प्रवचन—१०

मनुष्यका कल्याण किसी परिस्थितिके अधीन नहीं है, अपितु उसके सदुपयोगमें है। कैसी ही प्रतिकूल परिस्थिति क्यों न हो, उसमें वह अपना कल्याण कर सकता है। मनुष्य परिस्थितिको बदलनेका प्रयास अधिक करता है कि निर्धनता चली जाय और धनवत्ता आ जाय, मूर्खता चली जाय और विद्वत्ता आ जाय, रोग चला जाय और नीरोगता आ जाय, इत्यादि। इसीमें उसका बहुत समय चला जाता है। परंतु कल्याण करनेके लिये ‘प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग कैसे किया जाय’?—इसपर विचार करें तो बहुत लाभ होगा।

संसारमें ऐसी कोई भी परिस्थिति नहीं है कि जिसमें जीवका कल्याण न हो सकता हो। कारण कि परमात्मा किसी भी परिस्थितिमें कम या अधिक, समीप या दूर नहीं हैं, अपितु प्रत्येक परिस्थितिमें समानरूपसे विद्यमान हैं। अत: प्रत्येक परिस्थिति परमात्माकी प्राप्तिमें साधक हो सकती है, बाधक नहीं। मनुष्य-जन्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मिला है और किन्हीं दो मनुष्योंकी भी परिस्थिति समान नहीं रहती। इसलिये किसी एक परिस्थितिमें ही परमात्माकी प्राप्ति होती हो तो सब मनुष्योंका कल्याण हो सकता है—यह बात नहीं कही जाती, अपितु यह कहते कि किसी एकका ही कल्याण होगा। अत: साधकको प्रत्येक परिस्थितिका सदुपयोग करना चाहिये। सदुपयोगके लिये पहले परिस्थितिको देखे कि वह हमारे अनुकूल है या प्रतिकूल? यदि प्रतिकूल है, तो उसमें अनुकूलताकी इच्छाका त्याग करना है। प्रतिकूल परिस्थिति दु:खदायी तभी होती है, जब सुखदायी परिस्थितिकी इच्छा करते हैं। इसलिये यदि सुखदायी परिस्थिति-(अनुकूलता-)की इच्छाका त्याग करें तो दु:खदायी परिस्थिति (प्रतिकूलता) विकासका कारण हो जायगी। ऐसे ही सुखदायी परिस्थिति आये तो उसके सुख-भोगका और ‘वह बनी रहे’ ऐसी इच्छाका त्याग करना है; क्योंकि वह रहनेवाली है ही नहीं। उसका सुख स्वयं न भोगकर उसके द्वारा दूसरोंकी सेवा करनी है; क्योंकि अनुकूल परिस्थिति दूसरोंकी सेवाके लिये ही है, अपने सुखभोगके लिये नहीं।

एहि तन कर फल बिषय न भाई।

स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥

(मानस ७। ४३। १)

‘त्याग’ अर्थात् सुखका भोग नहीं करना और ‘सेवा’ अर्थात् दूसरोंको सुख पहुँचाना—ये दोनों ही चीजें कल्याण करनेवाली हैं, जिसे प्रत्येक मनुष्य कर सकता है। त्यागमें सेवा होती है और सेवामें त्याग होता है।

मनुष्य दु:खदायी परिस्थितिमें भी दूसरोंकी सेवा कर सकता है, दूसरोंको सुख पहुँचा सकता है। कोई कहे कि मेरे पास पैसे नहीं हैं, तो दूसरेको सुख कैसे पहुँचाऊँ! तो पैसोंसे ही दूसरोंको सुख पहुँच सकता हो—ऐसी बात नहीं है। हमारे हृदयमें दूसरोंको सुख पहुँचानेका भाव होना चाहिये। दूसरा दु:खी है तो उसके साथ हम भी हृदयसे दु:खी हो जायँ कि उसका दु:ख कैसे मिटे? उससे प्रेमपूर्वक बात करें और सुनें। उससे कहें कि दु:खदायी परिस्थिति आनेपर घबराना नहीं चाहिये; ऐसी परिस्थिति तो भगवान‍् राम एवं नल, हरिश्चन्द्र आदि अनेकों बड़े-बड़े पुरुषोंपर भी आयी है; आजकल तो अनेक लोग तुम्हारेसे भी अधिक दु:खी हैं; हमारे लायक कोई काम हो तो कहना, इत्यादि। ऐसी बातोंसे वह राजी हो जायगा। ऐसे ही सुखी व्यक्तिसे मिलकर हम भी हृदयसे सुखी हो जायँ कि बहुत अच्छा हुआ तो वह राजी हो जायगा। इस प्रकार हम सुखी और दु:खी—दोनों व्यक्तियोंकी सेवा कर सकते हैं। दूसरेके सुख और दु:ख—दोनोंमें सहमत होकर हम दूसरेको सुख पहुँचा सकते हैं। केवल दूसरोंके हितका भाव ‘सर्वभूतहिते रता:’ निरन्तर रहनेकी आवश्यकता है। जो दूसरोंके दु:खसे दु:खी और दूसरोंके सुखसे सुखी होते हैं, वे संत होते हैं—‘पर दुख दुख सुख सुख देखे पर’ (मानस ७।३७।१)।

