प्रवचन—११

तत्त्वकी प्राप्ति हो जाय और होते ही वह दृढ़ हो जाय ऐसी बात बतायी जाती है। बिलकुल सबके अनुभवकी बात है। जड प्रकृति परिवर्तनशील है और चेतन परमात्मतत्त्वमें कभी परिवर्तन नहीं होता। वह सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। न बदलनेवालेका और निरन्तर बदलनेवालेका—दोनोंका हमें अनुभव है। बचपनसे लेकर अभीतक मैं वही हूँ—इसमें ‘मैं वही हूँ’ यह अनुभव न बदलनेवालेका है। संसार, शरीर, मनोवृत्ति, भाव, घटना, परिस्थिति, अवस्था आदि बदलनेवाले हैं। यह सबका अनुभव है। परन्तु उन बदलनेवालेको जाननेवाले हम नहीं बदलते। बदलनेवालेमें जब हम स्थित रहते हैं, तब हमें सुख और दु:ख होता है—‘पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥’ (गीता १३।२०) अर्थात् पुरुष सुख-दु:खके भोगनेमें हेतु होता है। कौन-सा पुरुष? ‘पुरुष: प्रकृतिस्थो हि’ (गीता १३। २१) अर्थात् प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही भोक्ता बनता है। जो हमारी मनोवृत्ति बदलती है, हमारी अवस्था बदलती है, हमारी दशा बदलती है, हमारे भाव बदलते हैं, हमारी क्रियाएँ बदलती हैं, हमारी परिस्थितियाँ बदलती हैं—इन बदलनेवालोंमें जब हम स्थित होते हैं, तब हम प्रकृतिमें स्थित होते हैं। मनमें जो काम-क्रोध, हर्ष-शोक, राग-द्वेष आदि वृत्तियाँ पैदा होती हैं, उनमें जब हम स्थित होते हैं, तब हम पराधीन होते हैं और सुख-दु:खका भोग करते हैं।

वास्तवमें एक दु:खके ही दो नाम सुख और दु:ख हैं। जैसे दादकी बीमारी एक है पर उसीके दो नाम खुजली और जलन हैं। खुजली अच्छी लगती है और जलन बुरी लगती है तो जो अच्छी लगती है वह भी बीमारी है, जो बुरी लगती है वह भी बीमारी है। ऐसे ही बदलनेवालेके साथ मिलकर जो हम सुखी और दु:खी होते हैं, यह भी एक बीमारी है। बीमारीका मतलब यह कि हम अपने स्वरूपमें स्थित (स्वस्थ) नहीं हैं, प्रकृतिमें स्थित हैं। जब हम बदलनेवाली वृत्तियोंमें, भावोंमें, क्रियाओंमें स्थित नहीं होते, इनसे अलग रहते हैं, तब हम स्वस्थ रहते हैं। तब हम सुख-दु:खमें समान रहते हैं—‘समदु:खसुख: स्वस्थ:’ (गीता १४।२४)। सम्पूर्ण अवस्थाओं, दशाओं, परिस्थितियों और घटनाओंमें हम रहते हैं, यह हमारा अनुभव है। अगर ऐसा नहीं हो तो सम्पूर्ण अवस्थाओं, दशाओं आदिका ज्ञान हमें कैसे होता? हमें इनका ज्ञान होता है, इससे सिद्ध होता है कि हम रहते हैं। हमें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, मूर्च्छा, समाधिका ज्ञान होता है। सुख-दु:खका भी ज्ञान होता है। शोक, मोह, चिन्ता, राग, द्वेष आदिका भी हमें ज्ञान होता है तो हम शोक, मोह, चिन्ता, भय, उद्वेग आदिसे रहित हैं। अगर ऐसा नहीं है तो हमें सुखका अनुभव होगा, दु:खका अनुभव नहीं होगा, हम शोकमें ही रात-दिन रहते हैं तो प्रसन्नताका हमें अनुभव नहीं होगा। परंतु ऐसा है नहीं। अनुकूलता-प्रतिकूलताको लेकर ठीक और बेठीक—दोनोंका ज्ञान हमें होता है तो वास्तवमें हम ठीक-बेठीकसे ऊँचे हैं। इस निर्द्वन्द्वतामें हम स्थित हो जायँ तो सुगमतासे मुक्त हो जायँ—‘निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥’ (गीता ५।३)। वास्तवमें तो हम मुक्त ही हैं पर द्वन्द्वोंको अपना मान करके फँस जाते हैं—

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।

सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥

(गीता ७।२७)

