयोगी कर्तव्य-कर्म कैसे करेगा? कारण कि मन स्थिर होनेपर बाहरी क्रियाएँ रुक जाती हैं। भगवान् भी योग (समता)में स्थित होकर कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं—‘योगस्थ: कुरु कर्माणि’ (२। ४८)। तात्पर्य है कि कर्मोंका महत्त्व नहीं है, प्रत्युत योग (समता)का ही महत्त्व है। अत: कर्मोंमें योग ही कुशलता है।