एक शंका होती है कि हम पहले ही अपने दु:खसे दु:खी हैं, फिर दूसरेके दु:खसे भी दु:खी होने लगें तो हम तो हरदम रोनेमें ही रहे! हमारा दु:ख फिर कभी मिटेगा ही नहीं; क्योंकि संसारमें दु:खी तो मिलते ही रहेंगे! इसका समाधान यह है कि जैसे हमारे ऊपर कोई दु:ख आनेसे हम उसे दूर करनेकी चेष्टा करते हैं, वैसे ही दूसरेको दु:खी देखकर अपनी शक्तिके अनुसार उसका दु:ख दूर करनेकी चेष्टा होनी चाहिये। उसका दु:ख दूर करनेकी सच्ची भावना होनी चाहिये। अत: दूसरेके दु:खसे दु:खी होनेका तात्पर्य उसके दु:खको दूर करनेका भाव तथा चेष्टा करनेसे है, जिससे हमें प्रसन्नता ही होगी, दु:ख नहीं। दूसरेके दु:खसे दु:खी होनेपर अपने पास शक्ति, योग्यता, पदार्थ आदि जो कुछ भी है, वह सब स्वत: दूसरेका दु:ख दूर करनेमें लग जायगा। दु:खी व्यक्तिको सुखी बना देना तो हमारे हाथकी बात नहीं है पर उसका दु:ख दूर करनेके लिये अपनी सुख-सामग्रीको उसके अर्पित कर देना हमारे हाथकी बात है। इस प्रकार सुख-सामग्रीके त्यागसे तत्काल शान्तिकी प्राप्ति होती है—‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’(गीता १२।१२)।

पातंजलयोगदर्शनमें आया है—मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदु:खपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्। (१।३३) अर्थात् सुखीके साथ मैत्री, दु:खीके साथ करुणा, पुण्यात्माके साथ प्रसन्नता और पापात्माके साथ उपेक्षाकी भावना रखनेसे चित्त निर्मल होता है।

परंतु गीताने इन चारों बातोंको दोमें बाँट दिया है—‘मैत्र: करुण एव च’ (१२।१३)। तात्पर्य यह कि सुखी और पुण्यात्माको देखकर मैत्री हो एवं दु:खी और पापात्माको देखकर करुणा हो। पापात्माकी उपेक्षासे उतना लाभ नहीं होता, जितना करुणासे होता है। मैत्री और करुणाके भावसे अन्त:करण निर्मल हो जाता है। सुखीको देखकर ईर्ष्या करनेसे और दु:खीको देखकर अभिमान करनेसे अन्त:करण मैला हो जाता है। पापात्मासे घृणा-द्वेष करनेपर भी अन्त:करण मैला हो जाता है।

हमारे सामने चाहे जैसी परिस्थिति, अवस्था, देश, काल, व्यक्ति, वस्तु आदि आये, वह सब-की-सब परमात्माकी प्राप्तिमें साधन-सामग्री है। यदि मनुष्य उसका सदुपयोग करनेकी विद्या सीख जाय तो फिर उसका कल्याण निश्चित है।

कैसी ही परिस्थिति क्यों न हो, उसका सदुपयोग करना चाहिये। यदि सदुपयोग करना न आये तो सत्-शास्त्रोंमें देखे, संत-महापुरुषोंसे पूछे, स्वयं विचार करे, भगवान‍्को याद करे और उनसे प्रार्थना करे तो सद‍्बुद्धि पैदा हो जायगी। उसके अनुसार आचरण करनेसे उद्धार हो जायगा। गीता हमें सिखाती है—

सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।

ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

(२।३८)

‘जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दु:खको समान समझकर, उसके बाद युद्धके लिये तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको नहीं प्राप्त होगा।’

युद्धसे भी क्रूर कर्म और क्या होगा? पर वह भी जय-पराजय आदिमें सम होकर किया जाय, तो कल्याण करनेवाला हो जाता है। परन्तु प्रत्येक कर्म शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार होना चाहिये। प्रत्येक परिस्थितिमें हमारे सामने दो ही चीजें आती हैं—कर्म और उसका फल। अत: प्रत्येक कर्तव्य कर्म शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितके लिये करें और फल (सुख-दु:खादि)-में सम रहें। ऐसा करनेसे परमात्मामें अपनी स्वत:सिद्ध स्थितिका अनुभव हो जायगा।