इच्छा (राग) और द्वेष, हर्ष और शोक—इन द्वन्द्वमोहसे मोहित होकर इनसे परे उस परमात्माको नहीं जानते। ‘सर्गे यान्ति’ का मतलब—आरम्भमें ही यह जीव मोहको प्राप्त हो जाता है और बार-बार जन्मता-मरता रहता है। बदलनेवालेमें न स्थित होकर अपने स्वरूपमें जो कि सम्पूर्णको जानता है, स्थित हो जायँ और जाननेमें आनेवाली तथा बदलनेवाली वस्तुके साथ न बदलें अर्थात् उसके साथ अपनी एकता न मानें तो हमारी स्थिति स्वत: स्वरूपमें है। स्वत: स्वरूपमें स्थितिका नाम है—जीवन्मुक्ति। पर स्वत: रहनेवालेके साथ न रहकर बदलने-वालेके साथ मिल जाते हैं, इसका नाम है—बन्धन। बन्धनको हम जब चाहें तब छोड़ दें और जब चाहें तब पकड़ लें। इसमें हम पराधीन नहीं हैं, स्वाधीन हैं। बन्धन पकड़कर बन्धनमें कभी स्थित रह नहीं सकते और स्वरूपसे विमुख होकर स्वरूपसे अलग कभी रह नहीं सकते; क्योंकि बन्धन तो मिटते रहते हैं, हम नये-नये पकड़ते रहते हैं और हमारा जो स्वरूप है, वह ज्यों-का-त्यों ही रहता है, कभी बदलता नहीं। स्वरूपमें हमारी स्थिति स्वत:सिद्ध है। स्वत:सिद्ध स्थितिका आदर न करके परत: स्थितिका, जो बदलती रहती है, आदर करते हैं—महत्त्व देते हैं; इसीसे जन्म-मरणमें भटकते हैं और दु:ख पाते हैं।

जब हम बदलनेवालेके साथ न रहकर, जो सम्पूर्ण बदलनेवालेको जानता है, उसमें स्थित हो जायँ तो हम अभी मुक्त हैं। मुक्तिके लिये भविष्य नहीं होगा। अमुक चीज नहीं है, अमुक अवस्था नहीं है, अमुक परिस्थिति नहीं है तो वह समय पाकर होगी। परन्तु यह समय पाकर नहीं होगा। यह समयसे अतीत है और सब समयमें है, किसी देशमें नहीं है और सम्पूर्ण देशोंमें है, किसी वस्तुमें नहीं है और सम्पूर्ण वस्तुओंमें है। देश-काल, वस्तु, व्यक्तिसे सर्वथा अतीत होते हुए भी सबमें परिपूर्ण है। उसमें स्थित होना स्वरूपमें स्थित होना है।

ज्ञानीकी भी वृत्तियाँ बदलती हैं—‘प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।’ (गीता १४।२२) अर्थात् तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषमें भी प्रकाश, प्रवृत्ति और मोहकी वृत्तियाँ होती हैं। बदलना इनका स्वभाव है और न बदलना हमारा स्वभाव है। उस स्वरूपमें हम स्वत:-स्वाभाविक स्थित हैं। केवल प्रकृतिमें स्थित नहीं होना है।

अब कोई प्रश्न करे कि यह बात समझमें तो आती है पर टिकती नहीं। तो उसका उत्तर यह है कि वास्तवमें यह बात मिटती ही नहीं, प्रत्युत निरन्तर रहती है; क्योंकि यह बात टिकती नहीं—इसे तो हम जानते ही हैं। ‘टिकती नहीं’ यह प्रकृति है और ‘जानते हैं’ यह स्वरूप है। प्रकृतिके साथ मिलें नहीं, इतनी ही बात है। वह तो मिटती ही है और स्वरूप टिकता ही है।

यह टिकती नहीं—इसे जाननेवाला भी मिटता है क्या? यदि मिटता है तो जानता कौन है? मिटनेको जाननेवाला न रहे तो मिटनेको जानेगा कौन? प्रकृति परिवर्तनशील है। वह तो बदलेगी ही। जाग्रत् होगा, स्वप्न होगा, सुषुप्ति होगी, ठीक होगा, बेठीक होगा, अनुकूल होगा, प्रतिकूल होगा—यह तो सदा ही होगा। पर इसे जाननेवालेमें क्या फर्क पड़ा? हम बदलनेवालेमें स्थित न हों; बदलनेवालेकी परवाह न करें। हम अपने स्वरूपमें ही स्थित रहें। अपने स्वरूपकी परवाह करनी है, उससे च्युत नहीं होना है। यह निश्चय हम पक्‍का रखें। फिर इसमें गलती नहीं होगी। इसपर जितना टिक जायँ, उतना ही लाभ होगा।