दु:खदायी परिस्थितिका सदुपयोग है—सुखकी इच्छाका त्याग करना। सुखकी इच्छासे ही दु:ख होता है। सुखकी इच्छाका त्याग कर दे तो दु:ख होगा ही नहीं। जैसे, बीमार होनेपर, ‘मैं स्वस्थ हो जाऊँ’ ऐसी इच्छा रहनेसे ही दु:ख होता है। यदि बीमारीको भगवान‍्की भेजी हुई तपस्या मानें तो दु:ख नहीं होगा। एक व्यक्ति व्रत रखनेके कारण अन्न नहीं खाता और एक व्यक्तिको अन्न नहीं मिलता तो व्रत रखनेवालेको अन्न न मिलनेका दु:ख नहीं होता; क्योंकि उसमें अन्न खानेकी इच्छा ही नहीं है। परन्तु अन्न खानेकी इच्छा रहनेपर अन्न न मिले तो दु:ख होता है।

प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो उससे एक तो पापोंका नाश होता है और एक नया विकास होता है। परन्तु दु:खसे दु:खी होनेपर विकास रुक जाता है। सुख आनेपर तो साधनमें बाधा आ सकती है पर दु:ख आनेपर बाधा आ ही नहीं सकती; क्योंकि दु:ख अटकानेवाला नहीं है। इसलिये सुख आये या दु:ख, नफा हो या घाटा, बीमारी आये या स्वस्थता, आदर हो या निरादर, प्रशंसा हो या निन्दा, प्रत्येक परिस्थितिमें साधकको समान रहना चाहिये। ऐसा सुख आ जाय, इतना नफा हो जाय, ऐसी प्रशंसा हो जाय आदिकी इच्छा रखनेसे वैसा तो होता नहीं, वह मुफ्तमें दु:ख पाता रहता है। सुखदायी परिस्थितिमें सुखी होना भी भोग है और दु:खदायी परिस्थितिमें दु:खी होना भी भोग है। परन्तु दोनों परिस्थितियोंका सदुपयोग किया जाय तो भोग नहीं होगा, अपितु योग होगा अर्थात् उसके द्वारा परमात्मासे सम्बन्ध हो जायगा। भोगी व्यक्ति योगी नहीं हो सकता।

दु:खदायी परिस्थितिमें भगवान‍्की स्मृति आयेगी, दूसरेका दु:ख कैसा होता है—इसका अनुभव होगा और दयाका भाव आयेगा। वास्तवमें दु:खदायी परिस्थिति पापोंका फल नहीं, सुखकी इच्छाका फल है। मूल बात तो यही है। दु:खदायी परिस्थितिको भले ही पापोंका फल मान लें पर दु:खदायी परिस्थितिमें जो सुखकी इच्छा होती है, वह पापोंका फल नहीं, पापोंका कारण है। सुखकी इच्छा ही ‘काम’ है, जिससे सम्पूर्ण पाप होते हैं (गीता ३। ३६-३७)। सुख भोगनेसे सुखेच्छा बढ़ती है और सुखेच्छा बढ़नेसे दु:ख बढ़ता है।

सुखेच्छाका त्याग करनेका उपाय है—दूसरोंको सुख पहुँचानेका भाव। जैसे, हमारे पास अधिक धन है तो निर्धनोंको सुख कैसे हो? हमारे पास विद्या अधिक है तो विद्याहीनोंको सुख कैसे हो? हमारे पास जो भी सुखदायी सामग्री है, वह अपने भोगनेके लिये नहीं है। वह दूसरोंकी सेवा करनेके लिये ही है; दूसरोंके सेवामें लगाना ही उस सामग्रीका सदुपयोग है। सुख और दु:ख सदुपयोग करनेसे ही मिटेंगे, भोगनेसे नहीं। नहीं सदुपयोग करनेसे हम सुख और दु:ख दोनोंसे ऊँचे उठ जायँगे अर्थात् हमारा कल्याण हो जायगा। इसलिये प्रत्येक परिस्थिति हमारे कल्याणका साधन है। कारण कि भगवान‍्ने मनुष्यजन्म जीवके उद्धारके लिये दिया है। अत: उसे जो सामग्री दी है, वह कल्याणके लिये ही दी है।

करी गोपाल की सब होई।

जो अपनौं पुरुषारथ मानत,

अति झूठौ है सोई॥

साधन, मन्त्र, जन्त्र, उद्यम, बल,

ये सब डारौ धोई।

जो कछु लिखि राखी नँदनंदन

मेटि सकै नहिं कोई॥

दुख-सुख, लाभ-अलाभ समुझि तुम,

कतहिं मरत हौ रोई।

सूरदास स्वामी करुनामय,

स्याम-चरन मन पोई॥